श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

38- भगवती लक्ष्मीका समुद्रसे प्रकट होना और इन्द्रके द्वारा महालक्ष्मीके ध्यान तथा स्तवन किये जाने और पुनः अधिकार प्राप्त किये जानेका वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद ! तदनन्तर भगवान् श्रीहरिका ध्यान करके देवराज इन्द्रने बृहस्पतिजीको आगे करके सम्पूर्ण देवताओंके साथ ब्रह्माकी सभाके लिये प्रस्थान किया। वे शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। सबको ब्रह्माजीके दर्शन हुए। इन्द्र और बृहस्पतिसहित समस्त देवताओं ने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया। तत्पश्चात् देवगुरु बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त क सुनाया। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी हँस पड़े। उन्होंने देवराजसे कहा।

ब्रह्माजी बोले-

वत्स! तुम मेरे वंशज हो । तुम्हें उत्तम बुद्धि प्राप्त है। मेरे प्रपौत्र हो। बृहस्पतिजी तुम्हारे गुरु हैं और तुम स्वयं भी देवताओंके स्वामी हो। परम प्रतापी विष्णुभक्त दक्ष प्रजापति तुम्हारे मातामह हैं। भला, जिसके तीनों कुल ऐसे पवित्र हों, वह सुयोग्य पुरुष अहंकार क्यों करे ? जिसकी माता परम पतिव्रता, पिता शुद्धस्वरूप और मातामह एवं मातुल जितेन्द्रिय हों, वह व्यक्ति अहंकारी क्यों बन जाय ? क्योंकि यदि पिता, मातामह और गुरु- ये तीन दोषी हों तो इन्हींके दोषसे सम्पन्न होकर पुरुष भगवान् श्रीहरिका द्रोही बन सकता है - यह निश्चित है। सर्वान्तरात्मा भगवान् श्रीहरि सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर में विराजमान रहते हैं। उनके देहसे निकल जानेपर उसी क्षण प्राणी शव बन जाता है। वे स्वामी हैं और हम सब लोग उनके अनुचर हैं। मैं प्राणियोंके शरीरमें इन्द्रियोंका स्वामी मन होकर रहता हूँ। शंकर ज्ञानका रूप धारण करके रहते हैं। विष्णुके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी भगवती श्रीराधा प्रकृतिके रूपमें विराजमान रहती हैं। बुद्धिको साध्वी दुर्गाका रूप माना गया है। निद्रा एवं क्षुधा आदि - ये सभी भगवती प्रकृतिकी कलाएँ हैं। आत्माका जो बुद्धिमें प्रतिबिम्ब है, वही जीव है। उसीने इस भोग- शरीरको धारण कर रखा है। जब शरीरका स्वामी आत्मा देहसे निकलकर जाने लगता है, तब ये सब भी तुरंत उसीके साथ-साथ चल पड़ते हैं; जैसे रास्ते में वरके आगे चलनेपर सभी बराती सज्जन उसका अनुसरण करते हैं। मैं शिव, शेषनाग, विष्णु, धर्म एवं महाविराट् तथा तुम सब लोग ये सब - जिनके अंश और भक्त हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यरूप पुष्पका तुमने अपमान कर दिया है। भगवान् शिवने जिस पुष्पसे उन श्रीहरिके चरणकमलोंकी पूजा की थी, वही पुष्प सौभाग्यवश मुनिवर दुर्वासाकी कृपासे तुम्हें प्राप्त हुआ था; परंतु तुमने उसका सम्मान नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलसे च्युत पुष्प जिसके मस्तकपर स्थान पाता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति सम्पूर्ण देवताओंमें प्रधान माना जाता है और उसीकी पहले पूजा होती है। हाय! दैवने तुम्हें ठग लिया। वास्तवमें दैव बड़ा प्रबल होता है। इस समय भगवान् श्रीकृष्णके निर्माल्यका परित्याग करनेसे रोषमें आकर भगवती श्रीदेवी तुम्हारे पाससे चली गयी हैं। अब तुम मेरे तथा बृहस्पतिके साथ वैकुण्ठमें चलो। मैं वर देता हूँ, अतः तुम वहाँ लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरिकी सेवा करके लक्ष्मीको अवश्य प्राप्त कर लोगे ।

नारद! इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंको साथ ले वैकुण्ठलोकमें गये। वहाँ जानेपर उन्हें परब्रह्म सनातन भगवान् श्रीहरिके दर्शन हुए। उस समय वे तेजःपुञ्ज प्रभु अपने ही तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका श्रीविग्रह ऐसा जान पड़ता था, मानो ग्रीष्म ऋतुके मध्याह्नकालिक - असंख्य सूर्य एक साथ चमक रहे हों। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित लक्ष्मीकान्त भगवान् श्रीहरि शान्तरूपसे विराजमान थे। वे चार भुजावाले पार्षदोंसे और भगवती सरस्वतीसे युक्त थे। चारों वेदोंसहित भगवती गङ्गा भक्ति प्रदर्शित करती हुई उनके पास विराजमान थीं। उन्हें देखकर ब्रह्माके अनुयायी सम्पूर्ण देवताओंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके प्रत्येक अङ्गमें भक्ति और विनयका विकास हो चुका था। आँखोंमें आँसू भरकर वे परम प्रभु भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करने लगे। स्वयं ब्रह्माजीने हाथ जोड़कर भगवान् से यथावत् समस्त वृत्तान्त कह सुनाया। उस समय समस्त देवता अपने अधिकारसे च्युत होनेके कारण रो रहे थे। विपत्तिने उनके हृदयमें भलीभाँति स्थान प्राप्त कर लिया था। भयके कारण उनमें घबराहटकी सीमा नहीं थी। उनके शरीरपर एक भी रत्न या आभूषण नहीं था। वे सवारीसे भी रहित थे। उन सभीके मुख म्लान थे। श्री तो पहले ही उनका साथ छोड़ चुकी थी। वे निस्तेज एवं भयग्रस्त थे। कुछ भी करनेकी शक्ति उनमें नहीं रह गयी थी। देवताओंको ऐसी दीन दशामें पड़े हुए देखकर भयको दूर करनेवाले भगवान् श्रीहरिने उनसे कहा।

भगवान् श्रीहरि बोले-

ब्रह्मन् तथा देवताओ ! भय मत करो मेरे रहते तुमलोगोंको किस बातका भय है। मैं तुम्हें परम ऐश्वर्यको बढ़ानेवाली अचल लक्ष्मी प्रदान करूँगा; परंतु मैं कुछ समयोचित बात कहता हूँ, तुमलोग उसपर ध्यान दो। मेरे वचन हितकर, सत्य, सारभूत एवं परिणाममें सुखावह हैं। जैसे अखिल विश्वके सम्पूर्ण प्राणी निरन्तर मेरे अधीन रहते हैं, वैसे ही मैं भी अपने भक्तोंके अधीन हूँ। मैं अपनी इच्छासे कभी कुछ नहीं कर सकता। सदा मेरे भजन चिन्तनमें लगे रहनेवाला निरङ्कुश भक्त जिसपर रुष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मीसहित मैं नहीं ठहर सकता - यह बिलकुल निश्चित है। मुनिवर दुर्वासा महाभाग शंकरके अंश एवं वैष्णव पुरुष हैं। उनके हृदयमें मेरे प्रति अटूट श्रद्धा भी है। उन्होंने तुम्हें शाप दे दिया है। अतएव तुम्हारे घरसे लक्ष्मीसहित मैं चला आया हूँ; क्योंकि जहाँ शङ्खध्वनि नहीं होती, तुलसीका निवास नहीं रहता, शंकरकी पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणोंको भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहतीं। ब्रह्मन् तथा देवताओ! जहाँ मेरे भक्तों की निन्दा होती है, वहाँ रहनेवाली महालक्ष्मीके मनमें अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे उस स्थानको छोड़कर चल देती हैं। जो मेरी उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमी के दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्तिके घरसे भी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो मेरे नामका तथा अपनी कन्याका विक्रय करता है एवं जहाँ अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घरको त्यागकर मेरी प्रिया लक्ष्मी अन्यत्र चली जाती हैं। जो ब्राह्मण पुंश्चलीके उदरसे उत्पन्न हुआ है अथवा पुंश्चलीका पति है, उसे 'महापापी' कहा गया है। उसके घर लक्ष्मी नहीं ठहर सकतीं।

जो ब्राह्मण बैल जोतता है, वह कमलालया भगवती लक्ष्मीका प्रेमभाजन नहीं हो सकता। अतः उसके यहाँसे वे चल देती हैं। जो अशुद्धहृदय, क्रूर, हिंसक और निन्दक है, उस ब्राह्मणके हाथका जल पीनेमें भगवती लक्ष्मी डरती हैं, अतः उसके घरसे वे चल देती हैं। जो शूद्रोंसे यज्ञ कराता है, कायर व्यक्तियों का अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, नखोंसे

पृथ्वीको कुरेदता रहता है; जो निराशावादी है, सूर्योदयके समय भोजन करता है, दिनमें सोता और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे मूर्खोके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो अल्पज्ञानी व्यक्ति भीगे पैर अथवा नंगा होकर सोता है तथा निरन्तर बेसिर-पैरकी बातें बकता रहता है, उसके घरसे साध्वी लक्ष्मी चली जाती हैं। जो सिरपर तैल लगाकर उसीसे दूसरेके अङ्गको स्पर्श करता है अर्थात् अपने सिरका तैल दूसरेको लगाता है तथा अपनी गोदमें बाजा लेकर उसे बजाता है, उसके घर से रुष्ट होकर लक्ष्मी चली जाती हैं। जो द्विज व्रत, उपवास, संध्या और विष्णुभक्तिसे हीन है, उस अपवित्र पुरुषके घरसे मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती हैं। जो ब्राह्मणोंकी निन्दा तथा उनसे द्वेष करता है, जीवोंकी सदा हिंसा करता है और दयारहित है, उसके घरसे जगज्जननी लक्ष्मी चली जाती हैं।

जिस स्थानपर भगवान् श्रीहरिकी चर्चा होती है और उनके गुणोंका कीर्तन होता है, वहींपर सम्पूर्ण मङ्गलोंको भी मङ्गल प्रदान करनेवाली भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं। पितामह ! जहाँ भगवान् श्रीकृष्णका तथा उनके भक्तोंका यश गाया जाता है, वहीं उनकी प्राणप्रिया भगवती लक्ष्मी सदा विराजती हैं। जहाँ शङ्खध्वनि होती है तथा शङ्ख, शालग्राम, तुलसी- इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं। जहाँ शिवलिङ्गकी पूजा और पवित्र कीर्तन तथा दुर्गापूजन एवं कीर्तन होता है, वहाँ कमलालया लक्ष्मी निवास करती हैं। जहाँ ब्राह्मणोंकी सेवा होती है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराये जाते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओंका अर्चन होता है, वहाँ पद्ममुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती हैं। नारद! रमापति भगवान् श्रीहरिने सम्पूर्ण देवताओंसे यों कहकर श्रीलक्ष्मीसे कहा-'देवि !

तुम अपनी कलासे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करना स्वीकार कर लो। इस प्रकार लक्ष्मीसे कहनेके पश्चात् उन जगत्प्रभुने पुनः ब्रह्मासे कहा – 'पद्मज ! तुम समुद्रका मन्थन करो, - उससे लक्ष्मी प्रकट होंगी। तब उन्हें देवताओंको सौंप देना।' मुने! यों अपना प्रवचन समाप्त करके कमलाकान्त भगवान् श्रीहरि अन्तःपुरमें चले गये। देवता उसी क्षण क्षीरसागरकी ओर चल पड़े। वहाँ सभी देवता और दानव एकत्रित हुए। मन्दराचल पर्वतको मन्थनकाष्ठ, कच्छपको पात्र तथा शेषनागको मन्थनकी रस्सी बनाकर वे क्षीरसमुद्रको मथने लगे। फलस्वरूप धन्वन्तरि वैद्य, अमृत, उच्चैःश्रवा घोड़ा, विविध रत्न, हाथियों में रत्न ऐरावत, लक्ष्मी, सुदर्शनचक्र तथा वनमाला- ये अमूल्य पदार्थ उन्हें प्राप्त हुए। मुने! उस समय भगवान् विष्णुमें अपार श्रद्धा रखनेवाली साध्वी श्रीलक्ष्मीने क्षीरशायी सर्वेश्वर श्रीहरिके गलेमें वनमाला पहना दी। फिर देवता, ब्रह्मा और शंकरके पूजन एवं स्तवन करनेपर उन्होंने देवताओंके भवनपर केवल दृष्टि फैला दी। इतनेमें ही देवताओंने दुर्वासामुनिके शापसे मुक्त होकर दैत्योंके हाथमें गये हुए अपने राज्यको प्राप्त कर लिया। नारद! यों महालक्ष्मीकी कृपासे वर पाकर वे परम सुखी हो गये।

इस प्रकार महालक्ष्मीका सम्पूर्ण श्रेष्ठ उपाख्यान मैंने बतला दिया। इस सारभूत उपाख्यान प्रभावसे समस्त सुख प्राप्त हो जाता है। अब पुनः तुम क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा-

प्रभो! मैं भगवान् श्रीहरिका मङ्गलमय गुणानुवर्णन, उत्तम ज्ञान तथा भगवती लक्ष्मीका अभीष्ट उपाख्यान सुन चुका। अब आप ध्यान और स्तोत्रका प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! प्राचीन समयकी बात है, देवराज इन्द्रने क्षीर-समुद्रके तटपर तीर्थमें स्नान किया, दो स्वच्छ वस्त्र पहने, एक कलश स्थापित किया और छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं— गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा इन देवताओंकी गन्ध, पुष्प आदि उपचारों से भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजा करनेके पश्चात् इन्द्रने परम ऐश्वर्यस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीका आवाहन किया। अपने पुरोहित बृहस्पति तथा ब्रह्माजीके बताये अनुसार पूजा सम्पन्न की। मुने! उस समय उस पवित्र देशमें अनेक मुनिगण, ब्राह्मण समाज, गुरुदेव, श्रीहरि, देववृन्द तथा आनन्दमय ज्ञानस्वरूप भगवान् शंकर विराजमान थे। नारद! देवराजने पारिजातका चन्दन चर्चित पुष्प लेकर भगवती महालक्ष्मीका ध्यान किया और उनकी पूजा की। पूर्वकालमें भगवान् श्रीहरिने ब्रह्माजीको जो ध्यान बतलाया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानसे इन्द्रने भगवतीका चिन्तन किया। मैं वह ध्यान तुम्हें बताता हूँ, सुनो– 'परम पूज्या भगवती महालक्ष्मी सहस्र दलवाले कमलकी कर्णिकाओंपर विराजमान हैं। इनकी सुन्दर साड़ी शरत्पूर्णिमाके करोड़ों चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न है। ये परम साध्वी देवी स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित हो रही हैं। इन परम मनोहर देवीका दर्शन पाकर मन आनन्दसे खिल उठता है। इनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। रत्नमय भूषण इनकी छवि बढ़ा रहे हैं। इन्होंने पीताम्बर पहन रखा है। इन प्रसन्न वदनवाली भगवती महालक्ष्मीके मुखपर मुस्कान छा रही है। ये सदा युवावस्थासे सम्पन्न रहती हैं और सम्पूर्ण सम्पत्तियों को देनेवाली हैं। ऐसी कल्याणस्वरूपिणी भगवती महालक्ष्मीकी मैं उपासना करता हूँ।'

नारद! इस प्रकार ध्यान करके ब्रह्माजीके आज्ञानुसार सोलह प्रकारके उपचारोंसे देवराज इन्द्रने असंख्य गुणोंवाली उन भगवती महालक्ष्मीकी पूजा की प्रत्येक वस्तुको भक्तिपूर्वक मन्त्र पढ़ते हुए विधिके साथ समर्पण किया। अनेक प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में उपस्थित कीं। [आसन-] 'भगवती महालक्ष्मी! जो अमूल्य रत्नोंका सार है तथा विश्वकर्मा जिसके निर्माता हैं, ऐसा यह विचित्र आसन सेवामें प्रस्तुत है, इसे स्वीकार कीजिये। [पाद्य -] कमलालये! इस शुद्ध गङ्गा-जलको सब लोग मस्तकपर चढ़ाते हैं। सभीको इसे पानेकी इच्छा लगी रहती है। पापरूपी ईंधनको जलाने के लिये यह अग्निस्वरूप है। आप इसे पाद्यरूपमें स्वीकार करें। [अर्घ्य –] पद्मवासिनि ! शङ्खमें पुष्प, चन्दन, दूर्वा आदि श्रेष्ठ वस्तुएँ तथा गङ्गाजल रखकर शुद्ध अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे ग्रहण कीजिये। [ सुगन्धित तैल-] श्रीहरिप्रिये! यह उत्तम गन्धवाले पुष्पोंसे सुवासित तैल तथा सुगन्धपूर्ण आमलकी फल शरीरकी सुन्दरता बढ़ानेका परम साधन है। आप इस स्नानोपयोगी वस्तुको स्वीकार करें। [ धूप -] श्रीकृष्णकान्ते! वृक्षका रस सूखकर निर्यास (गोंद) के रूपमें परिणत हो गया है। इसमें सुगन्धित द्रव्य मिला दिये गये हैं। ऐसा यह पवित्र धूप स्वीकार कीजिये । [ चन्दन-] देवि! यह मनोहर चन्दन मलयगिरिसे उत्पन्न हुआ है। यह चन्दन वृक्षका सार तत्त्व है, सुगन्धयुक्त एवं सुखदायक है। सेवामें समर्पित हुए इस चन्दनको स्वीकार करें। [दीप-] परमेश्वरि ! जो जगत्‌के लिये चक्षुःस्वरूप है, जिसके सामने अन्धकार टिक नहीं सकता तथा जो शुद्धस्वरूप है, ऐसे इस प्रज्वलित दीपको स्वीकार कीजिये। [ नैवेद्य-] देवि ! यह नाना प्रकारका उपहारस्वरूप नैवेद्य नाना प्रकार के रससे पूर्ण तथा विविध स्वादसे युक्त है। इसे स्वीकार कीजिये। [अन्न-] देवि! अन्नको ब्रह्मस्वरूप माना गया है। प्राणकी रक्षा इसीपर निर्भर है। तुष्टि और पुष्टि प्रदान करना इसका सहज गुण है। आप इसे ग्रहण कीजिये । [ खीर -] महालक्ष्मी! यह उत्तम पक्वान्न (खीर) चीनी और घृतसे युक्त है, इसे अगहनीके चावल तैयार किया गया है। आप कृपया इसे स्वीकार कीजिये। [स्वस्तिक नामक मिष्टान्न-] लक्ष्मि ! शर्करा और घृतमें सिद्ध किया हुआ यह परम मनोहर स्वादिष्ट स्वस्तिक नामक नैवेद्य है। इसे आपकी सेवामें समर्पित किया गया है, स्वीकार करें। [फल-] कमले! ये अनेक प्रकारके सुन्दर पके हुए फल हैं, जो स्वादिष्ट होनेके साथ ही मनोवाञ्छित फल देनेवाले हैं। इन्हें ग्रहण कीजिये। [ दुग्ध –] अच्युतप्रिये ! सुरभी गौके स्तनसे निकला हुआ यह मृत्युलोकके लिये अमृतस्वरूप परम सुस्वादु दुग्ध है। आप इसे स्वीकार कीजिये। [ गुड़ -] देवि ! ईखके स्वादभरे रसको अग्रिपर पकाकर बनाया गया यह गुड़ है। इसे ग्रहण कीजिये। [मिष्टान्न -] देवि! जौ, गेहूँ आदि चूर्णसे तैयार किया हुआ यह मिष्टान्न है। गुड़ और घृतके साथ अग्निपर यह सिद्ध किया गया है। इसे आप स्वीकार करें। [पिष्टक-] देवि ! धान्यके चूर्णसे बनाये गये स्वस्तिक आदि चिह्नोंसे युक्त इस पिष्टकको भक्तिपूर्वक आपकी सेवा में समर्पित किया है; स्वीकार कीजिये । [ ईख –] देवि! ईख इस भूतलका एक विशिष्ट वृक्ष है, इससे गुड़ आदि अनेक पदार्थ तैयार किये जाते हैं; अतः यह सुस्वादु रससे युक्त ईख सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण करें। [ व्यजन-] कमले ! शीतल वायु प्रदान करनेवाला यह व्यजन तथा स्वच्छ चँवर उष्णकालके लिये परम सुखदायी है। इसे ग्रहण कीजिये । [ताम्बूल] देवि ! यह उत्तम ताम्बूल कर्पूर आदि सुगन्धित वस्तुओं से सुवासित एवं जिह्वाको स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है। इसे आप स्वीकार कीजिये। [जल-] देवि ! प्यासको शान्त करनेवाला अत्यन्त शीतल, सुवासित एवं जगत्‌के लिये जीवन स्वरूप यह जल - स्वीकार कीजिये। [माल्य -] देवि ! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, असीम शोभाको देनेवाली तथा देवराजके लिये भी परम प्रिय इस पवित्र मालाको स्वीकार करें। [ आचमनीय - ] कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थ-जल, स्वयं शुद्ध तथा अन्यको भी सदा शुद्ध करनेवाला है। इसे आप रम्य आचमनीयके रूपमें स्वीकार करें। [ शय्या -] देवि ! यह अमूल्य रत्नोंसे बनी हुई सुन्दर शय्या वस्त्र और आभूषणोंसे सजायी गयी है, पुष्प और चन्दनसे चर्चित है। इसे आप स्वीकार करें। [ अपूर्व द्रव्य-] देवि ! यही नहीं, किंतु पृथ्वीपर जितने भी अपूर्व द्रव्य शरीरको सजानेके लिये परम उपयोगी हैं तथा देवराज इन्द्रके भी योग्य हैं, वे दुर्लभ वस्तुएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं। इन्हें स्वीकार करें।' मुने! देवराज इन्द्रने इस सूत्ररूप मन्त्रको पढ़कर भगवती महालक्ष्मीको उपर्युक्त द्रव्य समर्पण करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक विधिसहित उनके मूलमन्त्रका दस लाख जप किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। यह मूल मन्त्र सभीके लिये कल्पवृक्षके समान है। ब्रह्माजीकी कृपासे यह उन्हें प्राप्त हुआ था। पूर्वमें श्रीबीज (श्रीं), मायाबीज ( ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और वाणीबीज (ऐं) का प्रयोग करके 'कमलवासिनी' इस शब्दके अन्तमें 'डे' विभक्ति लगाने पर अन्तमें 'स्वाहा' शब्द जोड़ दिया जाय (श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा) – यही इस मन्त्रराजका स्वरूप है। कुबेरने इसी मन्त्रसे भगवती महालक्ष्मीकी आराधना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया। इसी मन्त्रके प्रभावसे दक्षसावर्णि मनुको से राजाधिराजकी पदवी प्राप्त हुई है तथा मङ्गल सातों द्वीपोंके राजा हुए हैं।

नारद! प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा राजा केदार - इन सिद्धपुरुषोंको राजेन्द्र कहलानेका सौभाग्य इसी मन्त्रने दिया है ।

इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिये। उस समय वे वरदायिनी सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर विराजमान थीं और अपनी प्रभासे सप्तद्वीपवती पृथ्वीको आच्छादित कर रही थीं। उनकी अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके पुष्पके समान थी।

रत्नमय भूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके मुखपर मुस्कान छायी थी। भक्तपर कृपा करनेके लिये वे परम आतुर थीं। उनके गलेमें रत्नोंका हार शोभा पा रहा था। असंख्य चन्द्रमाके समान उनकी प्रभा थी। ऐसी शान्तस्वरूपा जगदम्बा भगवती महालक्ष्मीको देखकर देवराज इन्द्र उनकी स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रके सर्वाङ्गमें पुलकावली छा गयी थी। उनके नेत्र आनन्दके आँसुओंसे पूर्ण थे और उनकी अञ्जलि बँधी थी। ब्रह्माजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान करनेवाला वैदिक स्तोत्रराज उन्हें स्मरण था। इसीको पढ़कर उन्होंने स्तुति आरम्भ की।

देवराज इन्द्र बोले –

भगवती कमलवासिनीको  नमस्कार है। देवी नारायणीको बार-बार नमस्कार है। संसारकी सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्माको अनेकशः नमस्कार है। कमलरत्नके समान नेत्रवाली कमलमुखी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है। पद्मासना, पद्मिनी एवं वैष्णवी नामसे प्रसिद्ध भगवती महालक्ष्मीको बार-बार नमस्कार है। सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवीको नमस्कार है। सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवीको बारंबार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करनेवाली तथा हर्ष प्रदान करनेमें परम कुशल देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवीको

भगवान् नारायण कहते हैं-

मुने! सृष्टिके प्रारम्भिक समयकी बात है— देवता भोजनकी व्यवस्थाके लिये ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी मनोहारिणी सभामें गये। मुने! वहाँ जाकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें भोजन देनेकी प्रतिज्ञा करके श्रीहरिके चरणोंकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञरूपमें प्रकट हुए। उस यज्ञमें जिस-जिस हविष्यकी आहुति दी गयी, वह सब ब्रह्माजीने देवताओंको दिया; किंतु ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण भक्तिपूर्वक जो हवन करते थे, वह देवताओंको उपलब्ध नहीं होता था। इसीसे सब उदास होकर ब्रह्मसभामें गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने आहार न मिलनेकी बात बतलायी। ब्रह्माजीने देवताओं की प्रार्थना सुनकर ध्यान द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। फिर भगवान्की आज्ञासे उन्होंने ध्यानके द्वारा ही मूलप्रकृतिकी पूजा की। तब सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती प्रकृति अपनी कलाद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्ति 'स्वाहा' के रूपमें प्रकट हुईं। उन परम सुन्दरी देवीके विग्रहकी सुन्दर श्याम कान्ति थी। वे मनोहारिणी देवी मुस्करा रही थीं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्यग्रचित्तवाली उन भगवती स्वाहाने ब्रह्माजीके सम्मुख उपस्थित होकर उनसे कहा- 'पद्मयोने! तुम वर माँगो !' तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवतीका वचन सुनकर सम्भ्रमपूर्वक कहा।

ब्रह्माजी बोले-

तुम अग्निकी दाहिकाशक्ति तथा उनकी परम सुन्दरी पत्नी होनेकी कृपा करो। तुम्हारे बिना अग्नि आहुतियोंको भस्म करनेमें असमर्थ हैं। जो मानव मन्त्रके अन्तमें तुम्हारे नामका उच्चारण करके देवताओंके लिये हवनीय पदार्थ अर्पण करें, उनका वह हविष्य देवताओंको सहज ही उपलब्ध हो जाय। अम्बिके! तुम अग्निदेवकी सर्वसम्पत्स्वरूपा एवं श्रीरूपिणी गृहस्वामिनी बनो। देवता और मनुष्य सदा तुम्हारी पूजा करेंगे। ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवती स्वाहा देवी उदास हो गयीं। उन्होंने स्वयं ब्रह्माजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया।

स्वाहा बोलीं-

ब्रह्मन्! मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करूँगी। उन परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त जो कुछ भी है सब स्वप्रके समान भ्रममात्र है। तुम जो जगत्की सृष्टि कर हो, भगवान् शंकरने जो मृत्युपर विजय प्राप्त की है, शेषनाग जो अखिल विश्वको धारण करते हैं, धर्म जो समस्त देहधारियोंके साक्षी हैं, गणेशजी जो सम्पूर्ण देव-समाजमें सर्वप्रथम पूजा प्राप्त करते हैं तथा जगदम्बा प्रकृतिदेवी जो सर्वपूज्या हुई हैं - यह सब उन भगवान् श्रीकृष्ण के कृपा प्रसादका ही फल है। भगवान् श्रीकृष्ण के सेवक होनेसे ही ऋषियों और मुनियोंका सर्वत्र सम्मान है। अतः पद्मज! मैं भी एकमात्र उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णके चरण कमलोंका सानुराग - चिन्तन करती हूँ ।

ब्रह्माजीसे यों कहकर वे कमलमुखी देवी स्वाहा निरामय भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये चल दीं। फिर एक पैरसे खड़ी होकर उन्होंने श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। तब प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्णके दर्शन उन्हें प्राप्त हुए। भगवान्‌के परम कमनीय सौन्दर्यको देखकर सुरूपिणी देवी स्वाहा मूच्छित-सी हो गयीं; क्योंकि वे उन कामेश्वर प्रभुको कान्तभावसे चाहने लगी थीं।

चिरकालतक तपस्या करनेके कारण क्षीण शरीरवाली देवी स्वाहाके अभिप्रायको वे सर्वज्ञ प्रभु समझ गये। उन्होंने उन्हें उठाकर अपने अङ्कमें बैठा लिया और कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-

कान्ते! तुम वाराहकल्पमें अपने अंशसे मेरी प्रिया बनोगी। तुम्हारा नाम 'नाग्नजिती होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्तिके रूपमें अग्निकी प्रिय पत्नी बनो। मेरे प्रसादसे तुम मन्त्रोंकी अङ्गभूता एवं परम पवित्र होओगी। अग्निदेव तुम्हें अपनी गृहस्वामिनी बनाकर भक्ति भावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम परम रमणीया देवीके साथ वे सानन्द विहार करेंगे।

नारद! देवी स्वाहासे इस प्रकार सम्भाषण करके उन्हें आश्वासन दे भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। फिर ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार डरते हुए अग्निदेव वहाँ आये और सामवेदमें कही हुई विधिसे जगज्जननी भगवतीका ध्यान करके उन्होंने देवीकी भलीभाँति पूजा और स्तुति की। तत्पश्चात् अग्रिदेवने मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहादेवीका पाणिग्रहण किया। देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक वे उनके साथ आनन्द करते रहे। परम सुखप्रद निर्जन देशमें रहते समय देवी स्वाहा अग्निदेवके तेजसे गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं, तत्पश्चात् दक्षिणाग्रि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयानिके क्रमसे उनके मनको मुग्ध करनेवाले परम सुन्दर तीन पुत्र उनसे उत्पन्न हुए। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय आदि सभी श्रेष्ठ वर्ण 'स्वाहान्त' मन्त्रोंका उच्चारण करके अग्निमें हवन करने लगे और देवताओंको वह आहाररूपसे प्राप्त होने लगा। जो पुरुष स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है, उसे केवल मन्त्र पढ़नेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार विषहीन सर्प, वेदहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्याहीन पुरुष तथा फल एवं शाखाहीन वृक्ष निन्दाके पात्र हैं, वैसे ही स्वाहाहीन मन्त्र भी निन्द्य है। ऐसे मन्त्रसे किया हुआ हवन शीघ्र फल नहीं देता। फिर तो सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गये। देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं स्वाहान्त मन्त्रसे ही उनके सारे कर्म सफल होने लगे। मुने! भगवती स्वाहासे सम्बन्ध रखनेवाला इस प्रकार यह सारा श्रेष्ठ उपाख्यान कह सुनाया। यह सारभूत प्रसङ्ग सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा-

प्रभो ! मुनीश्वर ! अब मुझे भगवती स्वाहाकी पूजाका वह विधान, ध्यान एवं स्तोत्र बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे अग्निदेवने उनकी पूजा करके स्तुति की थी।

भगवान् नारायण कहते हैं-

ब्रह्मन्! मुनिवर ! भगवती स्वाहाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाका जो विधान सामवेदमें कहा गया है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। पुरुषको चाहिये कि फल प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भमें शालग्रामकी प्रतिमामें अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका पूजन करके यज्ञ आरम्भ करे। ध्यान इस प्रकार करना चाहिये- 'देवी स्वाहा मन्त्रोंकी अङ्गभूता होनेसे परम पवित्र हैं। ये मन्त्रसिद्धिस्वरूपिणी हैं। सिद्ध एवं सिद्धिदायिनी हैं तथा मनुष्योंको उनके सम्पूर्ण कर्मोंका फल देनेवाली हैं। मैं उनका भजन करता हूँ।' मुने! यों ध्यान करके मूलमन्त्रसे पाद्य आदि अर्पण करनेके पश्चात् स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मूलमन्त्र यह है 'ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहा'। इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक जो भगवती स्वाहाकी पूजा करता है, उसके सारे मनोरथ अवश्य पूर्ण हो जाते हैं।

अग्निदेव बोले-

स्वाहा, आद्या प्रकृत्यंशा, मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी, मन्त्रफलदात्री, जगद्धात्री, सती, सिद्धिस्वरूपा, सिद्धा, सदा नृणां सिद्धिदा, हुताशदाहिकाशक्ति, हुताशप्राणाधिकरूपिणी, संसारसाररूपा, घोरसंसारतारिणी, देवजीवनरूपा और देवपोषणकारिणी- ये सोलह नाम भगवती स्वाहाके हैं। जो भक्तिपूर्वक इनका पाठ करता है, उसे इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है। उसका कोई भी कर्म अङ्गहीन नहीं होता। उसे सब कर्मोंमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सोलह नामोंके प्रभावसे पुत्रहीनको पुत्र तथा भार्याहीनको प्रिय भार्या प्राप्त हो जाती है।

भगवान् नारायण कहते हैं-

मुने! अब भगवती स्वधाका उत्तम उपाख्यान कहता हूँ, सुनो। यह पितरोंके लिये तृप्तिप्रद एवं श्राद्धोंके फलको बढ़ानेवाला है। जगत्स्स्रष्टा ब्रह्माने सृष्टिके आरम्भमें सात पितरोंका सृजन किया; उनमें चार तो मूर्तिमान् थे और तीन तेजःस्वरूप थे। उन सातों सिद्धिस्वरूप मनोहर पितरोंको देखकर उनके भोजनके लिये श्राद्ध-तर्पणपूर्वक दिया हुआ पदार्थ निश्चित किया। तर्पणान्त स्नान, श्राद्धपर्यन्त देवपूजन तथा त्रिकालसंध्यान्त आह्निक कर्म - यह ब्राह्मणोंका परम कर्तव्य है। यह बात श्रुतिमें प्रसिद्ध है। जो ब्राह्मण नित्य त्रिकालसंध्या, श्राद्ध, तर्पण, बलिवैश्वदेव और वेदध्वनि नहीं करता, उसे विषहीन सर्पके समान शक्तिहीन समझना चाहिये। नारद ! श्रीहरिकी सेवासे वञ्चित तथा भगवान्को भोग लगाये बिना खानेवाला मनुष्य जीवनपर्यन्त अपवित्र रहता है। उसे कोई भी शुभकार्य करनेका अधिकार नहीं है। इस प्रकार ब्रह्माजी तो पितरोंके आहारार्थ श्राद्ध आदिका विधान करके चले गये; परंतु ब्राह्मण आदि उनके लिये जो कुछ देते थे, उसे पितर पाते नहीं थे। अतः वे सभी क्षुधा शान्त न होनेके कारण दुःखी होकर ब्रह्माजीकी सभामें गये। उन्होंने वहाँ जाकर ब्रह्माजीको सारी बातें बतायीं। तब उन महाभाग विधाताने एक परम सुन्दर मानसी कन्या प्रकट की सैकड़ों चन्द्रमाकी प्रभाके समान मुखवाली वह देवी रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। उस साध्वी देवीमें विद्या, गुण, बुद्धि और रूप सम्यक् प्रकार से विद्यमान थे। श्वेत चम्पाके समान उसका उज्ज्वल वर्ण था। वह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित थी। मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी अंशभूता वह शुद्धस्वरूपा देवी मन्द मन्द मुस्करा रही थी। वर देनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी उस सुन्दरीका नाम 'स्वधा' रखा गया। भगवती लक्ष्मीके सभी शुभ लक्षण उसमें विराजमान थे। उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह अपने चरणकमलोंको शतदल कमलपर रखे हुए थी। उसके मुख और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उसे पितरोंकी पत्नी बनाया गया। ब्रह्माजीने पितरोंको

संतुष्ट करनेके लिये यह तुष्टिस्वरूपिणी पत्नी उन्हें सौंप दी। साथ ही अन्तमें 'स्वधा' लगाकर मन्त्रोंका उच्चारण करके पितरोंके उद्देश्यसे पदार्थ अर्पण करना चाहिये - यह गोपनीय बात भी ब्राह्मणोंको बतला दी। तबसे ब्राह्मण उसी क्रमसे पितरों को कव्य प्रदान करने लगे। यों देवताओंके लिये वस्तुदानमें 'स्वाहा' और पितरोंके लिये 'स्वधा' शब्दका उच्चारण श्रेष्ठ माना जाने लगा। सभी कर्मों (यज्ञों) में दक्षिणा उत्तम मानी गयी है। दक्षिणाहीन यज्ञ नष्टप्राय कहा गया है। उस समय देवता, पितर ब्राह्मण, मुनि और मानव-इन सबने बड़े आदरके साथ उन शान्तस्वरूपिणी भगवती स्वधाकी पूजा एवं स्तुति की। देवीके वर प्रसादसे वे सब के सब परम संतुष्ट हो गये।

उनकी सारी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं। मुने! इस प्रकार भगवती स्वधाके सम्पूर्ण उपाख्यानका वर्णन मैंने तुम्हारे सामने कर दिया। यह सबके लिये तुष्टिकारक है। पुनः क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा-

वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महामुने! अब मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, ध्यान और स्तोत्र सुनना चाहता हूँ। यत्नपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं-

ब्रह्मन्! देवी स्वधाका ध्यान-स्तवन वेदोंमें वर्णित है, अतएव सबके लिये मान्य है। शरत्कालमें आश्विन मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्र में अथवा श्राद्धके दिन यत्नपूर्वक भगवती स्वधाकी पूजा करके तत्पश्चात् श्राद्ध करना चाहिये। जो अभिमानी ब्राह्मण स्वधा देवीकी पूजा न करके श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध और तर्पणके फलका भागी नहीं होता- यह सर्वथा सत्य है। 'भगवती स्वधा ब्रह्माजीकी मानसी कन्या हैं, ये सदा तरुणावस्थासे सम्पन्न रहती हैं। पितरों और देवताओंके लिये सदा पूजनीया हैं। ये ही श्राद्धोंका फल देनेवाली हैं। इनकी मैं उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके शालग्राम शिला अथवा मङ्गलमय कलशपर इनका आवाहन करना चाहिये। तदनन्तर मूलमन्त्रसे पाद्य आदि उपचारों द्वारा इनका पूजन करना चाहिये। महामुने! 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्राह्मण इनकी पूजा, स्तुति और इन्हें प्रणाम करें। ब्रह्मपुत्र विज्ञानी नारद! अब स्तोत्र सुनो। यह स्तोत्र मानवोंके लिये सम्पूर्ण अभिलाषा प्रदान करनेवाला है। पूर्वकालमें ब्रह्माजी ने इसका पाठ किया था।

ब्रह्माजी बोले –

'स्वधा' शब्दके उच्चारण - मात्रसे मानव तीर्थस्नायी समझा जाता है। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर वाजपेय यज्ञके फलका अधिकारी हो जाता है। 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाय तो श्राद्ध, बलि और तर्पणके फल पुरुषको प्राप्त हो जाते हैं। श्राद्धके अवसरपर जो पुरुष सावधान होकर स्वधा देवीके स्तोत्रका श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धोंका फल पा लेता है - इसमें संशय नहीं है। जो मानव 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस पवित्र नामका त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्रका लाभ होता है। देवि! तुम पितरोंके लिये प्राणतुल्या और ब्राह्मणोंके लिये जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्धकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपासे श्राद्ध और तर्पण आदिके फल मिलते हैं। तुम पितरोंकी तुष्टि, द्विजातियोंकी प्रीति तथा गृहस्थोंकी अभिवृद्धि के लिये मुझ ब्रह्माके मनसे निकलकर बाहर जाओ। सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टिके समय प्रकट होती हो और प्रलयकालमें तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है। तुम ॐ नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदोंद्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपोंका निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगोंमें इन छहोंकी बड़ी मान्यता है।

इस प्रकार देवी स्वधाकी महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभामें विराजमान हो गये। इतने में सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं। तब पितामहने उन कमलनयनी देवीको पितरोंके प्रति समर्पण कर दिया। उन देवीकी प्राप्तिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे आनन्दसे विह्वल हो गये। यही भगवती स्वधाका पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित चित्तसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसको वेदपाठका फल मिलता है। (अध्याय ४०-४१)