नारदजीने कहा-
भगवन्! मैं धर्मराज और सावित्रीके संवादमें निर्गुण निराकार परमात्मा श्रीकृष्णका निर्मल यश सुन चुका वास्तवमें उनके गुणोंका कीर्तन मङ्गलोंका भी मङ्गल है। प्रभो! अब मैं भगवती लक्ष्मीका उपाख्यान सुनना चाहता हूँ। वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् ! सर्वप्रथम भगवती लक्ष्मीकी किसने पूजा की? इन देवीका कैसा स्वरूप है और किस मन्त्रसे इनकी पूजा होती है? आप मुझे इनका गुणानुवाद सुनानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले-
ब्रह्मन् ! प्राचीन समयकी बात है। सृष्टिके आदिमें परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके वामभागसे रासमण्डलमें भगवती श्रीराधा प्रकट हुईं। उन परम सुन्दरी श्रीराधा चारों ओर वटवृक्ष शोभा दे रहे थे। उनकी अवस्था ऐसी थी, मानो द्वादशवर्षीया देवी हों। निरन्तर रहनेवाला तारुण्य उनकी शोभा बढ़ा रहा था। उनका दिव्य विग्रह ऐसा प्रकाशमान था, मानो श्वेत चम्पकका पुष्प हो। उन मनोहारिणी देवीके दर्शन परम सुखी बनानेवाले थे। उनका प्रसन्नमुख शरत्पूर्णिमाके कोटि-कोटि चन्द्रमाओंकी प्रभासे पूर्ण था। उनके विकसित नेत्रोंके सामने शरत्कालके मध्याह्नकालिक कमलोंकी शोभा छिप जाती थी। परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके साथ विराजमान रहनेवाली वे देवी उनकी इच्छाके अनुसार दो रूप हो गयीं। रूप, वर्ण, तेज, अवस्था, कान्ति, यश, वस्त्र, आकृति, आभूषण, गुण, मुस्कान, अवलोकन, वाणी, गति, मधुर स्वर, नीति तथा अनुनय-विनयमें दोनों (राधा तथा लक्ष्मी) समान थीं। श्रीराधाके बाँयें अंशसे लक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ और अपने दाहिने अंशमें श्रीराधा स्वयं ही विद्यमान रहीं। श्रीराधाने प्रथम परात्पर प्रभु द्विभुज भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपसे स्वीकार कर लिया। भगवान्का वह विग्रह अत्यन्त कमनीय था। महालक्ष्मीने भी श्रीराधाके वर लेनेके पश्चात् उन्हींको पति बनानेकी इच्छा की। तब भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें गौरव प्रदान करनेके विचारसे ही स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हो गये। अपने दक्षिण अंशसे वे दो भुजाधारी श्रीकृष्ण ही बने रहे और वाम अंश से चतुर्भुज विष्णुके रूपमें परिणत हो गये। उन्होंने महालक्ष्मीको भगवान् विष्णुकी सेवामें समर्पित कर दिया जो देवी अपनी स्नेहभरी दृष्टि से विश्वको माताकी भाँति निरन्तर देखती-भालती रहती हैं, वे ही देवियोंमें महती होनेके कारण महालक्ष्मीके नामसे प्रसिद्ध हुईं। इस प्रकार द्विभुज भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्राणपति बने और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु लक्ष्मीके। द्विभुज श्रीकृष्ण गोपों और गोपियोंसे आवृत हो गोलोकमें अत्यन्त शोभा पाने लगे और चतुर्भुज भगवान् श्रीविष्णु भगवती लक्ष्मीसहित वैकुण्ठधामको च गये। ये भगवान् श्रीविष्णु और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों समस्त अंशोंमें एक समान ही हैं।
भगवती श्रीमहालक्ष्मी योगबलसे नाना रूपोंमें विराजमान हुईं। वे सम्पूर्ण सौभाग्योंसे सम्पन्न होकर परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा, परिपूर्णतमा 'महालक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हो वैकुण्ठधाममें निवास करने लगीं। प्रेमके कारण समस्त नारीसमुदायमें वे प्रधान हुईं। वे स्वर्गमें इन्द्रकी सम्पत्तिस्वरूपिणी होकर 'स्वर्गलक्ष्मी' के नामसे प्रसिद्ध हुई। पातालमें तथा मर्त्यलोकमें राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' हुईं। गृहस्थोंके यहाँ 'गृह लक्ष्मी' के नामसे पूजित हुईं। अपने कलांशसे ये ही गृहिणी भी कहलाती हैं। वे गृहस्थोंके लिये सम्पत्स्वरूपा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला हैं। गौओंकी जननी सुरभि तथा यज्ञपत्नी दक्षिणा भी वे ही हैं। क्षीरसागरके यहाँ उसकी कन्या हैं। कमलों में 'श्री' तथा चन्द्रमा और सूर्यमें 'शोभा' रूपसे उन्हींका निवास है। वे सूर्यमण्डलका अलंकार हैं। भूषण, रत्न, फल, जल, राजा, रानी, दिव्य नारी, गृह, सम्पूर्ण धान्य, वस्त्र, पवित्र स्थान, देवताओंकी प्रतिमा, मङ्गल कलश, माणिक्य, मोतियोंकी सुन्दर मालाएँ, बहुमूल्य हीरे, चन्दन वृक्षोंकी सुरम्य शाखा तथा नूतन मेघ - इन सभी वस्तुओंमें भगवती श्रीलक्ष्मीका अंश विद्यमान है।
मुने! सर्वप्रथम भगवान् नारायणने वैकुण्ठधाममें इन महालक्ष्मीकी पूजा की दूसरी बार ब्रह्माजीने भक्तिपूर्वक इनका अर्चन किया। तीसरी बार भगवान् श्रीशिवने इनकी आराधना की। मुने! फिर भगवान् विष्णुने क्षीरसागरमें इनकी पूजा की।
तदनन्तर स्वायम्भुव मनु, मानवेन्द्र, ऋषीश्वर, मुनीश्वर तथा साधु गृहस्थ — इन लोगोंने महालक्ष्मीकी उपासना की है। गन्धर्व और नाग आदिने पाताललोकमें इनका पूजन किया। भाद्रपदमासकी शुक्ल अष्टमीके सुअवसरपर ब्रह्माद्वारा ये सुपूजित हुईं। नारद! फिर भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें पूरे पक्षतक त्रिलोकीमें इनकी भक्तिपूर्वक पूजा होने लगी। चैत्र, पौष तथा भाद्रपदमासके पवित्र मङ्गलवारको भगवान् विष्णुने भक्तिपूर्वक तीनों लोकोंमें इनकी पूजाका महोत्सव चालू किया। वर्षके अन्तमें पौषकी संक्रान्तिके दिन मनुने अपने प्राङ्गणमें इनकी प्रतिमाका आवाहन करके इनकी पूजा की। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें वह पूजा प्रचलित हो गयी। राजेन्द्र ! मङ्गल, केदार, नील, नल, सुबल, उत्तानपाद पुत्र ध्रुव, इन्द्र, बलि, कश्यप, दक्ष, मनु, विवस्वान् (सूर्य), प्रियव्रत,चन्द्रमा, कुबेर, वायु, यम, अग्नि और वरुणने मङ्गलमयी देवीकी उपासना की। इस प्रकार ये भगवती महालक्ष्मी सर्वत्र सब लोगोंसे सदा सुपूजित हुई हैं। ये सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। समस्त सम्पत्तियाँ इन्हींका स्वरूप हैं।
नारदजीने पूछा-
भगवन् ! श्रीमहालक्ष्मी भगवान् नारायणकी प्रिया होकर सदा वैकुण्ठ में विराजती हैं। उन सनातनीदेवी को वैकुण्ठकीअधिष्ठात्री देवी कहा गया है। फिर वे देवी पृथ्वीपर सिन्धुकन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुई ? उनका ध्यान कवच और पूजनसम्बन्धी सम्पूर्ण विधान क्या है? पूर्वकालमें सबसे पहले उन महालक्ष्मीका स्तवन किसने किया था? इन सब बातोंका मेरे लिये विशद विवेचन कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा-
नारद ! पूर्वसमयकी बात है। दुर्वासाके शापसे इन्द्र, देवसमुदाय तथा मर्त्यलोक-सभी श्रीहीन हो गये थे। रूठी हुई लक्ष्मी स्वर्ग आदिका त्याग करके बड़े दुःखके साथ वैकुण्ठमें गयीं और महालक्ष्मी में अपने आपको विलीन कर दिया। उस समय - सम्पूर्ण देवताओंके शोककी सीमा नहीं रही। वे परम दुःखी होकर भगवान् ब्रह्माकी सभामें गये। वहाँ पहुँचकर ब्रह्माजीको आगे करके वे सब वैकुण्ठमें गये। वहाँ भगवान् नारायण विराजमान थे। अत्यन्त दैन्यभाव प्रकट करते हुए देवताओं ने उनकी शरण ग्रहण की वस्तुतः देवता बहुत दुःखी थे। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे। तब पुराणपुरुष भगवान् श्रीहरिकी आज्ञा मानकर वे इन्द्रसम्पत्तिस्वरूपा लक्ष्मी अपनी कलासे समुद्रकी कन्या हुईं।
देवताओं और दैत्योंने मिलकर क्षीरसागरका मन्थन किया था। उससे महालक्ष्मीका प्रादुर्भाव हुआ। देवताओंने वहाँ उन्हें देखा और उनसे वर प्राप्त किया। देवता आदिको वर देकर उन प्रसन्नवदना देवीने क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुको वरमाला अर्पित की। नारद! उनकी कृपासे देवताओंको असुरोंके हाथमें गया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हो गया। देवता उनकी भलीभाँति पूजा और स्तुति करके सर्वत्र निरापद हो गये।
नारदजीने पूछा-
ब्रह्मन् ! ब्रह्मनिष्ठ और तत्त्वज्ञ मुनिवर दुर्वासाने कब, क्यों और किस अपराधके कारण इन्द्रको शाप दे दिया था ? देवता आदिने किस रूपसे समुद्रका मन्थन किया ? किस स्तोत्रसे प्रसन्न होकर देवीने इन्द्रको साक्षात् दर्शन दिये थे ? प्रभो ! किस प्रकार उन दोनोंका संवाद हुआ था ? यह सब बतानेकी कृपा करें ।
भगवान् नारायण कहते हैं-
नारद! प्राचीन कालकी बात है। मुनिवर दुर्वासाजी वैकुण्ठ कैलासके शिखरपर जा रहे थे। इन्द्रने उन्हें देखा। मुनिवरका शरीर ब्रह्मतेजसे प्रदीप्त हो रहा था। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो ग्रीष्म ऋतुके - मध्याह्नकालिक सूर्यकी सहस्रों किरणोंसे सम्पन्न हों। उनकी अत्यन्त स्वच्छ जटाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमक रही थीं। वे श्वेतवर्णक यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे तथा उनके हाथों में चीर, दण्ड और कमण्डलु शोभा पा रहे थे। उनके ललाटपर महान् उज्ज्वल तिलक चन्द्रमाके सदृश जान पड़ता था। वेद-वेदाङ्गके पारगामी असंख्य शिष्य उनके साथ विद्यमान थे। उन्हें देखकर इन्द्रने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। उनके शिष्योंको भी भक्तिपूर्वक प्रसन्नता के साथ इन्द्रने संतुष्ट किया तब शिष्योंसहित मुनिवर दुर्वासाने इन्द्रको शुभ आशीर्वाद दिया साथ ही भगवान् विष्णुद्वारा प्राप्त परम मनोहर पारिजात पुष्प भी उन्हें समर्पित किये। राज्यश्रीके गर्वमें गर्वित इन्द्रने जरा, मृत्यु एवं शोकका विनाश करनेवाले तथा मोक्षदायी उस पुष्पको लेकर अपने ऐरावत हाथीके मस्तकपर रख दिया। उस पुष्पका स्पर्श होते ही रूप, गुण, तेज और अवस्था — इन सबसे सम्पन्न होकर ऐरावत सहसा - भगवान् विष्णुके समान हो गया। फिर तो इन्द्रको छोड़कर वह घोर वनमें चला गया। मुने! उस समय इन्द्र तेजसे युक्त उस ऐरावतपर शासन नहीं कर सके। इन्द्रने इस दिव्य पुष्पका परित्याग कर तिरस्कार किया है - यह जानकर मुनिवर दुर्वासाके रोषकी सीमा न रही। उन्होंने क्रोधमें भरकर शाप देते हुए कहा।
मुनिवर दुर्वासा बोले-
अरे ! राज्यश्रीके अभिमानमें प्रमत्त होकर तुम क्यों मेरा अपमान कर रहे हो ? मैंने तुम्हें यह पारिजात पुष्प दिया और तुमने गर्वके कारण स्वयं इसका उपयोग न करके हाथीके मस्तकपर रख दिया! नियम तो यह है कि श्रीविष्णुको समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जलके प्राप्त होते ही उनका उपभोग करना चाहिये। त्याग करनेसे ब्रह्महत्याके सदृश दोष लगता है। सौभाग्यवश प्राप्त हुए भगवान् विष्णुके पावन नैवेद्यका जो त्याग करता है, वह पुरुष श्री, बुद्धि और ज्ञानसे भ्रष्ट हो जाता है। भगवान् विष्णुके लिये अर्पित की हुई वस्तुको पाते ही उसे पा लेनेवाला बड़भागी पुरुष अपनी सौ पीढ़ियोंका उद्धार करके स्वयं मुक्त हो जाता है। जो पुरुष नैवेद्य भोजन करके निरन्तर भगवान् श्रीहरिकी भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति करता है, वह भगवान् विष्णुके समान हो जाता है। उसका स्पर्श करके चलनेवाली वायुका संयोग पाकर तीर्थोंका समूह पवित्र हो जाता है। उसकी चरणरज लगते ही पृथ्वी पवित्र हो जाती है। श्रीहरिको भोग न लगाया हुआ अन्न मांसके समान अभक्ष्य है। शिव लिङ्गके लिये अर्पण किया हुआ अन्न तथा शूद्रयाजी, चिकित्सक, देवल, कन्याविक्रयी और योनि-जीवीका अन्न, ठंडा, बासी, सबके भोजन करनेपर बचा हुआ अन्न, शूद्रापति एवं वृषवाही, अदीक्षित, शवदाही, अगम्यागामी, मित्रद्रोही, विश्वासघाती, कृतघ्र तथा झूठी गवाही देनेवाले ब्राह्मणोंका अन्न अत्यन्त दूषित समझा जाता है; परंतु ये सब भी भगवान् विष्णुको अर्पण करके भोजन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं। यदि चाण्डाल भी भगवान् विष्णुकी उपासना करता है तो वह करोड़ों वंशजोंका उद्धार कर सकता है। श्रीहरिकी भक्तिसे विमुख मानव स्वयं अपनी भी रक्षा नहीं कर सकता। यदि अज्ञानमें भी भगवान् विष्णुको समर्पित नैवेद्य ग्रहण कर लिया जाय तो वह पुरुष अपने सात जन्मोंके उपार्जित पापोंसे मुक्त हो जाता है । जान-बूझकर भक्तिपूर्वक जो श्रीहरिका प्रसाद ग्रहण करता है, उसके तो अनेक जन्मोंके पाप निश्चितरूपसे भस्म हो जाते हैं। इन्द्र! तुमने जो अभिमानमें आकर भगवान्के प्रसादरूप पारिजातके पुष्पको हाथीके मस्तकपर रख दिया, इस अपराधके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान् श्रीहरिके समीप चली जाय। मैं भगवान् नारायणका भक्त हूँ। मुझे शिव तथा ब्रह्मासे भी किंचित् भी भय नहीं है। काल मृत्यु और जरासे भी मैं नहीं डरता, फिर दूसरोंकी तो गिनती ही क्या है ? तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यप भी मेरा क्या करेंगे? देवराज! तुम्हारे गुरु बृहस्पति भी मुझ निःशङ्क पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। देखो, यह पुष्प जिसके मस्तकपर है, उसीकी पूजा श्रेष्ठ मानी जाती है। शिवके पुत्रका मस्तक कट जानेपर उसके पुनरुज्जीवनके लिये यही मस्तक (हाथीका सिर) जोड़ा जायगा।
मुनिवर दुर्वासाके ये वचन सुनकर देवराज इन्द्रने उनके चरण पकड़ लिये भयके कारण उनके मनमें घबराहट छा गयी। शोकातुर होकर उच्च स्वरसे रोते हुए वे मुनिसे कहने लगे।
इन्द्रने कहा-
प्रभो! आपने मुझ मतवालेको यह शाप देकर बहुत ही उचित किया है। यदि आपने मेरी सम्पत्ति हर ली तो अब आप मुझे कुछ ज्ञानोपदेश करनेकी कृपा कीजिये। ऐश्वर्य तो विपत्तियोंका बीज है। उससे ज्ञान ढक जाता है। इसीसे इसको मुक्तिमार्गकी अर्गला कहा जाता है। इसके कारण हरि-भक्तिमें पद-पदपर बाधा उपस्थित हुआ करती है। सम्पत्ति जन्म, मृत्यु, जरा, रोग, शोक और दुःखके बीजका उत्तम अङ्कुर है ।धनरूपी रतौंधीसे अन्धा हुआ मानव मुक्तिके मार्गको नहीं देख सकता (ऐश्वर्य विपदां बीजं जन्ममृत्युजरारोगशोकदुःखा प्रच्छन्नज्ञानकारणम् । मुक्तिमार्गार्गलं दाढ्यं हरिभक्तिव्यवायकम् ॥ परम् । सम्पत्तितिमिरान्धं च मुक्तिमार्ग न पश्यति ॥ (प्रकृतिखण्ड ३६ ४८-४९))
जो सम्पत्तिसे प्रमत्त हो गया है, उसे मदिरासे मत्त हुआ समझना चाहिये। उसे बान्धवजन घेरे रहते हैं; परंतु वह बन्धुजनोंसे द्वेष रखता है। वैभवमत्त, विषयान्ध, विह्वल, महाकामी और राजसिक व्यक्तिमें सत्त्वमार्गका अवलोकन करनेकी योग्यता नहीं रह जाती। विषयान्ध दो प्रकारके बताये गये हैं- राजस और तामस। जिसमें शास्त्रका ज्ञान नहीं है, वह तामस कहलाता है और शास्त्रज्ञ राजस। मुनिश्रेष्ठ! शास्त्र दो प्रकारके मार्ग दिखलाते हैं- एक प्रवृत्ति- बीज और दूसरा निवृत्ति- बीज। पहला जो प्रवृत्तिमार्ग है, वह दुःखका रास्ता है, परंतु जीव क्लेशमें ही सुख मानकर पहले उसीपर चलते हैं। वह मार्ग स्वच्छन्द, प्रसन्नतापूर्ण, विरोधशून्य एवं आपात मधुर होनेपर भी परिणाममें नाशका बीज तथा जन्म-मृत्यु और जराके चक्करमें डालनेवाला है। जीव अनेक जन्मोंतक अपने विहित कर्मके परिणामस्वरूप नाना प्रकारकी योनियों में क्रमशः भ्रमण करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे मानव होकर सत्सङ्गका सुअवसर प्राप्त करता है। सैकड़ों और सहस्रों पुरुषों में कोई विरला ही साधुपुरुष भवसागरसे पार उतारनेमें कारण बनता है। साधुपुरुष सत्त्वगुणके प्रकाशसे मुक्तिमार्गका दर्शन कराता है। तब जीवके हृदयमें बन्धनको तोड़नेके लिये यत्न करनेकी भावना उत्पन्न होती है। जब अनेक जन्मोंके पुण्य एवं तपस्या और उपवास सहायक होते हैं तब प्राणीको निर्विघ्न और परम सुखद मुक्तिमार्गकी उपलब्धि होती है। यह बात मैंने विभिन्न प्रसङ्गों और अवसरोंपर गुरु ( बृहस्पति) जीके मुखसे सुनी है। अब विधाता - इस विपत्तिके समय मुझे ज्ञानका समुद्र प्रदान किया है। मेरा उद्धार करनेवाली यह विपत्ति वास्तवमें सम्पत्तिरूपिणी है। ज्ञानसिन्धो ! दीनबन्धो! दयानिधे! इस समय मुझ दीनको कुछ ऐसा सारभूत ज्ञान दीजिये, जो मुझे भवसागरसे पार कर दे।
इन्द्रकी यह बात सुनकर ज्ञानियोंके गुरु सनातन मुनि दुर्वासा जोर-जोरसे हँस पड़े और अत्यन्त संतुष्ट होकर इन्द्रको ज्ञानका उपदेश देने लगे।
मुनि बोले-
अहो महेन्द्र ! यह बड़े मङ्गलकी बात है कि तुम अभीष्ट (मोक्ष) मार्गका साक्षात्कार - करना चाहते हो। यह पहले तो दुःखका कारण जान पड़ता है; परंतु परिणाममें सुख देनेवाला है। जीवको जो गर्भकी यातना तथा मृत्युकष्ट सहन करने पड़ते हैं, उन सबका खण्डन करनेवाला यह ज्ञान बताया जा रहा है। जिससे पार पाना कठिन है, उस दुर्वार एवं असार संसार-पारावारसे उद्धार करनेवाला यह ज्ञान ही है। इससे कर्मरूपी वृक्षके अङ्कुरका उच्छेद हो जाता है। यह सबका उद्धार करनेवाला है। ज्ञानका यह मार्ग सब मार्गोंसे श्रेष्ठ है। इससे संतोष और संततिकी प्राप्ति होती है। दान, तप, व्रत और उपवास आदि कर्मसे जीवधारियों को स्वर्गभोग आदि सुखकी उपलब्धि होती है। पहलेके सकाम कर्मोंका यत्नपूर्वक मूलोच्छेद करके यह ज्ञान मोक्षका बीज वपन करता है। संकल्पका अभाव ही मोक्षका बीज है। मनुष्य जो भी सात्त्विक कर्म करे, उसे कामना या संकल्पसे शून्य ही रखे। समस्त कर्मोंको श्रीकृष्णके चरणों में समर्पित करके ज्ञानी पुरुष परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है। संसारी पुरुषों के लिये इस गतिको निर्वाण- मोक्ष कहा गया है। परंतु वैष्णव पुरुष भगवत्सेवासे विरह होनेके भयसे कातर हो इस निर्वाण-मुक्तिकी इच्छा नहीं करते हैं। वे उत्तम देह धारण करके गोलोक अथवा वैकुण्ठधाममें उन्हीं परमात्माकी नित्य सेवा करते हैं। इन्द्र ! वैष्णवजन भगवत्सेवारूप मुक्तिकी ही अभिलाषा रखते हैं। वे जीवन्मुक्त हैं और अपने समस्त कुलका उद्धार कर देते हैं। भगवान् विष्णुका स्मरण, कीर्तन, अर्चन, पादसेवन, वन्दन, स्तवन, नित्य भक्तिभावसे उनके नैवेद्यका भक्षण, चरणोदकका पान तथा उनके मन्त्रका जप- यही जीवके उद्धारका बीज है, जो सबके लिये अभीष्ट हो सकता है। यह मृत्युञ्जय-ज्ञान है, जिसे भगवान् मृत्युञ्जयने मुझे दिया था। मैं उनका शिष्य हूँ। इसलिये उन्हींके कृपा प्रसादसे सर्वत्र निर्भय विचरता हूँ। जो तीनों लोकोंमें परम दुर्लभ हरिभक्ति प्रदान करता है, वही जन्मदाता पिता है, वही ज्ञानदाता गुरु है, वही बन्धु है और वही सत्पुरुषों में श्रेष्ठ है (स जन्मदाता स गुरुः स च बन्धुः सतां परः। यो ददाति हरेर्भक्तिं त्रैलोक्ये च सुदुर्लभाम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ३६ । ७६))। जो श्रीकृष्ण सेवाके सिवा दूसरा कोई मार्ग दिखाता है, वह उस शिष्यका विनाश ही करता है। निश्चय ही उस गुरुको उसके वधके पापका भागी होना पड़ता है। भगवान् श्रीकृष्णका नाम ही सदा समस्त लोकों के लिये मङ्गलकारक है। जो कृष्ण नाम लेता है, उसके मङ्गलकी सदा वृद्धि होती है। उसकी आयुका अपव्यय नहीं होता। श्रीकृष्णभक्तों से काल, मृत्यु, रोग, संताप और शोक उसी तरह दूर भागते हैं, जैसे गरुड़से सर्प श्रीकृष्ण मन्त्रका उपासक ब्राह्मण हो या चाण्डाल, वह ब्रह्मलोकको लाँघकर उत्तम गोलोकमें चला जाता है। ब्रह्माजी मधुपर्क आदिके द्वारा उसकी पूजा करते हैं तथा देवताओं और सिद्धोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वह परमानन्दका अनुभव करता है। भगवान् शिवने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी सेवाको ही ज्ञान, तप, वेद तथा योगका सार बताया है। वहीं परम कल्याणस्वरूप है। ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् स्वप्रके समान मिथ्या ही है। केवल परब्रह्म परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं। वे प्रकृतिसे भी परे हैं। अतः तुम उन्हींकी आराधना करो। भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त सुखदायक, सारतत्त्वस्वरूप, भक्तिदाता, मोक्षदाता, सिद्धिदाता, योगप्रदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। योगी, यती, सिद्ध और तपस्वी सबके लिये कर्मोंका भोग अनिवार्य है, परंतु नारायणके भक्तोंके लिये कर्मभोग नहीं है। जैसे प्रज्वलित अग्रिमें डाला गया सूखा ईंधन शीघ्र ही जल जाता है, उसी प्रकार भगवद्भक्तोंके स्पर्शमात्रसे सारा पाप तत्काल भस्म हो जाता है। श्रीकृष्ण-भक्तसे रोग, पाप और भय सभी थर-थर काँपते हैं । यमदूत भी उससे डरकर दूर भागते हैं। विधाता कारागाररूपी इस संसारमें मनुष्य तभीतक बँधा रहता है, जबतक कि गुरुके मुखसे उसको श्रीकृष्ण मन्त्रका उपदेश नहीं प्राप्त होता श्रीकृष्णका - नाम किये हुए कर्मोंके भोगरूपी बेड़ीका उच्छेद करनेवाला, मायाजालको छिन्न-भिन्न कर देनेवाला तथा मायापाशका विनाशक है। गोलोकके मार्गका सोपान, उद्धारका बीज तथा भक्तिका नित्य बढ़नेवाला अविनाशी अङ्कुर है। पुरन्दर ! सम्पूर्ण तप, योग, सिद्धि, वेदाध्ययन, व्रत, दान, तीर्थ स्नान, यज्ञ, पूजन और उपवास- इन सबका वही सार है, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है।
श्रीकृष्णके मन्त्रको ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। उसके स्पर्शसे तीर्थोके समुदाय तथा सारी पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। अनेक जन्मोंतक जिसे कोई दीक्षा नहीं प्राप्त हुई है, वह लेशमात्र पुण्यके प्रभावसे किसी अन्य देवताका मन्त्र पाता है। अनेक जन्मोंतक अन्य देवताओंकी सेवाके फलस्वरूप उसको समस्त कर्मोंके साक्षी सूर्यदेवका मन्त्र प्राप्त होता है। तीन जन्मोंतक सूर्यकी सेवासे शुद्ध हुआ मनुष्य गणेशजी के सर्वविघ्नहारी मन्त्रका उपदेश पाता है। अनेक जन्मोंतक उनकी सेवासे मनुष्यकी सारी विघ्न बाधाएँ दूर हो जाती हैं। फिर वह गणेशजी के कृपा प्रसादसे दिव्य ज्ञान प्राप्त करता है। उस ज्ञानके प्रकाशमें भलीभाँति विचार करके अज्ञानान्धकारका निवारण करनेके पश्चात् मनुष्य विष्णुमायास्वरूपिणी प्रकृतिदेवी दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका भजन करता है। वे सिद्धिदायिनी, सिद्धिरूपिणी तथा परमा सिद्धियोगिनी हैं। वाणी, लक्ष्मी और श्रीकृष्णप्रिया राधा आदि उनके अनेक रूप हैं। अनेक जन्मोंतक उनकी उपासना करनेके पश्चात् उनकी कृपासे ज्ञानी होकर मनुष्य ज्ञानानन्दस्वरूप, श्रीकृष्णज्ञानके अधिदेवता सनातन महादेव कल्याणस्वरूप शिवका भजन करता है। वे मङ्गलदायक, कल्याणकारक, परमानन्दरूप, परमानन्ददायी, सुखदायक, मोक्षदायक तथा समस्त सम्पत्तियोंके दाता हैं। अमरत्व, सुदीर्घ आयु, इन्द्रत्व तथा मनुत्वको भी वे अनायास ही देनेमें समर्थ हैं। राजेन्द्रपद, ज्ञान तथा हरिभक्तिके भी दाता हैं। तीन जन्मोंतक उनकी आराधना करके उन्हीं आशुतोष महात्मा शंकरके कृपाप्रसादसे मनुष्य निश्चय ही हरिभक्ति प्राप्त कर लेता है। फिर श्रीकृष्ण भक्तोंके संसर्गसे उसको कृष्णमन्त्रकी प्राप्ति होती है। तत्त्वज्ञ पुरुष निर्मल ज्ञान- दीपके प्रकाशित होनेसे ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को मिथ्या ही देखता है। वरदाता शंकर वरसे जब निर्मल ज्ञान और भगवद्भक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, तब मनुष्य परात्पर निवृत्तिभावको प्राप्त हो जाता है। जिस शरीरमें उसे श्रीकृष्ण मन्त्रकी प्राप्ति होती है, वह शरीर जबतक टिका रहता है, तभीतक उसे भारतवर्षमें रहना पड़ता है। उस पाञ्चभौतिक शरीरको त्याग देनेके पश्चात् वह दिव्य रूप धारण कर लेता है और श्रीहरिके गोलोक या वैकुण्ठधाममें उनका पार्षद बनकर उनकी सेवा किया करता है। वह परमानन्दसे सम्पन्न तथा मोह आदिसे रहित हो जाता है। इस प्राकृत जगत्में पुनः उसका आगमन नहीं होता। उसे पुनः माताका स्तन नहीं पीना पड़ता। जो विष्णुमन्त्रके उपासक गङ्गा आदि तीर्थोका सेवन करनेवाले तथा स्वधर्मपरायण भिक्षु हैं, उनका फिर जन्म नहीं होता। तीर्थमें पापका सर्वथा परित्याग करे और पुण्यकर्मका अनुष्ठान करते हुए श्रीहरिका भजन करे। विधाताने तीर्थसेवी पुरुषोंका यही धर्म बताया है। भगवान् विष्णुके नाम मन्त्रका जप करे, उन्हींकी सेवा आदिमें तत्पर रहे तथा उन्हींके व्रत एवं उपवासमें संलग्न रहे। यह विष्णुसेवी पुरुषोंका धर्म बताया गया है।
जो सदन्न या कदन्नमें (उत्तम या निकृष्ट श्रेणीके अन्नमें), मिट्टीके ढेले अथवा सुवर्णमें सदा समभाव रखता है, वह संन्यासी कहा गया है। जो दण्ड, कमण्डलु तथा गेरुआ वस्त्रमात्र धारण करे, प्रतिदिन प्रवासमें रहे और एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे, उसे संन्यासी कहा गया है। जो लाभ आदिसे रहित होकर सदाचारी द्विजोंका दिया हुआ अन्न खाता है, किंतु किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो व्यापार न करे, आश्रम बनाकर न रहे, समस्त वैदिक कर्मोंसे विलग रहे तथा निरन्तर नारायणका ध्यान करे, उसे सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो सदा मौन रहे, ब्रह्मचर्यका पालन करे, दूसरोंसे बात न करे और सबको ब्रह्ममय देखे, उसे संन्यासी कहा गया है। जिसकी सर्वत्र समबुद्धि हो, जो हिंसा और माया आदिसे दूर रहता हो तथा क्रोध और अहंकारसे शून्य हो, वही सच्चा संन्यासी कहा गया है। जो बिना माँगे प्रस्तुत हुए मीठे अथवा स्वादरहित अन्नको समभावसे भोजन करता है, किंतु खानेके लिये किसीसे याचना नहीं करता, वह संन्यासी कहा गया है। जो स्त्रियोंका मुँह न देखे, उनके पास खड़ा न हो और काठकी बनी हुई नारीमूर्तिका भी स्पर्श न करे, वही सच्चा भिक्षु है। ब्रह्माजीने संन्यासियोंका यही धर्म बताया है। इसके विपरीत चलनेपर जन्म, मृत्यु और यमयातनाका भय सिरपर सवार रहता है अथवा पशु आदि क्षुद्र जन्तुओंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। गर्भवासके समय सभी प्राणी अपने सैकड़ों जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करते हैं; किंतु गर्भ निकलते ही जीव विष्णुकी मायासे मोहित हो सब कुछ भूल जाता है।
देवता हो या कीट सभी यत्नपूर्वक अपने शरीरकी रक्षा करते हैं। स्त्रीकी योनिके भीतर जब पुरुषका वीर्य पड़ता है तो वह तत्काल उसके रक्तमें मिल जाता है। रक्तकी मात्रा अधिक होनेपर संतान माताके समान होती है और वीर्यकी अधिकता होनेपर संतानकी आकृति पितासे अधिक मिलती-जुलती है। ऋतुकालके बाद यदि युग्म दिनोंमें गर्भाधान हो तो पुत्रका जन्म होता है और विषम दिनोंमें आधान होनेपर कन्याकी उत्पत्ति होती है। युग्म दिनोंमें तथा रवि, मङ्गल और गुरुका वार होनेपर आधान हो तो पुत्र होता है। अन्य वारों तथा विषम दिनों में आधानसे कन्याका जन्म होता है। जिसका जन्म पहले पहरमें होता है, वह अल्पायु होता है, दूसरे पहरमें जन्म लेनेवालेकी आयु मध्यम होती है तथा तीसरे पहरमें जिसका जन्म होता है, वह दीर्घायु होता है। चतुर्थ पहरमें जन्म लेनेवाला चिरंजीवी माना जाता है। जिस क्षण या लग्नमें बालकका जन्म होता है, उस समयकी ग्रहस्थितिके अनुरूप उसका भावी जीवन हुआ करता है। वह पूर्वकर्मोंके अनुसार सुखी या दुःखी होता है। जैसे क्षणमें जन्म होता है, वैसे ही संतान होती है। प्रसवके क्षणकी चर्चा विद्वान् पुरुष ही करते हैं। रज वीर्य परस्पर संयुक्त हो एक रातमें कललका आकार धारण करते हैं। फिर वह कलल दिनों - दिन बढ़ने लगता है। सातवें दिन उसकी आकृति बेरके समान होती है और एक मासमें वह लट्टूके समान हो जाता है। तीन महीना बीतते-बीतते वह बिना हाथ-पैरके मांसपिण्डके रूपमें परिणत हो जाता है। पाँचवें मासमें देहधारी जीवके सारे अवयव प्रकट हो जाते हैं। छठे महीनेमें जीवका संचार होता है। फिर वह सब तत्त्वोंको समझने लगता है। थोड़ी-सी जगहमें उसे रहना और सोना पड़ता है, इस बातको समझकर वह पिंजड़ेमें बँधे हुए पक्षीके समान दुःखी हो जाता है। अपवित्र स्थानमें रहकर वह माताके खाये हुए अन्न-पानका ही आहार करता है और 'हाय ! हाय!' करके परमेश्वरका चिन्तन करने लगता है। इस तरह चार मासतक बड़ी भारी यातना भोगकर यथासमय वायुसे प्रेरित हो वह गर्भसे बाहर निकलता है। उस समय उसे दिशा, देश और कालका भान नहीं होता विष्णुमायासे मोहित हो वह सब कुछ भूल जाता है। शैशवकालकी सीमातक वह शिशु सदा मल - मूत्रसे लिपटा रहता है। दूसरेके अधीन होता है ।उसमें मच्छर आदिको हटानेकी भी शक्ति नहीं रहती। जब उसे कीड़े आदि काट खाते हैं, तब वह दुःखी होकर बारंबार रोता है। स्तन पान करनेमें भी असमर्थ ही रहता है। अभीष्ट वस्तुकी याचना करनेके लिये उसकी वाणी नहीं निकलती। पौगण्डावस्थातक वह स्पष्ट बोल नहीं पाता। पौगण्डावस्थामें भी अनेक प्रकारकी यातना भोगकर जवान होता है। उस समय मायासे मोहित देहधारी जीव गर्भादिकी यातनाको भूल जाता है। आहार और मैथुनकी चिन्तासे पीड़ित तथा नाना प्रकारके मोह आदिसे वेष्टित होकर वह पुत्र, पत्नी तथा अनुचरोंका यत्नपूर्वक पालन करता है। जबतक वह उनके पालनमें समर्थ रहता है, तभीतक घरमें उसकी पूजा होती है- आदर सत्कार होता है। असमर्थ हो जानेपर तो भाई बन्धु उसे बूढ़े बैलकी भाँति व्यर्थका भार समझने लगते हैं। जब अत्यन्त जरा-जर्जर, जड एवं बधिर हो जाता है, खाँसी और दमा आदि रोग सताने लगते हैं तथा वह अत्यन्त मूढवत् हो सर्वथा दूसरोंके अधीन हो जाता है, तब सदा बारंबार पश्चात्ताप करने लगता है। वह कहता है- 'अहो! मैंने श्रीहरिके तीर्थका तथा सत्संगका भी स्वेच्छापूर्वक कभी सेवन नहीं किया। यदि पुनः भारतवर्षमें मनुष्यका जन्म पाऊँगा, तब तीर्थों में जाऊँगा और भगवान् श्रीकृष्णकी सेवा करूँगा।' देवेन्द्र ! इस तरह संकल्प करते हुए उस जडको यथासमय आकर अत्यन्त भयंकर यमदूत पकड़ लेता है। वह उस दूतको देखता है। उसके हाथों में पाश और दण्ड होते हैं। उसकी आँखें अत्यन्त क्रोधसे लाल होती हैं, आकृति विकराल एवं भयंकर होती है। उसे किन्हीं भी उपायोंद्वारा रोक पाना कठिन होता है। वह बलिष्ठ, भयानक, दुर्दर्श, सम्पूर्ण सिद्धियोंका ज्ञाता तथा अन्य सबकी दृष्टिसे ओझल होता है। सामने खड़े हुए उस दूतपर दृष्टि पड़ते ही वह अत्यन्त भयभीत हो मल-मूत्रका त्याग करने लग जाता है। फिर तत्काल ही प्राणों तथा पाञ्चभौतिक देहको भी त्याग देता है।
यमदूत अंगूठेके बराबर आकारवाले जीवको लेकर भोगदेह ( या यातना शरीर) में स्थापित - कर देता है; तब उसे तीव्रगतिसे अपने स्थानपर ले जाता है। जीव वहाँ पहुँचकर सब धर्मों ज्ञाता यमराजको देखता है। वे रत्नसिंहासनपर । सुस्थिरभावसे बैठकर मन्द-मन्द मुस्कराते दिखायी देते हैं। वे सर्वज्ञ हैं, धर्माधर्मके विचारको जानते हैं तथा सब ओर उनका मुख है। विधाताने पूर्वकालसे ही यमको सम्पूर्ण विश्वके नियमनका एकमात्र अधिकार दे रखा है। वे अग्रिशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करते हैं। रत्नमय आभूषणोंसे भूषित हैं, तीन करोड़ दूत और पार्षदगण उन्हें सदा घेरे रहते हैं। वे शुद्ध स्फटिकमणिकी माला लेकर उसके द्वारा श्रीकृष्णके नामोंका जप करते र हैं तथा रोमाञ्चित शरीरसे मन-ही-मन उनके युगल चरणारविन्दोंका ध्यान किया करते हैं। उस समय उनकी वाणी गद्गद होती है, नेत्रों से अश्रुधारा बहती रहती है। भगवान् यम सबपर समान दृष्टि रखते हैं। उनका रूप बहुत ही सुन्दर एवं कमनीय है। उनका शरीर सदा सुस्थिर यौवनसे सुशोभित होता है। वे अपने तेजसे उद्भासित होते रहते हैं। उनकी कान्ति शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको लज्जित कर देती है। उनकी ओर सुखपूर्वक देखा जा सकता है। वे बड़े बुद्धिमान् हैं और चित्रगुप्त के सामने विराजमान रहते हैं। पुण्यात्माओंके समक्ष उनका रूप उपर्युक्त रूपसे शान्त ही रहता है, परंतु पापियोंको वे बड़े भयानक दिखायी देते हैं। उन्हें देखकर देहधारी जीव प्रणाम करता है और अत्यन्त भयभीत होकर खड़ा हो जाता है। सूर्यनन्दन यम चित्रगुप्त के साथ विचार करके जिनके लिये जो उचित होता है, वैसा ही शुभ या अशुभ फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार उन जीवोंको आवागमनके चक्करसे कभी छुटकारा नहीं मिलता। श्रीकृष्ण-चरणारविन्दोंका सेवन ही जीवको उससे छुटकारा दिला सकता है।
देवराज ! ये सब बातें मैंने आनुषङ्गिकरूपसे तुम्हें बतायी हैं, अब मनोवाञ्छित वर माँगो । वत्स! मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा मेरे लिये कुछ भी असाध्य नहीं है।
महेन्द्रने कहा-
याचकोंके लिये कल्प वृक्षस्वरूप मुनिश्रेष्ठ! मेरा इन्द्रत्व तो चला ही गया। अब ऐश्वर्यसे क्या प्रयोजन है? आप मुझे परमपद प्रदान कीजिये । महेन्द्रकी यह बात सुनकर मुनिवर दुर्वासा हँसे और वेदोक्त सारतत्त्वस्वरूप सत्य वचन बोले ।
मुनिने कहा –
महेन्द्र ! विषयी पुरुषोंके लिये परमपद अत्यन्त दुर्लभ है। तुम जैसे लोगोंको तो प्राकृत प्रलय कालमें भी मुक्ति नहीं मिल सकती। सृष्टिकालमें जीवोंका आविर्भाव तथा प्रलयकालमें तिरोभावमात्र होता है। ठीक उसी तरह, जैसे प्रातः काल प्राणियोंका जागरण और रात्रिकालमें शयन हुआ करता है। जैसे काल चक्र भ्रमण करता रहता है, उसी प्रकार विषयी जीव भी ईश्वरकी इच्छासे गाड़ीके पहियेकी तरह सदा ही आवागमनका चक्कर काटते रहते हैं। साठ विपलोंका एक पल, साठ पलोंका एक दण्ड, दो दण्डोंका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तीका एक दिन-रात, पंद्रह दिन-रातोंका एक पक्ष, शुक्ल और कृष्ण नामक दो पक्षोंका एक मास, दो मासोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुओंका एक अयन, दो अयनोंका एक वर्ष, तैंतालीस लाख बीस हजार मानववर्षोंके चार युग तथा मनुष्यों के पचीस हजार पाँच सौ साठ चतुर्युगोंकी एक इन्द्रकी आयु होती है। यही एक मनुकी भी आयु कही गयी है। दस लाख आठ हजार इन्द्रोंका पतन हो जानेपर ब्रह्माजीकी आयु पूरी होती है। तभी 'प्राकृतिक लय' होता है। वत्स! प्राकृतिक प्रलयके समय परमात्मा श्रीकृष्णकी पलकें गिरती हैं। जब फिर उनकी पलकें उठती या आँख खुलती है, तब पुनः नयी सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रुतिमें ब्रह्माकी सृष्टि और प्रलयोंको असंख्य बताया गया है। जैसे पृथ्वीके धूलिकणोंकी गणना नहीं हो सकती, उसी तरह सृष्टि और प्रलयोंकी भी कोई गिनती नहीं है। यह चन्द्रशेखर शिवका कथन है। उपर्युक्त इन्द्रोंका मोक्ष नहीं होता। अतः देवराज ! तुम कोई दूसरा वर माँगो, जो सृष्टिसूत्रके अनुरूप हो ।
मुने! मुनीश्वर दुर्वासाकी यह बात सुनकर देवराजको बड़ा विस्मय हुआ। तब उन्होंने वहाँ अपने पूर्व ऐश्वर्यका ही वरण किया। 'तुम अपने पूर्व ऐश्वर्यको शीघ्र ही प्राप्त कर लोगे- ऐसा कहकर मुनि दुर्वासा अपने घरको चले गये।
नारदजीने पूछा-
भगवान् श्रीहरिका गुणगान सुनकर इन्द्रको जब ज्ञान प्राप्त हो गया, तब उन्होंने घर जाकर क्या किया? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण बोले—
ब्रह्मन्! श्रीकृष्णका गुणगान सुनकर इन्द्र संसारके ऐश्वर्य-भोगसे विरक्त हो गये। वे दिनोंदिन अपने वैराग्यभावको बढ़ाने लगे। मुनिवर दुर्वासाके पाससे घर जाकर उन्होंने अपनी अमरावतीपुरीकी दशा देखी। वह दैत्यों तथा असुर-समूहोंसे भरी होनेके कारण भयसे व्याकुल जान पड़ती थी। उस पुरीमें कहीं तो उनके बन्धु बान्धव विषादमें डूबे थे और कहीं-कहींके बन्धुजन पुरी छोड़कर बाहर चले गये थे। अपनी पुरीको पिता-माता पत्नी आदिसे - रहित, अत्यन्त हलचलसे पूर्ण तथा शत्रुओं से आक्रान्त देखकर इन्द्रदेव गुरु बृहस्पतिके पास गये। उस समय शक्तिशाली बृहस्पतिजी मन्दाकिनीके तटपर विराजमान हो परब्रह्म परमात्माका ध्यान करते हुए देवराज इन्द्रको दृष्टिगोचर हुए। फिर देखा तो वे गङ्गाके जलमें पूर्वाभिमुख खड़े होकर सूर्यका अभिवादन कर रहे थे। उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू भरे थे। उनका शरीर पुलकित था। वे अत्यन्त आनन्दित थे। वे परम श्रेष्ठ, गाम्भीर्य सम्पन्न, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरुषोंसे सेवित, बन्धुवर्ग में आदरणीय, भ्रातृ समुदायमें ज्येष्ठ तथा देव-शत्रुओंके लिये अनिष्टकारी गुरुवर बृहस्पतिजी मन्त्रका जप कर रहे थे। देवराज एक पहरतक उन्हें देखते रह गये। तत्पश्चात् उन्हें ध्यानसे उपरत देखकर प्रणाम किया। फिर वे गुरुदेवके चरणकमलोंमें मस्तक झुकाकर उच्चस्वरसे रोने लगे। तदनन्तर दुर्वासाजीके द्वारा दिये गये शापके सम्बन्धकी सारी बातें इन्द्रने बृहस्पतिजीको बतायीं। इन्द्रकी सारी बातें सुनकर परम बुद्धिमान् एवं वक्ताओं में श्रेष्ठ बृहस्पतिजीने इस प्रकार कहा।
बृहस्पति बोले-
सुरश्रेष्ठ! मैं सब कुछ सुन चुका हूँ। तुम विषाद मत करो; मेरी बात सुनो नीतिज्ञ पुरुष विपत्तिके अवसरपर कभी भी घबराता नहीं है; क्योंकि यह विपत्ति और सम्पत्ति स्वप्ररूपिणी है। इसे नश्वर कहा जाता है। यह सम्पत्ति और विपत्ति अपने ही पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मका फल है। जीव स्वयं ही उन दोनोंका निर्माता है। प्रायः सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये प्रत्येक जन्ममें यही शाश्वत नियम है। चक्रकी भाँति वह सदा घूमता रहता है; फिर इस विषयमें चिन्ता किस बातकी ? शुभ हो अथवा अशुभ, जिस किसी प्रकार के अपने कर्मफलको भोगनेके लिये ही पुरुष शरीर प्राप्त करता है। शतकोटि कल्प क्यों न बीत जायँ, किंतु बिना भोग किये कर्मका अन्त नहीं होता। अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। इस प्रकारकी बातें परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको सम्बोधित करके सामवेदकी कौथुमी शाखा में कही हैं। किये हुए सम्पूर्ण कर्मोंका भोग शेष रह जानेपर कर्मानुसार प्राणियोंका भारतवर्ष में अथवा कहीं अन्यत्र जन्म होता है। करोड़ों जन्मोंके किये हुए कर्म प्राणीके पीछे लगे रहते हैं। पुरन्दर ! छायाकी भाँति वे बिना भोगे अलग नहीं होते। काल, देश और पात्रके भेदसे कर्मोंमें न्यूनाधिकता हुआ ही करती है। जिस प्रकार कुशल कुम्भकार दण्ड, चक्र, शराव और भ्रमणके द्वारा क्रमशः मिट्टीसे सुन्दर घटका निर्माण कर लेता है, उसी प्रकार विधाता कर्मसूत्रसे प्राणियोंको फल प्रदान करते हैं। अतः देवराज! जिनकी आज्ञासे इस जगत्की सृष्टि हुई। है, उन भगवान् नारायणकी तुम उपासना करो। वे प्रभु त्रिलोकीमें विधाताके विधाता, रक्षक के रक्षक, स्रष्टाके स्रष्टा, संहर्ताके संहारकर्ता तथा कालके भी काल हैं। जो पुरुष महान् विपत्तिके अवसरपर उन भगवान् मधुसूदनका स्मरण करता है, उसके लिये उस विपत्तिमें भी सम्पत्तिकी ही भावना उत्पन्न हो जाती है; ऐसा भगवान् शंकरने आदेश दिया है (महाविपत्तौ संसारे यः स्मरेन्मधुसूदनम्। विपत्तौ तस्य सम्पत्तिर्भवेदित्याह शङ्करः ॥ (प्रकृतिखण्ड ३७ ४०)) ।
नारद! इस प्रकार कहकर तत्त्वज्ञानी बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको हृदयसे लगा लिया और शुभाशीर्वाद देकर उन्हें पूर्णरूपसे सारी बातें समझा दीं।
(अध्याय ३५-३७)