श्रीमहादेवजी कहते हैं-
पार्वति ! एक समयकी बात है, श्रीकृष्ण विरजा नामवाली सखीके यहाँ उसके पास थे। इससे श्रीराधाजीको क्षोभ हुआ। इस कारण विरजा वहाँ नदीरूप होकर प्रवाहित हो गयी। विरजाकी सखियाँ भी छोटी - छोटी नदियाँ बनीं। पृथ्वीकी बहुत सी नदियाँ - और सातों समुद्र विरजासे ही उत्पन्न हैं। राधा ने प्रणयकोपसे श्रीकृष्णके पास जाकर उनसे कुछ कठोर शब्द कहे। सुदामाने इसका विरोध किया। इसपर लीलामयी श्रीराधाने उसे असुर होनेका शाप दे दिया। सुदामाने भी लीलाक्रमसे ही श्रीराधा मानवीरूपमें प्रकट होनेकी बात कह दी। सुदामा माता राधा तथा पिता श्रीहरिको प्रणाम करके जब जानेको उद्यत हुआ तब श्रीराधा पुत्रविरहसे कातर हो आँसू बहाने लगीं। श्रीकृष्णने उन्हें समझा बुझाकर शान्त किया और शीघ्र उसके लौट आनेका विश्वास दिलाया। सुदामा ही तुलसीका स्वामी शङ्खचूड़ नामक असुर हुआ था, जो मेरे शूलसे विदीर्ण एवं शापमुक्त हो पुनः गोलोक चला गया। सती राधा इसी वाराहकल्पमें गोकुलमें अवतीर्ण हुई थीं। वे व्रजमें वृषभानु वैश्यकी कन्या हुई। वे देवी अयोनिजा थीं, माताके पेटसे नहीं पैदा हुई थीं। उनकी माता कलावतीने अपने गर्भ में 'वायु' को धारण कर रखा था। उसने योगमायाकी प्रेरणासे वायुको ही जन्म दिया; परंतु वहाँ स्वेच्छा श्रीराधा प्रकट हो गयीं। बारह वर्ष बीतनेपर उन्हें नूतन यौवनमें प्रवेश करती देख माता-पिताने 'रायाण' वैश्यके साथ उसका सम्बन्ध निश्चित कर दिया। उस समय श्रीराधा घरमें अपनी छायाको स्थापित करके स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। उस छायाके साथ ही उक्त रायाणका विवाह हुआ। 'जगत्पति श्रीकृष्ण कंसके भयसे रक्षाके बहाने शैशवावस्थामें ही गोकुल पहुँचा दिये गये थे। वहाँ श्रीकृष्णकी माता जो यशोदा थीं, उनका सहोदर भाई ‘रायाण' था। गोलोकमें तो वह श्रीकृष्णका अंशभूत गोप था, पर इस अवतारके समय भूतल पर वह श्रीकृष्णका मामा लगता था जगत्स्स्रष्टा विधाताने पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ साक्षात् श्रीराधाका विधिपूर्वक विवाहकर्म सम्पन्न कराया था। गोपगण स्वप्नमें भी श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन नहीं कर पाते थे। साक्षात् राधा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें वास करती थीं और छायाराधा रायाणके घरमें। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन पानेके लिये पुष्करमें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी; उसी तपस्याके फलस्वरूप इस समय उन्हें श्रीराधा-चरणोंका दर्शन प्राप्त हुआ था। गोकुलनाथ श्रीकृष्ण कुछ कालतक वृन्दावनमें श्रीराधाके साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। तदनन्तर सुदामाके शाप से उनका श्रीराधाके साथ वियोग हो गया। इसी बीचमें श्रीकृष्णने पृथ्वीका भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जानेपर तीर्थयात्रा के प्रसङ्गसे श्रीराधाने श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णने श्रीराधाका दर्शन प्राप्त किया। तदनन्तर तत्त्वज्ञ श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गोलोकधाम पधारे। कलावती (कीर्तिदा) और यशोदा भी श्रीराधाके साथ ही गोलोक चली गयीं। प्रजापति द्रोण नन्द हुए। उनकी पत्नी धरा यशोदा हुईं। उन दोनोंने पहले की हुई तपस्याके प्रभावसे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। महर्षि कश्यप वसुदेव हुए थे। उनकी पत्नी सती साध्वी अदिति अंशतः देवकीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। प्रत्येक कल्पमें जब भगवान् अवतार लेते हैं, देवमाता अदिति तथा देवपिता कश्यप उनके माता-पिताका स्थान ग्रहण करते हैं। श्रीराधाकी माता कलावती (कीर्तिदा) पितरोंकी मानसी कन्या थी। गोलोकसे वसुदाम गोप ही वृषभानु होकर इस भूतलपर आये थे।
दुर्गे ! इस प्रकार मैंने श्रीराधाका उत्तम उपाख्यान सुनाया। यह सम्पत्ति प्रदान करनेवाला, पापहारी तथा पुत्र और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला है। श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं- द्विभुज और चतुर्भुज । चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्ण गोलोकधाममें चतुर्भुजकी पत्नी महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी हैं। ये चारों देवियाँ चतुर्भुज नारायणदेवकी प्रिया हैं। श्रीकृष्णकी पत्नी श्रीराधा हैं, जो उनके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं। वे तेज, अवस्था, रूप तथा गुण सभी दृष्टियोंसे उनके अनुरूप हैं। विद्वान् पुरुषको पहले 'राधा' नामका उच्चारण करके पश्चात् 'कृष्ण' नामका उच्चारण करना चाहिये। इस क्रमसे उलट-फेर करनेपर वह पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है।
कार्तिककी पूर्णिमाको गोलोकके रासमण्डलमें श्रीकृष्णने श्रीराधाका पूजन किया और तत्सम्बन्धी महोत्सव रचाया। उत्तम रत्नोंकी गुटिकामें राधा कवच रखकर गोपोंसहित श्रीहरिने उसे अपने कण्ठ और दाहिनी बाँहमें धारण किया। भक्तिभावसे उनका ध्यान करके स्तवन किया। फिर मधुसूदनने राधाके चबाये हुए ताम्बूलको लेकर स्वयं खाया।
राधा श्रीकृष्णकी पूजनीया हैं और भगवान् श्रीकृष्ण राधाके पूजनीय हैं। वे दोनों एक दूसरेके इष्ट देवता हैं। उनमें भेदभाव करनेवाला पुरुष नरकमें पड़ता है। श्रीकृष्णके बाद धर्मने, ब्रह्माजीने, मैंने, अनन्तने, वासुकिने तथा सूर्य और चन्द्रमाने श्रीराधाका पूजन किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्र, रुद्रगण, मनु, मनुपुत्र, देवेन्द्रगण, मुनीन्द्रगण तथा सम्पूर्ण विश्वके लोगोंने श्रीराधाकी पूजा की। ये सब द्वितीय आवरणके पूजक हैं। तृतीय आवरणमें सातों द्वीपोंके सम्राट् सुयज्ञने तथा उनके पुत्र-पौत्रों एवं मित्रोंने भारतवर्ष में प्रसन्नतापूर्वक श्रीराधिकाका पूजन किया। उन महाराजको दैववश किसी ब्राह्मणने शाप दे दिया था, जिससे उनका हाथ रोगग्रस्त हो गया था। इस कारण वे मन-ही मन बहुत दुःखी रहते थे। उनकी राज्यलक्ष्मी छिन गयी थी; परंतु श्रीराधाके वरसे उन्होंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। ब्रह्माजीके दिये हुए स्तोत्र परमेश्वरी श्रीराधाकी स्तुति करके राजाने उनके अभेद्य कवचको कण्ठ और बाँहमें धारण किया तथा पुष्करतीर्थमें सौ वर्षोंतक ध्यानपूर्वक उनकी पूजा की। अन्तमें वे महाराज रत्नमय विमानपर सवार होकर गोलोकधाममें चले गये। पार्वति ! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ४९)