सावित्रीने कहा-
महाभाग धर्मराज! आप वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् हैं। जो सबका सारभूत, अभीष्ट, सर्वसम्मत, कर्मका उच्छेद करनेमें कारणभूत, परम श्रेष्ठ, मनुष्योंके लिये सुखदायी, यशोवर्द्धक, धर्मप्रद तथा सबको सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाला है, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण मानव जगत्को दुःख देनेवाली यमयातनाको नहीं प्राप्त होते, नरककुण्डोंको नहीं देखते और न उनमें पड़ते ही हैं तथा जिससे जन्म आदि विकार नहीं प्राप्त होते, वह उत्तम कर्म क्या है ? सुव्रत ! यह बतानेकी कृपा करें। साथ ही उन कुण्डोंके आकार कैसे हैं, वे किस प्रकार बने हैं तथा कौन से पापी किस रूपसे उनमें वास करते हैं- यह मैं सुनना चाहती हूँ। देहके अग्निमें भस्म हो जानेके पश्चात् मानव किस देहसे लोकान्तरों में जाता और अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंके फल भोगता है? अत्यन्त क्लेश पानेपर भी वह शरीर नष्ट क्यों नहीं हो जाता तथा वह शरीर भी कैसा है? ये सभी बातें मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं—
नारद! सावित्रीके वचन सुनकर धर्मराजने भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए गुरुको नमस्कारकर पवित्र कथा आरम्भ की।
धर्मराज बोले-
वत्से ! पतिव्रते! सुव्रते! चारों वेद, धर्मशास्त्र, संहिता, पुराण, इतिहास, पाञ्चरात्र प्रभृति धर्मग्रन्थ तथा अन्य धर्मशास्त्र एवं वेदाङ्ग इन सबमें एक श्रीकृष्णकी मङ्गलमयी सेवाको ही सबके लिये अभीष्ट एवं सारभूत बतलाया गया है। इससे जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा शोक संताप नष्ट हो जाते हैं। यह साधन सर्वमङ्गलरूप तथा परम आनन्दका कारण है। इससे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह नरकसे प्राणीका उद्धार करनेवाला है। भक्तिरूपी वृक्षमें अङ्कुर उत्पन्न करनेवाला तथा कर्मरूपी वृक्षको काटनेवाला है। गोलोकके मार्गपर अग्रसर होनेके लिये यह सोपान है। भगवान्के सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य और सामीप्य आदि मोक्षको तथा अविनाशी एवं शुभ पदको प्रदान करनेवाला है। शुभे! श्रीकृष्णके किङ्कर नरककुण्ड, यमदूत तथा यमराजको स्वप्नमें भी नहीं देखते हैं।
जो एकादशीका व्रत तथा वैष्णवतीर्थमें स्नान करते हैं, एकादशीको अन्न नहीं खाते और भगवान् श्रीहरिको नित्य प्रणाम करते एवं उनकी प्रतिमाकी पूजा करते हैं, उन्हें भी मेरी भयंकर संयमनीपुरीमें नहीं जाना पड़ता। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंसे मेरे दूत इस प्रकार डरते हैं, जैसे गरुड़से सर्प मेरा दूत जब हाथमें पाश लेकर मर्त्यलोककी ओर जाता है, तब मैं चेतावनी देते हुए उससे कहता हूँ – 'दूत! तुम भगवान् विष्णुके भक्तका आश्रम छोड़कर और सब जगह जा सकोगे।' श्रीकृष्ण मन्त्रके उपासकोंके नाम भी यमलोक वासियोंको काट खाते हैं। चित्रगुप्त भयभीत से - हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्वागत करते हैं। ब्रह्माजी उनके लिये मधुपर्क आदि निवेदन कर हैं; क्योंकि वे ब्रह्मलोकको लाँघकर गोलोकमें जानेवाले होते हैं। उनके स्पर्शमात्र से प्राणियोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे प्रज्वलित अग्निमें पड़कर तृण और काष्ठ भस्म हो जाते हैं। उन्हें देखकर मोह भी अत्यन्त भयभीत सा होकर सम्मोहको प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, मृत्यु, जरा, शोक, भय, काल, शुभाशुभ कर्म, हर्ष तथा भोग– ये सभी हरिभक्तोंको देखकर प्रभावशून्य हो जाते हैं। पतिव्रते! जो यमयातनामें नहीं पड़ते, उनका परिचय दिया गया। अब आगमके अनुसार देहका विवरण बता रहा हूँ, सुनो। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश - ये पाँच तत्त्व स्रष्टाके सृष्टि-विधानमें देहधारियोंकी देहके बीज (उपादान कारण) हैं। पृथ्वी आदि पाँच भूतोंसे जो देह निर्मित होता है, वह कृत्रिम है। अतएव नश्वर है। इसीलिये वह यहीं भस्म हो जाता है। बँधी हुई मुट्ठीमें अँगूठेकी जितनी लम्बाई होती है, उतना ही बड़ा जो पुरुषाकार जीव है, वही कर्मोंके भोगके लिये सूक्ष्म 'यातनादेह' को धारण करता है। वह देह मेरे लोकमें नरककी प्रज्वलित आगमें डाली जानेपर भी जलकर भस्म नहीं होती। जलमें भी गलती नहीं है। दीर्घकालतक घातक प्रहार करनेपर भी उसका नाश नहीं होता है। अस्त्र, शस्त्र, तीखे कण्टक, खौलते हुए तेल या जल, तपाये हुए लौह, गरम पत्थर तथा तपाकर लाल की हुई लोहेकी प्रतिमासे स्पर्श होनेपर और ऊँचेसे नीचे गिरनेपर भी वह यातना शरीर न तो दग्ध होता है, न टेढ़ा-मेढ़ा - ही होता है। केवल संताप भोगता है (पर नष्ट नहीं होता) देवि! आगमोंके कथनानुसार (जलने, कटने आदिका भीषण दुःख सहते हुए भी न मरनेवाले) यातना देहका सारा वृत्तान्त तथा कारण बताया गया। अब मैं तुमसे नरक कुण्डोंके लक्षण बता रहा हूँ; सुनो।
सतीशिरोमणे! सभी नरककुण्ड पूर्ण चन्द्रमण्डलकी भाँति गोलाकार हैं। वे गहरे भी बहुत हैं। उनमें अनेक प्रकारके पत्थर जड़े गये हैं। प्रलयकालतक उनका नाश नहीं होता। भगवान् श्रीहरिकी इच्छासे पापियोंको क्लेश देनेके लिये नानारूपोंमें उनका निर्माण हुआ है। जो प्रज्वलित अंगारस्वरूप है, जिसका विस्तार सब ओरसे एक एक कोस है तथा जिसमें सौ हाथ ऊपरतक आगकी लपटें उठा करती हैं, उसे 'अग्निकुण्ड' कहा गया है। भयानक चीत्कार करनेवाले पापियोंसे वह सदा भरा रहता है। मेरे दूत उनपर प्रहार करते रहते हैं। वे निरन्तर उस नरककी रक्षा भी करते हैं। जो हिंसक जन्तुओं से भरा-पूरा अत्यन्त घोर अन्धकारसे पूर्ण तथा आधे कोसतक विस्तृत है और जिसमें बहुत गरम जल भरा रहता है उसे 'प्रतप्तोदककुण्ड' कहते हैं। मेरे सेवकोंद्वारा कठिन प्रहार पड़नेपर नारकी जीव चिल्लाते रहते हैं। इसके बाद 'तप्तक्षारोदकुण्ड' है। वह खौलते हुए खारे जलसे भरा रहता है। एक कोस विस्तारवाला वह भयानक नरक पापियों तथा नाकोंसे भरपूर है। एक कोस विस्तारमें 'विण्मूत्रकुण्ड' नामक नरक है। निराहार रहनेके कारण सूखे हुए कण्ठ, ओठ और तालुवाले पापी उसमें इधर-उधर भागते हैं। वह दारुण नरक विष्ठासे ही बना हुआ है। उसमें अत्यन्त दुर्गन्ध फैली रहती है। वहाँ कीड़ों से उनका सारा अङ्ग छिंद जाता है। 'मूत्रकुण्ड' नामक नरक खौलते हुए मूत्र तथा मूत्रके कीड़ोंसे भलीभाँति भरा हुआ है। अत्यन्त पातकी जीवोंसे भरा हुआ वह नरक दो कोसके परिमाणमें है। वहाँके कीड़े जीवोंको खाते रहते हैं। उसमें पड़े पापियोंके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे रहते हैं। श्लेष्म आदि अपवित्र वस्तुओं और उसके कीड़ों तथा श्लेष्मभोजी पापीजनोंसे भरा नरक 'श्लेष्मकुण्ड' कहा गया है। आधे कोसके परिमाणमें विषभक्षी पापियों तथा कीड़ोंसे भरा हुआ नरक 'गरकुण्ड' के नामसे कहा जाता है। सर्पके समान आकारवाले वज्रमय दाँतोंसे युक्त तथा क्षुधातुर सूखे कण्ठवाले अत्यन्त भयंकर जन्तुओं द्वारा वह नरक भरा रहता है। आँखोंके मलोंसे युक्त आ कोसके विस्तारवाला 'नेत्रमलकुण्ड' है। कीड़ोंसे क्षत-विक्षत हुए पापी प्राणी निरन्तर उसमें चक्कर लगाते रहते हैं। वसासे पूर्ण चार कोसका लम्बा चौड़ा 'वसाकुण्ड' है। वसाभोजी पातकी जीव उसमें व्याप्त रहते हैं। एक कोसकी लम्बाई चौड़ाईवाला 'शुक्रकुण्ड' है। वीर्यके कीड़ोंसे वह व्याप्त रहता है। उसमें रहनेवाले पापियोंको जब कीड़े काटते हैं, तब वे इधर-उधर भागते रहते हैं। बावड़ीके समान परिमाणवाला दुर्गन्धित वस्तुओंसे भरा हुआ रक्तकुण्ड' है। उस गहरे कुण्डमें रक्त पीनेवाले प्राणी तथा काटनेवाले कीड़े भरे रहते हैं। 'अश्रुकुण्ड' नेत्रोंके आँसुओंसे पूर्ण रहता है। अनेक पापीजन उसमें भरे रहते हैं। चार बावड़ी जितना उसका विस्तार है। कीड़ों काटनेपर जीव उसमें रुदन करते रहते हैं। मनुष्योंके शारीरिक मलों तथा मलभक्षी पापी जीवोंसे युक्त 'गात्रमलकुण्ड' है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेके कारण घबराये हुए जीव उसमें किसी प्रकार समय बिताते हैं। कानोंकी मैल खानेवाले पापियोंसे आच्छादित 'कर्णविट्कुण्ड' है। चार बावड़ी जितने प्रमाणवाला वह कुण्ड कीटोंद्वारा काटे जानेवाले पापियोंके चीत्कार पूरित रहता है। मनुष्योंकी मज्जा तथा अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त 'मज्जाकुण्ड' है, जो महापापियोंसे युक्त एवं चार वापीके विस्तारवाला है। मेरे दूतोंसे प्रताड़ित प्राणियोंसे युक्त स्निग्ध मांसवाला 'मांसकुण्ड' है। एक वापी जितने प्रमाणवाले इस - कुण्डमें भयानक प्राणी भरे रहते हैं। कन्याका विक्रय करनेवाले पापी वहाँ रहकर कन्याका मांस भक्षण करते हैं। कीड़ोंके काटनेपर वे अत्यन्त भयभीत हो 'बचाओ-बचाओ' की पुकार करते रहते हैं। चार बावड़ी जितने लंबे-चौड़े 'नखादि' चार कुण्ड हैं। ताम्रमय उल्कासे युक्त तथा जलते हुए ताँबेके सदृश 'प्रतप्तताम्रकुण्ड' है । ताँबेकी असंख्य प्रतप्त प्रतिमाएँ उसमें भरी रहती हैं। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सटाया जाता है। तब वे चिल्ला उठते हैं। नारकी जीवोंसे भरा वह नरक दो कोस लंबा-चौड़ा है। प्रज्वलित लोहे तथा चमकते हुए अङ्गारोंसे युक्त 'प्रतप्तलौहकुण्ड' है। वह जलते हुए लौहकी लाखों प्रतिमाओंसे पूर्ण है। प्रत्येक प्रतिमासे पापियोंको सटाया जाता है, तब वे चीत्कार कर उठते हैं। वहाँ निरन्तर जलते हुए वे पापी भयभीत होकर रक्षा करो, रक्षा करो' पुकारते रहते हैं। वह कुण्ड दो कोसमें विस्तृत तथा अत्यन्त भयानक है और वहाँ चारों और भयानक अन्धकार छाया रहता है। 'चर्मकुण्ड' और 'तप्तसुराकुण्ड' आधी बावड़ीके प्रमाणके ही हैं। चर्मभक्षण तथा सुरापान करनेवाले पापी जीव उसमें भरे रहते हैं।
शाल्मलिवृक्षके नीचे तीखे काँटोंसे भरा एक कुण्ड है। वह दुःखप्रद नरक एक कोसकी दूरीमें है। लाखों मनुष्य उसमें अँट सकते हैं। वहाँ चार चार हाथके अत्यन्त तीखे काँटे शाल्मली वृक्षसे गिरकर बिछे रहते हैं। एक-एक करके सभी काँटोंसे घोर पापियोंके अङ्ग छिद उठते हैं। उन अत्यन्त व्यग्र पापियोंके तालू सूख जाते हैं, तब महान् भयभीत होकर 'मुझे जल दो'– यों चिल्लाने लगते हैं। तक्षक आदिके विषसमूहों से परिपूर्ण एक कोस लंबा-चौड़ा नरक है, जिसमें पापी मेरे दूतोंकी मार खाकर गिरते हैं और वह विष ही खानेको पाते हैं। 'प्रतसतैलकुण्ड' में सदा खौलता हुआ तेल भरा रहता है। जलन कारण कीड़ेतक उसमें नहीं रहते; किंतु मेरे दूतोंकी चोट खाकर पापियोंको वहाँ रहना पड़ता है। जलता हुआ तैल ही उन्हें खाना पड़ता है।
जिनके आकार त्रिशूल-जैसे हैं तथा जिनकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण है, उन लौहमय शस्त्रों से सम्पन्न 'शस्त्रकुण्ड' है। चार कोसमें विस्तृत वह नरक ऐसा जान पड़ता है, मानो शस्त्रोंकी शय्या हो भालोंसे छिद जानेके कारण जिनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये हैं, ऐसे पापी जीवोंसे उस नरकका कोना-कोना भरा रहता है। साध्वि! जिसमें सर्प जैसे बड़े-बड़े असंख्य भयंकर कीड़े - रहते हैं, उसे 'कृमिकुण्ड' कहा जाता है। विकृत वदनवाले उन कीड़ोंके दाँत बड़े तेज होते हैं। वहाँ सर्वत्र अन्धकार फैला है। 'पूयकुण्ड' को चार कोस लंबा-चौड़ा बताया जाता है। पूयभक्षी प्राणी उसमें निवास करते हैं। तालके वृक्ष जितना गहरा तथा असंख्य सर्पोंसे युक्त 'सर्पकुण्ड' है। वह दो कोस लंबा और बर्फीले जलसे पूर्ण होता है। साँप पापियोंके शरीरसे लिपटकर उन्हें काटते रहते हैं। मशक आदि क्रूर जन्तुओंसे पूर्ण 'मशकुण्ड', 'दंशकुण्ड' और 'गोलकुण्ड'– ये तीन नरक हैं। महान् पापियोंसे युक्त उन नरकोंकी सीमा आधे-आधे कोसकी है। जिनके हाथ बँधे रहते हैं, रुधिरसे सर्वाङ्ग लाल रहता है तथा जो मेरे दूतोंसे घायल रहते हैं, उन प्राणियोंद्वारा वहाँ हाहाकार मचा रहता है। वज्र और बिच्छुओंसे ओत-प्रोत 'वज्रदंष्ट्रकुण्ड' और 'वृश्चिककुण्ड' हैं। आधी बावड़ीके प्रमाणवाले उन नरकोंमें वज्र एवं बिच्छुओंसे विद्ध प्राणी भरे रहते हैं। 'शरकुण्ड', 'शूलकुण्ड' और 'खड्गकुण्ड'– ये तीनों आयुधोंसे व्याप्त हैं। उन नरकोंमें पड़े प्राणियोंका शरीर शस्त्रास्त्रोंसे छिदता रहता है। रक्तकी धारा बहने लगती है, जिससे वे लाल प्रतीत होते हैं। उन नरकोंका प्रमाण आधी बावड़ी है। संतप्त कीचड़ से पूर्ण तथा अन्धकारमय 'गोलकुण्ड' है। टेढ़े-मेढ़े काँटोंकी-सी आकृतिवाले कीड़े यहाँके पापियोंको काटते हैं। उस नरकका विस्तार आधी बावड़ी है। कीड़ोंके काटने तथा मेरे दूतोंके मारनेपर भयसे घबराये हुए प्राणी रोते रहते हैं। पापियोंका झुंड कोसोंतक फैला रहता है। अत्यन्त दुर्गन्धसे युक्त तथा पापियोंको निरन्तर दुःख देनेवाला 'नक्रकुण्ड' है। वहाँ विकृत आकारवाले भयंकर नक्र आदि जन्तु उन्हें काटते रहते हैं। उस नरककी लंबाई-चौड़ाई आधी बावड़ीके परिमाण में है। विष्ठा, मूत्र और श्लेष्मभक्षी असंख्य पापियों एवं कौओंसे भरा हुआ एक कुण्ड है। उसमें विशाल तथा विकृत आकारवाले भयंकर असंख्य कौए पापियोंको नोचते रहते हैं। 'सञ्चानकुण्ड' और 'बाजकुण्ड' इन्हीं दोनों वस्तुओं (पक्षियों) - से ओत-प्रोत हैं। इन कुण्डोंका परिमाण सौ धनुष है। उन भयानक पक्षियोंसे काटे हुए प्राणी सदा चीत्कार मचाया करते हैं। पापी जीवोंसे व्याप्त तथा सौ धनुष विस्तृत 'वज्रकुण्ड' है। वज्रके समान दाँतवाले भयंकर जन्तु उसमें रहते हैं। वहाँ सर्वत्र घोर अन्धकार छाया रहता है। दो वापी जितना लंबा-चौड़ा 'तप्तपाषाणकुण्ड' है। उसका आकार ऐसा है मानो आग धधक रही हो। पापी प्राणी संतप्त होकर इधर-उधर भागते रहते हैं। छुरेकी धारके समान तीखे पाषाणोंसे बना हुआ 'तीक्ष्ण पाषाणकुण्ड' है। महान् पापी उसमें वास करते हैं। रक्तसे लथपथ हुए प्राणियोंसे भरा हुआ 'लालाकुण्ड' है। वह कुण्ड एक कोस नीचेतक गहरा है। मेरे दूतोंसे संतप्त प्राणी उसमें खचाखच भरे रहते हैं। कज्जल वर्णवाले संतप्त पत्थरों से निर्मित तथा सौ धनुष परिमाणवाला 'मसीकुण्ड' है। पापियोंसे वह कुण्ड पूरित रहता है। तपे हुए बालूसे भरपूर एक कोस विस्तारवाला 'चूर्णकुण्ड' है। उसमें प्रतप्त बालुकासे दग्ध प्राणी निवास करते हैं। कुम्हारके चक्रकी भाँति निरन्तर घूमता हुआ 'चक्रकुण्ड' है। उसमें अत्यन्त तीक्ष्ण धारवाले सोलह अरे लगे हुए हैं, जिनसे वहाँक पापियोंके अङ्ग सदा क्षत-विक्षत होते रहते हैं। उस कुण्डका आकार अत्यन्त टेढ़ी-मेढ़ी कन्दराके समान है तथा वह पर्याप्त गहरा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई चार कोस है। उसमें खौलता हुआ जल भरा रहता है। वहाँके घोर पापियों को जलचर-जन्तु काटते-खाते हैं। उस अन्धकारमय भयानक कुण्डमें संतप्त प्राणियोंद्वारा करुण क्रन्दन होता रहता है। विकृत आकारवाले अत्यन्त भयंकर असंख्य कछुओंसे भरा हुआ 'कूर्मकुण्ड' है। जलमें रहनेवाले कछुए नारकी जीवोंको नोचते-खाते रहते हैं। प्रज्वलित ज्वालाओंसे व्याप्त 'ज्वालाकुण्ड' है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। उस कष्टदायी कुण्डमें पातकी प्राणी निरन्तर चिल्लाते रहते हैं। एक कोस गहराईवाला 'भस्मकुण्ड' है जिसमें सर्वत्र प्रतप्त भस्म ही भरा रहता है। जलते हुए भस्मको खानेके कारण वहाँके पातकी जीवोंके अङ्गोंमें दाह-सा होता रहता है।
जो तपे हुए लौहसे परिपूर्ण तथा जले हुए गाववाले पापियों से युक्त नरक है, उसे 'दग्धकुण्ड' कहा गया है। वह अत्यन्त भयंकर गहरा कुण्ड एक कोसके परिमाणमें है। वहाँ सर्वत्र अन्धकार छाया रहता है। ज्वालाके कारण पापियोंके तालु सूखे रहते हैं। 'तप्तसूर्मिकुण्ड' नरक अत्यन्त भयानक है, जो बहुसंख्यक ऊर्मियों, संतप्त क्षार जलों, नाना प्रकारके शब्द करनेवाले जल जन्तुओंसे युक्त है। जिसकी चौड़ाई चार कोस है; ऐसे गहरे और अन्धकारयुक्त नरकको 'प्रतप्तसूचीकुण्ड' कहते हैं। उस भयानक कुण्डमें दग्ध होने के कारण आर्तनाद करते हुए प्राणी एक-दूसरेको नहीं देख पाते। जिसमें तलवारकी धारके समान तीखे पत्तेवाले बहुत से ऊँचे-ऊँचे ताड़के वृक्ष हैं, उस नरकको 'असिपत्रकुण्ड' कहा गया है। उस नरकके ये ताड़वृक्ष आधे कोसकी लंबाईतक ऊपरको फैले हुए हैं और उन्हीं वृक्षोंपरसे वहाँके पापियोंको गिराया जाता है। उन वृक्षोंके सिरसे गिराये गये पापियोंके रक्तोंसे वह कुण्ड भरा रहता है। उन पापियोंके मुखसे 'रक्षा करो' की चीख निकलती रहती है। वह भयानक कुण्ड अत्यन्त गहरा, अन्धकारसे आच्छन्न तथा रक्तके कीड़ोंसे परिपूरित है। जो सौ धनुष- जितना लंबा-चौड़ा तथा छुरेकी धारके समान अस्त्रों से युक्त है, उस भयानक नरकको 'क्षुरधारकुण्ड' कहते हैं। पापियोंके रक्तसे वह कभी खाली नहीं हो पाता। जिसमें सूईके समान नोकवाले
अस्त्र भरे रहते हैं तथा जो पापियोंके रक्तसे सदा परिपूर्ण रहता है, पचास धनुष जितना लंबा-चौड़ा - वह नरक 'शूचीमुख' कहलाता है। वहाँ नारी प्राणी अत्यन्त कष्ट भोगते हैं। किसी एक जन्तुविशेषका नाम गोधा है; उसके मुखके समान जिसकी आकृति है, उसका नाम 'गोधामुखकुण्ड' है। उसकी गहराई कुएँके समान है और उसका प्रमाण बीस धनुष है। वह नरक घोर पापियोंके लिये अत्यन्त कष्टप्रद है। उन गोधासंज्ञक कीड़ोंके काटनेसे नारकी जीवोंका मुख सदा नीचेको लटकता रहता है। नाक (जलजन्तुविशेष) के मुखके समान जिसकी आकृति है, उसे 'नक्रकुण्ड' कहते हैं। वह सोलह धनुषके विस्तारमें स्थित है। उसकी गहराई कुएँ जितनी है। उस कुण्डमें सदा पापी भरे रहते हैं। 'गजदंशकुण्ड' को सौ धनुष लंबा चौड़ा बतलाया गया है। तीस धनुष जितना विस्तृत तथा गौके मुखकी आकृतिवाला एवं पापियोंके लिये अत्यन्त दुःखद जो नरक है, उसे 'गोमुखकुण्ड' कहा गया है। कालचक्र युक्त सदा चक्कर काटनेवाला भयानक नरक, जिसकी आकृति घड़ेके समान है, 'कुम्भीपाक' कहलाता है। चार कोसके परिमाणवाला वह नरक महान् अन्धकारमय है। साध्वि! उसकी गहराई एक लाख पोरसा है। उस कुण्डके अन्तर्गत तप्ततैल एवं ताम्रकुण्ड आदि बहुसंख्यक कुण्ड हैं। उस नरकमें बड़े-बड़े पापी अचेत होकर पड़े रहते हैं। भयंकर कीड़ोंके काटनेपर चिल्लाते हुए नारकी जीव परस्पर एक-दूसरेको देखने में असमर्थ रहते हैं। उन्हें क्षण-क्षणमें मूर्च्छा आती है और वे पृथ्वीपर लोट-पोट हो जाते हैं। पतिव्रते! उन सभी कुण्डोंमें जितने पापी पड़े हुए हैं, उन सबकी ऐसी ही दुर्दशा है। मेरे दूर्तोकी मार पड़नेपर वे क्षणमें गिरते और क्षणभरमें चिल्लाहट मचाने लगते हैं। कुम्भीपाकके अन्तर्गत जो नरककुण्ड हैं, वे उससे कहीं चौगुने कष्टप्रद हैं। सुदीर्घ कालतक मार पड़नेपर भी यातना भोगनेवाले उन शरीरोंका अन्त नहीं होता। कुम्भीपाकको सम्पूर्ण नरक कुण्डोंमें प्रधान बताया गया है। कालनिर्मित सुदृढ़ सूत्रसे बँधे हुए पापी जीव जहाँ निवास करते हैं, उसे 'कालसूत्र' नामक नरककुण्ड कहा गया है। मेरे दूतोंके प्रयाससे प्राणी कभी ऊपर उठते हैं और कभी डूब जाते हैं। बहुत देरतक उनकी साँस बंद हो जाती है। वे अचेत से हो जाते हैं। साध्वि! उसका जल सदा खौलता रहता है। नरकभोगी प्राणियोंके लिये वह बड़ा ही कष्टप्रद है। 'अवटकुण्ड' और 'मत्स्योदकुण्ड' एक ही है। 'अवट' संज्ञक एक कूप है। अतः कोई उसे अवटकुण्ड कहा करते हैं। संतप्त जल वह परिपूर्ण रहता है। चौबीस धनुष- जितना वह लंबा-चौड़ा है। जलते हुए शरीरवाले घोर पापी जीव उसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। मेरे दूतोंकी कठिन मार उन्हें सहनी पड़ती है। उस कुण्डकी 'अवटोद' संज्ञा है। उसके जलका स्पर्श होते ही सम्पूर्ण व्याधियाँ पापियोंको अनायास घेर लेती हैं। उसकी गहराई सौ धनुष है। जिसमें पड़े हुए प्राणियोंको अरुन्तुद नामक कीड़े काटते रहते हैं, उसे 'अरुन्तुदकुण्ड' कहा जाता है। दुःखी जीव सदा हाहाकार मचाया करते हैं। अत्यन्त तपी हुई धूलोंसे व्याप्त नरकको 'पांशुकुण्ड' कहते हैं। वह सौ धनुष जितना विस्तृत है। उसमें पड़े नारकी जीवोंके चमड़े जलते रहते हैं। खानेके लिये उसे जलती हुई धूल ही उपलब्ध होती है। जिसमें गिरते ही पापी पाशोंसे आवेष्टित हो जाता है, उसे विज्ञ पुरुषोंने 'पाशवेष्टनकुण्ड' कहा है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक कोस है। जहाँ पापी ज्यों ही गिरते हैं, त्यों ही शूलसे जकड़ उठते हैं, उसे 'शूलप्रोतकुण्ड' कहा जाता है। उसका परिमाण बीस धनुष है। 'प्रकम्पनकुण्ड' आधे कोसके विस्तारमें है। उसका जल बरफके समान गलता रहता है। उसमें पड़ते ही प्राणियोंके शरीरमें कँपकँपी मच जाती है। जिसमें पापियोंके मुखोंमें जलती हुई लुआठी घुसा दी जाती है, उसे 'उल्कामुखकुण्ड' कहा गया है। वह भी बीस धनुष जितना लम्बा चौड़ा है।
जिसकी गहराई लाख पोरसा है तथा सौ धनुष- जितना जो विस्तृत है, उस भयानक कुण्डको 'अन्धकूप नरक' कहते हैं। उसमें नाना प्रकारकी आकृतिवाले कीड़े रहते हैं। वह सदा अन्धकारसे व्याप्त रहता है। कूपके समान उसकी गोलाई है। कीड़ोंके काटनेपर प्राणी आतुर होकर परस्पर एक-दूसरेको चबाने लगते हैं। उन्हें खौलता हुआ जल ही पीनेको मिलता है। एक तो वे खौलते हुए जलसे जलते हैं, दूसरे कीड़े भी काटते रहते हैं। वहाँ इतना अन्धकार रहता है कि वे आँखोंसे कुछ भी देख नहीं सकते। जहाँ जानेपर पापी अनेक प्रकारसे शस्त्रों से बिंध जाते हैं, वह 'वेधनकुण्ड' कहलाता है।उसकी लंबाई-चौड़ाई बीस धनुष है। जहाँ डंडों से मारा जाता है, उस सोलह धनुषके प्रमाणवाले नरकको 'दण्डताडनकुण्ड' कहते हैं। जहाँ जाते ही पापी जीव मछलियोंकी भाँति महाजालमें फँस जाते हैं तथा जो बीस धनुष जितना विस्तृत है, वह 'जालरन्ध्रकुण्ड' कहलाता है। जहाँ गिरे हुए पापियोंके शरीर चूर्ण-चूर्ण हो जाते हैं, वह नरक 'देहचूर्णकुण्ड' नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ गये हुए पापियोंके पैरमें लोहेकी बेड़ी पड़ी रहती है। असंख्य पोरसा वह गहरा है। लंबाई और चौड़ाई बीस धनुष है। प्रकाशका तो वहाँ कहीं नाम ही नहीं रहता। उसमें प्राणी मूच्छित होकर जड़की भाँति पड़े रहते हैं। जहाँ गये पापी मेरे दूतोंद्वारा दलित और ताड़ित होते रहते हैं, उसको 'दलनकुण्ड' कहा गया है। वह सोलह धनुषके विस्तारमें है। तपी हुई बालूसे व्याप्त होनेके कारण जहाँ गिरते ही पापीके कण्ठ, ओठ और तालू सूख जाते हैं तथा जो तीस धनुष जितना परिमाणमें है - और जिसकी गहराई सौ पोरसा है एवं जो सदा अन्धकारसे आच्छन्न रहता है, उन पापियोंके लिये अतिशय दुःखप्रद नरकको 'शोषणकुण्ड' कहते हैं। विविध धर्मसम्बन्धी कषाय जलसे जो लबालब भरा रहता है, जिसकी लंबाई-चौड़ाई सौ धनुष है और जहाँ सदा दुर्गन्ध फैली रहती है तथा जहाँ उस अमेध्य वस्तुके आहारपर ही रहकर पापी जीव यातना भोगते हैं, वह नरक 'कषकुण्ड' कहलाता है। साध्वि! जिस कुण्डका आकार शूर्पके सदृश है तथा जो बारह धनुषके बराबर लंबा-चौड़ा है एवं जहाँ सर्वत्र संतप्त बालुका बिछी रहती है और पातकियोंसे कोई स्थल खाली नहीं रहता, उस नरकको 'शूर्पकुण्ड' कहते हैं । वहाँ सदा दुर्गन्ध भरी रहती है। वही खाकर पापी जीव वहाँ यातना भोगते हैं। पतिव्रते! जहाँकी रेणुका अत्यन्त संतप्त रहती है तथा जो घोर पापी जीवोंसे युक्त रहता है एवं जिसके भीतर आगी लपटें उठा करती हैं, ऐसी ज्वालासे भरे हुए मुखवाले नरकको 'ज्वालामुखकुण्ड' कहा जाता है। वह बीस धनुषमें विस्तृत है। ज्वालासे दग्ध पापी उसके कोने-कोनेमें भरे रहते हैं। उस कुण्डमें प्राणियोंको असीम कष्ट भोगना पड़ता है। जहाँ गिरते ही मानव मूच्छित हो जाता है तथा जिसके भीतरकी ईंटें अत्यन्त संतप्त रहती हैं। एवं जो आधी बावड़ी जितना परिमाणवाला है, वह 'जिम्भकुण्ड' कहलाता है। जो धूममय अन्धकारसे संयुक्त रहता है तथा जहाँ गये हुए पापी धूमोंके कारण नेत्रहीन हो जाते हैं और जिसमें साँस लेनेके लिये बहुत से छिद्र बने हैं, उस नरकको 'धूम्रान्धकुण्ड' कहा गया है। वह सौ धनुषके बराबर परिमाणमें है। जहाँ जानेपर पापीको तुरंत नाग बाँध लेते हैं तथा जो सौ धनुष- जितना लंबा-चौड़ा है और जिसमें सदा नाग भरे रहते हैं, उसे 'नागवेष्टनकुण्ड' कहा गया है। इन सभी कुण्डोंमें मेरे दूत प्राणियोंको मारते, जलाते तथा भाँति-भाँतिसे भयानक कष्ट देते रहते हैं।
सावित्री! सुनो, मैंने ये छियासी नरककुण्ड और इनके लक्षण भी बतला दिये। अब फिर तुम क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ३२-३३)