श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

50- राजा सुयज्ञकी यज्ञशीलता और उन्हें ब्राह्मणके शापकी प्राप्ति, ऋषियों द्वारा ब्राह्मणको क्षमाके लिये प्रेरित करते हुए कृतघ्नोंके भेद तथा विभिन्न पापोंके फलका प्रतिपादन

पार्वतीने पूछा-

प्रभो ! राजा सुयज्ञ कौन थे ? किस वंशमें उनका जन्म हुआ था? उन्हें ब्राह्मणका शाप कैसे प्राप्त हुआ था और किस तरह श्रीराधाजीको वे पा सके? जो सर्वात्मा श्रीकृष्णकी पत्नी हैं तथा साक्षात् श्रीकृष्णाने जिनका पूजन किया है, उन्हीं परमेश्वरी श्रीराधाक सेवाका सौभाग्य एक मल मूत्रधारी मनुष्यको कैसे मिल सका ? जिनके चरणारविन्दोंकी रजको पानेके लिये ब्रह्माजीने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थके भीतर साठ हजार वर्षोंतक तप किया तथा जिनका दर्शन पाना आपके लिये भी अत्यन्त कठिन है, उन्हीं पुरातनी महालक्ष्मी श्रीराधादेवीका दर्शन राजा सुयज्ञने कैसे किया ? वे मनुष्योंके दृष्टिपथमें कैसे आयीं ? तीनों लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माने राजा सुयज्ञको श्रीराधाका कवच किस प्रकार दिया ? उनके ध्यान, पूजन विधि तथा स्तोत्रका उपदेश कैसे दिया? यह सब बतानेकी कृपा कीजिये।

श्रीमहादेवजी बोले-

देवि! चौदह मनुओंमें जो सबसे प्रथम हैं, उन्हें स्वायम्भुव मनु कहते हैं। वे ब्रह्माजीके पुत्र और तपस्वी कहे गये हैं। उन्होंने शतरूपासे विवाह किया था। मनु और शतरूपाके पुत्र उत्तानपाद हुए। उत्तानपादके पुत्र केवल ध्रुव हैं। गिरिराजनन्दिनि ! ध्रुवकी कीर्ति तीनों लोकों में विख्यात है। ध्रुवके पुत्र उत्कल हुए, जो भगवान् नारायणके अनन्य भक्त थे। उन्होंने पुष्करतीर्थमें एक हजार राजसूय यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, उस यज्ञमें सारे पात्र रत्नों के बने हुए थे। राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सब पात्र ब्राह्मणोंको दान कर दिये थे। यज्ञान्तमहोत्सवमें राजाने बहुमूल्य वस्त्रोंकी सहस्त्रों राशियाँ जो तेजःपुञ्जसे उद्भासित होती थीं,

ब्राह्मणोंको बाँट दीं। प्रिये उस सुन्दर यज्ञको देखकर ब्रह्माजीने देवसभामें राजा उत्कलका नाम सुयज्ञ रख दिया। राजा सुयज्ञ अन्न, रत्न तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके दाता थे। वे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक उचित दक्षिणाके साथ ब्राह्मणोंको दस-बारह लाख गौएँ दानमें देते थे। उन गौओंके सींग रत्नोंसे मढ़े होते थे तथा दुग्धपात्र आदि सामग्री भी रत्नमयी ही होती थी। वे प्रतिदिन छः करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराया करते थे। उन्हें प्रतिदिन चूसने, चबाने चाटने और पीनेयोग्य भोजनसामग्री देकर तृप्त करते थे। नित्यप्रति एक लाख रसोइयोंको भोजन दिया करते थे। पूआ, रोटी चावल आदि अन्न, दाल आदि व्यञ्जन - दहीके साथ परोसे जाते थे। उस भोजनसामग्रीमें मांसका सर्वथा अभाव होता था। ब्राह्मणलोग भोजनके समय मनुवंशी राजा सुयज्ञकी ही नहीं, उनके पितरोंकी भी स्तुति करते थे। सुन्दरि ! यज्ञके दिनोंमें तथा उसकी समाप्तिके दिन कुल मिलाकर छत्तीस लाख करोड़ ब्राह्मणोंने अत्यन्त तृतिपूर्वक सु-अन्न भोजन किया था। उन्होंने दक्षिणामें इतने रत्न ग्रहण किये थे कि उन सबको अपने घरतक ढो ले जाना उनके लिये असम्भव हो गया था। कुछ तो उन्होंने शूद्रोंको बाँट दिया और कुछ रास्ते में छोड़ दिया। ब्राह्मण भोजनके अन्तमें राजाने ब्राह्मणेतरोंको भी भोजन दिया तथापि वहाँ अन्नकी सहस्रों राशियाँ शेष रह गयीं।

इस प्रकार यज्ञ करके महाबाहु राजा सुयज्ञ अपनी राजसभामें रमणीय रत्न सिंहासनपर बैठे हुए थे। वह सिंहासन रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अनेक छत्रोंसे सुशोभित था। उसे अच्छी तरह सजाया गया था। उसपर चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुओंका लेप हुआ था। चन्दनपल्लवोंसे उसकी रमणीयता और बढ़ गयी थी। वहाँ वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र, आदित्यगण, मुनिवर नारद तथा बड़े-बड़े देवता विराजमान थे। इसी समय वहाँ एक ब्राह्मण आया, जो रूखा और मलिन वस्त्र पहने था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसने मुसकराते हुए हाथ जोड़कर रत्नसिंहासनपर बैठे हुए पुष्पमाला और चन्दनसे चर्चित राजाको आशीर्वाद दिया। राजाने भी ब्राह्मणको प्रणाम तो किया, किंतु वे अपने स्थानसे उठे नहीं। उस सभाके सभासद् भी ब्राह्मणकी ओर देखकर खड़े नहीं हुए। वे सभी थोड़ा-थोड़ा हँसते रहे। तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनियों और देवताओंको नमस्कार करके निरङ्कुश भावसे वहाँ खड़ा हो गया और क्रोधपूर्वक राजाको शाप देता हुआ बोला- 'ओ पामर! तू इस राज्यसे दूर चला जा, श्रीहीन हो जा तथा शीघ्र ही गलित कोढ़से युक्त, बुद्धिहीन और उपद्रवोंसे ग्रस्त हो जा।' ऐसा कहकर क्रोधसे काँपता हुआ ब्राह्मण सभासदोंको शाप देनेके लिये उद्यत हो गया। जो लोग वहाँ हँसे थे, वे सब उठकर खड़े हो गये। उन सबने अपने दोषका परिहार कर लिया। अतः उनकी ओरसे ब्राह्मणका क्रोध जाता रहा। राजा उस ब्राह्मणको प्रणाम करके भय से कातर हो रोने लगे। वे व्यथित हृदयसे सभाके

बीचसे बाहर निकले। तब गूढरूपवाले वे ब्राह्मणदेवता भी ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हुए चल दिये। उनके पीछे-पीछे भयसे कातर हुए समस्त मुनि भी चले और बारंबार उच्चस्वरसे पुकारने लगे 'हे विप्र! ठहरो, ठहरो।' उन मुनियोंके नाम इस प्रकार हैं- पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, अङ्गिरा, मरीचि, कश्यप, वसिष्ठ, क्रतु, शुक्र, बृहस्पति, दुर्वासा, लोमश, गौतम, कणाद, कण्व, कात्यायन, कठ, पाणिनि, जाजलि, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, आपिशलि, तैत्तिलि, महातपस्वी मार्कण्डेय, वोढु, पैल, सनक, सनन्दन, सनातन, भगवान् सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, पराशर, जरत्कारु, संवर्त, करथ, और्व, च्यवन, भरद्वाज, वाल्मीकि, अगस्त्य, अत्रि, उतथ्य, संवर्त, आस्तीक, आसुरि, शिलालि, लाङ्गलि, शाकल्य, शाकटायन, गर्ग, वात्स्य, पञ्चशिख, जमदग्नि, देवल, जैगीषव्य, वामदेव, बालखिल्य आदि, शक्ति, दक्ष, कर्दम, प्रस्कन्न, कपिल, विश्वामित्र, कौत्स ऋचीक और अघमर्षण ये तथा और भी मुनि, पितर, अग्नि, हरिप्रिय, दिक्पाल तथा समस्त देवता भी ब्राह्मणके पीछे-

पीछे चले। पार्वति! उन नीतिविशारद मुनियोंने ब्राह्मणको समझाया, एक स्थानपर ठहराया और क्रमश: उनसे नीतिकी बातें कहीं।

पार्वतीने पूछा-

प्रभो ! ब्राह्मणों और ब्रह्माजीके पुत्रोंने, जो नीतिके विद्वान् थे, उस समय उन ब्राह्मणदेवतासे नीतिकी कौन-सी बात कही, यह मुझे बतानेकी कृपा करें।

श्रीमहादेवजी बोले-

सुमुखि ! उस मुनि समुदायने स्तुति और विनयसे ब्राह्मणको संतुष्ट करके क्रमश: इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

सनत्कुमारने कहा-

ब्रह्मन् ! तुम्हारे पीछे पीछे राजाकी लक्ष्मी और कीर्ति भी चली आयी है। सत्त्व, यश, सुशीलता, महान् ऐश्वर्य, पितर, अग्नि और देवता भी राजाको श्रीहीन करके उनके घरसे बाहर चले आये हैं। द्विजश्रेष्ठ! अब तुम संतुष्ट हो जाओ; क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाला कहा गया है। मुने! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है। वह तपस्यासे परिमार्जित होनेके कारण अत्यन्त निर्मल और शुद्ध होता है। अतः विप्रवर! अब क्षमा करो। आओ और राजभवनको पवित्र करो। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसके देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश होकर लौट जाते हैं; क्योंकि वहाँ अतिथिका सत्कार नहीं हुआ। इसलिये विप्रवर! क्षमा करो, आओ और राजभवनको शुद्ध करो।

पुलस्त्यजी बोले-

जो घरपर आये हुए अतिथिको टेढ़ी आँखोंसे देखते हैं, उन्हें अतिथि अपना पाप देकर और उनके पुण्य लेकर चला जाता है। अतः तुम राजाके दोषको क्षमा कर दो। वत्स! तुम्हारी जहाँ मौज हो, जाओ राजा अपने कर्मदोषसे ही उठकर खड़े नहीं हुए थे। उनके उस दोषको तुम क्षमा कर दो।

पुलहने कहा-

जो क्षत्रिय राजलक्ष्मीके मदसे अथवा जो ब्राह्मण विद्याके मदसे किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह क्षत्रिय श्रीहीन होता है तथा वह ब्राह्मण त्रिकाल संध्यासे शून्य हो जाता है। वे दोनों ही एकादशीव्रत तथा भगवान् विष्णुके नैवेद्यसे वञ्चित हो जाते हैं।

क्रतु बोले-

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, जो ब्राह्मणका अपमान करता है, वह दीक्षाके पुण्य और अधिकारसे भ्रष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं, उसका धन नष्ट हो जाता है तथा वह पुत्र और पत्नीसे भी हीन हो जाता है। यह एक अटल सत्य है, अतः भगवन्! क्षमा करो। आओ और राजाके घरको पवित्र करो ।

अङ्गिराने कहा-

जो ज्ञानवान् ब्राह्मण होकर किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह भारतवर्ष में सात जन्मोंतक सवारी ढोनेवाला बैल होता है। मरीचि बोले- जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में देवता, ब्राह्मण तथा गुरुका अपमान करता है, वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे वञ्चित हो जाता है।

कश्यपने कहा-

जो वैष्णव ब्राह्मणको देखकर उसका अपमान करता है, वह विष्णुमन्त्रकी दीक्षासे वञ्चित हो विष्णुपूजासे भी विरत हो जाता है। प्रचेता बोले- जो अतिथि ब्राह्मणको आया देख उसके लिये अभ्युत्थान नहीं करता-उठकर खड़ा नहीं हो जाता, वह भारतभूमिमें माता पिताकी भक्तिसे रहित होता है। उस मूढ़को सात जन्मोंतक हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। अतः द्विज श्रेष्ठ! शीघ्र चलो। राजाकोआशीर्वाद दो।

दुर्वासाने कहा-

जो गुरु, ब्राह्मण अथवा देवताकी प्रतिमाको देखकर शीघ्र ही उसके सामने मस्तक नहीं झुकाता, वह पृथ्वीपर सूअर होता है। अतः ब्रह्मन् ! हमारे सब अपराधोंको क्षमा करो और चलकर अतिथि सत्कार ग्रहण करो। राजाने पूछा- आप सब लोग श्रेष्ठ मुनि हैं। आपने किसी न किसी बहानेसे धर्मका उपदेश किया है। अतः सब कुछ स्पष्ट बताकर मुझ मूर्खको समझाइये। विद्वद्वरो! आपलोग पहले मुझे यह बतावें कि स्त्रीहत्या, गोहत्या, कृतघ्नता, गुरुपत्नीगमन तथा ब्रह्महत्या करनेवालोंको कौन-सा दोष लगता है तथा उसका परिहार कैसे होता है ?

वसिष्ठजी बोले-

राजन्! यदि स्वेच्छापूर्वक गो-वधका पाप किया गया हो तो उसके प्रायश्चित्तके लिये मनुष्य एक वर्षतक तीर्थों भ्रमण करता रहे। वह प्रतिदिन जौकी रोटी अथवा जौकी लप्सी खाये और हाथसे ही जल पीये। वर्ष पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित सौ अच्छी और दुधारू गौओंका दान करे। प्रायश्चित्तसे पाप क्षीण हो जानेपर भी मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापसे मुक्त नहीं होता। जो पाप शेष रह जाता है, उसीके फलसे वह दुःखी एवं चाण्डाल होता है। यदि आतिदेशिक हत्या हुई हो अर्थात् साक्षात् गोवध आदि न होकर उसके समान बताया गया कोई पापकर्म बन गया हो तो उसमें साक्षात् की हुई हत्यासे आधा फल भोगना पड़ता है। अनुकल्परूप प्रायश्चित्तसे उस हत्याका पाप यद्यपि क्षीण हो जाता है तथापि उससे पूर्णतया छुटकारा नहीं मिलता।

शुक्रने कहा-

स्त्रीकी हत्या करनेपर निश्चय ही गोहत्यासे दूना पाप लगता है। स्त्रीहत्यारा हजारों वर्षोंतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर वह महापापी मानव सात जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।

बृहस्पति बोले-

स्त्रीहत्यासे दूना पाप लगता है ब्रह्महत्यामें ब्रह्महत्यारा एक लाख वर्षोंतक निश्चय ही महाभयंकर कुम्भीपाक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर उस महापापीको सौ वर्षोतक विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है, इसके बाद सात जन्मोंतक सर्प होकर वह उस पापसे शुद्ध होता है। गौतमने कहा राजेन्द्र ! कृतघ्नको ब्रह्महत्यासे चौगुना पाप लगता है। वेदमें अवश्य ही कृतघ्नोंकी शुद्धिके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा गया है।

राजाने पूछा-

वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! आप मुझे कृतघ्नोंका लक्षण बताइये कृतघ्नोंके कितने भेद हैं और उनमें से किन्हें किस दोषकी प्राप्ति होती है ?

ऋष्यशृङ्गने उत्तर दिया-

सामवेदमें सोलह प्रकारके कृतघ्नोंका निरूपण किया गया है। वे सब के सब प्रत्येक दोषसे प्रत्येक फलके भागी - होते हैं। सत्कर्म, सत्य, पुण्य, स्वधर्म, तप, प्रतिज्ञा, दान, स्वगोष्ठी-परिपालन, गुरुकृत्य, देवकृत्य, कामकृत्य, द्विजपूजन, नित्य कृत्य, विश्वास, परधर्म - और परप्रदान- इनमें स्थित हुए मनुष्योंका जो वध करता है, वह पापिष्ठ कृतघ्न कहा गया है। इनके लिये जो लोक हैं, वे उस जन्मसे भिन्न योनियों में उपलब्ध होते हैं। राजेन्द्र ! वे पापी कृतघ्न जिन-जिन नरकोंमें जाते हैं, वे वे नरक निश्चय ही यमलोकमें विद्यमान हैं।

सुयज्ञने पूछा-

प्रभो ! किस प्रकारके कृतघ्र कौन-सा कर्म करके किन-किन भयंकर नरकों में जाते हैं? इसे एक-एक करके मैं सुनना चाहता हूँ। आप बतानेकी कृपा करें।

कात्यायनने कहा-

जो शपथ खाकर भी अपने सत्यको मिटा देता है, उसका पालन नहीं करता, वह कृतघ्न अवश्य ही चार युगोंतक कालसूत्र नरकमें निवास करता है। फिर सात सात जन्मोंतक कौआ और उल्लू होकर पुनः सात जन्मोंतक महारोगी शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है। तत्पश्चात् सर्वश्री सनन्दन, सनातन, पराशर, जरत्कारु, भरद्वाज और विभाण्डकने विभिन्न कृतघ्नोंके भेद तथा उनको प्राप्त होनेवाली दुर्गतिका वर्णन किया। तदनन्तर श्रीमार्कण्डेयजी बोले।

मार्कण्डेयने कहा –

नरेश्वर! शूद्रजातीय स्त्रीके साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको जो दोष प्राप्त होता है, उसका वर्णन वेदों में किया गया है। उसे बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। जो ब्राह्मण शूद्रजातीय स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह कृतघ्नों में प्रधान है। उसे चौदह इन्द्रोंके स्थितिकालतक कृमिदंष्ट्र नामक नरकमें निवास करना पड़ता है। वहाँ वह ब्राह्मण कीड़ोंके काटनेसे व्याकुल रहता है। यमराजके दूत उससे प्रतिदिन तपायी हुई लोहेकी प्रतिमाका आलिङ्गन करवाते हैं। तदनन्तर निश्चय ही वह व्यभिचारिणी स्त्रीकी योनिका कीड़ा होता है। इस अवस्था में एक हजार वर्षोंतक रहनेके बाद वह शूद्र होता है। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है।

सुयश बोले-

मुने! अन्य कृतघ्नोंके भी कर्मोंका फल बताइये। यह ब्राह्मणका शाप मेरे लिये श्लाघ्य है; क्योंकि इसके कारण मुझे सत्संगका लाभ हुआ। भला, विपत्तिमें पड़े बिना किसको सम्पत्ति प्राप्त होती है। मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया; क्योंकि आज मेरे घरपर मुक्त मुनिगण और देवता पधारे हैं। (अध्याय ५०-५१)