नारदजीने पूछा-
वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महाभाग नारायण! अब कृपया यह बताइये कि राजाने किस प्रकारसे पराप्रकृतिका सेवन किया था ? समाधि नामक वैश्यने भी किस प्रकार प्रकृतिका उपदेश पाकर निर्गुण एवं निष्काम परमात्मा श्रीकृष्णको प्राप्त किया था। उनकी पूजाका विधान, ध्यान, मन्त्र, स्तोत्र अथवा कवच क्या है? जिसका उपदेश महामुनि मेधसूने राजा सुरथको दिया था। समाधि वैश्यको देवी प्रकृतिने कौन-सा उत्तम ज्ञान दिया था ? किस उपायसे उन दोनोंको सहसा प्रकृतिदेवीका साक्षात्कार प्राप्त हुआ था ? वैश्यने ज्ञान पाकर किस दुर्लभ पदको प्राप्त किया था ? अथवा राजाकी क्या गति हुई थी? उसे मैं सुनना चाहता हूँ।
श्रीनारायणने कहा-
मुने! राजा सुरथ और समाधि वैश्यने मेधस् मुनिसे देवीका मन्त्र, स्तोत्र, कवच, ध्यान तथा पुरश्चरण विधि प्राप्त करके पुष्करतीर्थमें उत्तम मन्त्रका जप आरम्भ कर दिया। वे एक वर्षतक त्रिकाल स्नान करके देवीकी समाराधनामें लगे रहे, फिर दोनों शुद्ध हो गये। वहीं उन्हें मूलप्रकृति ईश्वरीके साक्षात्द र्शन हुए। देवीने राजाको राज्यप्राप्तिका वर दिया। भविष्यमें मनुके पद और मनोवाञ्छित सुखकी प्राप्तिके लिये आश्वासन दिया। परमात्मा श्रीकृष्णने भगवान् शंकरको जो पूर्वकालमें ज्ञान दिया था, वही परम दुर्लभ गूढ़ ज्ञान देवीने वैश्यको दिया। कृपामयी देवी उपवाससे अत्यन्त क्लेश पाते हुए वैश्यको निश्चेष्ट तथा श्वासरहित हुआ देख उसे गोदमें उठाकर दुःख करने लगीं और बार-बार कहने लगीं- 'बेटा! होशमें आओ।' चैतन्यरूपिणी देवीने स्वयं ही उसे चेतना दी। उस चेतनाको पाकर वैश्य होशमें आया और प्रकृतिदेवीके सामने रोने लगा। अत्यन्त कृपामयी देवी उसपर प्रसन्न हो कृपापूर्वक बोलीं।
श्रीप्रकृतिने कहा-
बेटा ! तुम्हारे मनमें जिस वस्तुकी इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो । अत्यन्त दुर्लभ ब्रह्मत्व, अमरत्व, इन्द्रत्व, मनुत्व और सम्पूर्ण सिद्धियोंका संयोग, जो चाहो, ले लो। मैं तुम्हें बालकोंको बहलानेवाली कोई नश्वर वस्तु नहीं दूँगी।
वैश्य बोला-
माँ ! मुझे ब्रह्मत्व या अमरत्व पानेकी इच्छा नहीं है। उससे भी अत्यन्त दुर्लभ कौन सी वस्तु है ? यह मैं स्वयं ही नहीं जानता। यदि कोई ऐसी वस्तु हो तो वही मेरे लिये अभीष्ट है। अब मैं तुम्हारी ही शरणमें आया हूँ, तुम्हें जो अभीष्ट हो, वही मुझे दे दो। मुझे ऐसा वर देनेकी कृपा करो, जो नश्वर न हो और सबका सार तत्त्व हो ।
श्रीप्रकृतिने कहा-
बेटा ! मेरे पास तुम्हारे लिये कोई भी वस्तु अदेय नहीं है। जो वस्तु मुझे अभीष्ट है, वही मैं तुम्हें दूँगी, जिससे तुम परम दुर्लभ गोलोकधाममें जाओगे। महाभाग वत्स! जो देवर्षियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है, वह सबका सारभूत ज्ञान ग्रहण करो और श्रीहरिके धाममें जाओ। भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण, वन्दन, ध्यान, अर्चन, गुण-कीर्तन, श्रवण, भावन, सेवा और सब कुछ श्रीकृष्णको समर्पण- यह वैष्णवोंकी नवधा भक्तिका लक्षण है। यह भक्ति जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि तथा यम यातनाका नाश करनेवाली है। जो नवधा भक्तिसे हीन, अधम एवं पापी हैं, उन लोगोंकी सूर्यदेव सदा आयु ही हरते रहते हैं। जो भक्त हैं और भगवान्में जिनका चित्त लगा हुआ है, ऐसे वैष्णव चिरजीवी, जीवन्मुक्त, निष्पाप तथा जन्मादि विकारोंसे रहित होते हैं। शिव, शेषनाग, धर्म, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट्, सनत्कुमार, कपिल, सनक, सनन्दन, वोढु, पञ्चशिख, दक्ष, नारद, सनातन, भृगु, मरीचि, दुर्वासा, कश्यप, पुलह, अङ्गिरा, मेधस्, लोमश, शुक्र, वसिष्ठ, ऋतु, बृहस्पति, कर्दम, शक्ति, अत्रि, पराशर, मार्कण्डेय, बलि, प्रह्लाद, गणेश्वर, यम, सूर्य, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, अकूपार, उलूक, नाडीजङ्घ, वायुपुत्र हनुमान्, नर, नारायण, कूर्म, इन्द्रद्युम्न और विभीषण- ये परमात्मा श्रीकृष्णकी नवधा भक्तिसे युक्त महान् 'धर्मिष्ठ' भक्तशिरोमणि हैं। वैश्यराज ! जो भगवान् श्रीकृष्णके भक्त हैं, वे उन्हींके अंश हैं तथा सदा जीवन्मुक्त रहते हैं। इतना ही नहीं, वे भूमण्डलके समस्त तीर्थोके पापोंका अपहरण करनेमें समर्थ हैं। ऊपर सात स्वर्ग हैं, बीचमें सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी है और नीचे सात पाताल हैं। ये सब मिलकर 'ब्रह्माण्ड' कहलाते हैं। बेटा ! ऐसे विश्व ब्रह्माण्डोंकी कोई गणना नहीं है। प्रत्येक विश्वमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, देवर्षि, मनु और मानव आदि हैं। सम्पूर्ण आश्रम भी हैं। सर्वत्र मायाबद्ध जीव रहते हैं। जिन महाविष्णुके रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड वास करते हैं, उन्हें महाविराट् कहते हैं। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। सबके अभीष्ट आत्मा श्रीकृष्ण सत्य, नित्य, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, अच्युत, प्रकृतिसे परे एवं परमेश्वर हैं। तुम उनका भजन करो। वे निरीह, निराकार, निर्विकार, निरञ्जन, निष्काम, निर्विरोध, नित्यानन्द और सनातन हैं।स्वेच्छामय (स्वतन्त्र) तथा सर्वरूप हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही वे दिव्य शरीर धारण करते हैं। परम तेज:-स्वरूप तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता हैं। ध्यानके द्वारा उन्हें वशमें कर लिया जाय, यह असम्भव है। शिव आदि योगियोंके लिये भी उनकी आराधना कठिन है। वे सर्वेश्वर, सर्वपूज्य, सबकी सम्पूर्ण कामनाओंके दाता, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सबको आनन्द प्रदान करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोके दाता, सर्वरूप, प्राणरूप, सर्वधर्मस्वरूप, सर्वकारणकारण, सुखद, मोक्षदायक, साररूप, उत्कृष्ट रूपसम्पन्न, भक्तिदायक, दास्यप्रदायक तथा सत्पुरुषोंको सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं। उनसे भिन्न सारा कृत्रिम जगत् नश्वर है। वे परात्परतर शुद्ध, परिपूर्णतम एवं शिवरूप हैं। बेटा! तुम सुखपूर्वक उन्हीं भगवान् अधोक्षजकी शरण लो। 'कृष्ण' यह दो अक्षरोंका मन्त्र श्रीकृष्णदास्य प्रदान करनेवाला है। तुम इसे ग्रहण करो और दुष्कर सिद्धिकी प्राप्ति करानेवाले पुष्करतीर्थमें जाकर इस मन्त्रका दस लाख जप करो। दस लाखके जपसे ही तुम्हारे लिये यह मन्त्र सिद्ध हो जायगा।
ऐसा कहकर भगवती प्रकृति वहीं अन्तर्धान हो गयीं। मुने! उन्हें भक्तिभावसे नमस्कार करके समाधि वैश्य पुष्करतीर्थमें चला गया। पुष्कर में दुष्कर तप करके उसने परमेश्वर श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। भगवती प्रकृतिके प्रसादसे वह श्रीकृष्णका दास हो गया।
भगवान् नारायण कहते हैं-
महाभाग नारद! राजा सुरथने जिस क्रमसे देवी परा प्रकृतिकी आराधना की थी, वह वेदोक्त क्रम बता रहा हूँ, सुनो। महाराज सुरथने स्नान करके आचमन किया। फिर त्रिविध न्यास, करन्यास, अङ्गन्यास तथा मन्त्राङ्गन्यास करके भूतशुद्धि की। इसके बाद प्राणायाम करके शङ्ख-शोधनके अनन्तर देवीका ध्यान किया और मिट्टीकी प्रतिमामें उनका आवाहन किया। फिर भक्तिभावसे ध्यान करके प्रेमपूर्वक उनका पूजन किया। देवीके दाहिने भागमें लक्ष्मीकी स्थापना करके परम धार्मिक नरेशने उनकी भी भक्तिभावसे पूजा की। नारद! तत्पश्चात् देवीके सामने कलशपर गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और पार्वती- इन छः देवताओंका आवाहन करके राजाने विधिपूर्वक भक्तिसे उनका पूजन किया। प्रत्येक विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह पूर्वोक्त छः देवताओंकी पूजा और वन्दना करके महादेवीका प्रेमपूर्वक निम्नाङ्कित रीतिसे ध्यान करे। मुने! सामवेदमें जो ध्यान बताया गया है, वह परम उत्तम तथा कल्पवृक्षके समान वाञ्छापूरक है।
ध्यान
मूलप्रकृति ईश्वरी महादेवीका नित्य ध्यान करे। वे सनातनी देवी ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी पूजनीया तथा वन्दनीया हैं। उन्हें नारायणी और विष्णुमाया कहते हैं। वे वैष्णवीदेवी विष्णुभक्ति देनेवाली हैं। यह सब कुछ उनका ही स्वरूप है। वे सबकी ईश्वरी, सबकी आधारभूता, परात्परा, सर्वविद्यारूपिणी, सर्वमन्त्रमयी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। वे सगुणा और निर्गुणा हैं। सत्यस्वरूपा, श्रेष्ठा, स्वेच्छामयी एवं सती हैं। महाविष्णुकी जननी हैं। श्रीकृष्णके आधे असे प्रकट हुई हैं। कृष्णप्रिया, कृष्णशक्ति एवं कृष्णबुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रीकृष्ण ने उनकी स्तुति, पूजा और वन्दना की है। वे कृपामयी हैं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है। उनकी प्रभा करोड़ों सूर्योकी दीप्तिको भी लज्जित करती है। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द-मन्द हास्यकी छटा छायी हुई है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल हैं। उनका नाम दुर्गादेवी है। वे सौ भुजाओंसे युक्त हैं और महती दुर्गतिका नाश करनेवाली हैं। त्रिनेत्रधारी महादेवजीकी प्रिया हैं। साध्वी हैं। त्रिगुणमयी एवं त्रिलोचना हैं। त्रिलोचन शिवकी प्राणरूपा हैं। उनके मस्तकपर विशुद्ध अर्द्धचन्द्रका मुकुट है। वे मालतीकी पुष्पमालाओंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। उनका मुख सुन्दर एवं गोलाकार है। वे भगवान् शिवके मनको मोहनेवाली हैं। रत्नोंके युगल कुण्डलसे उनके कपोल उद्भासित होते रहते हैं। वे नासिकाके दक्षिण भागमें गजमुक्तासे निर्मित नथ धारण करती हैं। कानोंमें बहुसंख्यक बहुमूल्य रत्नमय आभूषण पहनती हैं। मोतियोंकी पाँतको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपंक्ति उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। पके हुए बिम्बफलके समान उनके लाल-लाल ओठ हैं। वे अत्यन्त प्रसन्न तथा परम मङ्गलमयी हैं। विचित्र पत्ररचनासे रमणीय उनके कपोल-युगल परम उज्ज्वल प्रतीत होते हैं। रत्नोंके बने हुए बाजूबन्द, कंगन तथा रत्नमय मञ्जीर उनके विभिन्न अङ्गोंका सौन्दर्य बढ़ाते हैं। रत्नमय कङ्कणों से उनके दोनों हाथ विभूषित हैं। रत्नमय पाशक उनकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नमयी अंगूठियोंसे उनके हाथोंकी अँगुलियाँ जगमगाती रहती हैं। पैरोंकी अँगुलियों और नखोंमें लगे हुए महावरकी रेखा उनकी शोभावृद्धि करती है। वे अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। उनके विभिन्न अङ्ग गन्ध, चन्दनसे चर्चित हैं। वे कस्तूरी के विन्दुओंसे सुशोभित दो स्तन धारण करती हैं। सम्पूर्ण रूप और गुणोंसे सम्पन्न हैं तथा गजराजके समान मन्द गतिसे चलती हैं। अत्यन्त कान्तिमती तथा शान्तस्वरूपा हैं। योगसिद्धियोंमें बहुत बढ़ी - चढ़ी हैं। विधाताकी भी सृष्टि करनेवाली तथा सबकी माता हैं। समस्त लोकोंका कल्याण करनेवाली हैं। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति उनका परम सुन्दर मुख है। वे अत्यन्त मनोहारिणी हैं। उनके भालदेशका मध्यभाग कस्तूरी बिन्दु, चन्दन बिन्दु तथा सिन्दूर बिन्दुसे सदा उद्दीप्त होता रहता है। उनके नेत्र शरद् ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलोंकी कान्तिको छीने लेते हैं। काजलकी सुन्दर रेखाओंसे वे सर्वथा सुशोभित होते हैं। उनके श्रीअङ्ग करोड़ों कन्दपकी लावण्यलीलाको तिरस्कृत करनेवाले हैं। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनका मस्तक उत्तम रत्नोंके बने हुए मुकुटसे उद्भासित होता है। वे स्स्रष्टाकी सृष्टिमें शिल्परूपा और पालकके पालनमें दयारूपा हैं। संहारकालमें संहारककी उत्तम संहाररूपिणी शक्ति हैं। निशुम्भ और शुम्भको मथ डालनेवाली तथा महिषासुरका मर्दन करनेवाली हैं। पूर्वकालमें त्रिपुर-युद्धके समय त्रिपुरारि महादेवने इनकी स्तुति की थी। मधु और कैटभके युद्धमें वे विष्णुकी शक्तिस्वरूपिणी थीं । समस् दैत्योंका वध तथा रक्तबीजका विनाश करनेवाली यही हैं। हिरण्यकशिपुके वधकालमें ये नृसिंहशक्तिरूपमें प्रकट हुई थीं। हिरण्याक्षके वधकालमें भगवान् वाराहके भीतर वाराही शक्ति यही थीं। ये परब्रह्मरूपिणी तथा सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।
इस प्रकार ध्यान करके विद्वान् पुरुष अपने सिरपर पुष्प रखे और पुनः ध्यान करके भक्तिभाव आवाहन करे। प्रकृतिकी प्रतिमाका स्पर्श करके मनुष्य इस प्रकार मन्त्र पढ़े तथा मन्त्रद्वारा ही यत्नपूर्वक जीव-न्यास करे।
अम्ब ! भगवति! सनातनि! शिवलोकसे आओ, आओ सुरेश्वरि ! मेरी शारदीया पूजा ग्रहण करो। जगत्पूज्ये! महेश्वरि ! यहाँ आओ, ठहरो, ठहरो हे मातः ! हे अम्बिके! तुम इस प्रतिमामें निवास करो। अच्युते! इस प्रतिमामें तुम्हारे प्राण निम्रभागमें रहनेवाले प्राणोंके साथ आवें, रहें तुम्हारी सम्पूर्ण शक्तियाँ इस प्रतिमामें तुरंत पदार्पण करें। 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं दुर्गायै स्वाहा।' इस मन्त्रका उच्चारण करके कहे – 'हे सदाशिवे! इस प्रतिमाके हृदय में - प्राण स्थित हों। चण्डिके! सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता यहाँ आवें तुम्हारी शक्तियाँ यहाँ आवें। ईश्वर यहाँ आवें। देवि! तुम इस प्रतिमामें पधारो।' इस प्रकार आवाहन करके निम्नाङ्कित मन्त्रसे परिहार- स्तुति करनी चाहिये। विप्रवर! एकाग्रचित्त होकर परिहारको सुनो।
शिवप्रिये ! भगवति अम्बे! शिवलोकसे जो तुम आयी हो, तुम्हारा स्वागत है। भद्रे! मुझपर कृपा करो। भद्रकालि ! तुम्हें नमस्कार है। दुर्गे! माहेश्वरि ! तुम जो मेरे घरमें आयी हो, इससे मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ और मेरा जीवन सफल है। आज मेरा जन्म सफल और जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि मैं भारतवर्षके पुण्यक्षेत्रमें दुर्गाजीका पूजन करता हूँ। जो विद्वान् भारतवर्षमें आप पूजनीया दुर्गाका पूजन करता है, वह अन्तमें गोलोकधामको जाता है और इहलोकमें भी उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न बना रहता है। वैष्णवीदेवीकी पूजा करके विद्वान् पुरुष विष्णुलोकमें जाता है और माहेश्वरीकी पूजा करके वह शिवलोकको प्राप्त होता है। वेदों में सात्त्विकी, राजसी और तामसीके भेदसे तीन प्रकारकी देवीकी पूजा बतायी गयी है, जो क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधम है। सात्त्विकी पूजा वैष्णवोंकी है, शाक्त आदि राजसी पूजा करते हैं। और जो किसी मन्त्रकी दीक्षा नहीं ले सके हैं, ऐसे असत् पुरुषोंकी पूजा तामसी कही गयी है । जो पूजा जीवहत्यासे रहित और श्रेष्ठ है, वही सात्त्विकी एवं वैष्णवी मानी गयी है। वैष्णवलोग वैष्णवीदेवीके वरदानसे गोलोकमें जाते हैं। माहेश्वरी एवं राजसी पूजामें बलिदान होता है। शाक्त आ राजस पुरुष उस पूजासे कैलासमें जाते हैं। किरात लोग तामसी पूजाद्वारा भूत-प्रेतोंकी आराधना करके नरकमें पड़ते हैं। माँ! तुम्हीं जगत्के जीवोंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों फल प्रदान करनेवाली हो। तुम परमात्मा श्रीकृष्णकी सर्वशक्तिस्वरूपा हो । जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका अपहरण करनेवाली परात्परा हो । सुखदायिनी, मोक्षदायिनी, भद्रा (कल्याणकारिणी) तथा सदा श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाली हो । महामाये ! नारायणि ! दुर्गे! तुम दुर्गतिका नाश करनेवाली हो । दुर्गा नामके स्मरणमात्रसे यहाँ मनुष्योंका दुर्गम कष्ट दूर हो जाता है।
इस प्रकार परिहार-स्तवन करके साधक देवीके बायें भागमें तिपाईके ऊपर शख रखे। उसमें जल भर दे और दूर्वा, पुष्प तथा चन्दन डाल दे। तत्पश्चात् उसे दाहिने हाथसे पकड़कर मनुष्य इस तरह मन्त्र पढ़े ।
'हे शङ्ख ! तुम पवित्र वस्तुओं में परम पवित्र हो, मङ्गलोंके भी मङ्गल हो । पूर्वकल्पमें शङ्खचूडसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई, इसलिये परम पवित्र हो।' इस विधिसे अर्घ्यपात्रकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष उसे देवीको अर्पित करे।
तदनन्तर सोलह उपचार चढ़ाकर देवीकी पूजा करे। सजल कुशसे त्रिकोण मण्डल बनाकर वहाँ धार्मिक पुरुष कच्छप, शेषनाग और पृथ्वीका पूजन करे। मण्डलके भीतर ही तिपाई रखे और उसके ऊपर शङ्ख शङ्ख में तीन भाग जल डालकर उसकी पूजा करे तथा उसमें गङ्गा आदि तीर्थोका आवाहन करते हुए कहे -
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
नर्मदे सिन्धु कावेरि चन्द्रभागे च कौशिकि ॥
स्वर्णरेखे कनखले पारिभद्रे च गण्डकि।
श्वेतगङ्गे चन्द्ररेखे पम्पे चम्पे च गोमति ॥
पद्मावति त्रिपर्णाशे विपाशे विरजे प्रभे ।
शतहदे चेलगङ्गे जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥
हे गङ्गे ! यमुने! गोदावरि ! सरस्वति ! नर्मदे ! सिन्धु ! कावेरि! चन्द्रभागे ! कौशिकि! स्वर्णरेखे ! कनखले! पारिभद्रे! गण्डकि ! श्वेतगङ्गे ! चन्द्ररेखे ! पम्पे ! चम्पे ! गोमति ! पद्मावति! त्रिपर्णाशे ! विपाशे ! विरजे! प्रभे! शतहदे! तथा चेलगङ्गे! आपलोग इस जलमें निवास करें। तत्पश्चात् उस जलमें तुलसी और चन्दनसे अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, वरुण तथा शिव-इन छः देवताओंकी पूजा करे। फिर उस जलसे समस्त नैवेद्योंका प्रोक्षण करे। इसके बाद एक-एक करके सोलह उपचार समर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, स्त्रानीय, अनुलेपन, मधुपर्क, गन्ध, अर्घ्य, पुष्प, अभीष्ट नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, रत्नमय भूषण, धूप, दीप और शय्या- ये सोलह उपचार हैं ।
(आसन) शंकरप्रिये! अमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित तथा नाना प्रकारके चित्रोंद्वारा शोभित श्रेष्ठ सिंहासन ग्रहण करो। ( वस्त्र) शिवे! असंख्य सूत्रोंसे बने हुए तथा ईश्वरकी इच्छासे निर्मित प्रज्वलित अग्निद्वारा शुद्ध किया हुआ दिव्य वस्त्र स्वीकार करो। (पाद्य) दुर्गे! बहुमूल्य रत्नमय पात्रमें रखे हुए निर्मल गङ्गाजलको पैर धोनेके लिये पाद्यके रूपमें ग्रहण करो। (स्त्रानीय) परमेश्वरि ! सुगन्धित आँवलेक स्निग्ध द्रव और परम दुर्लभ सुपक्व विष्णुतैल स्त्रानीय सामग्रीके रूपमें प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो (अनुलेपन) जगदम्ब ! कस्तूरी और कुङ्कुम मिश्रित सुगन्धित चन्दनद्रव सुवासित अनुलेपन के रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो (मधुपर्क) महादेवि ! रत्नपात्र में स्थित परम पवित्र एवं परम मङ्गलमय माध्वीक मधुपर्कके रूपमें प्रस्तुत है। इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करो। (गन्ध) देवि! विभिन्न वृक्षोंके मूलका चूर्ण गन्ध द्रव्यसे युक्त हो परम पवित्र एवं मङ्गलोपयोगी गन्धके रूपमें समर्पित है। इसे ग्रहण करो (अर्घ्य) चण्डिके ! पवित्र शङ्खपात्र में स्थित स्वर्गङ्गाका जल दूर्वा, पुष्प और अक्षतसे युक्त अर्ध्यके रूपमें अर्पित है। इसे स्वीकार करो (पुष्प) जगदम्बिके! पारिजात वृक्षसे उत्पन्न सुगन्धित श्रेष्ठ पुष्प और मालती आदि फूलोंकी माला ग्रहण करो। (नैवेद्य) शिवे ! दिव्य सिद्धान्न, आमान्न, पीठा, खीर आदि, लड्डू और दूसरे दूसरे मिष्टान्न तथा सामयिक फल - नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत हैं। इन्हें स्वीकार करो। (आचमनीय) गिरिराजनन्दिनि ! मैंने भक्तिभावसे आचमनीयके रूपमें कर्पूर आदिसे सुसंस्कृत एवं सुवासित शीतल जल अर्पित किया है। इसे ग्रहण करो। (ताम्बूल) देवि ! सुपारी, पान और चूनाको एकत्र करके उसे कर्पूर आदिसे सुवासित किया है। वही यह समस्त भोगों में श्रेष्ठ रमणीय ताम्बूल है। इसे स्वीकार करो (रत्नमय भूषण) देवि ! अत्यन्त मूल्यवान् रत्नोंके सार-भागके द्वारा ईश्वरेच्छासे निर्मित तथा सम्पूर्ण अङ्गोंको शोभासम्पन्न बनानेवाला रत्नमय आभूषण ग्रहण करो। (धूप) देवि! वृक्षकी गोदके चूर्णको सुगन्धित वस्तुओंसे मिश्रित करके अग्निकी शिखासे शुद्ध किया गया है। इस धूपको स्वीकार करो। (दीप) परमेश्वरि ! घने अन्धकारको दूर करनेवाला यह परम पवित्र दीप दिव्य रत्नविशेष है। इसे ग्रहण करो। (शय्या) देवि ! यह उत्तम दिव्य पर्यड्डू रत्नोंके सारभागसे निर्मित हुआ है। इसपर गद्दा है और वह महीन वस्त्रकी चादरसे ढका हुआ है। तुम इस शय्याको स्वीकार करो । मुने! इस प्रकार दुर्गादेवीका पूजन करके उन्हें पुष्पाञ्जलि चढ़ावे तदनन्तर देवीकी सहचरी आठ नायिकाओंका यत्नतः पूजन करे। उनके नाम इस प्रकार हैं- उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका अतिचण्डा, चामुण्डा, चण्डा और चण्डवती। अष्टदल कमलपर पूर्व आदि दिशा के क्रमसे इनकी स्थापना करके पञ्चोपचारों द्वारा पूजन करे दलोंके मध्यभागमें भैरवोंका पूजन करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं- महाभैरव, संहारभैरव, असिताङ्ग भैरव, रुरुभैरव, कालभैरव, क्रोधभैरव, ताम्रचूडभैरव तथा चन्द्रचूडभैरव। इन सबकी पूजा करके बीचकी कर्णिकामें नौ शक्तियोंका पूजन करे क्रम यह है कि कमलके आठ दलोंमें आठ शक्तियोंकी और बीचकी कर्णिकामें नवीं शक्तिकी स्थापना करे। इस तरह इन सबका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। इन शक्तियोंके नाम यों हैं- ब्रह्माणी, वैष्णवी, रौद्री, माहेश्वरी, नारसिंही, वाराही, इन्द्राणी तथा कार्तिकी (कौमारी) । इनके अतिरिक्त नवीं प्रधाना शक्ति हैं सर्वमङ्गला, जो सर्वशक्तिस्वरूपा हैं। इन नौ शक्तियोंका पूजन करनेके पश्चात् कलशमें देवताओंका पूजन करे। शंकर, कार्तिकेय, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, वरुण, देवीकी चेटी, वटु तथा चौंसठ योगिनी–इन सबका विधिवत् पूजन करके यथाशक्ति भेंट उपहार अर्पित करके विद्वान् पुरुष स्तुति करे । कवचको भक्तिपूर्वक पढ़कर उसे गलेमें बाँध ले । फिर परिहार नामक स्तुति करके विद्वान् पुरुष देवीको नमस्कार करे। इस प्रकार उपहार दे स्तुति करके कवच बाँधकर विद्वान् पुरुष धरतीपर माथा टेक दण्डवत् प्रणाम करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे। (अध्याय ६३-६४)