श्री ब्रह्म वैवर्त महापुराण - प्रकृति खंड

1- पञ्चदेवीरूपा प्रकृतिका तथा उनके अंश, कला एवं कलांशका विशद वर्णन

भगवान् नारायण कहते हैं-

नारद! गणेशजननी दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा- ये पाँच देवियाँ प्रकृति कहलाती हैं । इन्हींपर सृष्टि निर्भर है।

नारदजीने पूछा-

ज्ञानियोंमें प्रमुख स्थान प्राप्त करनेवाले साधो ! वह प्रकृति कहाँसे प्रकट हुई है, उसका कैसा स्वरूप है, कैसे लक्षण हैं तथा क्यों वह पाँच प्रकारकी हो गयी ? उन समस्त देवियोंके चरित्र, उनके पूजाके विधान, उनके गुण और वे किसके यहाँ कैसे प्रकट हुई ये सभी प्रसङ्ग आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायणने कहा-

वत्स! 'प्र' का अर्थ है 'प्रकृष्ट' और 'कृति' से सृष्टिके अर्थका बोध होता है, अतः सृष्टि करनेमें जो प्रकृष्ट (परम प्रवीण) है, उसे देवी 'प्रकृति' कहते हैं। सर्वोत्तम सत्त्वगुणके अर्थमें 'प्र' शब्द, मध्यम रजोगुणके अर्थमें 'कृ' शब्द और तमोगुणके अर्थमें 'ति' शब्द है। जो त्रिगुणात्मकस्वरूपा है, वही सर्वशक्तिसे सम्पन्न होकर सृष्टिविषयक कार्यमें प्रधान है, इसलिये 'प्रधान' या 'प्रकृति' कहलाती है। 'प्र' प्रथम अर्थमें और 'कृति' सृष्टि अर्थमें है। अतः जो देवी सृष्टिकी आदिकारणरूपा है, उसे प्रकृति कहते हैं। सृष्टिके अवसरपर परब्रह्म परमात्मा स्वयं दो रूपोंमें प्रकट हुए प्रकृति और पुरुष उनका आधा दाहिना अङ्ग 'पुरुष' और आधा बायाँ अङ्ग 'प्रकृति' हुआ। वही प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, नित्या और सनातनी माया है। जैसे परमात्मा हैं, वैसी उनकी शक्तिस्वरूपा प्रकृति है अर्थात् परब्रह्म परमात्माके सभी अनुरूप गुण इन प्रकृतिमें निहित हैं, जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति सदा रहती है। इसीसे परम योगी पुरुष स्त्री और पुरुषमें भेद नहीं मानते हैं। नारद! वे सबको ब्रह्ममय देखते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण स्वेच्छामय, सर्वतन्त्र स्वतन्त्र परम पुरुष हैं। उनके मनमें सृष्टिकी इच्छा उत्पन्न होते ही सहसा 'मूल प्रकृति परमेश्वरी प्रकट हो गयीं। तदनन्तर परमेश्वरकी आज्ञाके अनुसार सृष्टि रचनाके लिये इनके पाँच रूप हो गये। भगवती प्रकृति भक्तोंके अनुरोधसे अथवा उनपर कृपा करनेके लिये विविध रूप धारण करती हैं। जो गणेशकी माता भगवती दुर्गा' हैं, उन्हें 'शिवस्वरूपा' कहा जाता है। ये भगवान् शंकरकी प्रेयसी भार्या हैं। नारायणी, विष्णुमाया और पूर्ण ब्रह्मस्वरूपिणी नामसे ये प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण तथा मनु प्रभृति- सभी इनकी पूजा करते हैं। ये सबकी अधिष्ठात्री देवी हैं, सनातन ब्रह्मस्वरूपा हैं। यश, मङ्गल, धर्म, श्री, सुख, मोक्ष और हर्ष प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। दुःख, शोक और उद्वेगको ये दूर कर देती हैं। शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षामें सदा संलग्न रहती हैं। ये तेज: स्वरूपा हैं। इनका विग्रह परम तेजस्वी है। इन्हें तेजकी अधिष्ठात्री देवी कहा जाता है। ये सर्वशक्तिस्वरूपा हैं और भगवान् शंकरको निरन्तर शक्तिशाली बनाये रखती हैं। सिद्धेश्वरी, सिद्धिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिदाताओंकी ईश्वरी, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, पिपासा, छाया, तन्द्रा, दया, स्मृति, जाति, क्षान्ति, शान्ति, कान्ति, भ्रान्ति, चेतना, तुष्टि, पुष्टि, लक्ष्मी, वृत्ति और माता— ये सब इनके नाम हैं। श्रीकृष्ण परब्रह्म परमात्मा हैं। उनके समीप सर्वशक्तिरूपसे ये विराजती हैं। श्रुतिमें इनके सुविख्यात गुणका अत्यन्त संक्षेपमें वर्णन किया गया है, जैसा कि आगमों में उपलब्ध होता है। ये अनन्ता हैं। अतएव इनमें गुण भी अनन्त हैं। अब इनके दूसरे रूपका वर्णन करता हूँ, सुनो।

जो परम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हैं, उन्हें 'भगवती लक्ष्मी' कहा जाता है। परम प्रभु श्रीहरिकी वे शक्ति कहलाती हैं। अखिल जगत्की सारी सम्पत्तियाँ उनके स्वरूप हैं। उन्हें सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे परम सुन्दरी, अनुपम संयमरूपा, शान्तस्वरूपा, श्रेष्ठ स्वभाव से सम्पन्न तथा समस्त मङ्गलोंकी प्रतिमा हैं। लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और अहंकार आदि दुर्गुणोंसे वे सहज ही रहित हैं। भक्तोंपर अनुग्रह करना तथा अपने स्वामी श्रीहरिसे प्रेम करना उनका स्वभाव है। वे सबकी आदिकारणरूपा और पतिव्रता हैं। श्रीहरि प्राणके समान जानकर उनसे अत्यन्त प्रेम करते हैं। वे सदा प्रिय वचन ही बोलती हैं; कभी अप्रिय बात नहीं कहतीं; धान्य आदि सभी शस्य तथा सबके जीवन रक्षाके उपाय उनके रूप हैं। प्राणियोंका जीवन स्थिर रहे - एतदर्थ उन्होंने यह रूप धारण कर - रखा है। वे परम साध्वी देवी महालक्ष्मी' नामसे विख्यात होकर वैकुण्ठमें अपने स्वामीकी सेवामें सदा संलग्न रहती हैं। स्वर्गमें 'स्वर्गलक्ष्मी', राजाओंके यहाँ 'राजलक्ष्मी' तथा मर्त्यलोकवासी गृहस्थोंके घर 'गृहलक्ष्मी' के रूपमें वे विराजमान हैं। समस्त प्राणियों तथा द्रव्यों में सर्वोत्कृष्ट शोभा उन्हींका स्वरूप है। वे परम मनोहर हैं। पुण्यात्माओंकी कीर्ति उन्हींकी प्रतिमा है। वे राजाओंकी प्रभा हैं। व्यापारियोंके यहाँ वे वाणिज्यरूपसे विराजती हैं। पापीजन जो कलह आदि अशिष्ट व्यवहार करते हैं, उनमें भी इन्हीं की शक्ति है। वे दयामयी हैं, भक्तोंकी माता हैं और उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये सदा व्याकुल रहती हैं। इस प्रकार दूसरी शक्ति (या प्रकृति) - का परिचय दिया गया। उनका वेदोंमें वर्णन है तथा सबने उनका सम्मान किया है। सब लोग उनकी आराधना और वन्दना करते हैं। नारद! अब मैं अन्य प्रकृतिदेवीका परिचय देता हूँ, सुनो। परब्रह्म परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञानकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं, उन्हें 'सरस्वती' कहा जाता है। सम्पूर्ण विद्याएँ उन्हींके स्वरूप हैं। मनुष्योंको बुद्धि, कविता, मेधा, प्रतिभा और स्मरण शक्ति उन्हींकी कृपासे प्राप्त होती हैं। अनेक प्रकारके सिद्धान्तभेदों और अर्थोंकी कल्पनाशक्ति वे ही देती हैं। वे व्याख्या और बोधस्वरूपा हैं। उनकी कृपा से समस्त संदेह नष्ट हो जाते हैं। उन्हें विचारकारिणी और ग्रन्थकारिणी कहा जाता है। वे शक्तिस्वरूपा हैं। सम्पूर्ण संगीतकी सन्धि और तालका कारण उन्हींका रूप है। प्रत्येक विश्वमें जीवोंके लिये विषय, ज्ञान और वाणीरूपा वे ही हैं। उनका एक हाथ व्याख्या ( अथवा उपदेश) की मुद्रामें - सदा उठा रहता है। वे शान्तस्वरूपा हैं तथा हाथमें वीणा और पुस्तक लिये रहती हैं। उनका विग्रह शुद्धसत्त्वमय है। वे सदाचारपरायण तथा भगवान् श्रीहरिकी प्रिया हैं। हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद और कमलके समान उनकी कान्ति है। वे रत्न (स्फटिकमणि) की माला फेरती हुई भगवान् श्रीकृष्णके नामोंका जप करती हैं। उनकी मूर्ति तपोमयी है। तपस्वीजनोंको उनके तपका फल प्रदान करनेमें वे सदा तत्पर रहती हैं। सिद्धि विद्या उनका स्वरूप है। वे सदा वे सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। इस प्रकार तृतीया देवी (प्रकृति) श्रीजगदम्बा सरस्वतीका शास्त्र अनुसार किञ्चित् वर्णन किया गया। अब चौथी प्रकृतिका परिचय सुनो। नारद! वे चारों वेदोंकी माता हैं। छन्द और वेदाङ्ग भी उन्हींसे उत्पन्न हुए हैं। संध्या-वन्दनके मन्त्र और तन्त्रोंकी जननी भी वे ही हैं। द्विजातिवर्णोंके लिये उन्होंने अपना यह रूप धारण किया है। वे जगद्रूपा, तपस्विनी, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न तथा सबका संस्कार करनेवाली हैं। उन पवित्र रूप धारण करनेवाली देवीको 'सावित्री' अथवा 'गायत्री' कहते हैं। वे ब्रह्माकी परम प्रिय शक्ति हैं। तीर्थ अपनी शुद्धिके लिये उनके स्पर्शकी कामना करते हैं। शुद्ध स्फटिकमणिके समान उनकी स्वच्छ कान्ति है। वे शुद्ध सत्त्वमय विग्रहसे शोभा पाती हैं। उनका रूप परम आनन्दमय है। उनका सर्वोत्कृष्ट रूप सदा बना रहता है। वे परब्रह्मस्वरूपा हैं मोक्ष प्रदान करना उनका स्वाभाविक गुण है। वे ब्रह्मतेजसे सम्पन्न परमशक्ति हैं। उन्हें शक्तिकी अधिष्ठात्री माना जाता है। नारद! उनके चरणकी धूलि सम्पूर्ण जगत्को पवित्र कर देती है।

नारद! इन चौथी देवीका प्रसंग सुना चुका। अब तुम्हें पाँचवीं देवीका परिचय देता हूँ। ये प्रेम और प्राणोंकी अधिदेवी तथा पञ्चप्राणस्वरूपिणी हैं। परमात्मा श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। सम्पूर्ण देवियोंमें अग्रगण्य हैं, सबकी अपेक्षा इनमें सुन्दरता अधिक है। इनमें सभी सद्गुण सदा विद्यमान हैं। ये परम सौभाग्यवती और मानिनी हैं। इन्हें अनुपम गौरव प्राप्त है। परब्रह्मका वामार्द्धाङ्ग ही इनका स्वरूप है। ये ब्रह्मके समान ही गुण और तेजसे सम्पन्न हैं। इन्हें परावरा, सारभूता, परमाद्या, सनातनी,परमानन्दरूपा, धन्या, मान्या और पूज्या कहा जाता है। ये नित्यनिकुञ्जेश्वरी, रासक्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। परमात्मा श्रीकृष्ण के रासमण्डलमें इनका आविर्भाव हुआ है। इनके विराजनेसे रासमण्डलकी विचित्र शोभा होती है। गोलोकधाममें रहनेवाली ये देवी 'रासेश्वरी' एवं 'सुरसिका' नामसे प्रसिद्ध हैं। रासमण्डलमें पधारे रहना इन्हें बहुत प्रिय है। ये गोपीके वेषमें विराजती हैं। ये परम आह्लादस्वरूपिणी हैं। इनका विग्रह संतोष और हर्षसे परिपूर्ण है। ये निर्गुणा (लौकिक त्रिगुणोंसे रहित स्वरूपभूत गुणवती), निर्लिप्सा (लौकिक विषयभोगसे रहित), निराकारा (पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित दिव्यचिन्मयस्वरूपा), आत्मस्वरूपिणी ( श्रीकृष्णकी आत्मा) नामसे विख्यात हैं। इच्छा और अहंकारसे ये रहित हैं। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही इन्होंने अवतार धारण कर रखा है। वेदोक्त विधिके अनुसार ध्यान करनेसे विद्वान् पुरुष इनके रहस्यको समझ पाते हैं। सुरेन्द्र एवं मुनीन्द्र प्रभृति समस्त प्रधान देवता अपने चर्मचक्षुओंसे इन्हें देखनेमें असमर्थ हैं। ये अग्रिशुद्ध नीले रंगके दिव्य वस्त्र धारण करती हैं। अनेक प्रकारके दिव्य आभूषण इन्हें सुशोभित किये रहते हैं। इनकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशमान है। इनका सर्वशोभासम्पन्न श्रीविग्रह सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे सम्पन्न है। भगवान् श्रीकृष्णके भक्तोंको दास्य-रति प्रदान करनेवाली एकमात्र ये ही हैं; क्योंकि सम्पूर्ण सम्पत्तियोंमें ये इस दास्य-सम्पत्तिको ही परम श्रेष्ठ मानती हैं। श्रीवृषभानुके घर पुत्रीके रूपसे ये पधारी हैं। इनके चरणकमलका संस्पर्श प्राप्तकर पृथ्वी परम पवित्र हो गयी है। मुने! जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता नहीं देख सके, वही ये देवी भारतवर्ष में सबके दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये स्त्री रत्नों में साररूपा हैं। भगवान् श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर इस प्रकार विराजती हैं, जैसे आकाशस्थित नवीन नील मेघोंमें बिजली चमक रही हो। इन्हें पानेके लिये ब्रह्माने साठ हजार वर्षोतक तपस्या की है। उनकी तपस्याका उद्देश्य यही था कि इनके चरणकमलके नखके दर्शन सुलभ हो जायँ, जिससे मैं परम पवित्र बन जाऊँ; परंतु स्वप्नमें भी वे इन भगवतीके दर्शन प्राप्त न कर सके; फिर प्रत्यक्षकी तो बात ही क्या है। उसी तपके प्रभावसे ये देवी वृन्दावनमें प्रकट हुई हैं धराधामपर इनका पधारना हुआ है, जहाँ ब्रह्माजीको भी इनका दर्शन प्राप्त हो सका। ये ही पाँचवीं देवी 'भगवती राधा' के नामसे प्रसिद्ध हैं। इन प्रकृतिदेवीके अंश, कला, कलांश और कलांशांशभेदसे अनेक रूप हैं। प्रत्येक विश्वमें सम्पूर्ण स्त्रियाँ इन्हींकी रूप मानी जाती हैं। ये पाँच देवियाँ परिपूर्णतम कही गयी हैं। इन देवियोंके जो-जो प्रधान अंश हैं, अब उनका वर्णन करता हूँ, सुनो भूमण्डलको पवित्र करनेवाली गङ्गा इनका प्रधान अंश हैं। ये सनातनी 'गङ्गा' जलमयी हैं। भगवान् विष्णुके विग्रहसे इनका प्रादुर्भाव हुआ है। पापियोंके पापमय ईंधनको भस्म करनेके लिये ये प्रज्वलित अग्नि हैं। इन्हें स्पर्श करने, इनमें नहाने अथवा इनका जलपान करनेसे पुरुष कैवल्य-पदके अधिकारी हो जाते हैं। गोलोक धाममें जानेके लिये ये सुखप्रद - सीढ़ीके रूपमें विराजमान हैं। इनका रूप परम पवित्र है। समस्त तीर्थों और नदियोंमें ये श्रेष्ठ मानी जाती हैं। ये भगवान् शंकरके मस्तकपर जटामें ठहरी थीं। वहाँसे निकलीं और पङ्क्तिबद्ध होकर भारतवर्षमें आ गयीं तपस्वीजन अपनी तपस्यामें सफलता प्राप्त कर सकें- एतदर्थ शीघ्र ही इनका पधारना हो गया। इनका शुद्ध एवं सत्त्वमय स्वरूप चन्द्रमा, श्वेतकमल या दूधके समान स्वच्छ है। मल और अहंकार इनमें लेशमात्र भी नहीं है। ये परम साध्वी गङ्गा भगवान् नारायणको बहुत प्रिय हैं।

श्री 'तुलसी' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश माना जाता है। ये विष्णुप्रिया हैं। विष्णुको विभूषित किये रहना इनका स्वाभाविक गुण है। भगवान् विष्णुके चरणमें ये सदा विराजमान रहती हैं। मुने! तपस्या, संकल्प और पूजा आदि सभी शुभकर्म इन्हींसे शीघ्र सम्पन्न होते हैं। पुष्पोंमें ये मुख्य मानी जाती हैं। ये परम पवित्र एवं सदा पुण्यप्रदा हैं। अपने दर्शन और स्पर्शमात्रसे ये तुरंत मनुष्योंको परमधामके अधिकारी बना देती हैं। पापमयी सूखी लकड़ीको जलानेके लिये प्रज्वलित अग्निके समान रूप धारण करके ये कलिमें पधारी हैं। इन देवी तुलसीके चरणकमलका स्पर्श होते ही पृथ्वी परम पावन बन गयी। तीर्थ स्वयं पवित्र होनेके लिये इनका दर्शन एवं स्पर्श करना चाहते हैं। इनके अभावमें अखिल जगत्के सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। इनकी कृपासे मुमुक्षुजन मुक्त हो जाते हैं। जो जिस कामनासे इनकी उपासना करते हैं, उनकी वे सारी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। भारतवर्षमें वृक्षरूपसे पधारनेवाली ये देवी कल्पवृक्षस्वरूपा हैं। भारतवासियोंका त्रा (उद्धार एवं रक्षा) करनेके लिये इनका यहाँ पधारना हुआ है। ये पूजनीयोंमें परम देवता हैं। प्रकृतिदेवीके एक अन्य प्रधान अंशका नाम देवी 'जरत्कारु' है। ये कश्यपजीकी मानसपुत्री हैं; अतः 'मनसा' देवी कहलाती हैं। इन्हें भगवान् शंकरकी प्रिय शिष्या होनेका सौभाग्य प्राप्त है। ये परम विदुषी हैं। नागराज शेषकी बहिन हैं। सभी नाग इनका सम्मान करते हैं। नागकी सवारीपर चलनेवाली इन अनुपम सुन्दरी देवीको 'नागेश्वरी' और 'नागमाता' भी कहा जाता है। प्रधान प्रधान नाग इनके साथ विराजमान रहते हैं। ये नागोंसे सुशोभित रहती हैं। नागराज इनकी स्तुति करते हैं। ये सिद्धयोगिनी हैं और नागलोकमें निवास करती हैं। ये विष्णुस्वरूपिणी हैं। भगवान् विष्णुमें इनकी अटल श्रद्धा भक्ति - है। ये सदा श्रीहरिकी पूजामें संलग्न रहती हैं। इनका विग्रह तपोमय है। तपस्वीजनोंको फल प्रदान करनेमें ये परम कुशल हैं। ये स्वयं भी तपस्या करती हैं। इन्होंने देवताओंके वर्षसे तीन लाख वर्षतक भगवान् श्रीहरिकी प्रसन्नताके लिये तपस्या की है। भारतवर्ष में जितने तपस्वी और तपस्विनियाँ हैं, उन सबमें ये पूज्य एवं श्रेष्ठ हैं। सर्प सम्बन्धी मन्त्रोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। - ब्रह्मतेजसे इनका विग्रह सदा प्रकाशमान रहता है। इनको 'परब्रह्मस्वरूपा' कहते हैं। ये ब्रह्मके चिन्तनमें सदा संलग्न रहती हैं। जरत्कारुमुनि भगवान् श्रीकृष्णके अंश हैं। उन्हींकी ये पतिव्रता पत्नी हैं। मुनिवर आस्तीक, जो तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, ये देवी उनकी माता हैं। नारद! प्रकृतिदेवीके एक प्रधान अंशको 'देवसेना' कहते हैं। मातृकाओंमें ये परम श्रेष्ठ मानी जाती हैं। इन्हें लोग भगवती 'षष्ठी' के नामसे कहते हैं। प्रत्येक लोकमें शिशुओंका पालन एवं संरक्षण करना इनका प्रधान कार्य है। ये तपस्विनी, विष्णुभक्ता तथा कार्तिकेयजीकी पत्नी हैं। ये साध्वी भगवती प्रकृतिका छठा अंश हैं। अतएव इन्हें 'षष्ठी' देवी कहा जाता है। संतानोत्पत्तिके अवसरपर अभ्युदयके लिये इन षष्ठी योगिनीकी पूजा होती है। अखिल जगत्में बारहों महीने लोग इनकी निरन्तर पूजा करते हैं। पुत्र उत्पन्न होनेपर छठे दिन सूतिकागृहमें इनकी पूजा हुआ करती है - यह प्राचीन नियम है। कल्याण चाहनेवाले कुछ व्यक्ति इक्कीसवें दिन इनकी पूजा करते हैं। इनकी मातृका संज्ञा है। ये दयास्वरूपिणी हैं। निरन्तर रक्षा करनेमें तत्पर रहती हैं। जल, थल, आकाश, गृह-जहाँ कहीं भी बच्चोंको सुरक्षित रखना इनका प्रधान उद्देश्य है।

प्रकृतिदेवीका एक प्रधान अंश 'मङ्गलचण्डी' के नामसे विख्यात है। ये मङ्गलचण्डी प्रकृतिदेवीके मुखसे प्रकट हुई हैं। इनकी कृपासे समस्त मङ्गल सुलभ हो जाते हैं। सृष्टिके समय इनका विग्रह मङ्गलमय रहता है। संहारके अवसरपर ये क्रोधमयी बन जाती हैं। इसीलिये इन देवीको पण्डितजन 'मङ्गलचण्डी' कहते हैं। प्रत्येक मङ्गलवारको विश्वभरमें इनकी पूजा होती है। इनके अनुग्रह से साधक पुरुष पुत्र, पौत्र, धन, सम्पत्ति, यश और कल्याण प्राप्त कर लेते हैं। प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण स्त्रियोंके समस्त मनोरथ पूर्ण कर देना इनका स्वभाव ही है। ये भगवती महेश्वरी कुपित होनेपर क्षणमात्रमें विश्वको नष्ट कर सकती हैं।

देवी 'काली' को प्रकृतिदेवीका प्रधान अंश मानते हैं। इन देवीके नेत्र ऐसे हैं, मानो कमल हों। संग्राममें जब भगवती दुर्गाके सामने प्रबल राक्षस बन्धु शुम्भ और निशुम्भ डटे थे, उस समय ये काली भगवती दुर्गाके ललाटसे प्रकट हुई थीं। इन्हें दुर्गाका आधा अंश माना जाता है। गुण और तेजमें ये दुर्गाके समान ही हैं। इनका परम पुष्ट विग्रह करोड़ों सूर्योके समान प्रकाशमान है। सम्पूर्ण शक्तियोंमें ये प्रमुख हैं। इनसे बढ़कर बलवान् कोई है ही नहीं। ये परम योगस्वरूपिणी देवी सम्पूर्ण सिद्धि प्रदान करती हैं। श्रीकृष्णके प्रति इनमें अटूट श्रद्धा है। तेज, पराक्रम और गुणमें ये श्रीकृष्णके समान ही हैं। इनका सारा समय भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनमें ही व्यतीत होता है। इन सनातनी देवीके शरीरका रंग भी कृष्ण ही है। ये चाहें तो एक श्वासमें समस् ब्रह्माण्डको नष्ट कर सकती हैं। अपने मनोरञ्जनके लिये अथवा जगत्‌को शिक्षा देनेके विचारसे ही ये संग्राममें दैत्योंके साथ युद्ध करती हैं। सुपूजित होनेपर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- सब कुछ देनेमें ये पूर्ण समर्थ हैं। ब्रह्मादि देवता, मुनिगण, मनु प्रभृति और मानवसमाज सब के सब इनकी - उपासना करते हैं। भगवती 'वसुन्धरा' भी प्रकृतिदेवीके प्रधान अंशसे प्रकट हैं। अखिल जगत् इन्हींपर ठहरा है। ये सर्व शस्य प्रसूतिका (सम्पूर्ण खेतीको उत्पन्न करनेवाली) कही जाती हैं। इन्हें लोग 'रत्नाकरा' और 'रत्नगर्भा' भी कहते हैं। सम्पूर्ण रत्नोंकी खान इन्हींके अंदर विराजमान है। राजा और प्रजा सभी लोग इनकी पूजा एवं स्तुति करते हैं। सबको जीविका प्रदान करनेके लिये ही इन्होंने यह रूप धारण कर रखा है। ये सम्पूर्ण सम्पत्तिका विधान करती हैं। ये न रहें तो सारा चराचर जगत् कहीं भी ठहर नहीं सकता।

मुनिवर ! प्रकृतिदेवीकी जो-जो कलाएँ हैं, उन्हें सुनो और ये जिन-जिनकी पत्नियाँ हैं, वह सब भी मैं तुम्हें बताता हूँ। देवी 'स्वाहा' अग्निकी पत्नी हैं। सम्पूर्ण जगत्में इनकी पूजा होती है । इनके बिना देवता अर्पित की हुई हवि पानेमें असमर्थ हैं। यज्ञकी पत्नीको 'दक्षिणा' कहते हैं। इनका सर्वत्र सम्मान होता है। इनके न रहनेपर विश्वभरके सम्पूर्ण कर्म निष्फल समझे जाते हैं। 'स्वधा' पितरोंकी पत्नी हैं। मुनि, मनु और मानव सभी इनकी पूजा करते हैं। इनका - उच्चारण न करके पितरोंको वस्तु अर्पण की जाय तो वह निष्फल हो जाती है। वायुकी पत्नीका नाम देवी 'स्वस्ति' है। प्रत्येक विश्वमें इनका सत्कार होता है। इनके बिना आदान-प्रदान सभी निष्फल हो जाते हैं। 'पुष्टि' गणेशकी पत्नी हैं। धरातलपर सभी इनको पूजते हैं। इनके बिना पुरुष और स्त्री- सभी क्षीणशक्ति- हीन हो जाते हैं। अनन्तकी पत्नीका नाम 'तुष्टि' है। सब लोग इनकी पूजा एवं वन्दना करते हैं। इनके बिना सम्पूर्ण संसार सम्यक् प्रकारसे कभी संतुष्ट हो ही नहीं सकता। ईशानकी पत्नीका नाम 'सम्पत्ति' है। देवता और मनुष्य सभी इनका सम्मान करते हैं। इनके न रहनेपर विश्वभरकी जनता दरिद्र कहलाती है। 'धृति' कपिलमुनिकी पत्नी हैं। सब लोग सर्वत्र इनका स्वागत करते हैं। ये न रहें तो जगत्में सम्पूर्ण प्राणी धैर्यसे हाथ धो बैठें। 'क्षमा' यमकी पत्नी हैं; ये साध्वी और सुशीला हैं, सभी इनका सम्मान करते हैं; ये न हों तो सब लोग रुष्ट एवं उन्मत्त हो जायँ। सती-साध्वी 'रति' कामदेवकी पत्नी हैं, ये क्रीड़ाकी अधिष्ठात्री देवी हैं। ये न रहें तो जगत्‌के सब प्राणी केलि कौतुकसे शून्य हो जायँ। सती 'मुक्ति' को सत्यकी भार्या कहा गया है। सबसे आदर पानेवाली ये देवी परम लोकप्रिय हैं। इनके बिना जगत् सर्वथा बन्धुता शून्य हो जाता है। परम साध्वी 'दया' मोहकी पत्नी हैं। ये पूज्य एवं जगत्प्रिय हैं। इनके अभावमें सम्पूर्ण प्राणी सर्वत्र निष्ठुर माने जाते हैं। पुण्यकी सहधर्मिणी 'प्रतिष्ठा' हैं। ये पुण्यरूपा देवी सदा सुपूजित होती हैं। मुने! इनके बिना सारा संसार जीते हुए ही मृतकके समान समझा जाता है। सुकर्मकी पत्नी 'कीर्ति' हैं, जो धन्या और माननीया हैं। सबके द्वारा इनका सम्मान होता है। इनके अभावमें अखिल जगत् यशोहीन होकर मृतकके समान हो जाता है। 'क्रिया' उद्योगकी पत्नी हैं। इन आदरणीया देवीसे सब लोग सहमत हैं। नारद! इनके बिना सारा संसार उच्छिन्न-सा हो जाता है। अधर्मकी पत्नीको 'मिथ्या' कहते हैं। सभी धूर्त इनका सत्कार करते हैं। सत्ययुगमें ये बिलकुल अदृश्य थीं। त्रेतायुगमें सूक्ष्म रूप धारण करके प्रकट हो गयीं। द्वापरमें अपने आधे शरीरसे शोभा पाने लगीं और कलियुगमें तो इन 'मिथ्या' देवीका शरीर पूरा हृष्ट-पुष्ट हो गया है। सब जगह इनकी पहुँच होनेके कारण ये बड़ी प्रगल्भता (धृष्टता) के साथ सर्वत्र अपना आधिपत्य जमाये रहती हैं। इनके भाईका नाम 'कपट' है। उसके साथ ये प्रत्येक घरमें चक्कर लगाती हैं। 'शान्ति' और 'लज्जा'– ये सुशीलकी दो आदरणीया पत्नियाँ हैं। नारद ! इनके न रहनेपर सारा जगत् उन्मत्ती भाँति जीवन व्यतीत करने लगता है। ज्ञानकी तीन पत्तियाँ हैं- 'बुद्धि', 'मेधा' और 'स्मृति'। ये साथ छोड़ दें तो समस्त संसार मूर्ख और मरेके समान हो जाय।

धर्मकी सहधर्मिणीका नाम 'मूर्ति' है। कमनीय कान्तिवाली ये देवी सबके मनको मुग्ध किये रहती हैं। इनका सहयोग न मिले तो परमात्मा निराकार ही रह जायँ और सम्पूर्ण विश्व भी निराधार हो जाय इनके स्वरूपको अपनाकर ही साध्वी लक्ष्मी सर्वत्र शोभा पाती हैं। 'श्री' और 'मूर्ति' – दोनों इनके स्वरूप हैं। ये परम मान्य, धन्य एवं सुपूज्य हैं। 'कालाग्नि' रुद्रकी पत्नीका नाम है। इनको 'योगनिद्रा' भी कहते हैं। रात्रिमें इनका सहयोग पाकर सम्पूर्ण प्राणी आच्छन्न अर्थात् नींदसे व्याप्त हो जाते हैं ।

कालकी तीन भार्याएँ हैं- 'संध्या', 'रात्रि' और 'दिन'। ये न रहें तो ब्रह्मा भी काल-संख्याका परिगणन नहीं कर सकते। 'क्षुधा' और 'पिपासा'– ये दो लोभकी भार्याएँ हैं। ये परम धन्य, मान्य और आदरकी पात्र हैं। इन्होंने सम्पूर्ण जगत्पर अपना प्रभाव जमा रखा है। इन्हींके कारण जगत् क्षोभयुक्त तथा चिन्तातुर होता है। 'प्रभा' और 'दाहिका' – ये तेजकी दो स्त्रियाँ हैं। इनके - अभावमें जगत्स्स्रष्टा ब्रह्मा अपना कार्य सम्पादन करनेमें असमर्थ हैं। ज्वरकी दो प्यारी भार्याएँ। हैं—'जरा' और 'मृत्यु'। ये दोनों कालकी पुत्रियाँ हैं। इनकी सत्ता न रहे तो ब्रह्माके बनाये हुए जगत्की व्यवस्था ही बिगड़ जाय। निद्राकी कन्याका नाम 'तन्द्रा' है। यह और 'प्रीति'– ये दो सुखकी प्रियाएँ हैं। ब्रह्मपुत्र नारद! विधिके विधानमें बना रहनेवाला यह सारा जगत् इनसे व्याप्त है। 'श्रद्धा' और 'भक्ति'– ये वैराग्यकी दो परम आदरणीय पत्नियाँ हैं। मुने! इनके कृपा प्रसादसे अखिल जगत् सदा जीवन्मुक्त हो सकता है। देवमाता 'अदिति', गौओंको उत्पन्न करनेवाली 'सुरभि', दैत्योंकी माता ‘दिति', 'कद्रू', 'विनता' और 'दनु'– ये सभी देवियाँ सृष्टिका कार्य सँभालती हैं। इन्हें भगवती प्रकृतिकी 'कला' कहा जाता है। अन्य भी बहुत सी कलाएँ हैं। - कुछ कलाओंका परिचय कराता हूँ, सुनो।

चन्द्रमाकी पत्नी 'रोहिणी' और सूर्यकी 'संज्ञा' हैं। मनुकी भार्याका नाम 'शतरूपा' है। 'शची' इन्द्रकी धर्मपत्नी हैं। बृहस्पतिकी सहधर्मिणी 'तारा' हैं। 'अरुन्धती' वसिष्ठमुनिकी धर्मपत्नी हैं। 'अहल्या' गौतमकी, 'अनसूया' अत्रिकी, 'देवहूति' कर्दममुनिकी और 'प्रसूति' दक्षकी पत्नियाँ हैं। पितरोंकी मानसी कन्या 'मेनका' पार्वतीकी जननी हैं। 'लोपामुद्रा', 'आहूति', कुबेरकी पत्नी, वरुणकी पत्नी, यमकी पत्नी, 'बलिकी भार्या विन्ध्यावली','कुन्ती', 'दमयन्ती', 'यशोदा', 'सती देवकी', 'गान्धारी', 'द्रौपदी', 'शैव्या', 'सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री', 'राधाकी जननी वृषभानुप्रिया कलावती', 'मन्दोदरी', 'कौसल्या', 'सुभद्रा', 'कैकेयी', 'रेवती', 'सत्यभामा', 'कालिन्दी', 'लक्ष्मणा', 'जाम्बवती', 'नाग्नजिती', 'मित्रविन्दा', 'रुक्मिणी', 'सीता'- जो स्वयं लक्ष्मी कहलाती हैं। 'व्यासको जन्म देनेवाली महासती योजनगन्धा', 'काली', 'बाणपुत्री उषा' उसकी सखी 'चित्रलेखा', 'प्रभावती', 'भानुमती', 'सती मायावती', 'परशुरामजीकी माता रेणुका', 'हलधर बलरामकी जननी रोहिणी' और ' श्रीकृष्णकी परम साध्वी बहिन दुर्गास्वरूपा एकानंशा' आदि भारतवर्षमें भगवती प्रकृतिकी बहुत-सी कलाएँ विख्यात हैं। जो-जो ग्राम देवियाँ हैं, वे सभी प्रकृतिकी कलाएँ हैं।

प्रत्येक लोकमें जितनी स्त्रियाँ हैं, उन सबको प्रकृतिकी कलाके अंशका अंश समझना चाहिये । इसीलिये स्त्रियोंके अपमानसे प्रकृतिका अपमान माना जाता है। जो पति और पुत्रवाली साध्वी ब्राह्मणीकी वस्त्र, अलंकार और चन्दनसे पूजा करता है, उसके द्वारा भगवती प्रकृतिकी पूजा सम्पन्न होती है। जिसने ब्राह्मणकी अष्टवर्षा कुमारीका वस्त्र, अलंकार एवं चन्दन आदिसे अर्चन कर लिया, उसके द्वारा भगवती प्रकृति स्वयं पूजित हो गयीं उत्तम, मध्यम और अधम- सभी स्त्रियाँ भगवती प्रकृतिके अंशसे उत्पन्न हैं। जो श्रेष्ठ आचरणवाली तथा पतिव्रता स्त्रियाँ हैं, इन्हें प्रकृतिदेवीका सत्त्वांश समझना चाहिये। इनको 'उत्तम' माना जाता है। जिन्हें भोग ही प्रिय है, वे राजस अंशसे प्रकट स्त्रियाँ 'मध्यम' श्रेणीकी कही गयी हैं। वे सुख-भोगमें आसक्त होकर सदा अपने कार्यमें लगी रहती हैं। प्रकृतिदेवीके तामस अंशसे उत्पन्न स्त्रियाँ अधम' कहलाती हैं। उनके कुलका कुछ पता नहीं रहता। वे मुखसे दुर्वचन बोलनेवाली, कुलटा, धूर्त, स्वेच्छाचारिणी और कलहप्रिया होती हैं। भूमण्डलकी कुलटाएँ, स्वर्गकी अप्सराएँ तथा व्यभिचारिणी स्त्रियाँ प्रकृतिका तामस अंश कही गयी हैं।

नारद! इस प्रकार प्रकृतिके सम्पूर्ण रूपका वर्णन कर दिया। वे सभी देवियाँ पृथ्वीपर पुण्यक्षेत्र भारतमें पूजित हुई हैं। दुर्गा दुर्गतिका नाश करती हैं। राजा सुरथने सर्वप्रथम इनकी उपासना की है। इसके पश्चात् रावणका वध करनेकी इच्छासे भगवान् श्रीरामने देवीकी पूजा की है। तत्पश्चात् भगवती जगदम्बा तीनों लोकों में सुपूजित हो गयीं। पहले दैत्यों और दानवोंका वध करनेके लिये ये दक्षके यहाँ प्रकट हुई थीं। परंतु कुछ कालके पश्चात् पिताके यज्ञमें स्वामीका अपमान देखकर इन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। फिर ये हिमालयकी पत्नीके उदरसे उत्पन्न हुई। उस समय इन्होंने भगवान् शंकरको पतिरूपमें प्राप्त किया। गणेश और स्कन्द- इनके दो पुत्र हुए। गणेशको स्वयं श्रीकृष्ण माना जाता है। स्कन्द विष्णुकी कलासे उत्पन्न हुए हैं। नारद! इसके बाद राजा मङ्गलने सर्वप्रथम लक्ष्मीकी आराधना की है। तत्पश्चात् तीनों लोकोंमें देवता, मुनि और मानव इनकी पूजा करने लगे। राजा अश्वपतिने सबसे पहले सावित्रीकी उपासना की; फिर प्रधान देवता और श्रेष्ठ मुनि भी इनके उपासक बन गये। सबसे पहले ब्रह्माने सरस्वतीका सम्मान किया। इसके बाद ये देवी तीनों लोकों में देवताओं और मुनियोंकी पूजनीया हो गयीं। सर्वप्रथम गोलोकमें रासमण्डलके भीतर परमात्मा श्रीकृष्णने भगवती राधाकी पूजा की है। गोपों, गोपियों, गोपकुमारों और कुमारियोंके साथ सुशोभित होकर श्रीकृष्णने राधाका पूजन किया था। उस समय कार्तिकी पूर्णिमाकी चाँदनी रात थी। गौओंका समुदाय भी इस उत्सवमें सम्मिलित था। फिर भगवान्‌की आज्ञा पाकर ब्रह्मा प्रभृति देवता तथा मुनिगण बड़े हर्षके साथ भक्तिपूर्वक पुष्प एवं धूप आदि सामग्रियोंसे निरन्तर इनकी पूजा वन्दना करने लगे। इस भूमण्डलमें पहले राधादेवीकी पूजा राजा सुयज्ञने की है। ये नरेश पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में थे। भगवान् शंकरके उपदेशके अनुसार इन्होंने देवीकी उपासना की थी। फिर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर त्रिलोकीमें मुनिगण पुष्प एवं धूप आदि उपचारोंसे भक्ति प्रदर्शित करते हुए इनकी पूजामें सदा तत्पर रहने लगे। जो-जो कलाएँ प्रकट हुई हैं, उन सबकी भारतवर्षमें पूजा होती है। मुने! तभीसे प्रत्येक ग्राम और नगरमें ग्रामदेवियोंकी पूजा होती है।

नारद! इस प्रकार आगमों के अनुसार भगवती प्रकृतिका सम्पूर्ण शुभ चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय १)