नारदजीने पूछा-
प्रभो ! गृहस्थ ब्राह्मणों, यतियों, वैष्णवों, विधवा स्त्रियों और ब्रह्मचारियों के लिये क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य ? क्या कर्तव्य है और क्या अकर्तव्य ?अथवा उनके लिये क्या भोग्य है और क्या अभोग्य? आप सर्वज्ञ, सर्वेश्वर और सबके कारण हैं, अतः मेरी पूछी हुई सब बातें बताइये।
महादेवजीने कहा-
मुने! कोई तपस्वी ब्राह्मण चिरकालतक मौन रहकर बिना आहार ही रहता है। कोई वायु पीकर रह जाता है और कोई फलाहारी होता है। कोई गृहस्थ ब्राह्मण अपनी स्त्रीके साथ रहकर यथोचित समयपर अन्न ग्रहण करता है। ब्रह्मन् ! जिनकी जैसी इच्छा होती है, वे उसीके अनुसार आहार करते हैं; क्योंकि रुचियोंका स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकारका होता है। गृहस्थ ब्राह्मणोंके लिये हविष्यान्न भोजन सदा उत्तम माना गया है। भगवान् नारायणका उच्छिष्ट प्रसाद ही उनके लिये अभीष्ट भोजन है। जो भगवान्को निवेदित नहीं हुआ है, वह अभक्षणीय है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। एकादशीके दिन सब प्रकारका अन्न जल मल-मूत्रके तुल्य कहा गया है। जो ब्राह्मण एकादशीके दिन स्वेच्छासे अन्न खाता है, वह पाप खाता है, इसमें संशय नहीं है। नारद !एकादशीका दिन प्राप्त होनेपर गृहस्थ ब्राह्मणोंको कदापि अन्न नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये, नहीं खाना चाहिये। जन्माष्टमी के दिन, रामनवमीके दिन तथा शिवरात्रिके दिन जो अन्न खाता है, वह भी दूने पातकका भागी होता है। जो सर्वथा उपवास करनेमें समर्थ न हो, वह फल-मूल और जल ग्रहण करे; अन्यथा उपवास के कारण शरीर नष्ट हो जानेपर मनुष्य आत्महत्याके पापका भागी होता है। जो व्रतके दिन एक बार हविष्यान्न खाता अथवा भगवान् विष्णुके नैवेद्यमात्रका भक्षण करता है, उसे अन्न खानेका पाप नहीं लगता। वह उपवासका पूरा फल प्राप्त कर लेता है। (उपवासासमर्थश्च फलमूलजलं पिबेत् । नष्टे शरीरे स भवेदन्यथा चात्मघातकः ॥ सकृद् भुंक्ते हविष्यानं विष्णोर्नैवेद्यमेव च । न भवेत् प्रत्यवायी स चोपवासफलं लभेत् ॥ (ब्रह्मखण्ड २७।१२ १३))
नारद! गृहस्थ, शैव, शाक्त, विशेषतः वैष्णव यति तथा ब्रह्मचारियोंके लिये यह बात बतायी गयी है। जो वैष्णव पुरुष नित्य भगवान् श्रीकृष्णके नैवेद्य (प्रसाद) का भोजन करता है, वह जीवन्मुक्त हो प्रतिदिन सौ उपवास व्रतोंका फल पाता है। सम्पूर्ण देवता और तीर्थ उसके अङ्गोंका स्पर्श चाहते हैं। उसके साथ वार्तालाप तथा उसका दर्शन समस्त पापोंका नाश करनेवाला है। यतियों, विधवाओं और ब्रह्मचारियोंके लिये ताम्बूल भक्षण निषिद्ध है।
नारद! समस्त ब्राह्मणोंके लिये जो अभक्ष्य है, उसका वर्णन सुनो ताँबेके पात्रमें दूध पीना, जूठे बर्तन या अन्नमें घी लेकर खाना तथा नमकके साथ दूध पीना तत्काल गोमांस-भक्षण के समान माना गया है। काँसके बर्तनमें रखा हुआ एवं जो द्विज उठकर बायें हाथसे जल पीता है, वह शराबी माना गया है और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत है। मुने! भगवान् श्रीहरिको निवेदित न किया गया अन्न, खानेसे बचा हुआ जूठा भोजन तथा पीनेसे शेष रहा जूठा जल- ये सब सर्वथा निषिद्ध हैं। कार्तिकमें बैगनका फल, माघमें मूली तथा श्रीहरिके शयनकाल (चौमासे) में कलम्बींका (जलज शाकविशेष अथवा कदम्ब) शाक सर्वथा नहीं खाना चाहिये। सफेद ताड़, मसूर और मछली- ये सभी ब्राह्मणोंके लिये समस्त देशोंमें त्याज्य हैं । प्रतिपदाको कूष्माण्ड (कोहड़ा) नहीं खाना चाहिये; क्योंकि उस दिन वह अर्थका नाश करनेवाला है। द्वितीयाको बृहती (छोटे बैगन अथवा कटेहरी) भोजन कर ले तो उसके दोषसे छुटकारा पानेके लिये श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये। तृतीयाको परवल शत्रुओंकी वृद्धि करनेवाला होता है; अतः उस दिन उसे नहीं खाना चाहिये। चतुर्थीको भोजनके उपयोग में लायी हुई मूली धनका नाश करनेवाली होती है । पञ्चमीको बेल खाना कलङ्क लगनेमें कारण होता है। षष्ठीको नीमकी पत्ती चबायी जाय या उसका फल या दाँतुन मुँहमें डाला जाय तो उस पापसे मनुष्यको पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। सप्तमीको ताड़का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीरका नाशक होता है। अष्टमीको नारियलका फल खाया जाय तो उससे बुद्धिका नाश होता है। नवमीको लौकी और दशमीको कलम्बीका शाक सर्वथा त्याज्य है। एकादशीको शिम्बी (सेम), द्वादशीको पूतिका (पोई) और त्रयोदशीको बैगन खानेसे पुत्रका नाश होता है। मांस सबके लिये सदा वर्जित है।
पार्वणश्राद्ध और व्रतके दिन प्रातः कालिक स्नानके समय सरसोंका तेल और पकाया हुआ तेल उपयोगमें लाया जाय तो उत्तम है। अमावास्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथियों में, रविवारको श्राद्ध और व्रतके दिन स्त्री सहवास - तथा तिलके तेलका सेवन निषिद्ध है। सभी वर्णोंके लिये दिनमें अपनी स्त्रीका भी सेवन वर्जित है। रातमें दही खाना, दिनमें दोनों संध्याओंके समय सोना तथा रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करना- ये नरककी प्राप्तिके कारण हैं। रजस्वला तथा कुलटाका अन्न नहीं खाना चाहिये।
ब्रह्मर्षे! शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणका अन्न भी खाने योग्य नहीं है। ब्रह्मन् ! सूदखोर और गणकका अन्न भी नहीं खाना चाहिये। अग्रदानी ब्राह्मण (महापात्र) तथा चिकित्सक ( वैद्य या डाक्टर) का अन्न भी खाने योग्य नहीं है। अमावास्या तिथि और कृत्तिका नक्षत्र में द्विजोंके लिये क्षौर कर्म (हजामत) वर्जित है। जो मैथुन करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करता है, उसका वह जल रक्तके समान होता है तथा उसे देनेवाला नरकमें पड़ता है। नारद! जो करना चाहिये, जो नहीं करना चाहिये, जो भक्ष्य है और जो अभक्ष्य है, वह सब तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय २७)
Summary of chapter 26 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
Welcoming Maharshi Nārada with great affection, Lord Śiva began imparting the comprehensive guidelines for daily spiritual discipline and formal devotional worship. He detailed the exact routine a devout seeker must follow upon waking during the auspicious Brahma-muhūrta, including inner cleansing, morning ablutions, silent chanting of sacred Mantras, and ceremonial purification. Lord Śiva then revealed the intricate procedures for establishing a sacred altar, meditating upon the transcendent form of Lord Śrī Kṛshṇa, and offering sixteen traditional items of worship with love, reverence, and complete absorption of mind.