सौति कहते हैं -
शौनक ! अपने यहाँ पुत्र जन्मके उत्सवमें गन्धर्वराजने बड़ी प्रसन्नता के साथ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न और धन दिये। समयानुसार बड़े होनेपर उपबर्हणने वसिष्ठी के द्वारा परम दुर्लभ हरि मन्त्रकी दीक्षा पाकर दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की एक समयकी बात है, वे गण्डकीके तटपर विराजमान थे। उन्हें युवावस्था प्राप्त हो चुकी थी। उस समय पचास गन्धर्वकन्याओंने उन्हें देखा। देखते ही वे सब की सब मोहित हो गयीं। उन सबने उपबर्हणको पतिरूपमें प्राप्त करनेका संकल्प ले योगशक्तिसे प्राणोंको त्याग दिया और चित्ररथ गन्धर्वके घर जन्म लेकर पिताकी आज्ञासे उनके साथ विवाह कर लिया। उपबर्हणने दीर्घकालतक उन सबके साथ विहार किया। चिरकालतक निरन्तर उनके साथ राज्य करके एक दिन वे ब्रह्माजीके स्थानपर गये और वहाँ श्रीहरिका यशोगान करने लगे। वहीं रम्भाको नृत्य करते देख उपबर्हणके मनमें वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित हो गया। इससे उनकी बड़ी हँसी हुई और ब्रह्माजीने उन्हें शाप देते हुए कहा- 'तुम गन्धर्व शरीरको त्याग दो - और शूद्रयोनिको प्राप्त हो जाओ। फिर समयानुसार वैष्णवोंका संसर्ग प्राप्त कर तुम पुनः मेरे पुत्रके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाओगे। बेटा! विपत्तिका सामना किये बिना पुरुषोंकी महत्ता प्रकट नहीं होती। संसारमें सभीको बारी-बारीसे सुख और दुःख प्राप्त होते हैं।'
ऐसा कहकर ब्रह्माजी पुष्करसे अपने धामको चले गये और उपबर्हण गन्धर्वने तत्काल उस शरीरको इस प्रकारसे त्याग दिया- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा नामवाले छः चक्रोंका क्रमशः भेदन करके उन्होंने इडा आदि नाड़ियोंका भेदन आरम्भ किया। इडा, सुषुम्णा, मेधा, पिङ्गला, प्राणहारिणी, सर्वज्ञानप्रदा, मनः संयमनी, विशुद्धा, निरुद्धा, वायुसंचारिणी, तेज: शुष्ककरी, बलपुष्टिकरी, बुद्धिसंचारिणी, ज्ञानजृम्भन कारिणी, सर्वप्राणहरा तथा पुनर्जीवनकारिणी - इन सोलह नाड़ियोंका भेदन करके मनसहित जीवात्माको ब्रह्मरन्ध्रमें लाकर वे योगासनसे बैठ गये और दो घड़ीतक उन्होंने आत्माको आत्मामें ही लगाया। तत्पश्चात् वे जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाले) योगिराज उपबर्हण ब्रह्मभावको प्राप्त हो गये। तीन तारवाली दुर्लभ वीणाको बायें कंधेपर रखकर दाहिने हाथमें शुद्ध स्फटिककी माला लिये वे वेदके सारतत्त्व तथा उद्धारके उत्तम बीजरूप परात्पर परब्रह्ममय (कृष्ण) इन दो अक्षरोंका जप करने लगे। उन्होंने कुशकी चटाईपर पूर्वकी ओर सिरहाना करके पश्चिम दिशाकी ओर दोनों चरण फैला दिये और इस तरह सो गये, मानो कोई पुरुष सो रहा हो।
उनके पिता गन्धर्वराजने उन्हें इस प्रकार देहत्याग करते देख स्वयं भी अपनी पत्नीके साथ मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए योगधारणाद्वारा प्राण त्याग दिये और परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लिया। उस समय उपबर्हणके सभी भाई बन्धु और पत्नियाँ बारंबार विलाप करते - हुए जोर-जोरसे रोने लगे। विष्णुकी मायासे मोहित होनेके कारण शोकसे पीड़ित हो वे उनके शरीरके पास गये। उपबर्हणकी पचास पत्नियोंमें जो उनकी परम प्रेयसी तथा प्रधान पटरानी थी, वह सती साध्वी मालावती अपने प्रियतमको छातीसे लगाकर अत्यन्त उच्च-स्वरसे रोदन करने लगी।
भाँति-भाँतिसे करुण विलाप करके मालावती बोली- कमलोद्भव ब्रह्माजीका यह कथन है कि मुझ सती-साध्वी, कुलीन नारियोंके लिये उसके पतिके सिवा दूसरा कोई विशिष्ट बान्धव नहीं दिखायी देता। अतः हे दिशाओंके स्वामी दिक्पालो! हे धर्म! हे प्रजापते! हे गिरीश शंकर! तथा हे कमलाकान्त नारायण! आपलोग मुझे पति दान दीजिये। ऐसा कहकर विरहसे आतुर हुई चित्ररथकी कन्या मालावती वहीं उस दुर्गम गहन वनमें मूच्छित हो गयी। प्रियतमको अपने वक्षःस्थलसे लगाकर पूरे एक दिन और एक रात वह अचेत अवस्थामें वहाँ पड़ी रही। उस समय सम्पूर्ण देवताओंने उसकी रक्षा की प्रातःकाल फिर होशमें आनेपर वह पुनः जोर-जोरसे विलाप करने लगी। उस सतीने श्रीहरिको सम्बोधित करके पुनः वहाँ इस प्रकार कहा।
मालावती बोली-
हे श्रीकृष्ण! आप सम्पूर्ण जगत्के नाथ (स्वामी तथा संरक्षक) हैं। नाथ ! मैं जगत्से बाहर नहीं हूँ। प्रभो! आप ही जगत्के पालक हैं। फिर मेरा पालन क्यों नहीं कर रहे हैं! 'यह पति है और मैं इसकी स्त्री हूँ। इस प्रकार जो 'इदम्' और 'मम' का भाव उत्पन्न होता है, वह आपकी मायाकी ही करामात है। आप ही सबके स्वामी हैं और ऐसा होना ही अधिक सम्भव है; क्योंकि आप ही सबके कारण हैं। कर्मके फलसे गन्धर्व उपबर्हण मेरे प्रियतम पति हुए और कर्मवश ही मैं उनकी प्रियतमा पत्नी हुई। अब कर्मभोगके अन्तमें वे मुझ प्रियाको किस स्थानमें रखकर कहाँ चले गये ? अथवा प्रभो! कौन किसका पति या पुत्र है? तथा कौन किसकी प्रिया है ? विधाता ही कर्मके अनुसार प्राणियोंको एक-दूसरेसे संयुक्त और वियुक्त करता रहता है। संयोगमें परम आनन्द मिलता है। और वियोगमें प्राणोंपर संकट उपस्थित हो जाता है। संसारमें सदा मूर्ख और अज्ञानीके ही जीवनमें ऐसी बात देखी जाती है। आत्माराम महात्माके हृदयपर निश्चय ही संयोग-वियोगका वैसा प्रभाव नहीं पड़ता विषय नाशवान् हैं, यह बात सर्वथा सत्य है, तथापि भूतलपर विषयभोग ही बान्धव बना हुआ है। यदि विषयभोगको स्वयं त्याग दिया जाय तो वह सुखका ही कारण होता है । परंतु जब दूसरे लोग बलपूर्वक उसका त्याग करवाते हैं, तब वह दुःखदायी जान पड़ता है। इसीलिये साधु पुरुष महान् से महान् मनोवाञ्छित ऐश्वर्यको स्वयं त्यागकर भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका, जहाँ आपत्ति या विपत्तिकी पहुँच नहीं है, सदा चिन्तन करते हैं। ज्ञानवान् संत पुरुष तो सर्वत्र हैं, परंतु भूतलपर ज्ञानवती स्त्री कौन है? अतः मुझ मूढ़ अबलाको आप मनोवाञ्छित पति प्रदान करें। मैं अमरत्व नहीं चाहती, इन्द्रपदकी इच्छा नहीं रखती और मोक्षके मार्गमें भी मेरी रुचि नहीं है; अतः आप मेरे इन श्रेष्ठ प्राणवल्लभको ही मुझे लौटा दें; क्योंकि ये मेरे लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- चारों पुरुषार्थोकी प्राप्ति करानेवाले श्रेष्ठ देवता हैं। जगदीश्वर! पृथ्वीपर जितनी भी स्त्री जातियाँ हैं, - उनमें से किसीको भी विधाताने इन गन्धर्वकुमारके समान गुणवान् पति नहीं दिया है।
इसके अनन्तर मालावती अपने स्वामीके गुणोंका बखान करने लगी और अन्तमें सहसा कुपित हो नारायण, ब्रह्मा, महादेव तथा धर्म आदि समस्त देवताओंको सम्बोधित करके उन्हें शाप देनेको उद्यत हो गयी। तब ब्रह्मा आदि देवताओंने क्षीरसागरके तटपर जाकर भगवान् विष्णुकी शरण ली और मालावतीके भीषण शापसे बचानेकी उनसे प्रार्थना की। देवताओंके प्रार्थना कर चुकनेपर आकाशवाणी हुई—'देवताओ! अब तुमलोग जाओ। यज्ञके मूल हैं भगवान् विष्णु वे ही ब्राह्मणका रूप धारण करके मालावतीको शान्त करने तथा तुमलोगोंको शाप के संकटसे बचानेके लिये जायँगे।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर सब देवताओंका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे सब के-सब उत्कण्ठित हो कौशिकीके तटपर मालावतीके स्थानमें गये। वहाँ पहुँचकर देवताओं ने उस सती मालावती देवीको देखा। वह रत्नोंके सारभूत इन्द्रनील आदि मणियोंके आभूषणों से उद्दीप्त हो भगवती लक्ष्मीकी कला-सी जान पड़ती थी। उसके अङ्गोंको अनिमें तपाकर शुद्ध की हुई सुनहरी साड़ी सुशोभित कर रही थी। भालदेशमें सिन्दूरकी बेंदी शोभा दे रही थी। वह शरत्कालके चन्द्रमाकी शान्त प्रभा-सी प्रकाशित होती और अपनी दीप्सिसे सम्पूर्ण दिशाओंको उद्भासित करती थी। पतिसेवारूप महान् धर्मका अनुष्ठान करके चिरकालसे संचित किये हुए तेजसे अग्निकी उत्तम एवं प्रज्वलित शिखा सी उद्दीप्त हो रही थी। पतिके शवको छातीसे लगाकर योगासन लगाये बैठी थी और स्वामीकी सुरम्य वीणाको दाहिने हाथमें लिये हुए थी।
प्राणवल्लभके प्रति भक्ति तथा स्नेहके कारण योगमुद्रापूर्वक तर्जनी और अङ्गुष्ठ अंगुलियोंके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिक मणिकी माला धारण किये थी। मनोहर चम्पाकी-सी अङ्ग कान्ति, - बिम्बफलके सदृश अरुण ओष्ठ और गले में रत्नोंकी माला शोभा पाती थी। वह सुन्दरी सोलह वर्षकी-सी अवस्थासे युक्त तथा नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न थी। वह सती अपने स्वामीके शवको बारंबार शुभदृष्टिसे देख रही थी।
इस रूपमें मालावतीको देखकर उन सब देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। वे सभी धर्मात्मा और धर्मभीरु थे; अतः क्षणभर वहाँ अपनेको छिपाये खड़े रहे। (अध्याय १३)
Summary of chapter 13 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
During a grand celestial assembly convened by Lord Brahmā to sing sacred hymns in honor of the Supreme Lord, the Gandharva Upabarhaṇa became distracted by the alluring dances of celestial damsels and lost his devotional focus, thereby committing a severe spiritual offense. Enraged by this lapse of reverence during a holy ritual, Lord Brahmā cursed Upabarhaṇa to instantly drop dead, causing his life air to depart his celestial form immediately. Beholding her beloved husband lifeless upon the ground, his chaste wife Mālatī fell into agonizing grief, weeping bitterly and threatening to consume the entire cosmos with the blazing heat of her virtuous chastity if her husband was not restored to life.