ब्रह्म महा पुराणम - ब्रह्म खंड

18- ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा उपबर्हणको जीवित करनेकी चेष्टा, मालावतीद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन, शक्तिसहित भगवान्‌का गन्धर्वके शरीरमें प्रवेश तथा गन्धर्वका जी उठना, मालावतीद्वारा दान एवं मङ्गलाचार तथा पूर्वोक्त स्तोत्रके पाठकी महिमा

सौति कहते हैं -

भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित हुए ब्रह्मा और शिव आदि देवता ब्राह्मण के साथ मालावतीके निकट गये। ब्रह्माजीने शवके शरीरपर कमण्डलुका जल छिड़क दिया और उसमें मनका संचार करके उसके शरीरको सुन्दर बना दिया। फिर ज्ञानानन्दस्वरूप साक्षात् शिवने उसे ज्ञान प्रदान किया। स्वयं धर्मने धर्म-ज्ञान और ब्राह्मणने जीवदान दिया। अग्निकी दृष्टि पड़ते ही गन्धर्वके शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हो गया। फिर कामकी दृष्टि पड़नेसे वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो गया। जगत्‌के प्राणस्वरूप वायुका अधिष्ठान होनेसे उस शरीरके भीतर निःश्वास और प्राणोंका संचार होने लगा। फिर सूर्यके अधिष्ठित होनेसे गन्धर्वके नेत्रों में देखनेकी शक्ति आ गयी। वाणीकी दृष्टि पड़नेसे वाक्शक्ति और श्रीके दृष्टिपातसे शोभा प्रकट हुई। इतनेपर भी वह शव नहीं उठा जड़की भाँति सोता ही रहा। आत्माका अधिष्ठान प्राप्त न होनेसे उसे विशिष्ट बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। तब ब्रह्माजी के कहनेसे मालावतीने शीघ्र ही नदीके जलमें स्नान किया और दो धुले वस्त्र धारण करके उस सतीने परमेश्वरकी स्तुति प्रारम्भ की।

मालावती बोली-

मैं समस्त कारणोंके भी कारणरूप उन परमात्माकी वन्दना करती हूँ, जिनके बिना भूतलके सभी प्राणी शवके समान हैं। वे निर्लिप्त हैं। सबके साक्षी हैं। समस्त कर्मोंमें सर्वत्र और सर्वदा विद्यमान हैं तो भी सबकी दृष्टि (जानकारी) में नहीं आते हैं। जिन्होंने सबकी आधारभूता उस परात्परा प्रकृतिकी सृष्टि की है; जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि भी जननी तथा त्रिगुणमयी है; साक्षात् जगत्स्स्रष्टा ब्रह्मा जिनकी सेवामें नियमित रूपसे लगे रहते हैं; पालक विष्णु और साक्षात् जगत्संहारक शिव भी जिनकी सेवामें निरन्तर तत्पर रहते हैं; सब देवता, मुनि, मनु, सिद्ध, योगी और संत-महात्मा सदा प्रकृतिसे परे विद्यमान जिन परमेश्वरका ध्यान करते हैं; जो साकार और निराकार भी हैं; स्वेच्छामय रूपधारी और सर्वव्यापी हैं। वर वरेण्य, वरदायक, वर देनेके योग्य और वरदानके कारण हैं, तपस्याके फल, बीज और फलदाता हैं; स्वयं तपः स्वरूप तथा सर्वरूप हैं; स आधार, सबके कारण, सम्पूर्ण कर्म, उन कर्मोंके फल और उन फलोंके दाता हैं तथा जो कर्मबीजका नाश करनेवाले हैं, उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करती हूँ। वे स्वयं तेजःस्वरूप होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं; क्योंकि विग्रहके बिना भक्तजन किसकी सेवा और किसका ध्यान करेंगे। विग्रहके अभावमें भक्तोंसे सेवा और ध्यान बन ही नहीं सकते। तेजका महान् मण्डल ही उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्योके समान दीप्तिमान् हैं। उनका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर है। नूतन मेघकी-सी श्याम कान्ति, शरद् ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान नेत्र, शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मन्द मुस्कानकी छटासे सुशोभित मुख और करोड़ों कन्दपको भी तिरस्कृत करनेवाला लावण्य उनकी सहज विशेषताएँ हैं। वे मनोहर लीलाधाम हैं। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दो बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, हाथमें मुरली है, श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर शोभा पाता है, किशोर अवस्था है। वे शान्तस्वरूप राधाकान्त अनन्त आनन्दसे परिपूर्ण हैं। कभी निर्जन वनमें गोपाङ्गनाओंसे घिरे रहते हैं। कभी रासमण्डलमें विराजमान हो राधा रानीसे समाराधित होते हैं। कभी गोप- बालकोंसे घिरे हुए गोपवेषसे सुशोभित होते हैं। कभी सैकड़ों शिखरवाले गिरिराज गोवर्धनके कारण उत्कृष्ट शोभासे युक्त रमणीय वृन्दावनमें कामधेनुओंके समुदायको चराते हुए बालगोपालके रूपमें देखे जाते हैं। कभी गोलोकमें विरजाके तटपर पारिजातवनमें मधुर मधुर वेणु बजाकर गोपाङ्गनाओंको मोहित किया करते हैं। कभी निरामय वैकुण्ठधाम में चतुर्भुज लक्ष्मीकान्तके रूपमें रहकर चार भुजाधारी पार्षदोंसे सेवित होते हैं। कभी तीनों लोकोंके पालनके लिये अपने अंशरूपसे श्वेतद्वीपमें विष्णुरूप धारण करके रहते हैं और पद्मा उनकी सेवा करती हैं। कभी किसी ब्रह्माण्डमें अपनी अंशकलाद्वारा ब्रह्मारूपसे विराजमान होते हैं। कभी अपने ही अंशसे कल्याणदायक मङ्गलरूप शिव-विग्रह धारण करके शिवधाममें निवास करते हैं। अपने सोलहवें अंशसे स्वयं ही सर्वाधार, परात्पर एवं महान् विराट् रूप धारण करते हैं, जिनके रोम-रोममें अनन्त ब्रह्माण्डोंका समुदाय शोभा पाता है। कभी अपनी ही

अंशकलाद्वारा जगत्‌की रक्षाके लिये लीलापूर्वक नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं। उन अवतारोंके वे स्वयं ही सनातन बीज हैं। कभी योगियों एवं संत-महात्माओंके हृदयमें निवास करते हैं। वे ही प्राणियोंके प्राणस्वरूप परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। मैं मूढ़ अबला उन निर्गुण एवं सर्वव्यापी भगवान्‌की स्तुति करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। वे अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणीसे परे हैं। भगवान् अनन्त सहस्र मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति नहीं कर सकते। पञ्चमुख महादेव, चतुर्मुख ब्रह्मा, गजानन गणेश और षडानन कार्तिकेय भी जिनकी स्तुति करने में समर्थ नहीं हैं, माया भी जिनकी मायासे मोहित रहती है, लक्ष्मी भी जिनकी स्तुति करनेमें सफल नहीं होती, सरस्वती भी जडवत् हो जाती है और वेद भी जिनका स्तवन करनेमें अपनी शक्ति खो बैठते हैं, उन परमात्माका स्तवन दूसरा कौन विद्वान् कर सकता है? मैं शोकातुर अबला उन निरीह परात्पर परमेश्वरकी स्तुति क्या कर सकती हूँ।

ऐसा कहकर गन्धर्व - कुमारी मालावती चुप हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी। भयसे पीड़ित हुई उस सतीने कृपानिधान भगवान् श्रीकृष्णको बारंबार प्रणाम किया। तब निराकार परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी शक्तियोंके साथ मालावतीके पति - गन्धर्व उपबर्हणके शरीरमें अधिष्ठित हुए। उनका आवेश होते ही गन्धर्व वीणा लिये उठ बैठा और शीघ्र ही स्नानके पश्चात् दो नवीन वस्त्र धारण करके उसने देव-समूहको तथा सामने खड़े हुए उन ब्राह्मणदेवताको प्रणाम किया। फिर तो देवता दुन्दुभि बजाने और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उन गन्धर्व दम्पतिपर दृष्टिपात करके उन

सबने उत्तम आशीर्वाद दिये। गन्धर्वने एक क्षणतक देवताओंके सामने नृत्य और गान किया। देवताओंके वरसे नया जीवन पाकर गन्धर्व उपबर्हण अपनी पत्नीके साथ पुनः गन्धर्व नगरमें चला गया। सती मालावतीने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न और नाना प्रकारके धन दिये तथा उन सबको भोजन कराया। उनसे वेदपाठ और मङ्गलकृत्य करवाये। भाँति-भाँतिके बड़े-बड़े उत्सव रचाये। उन सबमें एकमात्र हरिनामकीर्तनरूप मङ्गलकृत्य की प्रधानता रही। देवता अपने-अपने स्थानको चले गये और ब्राह्मण-रूपधारी साक्षात् श्रीहरि भी अपने धामको पधारे। शौनक ! यह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। साथ ही स्तवराजका भी वर्णन किया। जो वैष्णव पुरुष पूजाकालमें इस पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति एवं उनके दास्यका सौभाग्य पा लेता है। जो आस्तिक पुरुष वर प्राप्तिकी कामना रखकर उत्तम आस्था और भक्तिभावसे इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सम्बन्धी फलको निश्चय ही पाता है। इस स्तोत्रके पाठसे विद्यार्थीको विद्याका, धनार्थीको धनका, भार्याकी इच्छावालेको भार्याका और पुत्रकी कामनावालेको पुत्रका लाभ होता है। धर्म चाहनेवाला धर्म और यशकी इच्छावाला यश पाता है। जिसका राज्य छिन गया है, वह राज्य और जिसकी संतान नष्ट हो गयी है, वह संतान पाता है। रोगी रोगसे और कैदी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। भयभीत पुरुष भयसे छुटकारा पा जाता है। जिसका धन नष्ट हो गया है, उसे धनकी प्राप्ति होती है। जो विशाल वनमें डाकुओं अथवा हिंसक जन्तुओंसे घिर गया है, दावानलसे दग्ध होनेकी स्थितिमें आ गया है अथवा जलके समुद्रमें डूब रहा है, वह भी इस स्तोत्रका पाठ करके विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है। (अध्याय १८)