तदनन्तर शौनकजीके पूछनेपर सौतिने कहा-
ब्रह्मन्! हंस, यति, अरणि, वोढु, पञ्चशिख, अपान्तरतमा तथा सनक आदि - इन सबको छोड़कर अन्य सभी ब्रह्मकुमार, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी, सदा सांसारिक कार्यों में संलग्न हो प्रजाकी सृष्टि करके गुरुजनों (पिता आदि) - की आज्ञाका पालन करने लगे। स्वयं प्रजापति ब्रह्मा अपने पुत्र नारदके शापसे अपूज्य हो गये । इसीलिये विद्वान् पुरुष ब्रह्माजीके मन्त्रकी उपासना नहीं करते। नारदजी अपने पिताके शापसे उपबर्हण नामक गन्धर्व हो गये। उनके वृत्तान्तका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ; सुनिये।
इन दिनों जो गन्धर्वराज थे, वे सब गन्धर्वोंमें श्रेष्ठ और महान् थे, उच्चकोटिके ऐश्वर्यसे सम्पन्न थे, परंतु किसी कर्मवश पुत्र सुखसे वञ्चित थे। एक समय गुरुकी आज्ञा लेकर वे पुष्करतीर्थमें गये और वहाँ उत्तम समाधि लगाकर (अथवा अत्यन्त एकाग्रतापूर्वक) भगवान् शिवकी प्रसन्नता के लिये तप करने लगे। उस समय उनके मनमें बड़ी दीनता थी, वे दयनीय हो रहे थे। कृपानिधान वसिष्ठ मुनिने गन्धर्वराजको शिव कवच, स्तोत्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया। दीर्घकालतक निराहार रहकर उपासना एवं जप-तप करनेपर भगवान् शिवने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये। नित्य तेजः स्वरूप सनातन भगवान् शिव ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले वे भगवान् तपोरूप हैं, तपस्याके बीज हैं, तपका फल देनेवाले हैं और स्वयं ही तपस्याके फल हैं। शरणमें आये हुए भक्तको वे समस्त सम्पत्तियाँ प्रदान करते हैं। उस समय वे दिगम्बर वेषमें वृषभपर आरूढ थे, उन्होंने हाथोंमें त्रिशूल और पट्टिश ले रखे थे। उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकके समान निर्मल थी। उनके तीन नेत्र थे और उन्होंने मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण कर रखा था। उनका जटाजूट तपाये हुए सुवर्णकी प्रभाको छीने लेता था। कण्ठमें नी चिह्न और कंधेपर नागका यज्ञोपवीत शोभा दे रहा था। सर्वज्ञ शिव सबके संहारक हैं। वे ही काल और मृत्युञ्जय हैं। वे परमेश्वर ग्रीष्म ऋतुक दोपहरीके करोड़ों सूर्योके समान तेजस्वी थे। शान्तस्वरूप शिव तत्त्वज्ञान, मोक्ष तथा हरिभक्ति प्रदान करनेवाले हैं।
उन्हें देखते ही गन्धर्वने सहसा दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम किया और वसिष्ठजीके दिये हुए स्तोत्रसे उन परमेश्वरका स्तवन किया। तब कृपानिधान शिव उससे बोले- 'गन्धर्वराज! तुम कोई वर माँगो।' तब गन्धर्वने उनसे भगवान् श्रीहरिकी भक्ति तथा परम वैष्णव पुत्रकी प्राप्तिका वर माँगा। गन्धर्वकी बात सुनकर दीनोंके स्वामी । दीनबन्धु सनातन भगवान् चन्द्रशेखर हँसे और उस दीन सेवकसे बोले ।
श्रीमहादेवजीने कहा-
गन्धर्वराज! तुमने जो एक वर (हरिभक्ति) को माँगा है, उसी तुम कृतार्थ होओगे। दूसरा वर तो चबाये हुएको चबानामात्र है। वत्स! जिसकी श्रीहरिमें सुदृढ़ एवं सर्वमङ्गलमयी भक्ति है, वह खेल-खेलमें ही सब कुछ करनेमें समर्थ है। भगवद्भक्त पुरुष अपने कुलकी और नानाके कुलकी असंख् पीढ़ियोंका उद्धार करके निश्चय ही गोलोकमें जाता है। करोड़ों जन्मों में उपार्जित त्रिविध पापोंका नाश करके वह अवश्य ही पुण्यभोग तथा श्रीहरिकी सेवाका सौभाग्य पाता है। मनुष्योंको तभीतक पत्नीकी इच्छा होती है, तभीतक पुत्र प्यारा लगता है, तभीतक ऐश्वर्यकी प्राप्ति अभीष्ट होती है और तभीतक सुख दुःख होते हैं, जबतक कि उनका मन श्रीकृष्ण में नहीं लगता। श्रीकृष्णमें मन लगते ही भक्तिरूपी दुर्लङ्घय खड्ग मानवोंके कर्ममय वृक्षोंका मूलोच्छेद कर डालता है। जिन पुण्यात्माओंके पुत्र परम वैष्णव होते हैं, उनके वे पुत्र लीलापूर्वक कुलकी बहुसंख्यक पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं। अहो ! एक वरसे ही कृतार्थ हुआ पुरुष यदि दूसरा वर चाहता है तो मुझे आश्चर्य होता है। दूसरे वरकी क्या आवश्यकता है? लोगोंको मङ्गलकी प्राप्तिसे तृप्ति नहीं होती है। हमारे पास वैष्णवों के लिये परम दुर्लभ धन संचित है। श्रीकृष्णकी भक्ति एवं दास्य-सुख हमलोग दूसरोंको देनेके लिये उत्सुक नहीं होते। वत्स! जो तुम्हारे मनमें अभीष्ट हो, ऐसा कोई दूसरा वर माँगो अथवा इन्द्रत्व, अमरत्व या दुर्लभ ब्रह्मपद प्राप्त करो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण सिद्धियाँ, महान् योग और मृत्युञ्जय आदि ज्ञान यह सब कुछ सुखपूर्वक दे दूँगा, किंतु यहाँ श्रीहरिका दासत्व माँगनेका आग्रह छोड़ दो, क्षमा करो।
भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर गन्धर्वके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वह अत्यन्त दीनभावसे सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता दीनेश्वर शिवसे बोला ।
गन्धर्वने कहा-
प्रभो! जिसका ब्रह्माजीकी दृष्टि पड़ते ही पतन हो जाता है, वह ब्रह्मपद स्वप्नके समान मिथ्या एवं क्षणभङ्गुर है। श्रीकृष्णभक्त उसे नहीं पाना चाहता शिव! इन्द्रत्व, अमरत्व, सिद्धियोग आदि अथवा मृत्युञ्जय आदि ज्ञानकी प्राप्ति भी श्रीकृष्णभक्तको अभीष्ट नहीं है। श्रीहरिके सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य और सायुज्यको तथा निर्वाणमोक्षको भी वैष्णवजन नहीं लेना चाहते। (सालोक्यसाष्टिंसामीप्यसायुज्यं श्रीहरेरपि तत्र निर्वाणमोक्षं च न हि वाञ्छन्ति वैष्णवाः ॥ (ब्रह्मखण्ड १२ । ३५)) भगवान्की अविचल भक्ति तथा उनका परम दुर्लभ दास्य प्राप्त हो यही सोते, जागते हर समय भक्तोंकी इच्छा रहती है। अतः यही हमारे लिये श्रेष्ठ वर है। प्रभो! आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं; अतः मुझे वरके रूपमें श्रीहरिका दास्य-सुख तथा वैष्णव पुत्र प्रदान कीजिये। आपको संतुष्ट पाकर जो दूसरा कोई वर माँगता है, वह बर्बर है। शम्भो ! यदि आप मुझे दुष्कर्मी मानकर यह उपर्युक्त वर नहीं देंगे तो मैं अपना मस्तक काटकर अग्निमें होम दूँगा।
गन्धर्वकी यह बात सुनकर भक्तोंके स्वामी तथा भक्तपर अनुग्रह करनेवाले कृपानिधान भगवान् शंकर उस दीन भक्तसे इस प्रकार बोले।
भगवान् शंकरने कहा-
गन्धर्वराज! भगवान् विष्णुकी भक्ति, उनके दास्य-सुख तथा परम वैष्णव पुत्रकी प्राप्ति- इस श्रेष्ठ वरको उपलब्ध करो, खिन्न न होओ। तुम्हारा पुत्र वैष्णव होनेके साथ ही दीर्घायु, सद्गुणशाली, नित्य सुस्थिर यौवनसे सम्पन्न, ज्ञानी, परम सुन्दर, गुरुभक्त तथा जितेन्द्रिय होगा।
मुने! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँसे अपने धामको चले गये और गन्धर्वराज संतुष्ट होकर अपने घरको लौटे। अपने कर्ममें सफलता प्राप्त होनेपर सभी मानवोंके मानस-पङ्कज खिल उठते हैं। उस गन्धर्वराजकी पत्नीके गर्भसे भारतवर्षमें नारदजीने ही जन्म लिया। उस वृद्धा गन्धर्वपत्नीने गन्धमादन पर्वतपर अपने पुत्रका प्रसव किया था। उस समय गुरुदेव भगवान् वसिष्ठने यथोचित रीतिसे बालकका नामकरण संस्कार किया। उस बालकका वह मङ्गलमय संस्कार मङ्गलके दिन सम्पन्न हुआ। 'उप' शब्द अधिक अर्थका बोधक है और पुल्लिङ्ग 'बर्हण' शब्द पूज्य-अर्थमें प्रयुक्त होता है। यह बालक पूज्य पुरुषोंमें सबसे अधिक है; इसलिये इसका नाम 'उपबर्हण' होगा- ऐसा वसिष्ठजीने कहा। (अध्याय १२)
Summary of chapter 12 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
Fulfilling the solemn curse pronounced upon him by his father Lord Brahmā, the sublime sage Maharshi Nārada took birth in the celestial world as the exceptionally handsome Gandharva named Upabarhaṇa. Endowed with flawless physical beauty, immense wealth, and an extraordinary vocal mastery of divine music, Upabarhaṇa lived a life of celestial luxury, surrounded by fifty beautiful wives led by the devoted and virtuous Mālatī. He spent his time enchanting the heavenly courts of the Devas with his soulful singing and playing upon the vinā, yet beneath his worldly enjoyment lay the dormant seed of supreme spiritual devotion awaiting its destined awakening through divine grace.