शौनकजीने पूछा-
महाभाग सूतनन्दन !उस ब्राह्मणने अपनी पत्नीका त्याग करके शेष जीवनमें कौन-सा कार्य किया?अश्विनीकुमारोंके नाम क्या हैं?वे दोनों किसके वंशज हैं?
सौति बोले-
ब्रह्मन् ! उन ब्राह्मणदेवताका नाम सुतपा था। वे भरद्वाजकुलमें उत्पन्न बहुत बड़े मुनि थे। उन्होंने पहले हिमालयपर रहकर भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु) की प्रसन्नताके लिये दीर्घकालतक - तपस्या की थी। उस समय वे महातपस्वी और तेजस्वी मुनि ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान दिखायी देते थे। एक दिन उन्हें सहसा आकाशमें क्षणभरके लिये श्रीकृष्ण ज्योतिका दर्शन हुआ उस बेलामें उन्होंने भगवान् से यह वर माँगा– 'प्रभो! मैं आत्मनिष्ठ हो प्रकृतिसे परे सर्वथा निर्लिप्त रहूँ।' उन्होंने मोक्ष नहीं माँगा, भगवान्से उनकी अविचल दास्य-भक्तिके लिये याचना की। तब आकाशवाणी हुई–'ब्रह्मन् ! पहले स्त्री-परिग्रह (विवाह) करो। उसके बाद भोग सम्बन्धी प्रारब्धके क्षीण हो जानेपर मैं तुम्हें अपनी दास्य भक्ति दूँगा।' - तदनन्तर स्वयं ब्रह्माजीने उन्हें पितरोंकी मानसी कन्या प्रदान की। मुनिप्रवर शौनक ! उसके गर्भसे 'कल्याणमित्र' नामक पुत्रका जन्म हुआ। उस बालकके स्मरणमात्रसे किसीको अपने ऊपर वज्र या बिजली गिरनेका भय नहीं रहता। इतना ही नहीं, कल्याणमित्रके स्मरणसे निश्चय ही उन बन्धुजनोंकी भी प्राप्ति हो जाती है, जिनका दर्शन असम्भव होता है। तदनन्तर महामुनि सुतपाने किसी कारणवश कल्याणमित्रकी माताका परित्याग करके उसी समय सहसा पूर्वापराधका स्मरण हो आनेसे सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारको भी शाप दिया- 'देवाधम ! तू अपने भाईके साथ यज्ञभागसे वञ्चित और अपूज्य हो जा। तेरा अङ्ग व्याधिग्रस्त और जड हो जाय तू अकीर्तिमान् (कलंकयुक्त) हो जा।' यों कहकर सुतपा अपने पुत्र कल्याणमित्र के साथ घर चले गये। तब सूर्यदेवता दोनों अश्विनीकुमारों के साथ उनके निकट गये। शौनक ! त्रिलोकीनाथ सूर्यने अपने रोगग्रस्त पुत्रों के साथ मुनिवर सुतपाका दर्शन करके उनकी स्तुति करते हुए कहा।
सूर्य बोले -
भगवन् ! युग-युगमें प्रकट होनेवाले विष्णुस्वरूप ब्राह्मणदेवता! मुनीश्वर भारद्वाज! आप मेरे पुत्रोंका अपराध क्षमा करें ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर आदि सब देवता सदा ब्राह्मणके ही दिये हुए फल, फूल और जल आदिका उपभोग करते हैं। ब्राह्मणोंद्वारा ही आवाहित हुए देवता सदा सब लोकोंमें पूजित होते हैं। ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। ब्राह्मण रूपमें साक्षात् श्रीहरि ही प्रकट होते हैं। ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर साक्षात् नारायणदेव संतुष्ट होते हैं। तथा नारायणदेवके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं। गङ्गाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु) से बढ़कर - कोई देवता नहीं है। शंकरजीसे बड़ा वैष्णव नहीं है और पृथ्वीसे बढ़कर कोई सहनशील नहीं है। सत्यसे बड़ा कोई धर्म नहीं है। पार्वतीजीसे बढ़कर सती साध्वी स्त्री नहीं है। दैवसे बड़ा कोई बलवान् नहीं है तथा पुत्रसे अधिक दूसरा कोई प्रिय नहीं है। रोगके समान शत्रु, गुरुसे बढ़कर पूजनीय, माताके तुल्य बन्धु तथा पितासे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है।
सूर्यका यह वचन सुनकर भारद्वाज सुतपा मुनिने उनको प्रणाम किया और अपनी तपस्याके फलसे उनके दोनों पुत्रोंको रोगमुक्त कर दिया। फिर कहा- 'देवेश्वर! आगे चलकर आपके दोनों पुत्र यज्ञभागके अधिकारी होंगे।' यों कह सुतपा- मुनिने भगवान् सूर्यको प्रणाम किया और तपस्या के क्षीण होनेके भयसे भयभीत हो श्रीहरिकी सेवामें मन लगाकर गङ्गातटको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् भगवान् सूर्य दोनों पुत्रों के साथ अपने धामको चले गये।
विद्वान् हो या विद्याहीन, जो ब्राह्मण प्रतिदिन संध्यावन्दन करके पवित्र होता है, वही भगवान् विष्णुके समान वन्दनीय है। यदि वह भगवान्से विमुख हो तो आदरका पात्र नहीं है। जो एकादशीको भोजन नहीं करता और प्रतिदिन श्रीकृष्णकी आराधना करता है, उस ब्राह्मणका चरणोदक पाकर कोई भी स्थान निश्चय ही तीर्थ बन जाता है। जो नित्यप्रति भगवान्को भोग लगाकर उनका उच्छिष्ट भोजन करता है तथा उनके नैवेद्यको मुखमें ग्रहण करता है, वह इस भूतलपर परम पवित्र एवं जीवन्मुक्त है। कुलीन द्विजोंका जो अन्न-जल भगवान् विष्णुको अर्पित नहीं किया गया, वह मल-मूत्रके समान है- ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। ब्रह्माजी तथा उनके पुत्र सनकादि सभी विष्णुपरायण हैं; फिर उन्हींके - कुलमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण श्रीहरिसे विमुख कैसे हो सकता है? माता-पिता, नाना आदि अथवा गुरुके संसर्ग-दोषसे भी जो ब्राह्मण श्रीहरि विमुख हो जाते हैं, वे जीते-जी ही मुर्देके समान हैं। वह कैसा गुरु, कैसा पिता, कैसा पुत्र, कैसा मित्र, कैसा राजा तथा कैसा बन्धु है, जो श्रीहरिके भजनकी बुद्धि (सलाह) नहीं देता ? विप्रवर! अवैष्णव ब्राह्मणसे वैष्णव चाण्डाल श्रेष्ठ है; क्योंकि वह वैष्णव चाण्डाल अपने बन्धुगणोंसहित संसार बन्धनसे मुक्त हो जाता है और वह - अवैष्णव ब्राह्मण नरकमें पड़ता है। (स किं गुरुः स किं तातः स किं पुत्रः स किं सखा । स किं राजा स किं बन्धुर्न दद्याद् यो हरौ मतिम् ॥ अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र चण्डालो वैष्णवो वरः । सगणः श्वपचो मुक्तो ब्राह्मणो नरकं व्रजेत् ॥ (ब्रह्मखण्ड ११ । ३८-३९)
ध्यायन्ते वैष्णवाः शश्वत्गोविन्दपादपङ्कजम् । ध्यायते तांश गोविन्दः शश्वत् तेषां च संनिधौ ॥(ब्रह्मखण्ड ११ । ४४))
ब्रह्मन् ! जो प्रतिदिन संध्या-वन्दन नहीं करता अथवा भगवान् विष्णुसे विमुख रहता है, वह सदा अपवित्र माना गया है। जैसे विषहीन सर्पको सर्पभासमात्र कहा गया है, उसी तरह संध्याकर्म तथा भगवद्भक्तिसे हीन ब्राह्मण ब्राह्मणाभासमात्र है। वैष्णव पुरुष अपने कुलकी करोड़ों और नाना आदिकी सैकड़ों पीढ़ियोंके साथ भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। वैष्णवजन सदा गोविन्दके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हैं और भगवान् गोविन्द सदा उन वैष्णवों के निकट रहकर उन्हींका ध्यान किया करते हैं। भक्तों की रक्षाके लिये सुदर्शनचक्रको नियुक्त करके भी श्रीहरि निश्चिन्त नहीं होते हैं; इसलिये स्वयं भी उनके पास मौजूद रहते हैं। (अध्याय ११)
Summary of chapter 11 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
This inspiring chapter chronicles the uplifting history of the divine twin physicians, the Aśvinī Kumāras, who had been subjected to a past curse that deprived them of their rightful share in sacred sacrificial offerings. Through their sincere repentance, flawless service to holy ascetics, and the merciful intervention of pure devotees, the Aśvinī Kumāras achieved complete purification and were restored to their exalted celestial status. The narrative transitions into a profound eulogy celebrating the incomparable purity, spiritual power, and divine status of true Vaishṇava Brāhmaṇas, whose sincere prayers, unyielding austerity, and continuous chanting of Lord Śrī Kṛshṇa's holy names possess the potency to purify all three worlds and grant spiritual liberation.