ब्रह्म महा पुराणम - ब्रह्म खंड

3- श्रीकृष्णसे सृष्टिका आरम्भ, नारायण, महादेव, ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति ( दुर्गा ) का प्रादुर्भाव तथा इन सबके द्वारा पृथक्-पृथक् श्रीकृष्णका स्तवन

सौति कहते हैं-

भगवान्ने देखा कि सम्पूर्ण विश्व शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं है। जलका भी कहीं पता नहीं है। सारा आकाश वायुसे रहित और अन्धकारसे आवृत हो घोर प्रतीत होता है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदिसे शून्य होनेके कारण विकृताकार जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य और तृणका सर्वथा अभाव हो गया है। ब्रह्मन् जगत्‌को इस शून्यावस्थामें देख मन-ही-मन सब बातोंकी आलोचना करके दूसरे किसी सहायकसे रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभुने स्वेच्छासे ही सृष्टि-रचना आरम्भ की सबसे पहले उन परम पुरुष श्रीकृष्णके दक्षिणपार्श्वसे जगत्के कारणरूप तीन मूर्तिमान् गुण प्रकट हुए। उन गुणोंसे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पाँच तन्मात्राएँ तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द- ये पाँच विषय क्रमशः प्रकट हुए। तदनन्तर श्रीकृष्णसे साक्षात् भगवान् नारायणका प्रादुर्भाव हुआ, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम थी, वे नित्य तरुण, पीताम्बरधारी तथा वनमालासे विभूषित थे। उनके चार भुजाएँ थीं। उन्होंने अपने चार हाथों में क्रमश:- शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। उनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे, शार्ङ्गधनुष धारण किये हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ाती थी। श्रीवत्सभूषित वक्षमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभाको प्रकट कर रहे थे; शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी प्रभासे सेवित मुख चन्द्रके कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे कामदेवकी कान्तिसे युक्त रूप लावण्य उनका सौन्दर्य बढ़ा रहा था। वे श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

नारायण बोले-

जो वर (श्रेष्ठ), वरेण्य (सत्पुरुषोंद्वारा पूज्य), वरदायक (वर देनेवाले) और वरकी प्राप्तिके कारण हैं; जो कारणोंके भी कारण, कर्मस्वरूप और उस कर्मके भी कारण हैं; तप जिनका स्वरूप है, जो नित्य-निरन्तर तपस्याका फल प्रदान करते हैं, तपस्वीजनोंमें सर्वोत्तम तपस्वी हैं, नूतन जलधरके समान श्याम, स्वात्माराम और मनोहर हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो निष्काम और कामरूप हैं, कामनाके नाशक तथा कामदेवकी उत्पत्तिके कारण हैं, जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सर्वोत्तम एवं सर्वेश्वर हैं, वेद जिनका स्वरूप है, जो वेदोंके बीज, वेदोक्त फलके दाता और फलरूप हैं, वेदोंके ज्ञाता, उसके विधानको जाननेवाले तथा सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंके शिरोमणि हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ। (वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम् । कारणं कारणानां च कर्म तत्कर्मकारणम् ॥ तपस्तत्फलदं शश्वत् तपस्विनां च तापसम् । वन्दे नवघनश्यामं स्वात्मारामं मनोहरम् ॥ निष्कामं कामरूपं च कामघ्नं कामकारणम् । सर्वं सर्वेश्वरं सर्वबीजरूपमनुत्तमम् ॥ वेदरूपं वेदबीजं वेदोक्तफलदं फलम् । वेदज्ञं तद्विधानं च सर्ववेदविदां वरम् ॥ (ब्रह्मखण्ड ३ । १० - १३))

ऐसा कहकर वे नारायणदेव भक्तिभावसे युक्त हो उनकी आज्ञासे उन परमात्माके सामने रमणीय रत्नमय सिंहासनपर विराज गये। जो पुरुष प्रतिदिन एकाग्रचित्त हो तीनों संध्याओंके समय नारायणद्वारा किये गये इस स्तोत्रको सुनता और पढ़ता है, वह निष्पाप हो जाता है। उसे यदि पुत्रकी इच्छा हो तो पुत्र मिलता है और भार्याकी इच्छा हो तो प्यारी भार्या प्राप्त होती है। जो अपने राज्यसे भ्रष्ट हो गया है, वह इस स्तोत्र के पाठसे पुनः राज्य प्राप्त कर लेता है तथा धनसे वञ्चित हुए पुरुषको धनकी प्राप्ति हो जाती है। कारागारके भीतर विपत्तिमें पड़ा हुआ मनुष्य यदि इस स्तोत्रका पाठ करे तो निश्चय ही संकटसे मुक्त हो जाता है। एक वर्षतक इसका संयमपूर्वक श्रवण करनेसे रोगी अपने रोगसे छुटकारा पा जाता है।

सौति कहते हैं—

शौनकजी! तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे भगवान् शिव प्रकट हुए । उनकी अङ्गकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल एवं उज्ज्वल थी। उनके पाँच मुख थे और दिशाएँ ही उनके लिये वस्त्र थीं। उन्होंने मस्तकपर तपाये हुए सुवर्णके समान पीले रंगकी जटाओंका भार धारण कर रखा था। उनका मुख मन्द मन्द मुसकानसे प्रसन्न दिखायी देता था।

उनके प्रत्येक मस्तकमें तीन-तीन नेत्र थे। उनके सिरपर चन्द्राकार मुकुट शोभा पाता था। परमेश्वर शिवने हाथों में त्रिशूल, पट्टिश और जपमाला ले रखी थी। वे सिद्ध तो हैं ही, सम्पूर्ण सिद्धों के ईश्वर भी हैं। योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं। मृत्युकी भी मृत्यु हैं, मृत्युके ईश्वर हैं, मृत्युस्वरूप हैं और मृत्युपर विजय पानेवाले मृत्युञ्जय हैं। वे ज्ञानानन्दरूप, महाज्ञानी, महान् ज्ञानदाता तथा सबसे श्रेष्ठ हैं। पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभासे धुले हुए से गौरवर्ण शिवका दर्शन सुखपूर्वक होता है। उनकी आकृति मनको मोह लेती है। ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान भगवान् शिव वैष्णवोंके शिरोमणि हैं। प्रकट होनेके पश्चात् श्रीकृष्णके सामने खड़े हो भगवान् शिवने भी हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे और उनकी वाणी अत्यन्त गद्गद हो रही थी।

महादेवजी बोले-

जो जयके मूर्तिमान् रूप, जय देनेवाले, जय देनेमें समर्थ जयकी प्राप्तिके कारण तथा विजयदाताओंमें सर्वश्रेष्ठ हैं, उन अपराजित देवता भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो विश्वके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं, विश्वेश्वर, विश्वकारण, विश्वाधार, विश्वके विश्वासभाजन तथा विश्वके कारणोंके भी कारण हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो जगत्‌की रक्षाके कारण, जगत्के संहारक तथा जगत्‌की सृष्टि करनेवाले परमेश्वर हैं; फलके बीज, फलके आधार, फलरूप और फलदाता हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तेजः स्वरूप, तेजके दाता और सम्पूर्ण तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। (

जयस्वरूपं जयदं जयेशं जयकारणम् । प्रवरं जयदानां च वन्दे तमपराजितम् ॥

विश्वं विश्वेश्वरेशं च विश्वेशं विश्वकारणम् । विश्वाधारं च विश्वस्तं विश्वकारणकारणम् ॥

विश्वरक्षाकारणं च विश्वघ्नं विश्वजं परम् । फलबीजं फलाधारं फलं च तत्फलप्रदम् ॥

तेजः स्वरूपं तेजोदं सर्वतेजस्विनां वरम् । (ब्रह्मखण्ड ३ २४-२५)

कृष्णं वन्दे गुणातीतं गोविन्दमेकमक्षरम् । अव्यक्तमव्ययं व्यक्तं गोपवेषविधायिनम् ॥ किशोरवयसं शान्तं गोपीकान्तं मनोहरम् । नवीननीरदश्यामं कोटिकन्दर्पसुन्दरम् ॥ वृन्दावनवनाभ्यर्णे रासमण्डलसंस्थितम् । रासेश्वरं रासवासं रासोल्लाससमुत्सुकम् ॥(ब्रह्मखण्ड ३ । ३५-३७))

ऐसा कहकर महादेवजीने भगवान् श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया और उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर नारायणके साथ वार्तालाप करते हुए बैठ गये। जो मनुष्य भगवान् शिवद्वारा किये गये इस स्तोत्रका संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ मिल जाती हैं और पग पगपर विजय प्राप्त होती है। उसके मित्र, धन और ऐश्वर्यकी सदा वृद्धि होती है तथा शत्रुसमूह, दुःख और पाप नष्ट हो जाते हैं।

सौति कहते हैं –

तत्पश्चात् श्रीकृष्णके नाभि कमलसे बड़े-बूढ़े महातपस्वी ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने अपने हाथमें कमण्डलु ले रखा था। उनके वस्त्र, दाँत और केश सभी सफेद थे। चार मुख थे। वे ब्रह्माजी योगियोंके ईश्वर, शिल्पियोंके स्वामी तथा सबके जन्मदाता गुरु हैं। तपस्याके फल देनेवाले और सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके जन्मदाता हैं। वे ही स्रष्टा और विधाता हैं तथा समस्त कर्मोंके कर्ता, धर्ता एवं संहर्ता हैं। चारों वेदोंको वे ही धारण करते हैं। वे वेदोंके ज्ञाता, वेदोंको प्रकट करनेवाले और उनके पति (पालक) हैं। उनका शील स्वभाव सुन्दर है। वे सरस्वतीके कान्त, शान्तचित्त और कृपाकी निधि हैं। उन्होंने श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनका स्तवन किया। उस समय उनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था तथा उनकी ग्रीवा भगवान्‌के सामने भक्तिभावसे झुकी हुई थी।

ब्रह्माजी बोले-

जो तीनों गुणोंसे अतीत और एकमात्र अविनाशी परमेश्वर हैं, जिनमें कभी कोई विकार नहीं होता, जो अव्यक्त और व्यक्तरूप हैं तथा गोप-वेष धारण करते हैं, उन गोविन्द श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जिनकी नित्य किशोरावस्था है, जो सदा शान्त रहते हैं, जिनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है तथा जो नूतन जलधरके समान श्यामवर्ण हैं, उन परम मनोहर गोपीवल्लभको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनके भीतर रासमण्डलमें विराजमान होते हैं, रासलीलामें जिनका निवास है तथा जो रासजनित उल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं, उन रासेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ।

ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञासे नारायण तथा महादेवजीके साथ सम्भाषण करते हुए श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो प्रातः काल । उठकर ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और बुरे सपने अच्छे सपनोंमें बदल जाते हैं। भगवान् गोविन्दमें भक्ति होती है, जो पुत्रों और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली है। इस स्तोत्रका पाठ करनेसे अपयश नष्ट होता है और चिरकालतक सुयश बढ़ता रहता है।

सौति कहते हैं –

तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलसे कोई एक पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उसकी अङ्गकान्ति श्वेत वर्णकी थी और उसने अपने मस्तकपर जटा धारण कर रखी थी। वह सबका साक्षी, सर्वज्ञ तथा सबके समस्त कर्मोंका द्रष्टा था। उसका सर्वत्र समभाव था। उसके हृदयमें सबके प्रति दया भरी थी। वह हिंसा और क्रोधसे सर्वथा अछूता था। उसे धर्मका ज्ञान था । वह धर्मस्वरूप, धर्मिष्ठ तथा धर्म प्रदान करनेवाला था। वही धर्मात्माओंमें 'धर्म' नामसे विख्यात है। परमात्मा श्रीकृष्णकी कलासे उसका प्रादुर्भाव हुआ है, श्रीकृष्णके सामने खड़े हुए उस पुरुषने पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर प्रणाम किया और सम्पूर्ण कामनाओंके दाता उन सर्वेश्वर परमात्माका स्तवन आरम्भ किया।

धर्म बोले-

जो सबको अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, इसलिये 'कृष्ण' कहलाते हैं, सर्वव्यापी होनेके कारण जिनकी 'विष्णु' संज्ञा है, सबके भीतर निवास करनेसे जिनका नाम 'वासुदेव' है, जो 'परमात्मा' एवं 'ईश्वर' हैं, 'गोविन्द', 'परमानन्द', 'एक', 'अक्षर', 'अच्युत', 'गोपेश्वर', 'गोपीश्वर', 'गोप', 'गोरक्षक', 'विभु', 'गौओंके स्वामी', 'गोष्ठनिवासी', 'गोवत्स पुच्छधारी', 'गोपों और गोपियोंके मध्य विराजमान', 'प्रधान', 'पुरुषोत्तम', 'नवघनश्याम', 'रासवास' और 'मनोहर' आदि नाम धारण करते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।

ऐसा कहकर धर्म उठकर खड़े हुए। फिर वे भगवान्की आज्ञासे ब्रह्मा, विष्णु और महादेवजी के साथ वार्तालाप करके उस श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठे। जो मनुष्य प्रातः काल उठकर धर्मके मुख से निकले हुए इन चौबीस नामोंका पाठ करता है, वह सर्वथा सुखी और सर्वत्र विजयी होता है। मृत्युके समय उसके मुखसे निश्चय ही हरि - नामका उच्चारण होता है। अतः वह अन्त में श्रीहरिके परम धाममें जाता है तथा उसे श्रीहरिकी अविचल दास्य-भक्ति प्राप्त होती है। उसके द्वारा सदा धर्मविषयक ही चेष्टा होती है। अधर्ममें उसका मन कभी नहीं लगता। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी फल सदाके लिये उसके हाथमें आ जाता है। उसे देखते ही सारे पाप, सम्पूर्ण भय तथा समस्त दुःख उसी तरह भयसे भाग जाते हैं, जैसे गरुड़पर दृष्टि पड़ते ही सर्प पलायन कर जाते हैं।

सौति कहते हैं –

तत्पश्चात् धर्मके वामपार्श्वसे - एक रूपवती कन्या प्रकट हुई, जो साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुन्दरी थी। वह 'मूर्ति' नामसे विख्यात हुई। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णके मुख एक शुक्ल वर्णवाली देवी प्रकट हुई, जो वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली थी। वह करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न थी। उसके नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंका सौन्दर्य धारण करते थे। उसने अग्निमें शुद्ध किये गये उज्ज्वल वस्त्र धारण कर रखे थे और वह रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके मुखपर मन्द मन्द मुस्कराहट छा रही थी। दन्तपंक्ति बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी। अवस्था सोलह वर्षकी थी। वह सुन्दरियोंमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी थी। श्रुतियों, शास्त्रों और विद्वानोंकी परम जननी थी। वह वाणीकी अधिष्ठात्री, कवियोंकी इष्टदेवी, शुद्ध सत्त्वस्वरूपा और शान्तरूपिणी सरस्वती थी। गोविन्दके सामने खड़ी होकर पहले तो उसने वीणावादनके साथ उनके नाम और गुणोंका सुन्दर कीर्तन किया, फिर वह नृत्य करने लगी। श्रीहरिने प्रत्येक कल्पके युग-युगमें जो-जो लीलाएँ की हैं, उन सबका गान करते हुए सरस्वतीने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की।

सरस्वती बोलीं-

'जो रासमण्डलके मध्य भागमें विराजमान हैं, रासोल्लासके लिये सदा उत्सुक रहनेवाले हैं, रत्नसिंहासनपर आसीन हैं, रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं, रासेश्वर एवं श्रेष्ठ रासकर्ता हैं, रासेश्वर राधाके प्राणवल्लभ हैं, रासके अधिष्ठाता देवता हैं तथा रासलीलाद्वारा मनोविनोद करनेवाले हैं, उन भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करती हूँ। जो रासलीलाजनित श्रमसे थक गये हैं, प्रत्येक रासमें विहार करनेवाले हैं। तथा रासके लिये उत्कण्ठित हुई गोपियोंके प्राणवल्लभ हैं, उन शान्त मनोहर श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।'

यों कहकर प्रसन्न मुखवाली सती सरस्वतीने भगवान्‌को प्रणाम किया और सफलमनोरथ हो उनकी आज्ञासे वे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठीं । जो प्रातः काल उठकर वाणीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सदा बुद्धिमान् धनवान्, विद्वान् और पुत्रवान् होता है ।

सौति कहते हैं—

तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मनसे एक गौरवर्णा देवी प्रकट हुईं, जो रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बरकी साड़ी शोभा पा रही थी। मुखपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। वे नवयौवना देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी अधिष्ठात्री थीं। वे ही फलरूपसे सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्रदान करती हैं। स्वर्गलोकमें उन्हींको स्वर्गलक्ष्मी कहते हैं तथा राजाओंके यहाँ वे ही राजलक्ष्मी कहलाती हैं। श्रीहरिके सामने खड़ी होकर उन साध्वी लक्ष्मीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उनकी ग्रीवा भक्तिभावसे झुक गयी और उन्होंने उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन किया।

महालक्ष्मी बोलीं-

'जो सत्यस्वरूप, सत्यके स्वामी और सत्यके बीज हैं, सत्यके आधार, सत्यके ज्ञाता तथा सत्यके मूल हैं, उन सनातन देव श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करती हूँ।'

यों कह श्रीहरिको मस्तक नवाकर तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाली लक्ष्मीदेवी दसों दिशाओंको प्रकाशित करती हुई सुखासनपर बैठ गयीं। तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णकी बुद्धिसे सबकी अधिष्ठात्री देवी ईश्वरी मूलप्रकृतिका प्रादुर्भाव हुआ। सुतप्त काञ्चनकी-सी कान्तिवाली वे देवी अपनी प्रभासे करोड़ों सूर्योका तिरस्कार कर रही थीं। उनका मुख मन्द मन्द मुस्कराहटसे प्रसन्न दिखायी देता था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको मानो छीन लेते थे। उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी साड़ी शोभा पाती थी। वे रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थीं। निद्रा, तृष्णा, क्षुधा, पिपासा, दया, श्रद्धा और क्षमा आदि जो देवियाँ हैं, उन सबकी तथा समस्त शक्तियोंकी वे ईश्वरी और अधिष्ठात्री देवी हैं। उनके सौ भुजाएँ हैं। वे दर्शनमात्रसे भय उत्पन्न करती हैं। उन्हींको दुर्गतिनाशिनी दुर्गा कहा गया है। वे परमात्मा श्रीकृष्णकी शक्तिरूपा तथा तीनों लोकोंकी परा जननी हैं। त्रिशूल, शक्ति, शार्ङ्गधनुष, खड्ग, बाण, शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, अक्षमाला, कमण्डलु, वज्र, अङ्कुश, पाश, भुशुण्डि, दण्ड, तोमर, नारायणास्त्र, ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, पार्जन्यास्त्र, वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा गान्धर्वास्त्र - इन सबको हाथों में धारण किये श्रीकृष्णके सामने खड़ी हो, प्रकृति देवीने प्रसन्नतापूर्वक उनका स्तवन किया।

प्रकृति बोलीं-

प्रभो! मैं प्रकृति, ईश्वरी, सर्वेश्वरी, सर्वरूपिणी और सर्वशक्तिस्वरूपा कहलाती हूँ। मेरी शक्तिसे ही यह जगत् शक्तिमान् है तथापि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ; क्योंकि आपने मेरी सृष्टि की है, अतः आप ही तीनों लोकोंके पति, गति, पालक, स्रष्टा, संहारक तथा पुनः सृष्टि करनेवाले हैं। परमानन्द ही आपका स्वरूप है। मैं सानन्द आपकी वन्दना करती हूँ। प्रभो! आप चाहें तो पलक मारते-मारते ब्रह्माका भी पतन हो सकता है। जो भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे करोड़ों विष्णुओंकी सृष्टि कर सकता है, ऐसे आपके अनुपम प्रभावका वर्णन करनेमें कौन समर्थ है? आप तीनों लोकोंके चराचर प्राणियों, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा मुझ जैसी कितनी ही देवियोंकी खेल - खेलमें ही सृष्टि कर सकते हैं। आप परिपूर्णतम परमात्मा हैं। भलीभाँति स्तुतिके योग्य हैं। विभो ! मैं आपकी सानन्द वन्दना करती हूँ। असंख्य विश्वका आश्रयभूत महान् विराट् पुरुष जिनकी कलाका अंशमात्र है, उन परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको मैं आनन्दपूर्वक प्रणाम करती हूँ । ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता, सम्पूर्ण वेद, मैं और सरस्वती- ये सब जिनकी स्तुति करने में असमर्थ हैं तथा जो प्रकृतिसे परे हैं, उन आप परमेश्वरको मैं नमस्कार करती हूँ। वेद तथा श्रेष्ठ विद्वान् लक्षण बताते हुए आपकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं। भला जो निर्लक्ष्य हैं उनकी स्तुति कौन कर सकता है ? ऐसे आप निरीह परमात्माको मैं प्रणाम करती हूँ।

ऐसा कहकर दुर्गादेवी श्रीकृष्णको प्रणाम करके उनकी आज्ञासे श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठ गयीं। जो पूजाकालमें दुर्गाद्वारा किये गये परमात्मा श्रीकृष्णके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह सर्वत्र विजयी और सुखी होता है। दुर्गा देवी उसका घर छोड़कर कभी नहीं जाती हैं। वह भवसागरमें रहकर भी अपने सुयशसे प्रकाशित होता रहता है और अन्तमें श्रीहरिके परम धामको जाता है। (अध्याय ३)