सौति कहते हैं-
शौनकजी ! तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी जिह्वाके अग्रभागसे शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल वर्णवाली एक मनोहारिणी देवीका प्रादुर्भाव हुआ, जो सफेद साड़ी पहने हुए सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थीं और हाथमें जपमाला लिये हुए थीं। उन्हें सावित्री कहा गया है। साध्वी सावित्रीने सामने खड़ी हो हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर सनातन परब्रह्म श्रीकृष्णका स्तवन आरम्भ किया।
सावित्री बोलीं-
भगवन्! आप सबके बीज (आदिकारण) हैं। सनातन ब्रह्म ज्योति हैं। परात्पर, निर्विकार एवं निरञ्जन ब्रह्म हैं। आप श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करती हूँ। यों कह मन्द मन्द मुस्कराती हुई वेदमाता सावित्रीदेवी श्रीहरिको पुनः प्रणाम करके श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर आसीन हुईं। तत्पश्चात् परमात्मा श्रीकृष्णके मानससे एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। वह पाँच बाणोंद्वारा समस्त कामियोंके मनको मथ डालता है, इसलिये मनीषी पुरुष उसका नाम 'मन्मथ' कहते हैं। उस कामदेवके वामपार्श्वसे एक श्रेष्ठ कामिनी उत्पन्न हुई, जो परम सुन्दरी और सबके मनको मोह लेनेवाली थी। मन्द मन्द मुस्कराती हुई उस सतीको देखकर समस्त प्राणियोंकी उसमें रति हो गयी! इसीलिये मनीषी पुरुषोंने उसका नाम 'रति' रख दिया। पाँच बाण और पुष्पमय धनुष धारण करनेवाले कामदेव श्रीहरिके सामने खड़े हो उनकी स्तुति करके आज्ञा पाकर रतिके साथ रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बैठे। मारण, स्तम्भन, जृम्भन शोषण और उन्मादन ये कामदेवके पाँच बाण हैं। उन्हींको वे धारण करते हैं। अपने बाणोंकी परीक्षा करनेके लिये कामदेवने बारी-बारीसे वे सभी बाण चलाये। फिर तो ईश्वरकी इच्छासे सब लोग कामके वशीभूत हो गये। कामपरवश स्खलित महायोगी ब्रह्माजीका वीर्य अनिके रूपमें उद्दीप्त हो उठा। वे देवेश्वर अग्निदेव बड़ी-बड़ी लपटें उठाते हुए करोड़ों ताड़ोंके समान विशाल रूप धारण करके प्रज्वलित होने लगे। उस अग्निको बढ़ते देख श्रीकृष्णने लीलापूर्वक 'जल' की रचना की। वे अपने मुखसे निःश्वास वायुके साथ जलकी एक-एक बूँद गिराने लगे। मुखसे निकले हुए उस विन्दुमात्र जलने सम्पूर्ण विश्वको आप्लावित कर दिया। उसके किञ्चित् कणमात्र जलने उस प्रज्वलित अग्निको शान्त कर दिया। तभीसे जलके द्वारा आग बुझने लगी। तत्पश्चात् वहाँ एक पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ, जो उस अग्निके अधिदेवता थे। फिर पूर्वोक्त जलसे एक पुरुषका उत्थान हुआ, जिनका नाम 'वरुण' हुआ। वे ही जलके अधिष्ठाता देवता और समस्त जल-जन्तुओंके स्वामी हुए। इसके बाद उस अग्निदेवके वामपार्श्वसे एक कन्याका आविर्भाव हुआ, जिसका नाम 'स्वाहा' था। मनीषी पुरुष उसे अग्निकी पत्नी कहते हैं। जलेश्वर वरुणके वामपार्श्वसे भी एक कन्या प्रकट हुई, जो 'वरुणानी' के नामसे विख्यात थी। वही वरुणकी सती साध्वी प्रिया हुई। भगवान् श्रीकृष्णकी निःश्वास वायुसे श्रीमान् 'पवन' का प्रादुर्भाव हुआ, जो समस्त देहधारियोंके प्राण हैं। श्वास प्रश्वासके रूपमें उन्हींकी कला प्रकट हुई है। वायुदेवके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जो वायुपत्नी 'वायवी' देवी कही गयी है। श्रीकृष्णका शुक्र जलमें गिरा। वह एक हजार वर्षके बाद एक अंडेके रूपमें प्रकट हुआ। उसीसे महान् विराट् पुरुषकी उत्पत्ति हुई, जो सम्पूर्ण विश्वके आधार हैं। उन विराट् पुरुषके एक-एक रोम-कूपमें एक-एक ब्रह्माण्डकी स्थिति है। वे स्थूलसे भी स्थूलतम हैं। उनसे बड़ा दूसरा कोई नहीं है। वे परमात्मा श्रीकृष्णके सोलहवें अंश हैं। उन्हींको 'महाविष्णु' जानना चाहिये। वे ही सबके सनातन आधार हैं। जैसे जलमें कमलका पत्ता रहता है, उसी प्रकार वे महार्णव जलमें शयन करते हैं। उनके शयन करते समय कानोंके मलसे दो दैत्य प्रकट हुए। वे दोनों जलसे उठकर ब्रह्माजीको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये। तब भगवान् नारायणने उन दोनोंको अपने जघन देशमें सुलाकर चक्रसे काट डाला। उन - दोनोंके सम्पूर्ण मेदेसे यह सारी पृथ्वी निर्मित हुई, जिससे इसका नाम 'मेदिनी' हुआ। उसीपर सम्पूर्ण विश्वकी स्थिति है। उसकी अधिष्ठात्री देवीका नाम 'वसुन्धरा' है। (अध्याय ४)
Summary of chapter 4 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
As the cosmic design unfolded in accordance with the supreme supreme will of Lord Śrī Kṛshṇa, there emerged from the divine mind of the Supreme Lord the enchanting deity of love known as Kāmadeva, along with his exquisitely beautiful consort Rati. The Supreme Lord bestowed upon Kāmadeva five flower-barbed arrows of divine affection, charging him with the essential cosmic function of inspiring attraction, creation, and the continuation of living species across all material realms. Simultaneously, from the glorious pore-spaces of Lord Śrī Kṛshṇa's divine form, thousands of radiant celestial attendants, heavenly musician Gandharvas, and captivating maidens manifested, each endowed with immortal beauty and dedicated solely to the loving service and ornamentation of the supreme spiritual court in Goloka.