ब्राह्मण बोले-
शुभे! तुमने काल, यम, मृत्युकन्या तथा व्याधिगणोंका साक्षात्कार कर लिया। अब तुम्हारे मनमें क्या संदेह है? उसे पूछो। ब्राह्मणकी बात सुनकर सती मालावतीको बड़ा हर्ष हुआ। उसके मनमें जो प्रश्न था उसे उसने उन जगदीश्वरके समक्ष प्रस्तुत किया। मालावतीने कहा ब्रह्मन् ! आपने जो यह कहा कि रोग प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करता है, रोगके जो नाना प्रकारके कारण हैं, उन सबका वेद (आयुर्वेद) में निरूपण किया गया है, उसके सम्बन्धमें मेरा निवेदन यों है- जिसका निवारण करना कठिन है, वह अमङ्गलकारी रोग जिस उपायसे शरीरमें न फैले, उसका आप वर्णन करनेकी कृपा करें। मैंने जो-जो बात पूछी है या नहीं पूछी है तथा जो ज्ञात है अथवा नहीं ज्ञात है, वह सब कल्याणकी बात आप मुझे बताइये; क्योंकि आप दीनोंपर दया करनेवाले गुरु हैं। मालावतीका वचन सुनकर ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णुने वहाँ 'वैद्यकसंहिता' का वर्णन आरम्भ किया।
ब्राह्मण बोले-
जो सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता, समस्त कारणोंके भी कारण तथा वेद-वेदाङ्गोंके बीजके भी बीज हैं, उन परमेश्वर श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। समस्त मङ्गलोंके भी मङ्गलकारी बीजस्वरूप उन सनातन परमेश्वरने मङ्गलके आधारभूत चार वेदोंको प्रकट किया। उनके नाम हैं- ऋक्, यजु, साम और अथर्व उन वेदोंको देखकर और उनके अर्थका विचार करके प्रजापतिने आयुर्वेदका संकलन किया। इस प्रकार पञ्चम वेदका निर्माण करके भगवान्ने उसे सूर्यदेवके हाथमें दे दिया। उससे सूर्यदेवने एक स्वतन्त्र संहिता बनायी। फिर उन्होंने अपने शिष्योंको वह अपनी 'आयुर्वेदसंहिता' दी और पढ़ायी। तत्पश्चात् उन शिष्योंने भी अनेक संहिताओंका निर्माण किया। पतिव्रते! उन विद्वानों के नाम और उनके रचे हुए तन्त्रोंके नाम, जो रोगनाशके बीजरूप हैं, मुझसे सुनो। धन्वन्तरि, दिवोदास, काशिराज, दोनों अश्विनीकुमार, नकुल, सहदेव, सूर्यपुत्र यम, च्यवन, जनक, बुध, जाबाल, जाजलि, पैल, करथ और अगस्त्य - ये सोलह - विद्वान् वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता तथा रोगोंके नाशक (वैद्य) हैं। पतिव्रते! सबसे पहले भगवान् धन्वन्तरिने 'चिकित्सा-तत्त्वविज्ञान' नामक एक मनोहर तन्त्रका निर्माण किया। फिर दिवोदासने 'चिकित्सा-दर्पण' नामक ग्रन्थ बनाया। काशिराजने 'दिव्य चिकित्सा-कौमुदी' का प्रणयन किया। दोनों अश्विनीकुमारोंने 'चिकित्सा सारतन्त्र' की रचना की, जो भ्रमका निवारण करनेवाला है। नकुलने 'वैद्यकसर्वस्व' नामक तन्त्र बनाया। सहदेवने 'व्याधिसिन्धुविमर्दन' नामक ग्रन्थ तैयार किया। यमराजने 'ज्ञानार्णव' नामक महातन्त्रकी रचना की। भगवान् च्यवन मुनिने 'जीवदान' नामक ग्रन्थ बनाया। योगी जनकने 'वैद्यसंदेहभञ्जन' नामक ग्रन्थ लिखा । चन्द्रकुमार बुधने 'सर्वसार, ' जाबालने 'तन्त्रसार' और जाजलि मुनिने 'वेदाङ्ग सार' नामक तन्त्रकी रचना की। पैलने 'निदान तन्त्र', करथने उत्तम 'सर्वधर-तन्त्र' तथा अगस्त्यजीने 'द्वैधनिर्णय' तन्त्रका निर्माण किया ये सोलह तन्त्र चिकित्सा शास्त्रके बीज हैं, रोग-नाशके कारण हैं तथा शरीरमें बलका आधान करनेवाले हैं। आयुर्वेदके समुद्रको ज्ञानरूपी मथानीसे मथकर विद्वानोंने उससे नवनीत स्वरूप ये तन्त्र ग्रन्थ प्रकट किये हैं। सुन्दरि! इन सबको क्रमशः देखकर तुम दिव्य भास्कर संहिताका तथा - सर्वबीजस्वरूप आयुर्वेदका पूर्णतया ज्ञान प्राप्त कर लोगी। आयुर्वेदके अनुसार रोगोंका परिज्ञान करके वेदनाको रोक देना- इतना ही वैद्यका वैद्यत्व है। वैद्य आयुका स्वामी नहीं है - वह उसे घटा अथवा बढ़ा नहीं सकता। चिकित्सक आयुर्वेदका ज्ञाता, चिकित्साकी क्रियाको यथार्थरूपसे जाननेवाला धर्मनिष्ठ और दयालु होता है; इसलिये उसे 'वैद्य' कहा गया है।
दारुण ज्वर समस्त रोगोंका जनक है। उसे रोकना कठिन होता है। वह शिवका भक्त और योगी है। उसका स्वभाव निष्ठुर होता है और आकृति विकृत (विकराल) उसके तीन पैर, तीन सिर, छः हाथ और नौ नेत्र हैं। वह भयंकर ज्वर काल, अन्तक और यमके समान विनाशकारी होता है। भस्म ही उसका अस्त्र है तथा रुद्र उसके देवता हैं। मन्दाग्नि उसका जनक है। मन्दाग्निके जनक तीन हैं- वात, पित्त और कफ ये ही प्राणियोंको दुःख देनेवाले हैं। वातज, पित्तज और कफज-ये ज्वरके तीन भेद हैं। एक चौथा ज्वर भी होता है, जिसे त्रिदोषज भी कहते हैं। पाण्डु, कामल, कुष्ठ, शोथ, प्लीहा, शूलक, ज्वर, अतिसार, संग्रहणी, खाँसी, व्रण (फोड़ा), हलीमक, मूत्रकृच्छ्र, रक्तविकार या रक्तदोषसे उत्पन्न होनेवाला गुल्म, विषमेह, कुब्ज, गोद, गलगंड (घेघा), भ्रमरी, सन्निपात, विसूचिका (हैजा) और दारुणी आदि अनेक रोग हैं। इन्हींके भेद और प्रभेदोंको लेकर चौंसठ रोग माने गये हैं। ये चौंसठ रोग मृत्युकन्याके पुत्र हैं और जरा उसकी पुत्री है। जरा अपने भाइयों के साथ सदा भूतलपर भ्रमण किया करती है।
ये सब रोग उस मनुष्यके पास नहीं जाते, जो इनके निवारणका उपाय जानता है और संयमसे रहता है। उसे देखकर वे रोग उसी तरह भागते हैं, जैसे गरुड़को देखकर साँप नेत्रोंको जलसे धोना, प्रतिदिन व्यायाम करना, पैरोंके तलवों में तेल मलवाना, दोनों कानों में तेल डालना और मस्तकपर भी तेल रखना यह प्रयोग जरा और व्याधिका नाश करनेवाला है। जो वसन्त ऋतुमें भ्रमण, स्वल्पमात्रामें अग्रिसेवन तथा नयी अवस्थावाली भार्याका यथासमय उपभोग करता है, उसके पास जरा अवस्था नहीं जाती। ग्रीष्म ऋतुमें जो तालाब या पोखरेके शीतल जलमें स्नान करता, घिसा हुआ चन्दन लगाता और वायुसेवन करता है, उसके निकट जरा अवस्था नहीं जाती। वर्षा ऋतुमें जो गरम जलसे नहाता है, वर्षाक जलका सेवन नहीं करता और ठीक समयपर परिमित भोजन करता है, उसे वृद्धावस्था नहीं प्राप्त होती जो शरद् ऋतुकी प्रचण्ड धूपका - सेवन नहीं करता, उसमें घूमना-फिरना छोड़ देता है, कुएँ, बावड़ी या तालाबके जलमें नहाता है और परिमित भोजन करता है, उसके पास वृद्धावस्था नहीं फटकने पाती। जो हेमन्त ऋतुमें प्रातः काल - अथवा पोखरे आदिके जलमें स्नान करता, यथासमय आग तापता, तुरंतकी तैयार की हुई गरम गरम रसोई खाता है, उसके पास जरा अवस्था नहीं जाती है। जो शिशिर ऋतुमें गरम - कपड़े, प्रज्वलित अग्नि और नये बने हुए गरम गरम अन्नका सेवन करता है तथा गरम जलसे ही स्नान करता है, उसके समीप वृद्धावस्थाकी पहुँच नहीं होती।
जो तुरंतके बने हुए ताजे अन्नका, खीर और घृतका तथा समयानुसार तरुणी स्त्रीका उचित सेवन करता है, वृद्धावस्था उसके निकट नहीं जाती। जो भूख लगनेपर ही उत्तम अन्न खाता, प्यास लगनेपर ठंडा जल पीता और प्रतिदिन ताम्बूलका सेवन करता है, उसके पास वृद्धावस्था नहीं पहुँचती। जो प्रतिदिन दही, ताजा मक्खन और गुड़ खाता तथा संयमसे रहता है, उसके समीप जरावस्था नहीं जाती है।
जो मांस, वृद्धा स्त्री, नवोदित सूर्य तथा तरुण दधि (पाँच दिनके रखे हुए दही) का सेवन करता है, उसपर जरावस्था अपने भाइयोंके साथ हर्षपूर्वक आक्रमण करती है। सुन्दरि! जो रातको दही खाते हैं, कुलटा एवं रजस्वला स्त्रीका सेवन करते हैं, उनके पास भाइयोंसहित जरावस्था बड़े हर्षके साथ आती है। रजस्वला, कुलटा, विधवा, जारदूती, शूद्रके पुरोहितकी पत्नी तथा ऋतुहीना जो स्त्रियाँ हैं, उनका अन्न भोजन करनेवाले लोगोंको बड़ा पाप लगता है। उस पापके साथ ही जरावस्था उनके पास आती है। रोगोंके साथ पापोंकी सदा अटूट मैत्री होती है । पाप ही रोग, वृद्धावस्था तथा नाना प्रकार के विघ्नोंका बीज है। पापसे रोग होता है, पापसे बुढ़ापा आता है और पापसे ही दैन्य, दुःख एवं भयंकर शोककी उत्पत्ति होती है। इसलिये भारतके संत पुरुष सदा भयातुर हो कभी पापका आचरण नहीं करते। (पापेन जायते व्याधिः पापेन जायते जरा पापेन जायते दैन्यं दुःखं शोको भयंकरः ॥ तस्मात् पापं महावैरं दोषबीजममङ्गलम् । भारते संततं सन्तो नाचरन्ति भयातुराः ॥ (ब्रह्मखण्ड १६ । ५१-५२)) क्योंकि वह महान् वैर उत्पन्न करनेवाला, दोषोंका बीज और अमङ्गलकारी होता है।
जो अपने धर्मके आचरणमें लगा हुआ है, भगवान्के मन्त्रकी दीक्षा ले चुका है, श्रीहरिकी समाराधनामें संलग्न है, गुरु, देवता और अतिथियोंका भक्त है, तपस्यामें आसक्त है, व्रत और उपवास में लगा रहता है और सदा तीर्थसेवन करता है, उसे देखकर रोग उसी तरह भाग जाते हैं, जैसे गरुड़को देखकर साँप ऐसे पुरुषोंके पास जरा अवस्था नहीं जाती है और न दुर्जय रोगसमूह ही उसपर आक्रमण करते हैं।
पतिव्रते मालावति ! वात, पित्त और कफ ये तीन ज्वरके जनक हैं। ये जिस प्रकार देहधारियों में संचार करते और स्वयं जाते हैं, उसके विविध कारणों तथा उपायोंको मुझसे सुनो। जब भूखकी आग प्रज्वलित हो रही हो और उस समय आहार न मिले तो प्राणियोंके शरीरमें- मणिपूरक (तन्त्रके अनुसार छः चक्रोंमेंसे तीसरा चक्र, जिसकी स्थिति नाभिके पास मानी जाती है। यह तेजोमय और विद्युत्के समान आभावाला है। इसका रंग नीला है। इसमें दस दल होते हैं और उन दलोंपर 'ड' से लेकर 'फ' तकके अक्षर अंकित हैं। वह चक्र शिवका निवासस्थान माना जाता है। उसपर ध्यान लगानेसे सब विषयोंका ज्ञान हो जाता है।)चक्रमें पित्तका प्रकोप होता है। ताड़ और बेलका फल खाकर तत्काल जल पी लिया जाय तो वही सद्यः प्राणनाशक पित्त हो जाता है। जो दैवका मारा हुआ पुरुष शरद् ऋतुमें गरम पानी पीता - और भादोंमें तिक्त भोजन करता है, उसका पित्त बढ़ जाता है। धनिया पीसकर उसे शक्करके साथ ठंडे जलमें घोल दिया जाय तो उसको पीनेसे पित्तकी शान्ति होती है। चना सब प्रकारका, गव्य पदार्थ, तक्ररहित दही, पके हुए बेल और तालके फल, ईखके रससे बनी हुई सब वस्तुएँ, अदरख, मूँगकी दालका जूस तथा शर्करामिश्रित तिलका चूर्ण- ये सब पित्तका नाश करनेवाली ओषधियाँ हैं, जो तत्काल बल और पुष्टि प्रदान करती हैं। पित्तका कारण और उसके नाशका उपाय बताया गया।
अब दूसरी बात मुझसे सुनो। भोजनके बाद तुरंत स्नान करना, बिना प्यासके जल पीना, सारे शरीरमें तिलका तेल मलना, स्निग्ध तैल तथा स्निग्ध आँवलेके द्रवका सेवन, बासी अन्नका भोजन, तक्रपान, केलेका पका हुआ फल, दही, वर्षाका जल, शक्करका शर्बत, अत्यन्त चिकनाईसे युक्त जलका सेवन, नारियलका जल, बासी पानीसे रूखा स्नान (बिना तेल लगाये नहाना), तरबूजके पके फल खाना, ककड़ीके अधिक पके हुए फलका सेवन करना, वर्षा ऋतु में तालाबमें नहाना और मूली खाना - इन सबसे कफकी वृद्धि होती है। वह कफ ब्रह्मरन्ध्रमें उत्पन्न होता है, जो महान् वीर्यनाशक माना गया है। गन्धर्वनन्दिनि ! आग तापकर शरीरसे पसीना निकालना, भूजी भाँगका सेवन करना, पकाये हुए तेल विशेषको काममें लाना, घूमना, सूखे पदार्थ खाना, सूखी पकी हरैंका सेवन करना, कच्चा पिण्डारक (एक प्रकारका फल-शाक) (पिण्डारा), कच्चा केला, (एक जड़ीका पौधा भावप्रकाशके अनुसार यह पौधा हिमालयके शिखरोंपर होता है। इसका कन्द लहसुनके कन्दके समान और इसकी पत्तियाँ महीन सारहीन होती हैं। इसकी टहनियोंमें बारीक काँटे होते हैं और दूध निकलता है। यह अष्टवर्ग औषधके अन्तर्गत है और इसका कंद मधुर, बलकारक, कामोद्दीपक होता है। ऋषभ और जीवक दोनों एक ही जातिके गुल्म हैं, भेद केवल इतना ही है कि ऋषभकी आकृति बैलके सींगको तरह होती है और जीवककी झाडूकी-सी।) बेसवार (पीसा हुआ जीरा, मिर्च, लौंग आदि मसाला), सिन्धुवार (सिन्दुवार या निर्गुंडी), अनाहार (उपवास), अपानक (पानी न पीना), घृतमिश्रित रोचना-चूर्ण, घी मिलाया हुआ सूखा शक्कर, काली मिर्च, पिप्पल, सूखा अदरक, जीवक (अष्टवर्गान्तर्गत औषधविशेष) तथा मधु ये द्रव्य तत्काल कफको दूर करनेवाले तथा बल और पुष्टि देनेवाले हैं।
अब वातके प्रकोपका कारण सुनो। भोजनके बाद तुरंत पैदल यात्रा करना, दौड़ना, आग तापना, सदा घूमना और मैथुन करना, वृद्धा स्त्रीके साथ सहवास करना, मनमें निरन्तर संताप रहना, अत्यन्त रूखा खाना, उपवास करना, किसीके साथ जूझना, कलह करना, कटु वचन बोलना, भय और शोकसे अभिभूत होना- ये सब केवल वायुकी उत्पत्तिके कारण हैं। आज्ञा नामक चक्रमें वायुकी उत्पत्ति होती है। अब उसकी ओषधि सुनो। केलेका पका हुआ फल, बिजौरा नीबूके फलके साथ चीनीका शर्बत, नारियलका जल, तुरंतका तैयार किया हुआ तक्र, उत्तम पिट्ठी (पूआ, कचौरी आदि), भैंसका केवल मीठा दही या उसमें शक्कर मिला हो, तुरंतका बासी अन्न, सौवीर (जौकी काँजी), ठंडा पानी, पकाया हुआ तेलविशेष अथवा केवल तिलका तेल, नारियल, ताड़, खजूर, आँवलेका बना हुआ उष्ण द्रव पदार्थ, ठंडे और गरम जलका स्नान, सुस्निग्ध चन्दनका द्रव, चिकने कमलपत्रकी शय्या और स्निग्ध व्यञ्जन - वत्से! ये सब वस्तुएँ तत्काल ही वायुदोषका नाश करनेवाली हैं। मनुष्यों में तीन प्रकारके वायु दोष होते हैं। शारीरिक क्लेशजनित, मानसिक संतापजनित और कामजनित। मालावति! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रोगसमूहका वर्णन किया तथा उन रोगोंके नाशके लिये श्रेष्ठ विद्वानोंने जो नाना प्रकारके तन्त्र बनाये हैं, उनकी भी चर्चा की। वे सभी तन्त्र रोगोंका नाश करनेवाले हैं। उनमें रोगनिवारणके लिये रसायन आदि परम दुर्लभ उपाय बताये गये हैं। साध्वि! विद्वानों द्वारा रचे गये उन सब तन्त्रोंका यथावत् वर्णन कोई एक वर्षमें भी नहीं कर सकता। शोभने! बताओ, तुम्हारे प्राणवल्लभकी मृत्यु किस रोगसे हुई है। मैं उसका उपाय करूँगा, जिससे ये जीवित हो जायँगे ।
सौति कहते हैं -
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर - गन्धर्वकुमारी चित्ररथ पुत्री मालावतीने प्रसन्न होकर इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
मालावती बोली -
विप्रवर! सुनिये सभामें लज्जित हुए मेरे प्रियतमने ब्रह्माजीके शाप के कारण योगबलसे प्राणोंका परित्याग किया है। मैंने आपके मुँहसे निकले हुए अपूर्व, शुभ एवं मनोहर आख्यानको पूर्णरूपसे सुना है। इस संसारमें विपत्तिके बिना कब, किसको, कहाँ आप जैसे महात्माओंका संग प्राप्त हुआ है ? विद्वन् ! अब मुझे मेरे प्राणनाथको जीवित करके दे दीजिये। मैं आप सब लोगोंके चरणों में नमस्कार करके स्वामीके साथ अपने घरको जाऊँगी। मालावतीका यह वचन सुनकर ब्राह्मणरूप धारी भगवान् विष्णु उसके पाससे उठकर शीघ्र ही देवताओंकी सभामें गये। (अध्याय १६)
Summary of chapter 16 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
To alleviate the suffering of embodied souls and demonstrate the practical means of restoring life and health, the divine young Brāhmaṇa boy revealed to Mālatī the complete science of Āyurveda, the sacred Vedic system of medicine. He detailed the intricate diagnosis of physical diseases based on the imbalance of bodily humors, the medicinal properties of sacred herbs and roots, the preparation of life-restoring potions, and the spiritual remedies of chanting sacred Mantras. This comprehensive exposition highlighted how physical well-being and longevity are designed to serve as instruments for performing righteous duties, selfless service, and ultimate devotion to Lord Śrī Kṛshṇa.