ब्रह्म महा पुराणम - ब्रह्म खंड

5- ब्राह्म आदि कल्पोंका परिचय, गोलोकमें श्रीकृष्णका नारायण आदिके साथ रासमण्डलमें निवास, श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे श्रीराधाका प्रादुर्भाव; राधाके रोमकूपोंसे गोपाङ्गनाओंका प्राकट्य तथा श्रीकृष्णसे गोपों, गौओं, बलीवर्दी, हंसों, श्वेत घोड़ों और सिंहोंकी उत्पत्ति; श्रीकृष्णद्वारा पाँच रथोंका निर्माण तथा पार्षदोंका प्राकट्य; भैरव, ईशान और डाकिनी आदिकी उत्पत्ति

महर्षि शौनकके पूछनेपर सौति कहते हैं -

ब्रह्मन् ! मैंने सबसे पहले ब्रह्मकल्पके चरित्रका वर्णन किया है। अब वाराहकल्प और पाद्मकल्प – इन दोनों का वर्णन करूँगा, सुनिये। मुने! ब्राह्म, वाराह और पाद्म- ये तीन प्रकारके कल्प हैं; जो क्रमशः प्रकट होते हैं। जैसे सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- ये चारों युग क्रमसे कहे गये हैं, वैसे ही वे कल्प भी हैं। तीन सौ साठ युगोंका एक दिव्य युग माना गया है। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। चौदह मनुओंके व्यतीत हो जानेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। ऐसे तीन सौ साठ दिनोंके बीतनेपर ब्रह्माजीका एक वर्ष पूरा होता है। इस तरहके एक सौ आठ वर्षोंकी विधाताकी आयु बतायी गयी है। यह परमात्मा श्रीकृष्णका एक निमेषकाल है। कालवेत्ता विद्वानोंने ब्रह्माजीकी आयुके बराबर कल्पका मान निश्चित किया है। छोटे-छोटे कल्प बहुत-से हैं, जो संवर्त आदि नामसे विख्यात हैं। महर्षि मार्कण्डेय सात कल्पोंतक जीनेवाले बताये गये हैं; परंतु वह कल्प ब्रह्माजी के एक दिनके बराबर ही बताया गया है। तात्पर्य यह कि मार्कण्डेय मुनिकी आयु ब्रह्माजीके सात दिनमें ही पूरी हो जाती है, ऐसा निश्चय किया गया है। ब्राह्म, वाराह और पाद्म- ये तीन - महाकल्प कहे गये हैं। इनमें जिस प्रकार सृष्टि होती है, वह बताता हूँ, सुनिये ब्राह्मकल्पमें मधु-कैटभके मेदसे मेदिनीकी सृष्टि करके स्रष्ट भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञा ले सृष्टि रचना की थी। फिर वाराहकल्पमें जब पृथ्वी एकार्णवके जलमें डूब गयी थी, वाराहरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक रसातल से उसका उद्धार करवाया और सृष्टि रचना की; तत्पश्चात् पाद्मकल्पमें सृष्टिकर्ता ब्रह्माने विष्णु नाभिकमलपर सृष्टिका निर्माण किया ब्रह्मलोकपर्यन्त जो त्रिलोकी है, उसीकी रचना की, ऊपरके जो नित्य तीन लोक हैं, उनकी नहीं। सृष्टि निरूपणके प्रसंगमें मैंने यह काल गणना बतायी है और किञ्चिन्मात्र सृष्टिका निरूपण किया है। अब फिर आप क्या सुनना चाहते हैं?

शौनकजीने पूछा-

सूतनन्दन !अब यह बताइये कि गोलोकमें सर्वव्यापी महान् परमात्मा गोलोकनाथने इन नारायण आदिकी सृष्टि करके फिर क्या किया? इस विषयका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेकी कृपा करें।

सौतिने कहा-

ब्रह्मन् ! इन सबकी सृष्टि करके इन्हें साथ ले भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कमनीय सुरम्य रासमण्डलमें गये। रमणीय कल्पवृक्षोंके मध्यभागमें मण्डलाकार रासमण्डल अत्यन्त मनोहर दिखायी देता था। वह सुविस्तृत, सुन्दर, समतल और चिकना था। चन्दन, कस्तूरी, अगर और कुङ्कुमसे उसको सजाया गया था। उसपर दही, लावा, सफेद धान और दूर्वादल बिखेरे गये थे। रेशमी सूतमें गुँथे हुए नूतन चन्दन-पल्लवोंकी बन्दनवारों और केलेके खंभोंद्वारा वह चारों ओरसे घिरा हुआ था। करोड़ों मण्डप, जिनका निर्माण उत्तम रत्नोंके सारभागसे हुआ था, उस भूमिकी शोभा बढ़ाते थे। उनके भीतर रत्नमय प्रदीप जल रहे थे। वे पुष्प और सुगन्धकी धूपसे वासित थे। उनके भीतर अत्यन्त ललित प्रसाधन सामग्री रखी हुई थी। वहाँ जाकर जगदीश्वर श्रीकृष्ण

सबके साथ उन मण्डपोंमें ठहरे। मुनिश्रेष्ठ ! उस रासमण्डलका दर्शन करके वे सब लोग आश्चर्यसे चकित हो उठे। वहाँ श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जिसने दौड़कर फूल ले आकर उन भगवान्के चरणोंमें अर्घ्य प्रदान किया। उसके अङ्ग अत्यन्त कोमल थे। वह मनोहारिणी और सुन्दरियों में भी सुन्दरी थी। उसके सुन्दर एवं अरुण ओष्ठ और अधर अपनी लालिमासे बन्धुजीव पुष्प (दुपहरियेके फूल) की शोभाको पराजित कर रहे थे। मनोहर दन्तपंक्ति मोतियोंकी श्रेणीको तिरस्कृत करती थी। वह सुन्दरी किशोरी बड़ी मनोहर थी। उसका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमाके कोटि चन्द्रोंकी शोभाको छीने लेता था सीमन्तभाग बड़ा मनोहर था। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंके समान अत्यन्त सुन्दर दिखायी देते थे। उसकी मनोहर नासिकाके सामने पक्षिराज गरुडकी नुकीली चोंच हार मान चुकी थी। वह मनोहारिणी बाला अपने दोनों कपोलोंद्वारा सुनहरे दर्पणकी शोभाको तिरस्कृत कर रही थी। रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित दोनों कान बड़े सुन्दर लगते थे। सुन्दर कपोलोंमें चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुङ्कुम और सिन्दूरकी बूँदोंसे पत्ररचना की गयी थी, जिससे वह बड़ी मनोहर जान पड़ती थी। उसके सँवारे हुए केशपाश मालतीकी मालासे अलंकृत थे। वह सती-साध्वी बाला अपने सिरपर सुन्दर एवं सुगन्धित वेणी धारण करती थी। उसके दोनों चरणस्थल कमलोंकी प्रभाको छीने लेते थे। उसकी मन्द-मन्द गति हंस और खंजनके गर्वका गञ्जन करनेवाली थी। वह उत्तम रत्नोंके सारभागसे बनी हुई मनोहर वनमाला, हीरेका बना हुआ हार, रत्ननिर्मित केयूर, कंगन, सुन्दर रत्नोंके सारभागसे निर्मित अत्यन्त मनोहर पाशक (गलेकी जंजीर या कानका पासा), बहुमूल्य रत्नोंका बना झनकारता हुआ मंजीर तथा अन्य नाना प्रकारके चित्राङ्कित सुन्दर जड़ाऊ आभूषण पहने हुए थी।

वह गोविन्दसे वार्तालाप करके उनकी आज्ञा पा मुसकराती हुई श्रेष्ठ रत्नमय सिंहासनपर बैठ गयी। उसकी दृष्टि अपने उन प्राणवल्लभके मुखारविन्दपर ही लगी हुई थी। उस किशोरीके रोमकूपोंसे तत्काल ही गोपाङ्गनाओंका आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेषके द्वारा भी उसीकी समानता करती थीं उनकी संख्या लक्षकोटि । थी। वे सब की सब नित्य सुस्थिर-यौवना थीं। संख्याके जानकार विद्वानोंने गोलोकमें गोपाङ्गनागणोंकी उक्त संख्या ही निर्धारित की है। मुने! फिर तो श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे भी | उसी क्षण गोपगणोंका आविर्भाव हुआ, जो रूप और वेषमें भी उन्हींके समान थे। संख्यावेत्ता महर्षियोंका कथन है कि श्रुतिमें गोलोकके कमनीय मनोहर रूपवाले गोपोंकी संख्या तीस करोड़ बतायी गयी है।

फिर तत्काल ही श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे नित्य सुस्थिर यौवनवाली गौएँ प्रकट हुईं, जिनके रूप-रंग अनेक प्रकारके थे। बहुतेरे बलीवर्द (साँड़), सुरभि जातिकी गौएँ, नाना प्रकार के सुन्दर सुन्दर बछड़े और अत्यन्त मनोहर, श्यामवर्णवाली बहुत सी कामधेनु गायें भी वहाँ तत्काल प्रकट हो गयीं। उनमें से एक मनोहर बलीवर्दको, जो करोड़ों सिंहोंके समान बलशाली था, श्रीकृष्णने शिवको सवारीके लिये दे दिया। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके चरणोंके नखछिद्रोंसे सहसा मनोहर हंस-पंक्ति प्रकट हुई। उन हंसोंमें नर, मादा और बच्चे सभी मिले-जुले थे। उनमें से एक राजहंसको, जो महान् बल पराक्रमसे सम्पन्न था, श्रीकृष्णने तपस्वी ब्रह्माको वाहन बनानेके लिये अर्पित कर दिया।

तदनन्तर परमात्मा श्रीकृष्णके बायें कानके छिद्रसे सफेद रंगके घोड़ोंका समुदाय प्रकट हुआ, जो बड़ा मनोहर जान पड़ता था उनमेंसे एक श्वेत अश्व गोपाङ्गनावल्लभ श्रीकृष्णने देवसभामें विराजमान धर्मको सवारीके लिये प्रसन्नतापूर्वक दे दिया। फिर उन परम पुरुषके दाहिने कानके छिद्रसे उस देवसभाके भीतर ही महान् बलवान् और पराक्रमी सिंहोंकी श्रेणी प्रकट हुई। श्रीकृष्णने उनमेंसे एक सिंह जो बहुमूल्य श्रेष्ठ हारसे अलंकृत था, बड़े आदरके साथ प्रकृति (दुर्गा) - देवीको अर्पित कर दिया। उन्हें वही सिंह दिया गया, जिसे वे लेना चाहती थीं। इसके बाद योगीश्वर श्रीकृष्णने योगबलसे पाँच रथोंका निर्माण किया। वे सब शुद्ध एवं सर्वश्रेष्ठ रत्नोंसे बनाये गये थे। मनके समान वेगसे चलनेवाले और मनोहर थे। उनकी ऊँचाई लाख  योजनकी और विस्तार सौ योजनका था। उनमें लाख-लाख पहिये लगे थे। उनका वेग वायुके समान था। उन रथोंमें एक-एक लाख क्रीड़ाभवन बने हुए थे। उनमें शृङ्गारोचित भोगवस्तुएँ और असंख्य शय्याएँ थीं। उन गृहोंमें लाखों रत्नमय दीप प्रकाश फैलाते थे और लाखों घोड़े उस रथकी शोभा बढ़ाते थे। भाँति-भाँतिके विचित्र चित्र उनमें अङ्कित थे। सुन्दर रत्नमय कलश उनकी उज्ज्वलता बढ़ा रहे थे। रत्नमय दर्पणों और आभूषणोंसे वे सभी रथ (विमान) भरे हुए थे। श्वेत चँवर उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। अग्निमें तपाकर शुद्ध किये गये सुनहरे वस्त्र, विचित्र विचित्र माला, श्रेष्ठ मणि, मोती, माणिक्य तथा हीरोंके हारोंसे वे सभी रथ अलंकृत थे। कुछ कुछ लाल रंगके असंख्य सुन्दर कृत्रिम कमल, जो श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे निर्मित हुए थे, उन रथोंको सुशोभित कर रहे थे।

द्विज श्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने उनमें से एक रथ तो नारायणको दे दिया और एक राधिकाको देकर शेष सभी रथ अपने लिये रख लिये। तत्पश्चात् श्रीकृष्णके गुह्यदेशसे पिङ्गलवर्णवाले पार्षदोंके साथ एक पिङ्गल पुरुष प्रकट हुआ। गुह्यदेशसे आविर्भूत होनेके कारण वे सब गुह्यक कहलाये और वह पुरुष उन गुह्यकोंका स्वामी कुबेर कहलाया, जो धनाध्यक्षके पदपर प्रतिष्ठित है। कुबेरके वामपार्श्वसे एक कन्या प्रकट हुई, जो कुबेरकी पत्नी हुई। वह देवी समस्त सुन्दरियों में मनोरमा थी, अतः उसी नामसे प्रसिद्ध हुई। फिर भगवान्के गुह्यदेशसे भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस और विकृत अङ्गवाले वेताल प्रकट हुए। मुने! तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखसे कुछ

पार्षदोंका प्राकट्य हुआ, जिनके चार भुजाएँ थीं। वे सब के सब श्यामवर्ण थे और हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण करते थे। उनके गलेमें वनमाला लटक रही थी। उन सबने पीताम्बर पहन रखे थे, उनके मस्तकपर किरीट, कानों में कुण्डल तथा अन्यान्य अङ्गों में रत्नमय आभूषण शोभा दे रहे थे। श्रीकृष्णने वे चार भुजाधारी पार्षद नारायणको दे दिये गुह्यकोंको उनके स्वामी कुबेरके हवाले किया और भूत-प्रेतादि भगवान् शङ्करको अर्पित कर दिये। तदनन्तर श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंसे द्विभुज पार्षद प्रकट हुए, जो श्यामवर्णके थे और हाथों में जपमाला लिये हुए थे। वे श्रेष्ठ पार्षद निरन्तर आनन्दपूर्वक भगवान्के चरणकमलोंका ही चिन्तन करते थे। श्रीकृष्णने उन्हें दास्यकर्ममें नियुक्त किया। वे दास यत्नपूर्वक अर्घ्य लिये प्रकट हुए थे। वे सभी श्रीकृष्णपरायण वैष्णव थे। उनके सारे अङ्ग पुलकित थे, नेत्रोंसे अश्रु झर रहे थे और वाणी गद्गद थी। उनका चित्त केवल भगवच्चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही संलग्न रहता था।

इसके बाद श्रीकृष्णके दाहिने नेत्रसे भयंकर गण प्रकट हुए, जो हाथों में त्रिशूल और पट्टिश लिये हुए थे। उन सबके तीन नेत्र थे और मस्तकपर चन्द्राकार मुकुट धारण करते थे। वे सब के सब विशालकाय तथा दिगम्बर थे। प्रज्वलित अग्निशिखाके समान जान पड़ते थे। वे सभी महान् भाग्यशाली भैरव कहलाये। वे शिवके समान ही तेजस्वी थे। रुरुभैरव, संहारभैरव, कालभैरव, असितभैरव, क्रोधभैरव, भीषणभैरव, महाभैरव तथा खट्वाङ्गभैरव- ये आठ भैरव माने गये हैं। श्रीकृष्णके बायें नेत्रसे एक भयंकर पुरुष प्रकट हुआ, जो त्रिशूल, पट्टिश, व्याघ्रचर्ममय वस्त्र और गदा धारण किये हुए था। वह दिगम्बर, विशालकाय, त्रिनेत्रधारी और चन्द्राकार मुकुट धारण करनेवाला था। वह महाभाग पुरुष 'ईशान' कहलाया, जो दिक्पालोंका स्वामी है। इसके बाद श्रीकृष्णकी नासिकाके छिद्रसे डाकिनियाँ, योगिनियाँ तथा सहस्रों क्षेत्रपाल प्रकट हुए। इनके सिवा उन परम पुरुषके पृष्ठदेशसे सहसा तीन करोड़ श्रेष्ठ देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ, जो दिव्य मूर्तिधारी थे। (अध्याय ५)