सौति कहते हैं-
मालावती ब्राह्मणोंको धन देकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने स्वामीकी सेवाके लिये नाना प्रकारसे अपना शृङ्गार किया। वह प्रतिदिन पतिकी सेवा शुश्रूषा और समयोचित पूजा करने लगी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस पतिव्रताने स्वयं एकान्तमें पतिको भूले हुए। महापुरुषके स्तोत्र, पूजन, कवच और मन्त्रका बोध कराया। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थ में गन्धर्व और मालावतीको इस श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदिका तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया था।
इसी तरह शंकरजीका स्तोत्र और कवच भी गन्धर्वको भूल गया था। कृपानिधान वसिष्ठ एकान्तमें गन्धर्वराजको उसका भी बोध कराया। इस प्रकार बोधसम्पन्न हो परमानन्दमय गन्धर्वने अपने कुबेरभवनसदृश आश्रममें रहकर बन्धु बान्धवोंके साथ राज्य किया। उपबर्हणकी अन्य स्त्रियाँ भी जैसे-तैसे वहाँ आयीं और आकर उन्होंने बड़े आनन्दके साथ पुनः अपने स्वामीको प्राप्त किया।
शौनकने पूछा-
सूतनन्दन! पूर्वकालमें वसिष्ठजीने उन दोनों दम्पतिको भगवान् विष्णुके किस स्तोत्र, कवच, मन्त्र और पूजा विधिका - उपदेश किया था - यह आप बतानेकी कृपा करें। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने गन्धर्वराजको भगवान् शिवके जिस द्वादशाक्षर मन्त्र और कवच आदिका उपदेश - दिया था, वह भी मुझे बताइये। यह सब सुनने के लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है; क्योंकि शंकरका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दुर्गतिका नाश करनेवाला है।
सौति बोले-
शौनकजी! मालतीने जिस स्तोत्रके द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया था, वही स्तोत्र वसिष्ठजीने उन गन्धर्व-दम्पतिको दिया था। अब उनके दिये हुए मन्त्र और कवचका वर्णन सुनिये ।
'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा' - यह षोडशाक्षर मन्त्र उपासकोंके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसीका उपदेश वसिष्ठजीने दिया था। पूर्वकालमें श्रीहरिके पुष्करधाममें ब्रह्माजीने कुमारको यह मन्त्र दिया था तथा श्रीकृष्णने गोलोकमें भगवान् शंकरको इसका ज्ञान प्रदान किया था। यहाँ भगवान् विष्णुके वेदवर्णित स्वरूपका ध्यान किया जाता है, जो सनातन एवं सबके लिये परम दुर्लभ है। पूर्वोक्त मूल मन्त्र से उत्तम नैवेद्य आदि सभी उपचार समर्पित करने चाहिये। भगवान्का जो कवच है, वह अत्यन्त गुप्त है। उसे मैंने अपने पिताजीके मुखसे सुना था । विप्रवर ! पूर्वकालमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने ही पिताजीको गङ्गाके तटपर इसका उपदेश दिया था। भगवान् शंकरको, ब्रह्माजीको तथा धर्मको गोलोकके रासमण्डलमें गोपीवल्लभ श्रीकृष्णने कृपापूर्वक यह परम अद्भुत कवच प्रदान किया था।
ब्रह्मोवाच
राधाकान्त महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम् ।
ब्रह्माण्डपावनं नाम कृपया कथय प्रभो ॥ १७ ॥
मां महेशं च धर्म च भक्तं च भक्तवत्सल ।
त्वत्प्रसादेन पुत्रेभ्यो दास्यामि भक्तिसंयुतः ॥ १८ ॥
ब्रह्माजी बोले-
महाभाग ! राधाकान्त ! प्रभो ! ब्रह्माण्डपावन नामक जो कवच आपने प्रकाशित किया है, उसका उपदेश कृपापूर्वक मुझको, महादेवजीको तथा धर्मको दीजिये। भक्तवत्सल ! हम तीनों आपके भक्त हैं। आपकी कृपासे मैं अपने पुत्रोंको भक्तिपूर्वक इसका उपदेश दूँगा ॥ १७-१८॥
श्रीकृष्ण उवाच
शृणु वक्ष्यामि ब्रह्मेश धर्मेदं कवचं परम् ।
अहं दास्यामि युष्मभ्यं गोपनीयं सुदुर्लभम् ॥ १९ ॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं प्राणतुल्यं ममैव हि ।
यत्तेजो मम देहेऽस्ति तत्तेजः कवचेऽपि च ॥ २० ॥
श्रीकृष्णने कहा-
ब्रह्मन् ! महेश्वर ! और धर्म! तुमलोग सुनो! मैं इस उत्तम कवचका वर्णन कर रहा हूँ । यद्यपि यह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें इसका उपदेश दूँगा। परंतु ध्यान रहे, जिस किसीको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि यह मेरे लिये प्राणों के समान है। जो तेज मेरे शरीरमें है, वही इस कवचमें भी है ॥ १९ २० ॥
कुरु सृष्टिमिमं धृत्वा धाता त्रिजगतां भव
संहर्त्ता भव हे शम्भो मम तुल्यो भवे भव ॥ २१ ॥
हे धर्म त्वमिमं धृत्वा भव साक्षी च कर्मणाम्।
तपसां फलदाता च यूयं भवत मद्वरात् ॥ २२ ॥
ब्रह्मन्! तुम इस कवचको धारण करके सृष्टि करो और तीनों लोकोंके विधाताके पदपर प्रतिष्ठित रहो। शम्भो ! तुम भी इस कवचको ग्रहण करके संहारका कार्य सम्पन्न करो और संसारमें मेरे समान शक्तिशाली हो जाओ। धर्म! तुम इस कवचको धारण करके कर्मोंके साक्षी बने रहो। तुम सब लोग मेरे वरसे तपस्याके फलदाता हो जाओ ॥ २१ २२ ॥
ब्रह्माण्डपावनस्यास्य कवचस्य हरिः स्वयम् ।
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं जगदीश्वरः ॥ २३ ॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ।
त्रिलक्षवारपठनात् सिद्धिदं कवचं विधे ॥ २४ ॥
इस ब्रह्माण्डपावन कवचके स्वयं श्रीहरि ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं, मैं जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही देवता हूँ तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग (इस कवचका विनियोगवाक्य संस्कृतमें इस प्रकार है-
ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्डपावनकवचस्य साक्षात् श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, स एव जगदीश्वरः श्रीकृष्णो देवता धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः ।) कहा गया है। विधे! तीन लाख बार पाठ करनेपर यह कवच सिद्धिदायक होता है ॥ २३ २४ ॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेत्तु सः ।
तेजसा सिद्धियोगेन ज्ञानेन विक्रमेण च ॥ २५ ॥
प्रणवो मे शिरः पातु नमो रासेश्वराय च।
भालं पायान्नेत्रयुग्मं नमो राधेश्वराय च ॥ २६ ॥
कृष्णः पायाच्छोत्रयुग्मं हे हरे घ्राणमेव च ।
जिह्निकां वह्निजाया तु कृष्णायेति च सर्वतः ॥ २७ ॥
श्रीकृष्णाय स्वाहेति च कण्ठं पातु षडक्षरः ।
ह्रीं कृष्णाय नमो वक्त्रं क्लीं पूर्वश्च भुजद्वयम् ॥ २८ ॥
नमो गोपाङ्गनेशाय स्कन्धावष्टाक्षरोऽवतु ।
दन्तपंक्तिमोष्ठयुग्मं नमो गोपीश्वराय च ॥ २९ ॥
ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा ।
स्वयं वक्षःस्थलं पातु मन्त्रोऽयं षोडशाक्षरः ॥ ३० ॥
ऐं कृष्णाय स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु ।
ॐ विष्णवे स्वाहेति च कङ्कालं सर्वतोऽवतु ॥ ३१ ॥
ॐ हरये नम इति पृष्ठं पादं सदाऽवतु ।
ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा सर्वशरीरकम् ॥ ३२ ॥
प्राच्यां मां पातु श्रीकृष्ण आग्नेय्यां पातु माधवः ।
दक्षिणे पातु गोपीशो नैर्ऋत्यां नन्दनन्दनः ॥ ३३ ॥
वारुण्यां पातु गोविन्दो वायव्यां राधिकेश्वरः ।
उत्तरे पातु रासेश ऐशान्यामच्युतः स्वयम् ॥ ३४ ॥
सन्ततं सर्वतः पातु परो नारायणः स्वयम् ।
इति ते कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम् ॥ ३५ ॥
मम जीवनतुल्यं च युष्मभ्यं दत्तमेव च ।
जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोंके योग, ज्ञान और बल-पराक्रममें मेरे समान हो जाता है। प्रणव (ओंकार) मेरे मस्तककी रक्षा करे, 'नमो रासेश्वराय' (रासेश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र मेरे ललाटका पालन करे। 'नमो राधेश्वराय' (राधापतिको नमस्कार है) यह मन्त्र दोनों नेत्रों की रक्षा करे। 'कृष्ण' दोनों कानोंका पालन करें। 'हे हरे' यह नासिकाकी रक्षा करे। 'स्वाहा' मन्त्र जिह्वाको कष्टसे बचावे 'कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सब ओरसे हमारी रक्षा करे। 'श्रीकृष्णाय स्वाहा' यह षडक्षर मन्त्र कण्ठको कष्टसे बचावे । 'ह्रीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र मुखकी तथा 'क्लीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र दोनों भुजाओंकी रक्षा करे। 'नमो गोपाङ्गनेशाय' (गोपाङ्गनावल्लभ श्रीकृष्णको नमस्कार है) यह अष्टाक्षर मन्त्र दोनों कंधोंका पालन करे। 'नमो गोपीश्वराय' (गोपीश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र दन्तपंक्ति तथा ओष्ठयुगलकी रक्षा करे। 'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा' (रासमण्डलके स्वामी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। उनकी प्रसन्नता के लिये मैं अपने सर्वस्वकी आहुति देता हूँ-त्याग करता हूँ) यह षोडशाक्षर मन्त्र मेरे वक्षःस्थलक रक्षा करे। 'ऐं कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सदा मेरे दोनों कानोंको कष्टसे बचावे। ॐ विष्णवे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे कङ्काल (अस्थिपञ्जर) की सब ओरसे रक्षा करे। 'ॐ हरये नमः' यह मन्त्र सदा मेरे पृष्ठभाग और पैरोंका पालन करे। 'ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें श्रीकृष्ण, अग्निकोणमें माधव, दक्षिण दिशामें गोपीश्वर तथा नैर्ऋत्यकोणमें नन्दनन्दन मेरी रक्षा करें। पश्चिम दिशामें गोविन्द, वायव्यकोणमें राधिकेश्वर, उत्तर दिशामें रासेश्वर और ईशानकोणमें स्वयं अच्युत मेरा संरक्षण करें तथा परमपुरुष साक्षात् नारायण सदा सब ओरसे मेरा पालन करें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार इस परम | अद्भुत कवचका मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया। यह मेरे जीवनके तुल्य है। यह मैंने तुमलोगोंको अर्पित किया ॥ २५-३५३ ॥
अश्वमेधसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च।
कलां नार्हन्ति तान्येव कवचस्यैव धारणात् ॥ ३६ ।। गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः ।
स्नात्वा तं च नमस्कृत्य कवचं धारयेत् सुधीः ॥ ३७ ।। कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ।
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुरेव भवेद् द्विज ॥ ३८ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे
महापुरुषब्रह्माण्डपावनं नाम श्रीकृष्णकवचं सम्पूर्णम् ।
इस कवचको धारण करनेसे जो पुण्य होता है, सहस्त्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि स्नान करके वस्त्र-अलङ्कार और चन्दनद्वारा विधिवत् गुरुकी पूजा और वन्दना करनेके पश्चात् कवच धारण करे। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। शौनकजी! यदि किसीने इस कवचको सिद्ध कर लिया तो वह विष्णुरूप ही हो जाता है ।। ३६-३८ ।। इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराणके ब्रह्मखण्डमें महापुरुषब्रह्माण्डपावन नामक श्रीकृष्णकवच पूरा हुआ।
सौति कहते हैं—
शौनक ! अब शिवका कवच और स्तोत्र सुनिये, जिसे वसिष्ठजीने गन्धर्वको दिया था। शिवका जो द्वादशाक्षर मन्त्र है, वह इस प्रकार है, ॐ नमो भगवते शिवाय स्वाहा'। प्रभो! इस मन्त्रको पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें कृपापूर्वक प्रदान किया था। प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने रावणको यह मन्त्र दिया था और शंकरजीने पहले कभी बाणासुरको और दुर्वासाको भी इसका उपदेश दिया था। इस मूलमन्त्रसे इष्टदेवको नैवेद्य आदि सम्पूर्ण उत्तम उपचार समर्पित करना चाहिये। इस मन्त्रका वेदोक्त ध्यान 'ध्यायेन्नित्यं (ध्यायेन्नित्यं महेशं' इत्यादि श्लोक इस प्रकार है ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं दिव्याकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। रत्नासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं सकलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥ 'प्रतिदिन महेश्वरका ध्यान करे। उनकी अङ्गकान्ति चाँदीके पर्वत अथवा कैलासके समान है, मस्तकपर मनोहर चन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है, दिव्य वेश-भूषा एवं शृङ्गारसे उनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल- जगमगाता हुआ जान पड़ता है, उनके एक हाथमें फरसा, दूसरेमें मृगछौना तथा शेष दो हाथोंपर अभयकी मुद्राएँ हैं, वे सदा प्रसन्न रहते हैं, रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं, देवता लोग चारों ओरसे खड़े होकर उनकी स्तुति करते हैं। वे बाघम्बर पहने बैठे हैं, सम्पूर्ण विश्वके आदिकारण और वन्दनीय हैं, सबका भय दूर कर देनेवाले हैं, उनके पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र हैं।) महेशं' इत्यादि श्लोकके अनुसार है, जो सर्वसम्मत है।
'ॐ नमो महादेवाय'
बाणासुर उवाच
महेश्वर महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
संसारपावनं नाम कृपया कथय प्रभो ॥ ४३ ॥
सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीमहादेवजीको नमस्कार है।
बाणासुरने कहा-
महेश्वर ! महाभाग ! प्रभो ! आपने संसारपावन नामक जो कवच प्रकाशित किया है, उसे कृपापूर्वक मुझसे कहिये ॥ ४३ ॥
महेश्वर उवाच
शृणु वक्ष्यामि हे वत्स! कवचं परमाद्भुतम् ।
अहं तुभ्यं प्रदास्यामि गोपनीयं सुदुर्लभम् ॥ ४४ ॥
पुरा दुर्वाससे दत्तं त्रैलोक्यविजयाय च ।
ममैवेदं च कवचं भक्त्या यो धारयेत् सुधीः ॥ ४५ ॥ जेतुं शक्नोति त्रैलोक्यं भगवानिव लीलया ॥ ४६॥
महेश्वर बोले –
बेटा ! सुनो, उस परम अद्भुत कवचका मैं वर्णन करता हूँ। यद्यपि वह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें उसका उपदेश दूँगा। पूर्वकालमें त्रैलोक्य विजयके लिये - वह कवच मैंने दुर्वासाको दिया था। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष भक्तिभावसे मेरे इस कवचको धारण करता है, वह भगवान्की भाँति लीलापूर्वक तीनों लोकोंपर विजय पा सकता है। संसारपावनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ।
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं च महेश्वरः ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४७ ॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धिदं कवचं भवेत् ॥ ४८ ॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेद् भुवि ।
तेजसा सिद्धियोगेन तपसा विक्रमेण च ॥ ४९ ॥
शम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः ।
दन्तपंक्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम् ॥ ५० ॥
कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषभवाहनः ।
वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः ॥ ५१ ॥
सर्वाङ्गं पातु विश्वेशः सर्वदिक्षु च सर्वदा।
स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मे पातु संततम् ॥ ५२ ॥
इति ते कथितं बाण कवचं परमाद्भुतम् ।
यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ।। ५३ ।।
यत् फलं सर्वतीर्थानां स्नानेन लभते नरः ।
तत् फलं लभते नूनं कवचस्यैव धारणात् ॥ ५४॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेन्मां यः सुमन्दधीः ।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ५५ ॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते संसारपावनं नाम शङ्करकवचं सम्पूर्णम् ।
इस संसारपावन नामक शिवकवचके प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द तथा मैं महेश्वर देवता हूँ । धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके लिये इसका विनियोग है। (विनियोग-वाक्य यों समझना चाहिये- 'ॐ अस्य श्रीसंसारपावननामधेयस्य शिवकवचस्य प्रजापतिऋषिर्गायत्री छन्दो महेश्वरो देवता धर्मार्थकाममोक्षसिद्धौ विनियोगः ।) पाँच लाख बार पाठ करनेसे यह कवच सिद्धिदायक होता है। जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोग, तपस्या और बल-पराक्रममें इस भूतलपर मेरे समान हो जाता है ॥ ४७-४९ ॥
शम्भु मेरे मस्तककी और महेश्वर मुखकी रक्षा करें। नीलकण्ठ दाँतोंकी पाँतका और स्वयं हर अधरोष्ठका पालन करें। चन्द्रचूड कण्ठकी और वृषभवाहन दोनों कंधोंकी रक्षा करें।।
नीलकण्ठ वक्षःस्थलका और दिगम्बर पृष्ठभागका पालन करें। विश्वेश सदा सब दिशाओंमें सम्पूर्ण अङ्गोंकी रक्षा करें। सोते और जागते समय स्थाणुदेव निरन्तर मेरा पालन करते रहें ॥ ५०-५२॥
बाण ! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन किया। इसका उपदेश जो ही आवे, उसीको नहीं देना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक इसको गुप्त रखना चाहिये। मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करके जिस फलको पाता है, उसको अवश्य इस कवचको धारण करनेमात्रसे पा लेता है। जो अत्यन्त मन्दबुद्धि मानव इस कवचको जाने बिना मेरा भजन करता है, वह सौ लाख बार जप करे तो भी उसका मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता ॥ ५३-५५ ॥
इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणमें संसारपावन नामक कवच पूरा हुआ।
सौति कहते हैं-
शौनक ! यह तो कवच कहा गया। अब स्तोत्र सुनिये। मन्त्रराज कल्पवृक्ष स्वरूप है। इसे पूर्वकालमें वसिष्ठजीने दिया था ।
ॐ नमः शिवाय
बाणासुर उवाच
वन्दे सुराणां सारं च सुरेशं नीललोहितम् ।
योगीश्वरं योगबीजं योगिनां च गुरोर्गुरुम् ॥ ५६ ॥ ज्ञानानन्दं ज्ञानरूपं ज्ञानबीजं सनातनम् ।
तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥ ५७ ॥ तपोरूपं तपोबीजं तपोधनधनं वरम् ।
वरं वरेण्यं वरदमीड्यं सिद्धगणैर्वरैः ॥ ५८ ॥
कारणं भुक्तिमुक्तीनां नरकार्णवतारणम् ।
आशुतोषं प्रसन्नास्यं करुणामयसागरम् ॥ ५९ ॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभम् ।
ब्रह्मज्योतिः स्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥ ६०॥
विषयाणां विभेदेन विभ्रन्तं बहुरूपकम् ।
जलरूपमग्निरूपमाकाशरूपमीश्वरम् ।। ६१ ।।
वायुरूपं चन्द्ररूपं सूर्यरूपं महत्प्रभुम् ।
आत्मनः स्वपदं दातुं समर्थमवलीलया ॥ ६२ ॥
भक्तजीवनमीशं च भक्तानुग्रहकातरम् ।
वेदा न शक्ता यं स्तोतुं किमहं स्तौमि तं प्रभुम् ॥ ६३ ।।
अपरिच्छिन्नमीशानमहो वाङ्मनसोः परम् ।
व्याघ्रचर्माम्बरधरं वृषभस्थं दिगम्बरम् ।
त्रिशूलपट्टिशधरं सस्मितं चन्द्रशेखरम् ॥ ६४ ॥
इत्युक्त्वा स्तवराजेन नित्यं बाणः सुसंयतः ।
प्राणमच्छंकरं भक्त्या दुर्वासाश्च मुनीश्वरः ॥ ६५ ॥
सच्चिदानन्दस्वरूप शिवको नमस्कार है।
बाणासुर बोला-
जो देवताओंके सार तत्त्वस्वरूप और समस्त देवगणोंके स्वामी हैं, जिनका वर्ण नील और लोहित है, जो योगियोंके ईश्वर, योगके बीज तथा योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं, उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ज्ञानानन्दस्वरूप, ज्ञानरूप, ज्ञानबीज, सनातन देवता, तपस्याके फलदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तपः स्वरूप, तपस्याके बीज, तपोधनोंके श्रेष्ठ धन, वर, वरणीय, वरदायक तथा श्रेष्ठ सिद्धगणोंके द्वारा स्तवन करने योग्य हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भोग और मोक्षके कारण, नरकसमुद्रसे पार उतारनेवाले, शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, प्रसन्नमुख तथा करुणासागर हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनकी अङ्गकान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद तथा श्वेत कमलके सदृश उज्ज्वल है, जो ब्रह्मज्योतिः स्वरूप तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये विभिन्न रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो विषयोंके भेदसे बहुतेरे रूप धारण करते हैं, जल, अग्नि, आकाश, वायु, चन्द्रमा और सूर्य जिनके स्वरूप हैं, जो ईश्वर एवं महात्माओंके प्रभु हैं और लीलापूर्वक अपना पद देनेकी शक्ति रखते हैं, जो भक्तोंके जीवन हैं तथा भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर हो उठते हैं, उन ईश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। वेद भी जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं, जो देश, काल और वस्तुसे परिच्छिन्न नहीं हैं तथा मन और वाणीकी पहुँचसे परे हैं, उन परमेश्वर प्रभुकी मैं क्या स्तुति करूँगा! जो बाघम्बरधारी अथवा दिगम्बर हैं, बैलपर सवार हो त्रिशूल और पट्टिश धारण करते हैं, उन मन्द मुस्कानकी आभासे सुशोभित मुखवाले भगवान् चन्द्रशेखरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५६-६४॥
यों कहकर बाणासुर प्रतिदिन संयमपूर्वक रहकर स्तवराजसे भगवान्की स्तुति करता था और भक्तिभावसे शंकरजीके चरणोंमें मस्तक झुकाता था। मुनीश्वर दुर्वासा भी ऐसा ही करते थे ॥ ६५ ॥
मुने! वसिष्ठजीने पूर्वकालमें त्रिशूलधारी शिवके इस परम महान् अद्भुत स्तोत्रका गन्धर्वको उपदेश दिया था। जो मनुष्य भक्तिभावसे इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है। जो संयमपूर्वक हविष्य खाकर रहते हुए जगद्गुरु शंकरको प्रणाम करके एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुनता है, वह पुत्रहीन हो तो अवश्य ही पुत्र प्राप्त कर लेता है। जिसको गलित कोढ़का रोग हो या उदरमें बड़ा भारी शूल उठता हो, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुने तो अवश्य ही उस रोगसे मुक्त हो जाता है। यह बात मैंने व्यासजीके मुँहसे सुनी है। जो कैदमें पड़कर शान्ति न पाता हो, वह भी एक मासतक इस स्तोत्रको श्रवण करके अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जिसका राज्य छिन गया हो, ऐसा पुरुष यदि भक्तिपूर्वक एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। एक मासतक संयमपूर्वक इसका श्रवण करके निर्धन मनुष्य धन पा लेता है। राजयक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर जो आस्तिक पुरुष एक वर्षतक इसका श्रवण करता है, वह भगवान् शंकरके प्रसादसे निश्चय ही रोगमुक्त हो जाता है। द्विज शौनक ! जो सदा भक्तिभावसे इस स्तवराजको सुनता है उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। भारतवर्ष में उसको कभी अपने बन्धुओंसे वियोगका दुःख नहीं होता। वह अविचल एवं महान् ऐश्वर्यका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो पूर्ण संयमसे रहकर अत्यन्त भक्तिभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह यदि भार्याहीन हो तो अति विनयशील सती साध्वी सुन्दरी भार्या पाता है। जो महान् मूर्ख और खोटी बुद्धिका है, ऐसा मनुष्य यदि इस स्तोत्रको एक मासतक सुनता है तो वह गुरुके उपदेशमात्रसे बुद्धि और विद्या पाता है। जो प्रारब्ध कर्मसे दुःखी और दरिद्र मनुष्य भक्तिभावसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे निश्चय ही भगवान् शंकरकी कृपासे धन प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय इस उत्तम स्तोत्रको सुनता है, वह इस लोकमें सुख भोगता, परम दुर्लभ कीर्ति प्राप्त करता और नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें भगवान् शंकरके धामको जाता है, वहाँ श्रेष्ठ पार्षद होकर भगवान् शिवकी सेवा करता है। (अध्याय १९)
Summary of chapter 19 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
In this spiritually potent chapter, the text reveals the secret knowledge of supreme spiritual armours, including the Kṛshṇakavacha and the Śivakavacha, along with the exalted royal hymn known as Śivastavarāja. These sacred compositions, composed of transcendent Mantras and divine vibrations, bestow complete immunity against negative influences, demonic forces, mental anxieties, and physical dangers upon anyone who recites or wears them with pure faith. Lord Śiva explained that these sacred Kavachas serve as indestructible shields of divine light, purifying the subtle body, bestowing all material and spiritual opulences, and ensuring the ultimate attainment of Lord Śrī Kṛshṇa's eternal abode.