सौति कहते हैं-
नारदको इस प्रकार जाते देख ब्रह्माजी उदास हो गये और इस प्रकार बोले ।
ब्रह्माजीने कहा-
अच्छी बात है। बेटा! तुम तपस्याके लिये जाओ। अब संसारकी सृष्टि करनेसे मेरा भी क्या प्रयोजन है? मैं सर्वेश्वर श्रीकृष्णको जाननेके लिये गोलोकको जाऊँगा । सनक, सनन्दन, सनातन तथा चौथा बेटा सनत्कुमार- ये चारों वैरागी हैं ही। यति, हंसी, आरुणि, वोढु तथा पञ्चशिख– ये सब पुत्र तपस्वी हो गये। फिर संसारकी रचनासे मेरा क्या प्रयोजन? मरीचि, अङ्गिरा, भृगु, रुचि, अत्रि, कर्दम, प्रचेता, क्रतु और मनु- ये मेरे आज्ञापालक हैं। समस्त पुत्रोंमें केवल वसिष्ठ ऐसे हैं, जो सदा मेरी आज्ञाके अधीन रहते हैं। उपर्युक्त पुत्रों के सिवा अन्य सब के सब अविवेकी तथा मेरी आज्ञासे बाहर हैं। ऐसी दशामें मेरा संसारकी सृष्टिसे क्या प्रयोजन है? बेटा! सुनो। मैं तुम्हें वेदोक्त मङ्गलमय वचन सुना रहा हूँ। वह वचन परम्परा क्रमसे पालित होता आ रहा है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। समस्त विद्वान् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा रखते हैं; क्योंकि ये वेदोंमें विहित तथा विद्वानोंकी सभाओं में प्रशंसित हैं। वेदोंमें जिसका विधान है वह धर्म है और जिसका निषेध है वह अधर्म है। ब्राह्मणको चाहिये कि वह पहले सुखपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करके फिर वेदोंका अध्ययन करे । अध्ययन समाप्त होनेपर गुरुको दक्षिणा दे। इसके बाद उत्तम कुलमें उत्पन्न एवं परम विनीत स्वभाववाली कन्याके साथ विवाह करे। उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई नारी साध्वी तथा पतिसेवामें तत्पर होती है। अच्छे कुलकी स्त्री कभी उद्दण्ड नहीं हो सकती। पद्मरागमणिकी खानमें काँच कैसे पैदा हो सकता है? नारद! नीच कुलमें उत्पन्न हुई नारी ही माता-पिताके दोषसे उद्दण्ड होती है। वही दुष्टा तथा सब कर्मोंमें स्वतन्त्र होती है। बेटा ! सभी स्त्रियाँ दुष्ट नहीं होती हैं; क्योंकि वे लक्ष्मीकी कलाएँ हैं। जो अप्सराओंके अंशसे तथा नीच कुलमें उत्पन्न होती हैं, वे ही स्त्रियाँ कुलटा हुआ करती हैं। साध्वी स्त्री गुणहीन स्वामीकी सेवा एवं प्रशंसा करती है और कुलटा सद्गुणशाली पतिकी भी सेवा नहीं करती। उलटे उसकी निन्दा करती है। अतः साधुपुरुष प्रयत्नपूर्वक उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई कन्याके साथ विवाह करे। उसके गर्भसे अनेक पुत्रोंको जन्म देकर वृद्धावस्थामें तपस्याके लिये जाय। आगमें निवास करना उत्तम है, साँपके मुखमें तथा काँटेपर भी रह लेना अच्छा है, परंतु मुँहसे दुर्वचन निकालनेवाली स्त्रीके साथ निवास करना कदापि अच्छा नहीं है। वह इन अग्नि, सर्प और कण्टकसे भी अधिक दुःखदायिनी होती है। बेटा! मैंने तुम्हें वेद पढ़ाया है। अब तुम मुझे यही गुरुदक्षिणा दो कि विवाह कर लो। वत्स! तुम्हारी पूर्वजन्मकी पत्नी मालती उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई है। तुम किसी मङ्गलमय दिन और क्षणमें उसके साथ विवाह करो। वह सती तुम्हें पानेके लिये ही मनुवंशी संजयके घरमें जन्म लेकर भारतवर्ष में तपस्या कर रही है। इस समय उसका नाम रत्नमाला है। वह लक्ष्मीकी कला है। तुम उसे ग्रहण करो। भारतवर्षमें लोगोंकी तपस्याका फल व्यर्थ नहीं होता। मनुष्यको अध्ययनके पश्चात् पहले गृहस्थ होना चाहिये, फिर वानप्रस्थ तत्पश्चात् मोक्षके निमित् तपस्याका आश्रय लेना चाहिये। वेदमें यही क्रम सुना गया है। श्रुतिमें यह भी सुना गया है कि वैष्णवोंके लिये श्रीहरिकी पूजा ही तपस्या है। तुम वैष्णव हो । अतः घरमें रहो और श्रीकृष्ण-चरणोंकी अर्चना करो। बेटा ! जिसके भीतर और बाहर श्रीहरि ही विद्यमान हैं, उसे तपस्यासे क्या लेना है?जिसके बाहर और भीतर श्रीहरि नहीं हैं अर्थात् जो श्रीहरिको अपने बाहर और भीतर व्याप्त नहीं देखता, उसे भी व्यर्थकी तपस्यासे क्या लेना-देना है? तपस्याके द्वारा श्रीहरिकी ही आराधना की जाती है, दूसरा कोई आराध्य नहीं है। बेटा! जहाँ-तहाँ कहीं भी रहकर की हुई श्रीकृष्णकी सेवा सर्वोत्तम तप है। अतः तुम मेरे कहनेसे ही घरमें रहकर श्रीहरिका भजन करो। मुनिश्रेष्ठ! गृहस्थ बनो; क्योंकि गृहस्थोंको सदा ही सुख मिलता है। पत्नीके परिग्रहका प्रयोजन है पुत्रकी प्राप्ति; क्योंकि पुत्र सैकड़ों प्राणवल्लभा पत्नियोंसे भी अधिक प्रिय होता है। पुत्रसे बढ़कर कोई बन्धु नहीं है तथा पुत्रसे बढ़कर कोई प्रिय नहीं है। सबसे जीतनेकी इच्छा करे एकमात्र पुत्रसे ही पराजयकी कामना करे। कोई भी प्रिय पदार्थ अपने लिये नहीं (पुत्रके लिये) रखा जाता है; इसलिये भी पुत्र प्रिय होता है। अतः प्रियतम पुत्रको अपना श्रेष्ठ धन सौंप देना चाहिये। शौनक ! ऐसा कहकर ब्रह्माजी चुप हो गये। तब ज्ञानिशिरोमणि नारदने पितासे यह बात कही।
नारदजी बोले-
तात! जो स्वयं सब कुछ जानकर अपने पुत्रको कुमार्गमें लगाता है, वह पिता दयालु कैसे माना जा सकता है ? ब्रह्मन् ! ? सारा संसार पानीके बुलबुलेके समान नश्वर है। जैसे जलकी रेखा मिथ्या होती है, उसी प्रकार तीनों लोक मिथ्या हैं। जिसका मन श्रीहरिकी दासता छोड़कर विषयके लिये चञ्चल रहता है, उसका दुर्लभ मानव तन व्यर्थ हो गया। भवसागरमें कौन किसकी प्रिया है और कौन किसका पुत्र या बन्धु है? कर्ममयी तरङ्गों के उठनेसे इन सबका संयोग हो जाता है और उन तरङ्गोंके शान्त होनेपर ये एक-दूसरेसे बिछुड़ जाते हैं। जो सत्कर्म करवाता है, वही मित्र है, वही पिता और गुरु है। जो दुर्बुद्धि उत्पन्न करता
है, वह तो शत्रु है। उसे पिता कैसे कहा जा सकता है? तात! इस प्रकार मैंने शास्त्रके अनुसार वेदका बीज ( सारतत्त्व) बताया। यद्यपि यह ध्रुव सत्य है, तथापि मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। भगवन्! पहले मैं नर नारायणके आश्रमपर जाऊँगा। वहाँ नारायणकी वार्ता सुननेके पश्चात् पत्नी परिग्रह करूँगा।
ऐसा कहकर नारदमुनि पिताके सामने चुप हो रहे, उसी क्षण उनके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। पिताके सामने क्षणभर खड़े रहकर मुनिवर नारदने फिर यह मङ्गलदायक वचन कहा।
श्रीनारद बोले –
पिताजी ! पहले मुझे - कृष्णमन्त्रका उपदेश दीजिये, जो मेरे मनको अभीष्ट है। श्रीकृष्णमन्त्र सम्बन्धी जो ज्ञान है तथा जिसमें उनके गुणोंका वर्णन है, वह सब भी मुझे बताइये। इसके बाद आपकी प्रसन्नताके लिये मैं दार संग्रह करूँगा; क्योंकि मनकी इच्छा पूर्ण हो जानेपर ही मनुष्यको कोई काम करनेमें सुख मिलता है।
नारदकी यह बात सुनकर ज्ञानवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कमलजन्मा ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और अपने पुत्रसे फिर इस प्रकार बोले।
ब्रह्माजीने कहा-
वत्स! भगवान् शंकर तुम्हारे पूर्वजन्मके गुरु हैं और हमारे भी पुरातन गुरु हैं। अतः तुम उन्हीं ज्ञानियोंके गुरु कल्याणदाता शान्तस्वरूप शिवके पास जाओ। वहीं उन पुरातन गुरुसे भगवन्मन्त्रका ज्ञान प्राप्त करके नारायणकी कथा वार्ता सुनो और शीघ्र ही मेरे घर लौट आओ। शौनक ! ऐसा कहकर तीनों लोकोंका धारण-पोषण करनेवाले ब्रह्माजी चुप हो गये और नारदमुनि पिताको भक्तिभावसे प्रणाम करके शिवलोकको चले गये। (अध्याय २४)
Summary of chapter 23 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
Filled with intense spiritual longing to deepen his absorption in the Supreme Lord Śrī Kṛshṇa, Maharshi Nārada approached his father Lord Brahmā with folded hands and deep filial respect. He humbly requested permission to renounce all worldly involvement and depart for the sacred solitude of holy mountain hermitages to perform severe Tapas and uninterrupted meditation. Lord Brahmā, beholding his son's exalted state of detachment and supreme devotion, blessed him with great joy, commending his unwavering desire to seek the ultimate truth and encouraging him to gather wisdom from the highest spiritual masters across the universe.