सौति कहते हैं-
तदनन्तर सावित्रीने चार मनोहर वेदोंको प्रकट किया। साथ ही न्याय और व्याकरण आदि नाना प्रकारके शास्त्र समूह तथा परम मनोहर एवं दिव्य छत्तीस रागिनियाँ उत्पन्न कीं। नाना प्रकारके तालोंसे युक्त छः सुन्दर राग प्रकट किये। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलहप्रिय कलियुग; वर्ष, मास, ऋतु, तिथि, दण्ड, क्षण आदि; दिन, रात्रि, वार, संध्या, उषा, पुष्टि, मेधा, विजया, जया, छः कृत्तिका, योग, करण, देवसेना-जो कार्तिकेयप्रिया सती महाषष्ठी देवसेना- जो मातृकाओंमें प्रधान और बालकोंकी इष्ट देवी हैं, इन सबको भी सावित्रीने ही उत्पन्न किया। ब्राह्म, पाद्म और वाराह—ये तीन कल्प माने गये हैं। नित्य, नैमित्तिक, द्विपरार्ध और प्राकृत- ये चार प्रकारके प्रलय हैं। इन कल्पों और प्रलयोंको तथा काल, मृत्युकन्या एवं समस्त व्याधिगणोंको उत्पन्न करके सावित्रीने उन्हें अपना स्तन पान कराया।
तदनन्तर ब्रह्माजीके पृष्ठदेशसे अधर्म उत्पन्न हुआ। अधर्मके वामपार्श्वसे अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, जो उसकी पत्नी थी। ब्रह्माजीके नाभिदेशसे शिल्पियोंके गुरु विश्वकर्मा हुए। साथ ही आठ महावसुओंकी उत्पत्ति हुई, जो महान् बल - पराक्रमसे सम्पन्न थे। तत्पश्चात् विधाताके मनसे चार कुमार आविर्भूत हुए, जो पाँच वर्षकी अवस्थाके से जान पड़ते थे और ब्रह्मतेजसे - प्रज्वलित हो रहे थे। उनमेंसे प्रथम तो सनक थे, दूसरेका नाम सनन्दन था, तीसरे सनातन और चौथे ज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार थे। इसके बाद ब्रह्माजीके मुखसे सुवर्णके समान कान्तिमान् कुमार उत्पन्न हुआ, जो दिव्यरूपधारी था। उसके साथ उसकी पत्नी भी थी। वह श्रीमान् एवं सुन्दर युवक था। क्षत्रियोंका बीजस्वरूप था। उसका नाम था स्वायम्भुव मनु । जो स्त्री थी, उसका नाम शतरूपा था। वह बड़ी रूपवती थी और लक्ष्मीकी कलास्वरूपा थी। पत्नीसहित मनु विधाताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उद्यत रहते थे। स्वयं विधाताने हर्षभरे पुत्रोंसे, जो बड़े भगवद्भक्त थे, सृष्टि करनेके लिये कहा। परंतु वे श्रीकृष्णपरायण होनेके कारण 'नहीं' करके तपस्या करनेके लिये चले गये। इससे जगत्पति विधाताको बड़ा क्रोध हुआ। कोपासक्त ब्रह्मा ब्रह्मतेजसे जलने लगे। प्रभो! इसी समय उनके ललाटसे ग्यारह रुद्र प्रकट हुए। उन्होंमेंसे एकको संहारकारी 'कालाग्नि रुद्र' कहा गया है। समस्त लोकोंमें केवल वे ही तामस या तमोगुणी माने गये हैं। स्वयं ब्रह्मा राजस हैं और शिव तथा विष्णु सात्त्विक कहे गये हैं। गोलोकनाथ श्रीकृष्ण निर्गुण हैं; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे हैं। जो परम अज्ञानी और मूर्ख हैं, वे ही शिवको तामस (तमोगुणी) कहते हैं। वे शुद्ध, सत्त्वस्वरूप, निर्मल तथा वैष्णवोंमें अग्रगण्य हैं। अब रुद्रोंके वेदोक्त नाम सुनो-महान् महात्मा, मतिमान्, भीषण, भयंकर, ऋतुध्वज, ऊर्ध्वकेश, पिङ्गलाक्ष, रुचि, शुचि तथा कालाग्नि रुद्र । ब्रह्माजीके दायें कानसे पुलस्त्य, बायें कानसे पुलह, दाहिने नेत्रसे अत्रि, वामनेत्रसे ऋतु नासिकाछिद्रसे अरणि, मुखसे अङ्गिरा एवं रुचि, वामपार्श्वसे भृगु, दक्षिणपार्श्वसे दक्ष, छायासे कर्दम, नाभिसे पञ्चशिख, वक्षःस्थलसे वोढु, कण्ठदेशसे नारद, स्कन्धदेशसे मरीचि, गलेसे अपान्तरतमा, रसनासे वसिष्ठ, अधरोष्ठसे प्रचेता, वामकुक्षिसे हंस और दक्षिणकुक्षिसे यति प्रकट हुए। विधाताने अपने इन पुत्रोंको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। पिताकी बात सुनकर नारदने उनसे कहा।
नारद बोले-
जगत्पते! पितामह ! पहले सनक, सनन्दन आदि ज्येष्ठ पुत्रोंको बुलाइये और उनका विवाह कीजिये। तत्पश्चात् हम लोगोंसे ऐसा करनेके लिये कहिये। जब पिताजी !आपने उन्हें तपस्यामें लगाया है, तब हमें ही क्यों संसार बन्धनमें डाल रहे हैं? अहो ! कितने खेदकी बात है कि प्रभुकी बुद्धि विपरीत भावको प्राप्त हो रही है। भगवन्! आपने किसी पुत्रको तो अमृतसे भी बढ़कर तपस्याका कार्य दिया है और किसीको आप विषसे भी अधिक विषम विषय भोग दे रहे हैं। पिताजी! जो अत्यन्त निम्न कोटिके भयानक भवसागरमें गिरता है, उसका करोड़ों कल्प बीतनेपर भी उद्धार नहीं होता। भगवान् पुरुषोत्तम ही सबके आदिकारण तथा निस्तारके बीज हैं। वे ही सब कुछ देनेवाले, भक्ति प्रदान करनेवाले, दास्यसुख देनेवाले, सत्य तथा कृपामय हैं। वे ही भक्तोंको एकमात्र शरण देनेवाले, भक्तवत्सल और स्वच्छ हैं। भक्तों के प्रिय, रक्षक और उनपर अनुग्रह करनेवाले भी वे ही हैं। भक्तोंके आराध्य तथा प्राप्य उन परमेश्वर श्रीकृष्णको छोड़कर कौन मूढ विनाशकारी विषयमें मन लगायेगा? अमृतसे भी अधिक प्रिय श्रीकृष्ण सेवा छोड़कर कौन मूर्ख विषय नामक विषम विषका भक्षण (आस्वादन) करेगा ? विषय तो स्वप्रके समान नश्वर, तुच्छ, मिथ्या तथा विनाशकारी है। (निस्तारबीजं सर्वेषां बीजं च पुरुषोत्तमम्। सर्वदं भक्तिदं दास्यप्रदं सत्यं कृपामयम् ॥
भक्तैकशरणं भक्तवत्सलं स्वच्छमेव च । भक्तप्रियं भक्तनाथ भक्तानुग्रहकारकम् ॥
भक्ताराध्यं भक्तसाध्यं विहाय परमेश्वरम् । मनो दधाति को मूढो विषये नाशकारणे ॥
विहाय कृष्णसेवां च पीयूषादधिकां प्रियाम् । को मूढो विषमश्राति विषमं विषयाभिधम् ॥
स्वप्रवन्नश्वरं तुच्छमसत्यं नाशकारणम् (ब्रह्मखण्ड ८ ३३-३६)
तात! जैसे दीपशिखाका अग्रभाग पतङ्गोंको बड़ा मनोहर प्रतीत होता है, जैसे बंसीमें गुँथा हुआ मांस मछलियोंको आपाततः सुखद जान पड़ता है, उसी प्रकार विषयी पुरुषोंको विषयमें सुखकी प्रतीति होती है; परंतु वास्तवमें वह मृत्युका कारण है। ( यथा दीपशिखाग्रं च कीटानां सुमनोहरम् ॥
यथा वडिशमांसं च मत्स्यापातसुखप्रदम् । तथा विषयिणां तात विषयं मृत्युकारणम् ॥ (ब्रह्मखण्ड ८ । ३७-३८))
ब्रह्माजीके सामने वहाँ ऐसी बात कहकर नारदजी चुप हो गये। वे अग्निशिखाके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। पिताको प्रणाम करके चुपचाप खड़े रहे। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजी रोषसे आगबबूला हो उठे। उनका मुँह लाल हो गया। ओठ फड़कने लगे और सारा अङ्ग थर थर काँपने लगा ब्रह्मन्! वे पुत्रको शाप देते हुए बोले ।
ब्रह्माजीने कहा-
नारद! मेरे शापसे तुम्हारे ज्ञानका लोप हो जायगा। तुम कामिनियोंके क्रीडामृग बन जाओगे। उनके वशीभूत होओगे, तुम पचास कामिनियोंके पति बनो शृङ्गार शास्त्रके ज्ञाता, शृङ्गार रसास्वादनके लिये अत्यन्त लोलुप तथा नाना प्रकारके शृङ्गारमें निपुण लोगोंके गुरुके भी गुरु हो जाओगे। गन्धर्वोमें श्रेष्ठ पुरुष होओगे। सुमधुरस्वरसे युक्त उत्तम गायक बनोगे। वीणा वादन संदर्भ में पारंगत तथा - सुस्थिर यौवनसे युक्त होओगे विद्वान्, मधुरभाषी, शान्त, सुशील, सुन्दर और सुबुद्धि होओगे, इसमें संशय नहीं है। उस समय 'उपबर्हण' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि होगी। उन कामिनियोंके साथ युगोंतक निर्जन वनमें विहार करके फिर मेरे शापसे दासीपुत्र होओगे। बेटा! तदनन्तर वैष्णवोंके संसर्गसे और उनकी जूँठन खानेसे तुम पुनः श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त करके मेरे पुत्ररूपमें प्रतिष्ठित हो जाओगे। उस समय मैं पुनः तुम्हें दिव्य एवं पुरातन ज्ञान प्रदान करूँगा। इस समय मेरी आँखसे ओझल हो जाओ और अवश्य ही नीचे गिरो । ब्रह्मन्! पुत्रसे ऐसा कहकर जगत्पति ब्रह्मा चुप हो गये और नारदजी रोने लगे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पितासे कहा।
नारद बोले-
तात! तात! जगद्गुरो! आप अपने क्रोधको रोकिये। आप स्रष्टा हैं तपस्वियोंके स्वामी हैं। अहो! मुझपर आपका यह क्रोध अकारण ही हुआ है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह कुमार्गगामी पुत्रको शाप दे अथवा उसका त्याग कर दे। आप पण्डित होकर अपने तपस्वी पुत्रको शाप देना कैसे उचित मानते हैं? ब्रह्मन् ! जिन-जिन योनियोंमें मेरा जन्म हो भगवान्की भक्ति मुझे कदापि न छोड़े, ऐसा वर प्रदान कीजिये। जगत्स्स्रष्टाका ही पुत्र क्यों न हो, यदि भगवान् श्रीहरिके चरणों में उसकी भक्ति नहीं है। तो वह भारतभूमिमें सूअरसे भी बढ़कर अधम है जो अपने पूर्वजन्मका स्मरण रखते हुए श्रीहरिकी भक्तिसे युक्त होता है, वह सूअरकी योनियोंमें जन्म ले तो भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उस भजनरूपी कर्मसे वह गोलोकमें चला जाता है। जो गोविन्दके चरणारविन्दोंकी भक्तिरूप मनोवाञ्छित मकरन्दका पान करते रहते हैं, उन वैष्णव आदिके स्पर्शसे सारी पृथ्वी पवित्र हो जाती है। पितामह ! पापी लोग स्नान करके तीर्थोंको जो पाप दे देते हैं, अपने उन पापोंका भी प्रक्षालन करनेके लिये सब तीर्थ वैष्णव महात्माओंका स्पर्श प्राप्त करना चाहते हैं। (जातिस्मरो हरेर्भक्तियुक्तः शूकरयोनिषु । जनिर्लभेत् स प्रसवी गोलोकं याति कर्मणा ॥
गोविन्दचरणाम्भोजभक्तिमाध्वीकमीप्सितम् । पिबतां वैष्णवादीनां स्पर्शपूता वसुन्धरा ॥
तीर्थानि स्पर्शमिच्छन्ति वैष्णवानां पितामह ।पापानां पापिदत्तानां क्षालनायात्मनामपि ॥ ((ब्रह्मखण्ड ८ । ६१)) स किं गुरुः स किं तातः स किं स्वामी स किं सुतः यः श्रीकृष्णपदाम्भोजे भक्तिं दातुमनीश्वरः ॥ (ब्रह्मखण्ड ८। ५४-५६))
अहो! भारतवर्षमें श्रीहरिके मन्त्रका उपदेश देने और लेनेमात्रसे कितने ही मनुष्य अपने करोड़ों पूर्वजोंके साथ मुक्त हो गये हैं। मन्त्र ग्रहण करनेमात्रसे मनुष्य करोड़ों जन्मोंके पापसे मुक्त एवं शुद्ध हो जाते हैं और पहलेके कर्मको समूल नष्ट कर देते हैं। जो गुरुपुत्रों, पत्नियों, शिष्यों, सेवकों और भाई-बन्धुओंको उपदेश दे उन्हें सन्मार्गका दर्शन कराता है, उसे निश्चय ही उत्तम गति प्राप्त होती है। परंतु जो गुरु शिष्योंका विश्वासपात्र होकर उन्हें असन्मार्गका दर्शन कराता है- कुमार्गपर चलनेके लिये प्रेरित करता है, वह तबतक कुम्भीपाक नरकमें निवास करता है, जबतक सूर्य और चन्द्रमाका अस्तित्व रहता है। वह कैसा गुरु, कैसा पिता, कैसा स्वामी और कैसा पुत्र है,जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी भक्ति देनेमें समर्थ न हो। चतुरानन! आपने बिना किसी अपराधके ही मुझे शाप दे दिया है। अतः बदलेमें मैं भी शाप दूँ तो अनुचित न होगा; मेरे शापसे सम्पूर्ण लोकोंमें कवच, स्तोत्र और पूजासहित आपके मन्त्रका निश्चय ही लोप हो जाय। पिताजी! जबतक तीन कल्प न बीत जायँ, तबतक तीनों लोकोंमें आप अपूज्य बने रहें। तीन कल्प बीत जानेपर आप पूजनीयोंके भी पूजनीय होंगे। सुव्रत! इस समय आपका यज्ञभाग बंद हो जाय। व्रत आदिमें भी आपका पूजन न हो। केवल एक ही बात रहे- आप देवता आदिके वन्दनीय बने रहें ।
पिताके सामने ऐसा कहकर नारदजी चुप हो गये और ब्रह्माजी संतप्त हृदयसे सभामें सुस्थिर भावसे बैठे रहे। शौनकजी! पिताके दिये हुए उस शापके ही कारण नारदजी उपबर्हण नामक गन्धर्व तथा दासीपुत्र हुए। तदनन्तर पितासे ज्ञान प्राप्त करके वे फिर महर्षि नारद हो गये। इस प्रसंगका अभी मैं आगे चलकर वर्णन करूँगा। (अध्याय ८)
Summary of chapter 8 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
Continuing his sacred task of populating the cosmos with wisdom and life, Lord Brahmā brought forth from his four sacred mouths the four holy Vedas, the Vedāṅgas, the sacred Mantras, and the personified codes of righteous living. He then created from his divine mind the progenitors of mankind, including the Manus, Maharshi Daksha, and his spiritual son Maharshi Nārada. However, when Lord Brahmā commanded Maharshi Nārada to enter worldly family life and assist in procreating populations, Maharshi Nārada respectfully declined, declaring his unwavering resolve to remain a lifelong celibate focused exclusively on the loving service of Lord Śrī Kṛshṇa. This refusal sparked intense anger in Lord Brahmā, leading to a dramatic exchange of mutual curses wherein Lord Brahmā cursed Maharshi Nārada to become a wandering Gandharva immersed in worldly passion, while Maharshi Nārada cursed Lord Brahmā to lose widespread ritual worship among human beings on earth.