सौति कहते हैं-
विप्रवर शौनक ! तदनन्तर ब्रह्माजीने अपने पुत्रोंको सृष्टि करनेकी आज्ञा दी। नारदको छोड़कर शेष सभी पुत्र सृष्टिके कार्य में संलग्न हो गये। मरीचिके मनसे प्रजापति कश्यपका प्रादुर्भाव हुआ। अत्रिके नेत्रमलसे क्षीरसागर में चन्द्रमा प्रकट हुए। प्रचेताके मनसे भी गौतमका प्राकट्य हुआ। मैत्रावरुण पुलस्त्यके मानस पुत्र हैं। मनुसे शतरूपाके गर्भसे तीन कन्याओंका जन्म हुआ- आकूति, देवहूति और प्रसूति । वे तीनों ही पतिव्रता थीं। मनु शतरूपासे दो मनोहर पुत्र भी हुए, जिनके नाम थे- प्रियव्रत और उत्तानपाद उत्तानपादके पुत्र ध्रुव हुए, जो बड़े धर्मात्मा थे। मनुने अपनी पुत्री आकूतिका विवाह प्रजापति रुचिके साथ तथा प्रसूतिका विवाह दक्षके साथ कर दिया। इसी तरह देवहूतिका विवाह सम्बन्ध उन्होंने कर्दममुनिके साथ किया, जिनके पुत्र साक्षात् भगवान् कपिल हैं। दक्षके वीर्य और प्रसूतिके गर्भसे साठ कन्याओंका जन्म हुआ। उनमेंसे आठ कन्याओंका विवाह दक्षने धर्मके साथ किया, ग्यारह कन्याओंको ग्यारह रुद्रोंके हाथमें दे दिया। एक कन्या सती भगवान् शिवको सौंप दी। तेरह कन्याएँ कश्यपको दे दीं तथा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको अर्पित कर दीं।
विप्रवर! अब मुझसे धर्मकी पत्नियोंके नाम सुनिये- शान्ति, पुष्टि, धृति, तुष्टि, क्षमा, श्रद्धा, मति और स्मृति शान्तिका पुत्र संतोष और पुष्टिका पुत्र महान् हुआ धृतिसे धैर्यका जन्म हुआ। तुष्टिसे दो पुत्र हुए- हर्ष और दर्प क्षमाका पुत्र सहिष्णु था और श्रद्धाका पुत्र धार्मिक मतिसे ज्ञान नामक पुत्र हुआ और स्मृतिसे महान् जातिस्मरका जन्म हुआ। धर्मकी जो पहली पत्नी मूर्ति थी,उससे नर नारायण नामक दो ऋषि उत्पन्न हुए।
शौनकजी! धर्मके ये सभी पुत्र बड़े धर्मात्मा हुए। अब आप सावधान होकर रुद्रपत्नियोंके नाम सुनिये कला, कलावती, काष्ठा, कालिका, कलहप्रिया, कन्दली, भीषणा, रास्ना, प्रमोचा, भूषणा और शुकी। इन सबके बहुत से पुत्र हुए, जो भगवान् शिवके पार्षद हैं। दक्षपुत्री सतीने यज्ञमें अपने स्वामीकी निन्दा होनेपर शरीरको त्याग दिया और पुनः हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें अवतीर्ण हो भगवान् शंकरको ही पतिरूपमें प्राप्त किया धर्मात्मन्! अब कश्यपकी पत्नियों के नाम सुनिये। देवमाता अदिति, दैत्यमाता दिति, सर्पमाता कद्रू, पक्षियोंकी जननी विनता, गौओं और भैंसोंकी माता सुरभि, सारमेय (कुत्ते) आदि जन्तुओंकी माता सरमा, दानवजननी दनु तथा अन्य पत्नियाँ भी इसी तरह अन्यान्य संतानों की जननी हैं। मुने! इन्द्र आदि बारह आदित्य तथा उपेन्द्र (वामन) आदि देवता अदितिके पुत्र कहे गये हैं, जो महान् बल पराक्रमसे सम्पन्न हैं। ब्रह्मन् ! इन्द्रका पुत्र जयन्त हुआ, जिसका जन्म शचीके गर्भसे हुआ था। आदित्य (सूर्य) की पत्नी तथा विश्वकर्माकी पुत्री सवर्णाके गर्भ से शनैश्चर और यम नामक दो पुत्र तथा कालिन्दी नामवाली एक कन्या हुई उपेन्द्रके वीर्य और पृथ्वीके गर्भसे मङ्गल नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। तदनन्तर भगवान् उपेन्द्रके अंश और धरणीके गर्भसे मङ्गलके जन्मका प्रसंग सुनाकर सौति बोले- मङ्गलकी पत्नी मेधा हुई, जिसके पुत्र महान् घंटेश्वर तथा विष्णुतुल्य तेजस्वी व्रणदाता हुए। दितिसे महाबली हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक पुत्र तथा सिंहिका नामवाली कन्याका जन्म हुआ। सैंहिकेय (राहु) सिंहिकाका ही पुत्र है। सिंहिकाका दूसरा नाम निरृति भी था। इसीलिये राहुको नैर्ऋत कहते हैं। हिरण्याक्षको कोई संतान नहीं थी। वह युवावस्थामें ही भगवान् वाराहके हाथों मारा गया। हिरण्यकशिपुके पुत्र प्रह्लाद हुए, जो वैष्णवों में अग्रगण्य माने गये हैं। उनके पुत्र विरोचन हुए और विरोचनके पुत्र साक्षात् राजा बलि । बलिका पुत्र बाणासुर हुआ, जो महान् योगी, ज्ञानी तथा भगवान् शंकरका सेवक था। यहाँतक दितिका वंश बताया गया । अब कद्रूके वंशका परिचय सुनिये। अनन्त, वासुकि, कालिय, धनञ्जय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु, शंख, संवरण, धृतराष्ट्र, दुर्धर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकामुख तथा विरूप आदिको कद्रूने जन्म दिया था। शौनकजी! जितनी सर्प-जातियाँ हैं, उन सबमें प्रधान ये ही हैं। लक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई मनसादेवी कद्रूकी कन्या हैं। ये तपस्विनी स्त्रियों में श्रेष्ठ, कल्याणस्वरूपा और महातेजस्विनी हैं। इन्हींका दूसरा नाम जरत्कारु है। इन्हींके पति मुनिवर जरत्कारु थे, जो नारायणकी कलासे प्रकट हुए थे। विष्णुतुल्य तेजस्वी आस्तीक इन्हीं मनसादेवीके पुत्र हैं। इन सबके नाममात्र से मनुष्योंका नागोंसे भय दूर हो जाता है। यहाँतक कद्रूके वंशका परिचय दिया गया। अब विनताके वंशका वर्णन सुनिये।
विनताके दो पुत्र हुए- अरुण और गरुड। दोनों ही विष्णु तुल्य पराक्रमी थे। उन्हीं दोनोंसे क्रमशः सारी पक्षी - जातियाँ प्रकट हुईं। गाय, बैल और भैंसे—ये सुरभिकी श्रेष्ठ संतानें हैं। समस्त सारमेय (कुत्ते) सरमाके वंशज हैं। दनुके वंश में दानव हुए तथा अन्य स्त्रियोंके वंशज अन्यान्य जातियाँ। यहाँतक कश्यप-वंशका वर्णन किया गया। अब चन्द्रमाका आख्यान सुनिये।
पहले चन्द्रमाकी पत्नियोंके नामोंपर ध्यान दीजिये। फिर पुराणों में जो उनका अत्यन्त अपूर्व पुरातन चरित्र है, उसको श्रवण कीजिये। अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पूजनीया साध्वी पुनर्वसु, पुष्या, आश्लेषा, मघा, पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, हस्ता, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवणा, धनिष्ठा, शुभा शतभिषा, पूर्वभाद्रपदा, उत्तरभाद्रपदा तथा रेवती- ये सत्ताईस चन्द्रमाकी पत्नियाँ हैं। इनमें रोहिणीके प्रति चन्द्रमाका विशेष । आकर्षण होनेके कारण चन्द्रमाने अन्य सब पत्नियोंकी बड़ी अवहेलना की। तब उन सबने जाकर पिता दक्षको अपना दुःख सुनाया। दक्षने चन्द्रमाको क्षय रोगसे ग्रस्त होनेका शाप दे दिया। चन्द्रमाने दुःखी होकर भगवान् शंकरकी शरण ली और शंकरने उन्हें आश्रय देकर अपने मस्तकमें स्थान दिया। तबसे उनका नाम 'चन्द्रशेखर' हो गया। देवताओं तथा अन्य लोगोंमें शिवसे बढ़कर शरणागतपालक दूसरा कोई नहीं है।
अपने पतिके रोगमुक्त और शिवके मस्तकमें स्थित होनेकी बात सुनकर दक्षकन्याएँ बारंबार रोने लगीं और तेजस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ पिता दक्षकी शरणमें आयीं। वहाँ जाकर अपने अङ्गोंको बारंबार पीटती हुई वे उच्चस्वरसे रोने लगीं तथा दीनानाथ ब्रह्मपुत्र दक्षसे दीनतापूर्वक कातर वाणीमें बोलीं।
दक्षकन्याओंने कहा-
पिताजी! हमें स्वामीका सौभाग्य प्राप्त हो, इसी उद्देश्यको लेकर हमने आपसे अपना दुःख निवेदन किया था। परंतु सौभाग्य तो दूर रहे, हमारे सद्गुणशाली स्वामी ही हमें छोड़कर चल दिये। तात! नेत्रोंके रहते हुए भी हमें सारा जगत् अन्धकारपूर्ण दिखायी देता है। आज यह बात समझमें आयी है कि स्त्रियोंका नेत्र वास्तवमें उनका पति ही है। पति ही स्त्रियोंकी गति है, पति ही प्राण तथा सम्पत्ति है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका हेतु तथा भवसागरका सेतु भी पति ही है। पति ही स्त्रियोंका नारायण है, पति ही उनका व्रत और सनातन धर्म है। जो पतिसे विमुख हैं, उन स्त्रियोंका सारा कर्म व्यर्थ है। समस्त तीर्थोंमें स्नान, सम्पूर्ण यज्ञोंमें दक्षिणा वितरण, सम्पूर्ण दान, पुण्यमय व्रत एवं नियम, देवार्चन, उपवास और समस्त तप- ये पतिकी चरण सेवाजनित - पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। स्त्रियोंके लिये समस्त बन्धुबान्धवोंमें अपना पुत्र ही प्रिय होता है; क्योंकि वही स्वामीका अंश है। पति सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर है। जो नीच कुलमें उत्पन्न हुई है, वही स्त्री सदा अपने स्वामीसे द्वेष रखती है। जिसका चित्त चञ्चल और दुष्ट है, वही सदा परपुरुषमें आसक्त होती है। पति रोगी, दुष्ट, पतित, निर्धन, गुणहीन, नवयुवक अथवा वृद्ध ही क्यों न हो, साध्वी स्त्रीको सदा उसीकी सेवा करनी चाहिये। कभी भी उसे त्यागना नहीं चाहिये। जो नारी गुणवान् या गुणहीन पतिसे द्वेष । रखती या उसे त्याग देती है, वह तबतक कालसूत्र नरकमें पकायी जाती है, जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता रहती है। वहाँ पक्षीके समान कीड़े रात दिन उसे खाते रहते हैं। वह भूख लगनेपर मुर्देका मांस और मज्जा खाती है तथा प्यास लगनेपर मूत्रका पान करती है। तदनन्तर कोटि सहस्र जन्मोंतक गीध, सौ जन्मोंतक - सूअर, फिर सौ जन्मोंतक शिकारी जीव और उसके बाद बन्धु हत्यारिन होती है। तत्पश्चात् पहलेके सत्कर्मके प्रभावसे यदि कभी मनुष्य जन्म पाती है तो निश्चय ही विधवा, धनहीन और रोगिणी होती है। ब्रह्मकुमार! आप हमें पतिदान दीजिये; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका पूरक होता है। आप ब्रह्माजीके समान फिरसे जगत्की सृष्टि करने में समर्थ हैं। कन्याओंका यह वचन सुनकर प्रजापति दक्ष भगवान् शंकरके समीप गये। शंकरजीने उन्हें देखते ही उठकर प्रणाम किया। शिवको प्रणाम करते देख दक्षने दुर्धर्ष क्रोधको त्याग दिया और आशीर्वाद देकर कृपानिधान शंकरसे कहा- आप चन्द्रमाको लौटा दें। शिवने शरणागत चन्द्रमाको त्याग देना स्वीकार नहीं किया, तब दक्ष उन्हें शाप देनेको तैयार हो गये। यह देख शिवने भगवान् विष्णुका स्मरण किया। विष्णु वृद्ध ब्राह्मणके वेषमें आये और शिवसे बोले- 'सुरेश्वर! आप चन्द्रमाको लौटा दें और दक्षके शापसे अपनी रक्षा करें।'
शिवने कहा-
प्रभो! मैं अपने तप, तेज, सम्पूर्ण सिद्धि, सम्पदा तथा प्राणोंको भी दे दूँगा, परंतु शरणागतका त्याग करनेमें असमर्थ हूँ। जो भयसे ही शरणागतको त्याग देता है, उसे भी धर्म त्याग देता है और अत्यन्त कठोर शाप देकर चला जाता है। जगदीश्वर! मैं सब कुछ त्याग देनेमें समर्थ हूँ, परंतु स्वधर्मका त्याग नहीं कर सकता। जो स्वधर्मसे हीन है, वह सबसे बहिष्कृत है। जो सदा धर्मकी रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। भगवन्! आप तो धर्मको जानते हैं; फिर क्यों अपनी मायासे मोहित करते हुए मुझसे ऐसी बात कहते हैं। आप सबके स्रष्टा, पालक और अन्ततोगत्वा संहारक हैं। जिसकी आपमें सुदृढ़ भक्ति है, उसे किससे भय हो सकता है।
शंकरजीकी यह बात सुनकर सबके भावको जाननेवाले भगवान् श्रीहरिने चन्द्रमासे चन्द्रमाको खींचकर दक्षको दे दिया। आधे चन्द्रमा भगवान् शिवके मस्तकपर चले गये और वहाँ रोगमुक्त होकर रहने लगे। दूसरे चन्द्रमाको प्रजापति दक्षने ग्रहण किया, जिसे भगवान् विष्णुने दिया था। उस चन्द्रमाको राजयक्ष्मा रोगसे ग्रस्त देख दक्षने माधवका स्तवन किया। तब श्रीहरिने स्वयं यह व्यवस्था की कि एक पक्षमें चन्द्रमा क्रमशः क्षीण होंगे और दूसरे पक्षमें क्रमशः पुष्ट होते हुए परिपूर्ण हो जायँगे। ब्रह्मन् ! उन सबको वर देकर श्रीहरि अपने धामको चले गये और दक्षने चन्द्रमाको लेकर उन्हें अपनी कन्याओंको सौंप दिया। चन्द्रमा उन सबको पाकर दिन- रात उनके साथ विहार करने लगे और उसी दिनसे उनको समभावसे देखने लगे। मुने! इस प्रकार मैंने यहाँ सम्पूर्ण सृष्टि क्रमका कुछ वर्णन किया है। इस प्रसङ्गको पुष्कर तीर्थमें मुनियोंकी मण्डलीके बीच गुरुजीके मुखसे मैंने सुना था। (अध्याय ९)
Summary of chapter 9 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
In order to fulfill the cosmic mandate of populating the universe after Maharshi Nārada's detachment, Maharshi Daksha produced sixty virtuous daughters through his ascetic vows and mind-born potencies. These noble daughters were given in sacred marriage to the great progenitor sages, including Maharshi Kashyapa, Maharshi Dharma, Maharshi Chandra, and Maharshi Angiras. Through these divine unions, an extraordinary variety of living entities was born into the material world, including the Devas, Asuras, Nagas, celestial musicians, birds, beasts, trees, and human beings, thereby expanding the intricate web of living entities across all continents, oceans, and subtle dimensional realms under the watchful direction of the Supreme Lord.