सौति कहते हैं -
सृष्टिकर्ता ब्रह्माने अपने सब बालकोंको सृष्टिके कार्यमें लगाकर नारदजीको भी सृष्टि करनेके लिये प्रेरित किया। उन्होंने वेद वेदाङ्गों के पारंगत विद्वान् नारदसे यह सत्य, - हितकर, वेदसारस्वरूप और परिणाममें सुख देनेवाली बात कही।
ब्रह्माजी बोले-
कुलमें श्रेष्ठ मेरे प्राणवल्लभ पुत्र नारद! आओ। तुम ज्ञानदीपकी शिखासे अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले हो। तुमसे यह बात छिपी नहीं है कि जन्मदाता पिता परम गुरु है। वह सभी वन्दनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ है । विद्यादाता और मन्त्रदाता दोनों समान हैं तथा पितासे भी बढ़कर हैं। बेटा! मैं तुम्हारा पिता, पालक, विद्यादाता एवं मन्त्रदाता भी हूँ। तुम मेरी आज्ञासे मेरी ही प्रसन्नताके लिये विवाह कर लो।
ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर मुनिवर नारदके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वे भयभीत होकर विनयपूर्वक बोले।
नारदजीने कहा-
तात! वही पिता, वही गुरु, वही बन्धु, वही पुत्र और वही मेरा ईश्वर है, जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न करा दे।
(स पिता स गुरुबन्धुः स पुत्रः स मदीश्वरः। यः श्रीकृष्णपादपद्ये दृढां भक्तिं च कारयेत् ॥ (ब्रह्मखण्ड २३ । १७)) यदि बालक अज्ञानवश कुमार्गपर चल रहे हों तो उन्हींको जो उस मार्गसे हटाता है, वही करुणानिधान पिता है। जो श्रीकृष्ण-चरणोंमें लगी हुई भक्तिका त्याग कराकर पुत्रको दूसरे किसी विषयमें लगाये, वह कैसा पिता है? स्त्रीसंग्रह केवल दुःखका ही कारण है। उससे सुख नहीं मिलता। वह तपस्या, स्वर्ग, भक्ति, मुक्ति एवं सत्कर्मोमें विघ्न उपस्थित करनेवाला है। ब्रह्मन् ! मूढ़चित्त गृहस्थोंके घरों में तीन प्रकारकी स्त्रियाँ पायी जाती हैं- साध्वी, भोग्या और कुलटा। वे सब की सब स्वार्थपरायणा होती हैं। साध्वी स्त्री परलोकके भयसे, इस लोकमें अपनेको यश मिलनेके लोभसे तथा कामासक्तिसे भी निरन्तर स्वामीकी सेवा करती है। भोग्या स्त्री भोगकी अभिलाषिणी होती है। वह सदा केवल कामासक्तिसे ही प्रियतम पतिकी सेवा करती है। भोगके सिवा और किसी हेतुसे वह क्षणभर भी सेवा नहीं करती। भोग्या स्त्री जबतक वस्त्र, आभूषण, सम्भोग तथा सुस्निग्ध एवं उत्तम आहार पाती है, तबतक ही स्वामीके वशमें रहकर प्यारी बनी रहती है। कुलटा नारी कुलमें अंगारके समान है। वह कुलका नाश करनेवाली है। कुलटा स्त्री कपटसे ही स्वामीकी सेवा करती है, भक्तिसे नहीं। वे अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये सुधाके समान मधुर वचन बोलती हैं। क्रोध होनेपर उनके मुखसे विषके समान दुःसह वचन निकलता है। यदि उनकी बातपर विश्वास किया जाय तब तो सर्वनाश ही हो जाता है। उनके अभिप्रायको समझना बहुत कठिन है। केवल उनका कर्म छिपा होता है। सर्वज्ञ! आप सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आत्माराम पुरुषोंके ईश्वर हैं। प्रभो! मुझपर अनुग्रह कीजिये और अब मुझे विदा दीजिये। आप कल्पवृक्षसे भी बढ़कर हैं। मैं आपसे श्रीकृष्ण भक्तिकी याचना करता हूँ।
ऐसा कहकर नारदजीने पिताके चरण-कमलोंको पकड़कर मङ्गलमय तपके निमित्त जानेके लिये आज्ञा माँगी। फिर दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभावसे मस्तक झुका ब्रह्माजीकी परिक्रमा एवं प्रणाम करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। (अध्याय २३)
Summary of chapter 22 of the Brahma Vaivarta Mahā Purana - Brahma Khaṇḍa is as follows:
Exceedingly pleased with Maharshi Nārada's spiritual perfection, the text provides a profound philosophical exposition on the sacred etymologies and inner spiritual meanings of the names of Lord Brahmā's mind-born sons. It illuminates how names such as Sanaka, Sanātana, Sanandan, Sanatkumāra, and Nārada are not mere worldly designations, but sacred sound vibrations that embody eternal truth, absolute knowledge, non-attachment, and the capacity to bestow divine wisdom upon humanity. Specifically, the name Nārada is defined as one who bestows the precious water of divine devotion and spiritual knowledge that quenches the burning fire of material existence.