ब्रह्म महा पुराणम - ब्रह्म खंड

7- सृष्टिका क्रम- ब्रह्माजीके द्वारा मेदिनी, पर्वत, समुद्र, द्वीप, मर्यादापर्वत, पाताल, स्वर्ग आदिका निर्माण; कृत्रिम जगत्की अनित्यता तथा वैकुण्ठ, शिवलोक तथा गोलोककी नित्यताका प्रतिपादन

सौति कहते हैं-

शौनकजी! तब भगवान्की आज्ञाके अनुसार तपस्या करके अभीष्ट सिद्धि पाकर ब्रह्माजीने सर्वप्रथम मधु और कैटभके मेदेसे मेदिनीकी सृष्टि की। उन्होंने आठ प्रधान पर्वतोंकी रचना की। वे सब बड़े मनोहर थे। उनके बनाये हुए छोटे-छोटे पर्वत तो असंख्य हैं, उनके नाम क्या बताऊँ ? मुख्य मुख्य पर्वतोंकी - नामावली सुनिये- सुमेरु, कैलास, मलय, हिमालय, उदयाचल, अस्ताचल, सुवेल और गन्धमादन- ये आठ प्रधान पर्वत हैं। फिर ब्रह्माजीने सात समुद्रों, अनेकानेक नदों और कितनी ही नदियोंकी सृष्टि की। वृक्षों, गाँवों और नगरोंका निर्माण किया। समुद्रोंके नाम सुनिये- लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दही, दूध और सुस्वादु जलके वे समुद्र हैं। उनमेंसे पहलेकी लंबाई-चौड़ाई एक लाख योजनकी है। बादवाले उत्तरोत्तर दुगुने होते गये हैं। इन समुद्रोंसे घिरे हुए सात द्वीप हैं। उनके भूमण्डल कमलपत्रकी आकृतिवाले हैं। उनमें उपद्वीप और मर्यादापर्वत भी सात-सात ही हैं। ब्रह्मन् ! अब आप उन द्वीपोंके नाम सुनिये, जिनकी पहले ब्रह्माजीने रचना की थी। वे हैं- जम्बूद्वीप, शाकद्वीप, कुशद्वीप, प्लक्षद्वीप, क्रौञ्चद्वीप, न्यग्रोध (अथवा शाल्मलि) द्वीप तथा पुष्करद्वीप भगवान् ब्रह्माने मेरुपर्वतके आ शिखरोंपर आठ लोकपालोंके विहारके लिये आठ मनोहर पुरियोंका निर्माण किया। उस पर्वतके मूलभाग- पाताललोकमें उन्होंने भगवान् अनन्त ( शेषनाग ) की नगरी बनायी। तदनन्तर लोकनाथ ब्रह्माने उस पर्वतके ऊपर ऊपर सात स्वर्गोंकी सृष्टि की शौनकजी! उन सबके नाम सुनिये-भूर्लोक, भुवर्लोक, परम मनोहर स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक । मेरुके सबसे ऊपरी शिखरपर जरा-मृत्यु आदिसे रहित ब्रह्मलोक है। उससे भी ऊपर ध्रुवलोक है, जो सब ओरसे अत्यन्त मनोहर है। जगदीश्वर ब्रह्माजीने उस पर्वतके निम्म्रभागमें सात पातालोंका निर्माण किया। मुने! वे स्वर्गकी अपेक्षा भी अधिक भोग-साधनोंसे सम्पन्न हैं और क्रमश: एकसे दूसरे उत्तरोत्तर नीचे भागमें स्थित हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं- अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, पाताल तथा रसातल । सबसे नीचे रसातल ही है। सात द्वीप, सात स्वर्ग तथा सात पाताल — इन लोकोंसहित जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, वह ब्रह्माजीके ही अधिकारमें है। शौनक ! ऐसे-ऐसे असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और महाविष्णुके रोमाञ्च विवरों में उनकी स्थिति है।

श्रीकृष्णकी मायासे प्रत्येक ब्रह्माण्डमें दिक्पाल, ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं, देवता, मनुष्य आदि सभी प्राणी स्थित हैं। इन ब्रह्माण्डोंकी गणना करनेमें न तो लोकनाथ ब्रह्मा, न शङ्कर, न धर्म और न विष्णु ही समर्थ हैं; फिर और देवता किस गिनतीमें हैं? विप्रवर! कृत्रिम विश्व तथा उसके भीतर रहनेवाली जो वस्तुएँ हैं, वे सब अनित्य तथा स्वप्नके समान नश्वर हैं। वैकुण्ठ, | शिवलोक तथा इन दोनोंसे परे जो गोलोक है, ये सब नित्य धाम हैं। इन सबकी स्थिति कृत्रिम - विश्वसे बाहर है। ठीक उसी तरह, जैसे आत्मा, आकाश और दिशाएँ कृत्रिम जगत्से बाहर तथा नित्य हैं। ( अध्याय ७)