1 - भगवान्‌ श्रीहरिकी महिमा तथा उनके सर्वेश्वरत्वका प्रतिपादन, श्रीहरिको श्रीमद्भागवत, विष्णु तथा गरुड - ये तीन पुराण विशेष प्रिय हैं, इनका निरूपण तथा गरुड पुराणका माहात्म्य

प्राचीन समयकी बात है जगतके नेत्र स्वरूप उन परमब्रह्म श्रीहरिका स्तवन करते हुए सभी शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ शौनक आदि ब्रह्मवादी ऋषिगण नैमिष नामक महापुण्य - क्षेत्रमें उत्तम तपस्यामें संलग्न थे। वे सभी जितेन्द्रिय, भूख - प्यासको जीत लेनेवाले, सत्य परायण तथा संत थे। वे विशिष्ट भक्तिके साथ समस्त संसारको ज्ञान प्रदान करनेवाले भगवान्‌ विष्णुकी निरन्तर पूजा करते थे। वहाँ कोई यज्ञोंके द्वारा यज्ञपतिकी, कोई ज्ञानके द्वारा ज्ञानात्मक परम ब्रह्मकी और कुछ ऋषिगण परम भक्तिके द्वारा नारायणकी पूजामें लगे रहते थे।

एक बारकी बात है धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष - इन चार पुरुषार्थोंकी प्राप्तिका उपाय जाननेकी इच्छासे वे महात्मागण एक स्थानपर एकत्र हुए। ऊर्ध्वरेता वे मुनिगण संख्यामें छब्बीस हजार थे एवं उनके शिष्य - प्रशिष्योंकी संख्या तो बहुत अधिक थी। संसारपर अनुग्रह करनेवाले, वीतराग एवं मात्सर्य रहित वे महा तेजस्वी मुनि आपसमें विचार करने लगे कि इस संसारमें दुःखित प्राणियोंकी भगवान्‌ हरिके प्रति अचल भक्ति कैसे हो सकेगी? और कैसे आधि देविक, आधि भौतिक तथा आध्यात्मिक सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धि हो सकेगी? उन ऋषियोंकी इस जिज्ञासाको जानकर महामुनि शौनकने हाथ जोड़ते हुए बड़े ही विनय पूर्वक उनसे कहा - शौनकजीने कहा - हे ऋषियो! पौराणिकोंमें उत्तम सूतजी महाराज इस समय पवित्र सिद्धाश्रममें विराजमान हैं। वे भगवान्‌ वेदव्यासजीके शिष्य हैं और यतियोंके ईश्वर हैं। वे आपकी जिज्ञासा विषयक सभी बातोंको जानते हैं। इसलिये उन्‍हींके पास चलकर हमलोग पूछें। शौनक मुनिके ऐसा कहनेपर वे सभी उस पुण्य सिद्धाश्रममें गये। नैमिषारण्य वासी उन ऋषियोंने सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए सूतजीसे पूछा-

ऋषियोंने कहा - हे सुव्रत! किस उपायके द्वारा भगवान्‌ विष्णुको प्रसन्‍न किया जा सकता है? और कैसे इनकी पूजा करनी चाहिये? इसे आप बतायें साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा करें कि मुक्तिका साधनभूत तत्त्व क्या है?

इसपर सूतजी महाराजने कहा - हे ऋषिगणो! भगवान्‌ विष्णु, देवी लक्ष्मी, वायु, सरस्वती, शेषनाग, गुरुश्रेष्ठ कृष्णद्वैपायन व्यासजीको नमस्कार कर मैं अपनी बुद्धिके अनुसार वर्णन करता हूँ, आप लोग उन श्रेष्ठ तत्त्व स्वरूप भगवान्‌ हरिके विषयमें सुनें।

ऋषियो! नारायणके समान न कोई है, न हुआ है और न भविष्यमें ही कोई होगा। (नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।) इस सत्य वाक्यके द्वारा आप सभीके प्रयोजनको सिद्ध कर रहा हूँ।

शौनकजीने पूछा - हे मुनिश्रेष्ठ! सर्वप्रथम भगवान्‌ विष्णुको क्यों नमस्कार करना चाहिये? हे विद्वन्‌! हे सुव्रत! यह आप बतानेकी कृपा करें।

सूतजी बोले - हे शौनक! सभी वेदोंके द्वारा एकमात्र वेद्य -जानने योग्य वे हरि ही हैं, वेदादि शास्त्रों तथा इतिहास एवं पुराणोंमें उन्हींकी महिमा गायी गयी है, इसलिये वे विष्णु सर्वप्रथम वन्दनीय हैं, वे विष्णु ही सबमें ज्ञानरूपसे प्रकाशित हैं। इसलिये हरि प्रणामके योग्य हैं। वे सभीमें प्रधान हैं और सबसे बढ़कर हैं, इसलिये भी वे हरि सर्वप्रथम नमस्कार करने योग्य हैं।

भगवान्‌ विष्णुके समान न कोई देवता है और न वायुके समान कोई गुरु। विष्णुपदीके समान कोई तीर्थ नहीं है और विष्णु भक्तके समान कोई भक्त नहीं है।

कलियुगमें सभी पुराणोंमें तीन पुराण भगवान्‌ हरिको प्रिय और मुख्य हैं। उनमें भी कलिकालमें मनुष्योंका कल्याण करनेवाला श्री मद्भागवत महापुराण मुख्य पुराण है। इसमें जिनसे सर्वप्रथम सृष्टि हुई है उन श्रीहरिका प्रतिपादन हुआ है, इसीलिये यह भागवत पुराण श्रेष्ठ माना गया है। इस पुराणमें भगवान्‌ विष्णुसे ही ब्रह्मा और महेश आदिकी सृष्टि बतायी गयी है, हे विप्र! इसी प्रकार इसमें अनेक प्रकारके अर्थोंका तथा तत्त्व ज्ञानका निरूपण हुआ है, इन्हीं सब विशेषताओंके कारण यह भागवत श्रेष्ठतम पुराण माना गया है। इसी प्रकार विष्णु पुराण तथा गरुड पुराणको श्रेष्ठ कहा गया है। कलियुगमें ये तीन पुराण मनुष्यके लिये प्रधान बताये गये हैं। उनमें भी गरुड पुराणकी विशेषता कुछ अधिक ही है।

यह गरुड पुराण तीन अंशोंमें विभक्त है। इसके प्रथम अंशको कर्म काण्ड, द्वितीय अंशको धर्म काण्ड और तृतीय अंशको ब्रह्मकाण्ड कहा जाता है । उन तीनों काण्डोंमें भी अन्तिम यह ब्रह्म काण्ड श्रेष्ठ है।

हे विप्रो! इस तृतीयांश अर्थात्‌ ब्रह्म काण्डके श्रवणसे जो पुण्य होता है उसे भागवत - श्रवणके समान पुण्य फलवाला कहा गया है। इतना ही नहीं इस ब्रह्म खण्डके पारायणसे वेदपाठके समान फल प्राप्त होता है। इसमें संदेह नहीं है। हे विप्रगणो! इसके पाठ करनेका जो फल कहा गया है वह केवल श्रवण करनेसे भी मिल जाता है। भगवान्‌ हरिने ही व्यास रूपमें अवतरित होकर भागवत, विष्णु, गरुड आदि पुराणोंकी रचना की है। विष्णु - धर्मका प्रतिपादन करनेमें गरुड पुराणके समान कोई भी पूराण नहीं है।

(गारुडैन समं नास्ति विष्णुधर्मप्रदर्शने॥)

जैसे देवोंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं, आयुधोंमें सुदर्शन श्रेष्ठ है, यज्ञोंमें अश्वमेध श्रेष्ठ है, नदियोंमें गङ्गा श्रेष्ठ हैं, जलजोंमें कमल श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें यह गरुड पुराण हरिके तत्त्व निरूपणमें मुख्य कहा गया है। गरुड पुराणमें हरि ही प्रतिपाद्य हैं, इसलिये हरि ही नमस्कार करने योग्य हैं और हरि ही शरण्य हैं तथा वे हरि ही सब प्रकारसे सेवा करने योग्य हैं।

(गारुडाख्यपुराणे तु प्रतिपाद्यो हरि: स्मृत:।

अतो हरिर्नमस्कार्यो गम्यो योग्यों हरिं: स्मृत:॥)