गरुड महा पुराणम् - ब्रह्म खंड
15 - 17 - परमात्मा हरि तथा देवी महालक्ष्मीके विभिन्न अवतारोंका वर्णन
हे पक्षिश्रेष्ठ! हरि पूर्णानन्द स्वरूप हैं। उनके समान किसी भी देश अथवा कालमें कोई नहीं है। उन्हीं हरिने लोक कल्याणके लिये सम्पूर्ण सद्गुणोंके सागरके रूपमें अवतार ग्रहण किया। वे ही विष्णु समस्त अवतारोंके बीजभूत हैं, वे ही वासुदेव कहलाते हैं, वे वासुदेव ही संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्धके रूपमें प्रकट हुए। उन्हीं विष्णुने स्थूल देहसे ब्रह्मादि देवोंकी सृष्टि की। उन्हीं विष्णुने सनत्कुमार आदिके रूपमें शरीर धारण किया और तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा इन्द्रिय निग्रहकी शिक्षा दी। उन्होंने ही पृथ्वीके तथा दैत्यराज हिरण्याक्षके उद्धार हेतु एवं भूमिकी स्थापना और सज्जनोंकी रक्षाके लिये वराहका अवतार धारण किया। पञ्चरात्रकी शिक्षा देनेके लिये भी उन्हींने स्वरूप धारण किया। बदरिकाश्रममें उन्होंने ही नारायण नामसे अवतार लिया। वे ही हरि कपिल मुनिके रूपमें अवतरित हुए और उन्होंने ही कालकवलित चौबीस तत्त्वोंवाले सांख्य शास्त्रका आसुरिके लिये उपदेश किया। वे ही नारायण अत्रिपत्नी देवी अनसूयासे दत्तात्रेयके रूपमें प्रकट हुए और उन्होंने ही राजा अलर्कको आन्वीक्षिकी नामक तर्कविद्याका उपदेश दिया। वे ही सच्चिदानन्द हरि सूर्यके वंशमें आकूतिके गर्भसे प्रादुर्भूत हुए और उन्होंने ही स्वायम्भुव मन्वन्तरमें देवोंके साथ प्रजाका पालन किया। वे ही विष्णु अग्नीध्रपुत्री मेरुदेवीके गर्भसे नाभिके पुत्र - रूपमें उरुक्रम नामसे अवतरित हुए। उन हरिने ही देवता तथा असुरों द्वारा समुद्रके मन्थनके समय मन्दराचल पर्वतको अपनी पीठपर धारण करनेके लिये कूर्मरूप धारण किया। पुनः वे ही हरि हरितमणिके समान द्युतिवाले महात्मा धन्वन्तरिके रूपमें हाथमें अमृत कलश धारण किये हुए अपथ्यजनित दोषोंको दूर करनेके लिये अवतरित हुए। विष्णुने ही दितिपुत्र असुरोंको मोहित करनेके लिये मोहिनीका रूप धारण किया तथा पुनःनृसिंह रूपसे अवतरित होकर उन्होंने ही हिरण्यकशिपुको अपने ऊरुओंपर रखकर नखोंसे विदीर्ण कर डाला। अनन्तर अदिति और कश्यपसे वामनरूपमें अवतरित हुए। बलिसे अधिगृहीत सम्पूर्ण त्रैलेक्यके राज्यको पुनः इन्द्रको प्रदान करनेकी इच्छासे तथा बलिकी दानशीलताका विस्तार करनेके लिये उन्होंने यह रूप धारण किया। पुनः वे जमदग्निके पुत्र परशु रामके रूपमें विख्यात हुए और उन्होंने ब्रह्म द्वेषी क्षत्रियोंसे इस पृथ्वीको विहीन कर दिया। तदनन्तर उन हरिने ही सूर्यवंशमें रघु कुलमें देवी कौसल्यासे श्रीरामके रूपमें अवतार धारण किया। समुद्र बन्धन तथा रावण आदिके वध आदि कार्य उन्होंने ही किये। तदनन्तर द्वापरमें उन विष्णुने ही व्यासरूपमें अवतरित होकर वेद संहिताको चार भागोंमें विभक्त कर अपने पैल, सुमन्तु आदि शिष्योंको ऋगादि वेदोंको पढ़ाया। वे पराशरके द्वारा सत्यवतीमें प्रादुर्भूत हुए थे। तदनन्तर वे ही हरि वसुदेवके पुत्र - रूपमें देवकीसे कृष्णरूपमें अवतरित हुए। उन्होंने ही कंस आदिका वध किया और पाण्डवोंकी रक्षा की। तदनन्तर कलियुगकी प्रवृत्ति होनेपर वे ही असुरोंको मोहित करनेके लिये कीकट देशमें बुद्ध नामसे प्रादुर्भूत हुए। इसके बाद कलियुगकी मध्य संधिमें वे हरि विष्णुगुप्त (विष्णुयश) - के घर दस्युप्राय राजाओंका वध करनेके लिये कल्कि नामसे अवतीर्ण होंगे।
इस प्रकार संकर्षण आदि ये सभी अवतार हरिके हुए। हरिके असंख्य अवतार हैं, उन्हें स्वयं नारायण ही जानते हैं। इन सभी अवतारोंमें बलकी दृष्टिसे, रूपकी दृष्टिसे और गुणकी दृष्टिसे किसी भी प्रकारका भेद नहीं किया जा सकता। अनन्त नाम-रूपवाले विष्णु अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हैं।
श्रीकृष्णने कहा - हे खगेश्वर! जिस प्रकार हरिके अनन्त नाम- रूपात्मक अवतार हैं, उसी प्रकार हरिप्रिया भी विभिन्न अवतारोंके रूपमें प्रकट हुई हैं। वे लक्ष्मी ज्ञान स्वरूपा हैं। वे एकमात्र हरिके चरणोंका आश्रय ग्रहण कर नित्य उनके साथ रहती हैं। वे ही पुरुषकी पत्नी और प्रकृतिकी अभिमानिनी देवी हैं। जब ब्रह्माण्डके सृजनकी इच्छा हरिने की थी, उस समय गुणोंकी सृष्टि करनेके लिये ये प्रकृति नामसे प्रादुर्भूत हुई थीं। वासुदेवकी पत्नी माया, संकर्षणकी पत्नी जया, अनिरुद्धकी पत्नी शान्ता तथा प्रद्युम्नकी पत्नी कृतिके रूपमें इन्हींका अवतार हुआ। विष्णुकी पत्नी सत्त्वाभिमानिनी श्रीदेवी, तमोगुणकी अभिमानिनी देवी दुर्गा और रजोगुणकी अभिमानिनी वराहपत्नी देवी भूदेवी तथा भगवान् वेदकी अभिमानिनी देवी अन्नपूर्णा आदि सब इन्हीं देवीके अवतार हैं। साथ ही यज्ञपत्नी दक्षिणा, विदेहराज पुत्री सीता तथा रुक्मिणी, सत्यभामा आदि रूपोंमें भगवती लक्ष्मीका ही प्राकट्य हुआ है। इस प्रकार पृथक् - पृथक् देवी लक्ष्मीके अनन्त अवतार हुए हैं। ऐसे ही पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी भी शची आदि देवियोंके रूपमें उत्पन्न हुईं थीं।