गरुड महा पुराणम् - ब्रह्म खंड
6 - 9 - देवताओंद्वारा नारायणकी स्तुति
श्रीकृष्णने कहा - हे खगेश्वर! अपने - अपने तत्त्वमें स्थित उन - उन तत्त्वोंके अभिमानी देवताओंने नारायण हरिकी अनेक प्रकारसे पृथक् - पृथक् स्तुति की।
सर्वप्रथम श्री (देवी लक्ष्मी) - ने स्तुति प्रारम्भ की, उस समय उन्होंने मनमें सोचा कि प्रभुके तो एक - एक करके अनन्त गुण हैं। उन गुणोंकी स्तुति करनेमें मेरी कहाँ शक्ति है! ऐसा विचार कर वे देवी लज्जासे अवनत होकर इस प्रकार कहने लगीं-
श्रीने कहा - हे नाथ! मैं आपके चरणारविन्दोंपर नतमस्तक हूँ। आपके चरणोंके अलावा अन्य मैं कुछ भी नहीं जानती। हे देवदेव! हे ईश्वर! आपमें अनन्त गुण विद्यमान हैं। हे दामोदर! हे योगेन्द्र! आप अपने शरीरमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें। स्तुति करनेके लिये मेरे लिये आपसे अधिक और कोई प्रिय नहीं है।
ब्रह्माजीने कहा - हे लक्ष्मीपते। हे जगदाधार - स्वरूप विश्वमूर्ते! कहाँ आप ज्ञानके महासागर और कहाँ मैं अज्ञानी! आपमें असीम शक्ति है। मैं अल्पज्ञ हूँ और मेरी शक्ति भी अल्प है। हे प्रभो! हे मुरारे! आप सदैव मुझको अहंकार और ममताके भावसे दूर ही रखें। हे रमेश! मेरी इन्द्रियाँ सदा असन्मार्गपर प्रवृत्त होती हैं। वे सदा आपके चरणकमलमें अनुरक्त रहें, ऐसी कृपा करें। आपकी स्तुति करनेकी सामर्थ्य मुझमें नहीं है। इसलिये आप प्रसन्न हों। स्तुतिके अनन्तर विधाता ब्रह्मा हाथ जोड़े उनके सामने खड़े हो गये।
देवदेव ब्रह्माजीके बाद वायुदेव भगवान् नारायणके प्रेमसे विह्वल हो हाथ जोड़ते हुए गदगद वाणीसे उनकी स्तुति करने लगे - वायुने कहा - हे प्रभो! सभी देवगण आपके सेवक हैं और आपके चरणारविन्दोंका सांनिध्य परम दुर्लभ है। हे रमेश! हे नाथ! लोकमें जो आपको भक्तिसे विमुख हैं, जो पापकर्म करनेवाले हैं तथा जो अत्यन्त दुःखी हैं ऐसे प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही आपका अवतरण होता है। हे वासुदेव! आप अपने अवतारोंके द्वारा गौ, ब्राह्मण और देवताओं आदिके क्षेम तथा कल्याणके लिये नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, आपके अवतारका अन्य दूसरा प्रयोजन नहीं है। हे पुण्यश्रेष्ठी आपके जो चरितामृत हैं उनका गुणानुवाद करनेसे मेरा मन तृप्त नहीं होता, इसलिये हे मुकुन्द! एक अविचल भक्तिवाले भक्तके समान मुझे भक्ति प्रदान करें ताकि मेरा मन आपके पादारविन्दमें लगा रहे।
हे प्रभो! मेरी निद्रा आपकी वन्दनारूप बन जाय, मेरा सम्पूर्ण आचरण आपकी प्रदक्षिणा हो जाय और मेरा व्यवहार आपकी स्तुति बन जाय, ऐसा समझकर मैं आपके चरणोंमें स्वयंको समर्पित करता हूँ। हे देव! जितने पदार्थ हैं उन्हें देखकर ‘यह हरिकी ही प्रतिमा है’ ऐसा मानकर हे देवदेव! मैं उसमें स्थित हरि-रूप समझकर आपका भजन करूँ ऐसी आप कृपा करें। आप हरिके प्रसन्न होनेपर लोकमें कौन - सी वस्तु दुर्लभ रह जाती है अर्थात् उसे सब प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार स्तुति कर महात्मा वायुदेव हरिके आगे हाथ जोड़कर स्थित हो गये।
सरस्वतीने कहा - हे मुरारे! हे हरे! हे भगवन्! कौन ऐसा रसज्ञ है जो अपनी स्तुति अथवा कीर्तनसे संतुष्ट हो पायेगा अर्थात् कोई नहीं, किसीमें ऐसी बुद्धि नहीं है जो आपकी स्तुति - प्रशंसा कर सके। हे देवदेव! आपके गुणानुवादका कीर्तन ज्यों ही कानमें पहुँचता है वैसे ही वह सांसारिक देहानुरक्तिको नष्ट कर देता है, इतना ही नहीं वरन् जो घर, भार्या, पुत्र, पशु, धन -सम्पत्तिका व्यामोह, आसक्ति रहती है वह भी दूर हो जाती है।
है अनन्तदेव! वेदोंसे प्रतिपादित जो आपका स्वरूप है उसे लक्ष्मी भी नहीं जानतीं, चतुर्मुख ब्रह्मा भी नहीं जानते हैं, वायुदेव भी नहीं जानते हैं, फिर मुझमें यह शक्ति कहाँ है कि मैं आपकी स्तुति कर सकूँ। इसलिये हे हरे! आप मेरी रक्षा करें।
हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर देवी सरस्वती चुप हो गयीं। तदनन्तर भारतीने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।
भारतीने कहा - हे ब्रह्म! हे लक्ष्मीश! हे हरे! हे मुरारे! जो आपके गुणोंमें नित्य श्रद्धा रखता है, वह उन गुणोंका गान करते हुए सांसारिक असत् विषयोंमें प्रवृत्त अपनी बुद्धिमें संसारके प्रति विराग उत्पन्न कर लेता है और उसकी आपमें दृढ़ भक्ति हो जाती है और इस भक्तिके बलपर हे देवदेव! आपकी प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है। हरिके प्रसन्न हो जानेसे भगवान्का भक्तके लिये प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है, इसलिये हे प्रभो! आपके गुणोंके कीर्तनमें मेरी रति बनी रहे, जब ऐसी अनुरक्ति पुरुषमें हो जाती है तो वह प्रीति समस्त सांसारिक दुःखोंको काट डालती है और परमानन्द स्वरूप फलकी प्राप्ति करा देती है। हरिके गुणोंकी जो स्तुति नहीं करते उन्हें पाप लगता है और उनका पुण्य भी क्षीण हो जाता है।
हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति कर भारती मौन हो गयीं। उसके बाद शेषने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए केशवसे इस प्रकार कहा - शेषने कहा - हे वासुदेव! मैं आपके चरणोंके प्रभावको नहीं जानता। इसे न रुद्र जानते हैं और न गरुड ही जानते हैं, मैं तो बहुत ही न्यून हूँ। अतः शरण देकर मेरी रक्षा करें।
हे खगेश्वर! इस प्रकार स्तुति करके शेष मौन हो गये। उसके बाद पक्षिराज गरुडने स्तुति करना आरम्भ किया।
गरुडने कहा - हे प्रभो! आपके चरणोंकी स्तुति मैं क्या कर सकता हूँ। मेरा मन तो आपके चरण कमलमें ही समर्पित है। मैं तो पक्षियोनिमें उत्पन्न हूँ। इस मुखसे आपकी स्तुति कैसे सम्भव है? आपके अनन्त गुणोंकी प्रशंसा करनेकी शक्ति भला मुझमें कहाँ है?
इस प्रकार विनयपूर्वक स्तुति कर गरुड मौन हो गये। इसके बाद रुद्र स्तुति करने लगे।
रुद्रने कहा - हे भूमन्! हे भगवन्! आपकी जैसी स्तुति होनी चाहिये वह मैं नहीं जानता। आपके कल्याणकारी चरणोंके मूलमें मेरी भक्ति बनी रहे। ईश! अपनेमें स्थान देकर मेरी रक्षा करें।
इस प्रकार स्तुति कर रुद्रदेव शान्त हो गये। हे पक्षिश्रेष्ठ! तदनन्तर वारुणी, सौपर्णी तथा पार्वती आदि देवियोंने भी उन हरिकी बड़े ही भावभक्तिसे स्तुति कर उनकी शरण ग्रहण की।
श्रीकृष्णने पुन: कहा - हे खगेश्वर! अनन्तर इन्द्रने उनकी स्तुति करते हुए कहा -
हे देवदेव! आपके स्वरूपको हृदयमें जानते हुए भी जो मूढ स्तवनके लिये उत्सुक होता है, हे चक्रपाणि! बिना जाने भी तुम्हारी स्तुति करना यह आपका अनादर ही है; क्योंकि आपके यथार्थ स्वरूपको, गुणोंको वाणीके द्वारा व्यक्त करना सम्भव नहीं है, फिर भी आपकी स्तुति करनेमें आपके नामका उच्चारण होगा; अतः यह पुण्य फल तो देनेवाला ही होगा। ऐसा समझकर आपकी स्तुति की ही जाती है। हे प्रभो! जब रुद्रादि देव भी आपकी स्तुति करनेकी शक्ति नहीं रखते तो मुझमें ऐसी सामर्थ्य कहाँ? इस प्रकार देवाधिदेव हरिकी स्तुति कर नतमस्तक हो अंजलि बाँधकर इन्द्र मौन हो गये।
देवी शचीने स्तुति करते हुए कहा - हे देव! वज्र, अंकुश, ध्वज तथा कमलसे चिह्नित आपके चरणकमलोंका मैं सदा चिन्तन करती हूँ। हे ईश! आपके चरणरजका मैं सदा स्मरण करती हूँ। हे कृपालु! हे भक्त वत्सल! आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार शची देवी स्तुतिकर चुप हो गयीं। इसके बाद रतिने स्तुति करना आरम्भ किया।
रतिने कहा - हे नर - रूप धारण करनेवाले हरे। आपने अपने सेवकोंपर अनुकम्पा करनेके लिये यह अवतार धारण किया है, मैं आपके उस मुखारविन्दका सदा चिन्तन करती हूँ। हे देव! जो कुञ्चित केशराशिसे सुशोभित है तथा ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी आदिद्वारा स्तुत्य है, मैं आपके उस श्रीनिकेतन मुख कमलका ध्यान करती हूँ, आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार अतिशय आदरके साथ रति स्तुति कर भगवानके समीप ही स्थित हो गयीं। रतिके बाद दक्षने स्तुति आरम्भ की।
दक्षने कहा - भगवान् का चरणोदक रूप जो तीर्थ है, उसका मैं सदा चिन्तन करता हूँ। वह चरणजल ब्रह्माके द्वारा भलीभाँति सेवित है। ब्रह्मा आदि सभी देवोंके द्वारा वन्दनीय है। वही पवित्रतम चरणोदक गङ्गारूपी नदियोंमें श्रेष्ठ तीर्थ हुआ, जिस पवित्र पदरज मिश्रित गङ्गाको अपने जटा कलापमें धारण करनेसे अशिव भी शिव हो गये। हे करुणेश! हे विष्णो! ऐसे कृपावतार आपकी स्तुति करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। हे निदानमूर्त! आप सभी प्रकारसे मेरी रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति कर दक्ष चुप हो गये। इसके बाद बृहस्पतिने स्तुति करना आरम्भ किया।
बृहस्पतिने कहा - हे ईश! मैं आपके मुखकमलका सतत चिन्तन करता हूँ, आप मुझे सांसारिक विषयोंसे विरक्त करें। स्त्री, पुत्र, मित्र तथा पशु आदि ये सभी नाशवान् हैं, इनके प्रति मेरी जो आसक्ति है उसे आप नष्ट कर दें। हे देव! इस संसार चक्रमें भ्रमण करते हुए मैंने यह अनुभव किया है कि ‘यह संसार दुःखसे परिव्याप्त है।’ इसीसे मुक्ति पानेके लिये। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे देवाधिदेव! मेरी रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति कर बृहस्पति मौन हो गये। तदनन्तर अनिरुद्धने स्तुति करना आरम्भ किया।
अनिरुद्धने कहा - हे हरे! आपकी रसमयी कथाके आस्वादका परित्याग करके जो स्त्रियोंके विष्ठा आदिसे परिपूर्ण शरीर - रसके आनन्दमें निमग्न रहता है, वह मन्दबुद्धि सूकरके समान है। हे मुरारे! मज्जा, अस्थि, पित्त, कफ, रक्त तथा मलसे परिव्याप्त और चर्म आदिसे आवेष्टित स्त्री - मुखमें आसक्त व्यक्तिका पतन ही होता है। हे विभो! मुझ - ऐसे पापमतिके लिये आपकी मायाका ही बल है। इस अत्यन्त मात्र दुःखरूप तथा लेशमात्र सुखसे भी रहित संसार - चक्रमें भ्रमण करता हुआ मैं मल - नि:सारण करनेवाले नौ छिद्रोंसे युक्त इस शरीरमें आसक्त होता हुआ अत्यन्त मूढबुद्धि हूँ।
हे देव! आपके सत्कथामृतको छोड़कर मैं घरमें रहते हुए परिवारके पालनमें अनुरक्त तथा दान आदि शुभ कर्मोंसे विरत हो गया हूँ। हे देव! आपको नमस्कार है। आप मेरे इस संसार - मलको दूर करें और दिव्य कथामृतके पानकी शक्ति दें। मैं आपके सद्गुणोंका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हूँ।
हे खगेश्वर! अनिरुद्ध इस प्रकार स्तुति करके चुप हो गये। इसके बाद स्वायम्भुव मनुने स्तुतिका उपक्रम किया - स्वायम्भुव मनुने कहा - हे देव! आपकी स्तुति करनेके लिये प्रयत्न शीलमात्र होनेसे गर्भका दुःख नहीं होता है अर्थात् उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। हे प्रभो! आपकी इसी कृपासे मैंने परम पूज्यपदको प्राप्त किया है।
तदनन्तर स्तुति करते हुए वरुणने कहा - हे प्रभो! आपकी इच्छासे रचित देहरूपी घरमें, पुत्रमें, स्त्रीमें, धनमें, द्रव्यमें ‘यह मेरा है’ और ‘मैं इसका हूँ’ इस अल्पबुद्धिके कारण मूर्खजन संसार रूपी दुःखमें निमग्न हो जाते हैं, इसलिये मेरी ऐसी कुबुद्धिका विनाश कर आप अपने चरणोंकी दासत मुझे प्रदान करें। इस प्रकार स्तुति कर वरुण हाथ जोड़कर वहीं स्थित हो गये। इसके बाद देवर्षि नारदने हरिकी स्तुति की।
नारदने कहा - हे विष्णो! मेरे लिये आपके नामके श्रवण तथा कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कोई स्वादु युक्त तत्त्व नहीं है इसलिये आप मुझे पवित्र करें। मेरी जिह्वाके अग्रभागमें आपका नाम विद्यमान रहे। जिसकी जिह्वामें हरिनाम नहीं है वह मनुष्य रूपमें गदहा ही है। हे देव! मैं आपके स्वरूपको नहीं जानता, मुझपर आप कृपा करें। इस प्रकार नारद स्तुति कर देवाधि देवके सामने स्थित हो गये। अनन्तर महात्मा भृगु स्तुति करने लगे।
भगुने कहा - गरुड - जैसे आसनपर आसीन होनेवाले हे देव! आपके लिये कौन - सा आसन शेष रह जाता है। कौस्तुभ - जैसा आभूषण धारण करनेवाले आपके लिये और कौन - सा भूषण रह जाता है। लक्ष्मी जिनकी पत्नी हों उनको और क्या प्राप्तव्य रह जाता है। हे वागीश! आप वाणीके ईश हैं फिर आपके विषयमें क्या कहना? इस प्रकार भगवान् हरिकी स्तुति कर भृगु मौन हो गये। इसके बाद अग्निने पुरुषोत्तमकी स्तुति की।
अग्निने कहा - जिसके तेजसे मैं तेजस्वी और आज्यसिक्त हव्यका वहन करता हूँ। जिसके तेजसे मैं उदरमें प्रविष्ट होकर पूर्णशक्ति सम्पन्न हो अन्नका परिपाक करता हूँ इसलिये मैं आपके सदगुणोंको कैसे जान सकता हूँ?
प्रसूतिनि कहा - जिसके नामके अर्थका विचार करनेमें भी मुनिगण मोहमग्न हो जाते हैं और सदा जिससे देवगण भी भयभीत रहते हैं, मान्धाता, ध्रुव, नारद, भृगु, वैवस्वत आदि जिसकी प्रेमसे स्तुति करते हैं ऐसे हितचिन्तक आप विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ।
हे खगेश्वर! प्रसूतिने इस प्रकार स्तुति कर मौन धारण कर लिया। तदनन्तर ब्रह्मनन्दन वसिष्ठने विनयसे अवनत होकर स्तुति करना प्रारम्भ किया।
वसिष्ठने कहा - विधाता पुरुषको नमस्कार है, असत् - स्वरूपको नष्ट करनेवाले देवको पुनः - पुनः नमस्कार है। हे नाथ! मैं आपके चरण कमलोंमें सदा नतमस्तक हूँ। हे भगवन्! हे वासुदेव! मेरी सदा रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति करके वसिष्ठ मौन हो गये। इसके बाद ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचि तथा अत्रिने अतिशय भक्तिके साथ स्तुति करते हुए नारायणको प्रसन्न किया।
तदनन्तर स्तवन करते हुए महर्षि अंगिराने कहा - हे नाथ! मैं आपके अनन्त - बाहु, अनन्त - चक्षु और अनन्त मस्तक सम्पन्न विराट् स्वरूपको देखनेमें असमर्थ हूँ। आपका यह स्वरूप हजारों - हजार मुकुटोंसे अलंकृत है। अतिशय मूल्यवान् अनेक अलंकारोंसे सुशोभित ऐसे अनन्तपार - स्वरूपकी स्तुति करनेमें भी मैं असमर्थ हूँ।
हे खगेश्वर! इस प्रकार अंगिराने स्तुति कर मौन धारण किया। इसके बाद पुलस्त्य स्तुति करनेके लिये उद्यत हुए।
पुलस्त्यने कहा - हे भगवन्! आप अपने उपासकोंके लिये जैसा मङ्गलकारी स्वरूप धारण करते हैं, उसी भुवन मङ्गल स्वरूपका दर्शन मुझे भी करायें। ऐसे रूपवाले आपको नमस्कार है। आप नरकसे रक्षा करनेवाले हैं। हे देव! मैं आपके गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हूँ। हे भगवन्! मेरी रक्षा करें। इस प्रकार स्तुति कर पुलस्त्यजी मौन हो गये। इसके अनन्तर पुलह स्तुति करने लगे।
पुलहने कहा - हे भगवन्! महा पुरुषोंका कथन है कि निष्काम तथा रूपरहित भगवान्को समर्पित स्नान, उत्तम वस्त्र, दूध, फल, पुष्प, भोज्य पदार्थ तथा आराधन आदि सब व्यर्थ ही हैं तो फिर ऐसेनिष्काम आपको ये सब अर्पित न करके मैं निष्काम बुद्धिसि आपको प्रणाम समर्पित करता हूँ। हे वैकुण्ठ नाथ! आपके स्तवनकी शक्ति मुझमें नहीं है।
इस प्रकार स्तुति कर पुलह मौन हो गये। उसके बाद क्रतु स्तुति करने लगे।
क्रतुने कहा - हे भगवन् प्राणोंके निकलते समय आपके नाम ही संसार जन्य दुःखके विनाशक हैं। जो अनेक जन्मोंके पापको सहसा विनष्ट कर निर्मल मुक्ति प्रदान करते हैं, मैं उन नामशक्तिकी शरणमें हूँ।
हे विष्णो! जो आपकी भक्ति करनेमें असमर्थ हैं और केवल आपका नाममात्र लेते हैं, वे भी मुक्तिको प्राप्त करते हैं फिर जो भक्तिपूर्वक आपका स्मरण करते हैं, उनके विषयमें तो कहना ही कया!
ये भक्त्या विवशा विष्णो नाममात्रैकजल्पका:।
तेऽपि मुक्तिं प्रयान्त्याशु किमुत ध्यायिन: सदा॥
इस प्रकार स्तुति करके क्रतु भी मौन हो गये तब वैवस्वत मनुने स्तुतिसे नारायणको प्रसन्न किया।
विश्वामित्रने स्तुति करते हुए कहा - हे भगवन्! मैंने आपके चरण कमलोंका न तो ध्यान किया और न नित्य संध्योपासना ही की। ज्ञानरूपी द्वारके किवाड़को खोलनेमें दक्ष धर्मका उपार्जन भी मैंने नहीं किया। अन्त:करणमें व्याप्त मलके विनाश करनेमें अत्यन्त कुशल आपकी कथा भी मैंने कानोंसे नहीं सुनी, इसलिये हे देव! मुझ अनाथकी आप सदा रक्षा करें -
न ध्याते चरणाम्बुजे भगवतो संध्यापि नानुष्ठिता
ज्ञानद्वारकपाटपाटनपदुर्धर्मो ऽपि नोपार्जित:।
अन्तर्व्याप्तसलाभिघातकरणे पट्वी श्रुता ते कथा
नो देव श्रवणेन पाहि भगवन् मामत्रितुल्यं सदा॥
इस प्रकार स्तुति कर महामुनि विश्वामित्र हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
हे खगेश्वर। क्रतुके बाद मित्रने जगत्के कारण नारायणकी स्तुति करना आरम्भ किया।
मित्रने कहा - संसारके बन्धनको विनष्ट करनेवाले हे देव! आप प्राणियोंको संसारसे मुक्ति दिलानेवाले हैं तथा कल्याणके निधान हैं, मैं अज्ञानी हूँ, आपके चरणारविन्दोंको मैं प्रणाम करता हूँ। आप भगवान् वासुदेव ही अपने विषयमें जानते हैं। आपके यथार्थ स्वरूपको न मैं जानता हूँ न अग्नि तथा न ब्रह्मा - विष्णु - महेश - ये तीनों देवता, न मुनीन्द्र ही जानते हैं; परम भागवत भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते तो अन्यकी बात ही क्या है? हे परात्पर स्वामी! आप मेरी नित्य रक्षा करें।
हे खग! इस प्रकार हरिकी स्तुति कर मित्र मौन हो गये, उसके बाद ताराने स्तुति करना प्रारम्भ किया।
ताराने कहा - हे विष्णो! अनन्य - भावसे जो आपके प्रति दृढ भक्ति करते हैं, आपके लिये जो सभी कर्मोंको त्याग देते हैं और अपने स्वजनों तथा बान्धवोंका परित्याग कर देते हैं, आपको कथाको सुनकर जो दूसरेको सुनाते हैं और कहते हैं, इस प्रकारके ये साधुगण सभीके प्रति आसक्तिसे रहित हो जाते हैं। हे प्रभो! जैसे आप उन साधुगणों - भक्तोंकी रक्षा करते हैं वैसे ही मेरी भी सदा रक्षा करें।
निर्ऋतिने कहा - योगपूर्वक आपके प्रति समर्पित जन भक्तिसे परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। भक्त श्रद्धाभावसे की गयी सेवासे, सांसारिक विषयोंकी अनासक्ति और चित्तका निग्रह करनेसे विष्णुके परमपदको प्राप्त करते हैं, इसलिये हे प्रभो! दयापूर्वक उनके समान मेरी भी रक्षा करें।
तदनन्तर भगवान्के पार्षद वायुपुत्र महाभाग विष्वक्सेनने हरिकी स्तुति करना प्रारम्भ किया।
विष्वक्सेनने कहा - पूर्णानन्द स्वरूप भगवान् कृष्ण यदि सदा मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, यदि मेरी अपरोक्ष साधनरूपा परम भक्ति है और गुरुसे लेकर ब्रह्माण्डके साधुओंके प्रति यदि मेरी निष्कपट भक्ति है साथ ही तुलसी आदिके प्रति यदि मेरी प्रीति है और इनका सदा मुझे स्मरण है तो निश्चित ही मुझे आपका आशीर्वाद प्राप्त होगा, इसमें संदेह नहीं है।
इस प्रकार स्तुति कर महाभाग विष्वक्सेन चुप हो गये।
हे पक्षिराज! इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवों तथा लक्ष्मी आदि देवियोंने भगवान् हरिकी पृथक् - पृथक् स्तुति की और वे अंजलि बाँधकर मौन हो उनके सामने स्थित हो गये।
भगवान्ने उन सभीमें प्रविष्ट होकर उन्हें अपने शरीरमें आश्रय प्रदान किया।