10 - 13 - नारायणसे प्राकृत तथा वैकृत सृष्टिका विस्तार

गरुडजीने कहा - हे प्रभो! देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति किये गये भगवान्‌ विष्णु उन्हें आश्रय देकर स्वयं उन्हींमें किस प्रकार प्रविष्ट हुए और किस प्रकार सृष्टि हुई? हे कृपालो! आप इसे भलीभाँति बतायें।

श्रीकृष्णने कहा - वे भगवान्‌ महाप्रभु उन सम्बन्ध रहित तत्त्वोंमें प्रविष्ट हुए, इससे उनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ। सबसे पहले भगवान्‌ने हिरण्मयात्मक ब्रह्माण्डकी सृष्टि की, जो पचास कोटि योजनमें चारों ओर विस्तृत था। उसके ऊपर अवस्थित अत्यन्त सूक्ष्म भाग उतने ही विस्तारमें फैला था, जितनेमें उस हिरण्मय अण्डका विस्तार था। उसके भी ऊपर पचास कोटि भूतल था। वह सात आवरणोंसे चारों ओर परिधिद्वारा घिरा हुआ था। पहले आवरणका नाम कबन्ध है। दूसरा आवरण अग्निदेवका है, तीसरा आवरण महात्मा हरका है, चौथा आवरण आकाशका है, पाँचवाँ आवरण अहंकारका है, छठा आवरण महत्तत्त्वात्मक है और सातवाँ आवरण त्रिगुणात्मक है। इसके अनन्तर अव्याकृत आकाश है; इसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है। इसी मण्डलके मध्यमें अव्यय हरि विराजमान रहते हैं। आठवाँ आवरण आकाशका है। उसके मध्यमें विरजा नदी है। इसकी परिधि पाँच योजन विस्तीर्ण है। यह अतिशय पुण्यवती नदी है। विरजा नदीमें भलीभाँति स्नान करके लिंग - देहका भी परित्याग कर हरिके मोक्षपदकी प्राप्ति होती है। प्रारब्ध कर्मोंका क्षय हो जानेपर ही विरजा नदीमें स्नान शव सम्भव होता है।

है खगेश्वर! प्रलयमें भी इस विरजा नदीका लय नहीं होता, उसे लक्ष्मी स्वरूपा समझें; क्योंकि वह प्राणियोंके लिंग शरीरका नाश करनेवाली है। विरजा नदीके बाद व्याकृत आकाश है जो निःसीम है, उसकी अभिमानिनी देवता लक्ष्मी हैं। सृष्टिके समय उस ब्रह्माण्डके अभिमानी देवता ब्रह्मा थे, जो विराट्‌ नामसे कहे गये। इस प्रकार ब्रह्माण्ड आदिका सर्जन कर अव्ययात्मा भगवान्‌ हरि उन - उन तत्त्वाभिमानी देवताओंके साथ उस ब्रह्माण्डके ऊपर - नीचे - सर्वत्र व्याप्त होकर नित्य स्थित रहते हैं। हे पक्षिराज! यह प्राकृत सृष्टि है, अव्यक्त आदिसे लेकर पृथ्वीतकके जो भी तत्त्व इस अण्डरूप जगत्में बाह्यरूपसे उत्पन्न हुए हैं, वे सभी प्राकृत सृष्ट कहे जाते हैं और ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती सृष्टि वैकृत सृष्टि कही जाती है।

हे अण्डज! जिन्हों पुरुष कहा गया है वे हरि तो साक्षात्‌ भगवान्‌ पुरुषोत्तम ही हैं। उन विष्णुने उस हिरण्मय अण्डके मध्य विद्यमान जलराशिमें एक हजार वर्षतक शयन किया था। उस समय लक्ष्मी ही जलरूपमें थीं, शय्यारूपमें विद्या थीं, तरंग रूपमें वायु थे और तम ही निद्रारूपमें था। इसके अतिरिक्त वहाँ और कोई नहीं था। उसी उदकके मध्यमें नारायण योगनिद्रामें स्थित थे। हे पक्षिश्रेष्ठ। उस समय लक्ष्मीने उस जलगर्भमें शयन कर रहे हरिको स्तुति की। हरिकी प्रकृति उस समय लक्ष्मी तथा धरा ( भूदेवी) - इन दो रूपोंको धारण कर लेती है और शेष वेदका रूप धारण करके जलके मध्य सोये हरिकी स्तुति करते हैं। स्तुतिसे प्रसन्न हुए नित्य प्रबुद्ध वे महाविष्णु निद्राका परित्याग कर प्रबुद्ध हो उठे। उस समय उनकी नाभिसे सम्पूर्ण जगत्‌का आश्रयभूत हिरण्मय यद्य प्रादुर्भूर हुआ। इसे प्राकृत सृष्टिके रूपमें समझना चाहिये। उस सृष्टिकी अभिमानिनी देवता

भूदेवी थीं। वह पद्म असंख्य सूर्योंके समान प्रकाशवाला कहा गया है। चिदानन्द मय विष्णु उससे भिन्‍न हैं, उस पद्मको भगवान्‌के किरीट आदि आभूषणोंके समान समझना चाहिये।

हरिके किरीट आदि भी दो प्रकारके हैं - एक स्वरूप भूत तथा दूसरे स्वरूप भिन्‍न। उस पद्मसे सभी लोकोंके विधायक ब्रह्माण्डकी सृष्टि हुई। उस हिरण्मय पद्मसे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए। किसने मेरी सृष्टि की है, वह प्रभु कौन है? ऐसी जिज्ञासावश ब्रह्मा उस पद्मके नालमें प्रविष्ट हो गये। किंतु अज्ञानवश जब वे नारायणके विषयमें कुछ जान न सके तब उस समय उन्हें ‘तप’, ‘तप’ इस प्रकार ये दो शब्द सुनायी दिये।

उन शब्दोंके अभिप्रायको ठीक - ठीक समझते हुए विष्णुमें एकमात्र निष्ठा रखनेवाले ब्रह्माने हरिकी प्रीति प्राप्त करनेकी इच्छासे दिव्य हजार वर्षतक तपस्या की। हे खगेन्द्र! तपस्यासे प्रसन्‍न होकर हरि भक्तश्रेष्ठ ब्रह्माको दिव्य वर प्रदान करनेके लिये प्रकट हो गये। भगवान्‌ चतुर्भुजधारी थे, कमलके समान उनके नेत्र थे, वक्ष:स्थल श्रीवत्ससे सुशोभित था तथा गला कौस्तुभ मणिकी मालासे अलंकृत था, वे अत्यन्त प्रसन्न मुद्रामें थे, उनके नेत्र करुणासे आर्द्र थे। ऐसे उन नारायणका ब्रह्माको दर्शन हुआ।

भक्तोंक वशमें रहनेवाले, अत्यन्त दयालु परब्रह्म स्वरूप नारायणको अपने समक्ष देखकर ब्रह्माने बड़ी ही श्रद्धा - भक्तिसे उनकी पूजा की और उनके पादतीर्थकों मस्तकपर धारण किया। तदनन्तर भक्ति मानोंमें श्रेष्ठ तथा महा भागवतोंमें प्रधान ब्रह्माने उन हरिकी अनेक प्रकारसे स्तुति की और उनके सामने वे हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

श्रीकृष्णने पुन: कहा - ब्रह्माजीके द्वारा स्तुति किये जानेपर दयाके सागर भगवान्‌ मधुसूदन मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले - हे ब्रह्मन्‌! मेरे प्रसादसे इन देवताओंकी वैसी ही सृष्टि आप करें, जिस प्रकार पूर्वकालमें आपके द्वारा हुई थी। यद्यपि इस सृष्टि - कार्यसे आपका कोई प्रयोजन नहीं है, फिर भी मेरी प्रसन्‍नताके लिये आप ऐसा करें। हरिके ऐसा कहनेपर ब्रह्माने उन हरिकी स्तुति करके उनकी प्रसन्‍नताके लिये मनमें सृष्टि करनेका निर्णय लिया। तब महत्तत्त्वात्मक ब्रह्माने सर्वप्रथम जीवके अभिमानी देवता वायुदेवकी सृष्टि की। हे गरुड! वे ही प्रथम सृष्टिके पुरुषात्मा हैं। तदनन्तर ब्रह्माने अपने दाहिने हाथसे ब्रह्माणी तथा भारती नामक दो देवियोंकी सृष्टि की। बायें हाथसे सत्यके पुत्र महत्तत्त्वात्मक अनलको उत्पन्न किया। ब्रह्माके दाहिने हाथसे ही अहंकारात्मक हरकी सृष्टि हुई। इसी प्रकार गरुड, शेष, वायु, गायत्री, वारुणी, सौपर्णी, चन्द्र, इन्द्र, कामदेव, इन्द्रियोंके अभिमानी देवताओं, मनु - शतरूपा, दक्ष, नारदादि ऋषियों, कश्यप, अदितिदेवी, वसिष्ठ आदि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों, कुबेर, विष्वक्सेन तथा पर्जन्य आदि देवसृष्टिका उनसे प्रादुर्भाव हुआ। हे खगेश्वर! मेरी कृपासे ही ब्रह्मा इस सृष्टि - कार्यमें समर्थ हो सके।