गरुड महा पुराणम् - ब्रह्म खंड
2 - गरुडजीको श्रीकृष्ण द्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना तथा प्रलयकालके अन्तमें योग निद्रामें शयन कर रहे उन भगवान् विष्णुको सृष्टि - हेतु अनेक प्रकारकी स्तुति करते हुए जगाना
सूतजीने पुनः कहा -हे शौनकजी! एक बार गरुडजीने भगवान् विष्णु (कृष्ण ) - से किस प्रकार उन्होंने सृष्टिकी रचना की इस विषयमें प्रश्न किया था, तब उन्होंने कहा था कि हे सुव्रत! इस सृष्टिके मूल कारण अव्यय विष्णु हैं और वे व्यापक तत्त्व हैं, वे सर्वत्र व्याप्त रहते हैं। पूर्ण होनेके कारण वे ही अवतार ग्रहण करते हैं, अनेक रूपोंवाले इस दृश्य जगत् को वे एक रूप बनाकर प्रलय कालमें अपनेमें लीन करके शयन करते हैं। उनके गुण, रूप, अवयव तथा वैभवादि ऐश्वर्योंमें भेदरूप दिखायी पड़नेपर भी अभेद रूपमें उनका दर्शन करना चाहिये; क्योंकि भेदरूपमें दर्शन करनेपर शीघ्र ही अन्धकारके गर्तमें पतन हो जाता है।
जिस समय प्रलयकालीन समुद्रमें व्यापक भगवान् सभी जीवोंको अपने उदरमें प्रविष्ट कराकर शयन करते हैं, ब्रह्मा तथा इन्द्र, मरुत् आदि देवोंको, मुक्तोंको तथा मुक्तिके लिये सचेष्ट जनोंको भी वे अपनेमें अवस्थित करके कल्प पर्यन्त स्थित होते हैं, उस समय सर्व वेदात्मिका लक्ष्मी भक्तिसे समन्वित हो भगवान्की स्तुति करती हैं। उस समय विष्णु और लक्ष्मीको छोड़कर कुछ भी नहीं रहता। पर्यङ्करूपमें वे ही देवी हो जाती हैं एवं वासरूपसे लक्ष्मीके रूपमें भी विराजमान रहती हैं; वे देवी उस समय बहुत रूपोंमें सुशोभित होती हैं।
हे शौनक! गरुडको पुन: उन परम देवकी महिमाको बताते हुए श्रीकृष्णने कहा - हे विष्णो! आप सभीमें उत्कृष्ट हैं, सभी देवोंमें उत्तम होनेके कारण आप उत्कृष्ट हैं, आपके समान अथवा आपसे अधिक बड़ा और कोई नहीं है। आप ही एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म हैं। आपमें ही ब्रह्म शब्दका मुख्य प्रयोग है। अन्य ब्रह्मा, रुद्रादिमें अमुख्य है। अनन्त गुणोंसे परिपूर्ण होनेके कारण आप हरिको ही ब्रह्म कहा जाता है। गुण आदिकी पूर्णताके अभावसे अन्यको ब्रह्म नहीं कहा जा सकता। गुण और कालसे देशका आनन्त्य होता है, किंतु देश - कालमें गुण या कार्यसे आनन्त्य नहीं होता। हे विष्णो! आपमें गुणोंकी अनन्तता है। आपको न मैं जानता हूँ न ब्रह्मा तथा रुद्रादि देव ही जानते हैं। इन्द्र, अग्नि, यम आदि देव आपके गुणोंको जाननेमें असमर्थ हैं। देवर्षि नारद आदि ऋषि, गन्धर्व आदि कोई भी आपको पूर्णरूपसे नहीं जानते; फिर सामान्य लोगोंकी तो बात ही क्या है? आपसे ही देवोंकी सृष्टि हुई है। आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा आदि सृष्टि करनेमें समर्थ होते हैं। ब्राह्मणोंके द्वारा वेदादिके जितने अक्षरोंका पाठ होता है, वे सभी आप हरिके नाम ही हैं, आपको वे अति प्रिय हैं। मेरे स्वामी भी आप हरि ही हैं, सभीके एकमात्र स्वामी आप ही हैं। वेदोंमें आपकी स्तुतिका गान किया गया है, ऐसा जानकर जो वेदोंका गरुडजीको श्रीकृष्ण द्वारा भगवान् विष्णुकी महिमा बताना पाठ करता है वह द्विजोंमें उत्तम है। उसे वेदपाठी कहा गया है, इससे विपरीत भाव रखनेवाला वेदवादी कहलाता है।
श्रीकृष्णजीने गरुडजीको विष्णुतत्त्व बतलाते हुए पुनः कहा - हे महात्मन्! संसारमें अज्ञानी जीवद्वारा सैकड़ों - करोड़ों महान् - से - महान् अपराध बनते रहते हैं, पर वे हरि बड़े ही दयालु हैं, कृपालु हैं, उनका तीन बार नाममात्र लेनेसे ही वे उन्हें क्षमा कर देते हैं -
महापराधा: सन्ति लोके महात्मन्
सहस्त्रशः शतशः कोटिशश्च।
हरिश्च तान् क्षमते सर्वदैव
नामत्रयस्मरणाद्वै कृपालुः॥
कल्पान्तमें शयन कर रहे उन विष्णुको इस प्रकार स्तुति करते हुए जगाया गया - वेदोंके द्वारा जानने योग्य यज्ञस्वरूप हे गोविन्द!आप शीघ्र ही प्रसन्न हो जायँ और जगत् की रक्षा करें। हे केशव! अब आप अपनी योगनिद्राका परित्याग कर उठें। हे आनन्द स्वरूप! आप सृष्टि और प्रलय करनेमें समर्थ हैं।
हे प्रभो! ब्रह्माको प्रादुर्भूर कर आप उन्हें सृष्टि करनेके लिये प्रेरित करें और रुद्रको सृष्टिके संहारके लिये प्रेरित करें। हे हरे! हे मुरारे! कल्पादिका अन्त करनेके लिये आप उठें। हे महात्मन्! जो दुःख स्वरूप अन्धकार व्याप्त है उसे दूर करें। हे देव! भक्तोंको दुःखी देखकर आप भी दुःखी हो जाते हैं।
हे नारायण! हे वासुदेव! हे कृष्ण! हे अच्युत! तथा हे माधव! अब आप उठें, हे वैकुण्ठ! हे दयामूर्ते! है लक्ष्मीपते! आपको बार - बार नमस्कार है।
हे सरस्वतीके ईश! हे रुद्रेश! हे अम्बिकेश! हे चन्द्रेश! हे शचीपते! आप ब्राह्मणों तथा गौओंके स्वामी हैं, आपका नाम शास्त्रप्रिय है। हे ऋवेद और यजुर्वेदके प्रिय! हे निदानमूर्ते! हे साम तथा अथर्वप्रिय! हे मुरारे! आप पुराणमूर्ति हैं और स्तुतियाँ आपको प्रिय हैं, इसलिये आप स्तुतिप्रिय कहलाते हैं। हे विचित्रमूर्त! आप कमला (लक्ष्मी) - के पति हैं, आप शीघ्र ही उठें, इस योगनिद्राका परित्याग कर संसारमें व्याप्त अन्धकारको दूरकर जगत्की रक्षा करें।
-इस प्रकार स्तुति करनेपर अजन्मा विष्णु योगनिद्राका परित्याग कर शीघ्र ही जाग गये।