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अष्टादश महापुराणों में परम पावन एवं प्रामाणिक श्री कूर्मपुराण, क्षीर सागर के मंथन के समय भगवान श्रीमन नारायण द्वारा कच्छप अवतार (कूर्मावतार) धारण करके महर्षियों को प्रदान किया गया दिव्य वाङ्गमय है। यह पुराण दो मुख्य भागों में विभक्त है—पूर्वार्ध और उत्तरार्ध। इसके पूर्वार्ध भाग में कुल तिरपन (53) अध्याय समाविष्ट हैं। मूल रूप से ब्राह्मी, भागवती, सौरी तथा वैष्णवी नामक चार पवित्र संहिताओं में विस्तारित छह सहस्र श्लोकों की इस ब्राह्मी संहिता में जगत् की प्राकृत सृष्टि, वर्णाश्रम धर्म के विधान, भगवान नारायण तथा महादेव की लीलाएँ, वाराणसी एवं प्रयाग जैसे पावन तीर्थों की महिमा, और सूर्य तथा चंद्र वंश का पावन आख्यान अत्यंत भक्तिभाव से वर्णित है।
श्री कूर्मपुराण का केंद्रीय संदेश हरि और हर का अभेद तत्त्व तथा पराशक्ति जगज्जननी देवी की अगाध महिमा है। यह पुराण स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करता है कि पुरुषोत्तम नारायण और परमेश्वर शिव एक ही सच्चिदानंद परब्रह्म के दो क्रियात्मक स्वरूप हैं, इसलिए उनमें तनिक भी भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसमें वर्णाश्रम धर्म का सत्यनिष्ठा से पालन, कर्मफ़लों को परब्रह्म में अर्पण करने की निष्काम कर्मयोग साधना, तथा भक्ति और ज्ञानयोग के संगम द्वारा संसार-बंधन से मुक्ति पाने का मार्ग दर्शाया गया है। इसके साथ ही, कालचक्र की सर्वोपरि सत्ता, खगोल एवं भूगोल का वर्णन, तीर्थों की पावनता तथा सनातन धर्म की रक्षा हेतु प्रभु के विविध अवतारों का भक्तिरसपूर्ण आख्यान इस पुराण के मुख्य विषय हैं।
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पूर्वार्ध का हर अध्याय का विवरण
1 – इन्द्रद्युम्न की मोक्ष प्राप्ति का वर्णन
नैमिषारण्य के पवित्र वन में दीर्घसत्र यज्ञ कर रहे ऋषियों ने जब सूत लोमहर्षण जी से ज्ञान प्राप्ती की प्रार्थना की, तब उन्होंने कच्छप रूप धारी श्रीहरि द्वारा समुद्र मंथन के समय प्रकट किए गए कूर्मपुराण का दिव्य वृत्तांत सुनाया। मंथन के समय प्रकट हुई महालक्ष्मी को श्रीहरि ने धारण किया और नारद आदि देवों को बताया कि देवी पराशक्ति परब्रह्म स्वरूपिणी और उनकी अगाध माया हैं। इसके पश्चात् भगवान ने पूर्वजन्म में राजा रहे तथा शिव-विष्णु की अनन्य भक्ति एवं लक्ष्मी जी की कृपा से ब्राह्मण कुल में जन्मे परम पावन इन्द्रद्युम्न की कथा सुनाई, जिन्होंने निरंतर तपोनिष्ठा और अनन्य ध्यान द्वारा सूर्यमण्डल मार्ग से ब्रह्मलोक प्राप्त कर अंततः परब्रह्म में मोक्ष प्राप्त किया।
2 – वर्णाश्रम धर्म का वर्णन
महाप्रलय के अंत में एकार्णव जल में योगनिद्रा में लीन पुरुषोत्तम नारायण ने जगत् की सृष्टि हेतु ब्रह्मा तथा रुद्र को प्रकट किया। तत्पश्चात् भगवान की आज्ञा से महालक्ष्मी ने सांसारिक जीवों को अपनी मोहक माया से बांधने तथा तपोनिष्ठ, ज्ञानी और शिवभक्तों को मुक्त रखने का कार्य स्वीकार किया। ब्रह्मा जी ने अपने मुख, बाहु, ऊरु और चरणों से चारों वर्णों की रचना की तथा उनके कर्तव्यों का निर्धारण किया। गृहस्थाश्रम को आधार बनाकर चारों आश्रमों की स्थापना की गई ताकि मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चार पुरुषों की सिद्धि वेदविहित मार्ग से कर सके।
3 – वर्णाश्रम धर्म के क्रम का वर्णन
ब्रह्माचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास इन चारों आश्रमों का क्रमपूर्वक पालन करने का विधान है, किन्तु यदि तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो जाए तो ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास भी ग्रहण किया जा सकता है। मनुष्य को देव, ऋषि और पितृ ऋणों से मुक्त होकर निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों को ईश्वरार्पण बुद्धि से पूरा करना चाहिए। इस प्रकार ज्ञानपूर्वक किए गए कर्माचरण से चित्त शुद्ध होता है और परमेश्वर शिव की कृपा से जीव इसी जीवन में मुक्त होकर परब्रह्म पद को प्राप्त कर लेता है।
4 – प्राकृत सर्ग का वर्णन
सृष्टि से पूर्व त्रिगुणमयी मूल प्रकृति अव्यक्त रूप में स्थित थी, जिसमें रूप, रस, गंध आदि कोई विकार नहीं थे। प्रलयकालीन रात्रि के समाप्त होने पर परमेश्वर ने प्रकृति और पुरुष में प्रविष्ट होकर क्षोभ उत्पन्न किया, जिससे महत्तत्त्व, बुद्धि और त्रिविध अहंकार प्रकट हुए। तामस अहंकार से पंच तन्मात्राएँ और पंचमहाभूत उत्पन्न हुए, तथा सात्त्विक अहंकार से मन और इंद्रियों की सृष्टि हुई, जिनसे एक विशाल सुवर्ण ब्रह्मांड जल में प्रकट हुआ। उस ब्रह्मांड में ब्रह्मा जी रजोगुण से सृष्टि करते हैं, विष्णु जी सत्त्वगुण से पालन करते हैं तथा रुद्र तमोगुण से प्रलयकाल में संहार करते हैं।
5 – काल संख्या का विवरण
भगवान कूर्म ने परमेश्वर की आज्ञा से चलने वाले अखंड कालचक्र का सूक्ष्म मापन समझाया। काष्ठा, कला, मुहूर्त, अहोरात्र, मास और अयन से देवताओं का एक वर्ष बनता है। ऐसे बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग होता है। इकहत्तर चतुर्युगों का एक मन्वन्तर और एक हजार चतुर्युगों का ब्रह्मा जी का एक दिन अर्थात एक कल्प होता है। ब्रह्मा जी की सौ वर्षों की आयु पूर्ण होने पर प्राकृत प्रलय होता है और समस्त जगत् काल रूपी परमेश्वर में पुनः विलीन हो जाता है।
6 – भगवान वराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार
प्रलय के अगाध जल में डूबी हुई पृथ्वी को देखकर भगवान नारायण ने सर्ववेद-यज्ञमय वराह रूप धारण किया। पाताल लोक में प्रवेश करके भगवान वराह ने अपनी तीक्ष्ण दाढ़ के अग्रभाग पर पृथ्वी को उठाकर रसातल से बाहर निकाला। जनलोक में स्थित सनकादि मुनियों एवं सिद्धों ने भगवान की परम पुरुष के रूप में स्तुति की, जिसके बाद भगवान ने पृथ्वी को जल पर स्थिर कर पर्वतों की स्थापना की और पुनः सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया।
7 – सृष्टि का विस्तार से वर्णन
ब्रह्मा जी ने पूर्व कल्पों के संस्कारों के अनुसार अविद्या से युक्त अचेतन सृष्टि, पर्वत-वृक्षों की स्थावर सृष्टि, पशु-पक्षियों की तिर्यक् सृष्टि, देवताओं की ऊर्ध्व सृष्टि तथा मनुष्यों की अर्वाक् सृष्टि की रचना की। इसके पश्चात् सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार के वैराग्य धारण करने पर ब्रह्मा जी के क्रोध से नीलोहित रुद्र प्रकट हुए। रुद्र ने अपने समान अमर गणों की सृष्टि की, जबकि ब्रह्मा जी ने मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि और वशिष्ठ जैसे प्रजापतियों की रचना करके लोक विस्तार किया।
8 – मुख्य एवं गौण सर्ग का आख्यान
सृष्टि का विस्तार न होते देख ब्रह्मा जी ने अपने शरीर को दो भागों में विभक्त किया, जिससे एक भाग से पुरुष और दूसरे भाग से शतरूपा नामक योगिनी प्रकट हुईं। शतरूपा ने स्वायम्भुव मनु का वरण किया, जिनसे प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा प्रसूति एवं आकूति नामक कन्याएँ हुईं। प्रसूति का विवाह दक्ष से हुआ, जिनसे उत्पन्न चौबीस कन्याओं का विवाह धर्म, भृगु, शिव, मरीचि आदि ऋषियों से हुआ, जिनसे शुभ एवं धर्ममय गुणों का प्रसार हुआ; जबकि अधर्म और निकृति से भय, शोक, दुःख और मृत्यु की संतति उत्पन्न हुई।
9 – सृष्टि का क्रम
प्रलयकाल के अंत में शेषशय्या पर सोए नारायण की नाभि से एक हजार योजन लंबा कमल प्रकट हुआ, जिस पर ब्रह्मा जी अवतरित हुए। ब्रह्मा जी ने नारायण के उदर में समस्त ब्रह्मांड को देखा और बाहर आकर अहंकार करने लगे, तभी त्रिनेत्रधारी भगवान महेश्वर वहां साक्षात् प्रकट हुए। नारायण ने शिव जी को परमेश्वर मानकर प्रणाम किया और ब्रह्मा जी को दिव्य दृष्टि दी, जिसके बाद ब्रह्मा जी ने भी शिव जी की अधर्वशिरो मन्त्रों से स्तुति की। भगवान शिव ने स्पष्ट किया कि हरि और हर में भेद करने वाला कभी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता।
10 – रुद्रगणों की सृष्टि
नारायण के कान के मल से उत्पन्न मधु और कैटभ दैत्यों का भगवान की आज्ञा से वध हुआ। ब्रह्मा जी द्वारा पुनः सृष्टि की चिंता करने पर उनके क्रोधाश्रुओं से भूतगण प्रकट हुए और उनके प्राणों से प्रलयकारी रुद्र उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने उन्हें रुद्र नाम देकर आठ स्थान, आठ पत्नियाँ और आठ पुत्र प्रदान किए। जब रुद्र ने अमर एवं त्रिशूलधारी रुद्रगणों की सृष्टि की और मर्त्य जीवों को रचने से मना कर दिया, तो ब्रह्मा जी ने गद्गद होकर भगवान शिव के परम रूप की अष्टोत्तरशत श्लोकों से स्तुति की।
11 – जगज्जननी देवी का अवतार
ब्रह्मा जी की उग्र तपस्या से उनके मुख से अर्धनारीश्वर रूप में नीलोहित ईशान रुद्र प्रकट हुए। रुद्र ने अपने देह को पुरुष तथा स्त्री भागों में बाँटा; पुरुष भाग से एकादश रुद्र बने तथा स्त्री भाग से महालक्ष्मी आदि अनंत शक्तियाँ प्रकट हुईं। ब्रह्मा जी की आज्ञा से वह पराशक्ति दक्ष प्रजापति के घर सती के रूप में अवतरित हुईं और शिव जी की पत्नी बनीं। कालान्तर में दक्ष के अपमान के कारण सती ने योगबल से देह त्याग दी और पुनः हिमवान-मेना की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर शिव जी से विवाह किया।
12 – देवी का महान माहात्म्य
ऋषियों के पूछने पर भगवान कूर्म ने मेरू पर्वत पर ब्रह्मा जी द्वारा वर्णित देवी के परम रहस्यमयी माहात्म्य का उद्घाटन किया। देवी को परब्रह्म की अभिन्न पराशक्ति तथा शांति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति रूपी चार व्यूह शक्तियों की स्वामिनी बताया गया। हिमवान के सामने देवी ने अपना कोटिसूर्य सम महाविश्वरूप प्रकट किया, जिस पर हिमवान ने देवी के सहस्रनामों से स्तुति की। देवी ने ज्ञान, कर्म और भक्ति योग का उपदेश देते हुए कहा कि जो मेरी अनन्य शरण में आता है, वह शिव-सायुज्य मोक्ष पाता है।
13 – दक्ष की कन्याओं तथा ख्याति का वंश
महर्षि भृगु और ख्याति के यहाँ श्रीहरि की आद्याशक्ति महालक्ष्मी प्रकट हुईं, तथा धाता और विधाता नामक दो पुत्र हुए। अत्रि और अनसूया के यहाँ दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा का जन्म हुआ; अग्नि और स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन अग्नियों सहित उनतालीस अग्नियों का वंश फैला। पितरों की मानसी कन्या मेना ने हिमवान से विवाह कर मैनाक, क्रौंच, गंगा तथा देवी पार्वती को जन्म दिया, जिससे पावन वंश परंपरा स्थापित हुई।
14 – स्वायम्भुव मनु का वंश
स्वायम्भुव मनु के पुत्र उत्तानपाद के यहाँ परम भागवत ध्रुव प्रकट हुए, जिन्होंने अचल भक्ति से ध्रुवपद प्राप्त किया। इसी वंश में राजा वेन के पुत्र पृथु हुए, जिन्होंने प्रजा के हित के लिए पृथ्वी का दोहन किया। पृथु के वंशज राजा सुशील ने वैराग्य धारण कर श्वेताश्वतर मुनि से पाशुपात व्रत ग्रहण किया और भस्म धारण कर परमज्ञान पाया। इसी वंश के प्रचेताओं से दक्ष प्रजापति का पुनर्जन्म हुआ, जिन्होंने शिव जी से बैर करके अपनी पुत्री सती के देहत्याग का पाप सिर लिया।
15 – दक्ष के यज्ञ का विध्वंस
कनखल में दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में भगवान शिव का भाग न देखकर सती ने पिता के अज्ञान को धिक्कारा और योगाग्नि में अपनी देह भस्म कर दी। सती के देहत्याग से क्रुद्ध होकर महादेव ने अपनी जटा से महाबली वीरभद्र और महाकाली को प्रकट किया। वीरभद्र ने शिवगणों के साथ दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया, दक्ष का मस्तक काटकर अग्नि में होम कर दिया तथा अन्य देवताओं को दंडित किया। अंत में ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर प्रसन्न होकर शिव जी ने दक्ष को बकरे का सिर लगाकर जीवित किया, जिसके बाद दक्ष ने शिव जी की परम स्तुति की।
16 – दक्ष की अन्य कन्याओं की संतति
यज्ञ विध्वंस के पश्चात् भगवान शिव की कृपा से दक्ष प्रजापति ने साठ कन्याओं की सृष्टि की, जिनमें से तेरह कन्याओं का विवाह कश्यप ऋषि से हुआ। कश्यप की पत्नी अदिति से द्वादश आदित्य एवं वामन भगवान, दिति से दैत्य, दनु से दानव, विनता से गरुड़-अरुण, कद्रू से सहस्रों नाग, तथा सुरभि से एकादश रुद्र एवं गौएँ उत्पन्न हुईं, जिनसे यह समस्त चराचर जगत् भर गया।
17 – दिति की संतति तथा मरुद्गणों की उत्पत्ति
अपने पुत्रों के वध से दुखी दिति ने इंद्र को पराजित करने वाले पुत्र की प्राप्ति हेतु कठोर व्रत धारण किया। दिति के शौच नियम में तनिक सी भूल होते ही इंद्र ने उनके गर्भ में प्रवेश कर वज्र से गर्भ के सात टुकड़े कर दिए, और पुनः प्रत्येक के सात-सात टुकड़े किए। उन बालकों के रोने पर दयाद्र होकर इंद्र ने उन्हें ‘मरुद्गण’ नाम दिया और भगवान शिव एवं विष्णु की कृपा से उन्हें उनचास देवों के रूप में मरुद्गण की पदवी प्रदान की।
18 – महर्षि कश्यप के वंश का वर्णन
सूत जी ने कश्यप जी की संतति का विस्तृत विवरण दिया, जिसमें देवों, दैत्यों, दानवों, गंधर्वों, अप्सराओं तथा नागों के वंश का फैलाव तीनों लोकों में हुआ। भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जी के पराक्रम तथा नागलोक के वैभव का वर्णन करते हुए स्पष्ट किया गया कि वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर में कश्यप जी का वंश ही समस्त प्राणी जगत् का मूल आधार है।
19 – ऋषियों के वंश का वर्णन
सप्तर्षियों तथा भृगु, वशिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, कश्यप, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु जैसे परम पावन महर्षियों के कुलों का सुंदर आख्यान दिया गया। जमदग्नि, परशुराम, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और अगस्त्य जैसे महामुनियों की तपोनिष्ठा, उनके द्वारा किए गए महान यज्ञों तथा वेद रक्षा के प्रयासों का वर्णन किया गया, जिसका श्रवण मनुष्य के पापों का नाश कर उसे ब्रह्मतेज प्रदान करता है।
20 – सूर्यवंश का वर्णन
सूर्यदेव और संज्ञा के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रारंभ हुए परम पावन सूर्यवंश की कथा कही गई। मनु के पुत्रकामेष्टि यज्ञ से इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट, करूष और पृषध्र नामक नौ पुत्र तथा इला नामक कन्या हुई। शिव जी के वन में इला के पुरुष रूप सुद्युम्न बनने तथा बुधा के सहयोग से पुरूरवा के जन्म की कथा के साथ सूर्यवंशी राजाओं के भूमंडल पर राज्य विस्तार का वर्णन किया गया।
21 – इक्ष्वाकु वंश का वर्णन
अयोध्या को राजधानी बनाकर शासन करने वाले महाराजा इक्ष्वाकु के वंश में विकुक्षि, ककुत्स्थ, पृथु, श्रावस्त, कुवलाश्व, मान्धाता, मुचुकुंद और हरिश्चंद्र जैसे महाधार्मिक एवं सत्यसंध सम्राट प्रकट हुए। इन राजाओं ने सत्य और धर्म का दृढ़ता से पालन करते हुए अनेक अश्वमेध एवं राजसूय यज्ञ किए तथा हरि-हर की भक्ति से परमगति प्राप्त की।
22 – सोमवंश का वर्णन
अत्रि और अनसूया के पुत्र चंद्रमा से प्रादुर्भूत चंद्रवंश की पावन कथा वर्णित की गई। चंद्रमा के पुत्र बुध और इला से पुरूरवा का जन्म हुआ, जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया। पुरूरवा के वंश में नहुष और ययाति जैसे महान चक्रवर्ती हुए; ययाति ने अपनी वृद्धावस्था पुत्र पूरू को देकर यौवन भोगा और अंत में भोगों से विरक्त होकर केवल परमेश्वर के ध्यान में लीन होकर परमपद पाया।
23 – यदुवंश तथा हैहय वंश का वर्णन
ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु के वंश में हैहय परंपरा तथा सहस्रबाहु कार्तवीर्यार्जुन का जन्म हुआ। कार्तवीर्यार्जुन ने भगवान दत्तात्रेय की आराधना करके सहस्र भुजाएँ, अविनाशी रथ तथा अतुलनीय बल प्राप्त किया और सातों द्वीपों पर न्यायपूर्वक शासन किया, किन्तु अंत में अहंकारवश भार्गव परशुराम के हाथों वीरगति को प्राप्त हुए।
24 – यदुवंश का महान माहात्म्य
सूत जी ने यदुवंश की परम पावनता का गान किया, जिसमें वृष्णि, अंधक, देवरथ और शूरसेन जैसे धर्मात्मा राजा हुए। इस पावन वंश की गाथा सुनने मात्र से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी कुल की पवित्रता को देखकर पुरुषोत्तम श्रीहरि और शेषनाग ने भूभार हरण हेतु इसमें जन्म लेने का संकल्प किया था।
25 – यदुवंश में श्रीकृष्ण का माहात्म्य
मथुरा में वसुदेव और देवकी के घर भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के दिव्य अवतरण का भक्तिपूर्ण वर्णन किया गया। गोकुल की बाललीलाएँ, कंस, केशी, चाणूर जैसे अमानुषी दैत्यों का संहार, द्वारकापुरी की स्थापना, तथा रुक्मिणी-सत्यभामा आदि देवियों से विवाह कर अधर्म का नाश और हरि-हर भक्ति की पुनर्स्थापना का सुंदर आख्यान प्रस्तुत किया गया।
26 – भगवान श्रीकृष्ण की तपस्या
द्वारका में रहते हुए दिव्य पुत्र की लालसा से भगवान श्रीकृष्ण ने हिमालय में उपमन्यु मुनि के आश्रम की यात्रा की। उपमन्यु जी से पाशुपात दीक्षा ग्रहण कर, भस्म धारण करके श्रीकृष्ण ने बारह वर्षों तक कठोर तपोव्रत किया और महादेव जी का ध्यान किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर पार्वतीपति भगवान शिव ने साक्षात् दर्शन दिए और श्रीकृष्ण को साम्ब नामक पुत्र तथा अचल शिवभक्ति का वरदान दिया।
27 – भगवान श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन
पृथ्वी पर अपने अवतार कार्य को पूर्ण कर तथा प्रभास क्षेत्र में बहेलिए के तीर को निमित्त बनाकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला समेटी और निज स्वरूप में लीन हो गए। भगवान के धाम जाने के पश्चात् द्वारकापुरी समुद्र में डूब गई, और उन्होंने कलियुग के जीवों के कल्याण हेतु केवल भक्ति और धर्म का अमर संदेश पीछे छोड़ दिया।
28 – वेदव्यास तथा अर्जुन का संवाद
श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के पश्चात् अर्जुन की शक्ति क्षीण हो गई और वे गोपियों की रक्षा करने में असमर्थ रहे। दुःखी अर्जुन ने महर्षि वेदव्यास के आश्रम जाकर अपना संताप व्यक्त किया। व्यास जी ने बोध कराया कि काल ही सब शक्तियों का दाता और हर्ता है; श्रीकृष्ण साक्षात् नारायण थे जो अपना कार्य पूर्ण कर चले गए, अतः अब पाण्डवों को भी वैराग्य धारण कर परमयात्रा की तैयारी करनी चाहिए।
29 – युगधर्म का वर्णन
महर्षि वेदव्यास ने अर्जुन को चारों युगों के बदलते धर्म-स्वरूप का ज्ञान दिया। सत्ययुग में धर्म चार चरणों पर स्थित रहता है और ध्यान मुख्य साधन है; त्रेता में धर्म तीन चरणों पर रहता है और यज्ञ मुख्य है; द्वापर में दो चरणों पर रहकर पूजा मुख्य होती है; जबकि कलियुग में धर्म केवल एक चरण पर लंगड़ाता है और पाप, कपट एवं अज्ञानता का प्रसार होता है।
30 – युगधर्म पर व्यास-अर्जुन संवाद
व्यास जी ने आगे बताया कि कलियुग में घोर अधर्म होने के बावजूद एक बहुत बड़ा गुण है। जो फल सत्ययुग में हजारों वर्षों की कठोर तपस्या से, त्रेता में बड़े-बड़े यज्ञों से, और द्वापर में पूजा से मिलता है, वही फल कलियुग में केवल भगवान श्रीहरि और श्रीमहादेव के नाम-संकीर्तन तथा निष्काम भक्ति से सुलभता से प्राप्त हो जाता है।
31 – वाराणसी का महान माहात्म्य
वरुणा और असि नदियों के बीच स्थित परम पावन काशी (वाराणसी) क्षेत्र की महिमा का गान किया गया। काशी भगवान शिव और पार्वती का अविमुक्त क्षेत्र है, जिसे वे प्रलयकाल में भी कभी नहीं छोड़ते। काशी में देहत्याग करने वाले हर जीव के कान में स्वयं महादेव ‘तारक मन्त्र’ का उपदेश देकर उसे तत्काल मोक्ष प्रदान करते हैं।
32 – वाराणसी के दिव्य तीर्थों की महिमा
काशी के मणिकर्णिका, दशाश्वमेध आदि पावन घाटों की महिमा बताई गई। मणिकर्णिका में गंगा स्नान करके विश्वेश्वर लिंग के दर्शन करने से सहस्रों जन्मों के पाप कट जाते हैं। तीनों लोकों में काशी के समान कोई मोक्षदायी स्थान नहीं है।
33 – वाराणसी के शिवलिंगों का माहात्म्य
काशी में देवताओं, ऋषियों और भक्तों द्वारा स्थापित विश्वेश्वर, ओंकारेश्वर, कृत्तिवासेश्वर, कपर्दीश्वर आदि प्रसिद्ध शिवलिंगों की पूजा का फल वर्णित किया गया। विश्वनाथ जी का दर्शन और बिल्वपत्र से पूजन करने वाले जीव को कभी यमयातना नहीं सहनी पड़ती।
34 – वाराणसी के व्रत तथा आख्यान
काशी में निवास करके मोक्ष पाने वाले अनेक पौराणिक भक्तों और ऋषियों की कथाएँ सुनाई गईं। शिवरात्रि तथा सूर्य-चंद्र ग्रहण के समय काशी में किए गए जप, तप, दान और स्नान का फल अनंत गुना हो जाता है।
35 – काशी में महादेव का आनन्द ताण्डव
काशी के आनंदवन में भगवान शिव के दिव्य तांडव नृत्य और जगदम्बा पार्वती की नित्य उपस्थिति का वर्णन किया गया। इस काशी-माहात्म्य का पाठ या श्रवण करने वाला मनुष्य समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य पाकर अंत में शिवलोक प्राप्त करता है।
36 – प्रयागराज का माहात्म्य
गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती के संगम स्थल प्रयागराज को ‘तीर्थराज’ कहा गया है। यह ब्रह्मा जी की यज्ञवेदी है, जिसकी रक्षा स्वयं विष्णु और शिव करते हैं। माघ मास में प्रयाग संगम में स्नान करने से सौ अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।
37 – प्रयाग के तीर्थ स्थानों की महिमा
प्रयाग में स्थित अक्षयवट, वेणीमाधव मंदिर तथा विभिन्न स्नान घाटों का वर्णन किया गया। अक्षयवट की छाया में विष्णु पूजा तथा तर्पण करने से मनुष्य कुल सहित पवित्र होकर विष्णुलोक प्राप्त करता है।
38 – प्रयाग में श्राद्ध एवं याग विधि
प्रयाग संगम पर पितरों के लिए किया गया पिंडदान, तर्पण और दान अक्षय फल देने वाला होता है। यहाँ पितरों का श्राद्ध करने से सात पीढ़ियों के पितर नरक से मुक्त होकर स्वर्गलोक चले जाते हैं।
39 – प्रयाग में मोक्ष की प्राप्ति
प्राचीन राजाओं, ऋषियों और देवों द्वारा प्रयाग में स्नान एवं तप करके मुक्ति पाने के आख्यान कहे गए। प्रयागराज में निष्काम भाव से निवास और स्नान करने से जीव संसार-चक्र से सदा के लिए छूट जाता है।
40 – मन्वन्तरों का विस्तृत वर्णन
एक कल्प में आने वाले चौदह मन्वन्तरों का पूर्ण विवरण दिया गया। व्यतीत हो चुके छः मन्वन्तरों, वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर तथा आने वाले सात मन्वन्तरों के मनु, इंद्र, सप्तर्षि और भगवान विष्णु के अवतारी अंशों की सूची दी गई।
41 – भुवनकोश तथा पृथ्वी का भूगोल
सातों द्वीपों—जंबू, लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर द्वीप—तथा सात समुद्रों का विस्तार समझाया गया। जंबू द्वीप के केंद्र में स्थित सुवर्णमयी मेरू पर्वत का वर्णन किया गया, जो ब्रह्मांड का केंद्र है।
42 – चौदह भुवनों का विभाग
चौदह भुवनों का खाका प्रस्तुत किया गया, जिसमें पृथ्वी के नीचे स्थित अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल नाम के सात पाताल लोक, तथा ऊपर स्थित भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यलोक का सुंदर विवरण दिया गया।
43 – ग्रह तथा नक्षत्रों की गति
सूर्य, चंद्रमा, नवग्रहों और छब्बीस नक्षत्रों की गति एवं कालचक्र के संचालन का वर्णन किया गया। सूर्यदेव अपने सात घोड़ों वाले एकचक्र रथ पर सवार होकर जगत् को प्रकाश, जल और जीवन प्रदान करते हैं।
44 – ब्रह्माण्ड का विस्तार
समस्त ब्रह्मांड के विस्तार तथा ध्रुवतारे की केंद्रीय स्थिति का वर्णन हुआ। ध्रुव को आधार बनाकर ही समस्त नक्षत्र और ग्रह चक्र घूमते हैं, जिनसे ऋतुएँ और काल का संचालन होता है।
45 – प्रमुख पर्वत श्रेणियों का वर्णन
जंबू द्वीप की रक्षा करने वाले हिमवान, हेमकूट, निषध, मेरू, नील, श्वेत और श्रृंगवान पर्वतों, उनकी झीलों, दिव्य उपवनों और ऋषियों के पावन आश्रमों का आख्यान प्रस्तुत किया गया।
46 – अष्टदिक्पालों के निवास स्थान
मेरू पर्वत के शिखरों पर स्थित इंद्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर और ईशान नामक अष्टदिक्पालों की सुवर्णमयी नारियों तथा उनके ऐश्वर्य का वर्णन किया गया।
47 – नववर्षों का विभाग
जंबू द्वीप के नौ वर्षों—भारत, किंपुरुष, हरि, इलावृत, रम्यक, हिरण्मय, उत्तरकुरु, भद्राश्व और केतुमाल—का विवरण दिया गया। इनमें से केवल भारतवर्ष को ही ‘कर्मभूमि’ कहा गया है जहाँ से मोक्ष पाना संभव है।
48 – जम्बूद्वीप तथा भारतवर्ष की महिमा
भारतवर्ष की पावनता, इसकी नदियों और पर्वतों का गान किया गया। भारतभूमि में जन्म लेना देवताओं के लिए भी दुर्लभ है क्योंकि केवल यहीं से सत्कर्मों द्वारा स्वर्ग और मोक्ष के द्वार खुलते हैं।
49 – प्लक्ष आदि अन्य द्वीपों का वर्णन
लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच और शाक द्वीपों की नदियों, पर्वतों तथा वहाँ के निवासियों के दीर्घायु और निष्पाप जीवन का वर्णन किया गया जो प्राकृतिक रूप से परमेश्वर की आराधना करते हैं।
50 – पुष्करद्वीप का वर्णन
सातवें द्वीप पुष्करद्वीप, इसके विशाल मानसोत्तर पर्वत तथा उसके पार स्थित सुवर्णभूमि एवं लोकालोक पर्वत की सीमाओं का आख्यान प्रस्तुत किया गया।
51 – मन्वन्तरों में श्रीहरि की महिमा
प्रत्येक मन्वन्तर में भगवान पुरुषोत्तम नारायण द्वारा धर्म रक्षा हेतु धारण किए जाने वाले दत्तात्रेय, ऋषभ, नृसिंह आदि अवतारों का भक्तिपूर्ण संकीर्तन किया गया।
52 – वेदशाखाओं के विभाग का वर्णन
द्वापर युग में भगवान नारायण द्वारा वेदव्यास रूप में अवतरित होकर एक वेद को चार वेदों—ऋग्, यजुः, साम, अथर्व—में बाँटने तथा अपने शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनि, सुमंतु एवं सूत जी को संहिताएँ सौंपने की कथा कही गई।
53 – भगवान शिव के अवतारों का वर्णन
कलियुग में वेदव्यास के साथ-साथ भगवान शिव द्वारा भी अट्ठाईस अवतार धारण करने की कथा के साथ पूर्वार्ध का समापन होता है। श्वेताचार्य, लकुलीश आदि रूपों में अवतरित होकर महादेव पाशुपात योग और भस्म धारण की महिमा का प्रचार करते हैं और जीवों को मुक्ति प्रदान करते हैं।
उत्तरार्ध का हर अध्याय का विवरण
1 – ईश्वरगीता का प्रारंभ
बदरीकाश्रम के परम पावन आश्रम में सनत्कुमार आदि महर्षिगण संसार-चक्र से मुक्ति का मार्ग जानने हेतु कठोर तपस्या कर रहे थे, तभी उनके सम्मुख भगवान नारायण ऋषि के साथ त्रिनेत्रधारी भगवान श्री महादेव जी प्रकट हुए। भगवान नारायण ने महादेव जी को सर्वभूतात्मा परब्रह्म के रूप में नमन करते हुए उनसे ऋषियों के कल्याणार्थ परम रहस्यमयी ब्रह्मविद्या का उपदेश देने की प्रार्थना की। तत्पश्चात आकाश में प्रकट हुए दिव्य सिंहासन पर भगवान नारायण के साथ विराजमान होकर चंद्रमौलेश्वर भगवान शिव ने महर्षियों के संदेहों का निवारण करने हेतु ईश्वरगीता का पावन उपदेश प्रारंभ किया।
2 – पाशुपत योग तथा शुभाशुभ कर्मविपाक
भगवान महेश्वर ने आत्मा के नित्य, शुद्ध और निर्विकार स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट किया कि अज्ञान और अहंकार के कारण ही जीव देहाभिमान में बंधकर शुभाशुभ कर्मों के फल स्वरूप सुख-दुःख भोगता है। सांख्य ज्ञान और एकाग्र भक्ति के द्वारा जब साधक तामस और राजस अहंकार से परे होकर सर्वत्र परमेश्वर को ही देखता है, तब उसका मन निर्मल हो जाता है। ज्ञानी साधक संसार के मायावी प्रपंचों से मुक्त होकर जीवनकाल में ही जीवनमुक्त पद प्राप्त कर लेता है और अंततः परब्रह्म में विलीन हो जाता है।
3 – ब्रह्मस्वरूप निरूपण
भगवान ईशान ने परब्रह्म के सर्वव्यापी तथा अनिर्वचनीय स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया कि वे ही समस्त इंद्रियों के प्रकाशक होकर भी उनसे परे हैं। अव्यक्त परब्रह्म से काल, प्रधान और पुरुष का प्रादुर्भाव होता है, जिसके माध्यम से महत्तत्त्व और सृष्टि चक्र की रचना होती है। सर्वसमर्थ काल परमेश्वर शिव की ही अमोघ शक्ति है जो समस्त जीवों, देवों और लोकों की उत्पत्ति, पालन और प्रलय का संचालन करती है। जो साधक इस कालचक्र के स्वामी परमेश्वर की शरण ग्रहण करता है, वह संसार-सागर से सहसा तर जाता है।
4 – महायोगेश्वर माहात्म्य तथा भक्तियोग
भगवान महादेव ने प्रतिपादित किया कि केवल कठोर तप, दान अथवा विशाल यज्ञों से परे अनन्य भक्ति ही परमेश्वर को प्रसन्न करने का श्रेष्ठतम मार्ग है। भगवान की पराशक्ति ही ब्रह्मा रूप से सृष्टि, नारायण रूप से जगत्पालकता तथा रुद्र रूप से प्रलय का विधान करती है। परमेश्वर अपने अनन्य भक्तों की वर्ण अथवा आश्रम के भेदभाव के बिना रक्षा करते हैं और उनके समस्त पापों का क्षय करके उन्हें अपने परम अनामय पद में स्थान प्रदान करते हैं।
5 – ईश्वर के तांडव नृत्य का दर्शन
भगवान महेश्वर ने अपना सहस्रों मस्तक और सहस्रों भुजाओं वाला कोटिसूर्यप्रभ अति भयानक एवं अद्भुत विश्वरूप प्रकट किया और आकाशगंगा में दिव्य तांडव नृत्य किया। उस अलौकिक अवसर पर महर्षियों ने देखा कि भगवान श्रीमन नारायण सहसा महादेव जी के वाम भाग में विलीन हो गए, जिससे हरि-हर के अभेद स्वरूप की साक्षात पुष्टि हुई। इस परम आश्चर्यमय दृश्य को देखकर सनत्कुमार, भृगु, वामदेव आदि महर्षियों ने गद्गद होकर ऋचाओं द्वारा शंभु की स्तुति की और परम आनंद प्राप्त किया।
6 – ईश्वर के प्रभाव का वर्णन
भगवान शिव ने अपने अलौकिक ऐश्वर्य और प्रभुत्व का वर्णन करते हुए बताया कि समस्त ब्रह्मांडीय व्यवस्था उनके ही परम शासन में संचालित होती है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के अतिरिक्त सूर्य, चंद्रमा, वायु, वरुण, अग्नि, इंद्र, यम तथा चतुर्दश मनु उन्हीं की आज्ञा का अक्षरशः पालन करते हुए अपने-अपने लोकों का संचालन करते हैं। समस्त सृष्टि परमेश्वर की ही शक्ति का विलास है।
7 – पशुपति तत्त्व का प्रतिपादन
भगवान शिव ने चराचर जगत् में अपनी दिव्य विभूतियों का आख्यान करते हुए बताया कि चौबीस तत्त्वों से निर्मित इस भौतिक संसार में अज्ञान और कर्मों में बंधे समस्त जीव ‘पशु’ कहलाते हैं। इन जीवों को माया रूपी सुदृढ़ पाश में बांधने वाले तथा परम भक्ति से प्रसन्न होकर उन पाशों का उच्छेदन करने वाले केवल एकमात्र ‘पशुपति’ परमेश्वर शिव ही हैं, जो अपने शरणार्थी भक्तों को अक्षय मोक्ष प्रदान करते हैं।
8 – ब्रह्म तथा माया के स्वरूप का वर्णन
भगवान महेश्वर ने अपनी अगाध पराशक्ति का निरूपण करते हुए बताया कि उनके ही अव्यक्त गर्भ से सुवर्णमय ब्रह्मांड का प्रादुर्भाव होता है जिसमें हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर के सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतंत्रता, अलुप्तशक्ति और अनंतरूप नामक छह दिव्य अंग तथा सात सूक्ष्म तत्त्व ब्रह्मांड की आध्यात्मिक संरचना का निर्माण करते हैं, जो माया के आवरण से जीवों को आच्छादित रखते हैं।
9 – परतत्त्व निरूपण
भगवान शिव ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे स्वयं निर्गुण और अद्वैत हैं, तथापि माया के माध्यम से सगुण जगत् के रूप में भासित होते हैं। भगवान विष्णु का परम धाम परमेश्वर का ही स्वयंप्रकाश रूप है जहाँ अज्ञान का तम प्रवेश नहीं कर सकता। जो बुद्धिमान पुरुष इस अनिर्वचनीय, आनंदमय परब्रह्म का निरंतर ध्यान करते हैं, वे अपने अहंकार को विगलित कर सर्वथा निर्भय होकर परमपद प्राप्त करते हैं।
10 – ब्रह्म तत्त्व के मंगल स्वरूप का वर्णन
भगवान ईशान ने परम व्योम में स्थित स्वयंप्रकाश, निराकार और परम मंगलमय अव्यक्त लिंग का निरूपण किया, जो सूर्य, चंद्रमा, अग्नि या विद्युत के प्रकाश से परे अपनी स्वतःसिद्ध दिव्य प्रभा से प्रकाशित होता है। जितेंद्रिय ब्रह्मवित् साधक प्रणव ओमकार के निरंतर ध्यान और इंद्रिय निग्रह द्वारा अपने अंतःकरण में इस परम लिंग का साक्षात्कार करके परम मोक्ष प्राप्त करते हैं।
11 – योग प्रशंसा तथा पाशुपत योग
भगवान महादेव ने ईश्वरगीता का उपसंहार करते हुए अष्टांग योग, अभावयोग तथा महायोग के स्वरूप को विस्तार से समझाया। उन्होंने यम, नियम, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और ईश्वरपूजन के कठोर विधान के साथ-साथ पाशुपत व्रत, भस्मधारण की महिमा तथा काशी क्षेत्र में निवास के फल का वर्णन करते हुए बताया कि इस योग का निष्काम आचरण करने वाला परमार्थी साक्षात शिवसायुज्य प्राप्त करता है।
12 – व्यासगीता तथा वर्णाश्रम धर्म का प्रारंभ
ईश्वरगीता के पूर्ण होने पर महर्षियों के निवेदन पर भगवान वेदव्यास ने व्यासगीता के रूप में स्वायम्भुव मनु द्वारा उपदिष्ट सनातन वर्णाश्रम धर्म का आख्यान प्रारंभ किया। उन्होंने द्विज जातियों के लिए उपयुक्त समय पर उपनयन संस्कार, यज्ञोपवीत, मेखला तथा दंड धारण के नियमों का वर्णन किया तथा ब्रह्मचारी के लिए संध्यावंदन, अग्निहोत्र, गुरुभक्ति और पवित्र जीवनचर्या का विधान बताया।
13 – आचमन तथा शौच विधि
महर्षि वेदव्यास ने देह और मन की शुद्धि हेतु आचमन की शास्त्रीय विधि और शौचाचार का विशद वर्णन किया। उन्होंने भोजन, शयन, छींकने अथवा अपवित्र वस्तुओं के स्पर्श के पश्चात ब्राह्मतीर्थ से आचमन करने के नियम बताए तथा स्पष्ट किया कि जब तक बाह्य एवं आभ्यंतर शुद्धि न हो, तब तक कोई भी धार्मिक अथवा वैदिक कृत्य सफल नहीं होता।
14 – ब्रह्मचारी के धर्म तथा वेदाध्ययन विधि
महर्षि व्यास ने ब्रह्मचारी के लिए भिक्षाटन के कड़े नियम, गुरु, गुरुपत्नी तथा वृद्धों के प्रति परम आदरयुक्त व्यवहार तथा प्रतिदिन वेदाध्ययन की विधि बताई। उन्होंने वेद पाठ के प्रारंभ और समापन की उपाकर्म तथा उत्सर्जन विधियों के साथ-साथ अनध्याय के विशेष दिनों का विवरण दिया और प्रतिदिन गायत्री जप की परम महिमा का प्रतिपादन किया।
15 – गृहस्थ धर्म का वर्णन
महर्षि वेदव्यास ने समस्त आश्रमों के आश्रयदाता गृहस्थाश्रम की महिमा गाते हुए समावर्तन संस्कार, गुणवती कन्या से विवाह, नित्य पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान तथा गृह्याग्नि के परिपालन का निरूपण किया। उन्होंने अतिथि सत्कार, सत्य भाषण, दया, और धर्मानुसार अर्थ एवं काम के सेवन को गृहस्थ का परम कर्तव्य बताया, जिससे इहलोक और परलोक दोनों सिद्ध होते हैं।
16 – नियम, आचार तथा वर्जन विधि
महर्षि व्यास ने समाज में धार्मिक और नैतिक पवित्रता बनाए रखने हेतु त्याज्य आचरणों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने हिंसा, चोरी, नास्तिकों और पतितों का संग, परनिंदा, आत्मप्रशंसा तथा देव-वेद निंदा का पूर्ण रूप से त्याग करने का निर्देश दिया और बताया कि आचार ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म और रक्षक है।
17 – भक्ष्य तथा अभक्ष्य विचार
महर्षि वेदव्यास ने साधक के चित्त की शुद्धि हेतु भक्ष्य और अभक्ष्य पदार्थों का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने पतितों, दुराचारियों, मदिरापियों अथवा शौचहीन व्यक्तियों द्वारा दिए गए अन्न तथा अभक्ष्य लहसुन, प्याज, कवक आदि पदार्थों के सेवन का निषेध किया और बताया कि सात्त्विक अन्न के सेवन से ही मन निर्मल होकर ईश्वर ध्यान में प्रवृत्त होता है।
18 – नित्य कर्म तथा आह्निक विधि
महर्षि व्यास ने द्विज के लिए ब्राह्ममुहूर्त में जागरण से लेकर दैनिक संध्या-उपासना, भस्मधारण तथा स्नान के छह प्रकारों—ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य, वारुण और यौगिक स्नान—का वर्णन किया। उन्होंने प्रातः एवं मध्याह्न की संध्या, गायत्री जप, सूर्योपस्थान हेतु सूर्यहृदय स्तोत्र का पाठ तथा देव, ऋषि और पितृ तर्पण की विधि का भक्तिपूर्वक निरूपण किया।
19 – भोजन विधि तथा सायं संध्याचार
महर्षि वेदव्यास ने भोजन को प्राणाग्निहोत्र यज्ञ के रूप में ग्रहण करने के नियम, पंच प्राणों के लिए आहुति देने के मन्त्र तथा भोजन संबंधी पवित्र आचारों का वर्णन किया। इसके साथ ही उन्होंने सायं संध्यावंदन, रात्रि अग्निहोत्र, शयन के नियम तथा ब्रह्मचर्य के महत्व का निरूपण करते हुए दैनिक धर्मचर्या पूर्ण की।
20 – श्राद्धकल्प तथा तिथि विचार
महर्षि व्यास ने पितरों के तर्पण हेतु श्राद्धकल्प का विस्तृत वर्णन करते हुए अमावस्या, अष्टमी, नवमी, तिथि संक्रांति तथा ग्रहण आदि के पुण्य अवसरों को रेखांकित किया। उन्होंने गया, वराह पर्वत, काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र जैसे पावन तीर्थों में श्राद्ध करने के अक्षय फल की महिमा बताई और पितरों को संतुष्ट करने वाले कंद-मूल, तिल, दुग्ध तथा मधु आदि पदार्थों का विवरण दिया।
21 – श्राद्ध में ब्राह्मणों की परीक्षा
महर्षि वेदव्यास ने श्राद्ध कृत्य हेतु निमंत्रित किए जाने वाले ब्राह्मणों की योग्यता का कड़ा मानदंड प्रस्तुत किया। उन्होंने वेदविद्या-विशारद, तपोनिष्ठ, अग्निहोत्री, शमदमादि गुणसंपन्न तथा शिव-विष्णु के अनन्य भक्तों को ही श्राद्ध का पात्र बताया, जबकि मूर्ख, पतित, दंभी और आचारहीन व्यक्तियों को श्राद्ध में सर्वथा वर्जित ठहराया।
22 – श्राद्ध विधि का अनुष्ठान
महर्षि व्यास ने श्राद्ध के दिन पूर्वाहन में ब्राह्मणों के स्वागत, पाद-प्रक्षालन, पूर्वाभिमुख एवं उत्तराभिमुख बैठने के स्थान तथा विश्वेदेव एवं पितरों के आवाहन की संपूर्ण विधि बताई। उन्होंने तिल-जल से अर्घ्य देने, अग्नि या ब्राह्मण के हाथ में होम करने, कुशा पर पिंडदानानंतुक अर्पण करने तथा अंत में दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करने का सविस्तार वर्णन किया।
23 – अशौच विचार
महर्षि वेदव्यास ने वंश में जन्म और मरण से होने वाले सूतक अथवा अशौच के नियमों का निरूपण किया। उन्होंने चारों वर्णों के लिए अशौच की भिन्न-भिन्न समयावधि बताई तथा राजाओं, यतियों, ब्रह्मचारियों एवं यज्ञदीक्षित पुरुषों के लिए अशौच के अपवादों तथा अशौच के अंत में शुद्धि की शास्त्रीय विधियों को स्पष्ट किया।
24 – द्रव्य शुद्धि विधि
महर्षि व्यास ने विभिन्न भौतिक पदार्थों, धातुओं, काष्ठ, पाषाण, वस्त्र, धान्य तथा भूमि आदि के अशुद्ध होने पर उन्हें पुनः पवित्र करने के उपाय बताए। उन्होंने जल, भस्म, मृत्तिका, सूर्यकिरण और अग्नि के प्रयोग द्वारा सूक्ष्म अशुद्धियों को दूर करके वस्तुओं को यज्ञ एवं दैनिक कार्यों के योग्य बनाने की विधि समझाई।
25 – स्त्री धर्म का वर्णन
महर्षि वेदव्यास ने पातिव्रत्य धर्म की परम पावन महिमा का गान करते हुए साध्वी स्त्री के कर्तव्यों का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि अपने पति की भक्तिपूर्वक सेवा करने वाली, सास-ससुर का आदर करने वाली और गृहकार्यों को दक्षता से निपटाने वाली पतिव्रता नारी अपने पति के आधे पुण्य की भागिनी बनकर परमगति प्राप्त करती है।
26 – वानप्रस्थ धर्म का वर्णन
महर्षि व्यास ने जीवन के तीसरे सोपान वानप्रस्थ आश्रम का निरूपण करते हुए बताया कि गृहस्थ के कर्तव्यों को पूर्ण कर पोते का मुख देख लेने पर मनुष्य को वन में जाकर निवास करना चाहिए। वल्कल वस्त्र धारण कर, कंद-मूल-फल का अशन करते हुए और कठोर तपस्या के साथ अग्निहोत्र करते हुए मन को विरक्त करना इस आश्रम का परम लक्ष्य है।
27 – संन्यास धर्म का वर्णन
महर्षि वेदव्यास ने परम आश्रम संन्यास का वर्णन करते हुए सर्वसंग त्याग, दंड-कमंडल धारण और आत्मानुसंधान का विधान बताया। गृह, कुटुंब और अग्नियों का त्याग कर एकाकी विचरण करने वाला परिव्राजक संन्यासी भिक्षाचरण द्वारा जीवन निर्वाह करते हुए सर्वभूतों के प्रति अहिंसा भाव रखकर परब्रह्म में निरंतर लीन रहता है।
28 – यति धर्म का वर्णन
महर्षि व्यास ने यतियों एवं परमहंसों के लिए कठोर मनोनियम, वाक्-संयम और निरंतर आत्मचिंतन के कड़े नियम बताए। मान-अपमान, सुख-दुःख और निंदा-स्तुति में समभाव रखते हुए जो यति अपने अंतःकरण में विराजमान परमेश्वर का ध्यान करता है, वह माया के समस्त बंधनों को काटकर तत्काल शिवसायुज्य प्राप्त करता है।
29 – प्रायश्चित्त प्रारंभ तथा महापातक
महर्षि वेदव्यास ने अज्ञान अथवा प्रमादवश मनुष्य से होने वाले पापों की निवृत्ति हेतु प्रायश्चित्त विधान का प्रारंभ किया। उन्होंने ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, और गुरुपत्नी-गमन नामक चार महापातकों तथा उनके साथ संसर्ग करने वाले पांचवें महापातक का निरूपण करते हुए उनके भयानक परिणामों से सचेत किया।
30 – महापातक का प्रायश्चित्त
महर्षि व्यास ने महापातकों के घोर पापों के क्षालनार्थ अत्यधिक कठोर व्रतों, दीर्घकालिक उपवासों, वेद मन्त्रों के निरंतर जप, पावन तीर्थों की यात्राओं तथा विशाल दान विधान का आख्यान दिया, जिनसे पापी का अंतःकरण पुनः पवित्र होकर धर्मकार्य के योग्य होता है।
31 – अनुपातक का प्रायश्चित्त
महर्षि वेदव्यास ने महापातक के सदृश अनुपातकों—जैसे क्षत्रिय या वैश्य का वध, वेद का परित्याग, झूठ बोलना तथा निषिद्ध वस्तुओं का विक्रय—के प्रायश्चित्त हेतु कृच्छ्र व्रत, चांद्रायण व्रत, गायत्री जप तथा गो-दान आदि का विधान बताया।
32 – उपपातक का प्रायश्चित्त
महर्षि व्यास ने गौ-वध, हरे वृक्षों का अकारण छेदन, अनध्याय में पढ़ना तथा छोटी-मोटी चोरी आदि उपपातकों के निष्कृति के उपाय बताए। उन्होंने पंचगव्य प्राशन, लघु व्रतों, और शिव-विष्णु की विशेष प्रार्थना द्वारा इन पापों से मुक्ति का मार्ग दर्शाया।
33 – प्रकीर्णक प्रायश्चित्त
महर्षि वेदव्यास ने अज्ञात, गुप्त अथवा अज्ञानवश प्रतिदिन होने वाले छोटे-मोटी भूलों के निरसन हेतु प्रकीर्णक प्रायश्चित्तों का वर्णन किया। उन्होंने प्राणायाम, रुद्रसूक्त और पुरुषसूक्त के जप, पवित्र नदियों में स्नान तथा दैनंदिन ईश्वर-प्रार्थना द्वारा पापक्षय का विधान बताया।
34 – कृच्छ्र तथा चांद्रायण व्रत विधि
महर्षि व्यास ने परम पावन प्राजापत्य कृच्छ्र, सांतपन, पराक तथा चांद्रायण व्रतों का सविस्तार वर्णन किया। चंद्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने के अनुसार ग्रास नियम का पालन करके किया जाने वाला चांद्रायण व्रत शरीर की समस्त नाड़ियों को शुद्ध करके जन्मांतर के पापों को भस्म कर देता है।
35 – पात्र-अपात्र विचार तथा दान माहात्म्य
महर्षि वेदव्यास ने कलियुग में परम धर्म रूप दान की महिमा बताते हुए सुपात्र एवं अपात्र का कड़ा विवेक प्रस्तुत किया। उन्होंने वेदज्ञ, शमदमादि गुणसंपन्न और तपोनिष्ठ ब्राह्मण को ही दान का वास्तविक पात्र बताया, जबकि दंभी, कपाटी या नास्तिक को दान देना निष्फल एवं पापवर्धक बताया।
36 – दान का प्रभाव तथा प्रकार
महर्षि व्यास ने नित्य, नैमित्तिक, काम्य और विमल नामक चार प्रकार के दानों का स्वरूप समझाया। उन्होंने भूमिदान, गोदान, सुवर्णदान, तिलदान तथा अन्नदान के महात्म्य का गान करते हुए बताया कि निष्काम भाव से ईश्वरार्पण बुद्धि से दिया गया विमल दान अक्षय ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराता है।
37 – महादानों का वर्णन
महर्षि वेदव्यास ने तुलापुरुष, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मांड, गोसहस्र आदि सोलह महादानों का दिव्य वर्णन किया। उन्होंने यज्ञवेदी के निर्माण, वेद मन्त्रों के आवाह्न तथा विधिपूर्वक किए गए महादान की महिमा बताते हुए कहा कि इससे दाता के साथ-साथ उसकी सात पीढ़ियाँ विष्णु-शिव के परम धाम को प्राप्त करती हैं।
38 – तीर्थ माहात्म्य तथा प्रयाग वर्णन
महर्षि व्यास ने समस्त तीर्थों के राजा प्रयागराज की परम पावनता और गंगा, यमुना तथा गुप्त सरस्वती के त्रिवेणी संगम की महिमा का गान किया। माघ मास में संगम स्नान, वेणीमाधव का पूजन तथा अक्षयवट के दर्शन से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होना बताया।
39 – वाराणसी माहात्म्य
महर्षि वेदव्यास ने भगवान शिव और पार्वती की नित्य निवासभूमि परम पावन काशी की अलौकिक महिमा का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि काशी में देहत्याग करने वाले हर जीव को स्वयं महादेव दाहिने कान में ‘तारक मन्त्र’ प्रदान करके तत्काल जीवनमुक्त कर देते हैं।
40 – गया माहात्म्य
महर्षि व्यास ने गयासुर के पवित्र देह पर स्थित गया तीर्थ तथा विष्णुपद की महिमा बताई। उन्होंने गयाशिर पर विधिपूर्वक श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों के अक्षय तृप्त होकर ब्रह्मलोक जाने का मार्ग उजागर किया।
41 – पुराण निर्देश तथा पुराण श्रवण फल
महर्षि वेदव्यास ने भगवान नारायण द्वारा रचित अष्टादश महापुराणों की सूची, उनके परिमाण तथा प्रामाणिकता का निर्देश किया। उन्होंने कूर्मपुराण के अध्ययन और श्रवण को परम पावन बताते हुए कहा कि इससे साधक के समस्त पाप नष्ट होकर उसे भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
42 – कूर्मपुराण के पूर्वार्ध तथा उत्तरार्ध का संग्रह
महर्षि व्यास ने कूर्मपुराण के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दोनों भागों के समस्त विषयों का संक्षिप्त सार संगृहीत करके सुनाया। उन्होंने पुनः बल देकर प्रतिपादित किया कि हरि-हर का अभेद ज्ञान तथा वैदिक वर्णाश्रम धर्म का आचरण ही इस पुराण का परम सिद्धांत है।
43 – पुराण माहात्म्य तथा फलश्रुति
महर्षि वेदव्यास ने कूर्मपुराण के पाठ, श्रवण तथा इसे लिखकर ब्राह्मणों को दान देने की अलौकिक फलश्रुति का गान किया। उन्होंने बताया कि इस दिव्य पुराण का आश्रय लेने वाला साधक इहलोक में सर्व सुख भोगकर अंत में भगवान शिव और विष्णु के परम धाम को प्राप्त करता है।
44 – कूर्मपुराण की समाप्ति
सूत लोमहर्षण जी ने नैमिषारण्य के ऋषियों के सम्मुख कूर्मपुराण के उत्तरार्ध भाग के इस आख्यान को पूर्ण किया। परम आनंद में निमग्न होकर ऋषियों ने सूत जी, महर्षि वेदव्यास तथा कच्छप रूपधारी भगवान श्रीमन नारायण के चरणों में बारंबार प्रणाम किया और यह पावन पुराण गाथा संपन्न हुई।