Read Brahma Vaivarta Purāṇa’s Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa in Hindi
ब्रह्म वैवर्त पुराण अष्टादश महापुराणों में परम पावन, भक्तिरस से ओत-प्रोत एवं वैष्णव सिद्धान्तों का सर्वोच्च मुकुटमणि ग्रन्थ है। अठारह सहस्र श्लोकों में सुशोभित यह पुराण चार विशाल खण्डों में विभक्त है, जिसमें चतुर्थ एवं सबसे विशाल खण्ड श्री कृष्ण जन्म खण्ड के नाम से सुविख्यात है। कुल एक सौ पच्चीस (१२५) अध्यायों में विस्तृत यह खण्ड इस सम्पूर्ण महापुराण का पावन हृदय एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष है। पूर्ववर्ती ब्रह्म खण्ड, प्रकृति खण्ड एवं गणेश खण्ड की पावन कथाओं के अनन्तर, यह खण्ड परात्पर पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के धरा-अवतरण, दिव्य बाल-लीलाओं, गोकुल एवं व्रज की अप्राकृत लीलाओं, पूतनादि राक्षसों के संहार, श्रीगोवर्धन-धारण, जगज्जननी भगवती श्रीराधा रानी एवं गोपियों के साथ महा-रासलीला, द्वारका-लीला, पाण्डव-दौत्य, भगवद्गीता एवं उद्धव-गीता के अमर ज्ञान तथा अन्ततः भगवान् के स्वधाम-गमन का अत्यन्त विशद एवं भक्तिमयी आख्यान प्रस्तुत करता है।
यह अनुक्रमणिका (विषय-सूची) श्री कृष्ण जन्म खण्ड के समस्त एक सौ पच्चीस अध्यायों का सार-संक्षेप परम पावन कथात्मक शैली में प्रस्तुत करती है। इस खण्ड का मूल दार्शनिक सन्देश यही है कि सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही समस्त ब्रह्माण्डों एवं अवतारों के आद्य स्रोत, परात्पर परंब्रह्म हैं, जो अपने अनन्य भक्तों के प्रेमाधीन होकर पृथ्वी का भार हरण करने हेतु अवतरित होते हैं। निष्काम प्रेमभक्ति, श्रीराधा-कृष्ण के नित्य अभेद तत्त्व, भक्ति-कवचों, सहस्रनामों एवं गोलोक धाम की अलौकिक महिमा को गान करने वाला यह सार-संक्षेप मुमुक्षु जीवों के हृदय में अनन्य कृष्ण-भक्ति का सञ्चार कर उन्हें मोक्ष एवं नित्य गोलोक-वास प्रदान करता है।
पुराण का स्वरूप एवं दार्शनिक मर्म
श्री कृष्ण जन्म खण्ड ब्रह्म वैवर्त पुराण का सबसे विशाल एवं महत्त्वपूर्ण भाग है। प्रथम ब्रह्म खण्ड में भौतिक सृष्टि का वर्णन, द्वितीय प्रकृति खण्ड में पञ्च-देवियों एवं उप-शक्तियों के प्राकट्य का गान, तथा तृतीय गणेश खण्ड में विघ्नविनाशक श्रीगणेश की लीलाओं का निरूपण करने के पश्चात्, यह चतुर्थ खण्ड साक्षात् परंब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की सर्वोपरि सत्ता एवं उनकी लीला-माधुरी का उद्घाटन करता है। इसमें वसुदेव-देवकी का विवाह, मथुराह-कौंस के कूप में प्राकट्य, गोकुल में नन्दोत्सव, पूतना, शकटासुर, तृणावर्त, बकासुर, अघासुरादि का संहार, ब्रह्मा जी का मोह-भङ्ग, कालिय-दमन, गोवर्धन-पूजा एवं धारण, इन्द्र का गर्व-भङ्ग, महारासलीला, कंस-वध, सांदीपनि आश्रम में विद्याभ्यासादि, रुक्मिणी एवं अष्टमहिषियों के विवाह, बाणासुर-मर्दन, सुदामा-उद्धार, महाभारत युद्ध तथा उद्धव-गीता जैसे अनन्त पावन प्रसङ्गों का गम्भीर आख्यान है।
इस खण्ड का मुख्य सिद्धान्त यह है कि सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही स्वयमेव परंब्रह्म हैं, और भगवती श्रीराधा रानी उनकी नित्य स्वरूप-शक्ति (आह्लादिनी शक्ति) हैं। वे दोनों दो नहीं, अपितु एक ही आत्मा के दो रूप हैं जो दिव्य प्रेम-रस का आस्वादन कराने हेतु द्वैत भाव प्रकट करते हैं। यह ग्रन्थ स्पष्ट करता है कि ज्ञान, कर्म एवं तपस्या की अपेक्षा केवल निष्काम प्रेमा-भक्ति ही भगवान् को वश में करने का एकमात्र साधन है। इस पावन ग्रन्थ का श्रवण, पठन एवं मनन जीव के जन्म-जन्मान्तरों के पापों को भस्म कर उसे सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का शाश्वत सामीप्य प्रदान करता है।
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Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa is organized as follows and hence reading is suggested in this order:
- ब्रह्म खण्ड
- प्रकृति खण्ड
- गणेश खण्ड
- श्री कृष्ण जन्म खण्ड
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अनुक्रमणिका
१ – मङ्गलाचरण एवं महर्षि शौनक की जिज्ञासा
नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में एकत्र ऋषियों के सम्मुख श्रीसूत गोस्वामी जी ने श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के अलौकिक कथामृत का प्रकटीकरण आरम्भ किया। सूत जी ने सर्वेश्वर श्रीकृष्ण, भगवती श्रीराधा रानी, ब्रह्मा जी एवं महर्षि व्यासदेव के चरणों में भावपूर्ण साष्टाङ्ग प्रणाम अर्पित कर भक्तों की रक्षा हेतु अवतरित भगवान् की असीम करुणा का गान किया। महर्षि शौनक एवं अन्य ऋषियों ने परम श्रद्धापूर्वक सर्वेश्वर के गूढ़ अवतरण-रहस्य को सुनने हेतु अपनी तीव्र जिज्ञासा व्यक्त की।
२ – पृथ्वी का दुःख एवं देवगणों द्वारा श्रीहरि की स्तुति
कंस, जरासंध, शिशुपालादि अधर्मी असुर-राजाओं के अत्याचारों से पीड़ित होकर पृथ्वी देवी गो-रूप धारण कर रोती हुई ब्रह्मा जी की शरण में पहुँचीं। ब्रह्मा जी, भगवान् शिव तथा समस्त देवगणों को साथ लेकर क्षीरसागर के तट पर गए और सर्वेश्वर श्रीविष्णु की आकुल स्तुति की। तब आकाशवाणी ने आश्वासन दिया कि सर्वेश्वर श्रीकृष्ण शीघ्र ही मथुरा में अवतरित होकर पृथ्वी का भार हरण करेंगे।
३ – वसुदेव-देवकी का पावन विवाह एवं आकाशवाणी
मथुरा नगरी में राजा उग्रसेन एवं यादवों की उपस्थिति में वसुदेव जी और राजकुमारी देवकी का विवाह परम वैभव से सम्पन्न हुआ। जब कंस अपनी बहन देवकी को रथ में बैठाकर विदा कर रहा था, तब भयंकर आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का संहार करेगा। क्रोधित कंस ने देवकी को मारना चाहा, किन्तु वसुदेव जी ने अपने होने वाले समस्त पुत्रों को कंस को सौंपने का वचन देकर अपनी पत्नी के प्राण बचाए।
४ – कंस द्वारा वसुदेव-देवकी का बन्धन एवं कारागार-वास
वसुदेव जी के वचन देने पर भी कंस ने भयभीत होकर वसुदेव और देवकी को भारी लोहे की शृङ्खलाओं में बाँधकर काले कारागार में डाल दिया। तत्पश्चात् कंस ने अपने पिता उग्रसेन को गद्दी से हटाकर स्वयं राजा बनकर अत्याचार आरम्भ कर दिया। कारागार के अन्धकार में वसुदेव-देवकी निरन्तर भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए अवतरण काल की प्रतीक्षा करने लगे।
५ – प्रथम छः पुत्रों का जन्म एवं कंस द्वारा वध
कहाँ कारागार में वर्षों बीतने पर देवकी ने क्रमशः छः पुत्रों को जन्म दिया। वसुदेव जी ने अपने वचन के अनुसार प्रत्येक शिशु को कंस को सौंपा। मन्त्री योगिनी के बहकावे में आकर कंस ने उन छः नवजात शिशुओं को निर्दयतापूर्वक पत्थर पर पटककर मार डाला, जिससे वसुदेव-देवकी अगाध दुःख में डूब गए।
६ – योगमाया की दिव्य लीला एवं सातवें गर्भ का स्थानान्तरण
जब देवकी के गर्भ में सातवें बालक के रूप में भगवान् सङ्कर्षण (बलराम जी) पधारे, तब सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया शक्ति को आज्ञा दी। योगमाया ने देवकी के गर्भ को योगबल से गोकुल में नन्द जी के यहाँ रह रही रोहिणी के गर्भ में स्थानान्तरित कर दिया। मथुरा में देवकी का गर्भपात समझा गया, जबकि गोकुल में रोहिणी के गर्भ से तेजस्वी बलराम जी का प्राकट्य हुआ।
७ – मध्यरात्रि में मथुरा के कारागार में श्रीकृष्ण का प्राकट्य
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की घनघोर मध्यरात्रि में, जब बादल गरज रहे थे और भीषण वर्षा हो रही थी, मथुरा का कारागार दिव्य ज्योति से जगमगा उठा। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूप में, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, किरीट-कुण्डल से सुशोभित होकर वसुदेव-देवकी के सम्मुख प्रकट हुए। अपने परम प्रभु का दिव्य रूप देखकर दोनों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनकी भावपूर्ण स्तुति की।
८ – उफनती यमुना को पार कर वसुदेव जी की गोकुल-यात्रा
परमेश्वर की आज्ञा से भगवान् तुरंत एक सुकुमार नवजात शिशु के रूप में परिवर्तित हो गए। वसुदेव जी को निर्देश मिला कि वे बालक को तुरंत गोकुल में नन्द जी के यहाँ पहुँचा दें। योगमाया के प्रभाव से कारागार के द्वार अपने आप खुल गए और रक्षक गाढ़ निद्रा में सो गए। वसुदेव जी टोकरी में बालक को लेकर निकले। उफनती यमुना जी ने प्रभु के चरण-कमल स्पर्श कर वसुदेव जी को मार्ग दिया, और शेषनाग ने अपने फणों से वर्षा से बालक की रक्षा की।
९ – शिशुओं का आदान-प्रदान एवं कारागार में पुनरागमन
मध्यरात्रि में नन्दभवन पहुँचे वसुदेव जी ने देखा कि माता यशोदा ने एक कन्या (योगमाया) को जन्म दिया है और वे सोई हुई हैं। वसुदेव जी ने सद्योजात बाल-कृष्ण को यशोदा के पास सुला दिया और उस कन्या को लेकर तुरंत मथुरा लौट आए। कारागार में कन्या के आते ही शृङ्खलाएँ पुनः बँध गईं और रक्षकों की निद्रा खुल गई।
१० – कंस द्वारा कन्या-वध का प्रयास एवं योगमाया की चेतावनी
रक्षकों के सन्देश पर दौड़ा आया कंस देवकी के हाथों से उस बालिका को छीनकर पत्थर पर पटकने लगा। किन्तु वह बालिका कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई और आठ हाथों में दिव्यास्त्र लिए देदीप्यमान भगवती दुर्गा के रूप में प्रकट हुई। योगमाया ने कंस को चेतावनी दी कि उसका संहार करने वाला अन्यत्र सकुशल प्रकट हो चुका है, और इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गईं।
११ – गोकुल में नन्दोत्सव का अभूतपूर्व आनन्द
इधर गोकुल में जब प्रातःकाल माता यशोदा के गृह में पुत्र-रत्न के प्राकट्य का समाचार फैला, तब नन्दबाबा एवं समस्त गोपजन अगाध आनन्द में निमग्न हो गए। नन्दबाबा ने ब्राह्मणों एवं गायकों को मणियाँ, वस्त्र तथा करोड़ों गायें दान में दीं। समस्त गोप-गोपियों ने सड़कों पर दूध, दही और हल्दी का छिड़काव करते हुए ‘नन्दोत्सव’ का परम मङ्गलमय पर्व मनाया।
१२ – गर्गमुनि का आगमन एवं नामकरण संस्कार
दिव्य बालक का ज्योतिषीय विधान करने हेतु नन्दबाबा ने कुलगुरु महर्षि गर्गमुनि को आमंत्रित किया। गर्गमुनि ने गोशाला में गोपनीय रूप से दोनों बालकों का नामकरण किया। रोहिणी-पुत्र का नाम ‘राम’ (बलराम) तथा यशोदा-पुत्र का श्यामवर्ण देखकर ‘कृष्ण’ रखा। गर्गमुनि ने नन्दबाबा को सचेत किया कि यह बालक साक्षात् नारायण-तुल्य है और इसकी विशेष रक्षा करें।
१३ – गोकुल में श्रीकृष्ण एवं बलराम जी की बाल-लीलाएँ
गोकुल के आँगन में बड़े होते हुए श्रीकृष्ण और बलराम जी ने धूल में खेलने, बछड़ों की पूँछ पकड़ने, घर-घर जाकर माखन चुराने तथा गोपियों को खिझाने जैसी मनमोहक बाल-लीलाएँ कीं। एक बार जब माता यशोदा ने माटी खाने के सन्देह में बाल-कृष्ण का मुख खुलवाया, तो छोटे से मुख में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, सूर्य, नक्षत्र एवं सागर देखकर वे स्तब्ध एवं भावविभोर हो गईं।
१४ – पूतना राक्षसी का उद्धार
कंस द्वारा नवजात बालकों को मारने हेतु भेजी गई भयंकर पूतना राक्षसी परम सुन्दरी स्त्री का रूप धरकर गोकुल में प्रविष्ट हुई। उसने बाल-कृष्ण को विषैला दुग्ध पिलाना चाहा। बाल-कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उसके स्तन-पान के साथ उसके प्राणों को भी खींच लिया, जिससे पूतना अपने विशाल राक्षसी रूप में गिरकर भस्म हो गई।
१५ – शकटासुर का भङ्ग एवं उद्धार
बाल-कृष्ण के जन्मोत्सव के समय जब उन्हें एक भारी लकड़ी की गाड़ी (छकड़े) के नीचे सुलाया गया था, तब शकटासुर नामक दैत्य गाड़ी पर चढ़कर बालक को कुचलना चाहता था। बाल-कृष्ण ने रोते हुए अपने कोमल चरणों से उछलकर गाड़ी पर ऐसा प्रहार किया कि गाड़ी के छक्के छूट गए और दानव भस्म हो गया।
१६ – तृणावर्तासुर का संहार
कंस द्वारा भेजा गया तृणावर्तासुर चक्रवात (सुड़ीगाली) का रूप धारण कर गोकुल में धूल का अन्धकार फैलाकर बाल-कृष्ण को आकाश में उड़ा ले गया। प्रभु ने अपना भार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के समान भारी कर लिया, जिससे दानव का दम घुटने लगा और वह पर्वत पर गिरकर भस्म हो गया।
१७ – उखल-बन्धन एवं यमलार्जुन का उद्धार
माखन चुराने पर क्रोधित माता यशोदा ने बाल-कृष्ण को आँगन में भारी ओखली से बाँधने का प्रयास किया। किन्तु हर बार रस्सी दो अँगुल छोटी पड़ जाती थी। अन्ततः प्रभु स्वयं माता के वात्सल्य-प्रेम से बँध गए। ओखली को घसीटते हुए प्रभु दो विशाल यमलार्जुन (मद्दि) वृक्षों के मध्य से निकले और उन्हें उखाड़कर कुबेर-पुत्रों (नलकूबर एवं मणिग्रीव) का उद्धार किया।
१८ – गोकुल से वृन्दावनीय प्रस्थान
गोकुल में बार-बार असुरों के उत्पात से चिन्तित होकर नन्दबाबा, उपनन्द आदि वृद्ध गोपों ने मन्त्रणा की। नन्दबाबा की आज्ञा से सम्पूर्ण गोप-समुदाय अपने-अपने रथों एवं सामान को लेकर अति रमणीय, हरियाली से पूर्ण श्रीवृन्दावन धाम की ओर प्रस्थान कर गया।
१९ – वृन्दावन की लीलाएँ एवं वत्सासुरासुर का संहार
वृन्दावन की निकुञ्ज-गलियों में गो-चारण करते हुए श्रीकृष्ण और बलराम जी बाल-सखाओं के साथ विविध खेल खेलने लगे। बछड़े का रूप धरकर आए वत्सासुरासुर को पहचानकर श्रीकृष्ण ने उसकी पिछली टाँगों से पकड़कर घुमाया और कपित्थ (कैथ) के वृक्ष पर पटककर उसका संहार कर दिया।
२० – बकासुर का संहार
विशाल बगुले का रूप धरकर आए बकासुर ने श्रीकृष्ण को निगल लिया। किन्तु श्रीकृष्ण ने उसके गले में ऐसी भयंकर अग्नि-दाह उत्पन्न की कि उसने प्रभु को उगल दिया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने उसकी चोंच को दोनों हाथों से पकड़कर चीर डाला।
२१ – अघासुर का संहार
पूतना और बकासुर का छोटा भाई अघासुर एक योजन लम्बे विशाल अजगर का रूप धरकर मुख फाड़कर बैठ गया। ग्वाल-बाल गुफा समझकर उसके मुख में प्रविष्ट हो गए। श्रीकृष्ण ने उसके मुख में प्रवेश कर अपना शरीर इतना बढ़ाया कि असुर का श्वास रुक गया और उसके प्राण उड़ गए।
२२ – ब्रह्मा जी द्वारा बछड़ों एवं ग्वाल-बालों का हरण
श्रीकृष्ण की अलौकिक शक्ति की परीक्षा लेने हेतु ब्रह्मा जी ने वृन्दावन से समस्त बछड़ों एवं ग्वाल-बालों को चुराकर एक गुप्त गुफा में सुला दिया। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने तुरंत स्वयं को उतने ही ग्वाल-बालों एवं बछड़ों के रूप में विस्तारित कर लिया। एक वर्ष तक किसी को भेद न चला। अन्त में ब्रह्मा जी ने पराजित होकर प्रभु के चरणों में क्षमा-प्रार्थना की।
२३ – धेनुकासुर का उद्धार
तालवन में पके हुए मधुर फल खाने हेतु ग्वाल-बालों के कहने पर बलराम जी ने ताल के वृक्षों को हिलाया। वहाँ पहरा दे रहे धेनुकासुर गधे रूपी दैत्य को बलराम जी ने टाँगों से पकड़कर ताल के वृक्ष पर पटककर मार डाला।
२४ – कालिय-दमन एवं यमुना जी की शुद्धि
यमुना जी के जल को अपने भयंकर विष से दूषित करने वाले कालिय नाग के फणों पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अलौकिक ताण्डव नृत्य किया। कालिय का दर्प दलन हुआ। उसकी नाग-पत्नियों (नागकन्याओं) की स्तुति से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसे अभयदान दिया और रमणक द्वीप जाने की आज्ञा दी।
२५ – दावानल का भक्षण
गर्मी के दिनों में जब वृन्दावन के वन में भीषण दावानल (अग्नि) भड़क उठा और समस्त गोप-गोपियाँ भयभीत हो गईं, तब सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने उन सभी को नेत्र मूँदने को कहा और उस भीषण दावानल को स्वयं अपने मुख में आचमन कर लिया।
२६ – प्रलम्बासुर का संहार
सखाओं के छद्म रूप में आए प्रलम्बासुर नामक दैत्य ने खेल-खेल में बलराम जी को अपनी पीठ पर लादकर आकाश में भागना चाहा। बलराम जी ने अपना भार बढ़ाकर अपने मुष्टि-प्रहार से उस दैत्य का मस्तक चूर्ण कर दिया।
२७ – श्रीगोवर्धन-पूजा एवं गोवर्धन-धारण
इन्द्र-पूजा का खण्डन कर श्रीकृष्ण ने व्रजवासियों से गोवर्धन पर्वत एवं गायों की पूजा करवाई। रुष्ट होकर इन्द्र ने मूसलाधार जल बरसाया। व्रज की रक्षा हेतु श्रीकृष्ण ने विशाल गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका अँगुली पर सात दिनों तक छत्र की भाँति धारण किया।
२८ – इन्द्र की शरणागति एवं कामधेनु द्वारा अभिषेचन
अपना दर्प भङ्ग होने पर ऐरावत पर आरूढ़ होकर इन्द्र प्रभु के चरणों में आ गिरे और क्षमा-याचना की। कामधेनु माता ने अपने दिव्य दुग्ध से श्रीकृष्ण का अभिषेक कर उन्हें ‘गोविन्द’ पद पर प्रतिष्ठित किया।
२९ – वरुण-लोक से नन्दबाबा का आनयन
एकादशी व्रत के उपरान्त रात्रि में यमुना-स्नान करते समय वरुण के दूत द्वारा बन्दी बनाए गए नन्दबाबा को छुड़ाने हेतु श्रीकृष्ण स्वयं वरुण-लोक गए। वरुण ने परमेश्वर का पूजन कर ससम्मान नन्दबाबा को लौटाया।
३० – व्रजवासियों को वैकुण्ठ-लोक का दर्शन
अपने प्रेमी व्रजवासियों को परात्पर सत्य का बोध कराने हेतु श्रीकृष्ण ने उन्हें ब्रह्मसरोवर में स्नान कराया और जल के भीतर साक्षात् वैकुण्ठ धाम तथा श्रीमन नारायण के ऐश्वर्यमयी रूप का अलौकिक दर्शन कराया।
३१ – शरद-पूर्णिमा एवं रासलीला का आरम्भ
शरद-ऋतु की निर्मल चन्द्रिका में जब श्रीकृष्ण ने यमुना तट पर अपनी वेणु की मन्त्रमुग्धकारी तान छेड़ी, तब समस्त गोपियाँ अपने पति, पुत्र एवं गृह-काज छोड़कर कृष्ण-मिलन हेतु वन की ओर दौड़ पड़ीं।
३२ – यमुना तट पर महा-रासलीला
सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से प्रत्येक गोपी के पास एक-एक श्रीकृष्ण प्रकट होकर यमुना के कछारों पर अलौकिक महा-रासलीला का नृत्य आरम्भ किया। यह नृत्य भौतिक काम से सर्वथा रहित चिन्मय आत्माओं का महामिलन था।
३३ – गोपियों का मान एवं श्रीकृष्ण का अन्तर्धान
जब गोपियों के हृदय में यह अभिमान जागा कि प्रभु केवल उन्हीं के वश में हैं, तब श्रीकृष्ण तुरंत अन्तर्धान हो गए। गोपियाँ विरह-कातर होकर लताओं, वृक्षों एवं पशुपक्षियों से प्रियतम का पता पूछने लगीं।
३४ – गोपी-गीत एवं श्रीराधा जी का पुनरुद्भाव
अत्यन्त आकुल होकर गोपियों द्वारा गाए गए करुण गोपी-गीत से द्रवित होकर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधा रानी के साथ पुनः प्रकट हुए, जिससे समस्त व्रजबालाएँ पुनः परम आनन्द में निमग्न हो गईं।
३५ – शङ्खचूड़ यक्ष का वध
वन में गोपियों का अपहरण करने का दुःसाहस करने वाले कुबेर के सेवक शङ्खचूड़ यक्ष को श्रीकृष्ण ने एक ही मुष्टि-प्रहार से मार गिराया और उसके मस्तक की दिव्य मणि बलराम जी को भेंट की।
३६ – अरिष्टासुर (बैल) का संहार
वृषभ (बैल) का विशाल रूप धरकर आए अरिष्टासुर को श्रीकृष्ण ने उसके सींगों से पकड़कर पछाड़ दिया और उसका संहार कर व्रज को निर्भय किया।
३७ – नारद जी का कंस को सचेत करना एवं केश दैत्य का वध
नारद जी से यह जानकर कि कृष्ण ही देवकी का आठवाँ पुत्र है, कंस ने भयानक अश्व (घोड़े) के रूप में केश दैत्य को भेजा। श्रीकृष्ण ने अपना बाहु उसके मुख में डालकर उसकी श्वास रोक दी और उसका संहार कर दिया।
३८ – अक्रूर जी का आगमन एवं मथुरा-आह्वान
कंस के आदेश से अक्रूर जी रथ लेकर वृन्दावन पहुँचे। अक्रूर जी ने श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों के दर्शन कर अश्रु बहाए और कंस के धनुर्याग का निमन्त्रण दिया।
३९ – वृन्दावन से श्रीकृष्ण का प्रस्थान एवं गोपियों का कारुणिक विलाप
जब श्रीकृष्ण और बलराम रथ पर बैठकर मथुरा जाने लगे, तब माता यशोदा एवं समस्त गोपियाँ रथ के पहियों से लिपटकर करुण विलाप करने लगीं। श्रीकृष्ण उन्हें शीघ्र लौटने का आश्वासन देकर चले गए।
४० – मथुरा-प्रवेश एवं कुब्जा पर अनुग्रह
मथुरा नगरी में प्रवेश करते ही श्रीकृष्ण को कुब्जा नामक दासी सुगन्धित चन्दन ले जाती मिली। प्रभु ने उसके चरणों को अँगूठे से दबाकर उसकी ठुड्डी उठाकर उसकी कूबड़ ठीक कर दी और उसे परम सुन्दरी बना दिया।
४१ – कंस के शिव-धनुष का भङ्ग
धनुर्शाला में प्रविष्ट होकर श्रीकृष्ण ने कंस के भारी शिव-धनुष को खिलौने की भाँति उठाकर एक ही झटके में तोड़ डाला। प्रतिरोध करने वाले कंस के सैनिकों का संहार किया।
४२ – रङ्गशाला-प्रवेश एवं कुवलयापीड़ हाथी का संहार
मल्ल-रङ्गशाला के द्वार पर मत्त कुवलयापीड़ हाथी को श्रीकृष्ण ने लीलापूर्वक पछाड़कर उसके दाँत उखाड़ लिए और हाथी तथा महावत का संहार किया।
४३ – चाणूर-मुष्टिक वध एवं कंस-संहार
मल्ल-युद्ध में श्रीकृष्ण ने चाणूर को और बलराम जी ने मुष्टिक को पछाड़कर मार डाला। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने राजमञ्च पर बैठे कंस के बाल पकड़कर नीचे पटक दिया और उसका संहार कर उग्रसेन को मुक्त कराया।
४४ – माता-पिता का बन्धन-मोचन एवं उग्रसेन का राज्याभिषेक
कंस-वध के उपरान्त श्रीकृष्ण-बलराम ने कारागार में जाकर अपने माता-पिता वसुदेव-देवकी के चरण छुए और उन्हें मुक्त कराया। तत्पश्चात् राजा उग्रसेन का पुनः मथुरा के सिंहासन पर राज्याभिषेक किया।
४५ – सांदीपनि आश्रम में अध्ययन एवं गुरुदक्षिणा
वैदिक दीक्षा हेतु श्रीकृष्ण-बलराम अवन्तिकापुरी में महर्षि सांदीपनि के आश्रम गए। मात्र चौंसठ दिनों में समस्त ६४ कलाओं एवं वेदों में निपुण होकर, गुरुदक्षिणा रूप में महर्षि के मृत पुत्र को यमलोक से लाकर लौटाया।
४६ – व्रज में उद्धव जी का सन्देश-प्रस्थान
माता यशोदा एवं गोपियों के विरह को शांत करने हेतु श्रीकृष्ण ने अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को वृन्दावन भेजा। उद्धव ने गोपियों को निराकार ब्रह्म का उपदेश देना चाहा, किन्तु गोपियों के अनन्य प्रेम के आगे ज्ञानी उद्धव नतमस्तक हो गए।
४७ – उद्धव जी का मथुरा पुनरागमन एवं गोपियों की भक्ति-स्तुति
गोपियों के शुद्ध प्रेम-भाव को देखकर उद्धव जी ने उनकी चरण-धूलि सिर पर चढ़ाई और मथुरा लौटकर श्रीकृष्ण से कहा कि व्रज की गोपियों की भक्ति ही ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च सिद्धि है।
४८ – जरासंध का आक्रमण एवं द्वारका-निर्माण
कंस की मृत्यु से क्रुद्ध होकर उसके श्वशुर जरासंध ने १७ बार मथुरा पर आक्रमण किया। बार-बार के युद्ध से प्रजा को बचाने हेतु श्रीकृष्ण ने समुद्र के मध्य अभेद्य ‘द्वारकापुरी’ का निर्माण कराया और प्रजा को वहाँ बसाया।
४९ – भगवान् श्रीकृष्ण एवं राजकुमारी रुक्मिणी का पावन विवाह
विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी के गुप्त सन्देश पर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुण्डिनपुर से रथ पर बैठाकर लाया और जरासंध-शिशुपाल की सेना को पराजित कर द्वारका में रुक्मिणी जी से पावन विवाह किया।
५० – स्यमन्तक मणि का आख्यान, जाम्बवती एवं सत्यभामा विवाह
स्यमन्तक मणि के कलङ्क को मिटाने हेतु श्रीकृष्ण ने ऋक्षराज जाम्बवान् से २८ दिनों तक गुफा में युद्ध किया। जाम्बवान् ने प्रभु को पहचानकर मणि एवं अपनी पुत्री जाम्बवती का हाथ सौंपा। तत्पश्चात् सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भी श्रीकृष्ण से कर दिया।
५१ – कालिन्दी, मित्रविन्दा, सत्या, भद्रा एवं लक्ष्मणा का विवाह
धर्म-संरक्षण हेतु सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने सूर्य-पुत्री कालिन्दी, अवन्ति-राजकुमारी मित्रविन्दा, कोसल-कन्या सत्या (नाग्नजिती), कैकेयी भद्रा तथा विदेह-राजकुमारी लक्ष्मणा के साथ पावन विवाह रचाए।
५२ – नरकासुर-वध एवं १६ सहस्र राजकुमारियों का उद्धार
प्राग्ज्योतिषपुर के अत्याचारी दैत्य नरकासुर का संहार कर श्रीकृष्ण ने उसके कूप में बन्दी १६ सहस्र राजकन्याओं को मुक्त कराया और उनके सम्मान हेतु उन सभी के साथ अलग-अलग प्रासादों में विवाह किया।
५३ – बाणासुर-दमन एवं प्रद्युम्न-उषा विवाह
प्रद्युम्न एवं बाणासुर की पुत्री उषा के विवाह प्रसङ्ग में बाणासुर की सहस्र भुजाओं को काटकर श्रीकृष्ण ने उसके अहङ्कार को नष्ट किया और भगवान् शिव को शांत कर प्रद्युम्न का विवाह कराया।
५४ – पौण्ड्रक (नकली वासुदेव) का प्रसङ्ग एवं वध
स्वयं को असली वासुदेव घोषित करने वाले दम्भी राजा पौण्ड्रक तथा उसके मित्र काशीराज को भगवान् श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से संहार कर सत्य की स्थापना की।
५५ – द्विविद वानर का उद्धार
प्रजा को पीड़ित करने वाले बलशाली द्विविद नामक दुष्ट वानर का बलराम जी ने अपने हल-मूसल के प्रहार से संहार कर दिया।
५६ – सुदामा (कुचैल) का द्वारका आगमन
बाल-सखा दरिद्र ब्राह्मण सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर दो मुट्ठी चिउड़ा (अटुके) लेकर द्वारका में अपने सखा श्रीकृष्ण से मिलने पहुँचे।
५७ – सुदामा की कुटिया का ऐश्वर्यमयी रूपान्तरण
श्रीकृष्ण ने सुदामा के लाए चिउड़ा को परम प्रीति से आचमन किया। बिना माँगे ही प्रभु ने सुदामा की टूटी कुटिया को वैकुण्ठ-तुल्य रत्नजटित प्रासादों में परिवर्तित कर दिया।
५८ – उद्धव जी को भक्ति एवं ज्ञान का पावन उपदेश (उद्धव-गीता)
स्वधाम-गमन से पूर्व सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्त उद्धव को कलि युग के जीवों के कल्याण हेतु निष्काम भक्ति, वैराग्य एवं आत्म-ज्ञान का अमर उपदेश (उद्धव-गीता) प्रदान किया।
५९ – यादवाङ्कुरों को ऋषियों का शाप
सांब को स्त्री-वेश में सजाकर ऋषियों का उपहास करने पर क्रुद्ध ऋषियों ने शाप दिया कि इसके पेट से उत्पन्न मूसल ही सम्पूर्ण यदुवंश का संहार करेगा।
६० – कुरुक्षेत्र युद्ध की पूर्वपीठिका एवं शान्ति-दौत्य
पाण्डवों के अधिकार हेतु श्रीकृष्ण स्वयं हस्तिनापुर में कौरवों की सभा में शान्ति-दूत बनकर गए। दुर्योधन के न मानने पर प्रभु ने सभा में अपना देदीप्यमान विराट् रूप प्रकट किया।
६१ – कुरुक्षेत्र युद्ध में पार्थसारथि रूप एवं श्रीमद्भगवद्गीता
युद्धभूमि में अर्जुन के मोह को दूर करने हेतु भगवान् श्रीकृष्ण ने रथ के सारथि बनकर अमर ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का उपदेश दिया और धर्म की विजय सुनिश्चित की।
६२ – महाभारत युद्ध की समाप्ति एवं युधिष्ठिर का राज्याभिषेक
अठारह दिनों के भीषण संग्राम के पश्चात् पाण्डवों की विजय हुई। युधिष्ठिर का हस्तिनापुर में राज्याभिषेक कर श्रीकृष्ण पुनः अपनी द्वारकापुरी लौट आए।
६३ – प्रभास क्षेत्र में मूसल-काण्ड एवं यदुवंश-संहार
ऋषियों के शाप विधानवश प्रभास क्षेत्र में मदिरा के मन्द में यादवाङ्कुर आपस में एरका घास (जो मूसल के चूर्ण से बनी थी) से प्रहार कर एक-दूसरे का संहार कर बैठे।
६४ – बलराम जी एवं भगवान् श्रीकृष्ण की लीला-संवरण
बलराम जी ने शेषनाग रूप में योग-समाधि द्वारा देह त्यागी। तत्पश्चात् एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न श्रीकृष्ण के चरण-कमल को मृग समझकर जरा नामक व्याध ने बाण मारा। प्रभु अपने चतुर्भुज दिव्य रूप में साक्षात् अपने नित्य गोलोक धाम लौट गए।
६५ – उद्धव की बदरिकाश्रम-यात्रा
श्रीकृष्ण के स्वधाम-गमन के पश्चात् उद्धव जी प्रभु के निर्देशानुसार बदरिकाश्रम गए और वहाँ घोर तपस्या करते हुए भगवद्धाम को प्राप्त हुए।
६६ – द्वारका का समुद्र-मज्जन एवं पाण्डवों का महाप्रस्थान
श्रीकृष्ण के जाते ही द्वारकापुरी समुद्र में समा गई। समाचार सुनकर पाण्डवों ने राजा परीक्षित को सिंहासन सौंपकर हिमालय की ओर महाप्रस्थान किया।
६७ – श्रीकृष्ण-स्तुति एवं गोलोक की परम महिमा
श्रीसूत गोस्वामी जी ने घोषणा की कि इस कथा के श्रवण से जीव के जन्म-जन्मान्तरों के पाप भस्म हो जाते हैं और उसे गोलोक में नित्य वास मिलता है।
६८ – दिव्य गोलोक एवं अप्राकृत वृन्दावन का वैभव
माया और काल से परे परात्पर गोलोक धाम का वर्णन, जहाँ श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी नित्य विहार करते हैं।
६९ – ऋषियों की सभा में महर्षि नारद का आगमन
गंगा तट पर ऋषियों की सभा में महर्षि नारद वीणा बजाते हुए पधारे और श्रीकृष्ण-तत्त्व का ज्ञान दिया।
७० – काल-चक्र, चार युग एवं कलि युग में नाम-महिमा
सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि युग के प्रभाव तथा कलि युग में केवल श्रीकृष्ण-नाम-कीर्तन से ही परम गति मिलने का विधान।
७१ – ब्रह्माण्ड-अण्ड एवं सप्त पाताल लोकों का वर्णन
चौदह लोकों की रचना, अनन्तदेव का आधार तथा ब्रह्माण्डों के लय का दार्शनिक वर्णन।
७२ – वैकुण्ठ धाम का वैभव एवं श्रीनारायण का दरबार
लक्ष्मी जी के साथ वैकुण्ठ में विराजमान श्रीनारायण के ऐश्वर्यमयी रूप का निरूपण।
७३ – आदि-परंब्रह्म के रूप में श्रीकृष्ण का स्वरूप
सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही समस्त अवतारों के मूल परात्पर ब्रह्म हैं।
७४ – श्रीराधा-नाम की महिमा एवं पावन स्तोत्र
‘राधा’ नाम के दो अक्षरों का गोपनीय अर्थ एवं उनका सर्वपापहर स्तोत्र।
७५ – श्रीराधा जी का पावन मन्त्र एवं दीक्षा-विधान
वैष्णव आगमों के अनुसार श्रीराधा-मन्त्र का जप, ध्यान एवं गुरु-दीक्षा की आचार-संहिता।
७६ – दुर्वासा जी का आख्यान एवं देवों का दर्प-भङ्ग
अहङ्कार से भक्ति का नाश होता है—दुर्वासा जी एवं देवगणों के प्रसङ्ग द्वारा निरूपण।
७७ – पतिव्रता नारी का पावन धर्म एवं शक्ति
सती-साध्वी नारियों के पातिव्रत्य तेज का माहात्म्य।
७८ – राजा त्रिशङ्कु एवं सत्यवादी हरिश्चन्द्र की कथा
हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु द्वारा उन्हें सशरीर स्वर्ग/धाम प्रदान करना।
७९ – नाम-कीर्तन से अजामिल का पूर्ण उद्धार
मृत्यु के समय केवल पुत्र के नाम से ‘नारायण’ पुकारने पर भी अजामिल को यमदूतों से मुक्ति एवं वैकुण्ठ-प्राप्ति।
८० – एकादशी एवं श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी व्रत का माहात्म्य
एकादशी तथा जन्माष्टमी के दिन उपवास एवं भगवदर्चन करने का अक्षय पुण्य-फल।
८१ – रासलीला का परम गूढ़ एवं आध्यात्मिक अर्थ
रासलीला प्राकृत काम नहीं, अपितु आत्मा और परमात्मा के विशुद्ध चिन्मय अभेद मिलन का प्रतीक है।
८२ – शिव-नारायण/नारद सम्वाद में कृष्ण-भक्ति की सर्वोपरि श्रेष्ठता
भगवान् शिव द्वारा नारद जी को कृष्ण-भक्ति को ही सर्वोच्च साधना बताने का आख्यान।
८३ – श्रीकृष्ण के पावन नामों की संस्कृत व्युत्पत्ति
कृष्ण, वासुदेव, गोविन्द, माधवादि नामों के गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ।
८४ – तुलसी, धात्री (आँवला) एवं बिल्व वृक्षों की महिमा
इन पावन वृक्षों के पूजन एवं संरक्षण से सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की प्रसन्नता।
८५ – दीप, पुष्प, धूप आदि अर्पण करने का पुण्य-फल
विग्रह-पूजन में श्रद्धापूर्वक अर्पित सामग्रियों का अक्षय फल।
८६ – गो-सेवा का माहात्म्य एवं गो-माहात्म्य
गाय के शरीर में समस्त देवों का वास तथा गो-सेवा से गोलोक-प्राप्ति का विधान।
८७ – कलि युग में गृहस्थ एवं विरक्त सन्तों के धर्म
कलि युग में धर्म-संरक्षण हेतु सामाजिक एवं व्यक्तिगत आचार-संहिता।
८८ – आचार-शुद्धि, स्नान एवं सन्ध्यावन्दन के नियम
दैनिक जीवन में शारीरिक एवं सूक्ष्म मानसिक पवित्रता हेतु नियम।
८९ – मुख्य देवों के पावन मन्त्र एवं रक्षा-कवच
कृष्ण, राधा, शिव एवं विष्णु के नित्य जपनीय बीजाक्षर मन्त्र एवं कवच।
९० – राजा अम्बरीष एवं महर्षि दुर्वासा की कथा
भक्त अम्बरीष की रक्षा हेतु भगवान् के सुदर्शन चक्र का दुर्वासा के पीछे दौड़ना।
९१ – राजा मान्धाता का आख्यान एवं धर्म-शासन
मान्धाता की उग्र तपस्या एवं धर्मसम्मत सम्राट-शासन।
९२ – मुचुकुन्द का जागरण एवं कालायवन का भस्म होना
श्रीकृष्ण की युक्ति से सोए हुए मुचुकुन्द की दृष्टि से कालायवन का भस्म होना।
९३ – मथुरा-मण्डल एवं व्रज के पावन तीर्थों की महिमा
वृन्दावन, गोवर्धन, बरसाना आदि क्षेत्रों के कण-कण की पावनता।
९४ – पावन यमुना जी का प्राकट्य एवं यमुना-स्तोत्र
सूर्य-पुत्री यमुना जी के श्याम-जल का स्नान एवं पान-फल।
९५ – सम्मोहक कुञ्ज एवं श्रीराधा-कुण्ड का परम रहस्य
श्रीराधा-कुण्ड एवं श्याम-कुण्ड के स्नान से अनन्य राधा-दास्य की प्राप्ति।
९६ – राजा निमि एवं नवयोगेन्द्रों का दार्शनिक सम्वाद
नवयोगेन्द्रों द्वारा प्रतिपादित भागवत-धर्म एवं भक्ति-साधना।
९७ – अवधूत दत्तात्रेय एवं राजा यदु का सम्वाद
चौबीस प्राकृतिक गुरुओं से सीखे गए वैराग्य एवं आत्म-ज्ञान का उपदेश।
९८ – श्रीमद्भागवत एवं पुराण-पठन का फल
पुराणों के पठन-पाठन से गृह में लक्ष्मी एवं कृष्ण-कृपा का नित्य वास।
९९ – यथार्थ वैष्णव साधुओं के पावन लक्षण
अहङ्काररहित, क्षमाशील, दयालु एवं कृष्ण-गत-प्राण साधुओं की महिमा।
१०० – गोलोक में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण का अप्राकृत विग्रह
त्रिभङ्ग-ललित, पीताम्बरधारी, मुरलीधर श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का ध्यान।
१०१ – श्रीराधा जी की अष्टसखियों का वैभव
ललिता, विशाखा आदि सखियों के दिव्य भाव एवं परिचर्या।
१०२ – चार प्रकार की मुक्तियाँ एवं भक्ति की सर्वोपरि श्रेष्ठता
सालोक्य-सामीप्यादि मुक्तियों से भी निष्काम भक्ति की महत्ता।
१०३ – गोलोक में ब्रह्मा-श्रीकृष्ण सम्वाद
सृष्टि-रचना से पूर्व ब्रह्मा जी को श्रीकृष्ण द्वारा अभयदान।
१०४ – अष्ट-सिद्धियों का निरूपण
अणिमादि आठों सिद्धियाँ कृष्ण-भक्त के चरणों की दासी हैं।
१०५ – चित्ररथ गन्धर्व एवं पार्वती जी का शाप
चित्ररथ का वृत्रासुर के रूप में जन्म लेकर भी अनन्य भक्त बने रहना।
१०६ – राजा इन्द्रद्युम्न एवं श्रीजगन्नाथ जी का प्राकट्य
पुरी धाम में काष्ठ-विग्रह श्रीजगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की प्रतिष्ठा।
१०७ – शेषनाग अनन्तदेव की महिमा
मस्तक पर पृथ्वी को धारण करने वाले अनन्तदेव की भक्ति।
१०८ – महाप्रलय का भयङ्कर वर्णन
समस्त ब्रह्माण्डों का प्रकृति में तथा प्रकृति का श्रीकृष्ण में लय।
१०९ – श्रीकृष्ण के रोम-कूपों से पुनः नव-सृष्टि
प्रलय उपरान्त श्रीकृष्ण के रोम-कूपों से अनन्त नए ब्रह्माण्डों का प्राकट्य।
११० – ब्रह्मा जी द्वारा रचित श्रीकृष्ण-स्तोत्र
ब्रह्मा जी द्वारा परमेश्वर की स्तुति में गाया गया दिव्य स्तव।
१११ – भगवान् शिव द्वारा रचित श्रीकृष्ण-स्तोत्र
शिव जी द्वारा रचित सर्वपापहर श्रीकृष्ण-स्तोत्र।
११२ – अनन्तदेव द्वारा रचित श्रीकृष्ण-स्तोत्र
शेषनाग अनन्तदेव द्वारा असीम भक्ति से गाया गया स्तोत्र।
११३ – धर्मदेव द्वारा रचित श्रीकृष्ण-स्तोत्र
धर्मराज द्वारा सत्य एवं धर्म की रक्षा हेतु गाया गया स्तोत्र।
११४ – देवेन्द्र द्वारा रचित श्रीकृष्ण-स्तोत्र
इन्द्र द्वारा अपने अपराध की क्षमा हेतु गाया गया भावपूर्ण स्तव।
११५ – श्रीकृष्ण-सहस्रनाम स्तोत्र
पाप-विनाशक एवं मोक्षदायक श्रीकृष्ण के एक सहस्र पावन नाम।
११६ – अभेद्य श्रीकृष्ण-कवच
समस्त दिशाओं से साधक की रक्षा करने वाला दिव्य कवच।
११७ – श्रीराधा-सहस्रनाम स्तोत्र
अत्यन्त गोपनीय एवं प्रेमा-भक्ति प्रदान करने वाले श्रीराधा जी के सहस्र नाम।
११८ – अभेद्य श्रीराधा-कवच
साधक के आन्तरिक एवं बाह्य जीवन की रक्षा करने वाला राधा-कवच।
११९ – श्रीराधा-कृष्ण के नित्य अभेद का गुप्त सम्वाद
ऊर्जा और ऊर्जावान् के समान राधा-कृष्ण की नित्य एकरूपता।
१२० – ब्रह्मवैवर्त पुराण के पठन, लेखन एवं संरक्षण के नियम
शास्त्र-ग्रन्थों के सत्कार एवं पठन की शास्त्रीय मर्यादा।
१२१ – आचार्य एवं व्यासपीठ को दान का माहात्म्य
कथावाचक एवं गुरुदेव को वस्त्र, स्वर्ण, गोदान का अक्षय पुण्य।
१२२ – संपूर्ण ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रवण का पावन फल
चारों खण्डों के श्रवण से करोड़ों जनमों के पापों का क्षय।
१२३ – वक्ता एवं श्रोताओं हेतु मङ्गल-आशीर्वाद (फलश्रुति)
इस महापुराण के पाठकों को आरोग्य, धन, सुसन्तति एवं कृष्ण-धाम की प्राप्ति।
१२४ – महर्षि व्यास एवं सूत गोस्वामी को ऋषियों के प्रणाम
शौनकादि ऋषियों द्वारा ज्ञान-दाता सूत जी का भावपूर्ण पूजन।
१२५ – परम मङ्गलमय समापन एवं गोलोक-प्राप्ति
श्रीकृष्ण जन्म खण्ड तथा सम्पूर्ण ब्रह्मवैवर्त पुराण का अलौकिक प्रेमानन्द के साथ भव्य समापन।
Read Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa’s Śrī Kṛshṇa Janana Khaṇḍa Online in Hindi
Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa is organized as follows and hence reading is suggested in this order:
- ब्रह्म खण्ड
- प्रकृति खण्ड
- गणेश खण्ड
- श्री कृष्ण जन्म खण्ड
