Read Brahma Vaivarta Purāṇa’s Gaṇeśa Khaṇḍa in Hindi
ब्रह्मवैवर्त पुराण अष्टादश महापुराणों में परम पावन, भगवद्भक्तिरस से परिपूर्ण एवं वैष्णव सिद्धान्तों का अनुपम ग्रन्थ है। इसका तृतीय विशाल खण्ड ‘गणेश खण्ड’ के नाम से सुविख्यात है, जो छियालीस (४६) अध्यायों में सुसज्जित होकर विघ्नविनाशक, प्रथम पूज्य, सर्वसिद्धिप्रदायक भगवान् श्रीगणेश के अलौकिक अवतरण, दिव्य बाल-लीलाओं, एकदन्त होने की कथा तथा भगवान् परशुराम के पावन चरित्र का विशद आख्यान प्रस्तुत करता है। पूर्ववर्ती प्रकृति खण्ड के अनन्तर, यह गणेश खण्ड स्पष्ट करता है कि किस प्रकार परात्पर पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही जगज्जननी भगवती पार्वती के पुण्यक व्रत के प्रभाव से उनके पुत्र रूप में अवतरित होकर श्रीगणेश कहलाए और समस्त विघ्नों का हरण कर सर्वलोकों में प्रथम पूज्य पद पर प्रतिष्ठित हुए।
यह अनुक्रमणिका (विषय-सूची) गणेश खण्ड के समस्त छियालीस अध्यायों के पावन आख्यान को क्रमबद्ध भक्ति-भावमयी धारा में समाहित करती है। जगन्माता पार्वती का कल्पवृक्ष-तुल्य व्रत, कैलाश पर जन्मोत्सव का अलौकिक उल्लास, शनिदेव के दृष्टिपात से मस्तक का छिन्न होना तथा गजमुख का संयोजन, महर्षि जमदग्नि के आश्रम में परशुराम जी का प्राकट्य, कार्तवीर्य अर्जुन का वध, कैलाश के द्वार पर गणेश जी और परशुराम जी का भीषण संग्राम, परशु के प्रहार से गणेश जी का एकदन्त होना, गणपति-कवच का प्राकट्य, चन्द्रमा के गर्व का भंजन तथा स्यमन्तक मणि की कथा जैसी अनेक कल्याणी गाथाएँ इस खण्ड में अति भक्तिभाव से वर्णित हैं। इस पावन सार-संक्षेप का निरन्तर पठन-पाठन एवं श्रवण साधक के जीवन के समस्त विघ्नों का विनाश कर उसे अचल कृष्ण-भक्ति तथा परम सिद्धि प्रदान करता है।
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ब्रह्म वैवर्त पुराण को निम्नानुसार व्यवस्थित किया गया है और इसलिए इस क्रम में पढ़ने का सुझाव दिया गया है:
- ब्रह्म खंड
- प्रकृति खंड
- गणेश खंड (वर्तमान पृष्ठ)
- श्री कृष्ण जनन खंड
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अनुक्रमणिका (विषय-सूची)
१ – पार्वती जी की पुत्र-प्राप्ति की इच्छा एवं पुण्यक व्रत का संकल्प
इस पावन अध्याय के प्रारम्भ में कैलाशपति भगवान् शिव की अर्द्धाङ्गिनी जगज्जननी देवी पार्वती के हृदय में एक दिव्य पुत्र की प्राप्ति की उत्कृष्ट अभिलाषा जागृत होती है। जगन्माता की इस पावन इच्छा को जानकर सर्वेश्वर भगवान् शिव उन्हें परम फलदायी ‘पुण्यक व्रत’ के अनुष्ठान का विधान बताते हैं। यह व्रत साक्षात् सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने वाला तथा परम दुर्लभ सन्तान प्रदान करने वाला है। देवी पार्वती सनत्कुमार जी को अपना आचार्य वरण कर परम श्रद्धा एवं नियमपूर्वक इस कल्पवृक्ष-तुल्य महाव्रत के सम्पादन का दृढ़ सङ्कल्प लेती हैं।
२ – पुण्यक व्रत का शास्त्रीय अनुष्ठान एवं नियम-विधान
इस अध्याय में देवी पार्वती द्वारा सम्पादित पुण्यक व्रत के विस्तृत अनुष्ठान, पूजन-सामग्री, नियम एवं संयम का सांगोपाङ्ग वर्णन किया गया है। जगज्जननी पार्वती जी एक वर्ष तक कठोर तपस्या, निराहार व्रत, नित्य ब्राह्मण-भोजन, दान एवं सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की भक्तिमयी आराधना में लीन रहती हैं। इस महाव्रत के प्रभाव से कैलाश का सम्पूर्ण वातावरण दिव्य सुगन्ध, मङ्गल-ध्वनियों एवं अलौकिक तरङ्गो से आप्लावित हो उठता है, और समस्त देवगण जगन्माता के इस निष्काम तपोबल की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हैं।
३ – पुण्यक व्रत की पूर्णता एवं श्रीकृष्ण का बाल-रूप में अवतरण
पुण्यक व्रत की पूर्णता पर भक्तवत्सल सर्वेश्वर श्रीकृष्ण स्वयं एक परम सुन्दर, त्रिभङ्ग-ललित बाल-विष्णु के रूप में भगवती पार्वती के सम्मुख प्रकट होते हैं। परमेश्वर का वह अलौकिक बाल-रूप नवजलधर के समान श्यामवर्ण, मन्द-मन्द मुस्कान से युक्त तथा सहस्रों सूर्यो के समान देदीप्यमान था। भगवान् श्रीहरि जगन्माता पार्वती को वरदान देते हैं कि वे स्वयं उनके गर्भ से प्रकट न होकर भी उनके निष्काम पुण्यक व्रत के फलस्वरूप उनके पुत्र रूप में अवतरित हो रहे हैं। यह कहकर परमेश्वर अन्तर्धान हो जाते हैं और मन्दिर के मङ्गल-गृह में एक परम मनमोहक शिशु रूप में शयन करते हुए प्राप्त होते हैं।
४ – कैलाश पर श्रीगणेश जन्मोत्सव एवं देव-ऋषियों का आगमन
भगवती पार्वती के भवन में परम दिव्य बालक के अवतरण का समाचार सुनते ही सम्पूर्ण कैलाश धाम परम उल्लास में डूब जाता है। देवराज इन्द्र, ब्रह्मा जी, भगवान् विष्णु, महर्षि नारद, सप्तर्षि तथा समस्त गन्धर्व-अप्सराएँ कैलाश पर्वत पर एकत्र होकर जय-जयकार करते हैं। गन्धर्व मधुर गायन करते हैं और देवाङ्गनाएँ नृत्य करती हुई शिशु पर दिव्य पुष्पों की वर्षा करती हैं। सर्वेश्वर शिव और जगन्माता पार्वती समस्त आगत देवों एवं ब्राह्मणों का आदर-सत्कार कर रत्न, वस्त्र एवं गऊओं का अमित दान करते हैं।
५ – शनिदेव का आगमन, शनि-दृष्टिपात एवं गणेश जी का मस्तक-छेद
समस्त देवगण बाल-गणेश के रूप-सौन्दर्य का दर्शन कर धन्य हो रहे थे, तभी सूर्यपुत्र शनिदेव भी वहाँ उपस्थित होते हैं। शनिदेव अपनी पत्नी के पूर्व-शाप के कारण अपना मस्तक नीचा किए रहते हैं और बालक की ओर देखने से सङ्कोच करते हैं। भगवती पार्वती के स्नेहपूर्ण आग्रह पर जैसे ही शनिदेव बालक गणेश के श्रीमुख पर एक क्षण के लिए दृष्टिपात करते हैं, वैसे ही कर्म-विधान एवं कश्यप जी के प्राचीन शाप के प्रभाव से बालक का मस्तक धड़ से पृथक् होकर सीधे गोलोक धाम में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में लीन हो जाता है। यह देखते ही कैलाश पर हाहाकार मच जाता है और देवी पार्वती मूर्छित होकर गिर पड़ती हैं।
६ – श्रीविष्णु का गरुड़-प्रस्थान, गजमुख-आनयन एवं गणेश जी का पुनर्जीवन
हाहाकार के मध्य भक्ताभयप्रद सर्वेश्वर श्रीविष्णु तुरंत गरुड़ पर आरूढ़ होकर उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते हैं। पुष्पभद्रा नदी के तट पर वे एक अति तेजस्वी, एकदन्त गजराज (ऐरावत/गज) को विश्राम करते हुए देखते हैं। श्रीविष्णु अपने सुदर्शन चक्र से उस गजराज के मस्तक को पृथक् कर गरुड़ पर लादकर कैलाश लाते हैं। ब्रह्मा जी एवं श्रीविष्णु मन्त्र-शक्ति द्वारा उस गज-मस्तक को बालक के धड़ से जोड़कर जीवन का सञ्चार करते हैं। बालक गणेश पुनः जीवित होकर उठ बैठते हैं, जिससे सम्पूर्ण कैलाश में पुनः महाआनन्द छा जाता है।
७ – भगवती पार्वती द्वारा शनिदेव को शाप एवं सान्त्वना
अपने पुत्र के मस्तक-छेद से अति क्रोधित होकर जगज्जननी पार्वती जी शनिदेव को तत्क्षण पङ्गु (लँगड़ा) होने का शाप दे देती हैं। शनिदेव नम्रतापूर्वक प्रार्थना करते हैं कि इसमें उनका कोई व्यक्तिगत दोष नहीं था, अपितु यह काल-चक्र और शाप-विधान का फल था। भगवान् विष्णु एवं शिव जी के हस्तक्षेप करने पर देवी पार्वती का हृदय द्रवित हो जाता है। वे शाप को मन्द करते हुए शनिदेव को आशीर्वाद देती हैं कि वे ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त करेंगे और जो मनुष्य शनिदेव के दिन गणेश जी और शिव जी की पूजा करेगा, उस पर शनि की वक्र दृष्टि का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
८ – श्रीगणेश जी का नामकरण एवं प्रथम पूज्य पद की प्राप्ति
इस पावन अध्याय में भगवान् ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जी मिलकर बालक का नामकरण करते हैं। उनके गणेश, विघ्नेश, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, हेरम्ब, वक्रतुण्ड और गणाध्यक्ष आदि पावन नाम रखे जाते हैं। सर्वेश्वर श्रीविष्णु घोषणा करते हैं कि समस्त ब्रह्माण्ड में किसी भी मांगलिक कार्य, यज्ञ, पूजा अथवा अनुष्ठान में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाएगी। जो मनुष्य गणेश जी की अग्र-पूजा किए बिना किसी अन्य देवता का अर्चन करेगा, उसका वह अनुष्ठान निष्फल हो जाएगा। इस प्रकार श्रीगणेश जी को समस्त जगतों में ‘प्रथम पूज्य’ का परम पद प्राप्त होता है।
९ – गणेश एवं कार्तिकेय की प्रतिस्पर्धा तथा माता-पिता की परिक्रमा
जब गणेश जी और कार्तिकेय जी बड़े होते हैं, तब ब्रह्माण्ड की श्रेष्ठता एवं प्रथम पूजा के अधिकार को लेकर दोनों भाइयों में एक मधुर प्रतिस्पर्धा होती है। निर्णय हेतु यह शर्त रखी जाती है कि जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा। कार्तिकेय जी तुरंत अपने मयूर (मोर) पर सवार होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा हेतु उड़ जाते हैं। किन्तु चतुर एवं ज्ञाननिधि गणेश जी अपने माता-पिता—शिव और पार्वती—की सात बार भक्तिपूर्वक परिक्रमा करके हाथ जोड़ खड़े हो जाते हैं। वे शास्त्र-वचन प्रस्तुत करते हैं कि माता-पिता की परिक्रमा करना ही समस्त ब्रह्माण्डों की परिक्रमा से बढ़कर है। इस बुद्धि-कौशल से प्रसन्न होकर शिव-पार्वती उन्हें विजयी घोषित करते हैं।
१० – भगवान् श्रीगणेश का रिद्धि-सिद्धि के साथ पावन विवाह
गणेश जी की अनुपम बुद्धि, तपोबल एवं प्रथम पूज्य पद से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी अपनी दो मानस पुत्रियों—सिद्धि और बुद्धि (रिद्धि और सिद्धि)—का पावन विवाह श्रीगणेश जी के साथ सम्पन्न कराते हैं। विश्वकर्मा द्वारा कैलाश पर एक दिव्य मण्डप का निर्माण किया जाता है। समस्त देवगण एवं ऋषि-मुनि इस दिव्य विवाह में सम्मिलित होकर नवदम्पति पर अक्षत एवं पुष्पों की वर्षा करते हैं। कालान्तर में सिद्धि से ‘शुभ’ तथा बुद्धि से ‘लाभ’ नामक दो परम तेजस्वी पुत्रों का जन्म होता है, जो समस्त जगतों में मङ्गल और समृद्धि के अधिष्ठात्री देव बनते हैं।
११ – महर्षि जमदग्नि-रेणुका आख्यान एवं परशुराम जी का प्राकट्य
कथा का प्रवाह अब महर्षि जमदग्नि के आश्रम की ओर मुड़ता है। भृगुवंशी महर्षि जमदग्नि और उनकी परम पतिव्रता पत्नी रेणुका के घर भगवान् श्रीविष्णु के आवेशावतार के रूप में महातेजस्वी परशुराम जी का प्राकट्य होता है। बाल्यावस्था से ही परशुराम जी अद्भुत तपोबल, निर्भीकता एवं शस्त्र-विद्या के प्रति अगाध रुचि प्रदर्शित करते हैं। वे अपने माता-पिता के चरणों में अनन्य भक्ति रखते हुए आश्रम में वेद-अध्ययन एवं उग्र तपस्या में लीन रहते हैं।
१२ – परशुराम जी द्वारा शिव-आराधना, शस्त्र-विद्या एवं कल्पतरु-कवच प्राप्ति
पितृ-आज्ञा से भगवान् परशुराम शिव जी को प्रसन्न करने हेतु गन्धमादन पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या करते हैं। उनकी उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शिव उन्हें अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें धनुर्वेद का सम्पूर्ण ज्ञान, दिव्य अमोघ परशु (फरसा) तथा ‘त्रैलोक्यविजय’ नामक दिव्य कवच एवं स्तोत्र प्रदान करते हैं। शिव जी की कृपा से परशुराम जी त्रिलोक में पराक्रम और शस्त्र-विद्या के सर्वोपरि आचार्य बन जाते हैं।
१३ – कार्तवीर्य अर्जुन का जमदग्नि आश्रम में आगमन एवं कामधेनु हरण
एक बार महिष्मती का परम प्रतापी सहस्रबाहु राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी विशाल सेना के साथ शिकार खेलते हुए महर्षि जमदग्नि के आश्रम में पहुँचता है। महर्षि जमदग्नि अपनी कामधेनु (कपिला गाय) के प्रभाव से क्षणभर में सम्पूर्ण राजा और उसकी विशाल सेना के लिए अलौकिक राजसी भोजन और आदर-सत्कार की व्यवस्था कर देते हैं। कामधेनु के इस अद्भुत प्रभाव को देखकर लोभी कार्तवीर्य अर्जुन के मन में पाप आ जाता है। वह जमदग्नि जी के मना करने पर भी बलपूर्वक कामधेनु और उसके बछड़े को छीनकर महिष्मती ले जाता है।
१४ – परशुराम जी और कार्तवीर्य अर्जुन का भयंकर युद्ध तथा अर्जुन-वध
आश्रम लौटने पर जब परशुराम जी को कार्तवीर्य अर्जुन के इस कुकृत्य का पता चलता है, तो उनका क्रोध प्रज्वलित हो उठता है। वे अपना परशु और धनुष उठाकर अकेले ही महिष्मती नगरी की ओर प्रस्थान करते हैं। कार्तवीर्य अर्जुन की चतुरंगिणी सेना और उसके सहस्रों शूरवीर पुत्र परशुराम जी पर टूट पड़ते हैं। परशुराम जी अकेले ही अपने परशु के प्रचण्ड प्रहारों से सम्पूर्ण अक्षौहिणी सेना का संहार कर देते हैं। अंत में सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन और परशुराम जी के मध्य घोर युद्ध होता है, जिसमें परशुराम जी अर्जुन की सहस्र भुजाओं को काट डालते हैं और उसका मस्तक धड़ से अलग कर कामधेनु को मुक्त कराते हैं।
१५ – अर्जुन के पुत्रों द्वारा जमदग्नि-वध, रेणुका-विलाप एवं परशुराम जी की प्रतिज्ञा
कार्तवीर्य अर्जुन के वध का बदला लेने के लिए उसके कायर पुत्र एक दिन अवसर पाकर महर्षि जमदग्नि के आश्रम में तब प्रवेश करते हैं जब परशुराम जी आश्रम में नहीं थे। ध्यानमग्न महर्षि जमदग्नि का वे अधर्मपूर्वक वध कर देते हैं। माता रेणुका अपने पति के शव के पास बैठकर इक्कीस बार छाती पीट-पीटकर करुण विलाप करती हैं। आश्रम लौटने पर यह दारुण दृश्य देखकर परशुराम जी का हृदय दग्ध हो उठता है। माता के इक्कीस बार विलाप करने के कारण वे अपने हाथ में जल लेकर प्रतिज्ञा करते हैं कि वे इस पृथ्वी को इक्कीस बार अतातायी क्षत्रियों से विहीन कर देंगे।
१६ – परशुराम जी द्वारा इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन करना
अपनी भीष्म प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए भगवान् परशुराम हाथ में परशु लेकर सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरण करते हैं। वे इक्कीस बार अधर्मी, निरङ्कुश और अत्याचारी क्षत्रिय राजाओं का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। समन्तपंचक क्षेत्र में वे क्षत्रियों के रक्त से पाँच कुण्ड भर देते हैं। तदुपरान्त वे सम्पूर्ण विजित पृथ्वी को महर्षि कश्यप को दान में दे देते हैं और स्वयं अस्त्र-शस्त्र त्यागकर शान्त भाव से भगवान् शिव के दर्शन हेतु कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।
१७ – परशुराम जी का कैलाश आगमन एवं शिव-दर्शन की प्रबल इच्छा
पृथ्वी को अधर्ममुक्त करने के पश्चात् परशुराम जी अपने परम गुरु भगवान् शिव के चरण-कमलों का दर्शन करने हेतु कैलाश पर्वत पर पहुँचते हैं। वे गुरु-दर्शन की तीव्र उत्कण्ठा से भरकर शिव जी के आभ्यन्तर भवन की ओर बढ़ते हैं। किन्तु उस समय भगवान् शिव और जगन्माता पार्वती एकांत भवन में विराजमान थे, अतः बाह्य द्वार पर पहरा दे रहे गणेश जी उन्हें भीतर जाने से रोकते हैं।
१८ – गणेश जी द्वारा कैलाश के द्वार पर परशुराम जी को रोकना
श्रीगणेश जी परम सौम्य एवं दृढ़ वाणी में परशुराम जी से कहते हैं कि इस समय भगवान् शिव और माता पार्वती एकांत निवास में हैं, अतः किसी भी व्यक्ति का भीतर प्रवेश करना वर्जित है। परशुराम जी अपनी उतावली और गुरु-दर्शन की तीव्र इच्छा के कारण गणेश जी के वचनों की अवहेलना करते हैं और बलपूर्वक भीतर जाने का प्रयास करते हैं। गणेश जी द्वार पर अडिग होकर खड़े हो जाते हैं और परशुराम जी का मार्ग रोक लेते हैं।
१९ – गणेश जी और परशुराम जी के मध्य भीषण वाक्-युद्ध
द्वार पर रोके जाने से परशुराम जी का भृगुवंशी क्रोध भड़क उठता है। वे गणेश जी को एक बालक समझकर अपशब्द कहते हैं और अपने तपोबल का भय दिखाते हैं। दूसरी ओर, गणेश जी परम शान्त किन्तु ओजस्वी वाणी में उन्हें धर्म, मर्यादा और गुरु-द्वार के नियमों का बोध कराते हैं। दोनों महापुरुषों के मध्य गहन दार्शनिक एवं उग्र वाक्-युद्ध छिड़ जाता है, जो शीघ्र ही एक भीषण युद्ध में बदल जाता है।
२० – श्रीगणेश और परशुराम जी के मध्य घोर संग्राम
वाक्-युद्ध जब उग्र रूप धारण कर लेता है, तब परशुराम जी गणेश जी पर अपने दिव्यास्त्रों से प्रहार करते हैं। श्रीगणेश जी लीलापूर्वक उन समस्त अस्त्रों को निष्फल कर देते हैं। परशुराम जी क्रोधित होकर बाणों की वर्षा करते हैं, किन्तु गणेश जी अपनी सूंड से उन बाणों को पकड़कर दूर फेंक देते हैं। गणेश जी अपनी सूंड को बढ़ाकर परशुराम जी को लपेट लेते हैं और उन्हें समस्त लोकों में घुमाकर पुनः कैलाश पर खड़ा कर देते हैं। इस अद्भुत लीला से परशुराम जी का अहङ्कार चूर्ण हो जाता है और वे अत्यन्त क्रुद्ध हो जाते हैं।
२१ – परशुराम जी द्वारा परशु-प्रहार एवं गणेश जी का ‘एकदन्त’ होना
अत्यधिक क्रुद्ध होकर परशुराम जी अपना वह अमोघ परशु (फरसा) उठाते हैं जो उन्हें स्वयं भगवान् शिव ने दिया था। वे उस परशु को गणेश जी पर पूरी शक्ति से चलाते हैं। गणेश जी सोचते हैं कि यदि वे इस परशु के प्रहार को व्यर्थ कर देंगे, तो उनके पिता शिव जी के शस्त्र का अपमान होगा। अतः गुरु-शस्त्र का मान रखते हुए गणेश जी उस प्रहार को अपने बाएँ दाँत पर झेल लेते हैं। परशु के तीक्ष्ण प्रहार से गणेश जी का बायाँ दाँत टूटकर गिर पड़ता है, और उसी दिन से वे समस्त ब्रह्माण्ड में ‘एकदन्त’ के पावन नाम से विख्यात होते हैं।
२२ – भगवती पार्वती का भयानक क्रोध एवं परशुराम जी पर कोप
गणेश जी के दाँत से रक्त की धारा बहते देखकर तथा उनके एकदन्त रूप को देखकर जगज्जननी पार्वती जी भयंकर क्रोध से प्रज्वलित हो उठती हैं। वे चण्डी का कालरात्रि रूप धारण कर परशुराम जी को भस्म करने हेतु उद्यत हो जाती हैं। समस्त देवगण और शिव जी भी भगवती के इस भीषण कोप को देखकर भयभीत हो जाते हैं। परशुराम जी भयभीत होकर जगन्माता की शरण में गिर पड़ते हैं, किन्तु भगवती का क्रोध शान्त नहीं होता।
२३ – श्रीविष्णु का आगमन, पार्वती जी का सान्त्वन एवं गणेश-महिमा
कैलाश पर संकट देखकर भक्तिवत्सल सर्वेश्वर श्रीविष्णु स्वयं प्रकट होते हैं। वे भगवती पार्वती की गम्भीर स्तुति करते हैं और उनके वात्सल्य भाव की प्रशंसा करते हुए उनके क्रोध को शान्त करते हैं। श्रीविष्णु समझाते हैं कि परशुराम जी शिव जी के ही अनन्य भक्त एवं शिष्य हैं और यह घटना पूर्व-विधान के अनुसार गणेश जी की ‘एकदन्त’ महिमा को जगत् में प्रकट करने हेतु हुई है। श्रीविष्णु गणेश जी के असीम ब्रह्म-स्वरूप का वर्णन कर पार्वती जी के हृदय को परम आनन्दित कर देते हैं।
२४ – परशुराम जी द्वारा पश्चात्ताप, गणेश-स्तुति एवं क्षमा-याचना
श्रीविष्णु के वचनों से बोध पाकर परशुराम जी के हृदय में गहरा पश्चात्ताप उत्पन्न होता है। वे अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान् श्रीगणेश के चरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं और उनकी अद्भुत स्तुति रचते हैं। परशुराम जी जगन्माता पार्वती और श्रीगणेश से अपने किए गए अपराध के लिए क्षमा माँगते हैं। गणेश जी परम दयालु होकर परशुराम जी को हृदय से लगा लेते हैं और उनका सारा मानसिक ताप हर लेते हैं।
२५ – गणेश जी द्वारा परशुराम जी को वरदान एवं परशुराम-विजय
गणेश जी प्रसन्न होकर परशुराम जी को आशीर्वाद देते हैं कि उनका यह परशु-प्रहार जगत् में उनकी अमर कीर्ति का कारण बनेगा। वे परशुराम जी को वरदान देते हैं कि वे अष्ट सिद्धियों से युक्त होंगे, युद्ध में सदा अपराजित रहेंगे तथा जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे, तब तक उनकी भक्ति और कीर्ति अमिट रहेगी। गणेश जी परशुराम जी को सर्वत्र विजय प्राप्ति का अमोघ मन्त्र और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
२६ – राजा अनरण्य की कथा, गणेश-कवच एवं स्तोत्र
इस अध्याय में श्रीसूत गोस्वामी जी राजा अनरण्य का पावन आख्यान सुनाते हैं। राजा अनरण्य पर जब भयंकर विपत्ति और शत्रु-आक्रमण होता है, तब वे महर्षि गौतम के उपदेश से श्रीगणेश जी की शरण लेते हैं। वे संकट-नाशन ‘गणेश-कवच’ और ‘गणेश-स्तोत्र’ का नित्य पाठ करते हैं। इस तपोबल से राजा अनरण्य अपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं और अपने राज्य में पूर्ण सुख-समृद्धि स्थापित करते हैं।
२७ – राजा पुष्पभद्र की कथा एवं गणेश-पूजन का माहात्म्य
सूत जी आगे राजा पुष्पभद्र और उनके पुत्र का वृत्तान्त सुनाते हैं। राजा पुष्पभद्र का पुत्र पूर्वजन्म के पापों के कारण अकाल मृत्यु और गम्भीर रोग से पीड़ित होता है। राजा पुष्पभद्र गणेश चतुर्थी के परम पावन व्रत का अनुष्ठान करते हैं और गणेश जी का विधिवत् पूजन करते हैं। श्रीगणेश जी की कृपादृष्टि से राजकुमार का रोग मिट जाता है और उसे दीर्घायु प्राप्त होती है। यह अध्याय गणेश-पूजन की अलौकिक शक्ति को सिद्ध करता है।
२८ – माली-सुमाली युद्ध, सूर्यदेव का पतन एवं शिव जी की कृपा
कथा के एक अन्य प्रसङ्ग में माली और सुमाली नामक दैत्यों का सूर्यदेव के साथ भयंकर युद्ध होता है। युद्ध में जब सूर्यदेव दैत्यों पर प्रहार करते हैं, तब भगवान् शिव दैत्यों की रक्षा हेतु सूर्यदेव पर त्रिशूल से प्रहार कर देते हैं, जिससे सूर्यदेव चेतनाहीन होकर आकाश से गिर पड़ते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अन्धकार छा जाता है। तब महर्षि कश्यप अपने पुत्र सूर्य की यह दशा देखकर अत्यधिक दुःखी होते हैं।
२९ – महर्षि कश्यप का शिव जी को शाप एवं गणेश-मस्तक छेद का कारण
अपने पुत्र सूर्यदेव के पतन से शोकाकुल होकर महर्षि कश्यप भगवान् शिव को शाप देते हैं कि जिस प्रकार शिव जी के त्रिशूल से उनके पुत्र का मस्तक क्षत-विक्षत हुआ है, उसी प्रकार शिव जी के पुत्र का मस्तक भी धड़ से पृथक् हो जाएगा। कालान्तर में शिव जी सूर्यदेव को पुनः जीवित कर देते हैं, किन्तु कश्यप जी का वह शाप ही बालक गणेश के मस्तक-छेद का मुख्य ब्रह्माण्डीय कारण बनता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि नियति के विधान से कोई परे नहीं है।
३० – शिव-कवच, स्तोत्र एवं पूजन-विधान
इस अध्याय में भगवान् शिव का परम गुप्त ‘शिव-कवच’, पावन स्तोत्र तथा उनकी दैनिक पूजन-विधि का विशद वर्णन किया गया है। यह शिव-कवच साधक को समस्त आसुरी बाधाओं, अकाल मृत्यु, रोगों तथा भय से मुक्ति प्रदान करता है। जो भक्त इस कवच का नित्य पाठ करता है, वह शिव पद को प्राप्त होता है।
३१ – परशुराम जी की तीर्थयात्रा एवं कठोर तपस्या
गणेश जी से वरदान प्राप्त करने के पश्चात् परशुराम जी अपने मन को पूर्णतः श्रीकृष्ण-भक्ति में लीन करने हेतु भारतवर्ष के समस्त पवित्र तीर्थों की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। वे पुष्कर, कुरुक्षेत्र, प्रभास तथा बदरिकाश्रम जैसे पावन तीर्थों में स्नान कर उग्र तपस्या करते हैं और अपने अन्तःकरण को पूर्ण विशुद्ध बनाते हैं।
३२ – अगस्त्य जी से परशुराम जी को कृष्ण-मन्त्र एवं स्तोत्र की प्राप्ति
अपनी तीर्थयात्रा के दौरान परशुराम जी महर्षि अगस्त्य के पवित्र आश्रम में पहुँचते हैं। महर्षि अगस्त्य परशुराम जी की अनन्य निष्ठा देखकर उन्हें सर्वेश्वर श्रीकृष्ण का परम गुप्त मन्त्र, ध्यान-विधि तथा ‘अनुस्मृति स्तोत्र’ का उपदेश देते हैं। इस मन्त्र के जप से साधक को साक्षात् श्रीकृष्ण-साक्षात्कार की योग्यता प्राप्त होती है।
३३ – त्रैलोक्यमोहन कृष्ण-कवच एवं स्तोत्र का निरूपण
महर्षि अगस्त्य परशुराम जी को ‘त्रैलोक्यमोहन’ नामक परम गोपनीय कृष्ण-कवच प्रदान करते हैं। यह कवच सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के अङ्ग-प्रत्यङ्ग की रक्षा का पावन मन्त्र है। इसे धारण करने वाला साधक त्रिलोक में वन्दनीय हो जाता है और उसे समस्त आध्यात्मिक सिद्धियाँ अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं।
३४ – परशुराम जी को गोलोक में श्रीराधा-कृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन
अगस्त्य जी द्वारा दिए गए मन्त्र और कवच का जप करते हुए परशुराम जी पुष्कर क्षेत्र में घोर ध्यान में मग्न हो जाते हैं। उनके ध्यान की परिपक्वता पर उनके हृदय-आकाश में साक्षात् परम दिव्य गोलोक धाम का दृश्य प्रकट होता है। वे शतदल कमल पर विराजमान परात्पर पूर्णब्रह्म श्रीराधा-कृष्ण के मनमोहन द्विभुज रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं और अलौकिक प्रेमानन्द में निमग्न हो जाते हैं।
३५ – परशुराम जी का पुनरागमन एवं अवशिष्ट क्षत्रियों का दमन
गोलोकपति श्रीकृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन और आशीर्वाद पाकर परशुराम जी पुनः अपनी कर्मभूमि पर लौटते हैं। वे सुबाहु आदि अवशिष्ट अधर्मी क्षत्रिय राजाओं का दमन कर पृथ्वी पर पूर्ण धर्मराज्य की स्थापना करते हैं और प्रजा को भयमुक्त करते हैं।
३६ – सर्वसिद्धिप्रदायक गणपति-कवच का वर्णन
इस पावन अध्याय में महर्षि नारद के पूछने पर श्रीसूत गोस्वामी जी परम दुर्लभ ‘गणपति-कवच’ का वर्णन करते हैं। यह कवच श्रीगणेश जी के विभिन्न पावन नामों से निर्मित एक अभेद्य आध्यात्मिक ढाल है, जो साधक की आठों दिशाओं से रक्षा करता है। इसका पाठ करने से दरिद्रता, भय और विघ्न तुरंत दूर हो जाते हैं।
३७ – गणेश चतुर्थी व्रत एवं पूजन-माहात्म्य
यहाँ भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि (गणेश चतुर्थी) के महाव्रत की महिमा का विशद वर्णन है। इस दिन गणेश जी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर दूर्वा, मोदक, लाल पुष्प एवं चन्दन से पूजन करने का शास्त्रीय विधान बताया गया है। इस व्रत के प्रभाव से असम्भव कार्य भी सुलभ हो जाते हैं।
३८ – चन्द्रमा का अहङ्कार, गणेश जी पर उपहास एवं गणेश-शाप
एक बार गणेश जी मोदकों का भोग लगाकर अपने मूषक (चूहे) पर सवार होकर जा रहे थे। मार्ग में मूषक के लडखड़ाने से गणेश जी गिर पड़ते हैं। अपनी कान्ति के अहङ्कार में मत्त चन्द्रमा गणेश जी के उस लम्बोदर रूप और गिरने पर जोर से हँस पड़ता है। चन्द्रमा के इस अहङ्कार और उपहास से क्रुद्ध होकर गणेश जी शाप देते हैं कि जो भी गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा का दर्शन करेगा, उस पर मिथ्या कलङ्क लगेगा और उसकी कान्ति नष्ट हो जाएगी।
३९ – देवों की प्रार्थना पर चन्द्रमा के शाप का निवारण
गणेश जी के शाप से चन्द्रमा कान्तिहीन होकर निष्प्रभ हो जाता है और समस्त जगत् में जल-सङ्कट छा जाता है। समस्त देवगण एवं ब्रह्मा जी चन्द्रमा को लेकर गणेश जी की शरण में आते हैं और आकुल स्तुति करते हैं। गणेश जी दयालु होकर शाप को मन्द करते हैं कि केवल भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन करने पर ही कलङ्क का प्रभाव रहेगा, किन्तु जो मनुष्य इस दिन गणेश जी की पूजा करेगा या स्यमन्तक मणि की कथा सुनेगा, वह उस कलङ्क से मुक्त हो जाएगा।
४० – स्यमन्तक मणि की कथा का सन्दर्भ एवं श्रीकृष्ण पर मिथ्या कलङ्क
द्वापर युग में स्वयं सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात्रि को अनजाने में जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब देख लेते हैं। गणेश जी के शाप-विधान के अनुसार श्रीकृष्ण पर स्यमन्तक मणि चुराने का मिथ्या कलङ्क लग जाता है। सत्राजित् अपने भाई प्रसेन की मृत्यु और मणि के गुम होने का दोष श्रीकृष्ण पर लगाता है।
४१ – श्रीकृष्ण द्वारा स्यमन्तक मणि की प्राप्ति एवं जाम्बवान्-युद्ध
अपने ऊपर लगे मिथ्या कलङ्क को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण वन में जाते हैं। वे सिंह द्वारा प्रसेन के वध और जाम्बवान् द्वारा सिंह को मारकर मणि ले जाने का सुराग खोजते हैं। श्रीकृष्ण ऋक्षराज जाम्बवान् की गुफा में प्रवेश करते हैं और उनके मध्य २८ दिनों तक घोर मल्लयुद्ध होता है। जाम्बवान् श्रीकृष्ण को अपने प्रभु श्रीराम के रूप में पहचानकर क्षमा माँगते हैं और स्यमन्तक मणि तथा अपनी पुत्री जाम्बवती का हाथ श्रीकृष्ण को सौंप देते हैं। श्रीकृष्ण मणि लाकर सत्राजित् को सौंपते हैं और अपना निष्कलङ्क स्वरूप सिद्ध करते हैं।
४२ – एकदन्त गणेश जी का दार्शनिक स्वरूप एवं नाम-माहात्म्य
यह दार्शनिक अध्याय ‘एकदन्त’ शब्द के गूढ़ अर्थ को प्रकाशित करता है। ‘एक’ शब्द सर्वप्रधान परमात्मा (श्रीकृष्ण) का वाचक है और ‘दन्त’ शब्द बल तथा माया का वाचक है। जो परमात्मा अपनी माया और बल को एक करके ब्रह्माण्ड का संचालन करते हैं, वे ही ‘एकदन्त’ हैं। श्रीगणेश जी का यह रूप माया और ब्रह्म के पूर्ण एकत्व का प्रतीक है।
४३ – गणेश जी के सर्वशक्तिमान् स्वरूप एवं सर्वदेवमयता का निरूपण
इस अध्याय में श्रीगणेश जी के सर्वदेवमय स्वरूप का निरूपण किया गया है। गणेश जी केवल एक देव नहीं, अपितु स्वयं परंब्रह्म हैं। ब्रह्मा जी में उनका सृजनात्मक अंश, विष्णु जी में उनका पालन-अंश और शिव जी में उनका संहार-अंश विद्यमान है। उनकी पूजा से समस्त ३३ कोटि देवता स्वतः तृप्त हो जाते हैं।
४४ – परशुराम जी द्वारा महायज्ञ, सर्वस्व दान एवं महेन्द्र पर्वत गमन
अपनी सम्पूर्ण लीलाओं को पूर्ण कर भगवान् परशुराम एक महान् अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। वे अपनी सम्पूर्ण विजित भूमि, स्वर्ण एवं रत्न ऋषियों और ब्राह्मणों को दान में दे देते हैं। सर्वस्व दान करके वे अकिञ्चन संन्यासी का वेश धारण करते हैं और अखण्ड तपस्या हेतु महेन्द्र पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ वे आज भी चिरंजीवी रूप में विराजमान हैं।
४५ – गणेश खण्ड के अध्ययन एवं श्रवण का परम पुण्य-फल
यह फलश्रुति अध्याय गणेश खण्ड के पठन, श्रवण एवं मनन के अलौकिक पुण्यों का गान करता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस गणेश खण्ड का पाठ करता है, उसके घर से दरिद्रता, विघ्न, रोग और भय सदा के लिए मिट जाते हैं। उसे सुसन्तति, दीर्घायु, सिद्धि तथा अन्त में श्रीकृष्ण-चरणों में नित्य वास प्राप्त होता है।
४६ – गणेश खण्ड का भव्य समापन एवं श्रीकृष्ण जन्म खण्ड का पावन प्रवेश
छियालीस अध्यायों की इस मंगलमयी कथा को पूर्ण करते हुए श्रीसूत गोस्वामी जी नैमिषारण्य के ऋषियों के सम्मुख श्रीगणेश जी, शिव-पार्वती तथा श्रीकृष्ण के चरणों में बारम्बार प्रणाम अर्पित करते हैं। गणेश खण्ड का यह पावन प्रसङ्ग यहाँ परम गरिमा के साथ समाप्त होता है, और इसके साथ ही ब्रह्मवैवर्त पुराण के अन्तिम एवं सबसे विशाल ‘श्रीकृष्ण जन्म खण्ड’ में प्रवेश का दिव्य द्वार उद्घाटित होता है।
Read Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa’s Gaṇeśa Khaṇḍa Online in Hindi
ब्रह्म वैवर्त पुराण को निम्नानुसार व्यवस्थित किया गया है और इसलिए इस क्रम में पढ़ने का सुझाव दिया गया है:
- ब्रह्म खंड
- प्रकृति खंड
- गणेश खंड (वर्तमान पृष्ठ)
- श्री कृष्ण जनन खंड
