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श्री महर्षि वेदव्यास जी के प्रिय शिष्य महर्षि जैमिनी के गूढ़ प्रश्नों के समाधान से आरंभ होने वाला यह पावन मार्कंडेय पुराण, अष्टादश महापुराणों में परम पवित्र एवं सप्तम स्थान पर विराजमान है। यह दिव्य पुराण एक सौ सैंतीस अध्यायों और लगभग नौ सहस्र श्लोकों का एक ऐसा विशाल आध्यात्मिक भंडार है, जो सनातनी चेतना, धर्मशास्त्र, ब्रह्मांड विज्ञान और भगवदभक्ति की अमूल्य धाराओं से ओतप्रोत है। इस ग्रंथ की संरचना संवाद-शैली की उस सनातन परंपरा पर आधारित है, जहाँ ऋषियों और दिव्य आत्माओं के बीच सत्य की खोज होती है। इसके प्रारंभिक अध्याय महर्षि जैमिनी और विंध्याचल की कंदराओं में निवास करने वाले धर्मज्ञ, वेदवेत्ता चार दिव्य पक्षियों के मध्य हुए अद्भुत संवाद से परिपूर्ण हैं। इन पक्षियों को महर्षि शमीक के आश्रम में ऋषियों की कृपा से वेदज्ञान एवं पूर्वजन्म की दिव्य स्मृति प्राप्त हुई थी। वे पक्षी प्रथम चौलीस अध्यायों में कर्मविपाक, गार्हस्थ धर्म, अवधूत दत्तात्रेय जी की महिमा, रानी मदालसा द्वारा अपने पुत्रों को दिए गए अद्वैत तत्वज्ञान तथा यमलोक और नरकों के सूक्ष्म विधान को विस्तृत रूप से प्रकट करते हैं।
पुराण का मध्य भाग महर्षि मार्कंडेय और उनके सुयोग्य शिष्य क्रोष्टुकि के पावन संवाद के रूप में विकसित होता है, जो पैंतालीसवें अध्याय से लेकर एक सौ छत्तीसवें अध्याय तक विस्तृत है। इस महाभाग में जगत् की प्राकृत एवं वैकृत सृष्टि, ब्रह्मा जी के मानसी पुत्रों का आविर्भाव, चौदह मन्वंतरों का कालचक्र, भारतवर्ष का विस्तृत भौगोलिक एवं पौराणिक स्वरूप, तथा सूर्यवंश व चंद्रवंश के महान पुण्यश्लोक राजाओं की वंशावली गाथाएँ वर्णित हैं। इसी भाग के अंतर्गत अध्यात्म का परम शिखर कहे जाने वाले इक्यासीवें से तिरानवेवें अध्याय तक श्रीमद्दुर्गासप्तशती अर्थात् श्री देवी माहात्म्य का आविर्भाव होता है, जहाँ महर्षि मेधा राजा सुरथ और वैश्य समाधि को भगवती जगदंबा के महिषासुरमर्दिनी, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूपों के पावन चरित्र सुनाते हैं। यह संपूर्ण पुराण एक सौ सैंतीसवें अध्याय में इस दिव्य संहिता के पठन-पाठन तथा श्रवण की अक्षय फलश्रुति एवं श्रीहरि-चरणों में परम भक्ति के अर्पण के साथ संपन्न होता है।
मार्कंडेय पुराण का मूल स्वर धर्म की सनातन विजय, भगवद्भक्ति तथा आत्मज्ञान का अखंड आलोक है। इस पुराण का प्रथम सर्वोपरि विषय सत्य और कर्तव्य-पालन की महिमा है। महाराज हरिश्चंद्र द्वारा सचाई की रक्षा के लिए राजपाट, पत्नी तथा पुत्र का सहर्ष त्याग, राजा कुवलयाश्व का धर्मयुद्ध, तथा राजा मरुत्त और राजा दम के चरित्र के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि विषम से विषम परिस्थिति में भी धर्म का आचरण ही जीव का सच्चा संबल और मुक्ति का कारक है। कर्मफल सिद्धान्त तथा जीव की गतियों का गहन विश्लेषण करते हुए यह पुराण बताता है कि मनुष्य द्वारा किए गए शुभ और अशुभ कर्मों के फल अवश्यंभावी हैं, जिन्हें भोगकर ही पापों का क्षय होता है।
इस पुराण का दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पिशाच, दानव तथा अधर्म के विनाश हेतु पराम्बा भगवती जगदंबा की अनन्य उपासना है। श्री देवी माहात्म्य के अंतर्गत महामाया की सर्वोपरि शक्ति, मधु-कैटभ वध, महिषासुर वध, तथा शुंभ-निशुंभ वध के प्रसंगों द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि जब-जब संसार में अधर्म का पलड़ा भारी होता है, तब-तब सर्वशक्तिमती महामाया अपने भक्तों के उद्धार हेतु प्रकट होती हैं। इसके अतिरिक्त अवधूत भगवान दत्तात्रेय तथा तत्वज्ञानी रानी मदालसा द्वारा अपने बालकों को उरु-लोरी गाकर सिखाया गया शुद्ध अद्वैत ब्रह्मज्ञान इस पुराण को अध्यात्म शास्त्र का सर्वोच्च मुकुटमणि बनाता है। साथ ही प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की आराधना, आदित्य हृदय की पावन महिमा, तथा पूर्वजों के प्रति तृप्ति हेतु किए जाने वाले श्राद्ध-तर्पण विधान का जैसा विस्तृत और भक्तिमय वर्णन इसमें प्राप्त होता है, वह सनातन संस्कृति की पितृभक्ति एवं प्रकृति-पूजन की अमूल्य धरोहर है।
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हर अध्याय का विवरण
1 – जैमिनिशिष्यप्रश्न
परम पावन मार्कंडेय आश्रम में महर्षि वेदव्यास जी के परम शिष्य महर्षि जैमिनी उपस्थित होकर अत्यंत विनीत भाव से अपने गुरुदेव द्वारा संकेतित चार गूढ़ शंकाओं का समाधान पूछते हैं। जैमिनी मुनि यह जानना चाहते हैं कि सर्वेश्वर भगवान वासुदेव ने मनुष्य रूप में अवतार क्यों धारण किया, द्रौपदी के पाँचों पुत्र बिना विवाह किए अल्पायु में ही क्यों मारे गए, बलराम जी ने ब्रह्महत्या के दोष-निवारण के लिए तीर्थयात्रा क्यों की, और योगमाया स्वरूपिणी द्रौपदी पाँचों पांडवों की एकनिष्ठ पत्नी किस प्रकार बनी। महर्षि मार्कंडेय जी अपने नित्य संध्या-वंदन एवं वैदिक अनुष्ठान में संलग्न होने के कारण जैमिनी मुनि को विंध्याचल की पवित्र गुफाओं में निवास करने वाले सर्वज्ञ, धर्मनिष्ठ चार दिव्य पक्षियों के पास जाने का निर्देश देते हैं।
2 – पक्ष्युपाख्यान
चारों दिव्य पक्षियों के जन्म और उनकी अद्भुत आध्यात्मिक सामर्थ्य की पावन कथा का उद्घाटन होता है। कुरुक्षेत्र के महासंग्रामाग्नि में जब एक विशाल हाथी के गले का घंटा टूटकर गिर पड़ा, तो उसके नीचे सुरक्षित रहे चार अंडों से इन पक्षियों का जन्म हुआ था। महर्षि शमीक ने करुणाद्र होकर इनका पालन-पोषण किया और अपने आश्रम की पवित्र वेदमंत्रों की ध्वनि से इन्हें संस्कृत किया। पूर्वजन्म में मुनि सुकृष के पुत्र होकर मुनि दुर्वासा के शापवश पक्षी योनि में जन्मे ये जीव अपने तपोबल और मुनि-कृपा से पूर्वजन्म की स्मृति और विशुद्ध मानव वाणी से संपन्न थे। महर्षि जैमिनी के आगमन पर इन पक्षियों ने उनका परम आदर-सत्कार किया और उनके संशयों के निवारण के लिए तत्पर हुए।
3 – द्रौपदीपंचपतित्वनिरूपण
दिव्य पक्षियों ने महर्षि जैमिनी मुनि के प्रथम संशय का समाधान करते हुए भगवान इंद्र के पाँच तेजांशों और द्रौपदी के आविर्भाव का रहस्य प्रकट किया। प्राचीन काल में जब इंद्र से त्रिशिरा और वृत्र का वध हुआ, तब उनका बल, धर्म, और तेज खंडित होकर पाँच भागों में विभक्त हो गया था। वे ही पाँच दिव्य अंश भूलोक पर पांडवों के रूप में अवतरित हुए, और साक्षात् स्वर्ग की श्रीलक्ष्मी देवी यज्ञकुंड से द्रौपदी के रूप में प्रकट होकर उन पाँचों की सहधर्मिणी बनीं, जिससे सनातन धर्म की मर्यादा का पूर्ण पालन हुआ।
4 – वासुदेवावतारनिरूपण
चारों धर्मज्ञ पक्षी भगवान श्रीविष्णु के भूलोक पर अवतार धारण करने के परम रहस्य का गान करते हैं। यद्यपि श्रीहरि अजन्मा, निर्गुण और सर्वव्यापी हैं, फिर भी जब-जब पृथ्वी पर अधर्म का भार बढ़ता है और धर्म का ह्रास होता है, तब-तब वे अपनी योगमाया के द्वारा स्वेच्छा से सगुण रूप धारण करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का अवतार भूभार हरण करने, दुष्ट राजाओं का संहार करने और सनातन धर्म की पुनः स्थापना हेतु ही हुआ था।
5 – बलदेव तीर्थयात्रा
भगवान बलराम जी की पावन तीर्थयात्रा और उनके द्वारा धर्मशास्त्र के मर्म को स्थापित करने का सुंदर वृत्तांत वर्णित है। महाभारत युद्ध के समय निरपेक्ष रहने के उद्देश्य से बलराम जी ने पित्र्य और देव तीर्थों का सेवन करते हुए सरस्वती नदी के तट पर यात्रा की। नैमिषारण्य में सूत जी का अनजाने में वध हो जाने पर, उन्होंने लोक-शिक्षा हेतु बारह वर्षों तक कठिन व्रत धारण कर तीर्थाटन किया और परम पावन आचरण का आदर्श प्रस्तुत किया।
6 – द्रौपदेय वध
द्रौपदी के पाँचों वीर पुत्रों का अश्वत्थामा द्वारा रात्रि के समय असावधान अवस्था में वध किए जाने का मार्मिक कर्म-रहस्य प्रकट किया गया है। ये पाँचों बालक पूर्वजन्म में परम पवित्र विश्वेदेव थे, जिन्हें महर्षि विश्वामित्र के प्रति किए गए एक सूक्ष्म अपराध के कारण मर्त्यलोक में जन्म लेना पड़ा था। अल्पकाल में ही अपने पूर्वजन्म के शाप से मुक्त होकर वे पुनः अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो गए।
7 – हरिश्चंद्रोपाख्यान
सत्यनिष्ठ महाराज हरिश्चंद्र की परम पावन कथा प्रारंभ होती है, जिसमें उनकी अचल सत्यनिष्ठा और त्याग का अनुपम वर्णन है। महर्षि विश्वामित्र ने राजा की सत्य-परीक्षा लेने हेतु उनके संपूर्ण राज्य, कोष और सर्वस्व का दान माँग लिया, जिसे राजा ने प्रसन्नतापूर्वक अर्पित कर दिया। तत्पश्चात दक्षिणा की पूर्ति हेतु महाराज हरिश्चंद्र अपनी साध्वी पत्नी शैब्या और अबोध पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी नगरी की ओर प्रस्थान करते हैं।
8 – हरिश्चंद्रोपाख्यान अनुसंधान
काशी नगरी में महाराज हरिश्चंद्र द्वारा झेली गई दारुण विपत्तियों और उनके धर्म-विजय का मार्मिक प्रसंग वर्णित है। राजा ने स्वयं को एक चांडाल के हाथ बेच दिया और श्मशान की रखवाली का कार्य स्वीकार किया। सर्पदंश से मृत पुत्र का शव लेकर आई पत्नी से भी राजा ने बिना श्मशान-कर लिए दाह-संस्कार नहीं करने दिया। राजा की इस अभूतपूर्व सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान इंद्र, महर्षि विश्वामित्र और समस्त देवताओं ने प्रकट होकर पुत्र को जीवित किया और राजा को सह-प्रजा स्वर्गलोक प्रदान किया।
9 – आडिबक युद्ध
महर्षि वशिष्ठ और महर्षि विश्वामित्र के मध्य हुए भीषण युद्ध का आख्यान वर्णित है। हरिश्चंद्र के कष्टों से द्रवित होकर महर्षि वशिष्ठ ने विश्वामित्र को शाप दिया और विश्वामित्र ने वशिष्ठ को, जिससे दोनों मुनि विशाल पक्षी बनकर परस्पर युद्ध करने लगे। उनके भयानक युद्ध से तीनों लोक कांप उठे, तब स्वयं ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर दोनों महर्षियों का क्रोध शांत कराया और उन्हें परम सत्य का बोध कराया।
10 – गर्भोत्पत्ति वर्णन
ज्ञानी पुत्र और उसके पिता के मध्य हुए संवाद में मानव शरीर की उत्पत्ति और गर्भाशय के गूढ़ विज्ञान का वर्णन किया गया है। पुत्र अपने पिता को बताता है कि जीव किस प्रकार अपने कर्मानुसार पिता के शुक्र के माध्यम से माता के गर्भ में प्रवेश करता है और दस महीनों तक असह्य कष्ट भोगता है। गर्भ में रहते हुए उसे अपने पूर्वजन्मों का स्मरण रहता है और वह भगवान की स्तुति करता है, किंतु जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सब भूल जाता है।
11 – संसारगति एवं कर्मविपाक
ज्ञानी पुत्र अपने पिता को जीव की विभिन्न गतियों और कर्मफल के अटूट सिद्धांत का उपदेश देता है। मनुष्य द्वारा किए गए शुभ कर्मों से देवलोक और सुख की प्राप्ति होती है, जबकि पाप कर्मों से जीव नीच योनियों तथा घोर नरकों में गिरता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह इस नश्वर संसार के मोह से मुक्त होकर परमात्मा के ध्यान में संलग्न हो।
12 – यमयातना एवं नरक वर्णन
यमलोक के भयानक मार्गों तथा रौरव, महारौरव, तप्तकुंभ आदि विविध नरकों का अत्यंत जीवंत और चेतावनीपूर्ण वर्णन किया गया है। यमदूत पापियों को अत्यंत क्लेशदायक मार्गों से ले जाते हैं और उनके द्वारा किए गए कुकर्मों के अनुसार उन्हें यमयातनाएँ दी जाती हैं, जिससे जीव के पापों का परिमार्जन होता है।
13 – नरकानुभव निरूपण
परम दयालु राजा विपश्चित की अद्भुत कथा वर्णित है, जो अपने एक सूक्ष्म पाप के कारण नरक में पहुँचे थे। राजा के शरीर की परम पवित्र वायु और पुण्य-प्रभाव से नरक में यातना भोग रहे पापियों का कष्ट समाप्त हो गया। जब यमदूत राजा को स्वर्ग ले जाने लगे, तो राजा ने नारकीय जीवों के उद्धार हेतु स्वयं नरक में ही रुकने का संकल्प लिया, जिससे प्रसन्न होकर देवताओं ने सभी जीवों को नरक-मुक्त कर दिया।
14 – यमदूत निर्देश
यमदूत अपने सेवकों को निर्देश देते हुए बताते हैं कि कौन-कौन से पाप कार्य मनुष्य को नरक का भागी बनाते हैं और कौन से पुण्य कार्य यमयातना से रक्षा करते हैं। माता-पिता की सेवा, अतिथि-सत्कार, गो-सेवा, सत्यभाषण और विष्णु-भक्ति करने वाले मनुष्यों के पास यमदूत कभी नहीं भटकते।
15 – नरकमुक्ति एवं पुण्य वर्णन
पाप कर्मों के निष्कृति हेतु शास्त्रोक्त प्रायश्चित विधियों, दान-पुण्य और पित्र्य-श्राद्ध की पावन महिमा का वर्णन किया गया है। पुत्रों द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से पितर तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को आयु, आरोग्य, संतति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
16 – अनसूया वर एवं अत्रि तप
परम पतिव्रता माता अनसूया की महिमा और महर्षि अत्रि के कठोर तपोबल का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। जब त्रिदेवों ने अनसूया जी के पातिव्रत्य की परीक्षा लेनी चाही, तो माता ने अपने तपोबल से ब्रह्मा, विष्णु और महेश को छोटे-छोटे शिशुओं में बदल दिया। बाद में देवी अनसूया की भक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उनके पुत्र रूप में अवतार लेने का वरदान दिया।
17 – दत्तात्रेयावतार
त्रिदेवात्मक भगवान दत्तात्रेय जी के पावन अवतरण और उनकी अवधूत लीलाओं का सुंदर वर्णन है। महर्षि अत्रि और माता अनसूया के यहाँ अवतरित होकर भगवान दत्तात्रेय ने समस्त जगत को योग, भक्ति और अद्वैत ज्ञान की परम धारा से आप्लावित किया और शरणागत भक्तों का कल्याण किया।
18 – गर्गवाक्य एवं दत्तात्रेय माहात्म्य
महर्षि गर्ग राजा आयु को भगवान दत्तात्रेय जी की अनन्य उपासना और उनके शरणागति माहात्म्य का उपदेश देते हैं। गर्ग जी बताते हैं कि दत्तात्रेय जी के चरणों की शरण लेने से मनुष्य को समस्त राजयोग, राज्य-प्राप्ति, पुत्र-लाभ तथा अंततः मोक्ष की प्राप्ति सुलभ हो जाती है।
19 – दत्तात्रेयोपाख्यान
महाराज कार्तवीर्यार्जुन द्वारा भगवान दत्तात्रेय जी की कठोर आराधना और उनसे चार महान वरदान प्राप्त करने का प्रसंग वर्णित है। दत्तात्रेय जी की कृपा से सहस्रबाहु कार्तवीर्यार्जुन को सहस्र भुजाएँ, अधर्म-निवारण की शक्ति, न्यायपूर्ण राज्य-सदाचार और युद्ध में केवल श्रेष्ठ योद्धा द्वारा मृत्यु का वर प्राप्त हुआ।
20 – कुवालयाश्वोपाख्यान
राजकुमार कुवलयाश्व के परम पराक्रम और ऋषियों के यज्ञ-रक्षण की गाथा कही गई है। पातालकेतु नामक दुष्ट दानव से ऋषियों के आश्रमों की रक्षा करने हेतु राजकुमार अपने तीव्रगामी कुवलय नामक अश्व पर सवार होकर पाताल लोक पहुँचे और अधर्म का विनाश किया।
21 – कुवालयाश्व विवाह
राजकुमार कुवलयाश्व द्वारा पाताल लोक में बंदी बनाई गई गंधर्वराज विश्वावसु की परम सुंदरी कन्या मदालसा का दानव पातालकेतु से उद्धार करने का वृत्तांत है। राजकुमार ने दैत्य का संहार कर वैदिक विधि से मदालसा के साथ पाणिग्रहण संस्कार संपन्न किया।
22 – मदालसा मरण
पातालकेतु के भ्राता तालकेतु दानव द्वारा रचे गए कपट-जाल की दुखद घटना वर्णित है। तालकेतु ने छद्म वेश धारण कर महारानी मदालसा को यह झूठा समाचार दिया कि कुवलयाश्व युद्ध में मारे गए हैं। भयंकर पति-वियोग के शोक में साध्वी मदालसा ने अपने प्राणों का सहसा त्याग कर दिया।
23 – कुवालयाश्व पातालगमन
मदालसा के विरह में व्याकुल राजा कुवलयाश्व ने पुनः विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा ली। राजा की इस अनन्य निष्ठा से प्रभावित होकर उनके नाग-राजकुमार मित्रों ने उन्हें पाताल लोक ले जाकर अपने पिता नागराज अश्वतर से मिलाया।
24 – मदालसा पुनर्लाभ
नागराज अश्वतर ने हिमालय के पावन शिखर पर भगवती सरस्वती की आराधना कर परम दिव्य संगीत विद्या प्राप्त की। ब्रह्मा जी के वरदान से नागराज ने मदालसा को पुनः उसी रूप में पुनर्जीवित किया और राजा कुवलयाश्व को उनकी साध्वी पत्नी ससम्मान सौंप दी।
25 – कुवालयाश्व मदालसा संवाद
पुनर्जीवित होकर राजभवन लौटी महारानी मदालसा अपने पति कुवलयाश्व के साथ गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी पूर्ण रूप से असंग और आत्मज्ञानी बनी रहीं। राजा और रानी के बीच हुए अध्यात्मपरक संवादों में संसार की अनित्यता का उद्घाटन किया गया है।
26 – पुत्र शिक्षा
तत्वज्ञानी महारानी मदालसा अपने प्रथम तीन पुत्रों विक्रांत, सुबाहु और शत्रुमर्दन को पालने में झुलाते हुए लौकिक लोरी के स्थान पर शुद्ध अद्वैत ब्रह्मज्ञान के पद गाकर सुनाती हैं। माता के इस ज्ञानोपदेश से तीनों राजकुमार शैशवावस्था से ही विरक्त होकर संन्यास मार्ग पर निकल जाते हैं।
27 – मदालसोपदेश
मदालसा अपने पुत्रों को उपदेश देते हुए कहती हैं कि यह शरीर पंचभूतों का बना नश्वर ढांचा है, जबकि तुम्हारी आत्मा विशुद्ध, बुद्ध और नित्य-मुक्त ब्रह्म स्वरूप है। नाम, रूप और जातियाँ केवल शरीर के धर्म हैं, आत्मतत्त्व इन सबसे परे और परम आनंदमय है।
28 – मदालसा राजधर्मोपदेश
चौथे पुत्र अलर्क के जन्म पर राजा कुवलयाश्व के अनुरोध करने पर मदालसा उसे संन्यासी न बनाकर एक आदर्श प्रजापालक राजा बनाने हेतु राजधर्म का उपदेश देती है। मदालसा अलर्क को षडरस, दंडनीति, राज्य के सात अंग और प्रजा के पुत्रवत पालन का गूढ़ रहस्य सिखाती है।
29 – गृहस्थधर्मोपदेश
मदालसा राजकुमार अलर्क को वर्णाश्रम धर्म, गृहस्थ जीवन के पवित्र कर्तव्यों, पंचमहायज्ञों, अतिथि-सेवा और पितृ-तर्पण का विस्तृत विधान समझाती है। गृहस्थ आश्रम को समस्त आश्रमों का आधार बताते हुए वह धर्मानुकूल धनार्जन की प्रेरणा देती है।
30 – संन्यासधर्मोपदेश
मदालसा वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के नियमों का प्रतिपादन करती है। अंत में वह अलर्क को एक स्वर्ण मुद्रिका देती है और कहती है कि जब राज्य पर घोर विपत्ति आए और कोई मार्ग न सूझे, तब इस मुद्रिका के भीतर छिपे पत्र को पढ़ना।
31 – अलर्काभिषेक
महाराज कुवलयाश्व और मदालसा के वानप्रस्थ हेतु वन गमन के पश्चात राजकुमार अलर्क का राज्याभिषेक होता है। राजा अलर्क अपनी माता के दिए गए राजधर्म के उपदेशों का अक्षरसः पालन करते हुए अत्यंत धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करते हैं।
32 – अलर्क राज्य
राजा अलर्क के शासनकाल में राज्य में शांति, समृद्धि और धर्म का पूर्ण साम्राज्य रहता है। किंतु कालक्रम से अलर्क में सूक्ष्म रूप से राजमद और भोगों के प्रति आसक्ति उत्पन्न हो जाती है, जिसे देखकर उनके विरक्त भ्राता सुबाहु उन्हें जगाने का विचार करते हैं।
33 – सुबाहु आगमन
अलर्क के भ्राता सुबाहु काशीराज की सेना लेकर अलर्क के राज्य पर आक्रमण कर देते हैं और एक-एक करके उनके समस्त दुर्गों और कोष पर अधिकार कर लेते हैं। अत्यंत संकट में पड़कर राजा अलर्क को अपनी माता मदालसा की दी हुई मुद्रिका की याद आती है।
34 – अलर्काभ्युदय एवं विरक्ति
मुद्रिका को खोलने पर अलर्क उसमें मदालसा का संदेश पढ़ते हैं जिसमें लिखा था कि बाह्य राज्य का मोह छोड़कर अपने भीतर के आत्म-साम्राज्य को जीतो। अलर्क तुरंत वन में भगवान दत्तात्रेय जी की शरण में जाते हैं और उनसे परम आत्मज्ञान प्राप्त कर विरक्त हो जाते हैं।
35 – आचारनिरूपण
भगवान दत्तात्रेय जी राजा अलर्क को मन की शुद्धि हेतु आवश्यक सदाचार, पवित्रता, यम-नियम और चित्त को स्थिर करने की व्यावहारिक योग-विधियों का उपदेश देते हैं।
36 – मदालसोपदेश समाप्ति
आत्मज्ञान प्राप्त कर अलर्क जब सहर्ष अपना राज्य सुबाहु को सौंपने आते हैं, तो सुबाहु प्रकट करते हैं कि यह युद्ध केवल उन्हें भोग-पंक से निकालकर मोक्ष-मार्ग पर लाने की एक लीला थी। दोनों भ्राता राज्य काशीराज को सौंपकर वन में तपस्या हेतु चले जाते हैं।
37 – आत्मविवेक
जड़ वेशधारी मुनिपुत्र अपने पिता को आत्मा और अनात्मा के अंतर का स्पष्ट बोध कराते हैं। वे समझाते हैं कि आत्मा न तो इंद्रियाँ हैं, न मन और न बुद्धि, बल्कि वह इन सभी वृत्तियों का नित्य द्रष्टा और साक्षी चैतन्य है।
38 – जडपितृ संवाद
पुत्र और पिता के बीच हुए इस संवाद में संसृति के मोहजाल को काटने और संसार में जल-कमलवत निर्लिप्त रहने की कला का प्रतिपादन किया गया है।
39 – योगक्रिया
चित्तवृत्ति के निरोध हेतु प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। प्राणायाम द्वारा नाड़ियों का शोधन कर परमात्मा में मन लगाने की विधि बताई गई है।
40 – योगिसिद्धि
योग साधना के मार्ग में आने वाली अणिमा, महिमा आदि विभिन्न सिद्धियों और अलौकिक शक्तियों का वर्णन करते हुए मुनिपुत्र चेतावनी देते हैं कि सिद्धियाँ मोक्ष मार्ग की बाधाएँ हैं, साधक को इनमें बिना उलझे केवल परमपद की ओर बढ़ना चाहिए।
41 – योगाचार
एक सच्चे योगी का आहार, विहार, विचार और दिनचर्या कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। योगी को समलोष्टाश्मकांचन होकर केवल परब्रह्म में ही निरंतर स्थिति रखनी चाहिए।
42 – ओंकारमाहात्म्य
परम पावन ओंकार के अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा का तात्विक रहस्य प्रकट किया गया है। ओंकार के निरंतर जप और ध्यान से जीव समस्त बंधनों से मुक्त होकर परब्रह्म में लीन हो जाता है।
43 – अरिष्टनिरूपण
शरीर त्याग के पूर्व प्रकट होने वाले शारीरिक, मानसिक और प्राकृतिक अरिष्टों का वर्णन किया गया है। इन लक्षणों को देखकर योगी अपने अंतिम समय का ज्ञान प्राप्त कर शांत चित्त से योगधारणा द्वारा प्राणों का उत्सर्ग करता है।
44 – जडपुत्रोक्तिसमंजसम्
पुत्र के अमर ज्ञानोपदेश को सुनकर पिता पूर्ण रूप से कृतार्थ होकर परमपद को प्राप्त होते हैं। चारों दिव्य पक्षी महर्षि जैमिनी से कहते हैं कि हमने आपके प्रथम चरण के प्रश्नों का यथाशक्ति उत्तर दे दिया है।
45 – ब्रह्मोत्पत्ति एवं सृष्टि
यहाँ से महर्षि मार्कंडेय और उनके शिष्य क्रोष्टुकि का संवाद प्रारंभ होता है। मार्कंडेय जी महाप्रलय के पश्चात जगत् की पुनरुत्पत्ति, प्रकृति-पुरुष के क्षोभ, महत्तत्व व अहंकार की उत्पत्ति तथा ब्रह्मा जी के हिरण्यगर्भ रूप में आविर्भाव की कथा सुनाते हैं।
46 – ब्रह्ममान एवं युगगणना
काल के सूक्ष्मतम रूप परमाणु से लेकर चारों युगों—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि—की अवधि, दिव्य वर्षों की गणना, मन्वंतर तथा ब्रह्मा जी के एक अहोरात्र का गणितीय एवं पौराणिक मान प्रस्तुत किया गया है।
47 – प्राकृतसृष्टि एवं विकारसृष्टि
ब्रह्मा जी द्वारा की गई प्रथम प्राकृत सृष्टि तथा तत्पश्चात तनमात्राओं, ज्ञानेंद्रियों, कर्मेंद्रियों और पंचमहाभूतों के क्रमबद्ध विकास का विस्तृत वर्णन किया गया है।
48 – वैकृतसृष्टि
ब्रह्मा जी द्वारा ध्यान करने पर देव, दानव, पितर, मनुष्य, तिर्यक तथा स्थावर वृक्ष-लता आदि की वैकृत सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया का निरूपण किया गया है।
49 – प्रजापतिसृष्टि
सृष्टि के विस्तार हेतु ब्रह्मा जी के मानसिक संकल्प से मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वशिष्ठ, भृगु और दक्ष नामक नौ प्रजापतियों के आविर्भाव की कथा कही गई है।
50 – रुद्रसृष्टि एवं स्वायम्भुव मन्वन्तर
ब्रह्मा जी के ललाट से भगवान रुद्र का आविर्भाव, एकादश रुद्रों की उत्पत्ति तथा प्रथम मनु स्वायंभुव मनु और शतरूपा के पवित्र उद्भव और उनकी संतानों का वर्णन है।
51 – प्रियव्रत वंश
स्वायंभुव मनु के परम प्रतापी पुत्र राजा प्रियव्रत का पुण्य चरित्र वर्णित है, जिन्होंने अपने रथ के पहियों से पृथ्वी पर सात महाद्वीपों और सात समुद्रों का विभाजन किया था।
52 – आग्नीध्र एवं नाभि
जंबू द्वीप के राजा आग्नीध्र और उनके पुत्र राजा नाभि का चरित्र वर्णित है। महाराज नाभि और रानी मेरुदेवी के निष्काम यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं उनके पुत्र रूप में ऋषभदेव बनकर अवतरित हुए।
53 – ऋषभदेव एवं भरत
भगवान ऋषभदेव के परम विरक्त अवधूत जीवन तथा उनके ज्येष्ठ पुत्र राजा भरत के न्यायप्रिय शासन का वर्णन है। राजा भरत के नाम पर ही इस पावन देश का नाम भारतवर्ष प्रसिद्ध हुआ।
54 – जम्बूद्वीपवर्णन
ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित जंबू द्वीप, उसके मध्य में विराजमान स्वर्णमयी सुमेरु पर्वत, चारों दिशाओं के द्रोण पर्वतों और केसर-पर्वतों का विहंगम भौगोलिक वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
55 – किंपुरुषादिवर्ष
सुमेरु पर्वत के आसपास स्थित किंपुरुषवर्ष, हरिवर्ष, रम्यकवर्ष आदि विभिन्न दिव्यातिदिव्य प्रदेशों और वहाँ के निवासियों की दीर्घायु व आनंदमय जीवन शैली का चित्रण है।
56 – इलावृतवर्ष
सुमेरु पर्वत को चारों ओर से घेरे हुए इलावृतवर्ष का सुंदर वर्णन है, जहाँ साक्षात भगवान शिव और देवांगनाएँ निवास करती हैं और जहाँ का वातावरण नित्य मंगलमय रहता है।
57 – भारतवर्षवर्णन
सकल कर्मभूमि भारतवर्ष की पावन महिमा का गान किया गया है। मार्कंडेय जी बताते हैं कि भारतवर्ष ही वह भूमि है जहाँ से कर्मों का फल प्राप्त होता है और मोक्ष का द्वार खुलता है। इसके सात कुलपर्वतों और गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों का उल्लेख है।
58 – कूर्मविभाग
भारतवर्ष का पौराणिक ज्योतिषीय मानचित्र प्रस्तुत करते हुए संपूर्ण देश को एक विशाल दिव्य कछुए के आकार में विभाजित किया गया है और विभिन्न प्रदेशों का नक्षत्र-संबध दिखाया गया है।
59 – द्वीप एवं पर्वत वर्णन
जंबू द्वीप के अतिरिक्त प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर नामक शेष छह महाद्वीपों, उनके पर्वतों, नदियों और वहाँ की धर्म-व्यवस्था का सुंदर निरूपण है।
60 – स्वायम्भुव मन्वन्तर समाप्ति
प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर के देवों, ऋषियों और राजवंशों के वर्णन का उपसंहार किया गया है।
61 – स्वारोचिष मन्वन्तर – ब्राह्मण कथा
द्वितीय मन्वंतर की पृष्ठभूमि में वरदा नदी के तट पर रहने वाले स्वरूप नामक वेदपाठी ब्राह्मण और वरुथिनी नामक अप्सरा का रोचक उपाख्यान वर्णित है।
62 – स्वारोचिष मन्वन्तर – स्वारोचिष जन्म
स्वरूप ब्राह्मण द्वारा वरुथिनी के प्रस्ताव को ठुकरा देने पर, कलि नामक गंधर्व ने ब्राह्मण का रूप धरकर वरुथिनी से समागम किया, जिससे परम तेजस्वी स्वारोचिश का जन्म हुआ।
63 – स्वारोचिष मन्वन्तर – स्वारोचिष पराक्रम
स्वारोचिश द्वारा मनोरमा नाम की कन्या को शापमुक्त करना, उससे पद्मिनी विद्या प्राप्त करना और अपने पराक्रम से तीनों लोकों में कीर्ति स्थापित करना वर्णित है।
64 – स्वारोचिष मन्वन्तर – अनुवृत्ति
स्वारोचिश के धर्ममय शासन, उसके द्वारा किए गए विशाल वैदिक यज्ञों और प्रजा के प्रति उसके वात्सल्य भाव का वर्णन है।
65 – स्वारोचिष मन्वन्तर – द्युतिमान जन्म
स्वारोचिश के पुत्र द्युतिमान के जन्म तथा उसके द्वारा भगवान सूर्य की कठोर तपस्या करके अतुलनीय तेज और सार्वभौम पद प्राप्त करने की कथा है।
66 – स्वारोचिष मन्वन्तर – द्युतिमान अभिषेक
द्युतिमान को द्वितीय मनु के रूप में ‘स्वारोचिश मनु’ के नाम से विभूषित किया जाता है और उनके शासन में प्रजा रोग-शोक से रहित होकर धर्म मार्ग पर चलती है।
67 – स्वारोचिष मन्वन्तर – समाप्ति
द्वितीय स्वारोचिश मन्वंतर के ऋषियों, देवताओं और मनुपुत्रों की नामावली के साथ इस मन्वंतर का उपसंहार होता है।
68 – पद्मिनी विद्या एवं निधि वर्णन
कुबेर की अष्टविध निधियों—महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद और नील—तथा पद्मिनी विद्या के प्रभाव से मानव स्वभाव में आने वाले परिवर्तनों का गूढ़ विश्लेषण है।
69 – औत्तमि मन्वन्तर
तृतीय मन्वंतर के अधिपति औत्तमि मनु के जन्म की कथा कही गई है, जो राजा उत्तम के पुत्र थे और जिन्होंने कठिन तपस्या से मनु पद प्राप्त किया।
70 – औत्तमि मन्वन्तर – अनुवृत्ति
राजा उत्तम का अपनी रानी के साथ पुनर्मिलन तथा महर्षियों के आशीर्वाद से औत्तमि मनु का आविर्भाव वर्णित है।
71 – औत्तमि मन्वन्तर – अनुवृत्ति
तीसरे मन्वंतर के भानु नामक देवगणों, वशिष्ठ आदि सप्तर्षियों और मनुपुत्रों के पावन चरित्र का वर्णन है।
72 – औत्तमि मन्वन्तर – अनुवृत्ति
औत्तमि मन्वंतर में घटित प्रमुख धार्मिक घटनाओं तथा भगवान विष्णु द्वारा धर्म की रक्षा किए जाने का आख्यान है।
73 – औत्तमि मन्वन्तर – समाप्ति
तृतीय औत्तमि मन्वंतर का विशद वर्णन पूर्ण होता है।
74 – तामस मन्वन्तर
चतुर्थ तामस मन्वंतर का वर्णन है, जिसके मनु तामस थे। इस काल के सत्य नामक देवगणों, कवियों और सप्तर्षियों का कीर्तन किया गया है।
75 – रैवत मन्वन्तर
पंचम रैवत मन्वंतर की पावन कथा है। तामस मनु के जुड़वाँ भाई रैवत के मनु बनने और उनके काल की धार्मिक व्यवस्था का निरूपण है।
76 – चाक्षुष मन्वन्तर
षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर का वर्णन है। इस मन्वंतर में महान राजा पृथु का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने पृथ्वी का दोहन कर संपूर्ण औषधियों और अन्नों को प्रकट किया।
77 – वैवस्वत मन्वन्तर
वर्तमान में चल रहे सप्तम वैवस्वत मन्वंतर का वर्णन है। सूर्यपुत्र वैवस्वत मनु, वर्तमान सप्तर्षियों (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज) तथा इंद्र का कीर्तन है।
78 – वैवस्वत सावर्णि मन्वन्तर जन्म
अष्टम मन्वंतर के भावी मनु सावर्णि मनु के जन्म का रहस्य उजागर होता है, जो सूर्यदेव और छाया के पुत्र हैं और जिन्होंने कठोर तपस्या से मनु पद पाया।
79 – सावर्णिक मन्वन्तर प्रशंसा
भावी अष्टम मन्वंतर के महात्म्य की प्रशंसा की गई है और बताया गया है कि राजा सुरथ ही देवी भगवती के वरदान से सावर्णि मनु के रूप में जन्म लेंगे।
80 – सावर्णि मन्वन्तर वर्णन
सावर्णि मन्वंतर के भावी देवताओं, ऋषियों तथा मनुपुत्रों का परिचय देते हुए पौराणिक आख्यान को श्री देवी माहात्म्य की ओर मोड़ा जाता है।
81 – देवी माहात्म्य – मधु-कैटभ वध
श्रीमद्दुर्गासप्तशती का प्रथम अध्याय आरंभ होता है। स्वराज्य से वंचित राजा सुरथ और स्वजनों द्वारा ठुकराए गए वैश्य समाधि महर्षि मेधा के आश्रम में मिलते हैं। महर्षि मेधा उन्हें महामाया के प्रभाव का बोध कराते हुए बताते हैं कि प्रलयकाल में जब मधु और कैटभ ब्रह्मा जी का वध करने उद्यत हुए, तब ब्रह्मा जी ने योगनिद्रा रूपिणी महामाया की स्तुति की, जिससे प्रेरित होकर भगवान विष्णु ने उन दैत्यों का संहार किया।
82 – देवी माहात्म्य – देवी प्रादुर्भाव एवं महिषासुर सेना वध
महिषासुर द्वारा देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार करने पर, ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित समस्त देवताओं के शरीर से एक महान तेजोपुंज प्रकट हुआ, जो भगवती महालक्ष्मी के रूप में साकार हुआ। देवताओं के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर जगदंबा ने महिषासुर के सेनापतियों चिक्षुर, चामर आदि की चतुरंगिणी सेना का संहार कर दिया।
83 – देवी माहात्म्य – महिषासुर वध
महिषासुर द्वारा धारण किए गए भैंसे, सिंह, हाथी आदि विभिन्न मायावी रूपों को छिन्न-भिन्न करते हुए भगवती चंडिका ने अपने चरण से असुर को दबाकर शूल से उसकी गर्दन पर प्रहार किया और खड्ग से उसका मस्तक काटकर तीनों लोकों को निर्भय कर दिया।
84 – देवी माहात्म्य – महिषासुरमर्दिनी देवकृत स्तुति
देवराज इंद्र और समस्त देवताओं द्वारा जगदंबा की अत्यंत भावपूर्ण ‘शक्रादयः स्तुति’ की जाती है। देवताओं की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवती अभय वरदान देती हैं कि स्मरण करते ही वे सदैव अपने भक्तों के संकटों का हरण करेंगी।
85 – देवी माहात्म्य – शुम्भ-निशुम्भ दूत संवाद
उत्तर काल में शुंभ और निशुंभ दैत्यों द्वारा त्रिलोक पर अधिकार करने पर देवताओं ने हिमालय पर जाकर ‘अपराजिता स्तुति’ की। देवी पार्वती के शरीर कोश से कौशिकी प्रकट हुईं और उनकी छवि देखकर शुंभ के दूत सुग्रीव ने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे देवी ने युद्ध में जीतने की शर्त रखकर ठुकरा दिया।
86 – देवी माहात्म्य – धूम्रलोचन वध
देवी का उत्तर सुनकर क्रुद्ध शुंभ के सेनापति धूम्रलोचन को साठ हजार सैनिकों के साथ आते देखकर, भगवती ने केवल अपने ‘हुंकार’ मात्र से धूम्रलोचन को भस्म कर दिया और उनके वाहन सिंह ने दैत्य सेना का दलन कर दिया।
87 – देवी माहात्म्य – काली द्वारा चण्ड-मुण्ड वध
चंड और मुंड को दनुज सेना के साथ आते देख भगवती अंबिका के ललाट से अत्यंत भयानक रूप वाली देवी काली प्रकट हुईं। देवी काली ने हाथियों, रथों और असुरों को चबाते हुए चंड और मुंड के सिर काटकर अंबिका जी को समर्पित किए, जिससे उनका नाम ‘चामुंडा’ प्रसिद्ध हुआ।
88 – देवी माहात्म्य – मातृकाओं एवं चामुण्डा द्वारा रक्तबीज वध
युद्ध में देवताओं की शक्तियों से ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐंद्री नामक सप्तमातृकाएँ प्रकट हुईं। रक्तबीज दैत्य के रक्त की हर बूंद से नए दैत्य उत्पन्न होते देख, चामुंडा देवी ने उसका सारा रक्त पी लिया और भगवती ने शूल से रक्तबीज का वध कर दिया।
89 – देवी माहात्म्य – निशुम्भ वध
भयंकर संग्राम में निशुंभ गदा और अस्त्र-शस्त्र लेकर देवी पर टूट पड़ा। भगवती चंडिका ने अपनी तीक्ष्ण धार वाली खड्ग और बाणों से निशुंभ के शस्त्रों को काटकर उसके वक्षस्थल को बींध दिया, जिससे निशुंभ धराशायी हो गया।
90 – देवी माहात्म्य – शुम्भ वध
अकेले पड़े शुंभ द्वारा अन्य शक्तियों के बल पर लड़ने का ताना देने पर, जगदंबा ने मुस्कुराकर समस्त मातृकाओं को अपने ही शरीर में लीन कर लिया। तदुपरांत आकाश में हुए भयंकर वाग्युद्ध और मल्ल युद्ध के पश्चात देवी ने त्रिशूल से शुंभ का वध कर दिया।
91 – देवी माहात्म्य – नारायणी स्तुति
दैत्यों के विनाश पर देवताओं द्वारा संपूर्ण जगत् की जननी भगवती की परम पावन ‘नारायणी स्तुति’ की जाती है। प्रसन्न होकर देवी अपने भावी अवतारों—विंध्यवासिनी, रक्तदंतिका, शाकंभरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी—की घोषणा करती हैं।
92 – देवी माहात्म्य – फलस्तुति एवं दिव्य वरदान
भगवती माहात्म्य पाठ की अक्षय महिमा का वर्णन करती हैं। वे प्रतिज्ञा करती हैं कि जो भी मनुष्य नवरात्रि या अन्य समय में इस माहात्म्य का भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, उसके घर में महालक्ष्मी का स्थायी वास होगा और समस्त महामारियों व विघ्नों का नाश हो जाएगा।
93 – देवी माहात्म्य – सुरथ एवं समाधि वर लाभ
महर्षि मेधा द्वारा कथा पूर्ण करने पर, राजा सुरथ और वैश्य समाधि नदी के तट पर देवी की मृण्मयी मूर्ति बनाकर तीन वर्षों तक कठिन तपस्या करते हैं। भगवती प्रकट होकर राजा सुरथ को अखंड राज्य तथा अगले जन्म में सावर्णि मनु बनने का वर देती हैं, और वैश्य समाधि को परम मोक्षप्रद तत्वज्ञान प्रदान करती हैं।
94 – रौच्य एवं भौत्य मन्वन्तर विवरण
देवी माहात्म्य के उपरांत मार्कंडेय जी नवम रौच्य और दशम भौत्य मन्वंतरों के ऋषियों, देवगणों तथा मनुपुत्रों की संक्षिप्त कथा सुनाते हैं।
95 – रुचि चरित्र
प्रजापति रुचि के निवृत्तिमार्ग में रहने पर उनके पितर प्रकट होकर उन्हें गृहस्थ आश्रम स्वीकार करने तथा विवाह कर पित्र्य-ऋण से मुक्त होने की शिक्षा देते हैं।
96 – रुचि पितृ स्तुति
प्रजापति रुचि द्वारा पितरों को प्रसन्न करने के लिए की गई अत्यंत दिव्य एवं स्तुत्य ‘पितृ स्तुति’ का सुंदर निरूपण है।
97 – पितृ वर प्रदान
रुचि की स्तुति से प्रसन्न होकर पितर प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं और उन्हें एक सुयोग्य अप्सरा-कन्या से विवाह तथा चक्रवर्ती मनु पुत्र प्राप्त होने का वरदान देते हैं।
98 – रौच्य मन्वन्तर जन्म
प्रजापति रुचि का मालिनी से विवाह और नवम मनु ‘रौच्य मनु’ का आविर्भाव तथा उनके काल की समृद्धि का वर्णन है।
99 – अग्नि स्तुति
मुनि अंगिरा द्वारा भगवान अग्निदेव की स्तुति कर दशम मनु ‘भौत्य मनु’ को पुत्र रूप में प्राप्त करने की कथा वर्णित है।
100 – चतुर्दश मन्वन्तर समाप्ति
ग्यारहवें से चौदहवें भावी मन्वंतरों का संक्षिप्त निरूपण करते हुए संपूर्ण चौदह मन्वंतरों के कालचक्र का उपसंहार किया जाता है।
101 – वंश कीर्तन
सकल पापनाशक सूर्यवंश की पावन वंशावली का प्रारंभ होता है। महर्षि मार्कंडेय सूर्यवंश के राजाओं की नामावली और उनकी महिमा का गान करते हैं।
102 – सूर्य माहात्म्य
सकल जगत् के चक्षु, प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की अनन्य महिमा, उनके स्वरूप और तीनों कालों में उनकी आराधना के फल का वर्णन है।
103 – ब्रह्माकृत सूर्य स्तुति
सृष्टि के प्रारंभ में घोर अंधकार को नष्ट करने के लिए स्वयं पितामह ब्रह्मा जी द्वारा की गई भगवान सूर्य की परम पावन स्तुति का निरूपण है।
104 – सूर्य प्रभाव
भगवान सूर्य द्वारा अपनी सहस्र किरणों से जल का आकर्षण कर वृष्टि के रूप में संपूर्ण ओषधियों और प्राणियों का पोषण करने की प्राकृतिक प्रक्रिया का वर्णन है।
105 – मार्तण्डोत्पत्ति
महर्षि कश्यप और माता अदिति के यहाँ भगवान सूर्य के ‘मार्तंड’ रूप में अवतरित होने की परम पावन कथा है, जिससे देवों को उनका अधिकार पुनः प्राप्त हुआ।
106 – त्वष्टा द्वारा सूर्यतेज संहरण
सूर्यदेव की पत्नी संज्ञा द्वारा उनके अतिशय तेज को सहन न कर पाने पर, उनके पिता त्वष्टा (विश्वकर्मा) द्वारा सूर्यदेव के तेज को छीलकर कम करने का अद्भुत प्रसंग है।
107 – विश्वकर्माकृत सूर्य स्तुति
विश्वकर्मा द्वारा भगवान सूर्यदेव की स्तुति की जाती है और छिले हुए सूर्यतेज से भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु जी का सुदर्शन चक्र तथा कार्तिकेय की शक्ति आदि अमोघ दिव्यास्त्रों का निर्माण किया जाता है।
108 – सूर्य अनुभव
सूर्यदेव का वडवा (घोड़ी) रूप धरिणी संज्ञा से मिलन और अश्विनी कुमारों तथा रेवंत जी के प्रादुर्भाव की सुंदर लीला वर्णित है।
109 – सत्यादिति स्तुति
माता अदिति द्वारा अपने पुत्रों की रक्षा हेतु की गई सूर्य स्तुति और दैत्यों पर देवताओं की विजय गाथा है।
110 – सूर्य वंश कथा समाप्ति
भगवान सूर्यदेव की प्रधान उपासना का उपसंहार और सूर्यवंशी राजाओं के पावन चरित्र का मार्ग प्रशस्त होता है।
111 – वंशानुक्रमणिका
वैवस्वत मनु के पुत्रों—इक्ष्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यंत, नाभाग आदि से चले वंशों का क्रमबद्ध परिचय दिया गया है।
112 – पूषध्र चरित्र
मनु पुत्र पूषध्र द्वारा अनजाने में रात के अंधेरे में गौ-वध हो जाने पर गुरु शाप से शूद्रत्व प्राप्ति और पश्चात कठिन तप से परमपद पाने की कथा है।
113 – नाभाग चरित्र
नाभाग का अपने भाइयों द्वारा राज्य से वंचित किए जाने पर, अंगिरा ऋषियों के यज्ञ में सहयोग कर अपार धन प्राप्त करने और धर्मपूर्वक राज्य करने का वृत्तांत है।
114 – नाभाग चरित्र – अनुवृत्ति
राजा नाभाग की सत्यनिष्ठा, उनके द्वारा किए गए महान यज्ञों और प्रजा-रंजन का विस्तृत चित्रण है।
115 – नाभाग चरित्र – समाप्ति
राजा नाभाग अपने महाप्रतापी पुत्र अमरीष को राज्य सौंपकर वन में जाकर भगवद्ध्यान में लीन हो परमपद प्राप्त करते हैं।
116 – भणन्द एवं वत्सप्री चरित्र
राजा भणंद के पुत्र वत्सप्री द्वारा कुजंभ नामक दानव का वध कर राजकुमारी सुनांदा का उद्धार करने और धर्मराज्य स्थापित करने की गाथा है।
117 – खनित्र चरित्र
परम दयालु राजा खनित्र का चरित्र वर्णित है। जब उनके मंत्रियों ने कपट-अभिचार किया, तो अभिचार-विद्या ने राजा के बदले उन कपटियों का ही नाश कर दिया, जिससे दुखी होकर राजा ने संन्यास ले लिया।
118 – खनित्र चरित्र – समाप्ति
राजा खनित्र वन में कठोर तपस्या करके सब प्रकार की आसक्तियों से मुक्त हो ब्रह्मलीन हो जाते हैं।
119 – विविंश चरित्र
राजा खनित्र के पुत्र विविंश का अतुलनीय शौर्य और उनके राज्य में प्रजा की अपार सुख-समृद्धि का वर्णन है।
120 – खनीनेत्र चरित्र
राजा खनीनेत्र द्वारा पुत्रहीन होने पर कठोर तपस्या और अश्वमेध यज्ञ द्वारा करंधम नामक पराक्रमी पुत्र प्राप्त करने का वृत्तांत है।
121 – करन्धम चरित्र
राजा करंधम के अद्भुत बल का वर्णन है, जिन्होंने केवल अपनी तालियों की ध्वनि से सेना उत्पन्न कर शत्रु राजाओं के घेरे को छिन्न-भिन्न कर दिया था।
122 – अवीक्षित चरित्र
करंधम के पुत्र अवीक्षित के जन्म, उनकी शस्त्र-शास्त्र विद्या में निपुणता और उनके महान पराक्रम की गाथा है।
123 – अवीक्षित चरित्र – अनुवृत्ति
राजकुमार अवीक्षित द्वारा राजकुमारी विशालिनी के स्वयंवर में अनेक राजाओं को अकेले ही पराजित कर राजकुमारी को प्राप्त करने का रोमांचक प्रसंग है।
124 – अवीक्षित चरित्र – अनुवृत्ति
पराजित राजाओं द्वारा छल से अवीक्षित को बंदी बनाए जाने पर, उनके पिता करंधम द्वारा सेना लेकर शत्रुओं को परास्त कर पुत्र को छुड़ाने का वर्णन है।
125 – अवीक्षित चरित्र – अनुवृत्ति
बंदी बनने के अपमान से दुखी होकर अवीक्षित द्वारा राज्य-ग्रहण न करने और विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा लेने का प्रसंग है।
126 – अवीक्षित चरित्र – अनुवृत्ति
राजकुमारी विशालिनी का अवीक्षित के प्रति अनन्य प्रेम और उसकी तपस्या, तथा अवीक्षित की माता वीरा द्वारा पुत्रकामेष्टि व्रत करने का वर्णन है।
127 – अवीक्षित चरित्र – समाप्ति
महर्षियों के हस्तक्षेप से अवीक्षित और विशालिनी का पाणिग्रहण होता है और उनके यहाँ चक्रवर्ती राजा मरुत्त का प्रादुर्भाव होता है।
128 – मरुत्त चरित्र
महाराज मरुत्त के असाधारण जन्म, उनकी बाल्यकाल की असीम प्रतिभा और उनके चक्रवर्ती सम्राट बनने की पावन कथा है।
129 – मरुत्त चरित्र – अनुवृत्ति
राजा मरुत्त द्वारा नागों के उपद्रव से ऋषियों के आश्रमों की रक्षा करने हेतु नागलोक पर आक्रमण और नागों को परास्त करने का वर्णन है।
130 – मरुत्त यज्ञ
महाराज मरुत्त द्वारा किए गए उस ऐतिहासिक विशाल यज्ञ का वर्णन है, जिसमें समवर्त मुनि पुरोहित थे और जहाँ समस्त बर्तन शुद्ध स्वर्ण के थे तथा देवताओं ने स्वयं उपस्थित होकर यज्ञभाग स्वीकार किया था।
131 – मरुत्त चरित्र – समाप्ति
अतुलनीय यश प्राप्त कर महाराज मरुत्त अपने पुत्र नरिष्यंत को राज्य सौंपकर वन में तपस्या हेतु गमन करते हैं।
132 – नरिष्यन्त चरित्र
राजा नरिष्यंत का उदारतापूर्ण शासन, जिसमें उन्होंने यज्ञों में ब्राह्मणों को इतना स्वर्ण दान दिया कि संपूर्ण प्रजा धनवान हो गई।
133 – दम चरित्र
राजा नरिष्यंत के पुत्र दम के जन्म, उनकी धनुर्विद्या में प्रवीणता और उनके तेजस्वी चरित्र का निरूपण है।
134 – दम चरित्र – अनुवृत्ति
राजकुमार दम द्वारा दशार्ण देश की राजकुमारी सुमना के स्वयंवर में वपुष्मान नामक राजा को हराकर राजकुमारी से विवाह करने का वर्णन है।
135 – दम चरित्र – अनुवृत्ति
दुष्ट राजा वपुष्मान द्वारा वन में निशस्त्र एवं शांत बैठे वृद्ध राजा नरिष्यंत का छल से अधर्मपूर्वक वध करने की दुखद घटना है।
136 – दम द्वारा वपुष्मान वध
पिता के वध का समाचार सुनकर राजा दम द्वारा प्रतिज्ञाबद्ध होकर वपुष्मान पर आक्रमण करना, युद्ध में उसका संहार कर पिता का पितृ-तर्पण करना और क्षात्रधर्म की पुनर्स्थापना करना वर्णित है।
137 – पुराण समाप्ति एवं फलश्रुति
दिव्य पक्षियों द्वारा महर्षि जैमिनी के समस्त प्रश्नों का पूर्ण समाधान कर कथा को विराम देना तथा महर्षि मार्कंडेय द्वारा शिष्य क्रोष्टुकि को आशीर्वाद देना वर्णित है। इस सर्वपापहर, आयु, आरोग्य, धन व मोक्षप्रद श्रीमार्कंडेय महापुराण के अध्ययन एवं श्रवण की परम पावन फलश्रुति के साथ पुराण की पूर्ण पूर्णाहुति होती है।