Read Liṅga Purāṇa in Hindi

श्री लिंग पुराण सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में अत्यंत दिव्य, पावन और अलौकिक स्थान रखता है, जिसमें भगवान् परमेश्वर शिव के लिंग रूप तथा उनके सच्चिदानंद स्वरूप की महत्ता का विशद वर्णन किया गया है। यह महापुराण कुल मिलाकर ग्यारह सहस्र श्लोकों से सुशोभित है तथा दो विशाल भागों में विभक्त है—पूर्वार्ध और उत्तरार्ध। इसके पूर्वाध भाग में कुल एक सौ आठ अध्याय सम्मिलित हैं, जो सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, काल-गणना, भगवान् शिव के पंचमुखों की महिमा, लिंगोद्भव की पावन कथा, पाशुपत व्रत, योग के विविध अंगों, भुवन-कोश तथा सूर्य-चंद्र वंशों की पवित्र वंशावलियों का अति सूक्ष्म एवं भक्तिमय वर्णन प्रस्तुत करते हैं। नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में कुलपति शौनक आदि महर्षियों द्वारा आयोजित एक सहस्र वर्षों के महान् सत्र-याग के अवसर पर सूत जी ने व्यास देव के अनुग्रह से प्राप्त इस परम रहस्यमयी कथा का श्रवण कराया था। पूर्वाध के प्रत्येक अध्याय में भगवान् आशुतोष के कल्याणकारी चरित्रों, उनकी लीलाओं तथा भक्ति मार्ग के गूढ़ रहस्यों का ऐसा अनुपम प्रवाह है जो साधक के मन से अज्ञान के अंधकार को मिटाकर उसे परम पद की ओर ले जाता है।

लिंग पुराण के पूर्वाध का सर्वप्रमुख एवं केंद्रीय विषय परमब्रह्म परमेश्वर शिव की सर्वोच्च सत्ता, उनके सर्वव्यापक निराकार स्वरूप तथा सर्वकल्याणकारी साकार लिंग रूप की महिमा का गान करना है। इस पुराण में लिंग को केवल एक बाह्य प्रतीक न मानकर संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का परम आधार माना गया है, जिसमें प्रकृति और पुरुष की अविभाज्य एकता समाहित है। इसके साथ ही पाशुपत योग, अष्टांग योग तथा भस्म-धारण की महिमा का विशद व्याख्यान किया गया है जो जीव को अज्ञानरूपी पाश से मुक्त कर शिवत्व प्रदान करता है। पुराण में श्री हरि विष्णु, ब्रह्मा जी और भगवान् रुद्र के अभेद स्वरूप को बारंबार रेखांकित किया गया है, जिससे यह सिद्ध होता है कि संपूर्ण सृष्टि के मूल में एक ही सर्वव्यापी परमेश्वर शिव क्रियाशील हैं। इसके अतिरिक्त कालचक्र, चार युगों के धर्म, तीर्थों की महिमा, शिव-सहस्रनाम, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस, कामदेव का दहन, उमा-महेश्वर का दिव्य विवाह तथा श्वेत और उपमन्यु जैसे अनन्य भक्तों के उद्धार की परम पावन ऐतिहासिक कथाएँ इस पुराण के प्रधान विषय हैं। यह पावन ग्रंथ केवल आख्यान मात्र नहीं अपितु भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सदाचार का एक अमर स्रोत है जो प्रत्येक मुमुक्षु प्राणी को जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति कराने में पूर्ण समर्थ है।

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सरल वचन

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पूर्वार्थ – हर अध्याय का विवरण
1 – उपोद्धात

पावन नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में जब ऋषियों ने सहस्र वर्षों के महान् सत्र-याग का अनुष्ठान किया, तब वहाँ जगद्गुरु भगवान् शिव की आराधना करके लौटे देवर्षि नारद का आगमन हुआ। देवर्षि के आगमन पर सूत रोमहर्षण ने महर्षियों के समक्ष परम पावन लिंग पुराण का प्रारंभ करते हुए सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा, पालनकर्ता विष्णु तथा संहारकर्ता रुद्र के रूप में विभूषित सर्वव्यापी परमेश्वर शिव के चरणों में बारंबार साष्टांग प्रणाम किया।

2 – अनुक्रमणिका

इस अध्याय में सूत जी ने लिंग पुराण के दोनों भागों में वर्णित समस्त विषयों तथा अध्यायों की विस्तृत सूची प्रस्तुत की है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, भगवान् शिव के स्वरूपों, लिंगोद्भव की महिमा, पाशुपत योग, सूर्य एवं चंद्र वंशों की पवित्र वंशावलियों तथा भगवान् शिव की विविध कल्याणकारी लीलाओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है जो मुमुक्षु जीवों के उद्धार का सुगम मार्ग प्रशस्त करता है।

3 – सर्ग

इस अध्याय में जगत् की मूल उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया गया है कि सृष्टि से पूर्व केवल गुणरहित, निराकार, अव्यक्त परमब्रह्म परमेश्वर शिव ही विद्यमान थे। जब परमेश्वर की ईक्षण शक्ति सक्रिय हुई, तब अव्यक्त प्रकृति और पुरुष के संयोग से महत्तत्त्व, अहंकार, पंच-तन्मात्राएँ तथा पंच-महाभूत उत्पन्न हुए और अंततः ब्रह्मा जी का आविर्भाव करने वाला दिव्य हिरण्यगर्भ अंड निर्मित हुआ।

4 – सर्ग-प्रारंभ

हिरण्यगर्भ के भीतर प्रकट होकर जब ब्रह्मा जी ने चारों ओर अंधकार देखा, तब उन्होंने परमेश्वर शिव का ध्यान करते हुए घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी की निश्चल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् आशुतोष ने उन्हें दिव्य ज्ञान और दृष्टि प्रदान की, जिसके बल पर ब्रह्मा जी ने समस्त लोकों, देवों, पितरों तथा प्राणियों की सृष्टि का कार्य सफलतापूर्वक प्रारंभ किया।

5 – सृष्टि-वर्णन

इस अध्याय में ब्रह्मा जी द्वारा की गई मानस सृष्टि का विशद वर्णन है, जिसमें सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार जैसे निष्काम ऋषियों के साथ-साथ मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, भृगु तथा दक्ष जैसे महान् प्रजापतियों का आविर्भाव हुआ। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी ने देवों, असुरों, मनुष्यों तथा स्थावर-जंगम प्राणियों के निवास और दायित्वों का निर्धारण किया।

6 – शिव-महिमा

सूत जी भगवान् महेश्वर के अलौकिक तथा सर्वव्यापी स्वरूप का गान करते हुए बताते हैं कि वे ही इस चराचर जगत् के एकमात्र स्वामी और अंतर्यामी आत्मा हैं। भगवान् शिव अपने अष्टमूर्ति स्वरूप—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा तथा यजमान—के माध्यम से संपूर्ण ब्रह्मांड का पोषण एवं संचालन करते हैं और निष्काम भक्तों पर सहज ही कृपा बरसाते हैं।

7 – लिंग-तत्त्व

इस अध्याय में लिंग तत्त्व के सूक्ष्म एवं दार्शनिक रहस्य का उद्घाटन किया गया है, जहाँ अलिङ्ग अर्थात निराकार शिव को परम तत्त्व और लिङ्ग अर्थात व्यक्त प्रकृति को उनका दिव्य प्रतीक बताया गया है। भगवान् शिव और उनकी पराशक्ति उमा की यह अविभाज्य एकता ही संपूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का परम कारण है।

8 – योग-विभाग

अष्टांग योग के पावन मार्ग का निरूपण करते हुए इस अध्याय में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि का विस्तृत लक्षण प्रस्तुत किया गया है। साधक किस प्रकार बाह्य विषयों से चित्त को हटाकर भगवान् शिव के चरण कमलों में लीन होकर परम पद की प्राप्ति कर सकता है, इसका बहुत ही सुगम विधान यहाँ वर्णित है।

9 – योग-विघ्न

साधना के कठिन मार्ग पर उपस्थित होने वाले शारीरिक रोगों, मानसिक चंचलता, आलस्य, संशय तथा सिद्धियों के प्रलोभन रूपी योग-विघ्नों का निरूपण यहाँ किया गया है। सूत जी बताते हैं कि भगवान् परमेश्वर शिव के नाम-जप, ध्यान तथा अनन्य शरणागति के द्वारा ही साधक इन समस्त विघ्नों को परास्त कर सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

10 – प्रत्यक्ष-सिद्धि

उत्कृष्ट योग साधना के माध्यम से जब साधक का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है, तब उसे भूत, भविष्य और वर्तमान का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होने लगता है। इस अध्याय में योगियों द्वारा प्राप्त दिव्य शक्तियों और सिद्धियों का वर्णन करते हुए चेतावनी दी गई है कि साधक को सिद्धियों में न उलझकर केवल परमेश्वर शिव के परम पद को ही अपना अंतिम लक्ष्य बनाना चाहिए।

11 – सद्योजात-महिमा

भगवान् शिव के पंचमुखों में प्रथम पश्चिमी मुख सद्योजात की महिमा का गान करते हुए बताया गया है कि वे श्वेत वर्ण वाले, कल्याणकारी तथा सृष्टि-कार्य के अधिष्ठाता हैं। श्वेत कल्प में ब्रह्मा जी के ज्ञान-वर्धन हेतु भगवान् सद्योजात ने दिव्य रूप में प्रकट होकर उन्हें परम विद्या और सृष्टि-निर्माण की शक्ति प्रदान की थी।

12 – वामदेव-महिमा

भगवान् महेश्वर के उत्तरी मुख वामदेव का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे रक्त वर्ण वाले, रक्षण-शक्ति के पुंज तथा अत्यंत सौम्य हैं। रक्त कल्प में प्रकट होकर वामदेव जी ने ब्रह्मा जी को भक्ति मार्ग, ज्ञान तथा ध्यान की गूढ़ विधियों का उपदेश देकर समस्त लोकों का कल्याण किया था।

13 – तत्पुरुष-महिमा

भगवान् शिव के पूर्वी मुख तत्पुरुष की अलौकिक महिमा का निरूपण करते हुए उन्हें पीत वर्ण वाला और तिरोभाव शक्ति का प्रतीक बताया गया है। पीत कल्प में तत्पुरुष भगवान् ने महर्षियों को वेदों के गूढ़ तत्त्व का बोध कराया और अपनी अनन्य भक्ति का मार्ग उजागर किया।

14 – अघोर-उत्पत्ति

भगवान् शिव के दक्षिणी मुख अघोर के प्राकट्य की कथा बताते हुए उनके कृष्ण वर्ण तथा भयंकर रूप का वर्णन किया गया है। कृष्ण कल्प में अघोर रुद्र ने अज्ञान, अधर्म तथा आसुरी शक्तियों का संहार करके धर्म और ऋषियों की रक्षा की तथा अपनी उग्रता में भी परम कल्याणकारी स्वभाव प्रकट किया।

15 – अघोरेश-महिमा

इस अध्याय में अघोर रुद्र की उपासना और ध्यान का विस्तृत फल बतलाया गया है। जो साधक निष्काम भाव से भगवान् अघोरेश के चरणों में आत्मसमर्पण करता है, वह समस्त भयंकर पापों, दुःखों और जन्म-मरण के बंधन से छूटकर भगवान् शिव के परम धाम को प्राप्त करता है।

16 – ईशान-महिमा

भगवान् महेश्वर के पाँचवें तथा ऊर्ध्व मुख ईशान का वर्णन करते हुए उन्हें स्फटिक के समान निर्मल, सर्वव्यापी तथा अनुग्रह शक्ति का अधिपति बताया गया है। ईशान रूप ही समस्त विद्याओं, वेदों तथा कलाओं का मूल स्रोत है, जिसकी अनुकंपा से ही साधक को अंतिम मोक्ष प्राप्त होता है।

17 – लिंगोत्पत्ति

जब एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी के मध्य अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया, तब उनके मध्य एक अनंत, ज्योतिर्मय लिंग स्तंभ प्रकट हुआ। ब्रह्मा जी ऊपर और विष्णु जी नीचे की ओर उस अग्नि-स्तंभ का अंत खोजने चले किंतु सहस्रों वर्षों तक प्रयास करने पर भी उसका अंत न पा सके, जिसके पश्चात् दोनों ने नतमस्तक होकर भगवान् शिव की स्तुति की।

18 – विष्णु कृत शिव-स्तुति

अनंत ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर भावविभोर हुए भगवान् श्री हरि विष्णु ने परमेश्वर शिव की परम पावन स्तुति की। श्री हरि ने भगवान् आशुतोष को संपूर्ण ब्रह्मांड का मूल कारण, सर्वव्यापी तथा त्रिदेवों का जनयिता स्वीकार करते हुए उनके चरणों में अनन्य भक्ति की याचना की।

19 – विष्णु-बोध

भगवान् श्री हरि विष्णु की निष्काम स्तुति से अत्यंत प्रसन्न होकर परमेश्वर शिव लिंग स्तंभ से प्रकट हुए और उन्हें दिव्य ज्ञान तथा सुदर्शन चक्र प्रदान किया। महेश्वर ने घोषित किया कि विष्णु मेरे ही हृदय हैं और जो विष्णु से द्वेष करता है वह कभी मेरी कृपा प्राप्त नहीं कर सकता।

20 – ब्रह्मा-बोध

विष्णु जी के पश्चात् ब्रह्मा जी ने भी अपना अहंकार त्याग कर परमेश्वर शिव के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण किया। आशुतोष भगवान् ने ब्रह्मा जी के अपराध को क्षमा करते हुए उन्हें पुनः सृष्टि-निर्माण का ज्ञान तथा वेदों की दिव्य शक्ति प्रदान की।

21 – प्रभु-स्तुति

लिंगोद्भव के पश्चात् ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा समस्त देवों और ऋषियों ने मिलकर परमेश्वर शिव की महास्तुति की। संपूर्ण देव-मंडली ने जय-जयकार करते हुए जगद्गुरु महेश्वर को सर्व-रक्षक और परम मुक्तिदाता के रूप में नमन किया।

22 – रुद्र-सृष्टि

जब ब्रह्मा जी द्वारा रची गई मानस सृष्टि का विस्तार नहीं हो सका, तब उन्होंने अत्यंत घोर तप किया, जिससे उनके ललाट से नीललोहित रुद्र प्रकट हुए। उन रुद्र देव से ग्यारह एकादश रुद्र तथा असंख्य उग्र रूप उत्पन्न हुए जिन्होंने ब्रह्मांड की रक्षा का भार संभाला।

23 – कल्प-वर्णन

सूत जी कालचक्र के विविध कल्पों जैसे श्वेत, रक्त, पीत, कृष्ण तथा विश्वरूप कल्पों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करते हैं। प्रत्येक कल्प में भगवान् शिव किस प्रकार भिन्न-भिन्न रूपों और अवतारों में प्रकट होकर जगत् का कल्याण करते हैं, इसका दिव्य वर्णन यहाँ है।

24 – शिव-अवतार

वैवस्वत मन्वंतर के प्रत्येक कलि युग में धर्म की पुनर्स्थापना हेतु प्रकट होने वाले भगवान् शिव के चौबीस अवतारों जैसे श्वेत, सुतार, दमन, सुहोत्र तथा लकुलीश आदि का विवरण दिया गया है, जो अपने चार शिष्यों के साथ पाशुपत ज्ञान का प्रचार करते हैं।

25 – आचमन-स्नान विधि

शिव-पूजन से पूर्व शरीर और अंतःकरण की शुद्धि हेतु आचमन, मार्जन तथा स्नान की वैदिक विधियों का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। पावन नदियों के जल में मंत्रोच्चारपूर्वक स्नान करने से साधक के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप विनष्ट हो जाते हैं।

26 – भस्म-स्नान विधि

इस अध्याय में भस्म-स्नान अर्थात आग्नेय स्नान का विशेष महात्म्य बतलाया गया है। शिव-अग्नि से उत्पन्न पवित्र भस्म को मंत्रों के साथ संपूर्ण शरीर पर धारण करने से साधक परम पवित्र होकर शिव-पूजन का पूर्ण अधिकारी बनता है।

27 – लिंग-पूजन विधि

भगवान् शिव के पार्थिव अथवा प्राकृतिक लिंग पर जल, दुग्ध, बिल्वपत्र, गंध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य अर्पित करने की प्रामाणिक विधि बतलाई गई है। श्रद्धापूर्वक किया गया लिंग-पूजन साधक को समस्त लौकिक सुख तथा अंत में मोक्ष प्रदान करता है।

28 – मानस-पूजा

बाह्य सामाग्रियों के बिना अपने अंतःकरण के हृदय-कमल में परमेश्वर शिव की मानसिक उपासना करने की सर्वोच्च विधि यहाँ वर्णित है। अहिंसा, सत्य, दया, क्षमा और ज्ञान रूपी पुष्पों से की गई मानस-पूजा भगवान् आशुतोष को सर्वाधिक प्रिय है।

29 – मृत्युंजय-विद्या

काल के भय को हरने वाली परम पावन मृत्युंजय विद्या तथा उनके महामंत्र की महिमा का गान यहाँ किया गया है। जो साधक मृत्युंजय रूप में भगवान् शिव का ध्यान करता है, वह अकाल मृत्यु, महारोगों तथा यम-भय से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

30 – श्वेत-उद्धार

परम शिव-भक्त श्वेत ऋषि की पावन कथा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि जब यमराज उनके प्राण लेने आए, तब शिवलिंग से स्वयं महेश्वर प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज को दंडित कर अपने भक्त श्वेत को अमरत्व तथा परम पद प्रदान किया।

31 – शिव-स्तोत्र

समस्त देवताओं और महर्षियों द्वारा रचित परम पावन शिव-स्तोत्र का यहाँ निरूपण है। इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से साधक के अंतःकरण से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और उसमें शिव-भक्ति का दीपक प्रज्वलित होता है।

32 – प्रभु-स्तोत्र

त्रिपुरांतक, विषपायी, उमापति भगवान् शिव की महिमा में गाए गए एक और अलौकिक स्तोत्र का वर्णन यहाँ है, जो संसार के त्रितापों से दग्ध जीवों को परम शांति और आश्रय प्रदान करता है।

33 – ऋषि-वाक्य

नैमिषारण्य के ऋषियों द्वारा सूत जी के प्रति परम कृतज्ञता व्यक्त करते हुए शिव-कथा की महिमा का गान किया गया है। ऋषियों ने स्वीकार किया कि दुर्लभ मानव जन्म में शिव-तत्त्व का श्रवण ही एकमात्र परम लाभ है।

34 – योगी-प्रशंसा

भगवान् शिव के ध्यान में सदैव मग्न रहने वाले निष्काम शिव-योगी की अलौकिक महिमा का वर्णन किया गया है। ऐसा योगी स्वयं एक जंगम तीर्थ के समान होता है जिसके स्पर्श और दर्शन मात्र से संपूर्ण जगत् पवित्र हो जाता है।

35 – क्षुप-पराजया

विष्णु-भक्त राजा क्षुप और शिव-भक्त महर्षि दधीचि के मध्य हुए विवाद की ऐतिहासिक कथा का वर्णन यहाँ है। जब राजा क्षुप ने राजशक्ति का अहंकार किया, तब महर्षि दधीचि ने अपनी तपोबल और शिव-कृपा से उन्हें परास्त कर शिव-भक्ति की सर्वोच्चता सिद्ध की।

36 – क्षुप-दधीचि संवाद

राजा क्षुप और महर्षि दधीचि के मध्य ब्रह्मबल और क्षात्रबल पर हुए विचार-विमर्श का विशद वर्णन है। अंततः भगवान् विष्णु और शिव की प्रेरणा से राजा क्षुप ने अपनी भूल स्वीकार की और महर्षि दधीचि के चरणों में प्रणाम किया।

37 – ब्रह्मा-वरदान

सृष्टि-कार्य में आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु ब्रह्मा जी द्वारा किए गए कठिन तप से प्रसन्न होकर भगवान् महेश्वर ने उन्हें दिव्य वरदान और अखंड सृष्टि-रचना की शक्ति प्रदान की।

38 – ब्रह्मा-उत्पत्ति

प्रत्येक कल्प के प्रारंभ में परमेश्वर शिव द्वारा अपने वामांग अथवा दिव्य संकल्प से ब्रह्मा जी को पुनः प्रकट करने तथा उन्हें वेदों का ज्ञान सौंपने का सूक्ष्म आध्यात्मिक विवेचन यहाँ प्रस्तुत है।

39 – युग-धर्म

सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलि युग के क्रमिक ह्रास तथा उनके विशिष्ट धर्मों का वर्णन किया गया है। कलि युग में जहाँ तप और याग कठिन हैं, वहीं केवल शिव-नाम-संकीर्तन और सरलता से ही परम गति प्राप्त हो जाती है।

40 – युग-परिमाण

मानवी वर्ष, दिव्य वर्ष, चार युग, मन्वंतर तथा ब्रह्मा जी के एक दिन अर्थात कल्प की सूक्ष्म गणितीय काल-गणना का प्रामाणिक विवरण इस अध्याय में दिया गया है।

41 – ब्रह्मा-जन्म

भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति तथा कमल-नाल में भटकने के पश्चात् शिव-कृपा से उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप और कर्तव्य का बोध होने की कथा बतलाई गई है।

42 – नंदीश्वर-उत्पत्ति

परम ज्ञानी ऋषि शिलाद द्वारा अयोनिज और अमर पुत्र प्राप्ति हेतु किए गए घोर तप से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् शिव का उनके पुत्र नंदी के रूप में यज्ञवेदी से प्रकट होने का अत्यंत भावपूर्ण वृत्तांत यहाँ है।

43 – नंदीश्वर-अभिषेक

बालक नंदी की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव और माता पार्वती ने समस्त गणों, देवों और ऋषियों की उपस्थिति में उनका गणपति तथा द्वारपाल के रूप में महा-अभिषेक किया।

44 – नंदीश्वर-वरदान

भगवान् आशुतोष ने नंदीश्वर को अजर-अमरत्व, अणिमादि सिद्धियाँ तथा कैलाश धाम की सर्वोच्च संरक्षा का अधिकार प्रदान किया, जिससे वे समस्त शिव-भक्तों के मार्गदर्शक बने।

45 – पाताल-लोक वर्णन

अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल तथा पाताल इन सात अधो-लोकों की अद्भुत रचना, वहाँ के भवनों, नागों तथा दैत्यों के निवास का रोचक भौगोलिक वर्णन यहाँ है।

46 – द्वीप-वर्णन

जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्कर इन सात प्रमुख महाद्वीपों और उन्हें घेरने वाले सात समुद्रों की दिव्य व्यवस्था का विवरण दिया गया है।

47 – भारतवर्ष-महिमा

कर्मभूमि भारतवर्ष की अलौकिक महिमा का गान करते हुए बताया गया है कि यही वह पावन भूमि है जहाँ मनुष्य शुभ कर्म और शिव-उपासना करके स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

48 – मेरु-पर्वत

जम्बूद्वीप के केंद्र में स्थित सुवर्णमयी सुमेरु पर्वत की विशालता, उसकी चोटियों तथा उस पर स्थित ब्रह्मा, विष्णु, शिव और लोकपालों के दिव्य नगरों का मनोहारी वर्णन है।

49 – इलावृत-वर्ष

सुमेरु के मध्य स्थित इलावृत वर्ष का सुंदर वर्णन जहाँ स्वयं भगवान् शिव माता पार्वती और अपनी अनुचरियों के साथ दिव्य आनंद में सदैव निवास करते हैं।

50 – देव-लोक वर्णन

मेघों, नक्षत्रों, देवों तथा गंधर्वों के निवास स्थानों का विस्तृत भौगोलिक और खगोलीय विवरण इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है।

51 – विविध महाद्वीप

रम्यक, हिरण्मय, उत्तरकुरु, भद्राश्व तथा केतुमाल आदि अन्य पवित्र द्वीपों की जलवायु, निवासियों की आयु तथा उनके जीवन-शैली का वर्णन यहाँ है।

52 – भुवन-कोश

संपूर्ण पार्थिव और दिव्य ब्रह्मांड की सीमाओं, उसके विस्तार तथा शिव-इच्छा से संचालित होने वाली उसकी सूक्ष्म संरचना का व्यापक विवेचन है।

53 – भुवन-कोश निरंतरता

लोकालोक पर्वत, अंधकार की सीमा तथा ब्रह्मांड-कटाह के परिमाण का सूक्ष्म निरूपण जो जगत् की अनौपम रचना को उजागर करता है।

54 – ज्योतिश्चक्र

ध्रुव तारा को केंद्र मानकर सूर्य, चंद्रमा तथा ग्रहों के निरंतर परिभ्रमण करने वाले कालचक्र का खगोलीय वर्णन यहाँ दिया गया है।

55 – सूर्य-रथ

भगवान् सूर्यदेव के एक चक्र वाले दिव्य रथ, उसके सात छंद-रूपी घोड़ों तथा सूर्य-किरणों द्वारा जल-आकर्षण और वृष्टि करने की प्रक्रिया का सुंदर वर्णन है।

56 – चंद्र-वर्णन

चंद्रमा के रथ, उनकी कलाओं के ह्रास-वृद्धि तथा देवों एवं पितरों को अमृत-पान कराने वाले सोम-मण्डल का भावपूर्ण विवेचन यहाँ है।

57 – ग्रह-गति

मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू तथा केतु इन प्रमुख ग्रहों की गतियों, दूरियों तथा मानव जीवन पर उनके प्रभाव का वर्णन है।

58 – सूर्यादि-अभिषेक

ब्रह्मा जी द्वारा सूर्य को नक्षत्रों का, चंद्रमा को ओषधियों का तथा अन्य देवों को उनके लोकों का स्वामी नियुक्त किए जाने का आधिकारिक वृत्तांत है।

59 – सूर्य-किरण

सूर्य की विभिन्न किरणों के नामों, उनके रंगों तथा पृथक-पृथक किरणों द्वारा लोक-पोषण और वृष्टि संचालन के रहस्य का प्रकटीकरण है।

60 – सूर्य-मण्डल

प्रत्येक मास में सूर्य के रथ पर सवार होने वाले ऋषियों, गंधर्वों, अप्सराओं, नागों तथा ग्रामणियों की नामावली और उनके दायित्वों का विवरण है।

61 – ग्रह-स्थिति

पृथ्वी से सूर्य, चंद्र, नक्षत्रों तथा ग्रहों की क्रमिक ऊँचाई और योजन-परिमाण की प्रामाणिक खगोलीय तालिका यहाँ दी गई है।

62 – ध्रुव-स्थिति

बालक ध्रुव की घोर तपस्या, भगवान् विष्णु और शिव द्वारा उन्हें दिए गए अचल पद तथा समस्त ज्योतिश्चक्र के आधार रूप ध्रुव-स्थान का वर्णन है।

63 – देवादि-उत्पत्ति

दक्ष प्रजापति की कन्याओं के कश्यप, धर्म तथा भृगु आदि ऋषियों से विवाह के पश्चात् देवों, दानवों, गंधर्वों, यक्षों तथा सर्पों की उत्पत्ति की वंशावली है।

64 – पुलस्त्य-वरदान

महर्षि पुलस्त्य द्वारा राजा पराशर को पुराण-संहिता के निर्माण तथा वेद-ज्ञान के प्रसार हेतु दिए गए अलौकिक वरदान की कथा है।

65 – शिव-सहस्रनाम

ब्रह्मा जी द्वारा ऋषियों के कल्याण हेतु प्रकट किए गए भगवान् शिव के परम पावन एक सहस्र नामों की महिमा और उनके जप का फल यहाँ वर्णित है।

66 – ययाति-चरित

चंद्रवंश के महान् राजा ययाति के धर्मनिष्ठ शासन, उनके दिग्विजयी अभियानों तथा विशाल धर्म-यज्ञों के संपादन का सुंदर ऐतिहासिक आख्यान है।

67 – ययाति-चरित निरंतरता

शुक्राचार्य के शाप से ययाति को वृद्धावस्था प्राप्ति, उनके पुत्र पुरु द्वारा अपनी युवावस्था का दान तथा अंत में ययाति द्वारा विषयों की असारता समझकर वैराग्य धारण करने की कथा है।

68 – ज्यामघ-वंश

राजा ज्यामघ तथा उनकी अति-पतिव्रता महारानी शैब्या के चरित्र का वर्णन, जिनकी भक्ति और धर्म-बल से वंश का उद्धार हुआ।

69 – श्रीकृष्ण-जन्म लीला

यदुवंश में सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के पावन अवतार, उनकी बाल-लीलाओं, कंस-वध तथा भगवान् महेश्वर से प्राप्त अजेय वरदानों का पावन गान है।

70 – विविध-सृष्टि

विभिन्न मन्वंतरों के राजाओं, ऋषियों तथा वैवस्वत मनु के पुत्रों की वंशावलियों का विस्तृत निरूपण यहाँ किया गया है।

71 – नंदीकेश्वर-वचन

भगवान् शिव के परम अनुचर नंदीकेश्वर द्वारा ऋषियों को शिव-पूजा, व्रत-नियम तथा भक्ति-मार्ग के गूढ़ रहस्यों का दिया गया उपदेश है।

72 – रुद्र-रथ निर्माण

ताराकाक्ष आदि दानवों के सुवर्ण, रजत और लौह निर्मित तीन उड़ने वाले नगरों अर्थात त्रिपुरासुर के वध हेतु संपूर्ण ब्रह्मांडीय शक्तियों द्वारा शिव-रथ के निर्माण की भव्य कथा है।

73 – शिव-पूजन महात्म्य

श्रद्धा और भक्ति से अर्पित किए गए एक जल-धारा, एक बिल्वपत्र अथवा केवल ‘नमः शिवाय’ जप के अनंतर फल का अलौकिक निरूपण बतलाया गया है।

74 – शिव-लिंग लक्षण

स्वयंभू, रत्नज, धातुज, शैलज तथा पार्थिव आदि विविध शिवलिंगों के निर्माण, उनके भेदों तथा पूजन-फल का प्रामाणिक लक्षण दिया गया है।

75 – शिव-अद्वैत

परमेश्वर शिव के सर्वव्यापी, एकमेवाद्वितीय अद्वैत स्वरूप का दार्शनिक निरूपण, जहाँ जगत् और जीव उन्हीं की पराशक्ति का विवर्त हैं।

76 – प्रतिमा-प्रतिष्ठा

देवालयों में शिवलिंग अथवा शिव-प्रतिमाओं की शास्त्रीय विधि से स्थापना, अधिवासन, प्राण-प्रतिष्ठा तथा मंत्र-न्यास का विधान वर्णित है।

77 – शिव-देवालय

भगवान् शिव के सुंदर मंदिरों के निर्माण, जीर्णोद्धार तथा उनकी परिक्रमा करने से कुल की सौ पीढ़ियों के उद्धार होने की महिमा बतलाई गई है।

78 – देवालय-मार्जनादि

शिव-मंदिर में झाड़ू लगाने, पोंछा लगाने, रंगोली सजाने तथा सेवा-कार्य करने वाले भक्तों को मिलने वाले महान् पुण्य का भावपूर्ण वर्णन है।

79 – शिव-अर्चना क्रम

गृहस्थ तथा विरक्त साधकों हेतु प्रातःकाल से रात्रिकाल तक की जाने वाली प्रामाणिक शिव-पूजा, आरती तथा स्तुति की क्रमिक विधि है।

80 – पाशुपत-व्रत

भगवान् शिव द्वारा स्वयं प्रकट किए गए परम पावन पाशुपत व्रत तथा शरीर में भस्म-त्रिपुंड धारण करने की वैदिक संहिता का व्याख्यान है।

81 – पशु-पाश मोचन

अज्ञानरूपी पाश से बंधे हुए जीव अर्थात ‘पशु’ को परमेश्वर शिव की अनुकंपा और पाशुपत योग द्वारा मुक्ति प्राप्त होने का रहस्य उजागर किया गया है।

82 – व्यपोहण-स्त्व

कायिक, वाचिक तथा मानसिक पापों के तत्काल निवारण हेतु सर्व-पापहर ‘व्यपोहण’ नामक परम पवित्र शिव-स्तोत्र का पाठ वर्णित है।

83 – शिव-व्रत विधान

चतुर्दशी, अष्टमी, प्रदोष तथा शिवरात्रि जैसे अति-पावन तिथियों पर किए जाने वाले उपवास, जागरण तथा पूजा-नियमों का प्रामाणिक विधान है।

84 – उमा-महेश्वर व्रत

माता उमा और परमेश्वर महेश्वर की संयुक्त प्रसन्नता हेतु मार्गशीर्ष अथवा आश्विन पूर्णिमा को किए जाने वाले महाव्रत की विधि और फल बतलाया गया है।

85 – पंचाक्षर-महिमा

शिव-भक्ति के प्राण-स्वरूप ‘नमः शिवाय’ इस दिव्य पंचाक्षर मंत्र की अगाध महिमा, उसके अक्षरों के अर्थ तथा सर्व-सिद्धि-प्रदात्री शक्ति का गान है।

86 – ध्यान-यज्ञ

बाह्य कर्मकांड की अपेक्षा अंतःकरण में भगवान् शिव के ज्योतिर्मय स्वरूप का निरंतर ध्यान करने रूपी ध्यान-यज्ञ को सर्वोच्च बतलाया गया है।

87 – मुनि-मोह शमन

दारुक वन में ऋषियों के कर्म-अहंकार को चूर करने हेतु भगवान् शिव का भिक्षुक रूप में आगमन तथा उन्हें ज्ञान-मार्ग पर लाने की अलौकिक लीला है।

88 – पाशुपत-योग समीक्षा

यम-नियम से लेकर समाधि तक पाशुपत योग के संपूर्ण सिद्धांतों का सार-संक्षेप साधकों के सुगम बोध हेतु प्रस्तुत किया गया है।

89 – सदाचार-लक्षण

सत्य, अहिंसा, गुरु-सेवा, अतिथि-सत्कार तथा धर्मानुकूल जीवन जीने के व्यावहारिक नियमों अर्थात सदाचार का विशद वर्णन है।

90 – यति-प्रायश्चित्त

संन्यासी अथवा विरक्त साधकों से अनजाने में हुए नियमों के उल्लंघन के परिमार्जन हेतु शास्त्रीय प्रायश्चित्त और तपस्या का विधान है।

91 – अरिष्ट-लक्षण

शरीर, स्वप्न तथा प्रकृति में घटने वाली भावी अनिष्ट अथवा मृत्यु-सूचक घटनाओं के लक्षण तथा उनके निवारण हेतु शिव-जप का निर्देश है।

92 – श्रीशैल-महिमा

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पावन श्रीशैल पर्वत और मल्लिका अर्जुन शिव-धाम के दर्शन मात्र से समस्त पापों के नाश और मोक्ष-प्राप्ति की महिमा है।

93 – अंधकासुर-वध

अंधकासुर के अहंकार, उसके द्वारा कैलाश पर आक्रमण तथा भगवान् शिव द्वारा अपने त्रिशूल पर उसे धारण कर अंततः उसका उद्धार करने की कथा है।

94 – वराह-प्रादुर्भाव

दैत्य हिरण्याक्ष से पृथ्वी का उद्धार करने हेतु भगवान् विष्णु के वराह अवतार तथा शिव-कृपा से उनके इस महान् कार्य के सिद्ध होने का वर्णन है।

95 – नृसिंह-लीला व शरभ-अवतार

हिरण्यकशिपु का वध करने वाले भगवान् नृसिंह के उग्र ताप को शांत करने हेतु परमेश्वर शिव द्वारा दिव्य शरभ अवतार धारण करने की अलौकिक कथा है।

96 – शिव-प्रार्थना

शरभावतार द्वारा नृसिंह देव का क्रोध शांत होने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा समस्त देवों द्वारा महेश्वर के चरणों में की गई विनीत प्रार्थना है।

97 – जलंधर-वध

समुद्र-पुत्र महाबली दैत्य जलंधर के उपद्रव तथा भगवान् शिव द्वारा अपने पैर के अंगूठे से चक्र बनाकर उसका संहार करने का वृत्तांत है।

98 – विष्णु-कृत सहस्रनाम

भगवान् विष्णु द्वारा सुदर्शन चक्र की प्राप्ति हेतु शिव जी के एक सहस्र कमलों से पूजन तथा एक कमल कम होने पर अपना नेत्र अर्पित करने की परम भावुक कथा है।

99 – दक्ष-यज्ञ विध्वंस

प्रजापति दक्ष द्वारा शिव-तिरस्कार, माता सती का योगाग्नि में देह-त्याग तथा क्रुद्ध महेश्वर द्वारा वीरभद्र को भेजकर दक्ष-यज्ञ के विध्वंस की कथा है।

100 – दक्ष-उद्धार

वीरभद्र द्वारा दक्ष का मस्तक काटने के पश्चात् अजा (बकरे) का मस्तक लगाकर उन्हें पुनः जीवित करने तथा दक्ष द्वारा शिव-शरणागति प्राप्त करने का वर्णन है।

101 – मदन-दहन

तारकासुर वध हेतु सेनापति कार्तिकेय के जन्म का मार्ग प्रशस्त करने के लिए शिव-तपस्या भंग करने आए कामदेव को भगवान् शिव द्वारा तीसरे नेत्र से भस्म करने की कथा है।

102 – उमा-तपस्या

हिमाचल-पुत्री माता पार्वती द्वारा भगवान् महेश्वर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पंचाग्नि के मध्य की गई अत्यंत कठोर तपस्या का वर्णन है।

103 – उमा-परिणय

समस्त देवों, ऋषियों तथा लोकों की उपस्थिति में भगवान् शिव और माता पार्वती के अत्यंत भव्य, अलौकिक तथा आनंदमयी दिव्य विवाह का मनोहारी वृत्तांत है।

104 – देव-स्तुति

पार्वती-परमेश्वर के दिव्य विवाह के उपरांत समस्त देवताओं, अप्सराओं तथा गंधर्वों द्वारा जगत् के माता-पिता की गाई गई आनंदमयी स्तुति है।

105 – विनायक-उत्पत्ति

माता पार्वती द्वारा अपने उबटन से बालक गणेश के निर्माण, शिव द्वारा उन्हें गणाध्यक्ष एवं प्रथम-पूज्य विघ्नहर्ता पद प्रदान करने की पावन कथा है।

106 – तांडव-नृत्य

भगवान् महेश्वर द्वारा समस्त देवों और माता भवानी के समक्ष किए गए दिव्य तांडव नृत्य का वर्णन जो सृष्टि के पंच-कृत्यों को संचालित करता है।

107 – उपमन्यु-चरित

दुग्ध की लालसा वाले बालक उपमन्यु की अनन्य शिव-भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् आशुतोष द्वारा उन्हें क्षीर-सागर प्रदान करने तथा अपना पुत्र स्वीकार करने की भावुक कथा है।

108 – पाशुपत-व्रत फल

लिंग पुराण के पूर्वाध का उपसंहार करते हुए इसके एक सौ आठ अध्यायों के श्रवण, पठन तथा पाशुपत व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त होने वाले अनंत मोक्ष-फल की अंतिम घोषणा है।

उत्तरार्थ – हर अध्याय का विवरण
1 – विष्णु-तपस्या महिमा

इस प्रथम अध्याय में भगवान् श्री हरि विष्णु द्वारा मंदराचल पर्वत पर परमेश्वर शिव की प्रसन्नता हेतु की गई अत्यंत घोर तपस्या का भावपूर्ण वृत्तांत वर्णित है। श्री हरि की निष्काम भक्ति और उग्र तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान् आशुतोष अपने स्फटिक-संकाश दिव्य रूप में प्रकट हुए और उन्हें ब्रह्मांड-संरक्षण का दायित्व, दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा असीम ऐश्वर्य प्रदान कर दोनों देवों के अभेद संबंध को पुनः स्थापित किया।

2 – सनत्कुमार-नंदी संवाद

इस अध्याय में श्रीशैल धाम के पावन वातावरण में ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनत्कुमार तथा भगवान् महेश्वर के प्रधान अनुचर नंदीश्वर के मध्य हुए परम रहस्यमयी संवाद का निरूपण है। सनत्कुमार जी की नम्र जिज्ञासा पर नंदीश्वर जी ने भगवान् शिव के मूल स्वरूप, जगत् की उत्पत्ति तथा जीवों के मोक्ष-हेतु सरल उपासना-मार्गों का विस्तृत व्याख्यान प्रारंभ किया।

3 – अष्टमूर्ति-वर्णन

भगवान् महेश्वर के सर्वव्यापी अष्टमूर्ति स्वरूप का निरूपण करते हुए बताया गया है कि वे पृथ्वी रूप में शर्व, जल रूप में भव, अग्नि रूप में रुद्र, वायु रूप में उग्र, आकाश रूप में भीम, क्षेत्रज्ञ जीव रूप में पशुपति, सूर्य रूप में ईशान तथा चंद्र रूप में महादेव बनकर संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करते हैं, अतः संपूर्ण प्रकृति की सेवा ही शिव की प्रत्यक्ष पूजा है।

4 – विष्णु-सहस्रनाम

इस अध्याय में स्वयं भगवान् शिव द्वारा प्रकट किए गए श्री हरि विष्णु के एक सहस्र पावन नामों की दिव्य तालिका एवं महिमा का वर्णन है। महेश्वर ने ऋषियों से कहा कि विष्णु-सहस्रनाम का नित्य पाठ करने से मनुष्य समस्त भयंकर पापों, शत्रुओं के भय, महारोगों तथा दरिद्रता से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

5 – नवधा-सृष्टि

ब्रह्मा जी द्वारा परमेश्वर शिव की आज्ञा से की गई नौ प्रकार की सृष्टियों का क्रमबद्ध विवेचन इस अध्याय में दिया गया है। इसमें प्राकृत सृष्टियाँ जैसे महत्तत्त्व, तन्मात्राएँ और वैकारिक अहंकार तथा वैकृत सृष्टियाँ जैसे स्थावर, तिर्यक्, देव, मानुष तथा अनुग्रह-सृष्टि का विशद ज्ञान कराया गया है।

6 – पंचाक्षर-महिमा

शिव-भक्ति के मूल आधार ‘नमः शिवाय’ इस दिव्य पंचाक्षर महामंत्र की अगाध महिमा का गान करते हुए नंदीश्वर जी बतलाते हैं कि यह मंत्र चारों वेदों का सार-तत्त्व है। यह पावन मंत्र संसार रूपी अथाह समुद्र को पार करने के लिए सुदृढ़ नौका के समान है जो निष्काम जपकर्ता को भोग और मोक्ष दोनों सहज ही प्रदान करता है।

7 – भस्म-महात्म्य

इस अध्याय में आग्नेय भस्म की अलौकिक उत्पत्ति, उसकी शुद्धि तथा पाप-नाशिनी शक्ति का गान किया गया है। शिव-अग्नि के अवशिष्ट सार-रूप भस्म को धारण करने से जीव के समस्त कल्पित एवं अज्ञानजन्य पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं और वह परम पवित्र होकर शिव-सायुज्य का अधिकारी बनता है।

8 – त्रिपुंड-धारण विधि

शरीर के विभिन्न अंगों पर भस्म से तीन क्षैतिज रेखाएँ अर्थात त्रिपुंड धारण करने की शास्त्रीय एवं वैदिक विधि का सूक्ष्म विवरण यहाँ प्रस्तुत है। नंदीश्वर जी बताते हैं कि मस्तक, भुजाओं, हृदय तथा नाभि पर मंत्रोच्चारपूर्वक त्रिपुंड धारण करने से साधक को अकाल मृत्यु, विघ्नों तथा नकारात्मक शक्तियों का भय नहीं रहता।

9 – नित्य-पूजा विधि

शिव-उपासकों तथा गृहस्थ साधकों हेतु प्रातःकाल के आचमन, स्नान, संध्या-वंदन के पश्चात् शिवलिंग पर जल, गंध, अक्षत, पुष्प तथा धूप-दीप अर्पित करने की नित्य-पूजा संहिता यहाँ दी गई है, जो साधक के घर में अखंड लक्ष्मी और शांति का वास सुनिश्चित करती है।

10 – पुष्प-पत्र वर्णन

भगवान् शिव की अर्चना में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न पवित्र पुष्पों जैसे कमल, चमेली, धतूरा, कनेर तथा द्रोण-पुष्प की महिमा बतलाई गई है। इसके साथ ही पूजा में वर्जित पुष्पों की सूची देकर साधक को शास्त्रोक्त विधि से ही पत्र-पुष्प अर्पण करने का निर्देश दिया गया है।

11 – बिल्व-वृक्ष महिमा

साक्षात् उमा-महेश्वर के स्वरूप-भूत पावन बिल्व-वृक्ष तथा उनके त्रिदल पत्तों की अलौकिक महिमा का वर्णन है। शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र अर्पित करने से तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तथा बिल्व-वृक्ष की छाया में शिव-ध्यान करने से समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य फल प्राप्त होता है।

12 – उमा-महेश्वर व्रत

माता उमा और परमेश्वर शिव के युगल स्वरूप की प्रसन्नता हेतु पूर्णिमा तिथि को किए जाने वाले अति-पावन उमा-महेश्वर व्रत का संपूर्ण विधान यहाँ वर्णित है। इस व्रत का निष्ठापूर्वक आचरण करने से पारिवारिक सुख-समृद्धि, अखंड सौभाग्य तथा अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

13 – कल्याण-सुंदर व्रत

भगवान् शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह की पावन स्मृति में आयोजित किए जाने वाले कल्याण-सुंदर व्रत के उपवास, पूजन, रात्रि-जागरण तथा दान-पुण्य की विधि बतलाई गई है, जो साधकों के जीवन से समस्त कलह और बाधाओं को समाप्त कर मंगल विधान करती है।

14 – शिवलिंग-दान

स्वर्ण, रजत, ताम्र, पाषाण अथवा मृत्तिका से निर्मित शिवलिंग का निर्माण कर उसे विद्वान ब्राह्मणों अथवा देवालयों में दान करने का अक्षय पुण्य-फल यहाँ वर्णित है। भक्तिभाव से किया गया शिवलिंग-दान दानदाता के पितरों का उद्धार करता है और उसे शिवलोक में स्थान दिलाता है।

15 – गो-दान एवं भूमि-दान

सद्विद्वान एवं शिव-भक्तों को दुधारू गायों तथा उपजाऊ भूमि का दान करने के विधान का निरूपण है। भूमि-दान को अत्यंत श्रेष्ठ बतलाते हुए कहा गया है कि देवालय अथवा आश्रम हेतु भूमि दान करने वाला मनुष्य आगामी जन्मों में चक्रवर्ती राजा बनता है और अंततः मोक्ष पाता है।

16 – महादान-वर्णन

सनातन धर्म के सबसे प्रतिष्ठित और वैभवशाली षोडश महादानों जैसे तुलापुरुष-दान, हिरण्यगर्भ-दान, ब्रह्मांड-दान तथा कल्पवृक्ष-दान की विस्तृत शास्त्रीय विधि यहाँ दी गई है, जो राजाओं तथा समर्थ पुरुषों के महान् पापों का परिमार्जन कर उन्हें देव-तुल्य पद प्रदान करती है।

17 – तिल-पर्वत दान

तिल, सुवर्ण, रत्नों तथा वस्त्रों से निर्मित विशाल तिल-पर्वत का निर्माण करके दान करने का भावपूर्ण वर्णन है। तपस्या की अग्नि से उत्पन्न तिल का दान पितरों की तृप्ति करता है, वंश-वृद्धि सुनिश्चित करता है तथा दुष्ट ग्रहों के कुप्रभाव को तत्काल शांत करता है।

18 – दान-विधि

दान देने वाले दाता की मानसिक पवित्रता, देश, काल, पात्र तथा निरहंकार भाव के महत्व का निरूपण यहाँ किया गया है। नंदीश्वर जी स्पष्ट करते हैं कि दंभ और ख्याति हेतु दिया गया दान निष्फल रहता है, जबकि श्रद्धा और नम्रता से दिया गया अल्प दान भी अनंत गुना फल प्रदान करता है।

19 – दान-फल

विभिन्न प्रकार के सात्विक दानों जैसे जल, अन्न, दीप, वस्त्र, छत्र तथा उपाणह (जूते) के दान से प्राप्त होने वाले दिव्य लोक-भोगों तथा स्वर्गीय सुखों की विस्तृत सूची दी गई है, जो गृहस्थ जीवों को धर्म-मार्ग पर चलने की निरंतर प्रेरणा देती है।

20 – शांतिक-विधि

दुःस्वप्न, महामारी, अकाल तथा ग्रहों की प्रतिकूल चाल से उत्पन्न होने वाले अनिष्टों के शमन हेतु वैदिक मंत्रों, शिव-होम तथा ग्रह-शांति अनुष्ठानों की शास्त्रीय विधि यहाँ वर्णित है, जो संपूर्ण समाज और राष्ट्र में सुख-शांति की स्थापना करती है।

21 – प्रतिमा-प्रतिष्ठा

पाषाण अथवा धातु से निर्मित शिवलिंगों एवं दिव्य मूर्तियों का शास्त्रीय विधि से प्रक्षालन, जलाधिवास, अन्नाधिवास, न्यास तथा प्राण-प्रतिष्ठा करने का अति सूक्ष्म आगमोक्त विधान दिया गया है, जिससे मंतरांगों के द्वारा मूर्ति में साक्षात् देव-चेतना का प्राकट्य होता है।

22 – देवालय-प्रतिष्ठा

नवनिर्मित शिव-मंदिरों के शिखर पर कलश-स्थापन, ध्वजारोहण, वास्तु-शांति, यज्ञ तथा आचार्य-पूजन पूर्वक किए जाने वाले भव्य प्रतिष्ठा-समारोह का वर्णन है। मंदिर का निर्माण कराने वाला भक्त अपने कुल की अनेक पीढ़ियों के साथ शिव-धाम को प्राप्त करता है।

23 – जीर्णोद्धार विधि

प्राचीन, खंडित अथवा क्षतिग्रस्त शिव-मंदिरों एवं मूर्तियों के पुनः जीर्णोद्धार तथा पुनः-प्रतिष्ठा की पावन विधि बतलाई गई है। नंदीश्वर जी कहते हैं कि नए मंदिर के निर्माण की तुलना में जीर्ण-शीर्ण देवालय का उद्धार करना दुगना पुण्य-फल प्रदान करता है।

24 – भूत-शुद्धि

साधक के भौतिक शरीर के भीतर स्थित पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पंच-महाभूतों को बीज-मंत्रों और प्राणायाम के द्वारा शुद्ध करके दिव्य शिव-शरीर में परिवर्तित करने की गूढ़ योग-प्रक्रिया का वर्णन है, जो नित्य-पूजा का मुख्य आधार है।

25 – अभिषेक-विधि

शिवलिंग पर दुग्ध, दधि, घृत, मधु, शर्करा के पंचामृत तथा गंगाजल और सुगंधित द्रव्यों से किए जाने वाले रुद्र-अभिषेक की पावन विधि का निरूपण है। प्रत्येक द्रव्य से किए गए अभिषेक का पृथक-पृथक फल जैसे आरोग्य, लक्ष्मी, विद्या तथा पापनाश यहाँ बताया गया है।

26 – पाशुपत-योग निरूपण

भगवान् महेश्वर द्वारा जीवों के बंधन-मुक्ति हेतु प्रकट किए गए पाशुपत-योग का गंभीर दार्शनिक विवेचन है। इंद्रिय-निग्रह, वैराग्य, ध्यान तथा कार्य-कारण का ईश्वर में समर्पण करके साधक अज्ञान रूपी पाश से छूटकर अद्वैत शिव-तत्त्व में लीन हो जाता है।

27 – सिद्धि-प्राप्ति

पाशुपत-योग की उच्च अवस्था में योगियों को प्राप्त होने वाली दूरश्रवण, दूरदर्शन, अणिमादि अष्ट-सिद्धियों तथा अलौकिक सामर्थ्य का वर्णन है। इसके साथ ही चेतावनी दी गई है कि सच्चा साधक इन सिद्धियों के प्रलोभन में न फँसकर केवल परमेश्वर के पद को ही ध्येय बनाए।

28 – मोक्ष-प्राप्ति

अज्ञान, अहंकार और कर्म के तीन कड़े बंधनों से मुक्त होकर जीव (पशु) द्वारा परमेश्वर (पति) का सायुज्य प्राप्त करने रूपी मोक्ष का निरूपण है। मुक्त आत्मा शिवलोक में अखंड आनंद, अमूर्त शांति तथा साक्षात् प्रकाश स्वरूप में नित्य स्थित रहती है।

29 – राजा भद्रायु का चरित्र

विष-प्रयोग और राज्य-च्युत होने के भीषण संकट में पड़े बालक राजकुमार भद्रायु का महर्षि ऋषभ की कृपा और ‘शिव-कवच’ के प्रभाव से पुनर्जीवन पाने तथा अजेय पराक्रम से अपना राज्य पुनः प्राप्त करने का अलौकिक ऐतिहासिक वृत्तांत यहाँ वर्णित है।

30 – श्वेतकेतु-उद्धार

अल्पायु योग लेकर जन्मे परम शिव-भक्त बालक श्वेतकेतु की कथा है, जिन्होंने यमराज के आगमन पर शिवलिंग का आलिंगन कर महेश्वर का आह्वान किया, जिस पर आशुतोष भगवान् ने स्वयं प्रकट होकर मृत्यु के देवता को पीछे धकेला और बालक को अमरत्व प्रदान किया।

31 – महर्षि दधीचि का आत्म-त्याग

आसुरी शक्तियों और वृत्रासुर के आतंक से देवताओं की रक्षा हेतु परम शिव-भक्त महर्षि दधीचि द्वारा अपने भौतिक शरीर का योगाग्नि में त्याग करने की कथा है, जिनकी अिस्थियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाकर इंद्र को दिया और धर्म की विजय हुई।

32 – प्रायश्चित्त-विधि

अज्ञानवश अथवा अकस्मात् त्रुटियों से हुए गुरुतर पापों के परिमार्जन हेतु शास्त्रीय कृच्छ्र-व्रत, प्रायश्चित्त, उपवास, रुद्राष्टाध्यायी पाठ तथा तिल-होम का विधान दिया गया है, जो पश्चाताप से दग्ध मन को पुनः परम पवित्र बना देता है।

33 – शिलाद-तपस्या

परम ज्ञानी मुनि शिलाद द्वारा अयोनिज पुत्र-प्राप्ति हेतु सहस्रों वर्षों तक किए गए कठोर वायु-भक्षण तप का वृत्तांत है, जिससे प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् शिव उनके यज्ञ-कुंड से बालक नंदी के रूप में प्रकट हुए और उनके गृह को धन्य किया।

34 – परमेश्वर के दिव्य अवतार

धर्म की हानि और अधर्म के उत्थान के समय भक्तों के परित्राण हेतु भगवान् परमेश्वर शिव द्वारा धारण किए गए विविध लीला-अवतारों एवं उनके लोकोपकारी चरित्रों का भक्ति-पूरित गान इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है।

35 – राजा दशरथ का आख्यान

अयोध्या के सूर्यवंशी राजा दशरथ द्वारा अपने पूर्व-जन्मों के पाप-ताप के शमन हेतु सूर्यदेव तथा प्रभु शिव की आराधना करने तथा आशुतोष की अनुकंपा से भगवान् श्रीराम सहित चार दिव्य पुत्रों को प्राप्त करने की पावन कथा है।

36 – काशी-महिमा

अविमुक्त-क्षेत्र काशी नगरी की महा-महिमा का गान करते हुए बताया गया है कि यह नगरी भगवान् शिव के त्रिशूल की नोक पर स्थित है और महाप्रलय में भी इसका विनाश नहीं होता। यहाँ निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी को अंत समय में अनायास ही मुक्ति प्राप्त होती है।

37 – काशी के प्रमुख तीर्थ

काशी स्थित मणिकर्णिका, दशाश्वमेध, ललिता, ज्ञानवापी तथा कालभैरव जैसे परम पवित्र तीर्थों, कुंडों और शिवलिंगों का विस्तृत वर्णन है, जहाँ स्नान और दर्शन करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का तत्काल नाश हो जाता है।

38 – अविमुक्त-क्षेत्र महिमा

अविमुक्त-क्षेत्र के उस गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य का उद्घाटन किया गया है कि यहाँ मृत प्राणी के दाहिने कान में स्वयं भगवान् महेश्वर अंतिम क्षण में ‘तारक-मंत्र’ का उपदेश देते हैं, जिससे वह जीव जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए छूट जाता है।

39 – प्रलय-वर्णन

सृष्टि के प्रलय-चक्र का सूक्ष्म विवरण दिया गया है, जिसमें ब्राह्म, प्राकृत तथा आत्यंतिक प्रलय के समय संपूर्ण पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश तथा समय का परमेश्वर शिव के अव्यक्त स्वरूप में लीन होने का भयावह एवं ज्ञानप्रद वर्णन है।

40 – प्रकृति-पुरुष विचार

अव्यक्त त्रिगुणात्मक प्रकृति (शक्ति) तथा नित्य चेतनामय पुरुष (शिव) के पारस्परिक संबंध का गंभीर दर्शन प्रस्तुत किया गया है। दोनों की साम्यावस्था और अनन्य संयोग से ही संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना, स्थिति और लय का खेल संचालित होता है।

41 – शिवाद्वैत सिद्धांत

सनातन दर्शन के सर्वोच्च शिवाद्वैत सिद्धांत का व्याख्यान है, जहाँ साधक ‘सोऽहम्’ और ‘शिवोऽहम्’ की भावना से अपने निज-आत्मा को साक्षात् परमेश्वर शिव के रूप में साक्षात्कृत करता है और द्वैत की समस्त भ्रांतियाँ मिट जाती हैं।

42 – शिव-गायत्री मंत्र

परम पावन शिव-गायत्री मंत्र का प्राकट्य, उसके पदों का गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ तथा नित्य जपादि की विधि बतलाई गई है, जो साधक की बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित कर शुद्ध ज्ञान का प्रकाश बिखेरती है।

43 – जीवन्मुक्त लक्षण

भौतिक शरीर में रहते हुए भी सांसारिक प्रपंचों से पूर्णतः असंपृक्त, समदर्शी तथा अखंड शिव-भाव में स्थित ‘जीवन्मुक्त’ महापुरुष के अलौकिक लक्षणों का सुंदर वर्णन है, जो संपूर्ण जगत् हेतु वंदनीय होते हैं।

44 – उत्क्रांति-विधि

योगियों द्वारा अंत समय में अपने प्राणों को सुषुम्णा नाड़ी के मार्ग से ब्रह्मरंध्र की ओर ले जाकर देह-त्याग करने की परम गोपनीय उत्क्रांति-विधि का निरूपण है, जिससे आत्मा सीधे शिव-लोक में प्रविष्ट होती है।

45 – भक्ति-योग महिमा

कलि युग में ईश्वर-प्राप्ति हेतु भक्ति-योग को सबसे सरल, मधुर और सर्वोत्तम मार्ग बतलाया गया है। निष्काम प्रेम और अनन्य शरणागति से युक्त भक्त को भगवान् आशुतोष बिना किसी कठिन तपस्या के स्वयं प्राप्त हो जाते हैं।

46 – महर्षि अगस्त्य की शिव-भक्ति

विंध्याचल पर्वत के अहंकार का मर्दन करने वाले तथा समुद्र का आचमन करने वाले महर्षि अगस्त्य की अनन्य शिव-भक्ति, तपोबल तथा दक्षिण भारत में स्थापित उनके पवित्र शिवलिंगों का पावन ऐतिहासिक वृत्तांत है।

47 – दानव-संहार एवं ऋषि-रक्षण

सज्जनों की रक्षा हेतु भगवान् शिव द्वारा महर्षि अगस्त्य को दिए गए दिव्य अस्त्रों तथा वातापि और इल्वल जैसे क्रूर राक्षसों का संहार करके ऋषियों तथा धर्म की रक्षा करने की अलौकिक कथा का वर्णन है।

48 – उपमन्यु को दिव्य उपदेश

बालक उपमन्यु की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान् महेश्वर द्वारा उन्हें दिए गए अत्यंत गूढ़ अंतर्याग, मंत्र-साधना, ध्यान तथा उमा-शिव के स्वरूप का प्रामाणिक दिव्य उपदेश यहाँ दर्ज है।

49 – पंच-ब्रह्ममंत्र

भगवान् शिव के पाँच दिव्य मुखों से संबंधित सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर तथा ईशान इन पाँच परम शक्तिशाली ब्रह्ममंत्रों का शास्त्रीय विनियोग, ध्यान तथा जप-फल बतलाया गया है।

50 – मंत्र-शास्त्र रहस्य

मंत्रों के बीजाक्षर, न्यास, श्वास-नियंत्रण, जप की विधियों (वाचिक, उपांशु, मानस) तथा गुरु-कृपा से मंत्र-जाग्रति के सूक्ष्म विज्ञान का शास्त्रीय निरूपण इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है।

51 – शिव-ध्यान विधि

कैलाश पर्वत के सुवर्ण मण्डप में विराजमान, पंचमुख, दशभुज, चंद्र-मौलि, माता भवानी के साथ सुशोभित भगवान् शिव के अति-सुंदर साकार स्वरूप का मानस-ध्यान करने की भावपूर्ण ध्यान-संहिता यहाँ दी गई है।

52 – लिंग पुराण सार-संक्षेप

सूत रोमहर्षण द्वारा लिंग पुराण के पूर्वाध के एक सौ आठ अध्यायों तथा उत्तरार्ध के पचपन अध्यायों के संपूर्ण सार-तत्त्व का एक साथ संक्षिप्त दोहन एवं समन्वयात्मक उपसंहार प्रस्तुत किया गया है।

53 – फलश्रुति

इस परम पावन लिंग पुराण के पठन, श्रवण, मनन तथा प्रचार-प्रसार से प्राप्त होने वाले अनंत पुण्य-फल का निरूपण है। सूत जी कहते हैं कि इसका नित्य पाठ करने वाला मनुष्य सौ जन्मों के पापों से मुक्त होकर शिव-सायुज्य पाता है।

54 – ग्रंथ-दान विधि

शुभ मुहूर्त एवं पूर्णिमा जैसी पवित्र तिथियों पर लिंग पुराण की हस्तलिखित अथवा मुद्रित संहिता को सुंदर वस्त्रों में लपेटकर विद्वान शिव-भक्त को दान करने की शास्त्रीय विधि और उसका संपूर्ण पृथ्वी-दान के समान पुण्य-फल बताया गया है।

55 – मङ्गलाचरण एवं उपसंहार

इस अंतिम अध्याय में परमेश्वर शिव, माता जगदंबा, श्री हरि विष्णु, ब्रह्मा जी, नंदीश्वर तथा समस्त महर्षियों के चरणों में बारंबार नमन करते हुए संपूर्ण ब्रह्मांड में शांति, वृष्टि, धर्म-वृद्धि तथा जीवों के कल्याण हेतु परम मङ्गलाचरण के साथ पुराण का समापन किया गया है।

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