Read Garuda Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa in Hindi

This page contains the Hindi Table of Contents for the Garuda Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa. For the English Table of Contents, please see Read Garuda Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa. For Telugu Table of Contents, please refer to Read Garuda Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa in Telugu. For general information about the Purāṇa, please see Garuda Purāṇa. For general information about this Khaṇḍa, please see Brahma Khaṇḍa.

सनातन धर्म के अष्टादश महापुराणों में गरुड़ पुराण परम भास्वर और अक्षय ज्ञान का ऐसा अमृत-समुद्र है, जिसे साक्षात् भगवान् विष्णु ने वैकुण्ठ धाम में अपने परम भक्त और पक्षीराज गरुड़ जी को प्रदान किया था। आचार खण्ड और प्रेत खण्ड के दिव्य प्रकाश के अनन्तर, गरुड़ पुराण का यह अंतिम और सर्वोत्कृष्ट भाग ‘ब्रह्म खण्ड‘ इस महापुराण के मुकुटमणि तथा दार्शनिक हृदय के रूप में सुशोभित होता है। यह पावन खण्ड एक अखण्ड गुरु-परम्परा के माध्यम से संरक्षित हुआ—जहाँ सर्वेश्वर भगवान् नारायण ने इसका उपदेश ब्रह्मा जी को दिया, ब्रह्मा जी ने महर्षि व्यास को, और व्यास जी की अनुकम्पा से सूत गोस्वामी जी ने नैमिषारण्य के पवित्र तपोवन में सहस्र-वर्षीय महायज्ञ में एकत्र हुए शौनकादि ऋषियों को इसका श्रवण कराया। भक्तिमयी गाथा-शैली में रचा गया यह ब्रह्म खण्ड भौतिक संसार के बन्धनों से मुक्त होकर जीव को साक्षात् परब्रह्म के परम पद तक पहुँचाने वाला एक अविचल सेतु है।

ब्रह्म खण्ड के मूल दर्शन में भगवान् विष्णु को सर्वगुण-सम्पन्न, स्वतन्त्र, समस्त दोषों से रहित और इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के एकमात्र कारक, पालक व रक्षक ‘परब्रह्म’ के रूप में स्थापित किया गया है। यह दिव्य ग्रन्थ ब्रह्माण्ड की समस्त चेतनाओं और देव-शक्तियों के मध्य ‘तारतम्य’ (पदानुक्रम) का सूक्ष्म और अकाट्य विवरण प्रस्तुत करता है। इसमें भगवती महालक्ष्मी जी को भगवान् श्रीहरि की नित्या संगिनी और आद्यशक्ति के रूप में, तथा मुख्यप्राण वायुदेव को समस्त जीवों के परम गुरु, मध्यस्थ और विरक्त पथप्रदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। साथ ही, यह ग्रन्थ जीव-समूह के तीन शाश्वत वर्गों—सात्त्विक (मुक्ति-योग्य), राजस (नित्य-संसारी) और तामस (तमो-योग्य)—के भेद को स्पष्ट करते हुए यह उजागर करता है कि जीव का आन्तरिक स्वरूप और उसके द्वारा कृत कर्म किस प्रकार उसके अन्तिम लक्ष्य को निर्धारित करते हैं।

अपने गम्भीर तत्त्वज्ञान के साथ-साथ ब्रह्म खण्ड साधक के लिए एक सुगम और व्यावहारिक आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है। यह ग्रन्थ यह सिद्ध करता है कि केवल शुष्क ज्ञान या कर्म से मुक्ति सम्भव नहीं, अपितु भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, तुलसी-सेवा, शालग्राम-अर्चन और भगवान् के पवित्र नाम-संकीर्तन के समरस समन्वय से ही जीव माया के आवरण को बेध सकता है। यह पावन खण्ड यह परम सत्य उद्घाटित करता है कि जो भी साधक सर्वस्व अर्पण कर प्रभु नारायण के श्रीचरणों में अनन्य शरण ग्रहण करता है, उसके जन्म-जन्मान्तर के कर्म-बन्धन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। इस प्रकार, ब्रह्म खण्ड गरुड़ पुराण के सम्पूर्ण उपदेशों को उसकी परम पराकाष्ठा पर पहुँचाते हुए, साधक को वैकुण्ठ धाम में प्रभु श्रीहरि के श्रीचरणारविन्दों में नित्य और अभय वास प्रदान करने वाला सनातन आलोक स्तंभ है।

Read Garuda Purāṇa Online in Hindi

ब्रह्म कांड – केवल अनुवाद

हर अध्याय का विवरण

1 – मंगलाचरण-पुराणसंस्तुति

नैमिषारण्य के पवित्र वातावरण में, जहाँ पूज्य महर्षिगण निरन्तर चलने वाले महायज्ञ के लिए एकत्र हुए हैं, सूत गोस्वामी जी ब्रह्म खण्ड के वाचन का शुभारम्भ करने से पूर्व भगवान् विष्णु, भगवती महालक्ष्मी जी तथा महर्षि व्यास के चरणों में निष्ठापूर्वक प्रणाम अर्पित करते हैं। सूत गोस्वामी जी वर्णन करते हैं कि किस प्रकार पक्षीराज गरुड़ जी परम सत्य को जानने के लिए ब्रह्मा जी के पास उपस्थित हुए, जिससे उस दिव्य सम्वाद का श्रीगणेश हुआ जो समस्त लोकों के शाश्वत आश्रय प्रभु नारायण की परम महिमा को प्रकट करता है।

2 – विष्णुवाधिक्यनिरूपण

ब्रह्मा जी गरुड़ जी के समक्ष समस्त निर्मित प्राणियों, देवों तथा ब्रह्माण्डीय तत्त्वों पर भगवान् विष्णु की सर्वोपरि सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं। यह ग्रन्थ स्थापित करता है कि प्रभु नारायण स्वतन्त्र, कालातीत, समस्त भौतिक दोषों से रहित तथा असीमित दिव्य गुणों से परिपूर्ण हैं। इसमें यह घोषणा की गई है कि साक्षात् ब्रह्मा, शिव और इन्द्र भी अपनी ब्रह्माण्डीय शक्तियों और अधिकारों को प्राप्त करने के लिए निरन्तर उनके श्रीचरणों का ध्यान करते हैं।

3 – लक्ष्मी-स्वरूपनिरूपण

यह कथा भगवान् विष्णु की नित्या संगिनी भगवती महालक्ष्मी जी के दिव्य स्वरूप और विविध रूपों को उघाड़ती है, जो उनसे सर्वदा अभिन्न हैं। ब्रह्मा जी श्री, भू और दुर्गा सहित उनके सूक्ष्म रूपों का वर्णन करते हुए समझाते हैं कि यद्यपि वे भौतिक प्रकृति पर शासन करती हैं और समस्त लौकिक व आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, तथापि वे सम्पूर्ण रूप से प्रभु नारायण पर ही आश्रित हैं और निरन्तर अनन्य भक्ति से उनकी सेवा करती हैं।

4 – देवता-तारतम्यकथन

ब्रह्मा जी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समस्त देवों, महर्षियों और देहधारी जीवों को नियन्त्रित करने वाले ‘तारतम्य’ के गूढ़ सिद्धान्त की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। यह ग्रन्थ मुख्यप्राण वायुदेव को भगवान् के परम सेवक के रूप में भगवती महालक्ष्मी जी के ठीक नीचे स्थान देता है, जिसके पश्चात् ब्रह्मा, सरस्वती, रुद्र, पार्वती, इन्द्र तथा अन्य दिव्य शक्तियाँ आती हैं; जिससे यह सिद्ध होता है कि इस पावन क्रम के माध्यम से भगवदनुग्रह किस प्रकार प्रवाहित होता है।

5 – विष्ण्ववतार-निरूपण

यह अध्याय भगवान् विष्णु के अलौकिक अवतारों का विशद वर्णन करता है, जिसमें यह उजागर किया गया है कि किस प्रकार परमेश्वर वराह, नरसिंह, वामन, राम और कृष्ण जैसे दिव्य रूपों में इस भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं। ब्रह्मा जी स्पष्ट करते हैं कि ये दिव्य प्रादुर्भाव भौतिक कर्मों या शारीरिक क्षय के अधीन नहीं हैं, अपितु केवल धर्म की रक्षा करने और भक्तों का उद्धार करने के लिए धारण किए गए विशुद्ध सच्चिदानन्द स्वरूप हैं।

6 – देवता-अवतार-निरूपण

ब्रह्मा जी भगवान् विष्णु की दिव्य लीलाओं में सहायता करने के लिए पृथ्वी पर विभिन्न देवों के आंशिक अंशों और अवतारों का वर्णन करते हैं। यह कथा स्पष्ट करती है कि किस प्रकार दिव्य शक्तियाँ ब्रह्माण्डीय आवश्यकता के अनुरूप मानव या सूक्ष्म रूप धारण करती हैं और धर्म की स्थापना व जगत् के संरक्षण के लिए प्रभु नारायण की दिव्य आज्ञा के अधीन कार्य करती हैं।

7 – जीव-त्रिविधभेद-निरूपण

परमेश्वर ब्रह्मा जी के माध्यम से देहधारी जीवों के मुक्ति-योग्य सात्त्विक, नित्य-संसारी राजस तथा तमो-योग्य तामस रूपी तीन मूलभूत वर्गों का उद्घाटन करते हैं। यह ग्रन्थ समझाता है कि जीव का आन्तरिक आध्यात्मिक स्वभाव और उसके नैतिक विकल्प ही यह निर्धारित करते हैं कि वह नित्य वैकुण्ठ के आनन्द की ओर आरोहण करेगा, निरन्तर सांसारिक आवागमन में रहेगा या अधोगति को प्राप्त होगा।

8 – सृष्टिक्रम-निरूपण

ब्रह्मा जी ब्रह्माण्डीय सृष्टि का विशद विवरण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार भगवान् विष्णु अव्यक्त प्रकृति को उद्वेलित करके महत्-तत्त्व, अहङ्कार तथा सूक्ष्म तत्त्वों को उत्पन्न करते हैं। प्रभु नारायण की दिव्य शक्ति द्वारा निर्देशित और वायुदेव द्वारा समर्थित होकर, ब्रह्मा जी भौतिक ग्रह-मंडलों का निर्माण करते हैं और उन्हें विविध जीव-जातियों से आपूरित करते हैं।

9 – श्री-वायु-माहात्म्य

यह अध्याय ब्रह्माण्ड के धारण-पोषण तथा जीवों को आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाने में भगवती महालक्ष्मी जी और मुख्यप्राण वायुदेव की असाधारण भूमिकाओं की महिमा गाता है। ब्रह्मा जी समझाते हैं कि वायुदेव समस्त प्राणियों के भीतर अन्तर्यामी प्राणवायु के रूप में तथा जगद्गुरु के रूप में कार्य करते हैं, जो योग्य साधकों को भगवान् विष्णु की यथार्थ भक्ति और ज्ञान प्रदान करते हैं।

10 – कर्मस्वरूप-निरूपण

ब्रह्मा जी कर्म के सूक्ष्म एवं गहन विज्ञान को प्रकाशित करते हैं, और यह बतलाते हैं कि किस प्रकार व्यक्तिगत विचार, वाणी और कार्य ऐसे बन्धनकारी सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न करते हैं जो भावी जन्मों और अनुभवों को निर्धारित करते हैं। यह ग्रन्थ इस बात पर बल देता है कि यद्यपि कर्म एक निष्पक्ष नियम के रूप में कार्य करता है, तथापि यह पूर्णतः भगवान् विष्णु के परम नियन्त्रण और दिव्य विधान के ही अधीन है।

11 – देवासुर-स्वरूप-भेद

यह कथा दिव्य जीवात्माओं (देवों) तथा आसुरी प्रवृत्तियों (असुरों) के आन्तरिक लक्षणों, नैतिक स्वभावों और आध्यात्मिक मार्गों के भेद को स्पष्ट करती है। ब्रह्मा जी यह दर्शाते हैं कि नम्रता, सत्यता, अहिंसा और विष्णु-भक्ति दिव्य स्वभाव को परिभाषित करती हैं; जबकि अहंकार, छल, हिंसा और भगवान् के प्रति विद्वेष आसुरी जीवों के लक्षण हैं।

12 – तुलसी-शालग्राम-माहात्म्य

ब्रह्मा जी पवित्र तुलसी-दल और शालग्राम शिलाओं की परम पवित्रता का गान करते हैं और उन्हें भगवान् विष्णु के प्रत्यक्ष स्वयंभू स्वरूप घोषित करते हैं। यह ग्रन्थ बतलाता है कि नवीन तुलसी से सुशोभित शालग्राम जी का नित्य पूजन किस प्रकार बड़े से बड़े पापों को धो डालता है, पारिवारिक समरसता प्रदान करता है और साधक को शाश्वत मुक्ति प्रदान करता है।

13 – अदिति-कश्यप-कथा

यह अध्याय माता अदिति और महर्षि कश्यप के इतिहास का वर्णन करता है, जिसमें भगवान् विष्णु को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए उनके द्वारा किए गए कठोर तप और भक्तिपूर्ण प्रार्थनाओं का उल्लेख है। उनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् देवों की रक्षा करने, ब्रह्माण्डीय व्यवस्था को पुनरुज्जीवित करने और सम्पूर्ण जगत् को अनुगृहीत करने के लिए तेजस्वी वामनावतार के रूप में प्रकट हुए।

14 – नाममाहात्म्य-व्रतनिर्णय

ब्रह्मा जी भगवान् विष्णु के नारायण, कृष्ण, हरि और राम जैसे पावन नामों के कीर्तन की अगाध आध्यात्मिक शक्ति को प्रकट करते हैं। यह कथा दर्शाती है कि किस प्रकार श्रद्धापूर्वक दिव्य नाम का उच्चारण पर्वत-समान कर्म-भारों को नष्ट कर देता है, तथा प्रभु विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए एकादशी जैसे पवित्र व्रतों के पालन के नियमों को रेखांकित करती है।

15 – तीर्थनगरी-माहात्म्य

यह अध्याय काशी, प्रयाग, मथुरा, द्वारका और पावन गङ्गा सहित पवित्र तीर्थस्थानों एवं दिव्य नदियों की प्रशंसा करता है। ब्रह्मा जी समझाते हैं कि नम्र और भक्तिभाव से परिपूर्ण हृदय के साथ इन पवित्र भूमियों की यात्रा करना मन को शुद्ध करता है, सांसारिक आसक्तियों को तोड़ता है और भगवान् विष्णु के प्रति सहज प्रेम को जाग्रत करता है।

16 – राम-कृष्ण-चरितामृत

ब्रह्मा जी प्रभु रामचन्द्र जी और भगवान् कृष्ण की दिव्य लीलाओं एवं अलौकिक चरित्रों का सङ्क्षेप प्रस्तुत करते हैं। यह ग्रन्थ रावण के वध में श्रीराम की सत्य और धर्म के प्रति कठोर निष्ठा, तथा श्रीकृष्ण की मधुर बाल-लीलाओं, आसुरी शक्तियों के विनाश और श्रीमद्भगवद्गीता में दिव्य ज्ञान के उपदेश को उजागर करता है।

17 – वैष्णवलक्षण-निरूपण

यह कथा उन महान् गुणों और आध्यात्मिक आचरण की रूपरेखा प्रस्तुत करती है जो भगवान् विष्णु के समर्पित सेवक अर्थात् एक सच्चे वैष्णव को परिभाषित करते हैं। ब्रह्मा जी वर्णन करते हैं कि किस प्रकार एक सच्चा भक्त सर्वत्र दया भाव रखता है, सत्य बोलता है, गले में तुलसी-माला और मस्तक पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक धारण करता है तथा सर्वत्र प्रभु नारायण की उपस्थिति का दर्शन करता है।

18 – तारतम्य-क्रम-विस्तार

ब्रह्मा जी दिव्य शक्तियों, ऋषियों, राजाओं और भक्तों के विस्तृत पदानुक्रम का विस्तार से वर्णन करते हैं, जिससे ब्रह्माण्डीय आध्यात्मिक स्थिति का एक स्पष्ट मानचित्र प्राप्त होता है। यह विशद वर्गीकरण पुनः स्थापित करता है कि समस्त देव-शक्तियाँ अपनी शक्ति, आयु और ज्ञान को भगवान् विष्णु के प्रति अपनी भक्ति और सेवा के अनुपात में ही प्राप्त करती हैं।

19 – मुख्यप्राण-स्वरूप

यह अध्याय प्रत्येक भौतिक शरीर और ब्रह्माण्डीय प्रणाली को संचालित करने वाली दिव्य प्राण-शक्ति के रूप में मुख्यप्राण वायुदेव का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है। ब्रह्मा जी समझाते हैं कि वायुदेव भौतिक कामनाओं से सर्वथा अस्पर्शित रहते हैं और ब्रह्माण्ड की सृष्टि तथा जीवों के उद्धार में भगवान् विष्णु के प्रमुख साधन के रूप में निरन्तर सेवा करते हैं।

20 – स्वाध्याय-जप-यज्ञ

ब्रह्मा जी नित्य शास्त्र-अध्ययन रूपी स्वाध्याय तथा पवित्र मन्त्रों के ध्यानपूर्वक जप रूपी जप-यज्ञ की साधना का वर्णन करते हैं। यह ग्रन्थ गायत्री मन्त्र और अष्टाक्षर नारायण मन्त्र की परम पवित्रता को रेखांकित करता है, और यह बतलाता है कि किस प्रकार निरन्तर जप मन को निश्चल करता है और जीवात्मा को साक्षात् प्रभु नारायण से जोड़ता है।

21 – अन्तर्यज्ञ-स्वरूप

यह कथा हृदय-कमल की वेदी पर किए जाने वाले ‘अन्तर्यज्ञ’ अर्थात् आन्तरिक मानसिक यज्ञ की साधना को प्रकट करती है। ब्रह्मा जी विस्तार से बतलाते हैं कि किस प्रकार सांसारिक कामनाओं, अहंकार और मानसिक विकारों को दिव्य ज्ञान की अग्नि में आहुत करना सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करता है और साधक को भगवान् विष्णु के प्रत्यक्ष साक्षात्कारों के लिए प्रस्तुत करता है।

22 – विष्णु-ध्यान-प्रकार

ब्रह्मा जी क्षीरसागर में आदिशेष की शय्या पर विराजमान भगवान् विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप के अलौकिक दृश्य-ध्यान का वर्णन करते हैं। साधक को मुकुट और कौस्तुभ मणि की दमक से लेकर शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म तक प्रत्येक अलौकिक अङ्ग पर एकाग्र होने का निर्देश दिया गया है, जो आत्मा को अगाध शान्ति प्रदान करता है।

23 – भक्ति-ज्ञान-वैराग्य

यह अध्याय अनन्य भक्ति, आध्यात्मिक विवेक रूपी ज्ञान, और भौतिक सुखों के प्रति निस्पृहता रूपी वैराग्य के समरस समन्वय को प्रकाशित करता है। ब्रह्मा जी स्थापित करते हैं कि सच्ची भक्ति स्वाभाविक रूप से वैराग्य और दिव्य ज्ञान को जन्म देती है, जो सांसारिक मोह-माया को छिन्न-भिन्न करने वाले सम्पूर्ण मार्ग का निर्माण करती है।

24 – भक्त-चरित्र-कीर्तन

ब्रह्मा जी प्राचीन राजर्षियों और विरक्त भक्तों के प्रेरणादायी इतिहास का गान करते हैं, जिन्होंने भगवान् विष्णु के प्रति अटल शरणागति के साथ निष्ठा की कठोर परीक्षाओं का सामना किया। यह कथा दर्शाती है कि किस प्रकार भगवान् अपने भक्तों की समस्त सङ्कटों से स्वयं रक्षा करते हैं, और यह सिद्ध करती है कि अविचल श्रद्धा दिव्य अनुग्रह की गारण्टी देती है।

25 – वेद-पुरुष-सूक्त-माहात्म्य

यह अध्याय वैदिक मन्त्रों, विशेषकर पुरुष-सूक्त को भगवान् विष्णु के शाश्वत शब्द-ब्रह्म स्वरूप के रूप में महिमामण्डित करता है। ब्रह्मा जी समझाते हैं कि पुरुष-सूक्त का पाठ और ध्यान भगवान् के विराट स्वरूप को प्रकट करता है, जिससे बौद्धिक तेज, आध्यात्मिक बल और दिव्य कृपा की प्राप्ति होती है।

26 – सदाचार-नियम

ब्रह्मा जी व्यक्तिगत स्वच्छता, धर्मानुकूल आचरण, गुरुजनों के प्रति आदर, अतिथियों का सत्कार और प्राणियों पर दया सहित धर्मानुकूल जीवन (सदाचार) के नित्य नियमों को स्थापित करते हैं। सदाचार का पालन घर को नकारात्मकता से बचाता है और आध्यात्मिक ऊर्जा का संरक्षण करता है।

27 – मोक्षसाधन-निरूपण

यह कथा मोक्ष अर्थात् आत्यंतिक आध्यात्मिक विमुक्ति प्राप्त करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक चरणों का सम्पूर्ण सङ्क्षेप प्रदान करती है। ब्रह्मा जी बल देते हैं कि वैराग्य का संवर्धन, सन्तों की सेवा, नारायण का निरन्तर स्मरण और ईश्वर पर आत्मा की शाश्वत निर्भरता की अनुभूति ही पुनर्जन्म से पूर्ण मुक्ति प्रदान करती है।

28 – ब्रह्म-खण्ड-फलश्रुति

ब्रह्मा जी आधिकारिक फलश्रुति की घोषणा करते हैं, जिसमें ब्रह्म खण्ड को भक्तिपूर्वक पढ़ने, सुनने या साझा करने से प्राप्त होने वाले दिव्य फल का विवरण दिया गया है। यह ग्रन्थ वचन देता है कि इस शास्त्र के साथ निष्ठापूर्वक जुड़ना आध्यात्मिक अज्ञान को दूर करता है, पितृ-दोषों को नष्ट करता है, पारिवारिक समृद्धि प्रदान करता है और वैकुण्ठ में शाश्वत वास सुनिश्चित करता है।

29 – उपसंहार-मङ्गलाचरण

ब्रह्म खण्ड ब्रह्मा जी, गरुड़ जी और सूत गोस्वामी जी द्वारा अर्पित एक गम्भीर उपसंहार और दिव्य मङ्गलाचरण के साथ सम्पन्न होता है। यह ग्रन्थ समस्त प्राणियों के लिए विश्व-शान्ति, आध्यात्मिक जागरण और शाश्वत कल्याण का आह्वान करता है, और प्रत्येक देहधारी जीव से भगवान् विष्णु के श्रीचरणों में शाश्वत शरण लेने की प्रार्थना करता है।

Read Garuda Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa in Hindi

ब्रह्म कांड – केवल अनुवाद