Read Brahma Vaivarta Purāṇa’s Brahma Khaṇḍa in Hindi

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ब्रह्म वैवर्त पुराण अष्टादश महापुराणों में एक परम पावन तथा भगवद्भक्ति रस से आप्लावित अलौकिक ग्रन्थ है। इसका प्रथम खण्ड ‘ब्रह्म खण्ड‘ के नाम से विख्यात है, जो परात्पर पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण की परम सत्ता, उनके दिव्य गोलोक धाम, प्रकृति एवं जगत् की सृष्टि तथा महर्षि नारद के पावन जीवन-चरित्र का विशद आख्यान प्रस्तुत करता है। इस खण्ड में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण को ही समस्त ब्रह्माण्डों का मूल कारण, सर्वान्तर्यामी तथा परम कल्याणकारी परमात्मा के रूप में महिमामण्डित किया गया है।

यह अनुक्रमणिका (विषय-सूची) ब्रह्म खण्ड के समस्त तीस अध्यायों के सारभूत आख्यान को क्रमबद्ध भक्ति-भावमयी धारा में समाहित करती है। नैमिषारण्य की पवित्र ऋषि-सभा से प्रारम्भ होकर यह दिव्य प्रसंग गोलोक के ऐश्वर्य, श्रीराधा-कृष्ण के अप्राकृत प्राकट्य, ब्रह्माण्डीय सृष्टिक्रम, गन्धर्व उपबर्हण (महर्षि नारद) के उद्धार तथा भगवान् शिव द्वारा दिए गए अनन्य भक्ति-ज्ञान के साथ पूर्णता प्राप्त करता है। इस पावन ग्रन्थ का भक्तिपूर्वक अनुशीलन साधक के हृदय को श्रीकृष्ण-चरणारविन्दों में लीन कर परम आध्यात्मिक शान्ति प्रदान करता है।

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ब्रह्म वैवर्त पुराण को निम्नानुसार व्यवस्थित किया गया है और इसलिए इस क्रम में पढ़ने का सुझाव दिया गया है:

  1. ब्रह्म खंड (वर्तमान पृष्ठ)
  2. प्रकृति खंड
  3. गणेश खंड
  4. श्री कृष्ण जनन खंड

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हर अध्याय का विवरण
ब्रह्म खंड – हर अध्याय का विवरण
ब्रह्म खंड – मूल श्लोक का हिंदी अनुवाद

ब्रह्मवैवर्त पुराण: ब्रह्म खण्ड — अनुक्रमणिका (विषय-सूची)

१ – नैमिषारण्य में मङ्गलाचरण एवं पवित्र ऋषि-सभा

नैमिषारण्य के परम पवित्र तपोवन में, जहाँ महान् ऋषियों एवं महर्षियों का समूह जगत् के आध्यात्मिक कल्याण हेतु दीर्घकालीन महायज्ञ के अनुष्ठान में लीन था, वहाँ परम पूज्य महर्षि शौनक अपने हृदय में अनन्य भक्ति-भाव भरकर श्रीसूत गोस्वामी जी के सम्मुख विनम्रतापूर्वक उपस्थित हुए। अगाध श्रद्धा एवं विनय के साथ महर्षि शौनक ने दिव्य कथावाचक श्रीसूत गोस्वामी जी से प्रार्थना की कि वे ब्रह्मवैवर्त पुराण के उस अलौकिक कथामृत का प्रकटीकरण करें, जो भगवान् श्रीकृष्ण के परम सत्य को प्रकाशित करता है तथा मुमुक्षु जीवों को परम मोक्ष प्रदान करता है। सूत गोस्वामी जी दिव्य प्रेमानन्द में निमग्न होकर इस अलौकिक आख्यान को प्रारम्भ करने से पूर्व परात्पर प्रभु श्रीहरि श्रीकृष्ण, भगवान् ब्रह्मा, जगज्जननी देवी सरस्वती तथा अपने पूज्य गुरुदेव महर्षि व्यासदेव के चरणों में भावपूर्ण साष्टाङ्ग प्रणाम अर्पित करते हैं। तत्पश्चात् वे वर्णन करते हैं कि किस प्रकार यह पवित्र पुराण सर्वप्रथम सर्वेश्वर श्रीहरि द्वारा ब्रह्मा जी को प्रकट किया गया था, जिन्होंने पुनः इसके शाश्वत प्रकाश को महर्षि नारद के हृदय में सञ्चारित किया। इस परम पावन कथा के श्रवण-प्रस्ताव से समस्त तपस्वियों की सभा अभूतपूर्व आध्यात्मिक उल्लास एवं दिव्य उत्सुकता से भर उठी।

२ – गोलोक धाम का दिव्य स्वरूप एवं श्रीहरि श्रीकृष्ण का परंब्रह्म रूप

भौतिक ब्रह्माण्डों के पार, समस्त स्वर्ग लोकों से अति उच्च तथा श्रीवैकुण्ठ धाम की सर्वोपरि महिमा से भी परे, परात्पर दिव्य गोलोक धाम विराजमान है, जो अनन्त स्वयंप्रकाशित ज्योति तथा असीम माधुर्य से निरन्तर देदीप्यमान रहता है। इस परम दिव्य धाम के केन्द्र में स्थित शतदल कमल के मध्य रत्नजटित सिंहासन पर जगन्नियन्ता सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण विराजमान हैं। उनका श्रीविग्रह नूतन जलधर के समान श्यामवर्ण तथा पीताम्बरधारी है। वे अनमोल मणियों, देदीप्यमान वनमाला तथा उस मन्त्रमुग्धकारी वेणु (बांसुरी) से सुशोभित हैं, जिसकी मधुर तान समस्त सृष्टि को सम्मोहित कर देती है। वे ही समस्त कारणों के अनादि कारण, समस्त जीवों के अन्तरात्मा, पूर्ण स्वतन्त्र, सर्वऐश्वर्यपूर्ण तथा दिव्य गऊओं, कल्पवृक्षों एवं मुक्त आत्माओं से नित्य घिरे हुए हैं, जो निरन्तर उनकी अमोल उपस्थिति के अमृत का पान करते हैं।

३ – श्रीहरि श्रीकृष्ण से ब्रह्माण्डीय सृष्टि का प्राकट्य एवं श्रीनारायण की स्तुति

जब परात्पर परमेश्वर श्रीकृष्ण ने अपनी नित्य लीला हेतु ब्रह्माण्डों के प्रकटीकरण की इच्छा की, तब उनके दिव्य श्रीविग्रह से एक अलौकिक स्वर्णिम ज्योति-पुञ्ज प्रसारित हुआ, जिसने अनन्त आकाश को दिव्य ऊर्जा से आप्लावित कर दिया। उनकी परम शक्ति से प्रकट हुए कारण-जल में से भगवान् श्रीनारायण का भव्य चतुर्भुज रूप प्रकट हुआ, जिन्होंने अपने तेजस्वी हाथों में शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण के अतुलनीय सौन्दर्य तथा असीम ऐश्वर्य का दर्शन कर भगवान् श्रीनारायण ने अगाध नम्रता के साथ अपने कर-कमल जोड़कर उनकी परम पावन स्तुति की। उन्होंने श्रीहरि श्रीकृष्ण को समस्त अवतारों के मूल स्रोत, काल के स्वामी तथा उस शाश्वत तत्त्व के रूप में महिमामण्डित किया, जिनसे समस्त ब्रह्माण्डीय तत्त्व, लोक-लोकान्तर एवं प्राणिमात्र अपना अस्तित्व प्राप्त करते हैं।

४ – कामदेव, रति तथा दिव्य पार्षदों का प्राकट्य

जैसे-जैसे सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की परम इच्छा के अनुसार ब्रह्माण्डीय विधान विकसित हुआ, परमेश्वर के दिव्य मानस से कामदेव का परम सम्मोहक रूप अपनी अद्वितीय सुन्दरी पत्नी रति के साथ प्रकट हुआ। भगवान् श्रीहरि ने कामदेव को दिव्य अनुराग के पञ्चपुष्प-बाण प्रदान किए तथा उन्हें समस्त भौतिक लोकों में आकर्षण, सृजन एवं प्राणिमात्र की निरन्तरता का मुख्य कार्य सौंपा। उसी क्षण सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह के दिव्य रोम-कूपों से सहस्रों देदीप्यमान दिव्य पार्षद, गन्धर्व तथा परम सुन्दरी देवाङ्गनाएँ प्रकट हुईं, जो अमर सौन्दर्य से सम्पन्न थीं तथा गोलोक के परम दिव्य दरबार की प्रेमाभक्ति एवं सेवा-श्रृङ्गार हेतु समर्पित थीं।

५ – श्रीराधा रानी का प्राकट्य एवं गोलोक की गोपियों-गोपों का अवतरण

भगवान् श्रीहरि श्रीकृष्ण के वामाङ्ग से एकाएक एक परम अद्भुत एवं अतुलनीय दिव्य शक्ति, भगवती श्रीराधा रानी प्रकट हुईं, जो गोलोक की शाश्वत स्वामिनी तथा परम दिव्य प्रेम की साक्षात् मूरति हैं। प्रकट होते ही जगज्जननी श्रीराधा जी ने अगाध अनुराग से सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की ओर निहारा तथा भक्तिपुष्प अर्पित करने हेतु उनके चरण-कमलों की ओर धावित हुईं। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने अभिन्न स्वरूप तथा अपनी नित्य आह्लादिनी शक्ति के रूप में हृदय से लगा लिया। उसी अलौकिक क्षण में श्रीराधा जी के श्रीविग्रह से करोड़ों देदीप्यमान गोपियाँ तथा सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के विग्रह से उतने ही गोप बालक प्रकट हुए, जिन्होंने गोलोक में यमुना जी के स्वर्ण-बालुका तटों तथा निकुञ्जों को नित्य हास्य, पवित्र संगीत एवं असीम रास-लीलाओं से परिपूर्ण कर दिया।

६ – देवगणों को दिव्य शक्तियों एवं देवियों का समर्पण

विस्तारित होते हुए ब्रह्माण्ड में प्रशासनिक दायित्वों के विभाजन की आवश्यकता को देखते हुए, सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ने मुख्य देवों को दिव्य शक्तियाँ एवं पत्नियाँ सप्रेम सौंपीं। भगवान् श्रीकृष्ण ने वैकुण्ठ की परम ऐश्वर्यमयी अधिष्ठात्री देवी, भगवती लक्ष्मी जी को भगवान् श्रीनारायण को सौंपा ताकि वे वैकुण्ठ धाम में नित्य निवास करें। उन्होंने ज्ञान, वाणी तथा पवित्र विद्या की साक्षात् प्रतिमूर्ति भगवती सरस्वती जी को ब्रह्मा जी को सौंपा, ताकि वे वैदिक ज्ञान तथा विविध रूपों के सृजन में सहायता कर सकें। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर ने भगवान् शिव, देवराज इन्द्र तथा अन्य देवगणों को विभिन्न ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ, कर्तव्य एवं लोक प्रदान किए, जिससे समस्त आध्यात्मिक एवं भौतिक जगतों में परम व्यवस्था, आध्यात्मिक क्रम तथा दिव्य सामञ्जस्य स्थापित हुआ।

७ – भौतिक ब्रह्माण्ड, सागरों तथा पर्वतों की रचना

सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष दिव्य सामर्थ्य तथा सृजनात्मक दृष्टि प्राप्त कर, चतुर्मुख ब्रह्मा जी गहन ध्यान में लीन हो गए और उन्होंने भौतिक ब्रह्माण्ड की जटिल रचना प्रारम्भ की। परम दिव्य आज्ञा से उत्पन्न पञ्चमहाभूतों तथा मौलिक शक्तियों से ब्रह्मा जी ने चौदह लोकों से युक्त एक विशाल ब्रह्माण्ड-अण्ड की रचना की, जिसमें सर्वोच्च सत्यलोक से लेकर अधोलोक (पाताल) तक सम्मिलित थे। उन्होंने विशाल महासागरों, सुमेरु तथा हिमालय जैसे महान् पर्वतराजों, पवित्र नदियों के प्रवाह, काल के विभागों तथा समस्त देहधारी जीवों के भौतिक शरीरों की स्थापना की, जिससे भौतिक सृष्टि, पालन एवं लय का शाश्वत चक्र गतिशील हो उठा।

८ – वेदों, मनुओं का प्राकट्य एवं नारद-ब्रह्मा संवाद

सृष्टि को ज्ञान तथा जीवन से अलङ्कृत करने के अपने पावन कर्तव्य को आगे बढ़ाते हुए ब्रह्मा जी ने अपने चार पवित्र मुखों से चार वेदों, वेदाङ्गों, पावन मन्त्रों तथा सदाचार के नियमों को प्रकट किया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने दिव्य मानस से मानव जाति के प्रजापतियों—मनुगणों, महर्षि दक्ष तथा अपने मानस पुत्र महर्षि नारद की सृष्टि की। किन्हीं कारणों से जब ब्रह्मा जी ने महर्षि नारद को गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर प्रजा-सृष्टि करने की आज्ञा दी, तब महर्षि नारद ने इसे नम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और केवल भगवान् श्रीकृष्ण की भक्ति-सेवा में अनन्य भाव से जीवनभर ब्रह्मचारी रहने का अपना दृढ़ सङ्कल्प व्यक्त किया। इस अस्वीकृति से ब्रह्मा जी के हृदय में तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच परस्पर शाप का एक नाटकीय प्रसङ्ग घटित हुआ। ब्रह्मा जी ने नारद जी को कामवासना में लिप्त होकर गन्धर्व रूप में भटकने का शाप दिया, जबकि महर्षि नारद ने ब्रह्मा जी को पृथ्वी लोक में मनुष्यों द्वारा व्यापक रूप से पूजित न होने का शाप दिया।

९ – दक्ष-पुत्रियों की सन्तति एवं जीवों का विस्तार

महर्षि नारद के वैराग्य के पश्चात् ब्रह्माण्ड को जीवों से परिपूर्ण करने के दिव्य विधान को पूरा करने के लिए, महर्षि दक्ष ने अपने तपोबल तथा मानसिक शक्तियों द्वारा साठ पतिव्रता कन्याओं को उत्पन्न किया। इन श्रेष्ठ कन्याओं का पावन विवाह महर्षि कश्यप, महर्षि धर्म, महर्षि चन्द्र तथा महर्षि अङ्गिरा जैसे महान् प्रजापति ऋषियों के साथ सम्पन्न हुआ। इन दिव्य विवाहों के परिणामस्वरूप भौतिक जगत् में विविध प्रकार के जीव उत्पन्न हुए, जिनमें देव, असुर, नाग, गन्धर्व, पक्षी, पशु, वृक्ष तथा मनुष्य सम्मिलित थे। इस प्रकार सर्वेश्वर भगवान् की अध्यक्षता में समस्त महाद्वीपों, सागरों तथा सूक्ष्म लोकों में जीवों का एक विशाल जाल फैल गया।

१० – वर्णसङ्कर जातियों की उत्पत्ति एवं सामाजिक कर्तव्य

सामाजिक व्यवस्था तथा नैतिक कर्तव्यों के मूलभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए यह अध्याय सर्वेश्वर भगवान् के विराट् रूप के मुख, बाहु, ऊरु (जंघा) तथा चरणों से उत्पन्न चार प्राथमिक वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—की दिव्य सृष्टि का वर्णन करता है। इसमें विभिन्न युगों में सामाजिक मर्यादाओं के विपरीत सम्मिश्रण से उत्पन्न विभिन्न वर्णसङ्कर जातियों की उत्पत्ति का विस्तृत विवरण दिया गया है। ग्रन्थ में प्रत्येक वर्ग के लिए निर्धारित विशिष्ट नैतिक कर्तव्यों, धर्मसम्मत जीविकाओं, आचार-संहिताओं तथा आध्यात्मिक साधनाओं की व्याख्या की गई है, और यह बल दिया गया है कि जन्म चाहे किसी भी कुल में हुआ हो, सत्य, पवित्रता, अहिंसा और भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति ही मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता की कसौटी है।

११ – अश्विन कुमारों का उद्धार एवं ब्राह्मणों की महिमा

यह प्रेरणादायी अध्याय दिव्य वैद्य-युगल अश्विन कुमारों के पावन इतिहास का वर्णन करता है, जो एक प्राचीन शाप के कारण यज्ञ-भाग प्राप्त करने के अपने अधिकार से वञ्चित हो गए थे। अपने निष्कपट पश्चात्ताप, पवित्र ऋषियों की निष्काम सेवा तथा परम भक्तों की कृपामयी मध्यस्थता से अश्विन कुमारों ने पूर्ण पवित्रता प्राप्त की और अपने उच्च दिव्य पद को पुनः प्राप्त किया। तत्पश्चात् कथा वास्तविक वैष्णव ब्राह्मणों की अतुलनीय पवित्रता, आध्यात्मिक तपोबल एवं दिव्य महिमा के भावपूर्ण गान में परिवर्तित हो जाती है, जिनकी निष्कपट प्रार्थनाएँ, कठोर तपस्या तथा भगवान् श्रीकृष्ण के नाम का निरन्तर कीर्तन तीनों लोकों को पवित्र करने और परम मोक्ष प्रदान करने की सामर्थ्य रखता है।

१२ – गन्धर्व उपबर्हण के रूप में नारद जी का पूर्वजन्म

अपने पिता ब्रह्मा जी द्वारा दिए गए शाप को स्वीकार करते हुए, महान् ऋषि महर्षि नारद जी ने देवलोक में उपबर्हण नामक अत्यन्त रूपवान् गन्धर्व के रूप में जन्म लिया। अद्वितीय शारीरिक सौन्दर्य, अपार समृद्धि तथा संगीत विद्या में असाधारण निपुणता से सम्पन्न होकर उपबर्हण दिव्य सुखों का भोग करने लगे। वे अपनी परम पतिव्रता एवं गुणी पत्नी मालती के नेतृत्व में पचास सुन्दरी पत्नियों से घिरे रहते थे। वे देवों की दिव्य सभाओं में अपनी मधुर गायकी तथा वीणा-वादन से सभी को मन्त्रमुग्ध करते थे, किन्तु उनके इस सांसारिक भोग के पीछे परम आध्यात्मिक भक्ति का सुप्त बीज विद्यमान था, जो भगवत्कृपा से जागृत होने की प्रतीक्षा कर रहा था।

१३ – उपबर्हण की मृत्यु एवं मालती का कारुणिक विलाप

भगवान् श्रीहरि के गुणगान हेतु ब्रह्मा जी द्वारा आयोजित एक महान् दिव्य सभा में, गन्धर्व उपबर्हण देवाङ्गनाओं के मनमोहक नृत्य से विचलित हो गए और अपना भक्ति-ध्यान खो बैठे, जिससे उनसे एक भारी आध्यात्मिक अपराध हो गया। एक पवित्र अनुष्ठान के दौरान भक्ति-भावना के इस विचलन से क्रुद्ध होकर ब्रह्मा जी ने उपबर्हण को तत्क्षण मृत्यु को प्राप्त होने का शाप दे दिया, जिससे उनके प्राण पखेरू तुरंत उड़ गए। अपने प्राणप्रिय पति को पृथ्वी पर निश्चेष्ट पड़ा देखकर उनकी पतिव्रता पत्नी मालती अगाध शोक में डूब गई। वह करुण विलाप करने लगी और उसने चेतावनी दी कि यदि उसके पति को पुनः जीवित न किया गया तो वह अपने पातिव्रत्य तेज की प्रचण्ड अग्नि से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भस्म कर देगी।

१४ – बाल-ब्राह्मण रूप में श्रीविष्णु का प्राकट्य

मृत उपबर्हण के शरीर के पास बैठी मालती के अगाध दुःख एवं उसके निष्कंप पातिव्रत्य से द्रवित होकर, सर्वेश्वर भगवान् श्रीविष्णु ने एक तेजस्वी बालक ब्राह्मण का रूप धारण किया और वन में उसके समीप आए। गहन आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण मधुर वचनों द्वारा उस दिव्य बालक ने मालती को सांसारिक सम्बन्धों की क्षणभङ्गुरता, देहधारियों के लिए मृत्यु की अनिवार्यता तथा कर्म के अमिट विधान की व्याख्या करते हुए उसके शोकाकुल हृदय को सान्त्वना दी। उन्होंने मालती को नश्वर मोह से परे देखने और सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत, अविनाशी आश्रय में पूर्ण विश्वास रखने का उपदेश दिया, जो ही प्रत्येक जीव के सच्चे अन्तरात्मा एवं नित्य संगी हैं।

१५ – मालती एवं कालपुरुष संवाद

निराशा के सम्मुख समर्पण न करते हुए, दृढ़निश्चयी मालती ने कालपुरुष (मृत्यु एवं समय के देवता) के साथ एक नाटकीय संवाद किया, जो उपबर्हण की आत्मा को ले जाने हेतु उपस्थित हुए थे। अपनी निष्ठावान् भक्ति एवं पातिव्रत्य से अर्जित प्रचण्ड आध्यात्मिक ऊर्जा से युक्त होकर मालती ने स्वयं मृत्यु के अधिकार को चुनौती दी और यह सिद्ध किया कि एक समर्पित पत्नी का तपोबल ब्रह्माण्डीय विधानों द्वारा लिखे गए भाग्य को भी बदल सकता है। इस उग्र संवाद के दौरान दिव्य ब्राह्मण बालक मालती के रक्षक के रूप में उपस्थित रहे, जिससे यह प्रमाणित हुआ कि जब कोई जीव सर्वेश्वर भगवान् की शरण ले लेता है, तो काल की दुर्दम्य शक्ति को भी रुकना पड़ता है और भगवत्कृपा के सम्मुख झुकना पड़ता है।

१६ – दिव्य ब्राह्मण बालक द्वारा आयुर्वेद का उपदेश

देहधारी जीवों के कष्टों का निवारण करने तथा स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा के व्यावहारिक उपायों को दर्शाने के लिए, उस दिव्य ब्राह्मण बालक ने मालती को आयुर्वेद की सम्पूर्ण विद्या का रहस्य प्रदान किया, जो चिकित्सा का पवित्र वैदिक शास्त्र है। उन्होंने शारीरिक त्रिदोषों के असन्तुलन पर आधारित रोगों के निदान, दिव्य जड़ी-बूटियों एवं मूलों के औषधीय गुणों, जीवनदायी रसायनों के निर्माण तथा पवित्र मन्त्रों के जप द्वारा आध्यात्मिक उपचार का विस्तृत वर्णन किया। इस विशद उपदेश ने यह स्पष्ट किया कि शारीरिक आरोग्य तथा दीर्घायु का मूल उद्देश्य धर्म-पालन, निष्काम सेवा एवं भगवान् श्रीकृष्ण की परम भक्ति का साधन बनना है।

१७ – भगवान् ब्रह्मा का आगमन एवं श्रीविष्णु की पहचान

जैसे ही वह दिव्य उपदेश पूर्ण हुआ, भगवान् ब्रह्मा उस निर्जन वन में उपस्थित हुए और उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि वह साधारण ब्राह्मण बालक कोई और नहीं, अपितु स्वयं सर्वेश्वर भगवान् श्रीविष्णु हैं जो इस रूप में गुप्त रूप से उपस्थित थे। अपने पूर्व के क्रोध और उसके कारण उपबर्हण की मृत्यु पर अत्यधिक पश्चात्ताप एवं नम्रता से भरकर ब्रह्मा जी भगवान् के चरण-कमलों में साष्टाङ्ग प्रणाम कर गिर पड़े। उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान् की स्तुति की और अपने देव-अहङ्कार के लिए क्षमा माँगी। सर्वेश्वर श्रीविष्णु ने ब्रह्मा जी की प्रार्थनाओं को सहर्ष स्वीकार किया और उन्हें स्मरण कराया कि करुणा एवं क्षमा ही किसी भी ब्रह्माण्डीय प्रशासक का सर्वोच्च गुण है, तथा परमेश्वर की इच्छा के आगे नम्र समर्पण में ही वास्तविक महानता है।

१८ – उपबर्हण का पुनर्जीवन एवं मालती द्वारा स्तुति

सर्वेश्वर भगवान् श्रीविष्णु की परम आज्ञा तथा पावन आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग से उपबर्हण के प्राण उनके निष्प्राण शरीर में पुनः सञ्चारित हो गए, जिससे वे इस प्रकार जाग उठे मानो किसी गहरी नींद से सोकर उठे हों। अतिशय आनन्द तथा अगाध कृतज्ञता से भरकर मालती और उनके पुनर्जीवित पति ने परमेश्वर के चरणों में वन्दना की और उनकी असीम करुणा, सर्वशक्तिमत्ता तथा भक्तों के प्रति अनन्य प्रेम का यशोगान करने वाले दिव्य स्तवराज का पाठ किया। पुनर्जीवन प्रदान करने तथा आध्यात्मिक बोध कराने के अपने दिव्य कार्य को पूर्ण करके सर्वेश्वर भगवान् श्रीविष्णु ने उस दम्पति को दीर्घायु, आध्यात्मिक समृद्धि एवं परम मोक्ष का वरदान दिया और तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए।

१९ – पवित्र कवच, शिवकवच एवं शिवस्त्वराज

इस परम आध्यात्मिक अध्याय में ग्रन्थ श्रीकृष्णकवच तथा शिवकवच जैसे परम गुप्त आध्यात्मिक आवरणों (कवचों) का प्रकटीकरण करता है, साथ ही शिवस्त्वराज नामक परम पावन स्तोत्र का रहस्य उद्घाटित करता है। दिव्य मन्त्रों तथा अलौकिक तरङ्गों से निर्मित ये पवित्र रचनाएँ पूर्ण श्रद्धा के साथ पाठ या धारण करने वाले भक्त को नकारात्मक शक्तियों, आसुरी बाधाओं, मानसिक चिन्ताओं तथा शारीरिक संकटों से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करती हैं। भगवान् शिव ने स्पष्ट किया कि ये पवित्र कवच दिव्य ज्योति के अभेद्य ढाल के रूप में कार्य करते हैं, जो सूक्ष्म शरीर को पवित्र करते हैं, समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्रदान करते हैं तथा अन्ततः भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत धाम की प्राप्ति सुनिश्चित करते हैं।

२० – गोप-कुल में उपबर्हण का पुनर्जन्म

अपने सांसारिक प्रारब्ध के चक्र तथा अपने अन्तिम आध्यात्मिक मिशन हेतु भगवद्विधान के अनुसार, गन्धर्व उपबर्हण ने अन्ततः अपने दिव्य शरीर का त्याग किया और पृथ्वी पर एक पवित्र गोप-परिवार में जन्म लिया। परम पतिव्रता गोपी कलावती तथा उनके श्रेष्ठ पति के तेजस्वी पुत्र के रूप में अवतरित होकर बालक ने अपने बाल्यकाल से ही अद्भुत दिव्य लक्षणों, सौम्य स्वभाव तथा आध्यात्मिक लीनता के स्पष्ट सङ्केत प्रदर्शित किए। यह धरा-अवतरण एक महत्त्वपूर्ण सन्धिकाल सिद्ध हुआ, जहाँ उनके गन्धर्व-शरीर के अन्तिम सांसारिक आसक्ति-संस्कार पूर्णतः नष्ट हो गए और ब्रह्माण्ड के अमर वैरागी महर्षि के रूप में उनके अन्तिम रूपान्तरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

२१ – महर्षि नारद का शाप से पूर्ण मोक्ष एवं अमरत्व की प्राप्ति

जैसे-जैसे वह बालक गोप-बस्ती के पवित्र वातावरण में बड़ा हुआ, उसने वहाँ आने वाले साधु-सन्तों तथा शुद्ध वैष्णवों का सङ्ग किया और भगवान् श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं के मधुर प्रसङ्गों को परम श्रद्धा से सुना। उन संतों के कृपामय मार्गदर्शन, गहन ध्यान तथा सर्वेश्वर के चरण-कमलों में अनन्य भक्ति के द्वारा ब्रह्मा जी के प्राचीन शाप के अन्तिम अवशेष भी शुद्ध भक्ति की अग्नि में सर्वथा भस्म हो गए। नश्वर शरीर तथा भौतिक सीमाओं से परे उठकर वे अमर, दिव्य महर्षि नारद के रूप में प्रकट हुए। अपनी महती नामक दिव्य वीणा को हाथों में धारण कर वे भगवान् श्रीकृष्ण के पावन नामों का कीर्तन करते हुए तीनों लोकों में स्वच्छन्द रूप से विचरण करने लगे।

२२ – ब्रह्मा जी के पुत्रों के नामों की व्युत्पत्ति एवं अर्थ

महर्षि नारद की आध्यात्मिक पूर्णता से अत्यधिक प्रसन्न होकर, यह ग्रन्थ ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों के नामों की पावन व्युत्पत्ति तथा गूढ़ आध्यात्मिक अर्थों की गम्भीर दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह स्पष्ट करता है कि सनक, सनातन, सनन्दन, सनत्कुमार और नारद जैसे नाम केवल सांसारिक नामकरण नहीं हैं, अपितु वे पवित्र शब्द-ब्रह्म हैं जो शाश्वत सत्य, परम ज्ञान, अगाध वैराग्य तथा मानवता को दिव्य ज्ञान प्रदान करने की सामर्थ्य रखते हैं। विशेष रूप से, ‘नारद’ नाम का अर्थ उस दिव्य पुरुष के रूप में किया गया है जो भक्ति-रूपी पावन जल और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करके सांसारिक ताप की दावानल को शान्त करता है।

२३ – नारद जी द्वारा तपस्या की अनुमति एवं पितृ-आज्ञा

सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में अपने ध्यान को और गहरा करने की तीव्र आध्यात्मिक उत्कण्ठा से भरकर, महर्षि नारद ने अपने पिता ब्रह्मा जी के सम्मुख हाथ जोड़कर परम आदरपूर्वक निवेदन किया। उन्होंने सांसारिक दायित्वों से निवृत्त होकर पवित्र पर्वतीय आश्रमों के एकान्त में जाकर कठोर तपस्या तथा अविच्छिन्न ध्यान लगाने की अनुमति माँगी। ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र के निष्काम वैराग्य एवं परम भक्ति-भाव को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उन्हें आशीर्वाद दिया, और परम सत्य की खोज की उनकी दृढ इच्छा की प्रशंसा करते हुए उन्हें ब्रह्माण्ड के श्रेष्ठ गुरुओं से दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया।

२४ – गृहस्थ धर्म एवं व्यावहारिक जीवन पर ब्रह्मा जी का उपदेश

महर्षि नारद के प्रस्थान से पूर्व, ब्रह्मा जी ने गार्हस्थ्य धर्म (पवित्र गृहस्थ आश्रम) के परम गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों का प्रतिपादन करते हुए एक अद्भुत उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि जो गृहस्थ निष्काम भाव से अपने नित्य कर्तव्यों का पालन करता है, अतिथियों का उदारतापूर्वक सत्कार करता है, सत्य बोलता है, धर्म के मार्ग पर चलता है तथा अपने समस्त कर्मों के फल सर्वेश्वर श्रीकृष्ण को समर्पित कर देता है, वह संन्यासियों के समान ही परम आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करता है। ब्रह्मा जी ने इस बात पर बल दिया कि भौतिक जगत् आध्यात्मिक शिक्षा की एक गतिशील कर्मभूमि है, जहाँ प्रत्येक कर्तव्य यदि आसक्ति-रहित होकर किया जाए तो वह सीधे परमेश्वर की पूजा बन जाता है।

२५ – नारद जी की कैलाश यात्रा एवं भगवान् शिव से भेंट

अपने पिता से आशीर्वाद प्राप्त कर, महर्षि नारद रमणीय पर्वत-श्रृङ्खलाओं, दिव्य नदियों तथा पवित्र वनों को पार करते हुए भगवान् शिव के परम पावन, हिममण्डित कैलाश शिखर पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने योगिराज भगवान् शिव को कल्पवृक्ष के नीचे व्याघ्रचर्म पर शान्त मुद्रा में विराजमान देखा। उनका तेजस्वी श्रीविग्रह भस्म से विभूषित था तथा उनके मस्तक पर बालचन्द्र और पतितपावनी गङ्गा जी सुशोभित थीं। अगाध भक्ति और अलौकिक आनन्द से भरकर महर्षि नारद ने भगवान् शिव के चरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया, उनका हृदयस्पर्शी स्तवन किया और उनसे भगवान् श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति के सर्वोच्च रहस्यों की शिक्षा देने की प्रार्थना की।

२६ – नित्य पूजा-विधान एवं आचार-शुद्धि पर शिवजी का उपदेश

महर्षि नारद का अगाध स्नेह से स्वागत करते हुए, भगवान् शिव ने दैनिक आध्यात्मिक दिनचर्या तथा शास्त्रीय भगवद्-अर्चन की विस्तृत विधि का उपदेश देना प्रारम्भ किया। उन्होंने शुभ ब्रह्ममुहूर्त में जागरण से लेकर आन्तरिक शुद्धि, प्रातःकालीन शौच-स्नान, पावन मन्त्रों का मौन जप तथा बाह्य पवित्रता की पूरी प्रक्रिया बताई। तत्पश्चात् भगवान् शिव ने वेदी की स्थापना, सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के दिव्य विग्रह का ध्यान तथा षोडशोपचार (सोलह सामग्रियों) से सप्रेम, आदरपूर्वक एवं अनन्य मन से पूजन करने की सूक्ष्म विधि प्रकट की।

२७ – भक्तों के लिए आहार-शुद्धि एवं आचार-संहिता

आध्यात्मिक साधना के मार्ग का और अधिक विस्तार करते हुए, भगवान् शिव ने आहार-शुद्धि तथा व्यक्तिगत आचार-विचार के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश प्रदान किए। उन्होंने समझाया कि मनुष्य के मन की पवित्रता सीधे उसके द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन की पवित्रता पर निर्भर करती है। उन्होंने खाद्य पदार्थों का वर्गीकरण करते हुए सात्विक, ताज़े एवं वानस्पतिक भोजन की प्रशंसा की, जिसे पहले भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित कर प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है। साथ ही उन्होंने अशुद्ध, तामसिक तथा उत्तेजक पदार्थों का पूर्ण निषेध किया जो इन्द्रियों को विचलित करते हैं तथा आध्यात्मिक बुद्धि को ढँक देते हैं। भगवान् शिव ने बल देकर कहा कि एक सच्चे भक्त को सदैव मधुर वाणी, अहिंसा, नम्रता, सत्यता तथा प्राणिमात्र के प्रति निष्कपट करुणा का पालन करना चाहिए।

२८ – ब्रह्म, वैकुण्ठ तथा परम गोलोक धाम का रहस्य-उद्घाटन

इस परम अलौकिक तत्त्व-ज्ञान के प्रसङ्ग में, भगवान् शिव ने महर्षि नारद के सम्मुख ब्रह्माण्डीय तथा दिव्यातीत यथार्थ की सर्वोच्च संरचना का अनावरण किया और आध्यात्मिक अनुभूति के विभिन्न स्तरों को स्पष्ट किया। उन्होंने निराकार ‘ब्रह्म’ का वर्णन सर्वेश्वर भगवान् के श्रीविग्रह से निकलने वाली दिव्य ज्योति-प्रभा के रूप में किया, जिसका अनुभव ज्ञानी एवं तपस्वी करते हैं। तत्पश्चात् उन्होंने भव्य वैकुण्ठ लोकों का वर्णन किया जहाँ भगवान् श्रीनारायण परम ऐश्वर्य के साथ शासन करते हैं। इसके बाद उन्होंने यह रहस्य उद्घाटित किया कि सर्वोपरि, परम गोपनीय तथा सर्वोच्च गन्तव्य तो ‘गोलोक वृन्दावन’ है, जहाँ सर्वेश्वर श्रीकृष्ण अपनी आह्लादिनी शक्ति भगवती श्रीराधा रानी के साथ अतुलनीय दिव्य प्रेम की नित्य रास-लीलाओं का रसास्वादन करते हैं।

२९ – सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के विषय में नारद जी की जिज्ञासाएँ

भगवान् शिव के इस दिव्य तत्त्व-ज्ञान से भावविभोर होकर महर्षि नारद ने अपना हृदय खोल दिया और सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के परम स्वरूप, नित्य गुणों तथा मुख्य मन्त्रों के सम्बन्ध में अत्यन्त गोपनीय प्रश्न पूछे। उन्होंने परम दशाक्षरी/अष्टादशाक्षरी मन्त्र के गुप्त अर्थ, सद्गुरु से दीक्षा ग्रहण करने की प्रामाणिक विधि, भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करने के साधन तथा गोलोक की नित्य लीलाओं में प्रवेश हेतु आवश्यक आन्तरिक भाव (गोपी-भाव) के विषय में जिज्ञासा व्यक्त की। महर्षि नारद की इन नम्र जिज्ञासाओं ने जगत् कल्याण हेतु भगवान् शिव द्वारा वैष्णव तत्त्वज्ञान के अनमोल मणियों को प्रकट करने के लिए एक दिव्य निमित्त का कार्य किया।

३० – श्रीकृष्णाष्टक/स्त्वराज एवं ब्रह्म खण्ड का समापन

इस अलौकिक ग्रन्थ के शिखर पर पहुँचकर, भगवान् शिव ने भगवान् श्रीकृष्ण के उस परम पावन स्तवराज का पाठ किया, जो उन्हें परात्पर ब्रह्म, समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी, प्रकृति के ईश्वर तथा करुणा के अपार सिन्धु के रूप में महिमामण्डित करता है। भगवान् शिव ने घोषणा की कि इस परम पवित्र ‘ब्रह्म खण्ड’ का निष्कपट श्रद्धा से श्रवण, पठन अथवा ध्यान करने से अनेक जन्मों के सञ्चित पाप भस्म हो जाते हैं, इस लोक में नैतिक निष्ठा, आरोग्य एवं आध्यात्मिक विवेक की प्राप्ति होती है तथा अन्ततः भगवान् श्रीकृष्ण के शाश्वत गोलोक धाम में नित्य निवास प्राप्त होता है। इस भव्य स्तुति एवं मंगल-आशीर्वाद के साथ ब्रह्मवैवर्त पुराण का यह प्रथम ‘ब्रह्म खण्ड’ दिव्य प्रेम के अमर अमृत में पाठकों को निमग्न करता हुआ परम गरिमामय रूप से पूर्ण होता है।

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ब्रह्म वैवर्त पुराण को निम्नानुसार व्यवस्थित किया गया है और इसलिए इस क्रम में पढ़ने का सुझाव दिया गया है:

  1. ब्रह्म खंड (वर्तमान पृष्ठ)
  2. प्रकृति खंड
  3. गणेश खंड
  4. श्री कृष्ण जनन खंड

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हर अध्याय का विवरण
ब्रह्म खंड – हर अध्याय का विवरण
ब्रह्म खंड – मूल श्लोक का हिंदी अनुवाद
Published: August 3, 2026·Updated: August 6, 2026