Read Varāha Purāṇa in Hindi

सनातन धर्म के अष्टादश महापुराणों में श्रीवराहपुराण का स्थान अत्यंत महिमामण्डित और पावन है। इस दिव्य ग्रन्थ में स्वयं श्रीहरि के तृतीय अवतार भगवान श्रीवराह तथा धरणीदेवी (माता पृथ्वी) के मध्य हुआ अमृतमयी संवाद मुख्य आधार है, जिसे नैमिषारण्य के पवित्र क्षेत्र में परम ज्ञानी सूत जी ने शौनकादि ऋषियों के समक्ष प्रस्तुत किया। सम्पूर्ण वराहपुराण में पारम्परिक रूप से चौबीस सहस्र (२४,०००) श्लोकों का संग्रह माना जाता है, जो सृष्टि-रचना, धर्म-आचरण, विविध व्रत, तीर्थ-माहात्म्य और मोक्ष-साधना जैसे गूढ़ विषयों का अनुपम समन्वय करता है। यह पुराण मुख्य रूप से पूर्वभाग और उत्तरभाग में वर्गीकृत है, जिसमें पूर्वभाग के अंतर्गत प्राथमिक सृष्टि, विभिन्न देवों और शक्तियों का प्राकट्य, दशावतार-सम्बन्धी द्वादशी व्रत, पितृ-तर्पण, तथा सदाचार का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। संवाद शैली में निबद्ध यह पावन ग्रन्थ जिज्ञासु आत्मा को व्यावहारिक धर्म से जोड़ते हुए परम पद की प्राप्ति का सुगम मार्ग प्रदर्शित करता है।

श्रीवराहपुराण के मूल प्रतिपाद्य विषयों में अखिल ब्रह्माण्ड नायक भगवान श्रीनारायण की अनन्य भक्ति और शरणागति सर्वोपरि है। इस ग्रन्थ में जगत् की सृष्टि, स्थिति और लय के ऐतिहासिक चक्र का प्रामाणिक विवेचन करते हुए जीव के कल्याणार्थ स्वधर्म-पालन, परोपकार और सत्य-निष्ठा को मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन घोषित किया गया है। इसके साथ ही विभिन्न द्वादशी व्रतों का विस्तृत विधान, पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध-कर्म की शास्त्रीय विधि, माता दुर्गा और मातृगणों की दिव्य महिमा, देवाधिदेव महादेव तथा अन्य देवताओं के प्राकट्य की ऐतिहासिक घटनाएं इस पुराण के प्रमुख आयाम हैं। तीर्थों की पावनता, सदाचार के नियम, पाप-पुण्य का विवेचन और नाम-संकीर्तन के प्रभाव से मनुष्य किस प्रकार भवसागर से मुक्त होकर परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त होता है, यही इस दिव्य पुराण का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।

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हर अध्याय का विवरण
सरल वचन

हर अध्याय का विवरण

सनातन धर्म के अष्टादश महापुराणों में श्रीवराहपुराण का स्थान अत्यंत महिमामण्डित और पावन है। इस दिव्य ग्रन्थ में स्वयं श्रीहरि के तृतीय अवतार भगवान श्रीवराह तथा धरणीदेवी (माता पृथ्वी) के मध्य हुआ अमृतमयी संवाद मुख्य आधार है, जिसे नैमिषारण्य के पवित्र क्षेत्र में परम ज्ञानी सूत जी ने शौनकादि ऋषियों के समक्ष प्रस्तुत किया। सम्पूर्ण वराहपुराण में पारम्परिक रूप से चौबीस सहस्र (२४,०००) श्लोकों का संग्रह माना जाता है, जो सृष्टि-रचना, धर्म-आचरण, विविध व्रत, तीर्थ-माहात्म्य और मोक्ष-साधना जैसे गूढ़ विषयों का अनुपम समन्वय करता है। यह पुराण मुख्य रूप से पूर्वभाग और उत्तरभाग में वर्गीकृत है, जिसमें पूर्वभाग के अंतर्गत प्राथमिक सृष्टि, विभिन्न देवों और शक्तियों का प्राकट्य, दशावतार-सम्बन्धी द्वादशी व्रत, पितृ-तर्पण, तथा सदाचार का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। संवाद शैली में निबद्ध यह पावन ग्रन्थ जिज्ञासु आत्मा को व्यावहारिक धर्म से जोड़ते हुए परम पद की प्राप्ति का सुगम मार्ग प्रदर्शित करता है।

श्रीवराहपुराण के मूल प्रतिपाद्य विषयों में अखिल ब्रह्माण्ड नायक भगवान श्रीनारायण की अनन्य भक्ति और शरणागति सर्वोपरि है। इस ग्रन्थ में जगत् की सृष्टि, स्थिति और लय के ऐतिहासिक चक्र का प्रामाणिक विवेचन करते हुए जीव के कल्याणार्थ स्वधर्म-पालन, परोपकार और सत्य-निष्ठा को मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन घोषित किया गया है। इसके साथ ही विभिन्न द्वादशी व्रतों का विस्तृत विधान, पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध-कर्म की शास्त्रीय विधि, माता दुर्गा और मातृगणों की दिव्य महिमा, देवाधिदेव महादेव तथा अन्य देवताओं के प्राकट्य की ऐतिहासिक घटनाएं इस पुराण के प्रमुख आयाम हैं। तीर्थों की पावनता, सदाचार के नियम, पाप-पुण्य का विवेचन और नाम-संकीर्तन के प्रभाव से मनुष्य किस प्रकार भवसागर से मुक्त होकर परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त होता है, यही इस दिव्य पुराण का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश है।

अध्याय १ – मङ्गलाचरण एवं पृथ्वी का प्रश्न

प्रलयकाल के अथाह जल-प्लावन में जब दैत्यराज हिरण्याक्ष द्वारा पृथ्वी को रसातल में छिपा दिया गया था, तब भगवान श्रीहरि ने सम्पूर्ण सृष्टि के कल्याणार्थ दिव्य महावराह रूप धारण करके महासागर से माता पृथ्वी का उद्धार किया और उन्हें सुदृढ़ आधार पर स्थापित किया। मेरु पर्वत के शिखर पर विराजमान होकर परम प्रसन्न माता धरणी ने करबद्ध होकर त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीवराह की स्तुति की तथा संसार के समस्त जीवों के उद्धार, सृष्टि के प्रादुर्भाव, पालन और मुक्ति के परम साधन विषयक गूढ़ प्रश्न पूछे, जिसके उत्तर में करुणामय प्रभु ने इस दिव्य ज्ञानमयी संवाद का प्रारम्भ किया।

अध्याय २ – प्राथमिक सृष्टि-वर्णन

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को सृष्टि के आदि काल का वर्णन करते हुए बतलाया कि किस प्रकार अव्यक्त परब्रह्म से प्रकृति और सत्त्व, रज, तम—इन तीनों गुणों का प्राकट्य हुआ। तदनन्तर महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्च तन्मात्राएँ और पञ्च महाभूत उत्पन्न हुए तथा परमपिता ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ जिन्होंने समस्त लोकों, चराचर प्राणियों, प्रजापतियों और मनुष्यों की रचना करके सृष्टि के सनातन चक्र को सुव्यवस्थित गति प्रदान की।

अध्याय ३ – देवर्षि नारद का प्राकट्य

ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से परम भागवत देवर्षि नारद का दिव्य प्राकट्य हुआ, जिन्होंने जन्म लेते ही संसार के भौतिक बन्धनों से विरक्त होकर भगवान श्रीनारायण के अनन्य ध्यान और नाम-संकीर्तन को ही अपना जीवन समर्पित किया। नारद जी ने स्वायम्भुव मनु के तेजस्वी पुत्र राजा प्रियव्रत को अपने पूर्वजन्म का वृत्तान्त और भगवती सावित्री से प्राप्त ज्ञान का उपदेश देकर निष्काम भक्ति और आत्म-साक्षात्कार के पावन मार्ग पर आरूढ़ किया।

अध्याय ४ – श्रीनारायण की महिमा तथा राजा अश्वशिरा का आख्यान

भगवान श्रीवराह ने सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान भगवान श्रीनारायण के परम ऐश्वर्य का गुणगान करते हुए धर्मात्मा राजा अश्वशिरा का ऐतिहासिक चरित्र सुनाया। राजा अश्वशिरा ने महर्षि कपिल और जैगीषव्य के दिव्य सत्संग से यह साक्षात् अनुभव किया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल एक ही परम प्रभु श्रीहरि व्याप्त हैं, और राजा ने अपने समस्त कर्मों को भगवान के चरणों में समर्पित करके परम सिद्धि प्राप्त की।

अध्याय ५ – स्वधर्म-पालन तथा राजा वसु का आख्यान

इस अध्याय में राजा उपरिचर वसु के जीवन के माध्यम से यह पावन शिक्षा दी गई है कि अपने वर्णाश्रम और स्वधर्म का निष्ठापूर्वक पालन करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। राजा वसु ने समस्त यज्ञों और राजधर्म का पालन करते हुए अहिंसा और सत्य को धारण किया, जिसके फलस्वरूप प्रभु की असीम कृपा से उन्हें समस्त भौतिक और आध्यात्मिक बन्धनों से मुक्ति प्राप्त हुई।

अध्याय ६ – पुण्डरीकाक्ष स्तोत्र एवं मोक्ष-प्राप्ति

भगवान श्रीवराह ने राजा वसु द्वारा रचित और उच्चारित परम पावन पुण्डरीकाक्ष स्तोत्र की अनुपम महिमा का निरूपण किया। इस दिव्य स्तोत्र के नित्य पाठ और कमलनयन भगवान श्रीहरि के ध्यान से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के संचित पापों का क्षणमात्र में क्षय हो जाता है और वह परम शान्ति को प्राप्त होकर भगवान के नित्य धाम में स्थान प्राप्त करता है।

अध्याय ७ – गदाधर स्तोत्र तथा महर्षि रैभ्य की मुक्ति

पवित्र गया तीर्थ में महर्षि रैभ्य द्वारा की गई कठोर तपस्या और उनके द्वारा उच्चारित गदाधर स्तोत्र का दिव्य वर्णन इस अध्याय में किया गया है। महर्षि रैभ्य की अनन्य भक्ति से संतुष्ट होकर भगवान गदाधर ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए और इस स्तोत्र के प्रभाव से महर्षि रैभ्य ने भवबन्धन से छूटकर परम मोक्ष की प्राप्ति की।

अध्याय ८ – धर्मव्याध का जीवन-चरित्र

मिथिला नगरी में निवास करने वाले परम धर्मपरायण धर्मव्याध का पावन चरित्र यहाँ वर्णित है, जो अपने माता-पिता की अनन्य सेवा और गृहस्थ धर्म का यथार्थ पालन करके आत्मज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा था। धर्मव्याध ने महर्षि मातङ्ग के समक्ष सत्य, दया, अहिंसा और कर्तव्य-निष्ठा का मर्म प्रकट करते हुए प्रमाणित किया कि बाह्य कर्म की अपेक्षा अंतःकरण की शुद्धि और समर्पण ही धर्म का वास्तविक प्राण है।

अध्याय ९ – मत्स्य अवतार का दिव्य वर्णन

सृष्टि के प्रलयकाल में धर्म और वेदों की रक्षा हेतु भगवान श्रीनारायण ने विशाल स्वर्णिम मत्स्य रूप में अवतार धारण किया। प्रभु ने राजा सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) तथा सप्तऋषियों को नौका में सुरक्षित बैठाकर प्रलय के अथाह जल में उनका मार्गदर्शन किया और वेदों का उद्धार करके सृष्टि के नवनिर्माण की पृष्ठभूमि तैयार की।

अध्याय १० – राजा दुर्जय की उत्पत्ति और चरित्र

राजा सुप्रतीक के तेजस्वी पुत्र राजा दुर्जय की उत्पत्ति, उनके पराक्रम और उनके राज्य-शासन का विशद वर्णन इस अध्याय में हुआ है। राजा दुर्जय ने समस्त दिशाओं को जीतकर धर्मपूर्वक राज्य का विस्तार किया और कालान्तर में वे पुण्य तीर्थों और ऋषियों के आश्रमों का दर्शन करते हुए आध्यात्मिक जिज्ञासा से परिपूर्ण हुए।

अध्याय ११ – राजा दुर्जय और महर्षि गौरमुख का युद्ध

राजा दुर्जय अपनी विशाल सेना सहित महर्षि गौरमुख के तपोवन में पहुँचे, जहाँ महर्षि ने भगवान नारायण द्वारा प्रदत्त दिव्य चिन्तामणि के प्रभाव से सम्पूर्ण सेना का राजसी सत्कार किया। दुर्जय के सैनिकों और मंत्रियों ने लोभवश उस मणि को छीनने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप मणि से प्रकट हुई दिव्य सेना ने धर्म की रक्षा करते हुए राजा की सेना को परास्त कर दिया।

अध्याय १२ – श्रीनारायण द्वारा सुप्रतीक को वरदान

राजा सुप्रतीक ने सांसारिक भोगों की असारता को जानकर वन में कठोर तपस्या प्रारम्भ की और अनन्य भाव से केवल भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। उनकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीनारायण ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए और सर्वदुःखनिवृत्ति तथा परम मोक्ष का वरदान प्रदान किया।

अध्याय १३ – श्राद्ध-कल्प एवं श्राद्ध-विधान

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को पितरों की प्रसन्नता और तृप्ति हेतु किए जाने वाले श्राद्ध-कर्म के शास्त्रीय नियमों का विस्तार से उपदेश दिया। इसमें श्राद्ध के उपयुक्त समय, तिथियों, पवित्र स्थलों और हविष्य का वर्णन करते हुए बतलाया गया कि पितृगण किस प्रकार श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए जल और पिण्ड से तृप्त होकर कुल को दीर्घायु, यश और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

अध्याय १४ – श्राद्ध के नियम तथा पितृ-तर्पण

इस अध्याय में श्राद्ध-कर्म के सूक्ष्म विधि-विधान, योग्य ब्राह्मणों के लक्षण, निषिद्ध वस्तुएं और तर्पण की विस्तृत प्रणाली का निरूपण किया गया है। पितृपक्ष और अमावस्या के पावन अवसर पर विधिपूर्वक पितृ-यज्ञ सम्पन्न करने से मनुष्य तीनों ऋणों में से पितृ-ऋण से विमुक्त होकर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।

अध्याय १५ – दशावतार स्तोत्र तथा महर्षि गौरमुख की मुक्ति

महर्षि गौरमुख ने भगवान विष्णु के दस दिव्य अवतारों की स्तुति करते हुए परम कल्याणकारी दशावतार स्तोत्र का गान किया। इस स्तुति के प्रभाव से महर्षि के समस्त सांसारिक बन्धन कट गए और वे भगवान के नित्य धाम में लीन हो गए, जो यह सिद्ध करता है कि प्रभु के अवतारों का स्मरण ही कलुष-नाशन का अमोघ उपाय है।

अध्याय १६ – देवशुनी सरमा का उपाख्यान

इस अध्याय में देवशुनी सरमा की ऐतिहासिक कथा के माध्यम से कर्म-सिद्धान्त और प्रारब्ध के गूढ़ नियमों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें यह निरूपित किया गया है कि जीव अपने शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार ही विविध योनियों में जन्म लेता है और भगवत्कृपा ही उसे कर्म-पाश से मुक्त करने में समर्थ है।

अध्याय १७ – महर्षि महातपा की पावन कथा

परम तपस्वी महर्षि महातपा के कठोर संयम, त्याग और साधना का आख्यान यहाँ प्रस्तुत किया गया है। महर्षि ने धर्म के गूढ़ रहस्यों का साक्षात्कार करते हुए यह स्पष्ट किया कि इन्द्रिय-निग्रह और प्रभु-चरणों में अनन्य अनुराग ही समस्त तपस्याओं का परम फल है।

अध्याय १८ – पावक अग्निदेव की उत्पत्ति

सृष्टि-क्रम के अंतर्गत परमपिता ब्रह्मा जी के मुख से पावन अग्निदेव के प्राकट्य का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। अग्निदेव को समस्त यज्ञों का मुख और देवताओं का दूत घोषित किया गया, जिनके माध्यम से दी गई आहुतियाँ साक्षात् देवताओं तक पहुँचती हैं और संसार में संवत्सर तथा ऋतु-चक्र का सञ्चालन होता है।

अध्याय १९ – अग्निदेव का माहात्म्य एवं उपासना

अग्निदेव की उपासना-विधि, होम के प्रकार और अग्निहोत्र के दिव्य माहात्म्य का विशद विवेचन यहाँ किया गया है। नित्य अग्निहोत्र करने वाले साधक के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और वह तेज, बल तथा आत्मिक शुद्धि प्राप्त करके परम गन्तव्य को प्राप्त करता है।

अध्याय २० – देव-चिकित्सक अश्विनीकुमारों का प्राकट्य

भगवान सूर्यदेव और माता संज्ञा (वडवा रूप) के मिलन से दिव्य जुड़वाँ देव-चिकित्सक अश्विनीकुमारों (नासत्य और दस्र) का प्राकट्य हुआ। इन्होंने अपने अद्भुत ज्ञान और चिकित्सा-कौशल से देवताओं और ऋषियों के कष्टों का निवारण किया तथा यज्ञों में सोमरस के भाग के अधिकारी बने।

अध्याय २१ – भगवती गौरी का प्राकट्य

जगतजननी भगवती गौरी के प्राकट्य और उनकी घोर तपस्या की पावन गाथा इस अध्याय में वर्णित है। दक्ष-यज्ञ में सती रूप का त्याग करने के उपरान्त भगवती ने गिरिराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में अवतार लिया और देवाधिदेव महादेव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने हेतु अनुपम तपस्या की।

अध्याय २२ – भगवती गौरी तथा देवाधिदेव शिव का विवाह

भगवती गौरी की अनन्य तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनका वरण किया और समस्त देवों, ऋषियों तथा गंधर्वों की उपस्थिति में दोनों का पावन दिव्य विवाह सम्पन्न हुआ। इस मङ्गलमय विवाह से सम्पूर्ण चराचर जगत् में आनन्द की वर्षा हुई और ब्रह्माण्ड में धर्म तथा शुचिता की पुनर्स्थापना हुई।

अध्याय २३ – विघ्नहर्ता श्रीविनायक का प्राकट्य

भगवान शिव और माता पार्वती के आनंद-उल्लास से समस्त विघ्नों के हर्ता और सिद्धियों के दाता श्रीविनायक (गणेश जी) का प्राकट्य हुआ। भगवान शिव ने उन्हें समस्त गणों का अधिपति नियुक्त किया और यह वरदान प्रदान किया कि किसी भी शुभ कार्य और यज्ञ में सर्वप्रथम श्रीगणेश की ही पूजा होगी।

अध्याय २४ – नागों की उत्पत्ति तथा उनका चरित्र

प्रजापति कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू के गर्भ से शेषनाग, वासुकि, तक्षक आदि दिव्य नागों की उत्पत्ति का इतिहास यहाँ वर्णित है। नागों के निवास, उनके दायित्व और भगवान विष्णु के शेष-शय्या रूप में अनन्त सेवा की महिमा का भावपूर्ण निरूपण इस अध्याय में मिलता है।

अध्याय २५ – भगवान स्कन्द-कार्तिकेय का प्राकट्य

तारकासुर आदि दुष्ट दैत्यों के संहार हेतु भगवान शिव के अमोघ तेज से भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) का पावन प्राकट्य हुआ। कृत्तिकाओं द्वारा पोषित होकर महाबली सेनापति स्कन्द ने देव-सेना का नेतृत्व किया और दुष्टों का दलन करके तीनों लोकों को भयमुक्त किया।

अध्याय २६ – भुवन-भास्कर सूर्यदेव का प्राकट्य

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जीवन, प्रकाश और गति प्रदान करने वाले भगवान सूर्यदेव के प्राकट्य की कथा इस अध्याय में वर्णित है। बारह सूर्यों (द्वादशादित्य), उनके दिव्य रथ और उनकी किरणों के प्रभाव का वर्णन करते हुए सूर्य-उपासना से आरोग्य और ज्ञान-प्राप्ति का विधान समझाया गया है।

अध्याय २७ – मातृगणों का प्राकट्य एवं असुर-संहार

अधर्म और आसुरी शक्तियों के विनाश हेतु ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा—इन सात मातृकाओं का दिव्य प्राकट्य हुआ। इन दिव्य देवियों ने रणभूमि में आसुरी वृत्तियों का संहार करके धर्मपरायण भक्तों की रक्षा की और सृष्टि में संतुलन स्थापित किया।

अध्याय २८ – भगवती दुर्गा का प्राकट्य

समस्त देवताओं के सम्मिलित तेज से परम पराक्रमी भगवती दुर्गा का प्राकट्य हुआ, जिन्हें देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र समर्पित किए। भगवती ने महिषासुर आदि दुर्दान्त दैत्यों का मर्दन करके देवताओं को उनका स्वर्ग-राज्य पुनः दिलाया और भक्तों को अभय का वरदान दिया।

अध्याय २९ – दसों दिशाओं का प्राकट्य

ब्रह्माण्ड के भौगोलिक और आध्यात्मिक संतुलन हेतु पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि दसों दिशाओं और उनके अधिष्ठाता लोकपालों (इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त) के प्राकट्य का क्रम यहाँ सविस्तार वर्णित है।

अध्याय ३० – यक्षराज कुबेर का प्राकट्य

महर्षि विश्रवा के तेजस्वी पुत्र कुबेर की उत्पत्ति, उनकी कठोर तपस्या और भगवान शिव की अनन्य आराधना का पावन इतिहास यहाँ अंकित है। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कुबेर को समस्त निधियों का स्वामी, यक्षों का राजा और उत्तर दिशा का दिक्पाल नियुक्त किया।

अध्याय ३१ – श्रीविष्णु की महिमा एवं द्वादशी महात्म्य

सम्पूर्ण चराचर के पोषक भगवान श्रीविष्णु की अनन्त महिमा और उनके परम पावन स्वरूप का चिन्तन इस अध्याय में किया गया है। इसके साथ ही भगवान की प्रसन्नता प्राप्त करने वाली द्वादशी तिथि के महत्त्व और उसकी पावन फलश्रुति का विस्तार से निरूपण हुआ है।

अध्याय ३२ – धर्मदेव का प्राकट्य

सृष्टि में मर्यादा, न्याय और व्यवस्था के संवर्धन हेतु परमपिता ब्रह्मा जी के दक्षिण वक्षस्थल से साक्षात् धर्मदेव का प्राकट्य हुआ। धर्मदेव ने चारों युगों में सत्य, दया, तप और दान रूपी चार चरणों से जगत् को धारण करने का सनातन दायित्व संभाला।

अध्याय ३३ – रुद्र भगवान का प्राकट्य

सृष्टि के संहार और पुनः शोधन हेतु ब्रह्मा जी के ललाट से क्रोध रूप में भगवान रुद्र का प्राकट्य हुआ, जो ग्यारह रुद्रों के रूप में विभक्त हुए। भगवान रुद्र ने सृष्टि के संहारकारी दायित्व को स्वीकार करते हुए भक्तों के समस्त क्लेशों को दूर करने वाले कल्याणकारी शिव रूप को भी प्रकट किया।

अध्याय ३४ – पितृगणों की उत्पत्ति

सृष्टि-विस्तार के क्रम में ब्रह्मा जी के संकल्प से सोमपा, बर्हिषद, अग्निष्वात्त आदि विभिन्न श्रेणियों के दिव्य पितृगणों की उत्पत्ति हुई। पितरों को श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से संतुष्ट करने से मनुष्य के कुल में धर्म, विद्या और वंश-वृद्धि की प्राप्ति होती है।

अध्याय ३५ – सोम-चन्द्रमा का प्राकट्य

महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पावन तप से अमृतमय सोम (चन्द्रमा) का प्राकट्य हुआ। चन्द्रदेव को समस्त औषधियों, वनस्पतियों और नक्षत्रों का अधिपति बनाया गया, जिनकी शीतल किरणें सम्पूर्ण जीव-जगत को पोषण और जीवन-रस प्रदान करती हैं।

अध्याय ३६ – पूर्व-वृत्तान्त एवं तिथियों का माहात्म्य

इस अध्याय में काल-गणना की विभिन्न तिथियों (प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा और अमावस्या तक) के अधिष्ठाता देवताओं और उन तिथियों पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का ऐतिहासिक वृत्तान्त वर्णित है, जिससे साधक को यथेष्ट पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

अध्याय ३७ – राजा दीर्घबाहु की कथा

परम प्रतापी और सत्यवादी राजा दीर्घबाहु के जीवन-चरित्र का वर्णन यहाँ किया गया है, जिन्होंने अपने राज्य में धर्म की स्थापना की और निष्काम भाव से भगवान श्रीहरि की उपासना करके दीर्घायु, राज्य-वैभव तथा अंत में परम पद प्राप्त किया।

अध्याय ३८ – सत्यतपा का आख्यान

तपस्वी सत्यतपा के कठोर व्रत और सत्य-निष्ठा की प्रेरक गाथा इस अध्याय में प्रस्तुत की गई है। सत्यतपा ने विषम परिस्थितियों में भी सत्य का परित्याग नहीं किया, जिसके पुण्य प्रभाव से उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे लोक-परलोक में पूज्य हुए।

अध्याय ३९ – मत्स्यद्वादशी व्रत-विधान

मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भगवान के प्रथम मत्स्य अवतार के निमित्त किए जाने वाले मत्स्यद्वादशी व्रत की प्रामाणिक विधि यहाँ बतलाई गई है। इस व्रत में जलपूर्ण कलश की स्थापना, भगवान मत्स्य का पूजन और उपवास करने से मनुष्य के समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय ४० – कूर्मद्वादशी व्रत-विधान

पौष मास की द्वादशी तिथि को भगवान कूर्म (कच्छप) के निमित्त कूर्मद्वादशी व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। समुद्र-मन्थन के समय मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण करने वाले प्रभु कूर्म का ध्यान करने से साधक के जीवन में स्थिरता, धैर्य और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

अध्याय ४१ – वराहद्वादशी व्रत-विधान

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भगवान श्रीवराह के पूजनार्थ वराहद्वादशी व्रत के पालन का शास्त्रीय विधान है। इस पावन व्रत के प्रभाव से भक्त को दुर्गति और नरक के भय से मुक्ति मिलती है तथा वह पृथ्वी-तत्व की शुद्धि के साथ भगवान श्रीहरि का सामीप्य प्राप्त करता है।

अध्याय ४२ – नृसिंहद्वादशी व्रत-विधान

फाल्गुन मास की द्वादशी को भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने वाले भगवान नृसिंह के निमित्त नृसिंहद्वादशी व्रत का सम्पादन किया जाता है। इस व्रत के विधिपूर्वक अनुष्ठान से साधक के समस्त शत्रु, भय और आसुरी बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं और उसे अचल भक्ति का वरदान मिलता है।

अध्याय ४३ – वामनद्वादशी व्रत-विधान

चैत्र मास की द्वादशी तिथि को भगवान वामन के निमित्त वामनद्वादशी व्रत करने का नियम है। तीन पग भूमि में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को नापने वाले वामनावतार के पूजन से मनुष्य का अहंकार नष्ट होता है और उसे समस्त सम्पत्तियों तथा धर्म-निष्ठा की प्राप्ति होती है।

अध्याय ४४ – जामदग्न्यद्वादशी व्रत-विधान

वैशाख मास की द्वादशी को महर्षि जमदग्नि के पुत्र भगवान परशुराम के निमित्त जामदग्न्यद्वादशी व्रत का विधान बताया गया है। क्षत्रियों के अधर्म का शमन करने वाले प्रभु परशुराम की आराधना से साधक में अदम्य तेज, शौर्य और पाप-विनाशक सामर्थ्य का संचार होता है।

अध्याय ४५ – रामद्वादशी व्रत-विधान

ज्येष्ठ मास की द्वादशी तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के निमित्त रामद्वादशी व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। धर्म की साक्षात् मूर्ति भगवान राम और माता सीता का स्मरण-पूजन करने से परिवार में सुख-शान्ति, धर्म-निष्ठा और परम गति की प्राप्ति होती है।

अध्याय ४६ – कृष्णद्वादशी व्रत-विधान

आषाढ़ मास की द्वादशी को सम्पूर्ण कलाओं के अवतार भगवान श्रीकृष्ण के प्रीत्यर्थ कृष्णद्वादशी व्रत का पालन किया जाता है। मुरलीधर प्रभु श्रीकृष्ण की भक्ति-युक्त उपासना से साधक का हृदय प्रेम-रस से आप्लावित हो जाता है और वह जन्म-मरण के बन्धन से छूट जाता है।

अध्याय ४७ – बुद्धद्वादशी व्रत-विधान

श्रावण मास की द्वादशी तिथि को अहिंसा और करुणा के अवतार भगवान बुद्ध के निमित्त बुद्धद्वादशी व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से मन में परम शान्ति, वैराग्य, सर्वभूत-दया और चित्त की एकाग्रता सिद्ध होती है।

अध्याय ४८ – कल्किद्वादशी व्रत-विधान

भाद्रपद मास की द्वादशी को कलियुग के अन्त में धर्म की पुनर्स्थापना करने वाले भगवान कल्कि के निमित्त कल्किद्वादशी व्रत का विधान है। अश्वारूढ़ खड्गधारी भगवान कल्कि के ध्यान से साधक कलिकाल के समस्त दोषों से सुरक्षित रहता है और सत्ययुगीन चेतना को प्राप्त करता है।

अध्याय ४९ – पद्मनाभद्वादशी व्रत-विधान

आश्विन मास की द्वादशी तिथि को शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले भगवान पद्मनाभ के निमित्त पद्मनाभद्वादशी व्रत किया जाता है। जिनकी नाभि-कमल से ब्रह्मा जी प्रकट हुए, उन प्रभु पद्मनाभ की अर्चना से साधक को अतुलित ऐश्वर्य, सन्तान-सुख और अंत में परम पद मिलता है।

अध्याय ५० – धरणी व्रत-विधान

कार्तिक मास की पावन द्वादशी को माता धरणी (पृथ्वी) के निमित्त धरणी व्रत का अनुष्ठान करने का विशेष विधान भगवान वराह ने बतलाया है। इस पावन व्रत के द्वारा भूमि की शुद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और अन्न-धन की समृद्धि प्राप्त होती है तथा साधक पृथ्वी के समस्त सुखों को भोगकर अंत में भगवान श्रीवराह के परम वैकुण्ठ धाम में वास करता है।

अध्याय ५१ – कान्तिव्रत विधान

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को शारीरिक तेज और आत्मिक कान्ति प्रदान करने वाले परम पावन कान्तिव्रत का विधान बतलाया। इस व्रत के अंतर्गत भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का पूजन, गन्ध-पुष्प और नैवेद्य से अर्चन तथा दीपदान करने की विधि निरूपित की गई है, जिसके पुण्य प्रभाव से साधक इस लोक में अनुपम सौन्दर्य और कान्ति प्राप्त करके परलोक में दिव्य तेजमय पद को प्राप्त करता है।

अध्याय ५२ – सौभाग्यद्वादशी व्रत

इस अध्याय में अखण्ड सौभाग्य, पारिवारिक सुख और दांपत्य सौहार्द की वृद्धि करने वाले सौभाग्यद्वादशी व्रत की शास्त्रीय विधि का वर्णन किया गया है। माता धरणी के पूछने पर करुणामय प्रभु ने स्पष्ट किया कि जो नारी अथवा पुरुष विधिपूर्वक उपवास रखकर श्रीहरि और भगवती लक्ष्मी का संयुक्त पूजन करते हैं, उनके जीवन से समस्त दुर्भाग्य और वैधव्य जैसे दोष सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय ५३ – अविघ्नद्वादशी व्रत

समस्त कार्यों की निर्विघ्न सिद्धि और जीवन की समस्त बाधाओं के शमन हेतु अविघ्नद्वादशी व्रत का ऐतिहासिक आख्यान यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इस व्रत में भगवान श्रीनारायण के विघ्नहर्ता स्वरूप की आराधना की जाती है, जिससे साधक के मार्ग में आने वाले समस्त दैहिक, दैविक और भौतिक विघ्न प्रभु की कृपा से क्षणमात्र में विलीन हो जाते हैं।

अध्याय ५४ – कामद्वादशी व्रत

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों में धर्मसम्मत कामनाओं की पूर्ति करने वाले कामद्वादशी व्रत का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। निष्काम भाव से की जाने वाली यह साधना अंतःकरण की शुद्धि करती है तथा सकाम भाव से करने वाले भक्तों की समस्त सात्त्विक अभिलाषाओं को पूर्ण करके उन्हें संतुष्ट करती है।

अध्याय ५५ – आरोग्यद्वादशी व्रत

रोग-मुक्ति और दीर्घायु प्रदान करने वाले आरोग्यद्वादशी व्रत का पावन विधान यहाँ समझाया गया है। भगवान सूर्य और भगवान धन्वन्तरि के तेज से युक्त श्रीहरि का ध्यान करते हुए औषधीय द्रव्यों और पवित्र जल से किए जाने वाले अर्चन के फलस्वरूप साधक समस्त असाध्य रोगों से मुक्त होकर स्वस्थ शरीर और निर्मल मन प्राप्त करता है।

अध्याय ५६ – पुत्रप्राप्तिद्वादशी व्रत

सद्गुणी, दीर्घायु और धर्मनिष्ठ सन्तान की प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले गृहस्थों के लिए पुत्रप्राप्तिद्वादशी (सन्तानद्वादशी) व्रत की महिमा का गान यहाँ किया गया है। इस व्रत के विधिवत अनुष्ठान से निसन्तान जनों को योग्य सन्तान की प्राप्ति होती है और कुल की परम्परा धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहती है।

अध्याय ५७ – अनन्तद्वादशी व्रत

अविनाशी फल प्रदान करने वाले और जन्म-जन्मान्तर के संचित पापों का क्षय करने वाले अनन्तद्वादशी व्रत का दिव्य आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। अनन्त रूपधारी भगवान श्रीहरि की षोडशोपचार पूजा करने से साधक को अनन्त सुख, अक्षय कीर्ति और अंत में परम गति सुलभ होती है।

अध्याय ५८ – रूपद्वादशी व्रत

दिव्य व्यक्तित्व, आकर्षण और आत्मिक सौन्दर्य की प्राप्ति हेतु रूपद्वादशी व्रत के नियमों का प्रतिपादन यहाँ किया गया है। भगवान श्रीविष्णु के मनमोहक स्वरूप का चिन्तन और सुगन्धित पुष्पों से पूजन करने से साधक के समस्त शारीरिक विकार दूर होते हैं और वह देवताओं के समान कान्तियुक्त स्वरूप प्राप्त करता है।

अध्याय ५९ – सुगतिद्वादशी व्रत

दुर्गति और अधोगति से रक्षा करके जीव को उत्तम गति प्रदान करने वाले सुगतिद्वादशी व्रत का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। यमराज के दण्ड और नरक के भीषण कष्टों से भयभीत जीवों के लिए यह व्रत एक परम रक्षा-कवच के समान है, जो अंतकाल में जीवात्मा को सन्मार्ग और भगवद्धाम की ओर अग्रसर करता है।

अध्याय ६० – धनदद्वादशी व्रत

दारिद्र्य-विनाश और न्यायपूर्वक धन-धान्य की समृद्धि प्राप्त करने के उद्देश्य से किए जाने वाले धनदद्वादशी व्रत की विधि यहाँ निरूपित है। भगवान श्रीहरि के साथ कुबेर और माता महालक्ष्मी की आराधना करने से साधक के घर में अचल लक्ष्मी का वास होता है और वह परोपकार के कार्यों में धन का सदुपयोग करता है।

अध्याय ६१ – तिलद्वादशी व्रत

माघ मास में तिलों के छह प्रकार के प्रयोग (तिल-स्नान, तिल-उबटन, तिल-होम, तिल-तर्पण, तिल-भोजन और तिल-दान) के साथ सम्पन्न होने वाले तिलद्वादशी व्रत का पावन महात्म्य यहाँ वर्णित है। इस व्रत के आचरण से साधक के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप भस्म हो जाते हैं और उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्यफल प्राप्त होता है।

अध्याय ६२ – मनोरथद्वादशी व्रत

मन की समस्त सात्त्विक अभिलाषाओं को सिद्ध करने वाले मनोरथद्वादशी व्रत का विशद विवेचन इस अध्याय में किया गया है। द्वादश मासों की द्वादशी तिथियों पर भगवान के भिन्न-भिन्न नामों से की जाने वाली इस बारह मासीय साधना से साधक का प्रत्येक धर्मसम्मत मनोरथ प्रभु कृपा से निर्विघ्न पूर्ण होता है।

अध्याय ६३ – सुमन्तद्वादशी व्रत

सद्बुद्धि, विवेक और उत्तम मन्त्र-सिद्धि प्रदान करने वाले सुमन्तद्वादशी व्रत का निरूपण भगवान वराह ने माता धरणी के समक्ष किया। इस पावन व्रत के प्रभाव से अज्ञान का अन्धकार दूर होता है, मेधा शक्ति का विकास होता है और साधक परम ज्ञानी होकर धर्म के गूढ़ तत्वों को समझने में समर्थ होता है।

अध्याय ६४ – सुजन्मद्वादशी व्रत

आगामी जन्मों में नीच योनियों में पतन से बचने और उत्तम कुल, धर्मपरायण माता-पिता तथा सदाचारी वातावरण में जन्म की प्राप्ति हेतु सुजन्मद्वादशी व्रत का शास्त्रीय विधान यहाँ वर्णित है। यह व्रत जीव के पूर्वजन्मों के कुसंस्कारों को नष्ट कर उसके भविष्य को मंगलमय बनाता है।

अध्याय ६५ – मुक्तिद्वादशी व्रत

संसार के समस्त बन्धनों, माया के पाश और जन्म-मरण के चक्र से आत्यन्तिक मुक्ति प्रदान करने वाले मुक्तिद्वादशी व्रत की विधि का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। भगवान श्रीनारायण के पूर्ण शरणागत होकर किए जाने वाले इस व्रत से साधक समस्त उपाधियों से मुक्त होकर कैवल्य मोक्ष को प्राप्त करता है।

अध्याय ६६ – रुद्रगीत एवं शिव माहात्म्य

भगवान शिव द्वारा उच्चारित परम पावन रुद्रगीत का आख्यान इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है। देवाधिदेव महादेव ने भगवान श्रीनारायण के परम ऐश्वर्य और अद्वैत स्वरूप की स्तुति करते हुए हरि और हर के तात्विक एकत्व का प्रतिपादन किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि दोनों में लेशमात्र भी भेद नहीं है।

अध्याय ६७ – पाशुपत योग एवं ज्ञानोपदेश

भगवान शिव द्वारा उपदिष्ट पाशुपत योग के गूढ़ सिद्धान्तों, यम-नियमों और आत्म-नियन्त्रण की साधना का वर्णन यहाँ हुआ है। पाशुपत व्रत के आचरण से साधक के पशुपति-भाव की जागृति होती है, पाश (अविद्या और बन्धन) कट जाते हैं और वह विशुद्ध चैतन्य का साक्षात्कार करता है।

अध्याय ६८ – महिषासुर प्रादुर्भाव एवं देव-कष्ट

दैत्यराज महिषासुर की घोर तपस्या, वरदान-प्राप्ति के पश्चात् उसके द्वारा किए गए अत्याचारों तथा स्वर्ग-लोक से देवताओं के निष्कासन की ऐतिहासिक घटना यहाँ वर्णित है। तीनों लोकों में मचे हाहाकार से व्यथित होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास देवताओं की करुण पुकार का सजीव चित्रण इस अध्याय में मिलता है।

अध्याय ६९ – भगवती चण्डिका द्वारा महिषासुर वध

समस्त देवताओं के तेज-पुञ्ज से प्रकट हुई परम पराक्रमी भगवती चण्डिका द्वारा महिषासुर की विशाल सेना के संहार और अंततः महिषासुर के मर्दन का रोमांचक इतिहास यहाँ अंकित है। भगवती के इस विजय-चरित्र के स्मरण से भक्तों के समस्त भय नष्ट होते हैं और धर्म की पुनर्स्थापना होती है।

अध्याय ७० – सप्तमातृकाओं का प्राकट्य

असुरों के संहार और जगत् की रक्षा हेतु ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा—इन सात दिव्य मातृकाओं के प्राकट्य और उनके आयुधों का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। इन दिव्य शक्तियों ने युद्धभूमि में असुरों के रक्त का पान कर देवताओं को अभय प्रदान किया।

अध्याय ७१ – रुरु दैत्य वध एवं चामुण्डा चरित

उत्पाती रुरु दैत्य के घोर अधर्म और अत्याचारों के शमन हेतु भगवती चामुण्डा के प्राकट्य और भीषण युद्ध का वर्णन यहाँ हुआ है। भगवती चामुण्डा ने अपने विकराल रूप से रुरु का संहार कर उसकी मुण्डमाला धारण की और सम्पूर्ण जगत् को आसुरी आतंक से मुक्त कराया।

अध्याय ७२ – भगवती के त्रिशक्ति स्वरूप का माहात्म्य

सत्त्व, रज और तम गुणों की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली—इन तीन प्रमुख शक्तियों के तात्विक स्वरूप और उनकी नित्य महिमा का गान यहाँ किया गया है। भगवान वराह ने स्पष्ट किया कि यही पराशक्ति सृष्टि के सृजन, पालन और संहार का मूल कारण है।

अध्याय ७३ – सत्यतपा का धर्मोपदेश

परम तपस्वी सत्यतपा द्वारा धर्म, सदाचार और सत्य के गूढ़ नियमों का उपदेश इस अध्याय में प्रस्तुत किया गया है। महर्षि ने यह प्रतिपादित किया कि किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से पीड़ा न पहुँचाना तथा सर्वदा सत्य पर अडिग रहना ही सबसे बड़ी तपस्या है।

अध्याय ७४ – महर्षि अगस्त्य और गोकर्ण तीर्थ

परम तेजस्वी महर्षि अगस्त्य के पावन आश्रम और समुद्र-तट पर स्थित पवित्र गोकर्ण तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन यहाँ किया गया है। गोकर्ण महाबलेश्वर के दर्शन और वहाँ किए गए तप से महापातकों का भी नाश हो जाता है और साधक शिव-लोक को प्राप्त करता है।

अध्याय ७५ – विन्ध्यवासिनी देवी का माहात्म्य

विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करने वाली भगवती विन्ध्यवासिनी के प्राकट्य, उनके तप और मनोरथ-पूर्ति की दिव्य गाथा यहाँ वर्णित है। जो भक्त विन्ध्य पर्वत पर जाकर भगवती की अर्चना करते हैं, उन्हें भुक्ति और मुक्ति दोनों अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं।

अध्याय ७६ – तीर्थराज प्रयाग का माहात्म्य

गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम स्थल तीर्थराज प्रयाग की अनुपम महिमा का गान इस अध्याय में हुआ है। प्रयाग में माघ-स्नान, वेणी-दान और पिण्डदान के अमोघ फल का निरूपण करते हुए इसे समस्त तीर्थों का अधिपति और मोक्ष का सुगम द्वार बताया गया है।

अध्याय ७७ – अविमुक्त काशी क्षेत्र का माहात्म्य

भगवान विश्वनाथ की पावन नगरी काशी (अविमुक्त क्षेत्र) के दिव्य स्वरूप, मणिकर्णिका घाट और पञ्चक्रोशी परिक्रमा का माहात्म्य यहाँ वर्णित है। काशी में देहत्याग करने वाले प्राणी को स्वयं देवाधिदेव महादेव तारक मन्त्र प्रदान कर संसार-सागर से पार उतारते हैं।

अध्याय ७८ – गया तीर्थ एवं पितृमुक्ति

पितरों के उद्धार हेतु सर्वश्रेष्ठ स्थल गया तीर्थ, फल्गु नदी और विष्णुपद मन्दिर की पावन महिमा का विस्तृत विवेचन इस अध्याय में किया गया है। गया में श्रद्धापूर्वक पिण्डदान करने से सौ कुलों के पितर तृप्त होकर भगवान विष्णु के परम धाम को गमन करते हैं।

अध्याय ७९ – मथुरा तीर्थ माहात्म्य प्रारम्भ

भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मभूमि मथुरा मण्डल के दिव्य प्राकट्य, उसकी भौगोलिक सीमा और आध्यात्मिक श्रेष्ठता का प्रारम्भिक वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान वराह ने माता पृथ्वी को बताया कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर मथुरा के समान कोई अन्य पावन और प्रिय क्षेत्र नहीं है।

अध्याय ८० – विश्रान्ति तीर्थ एवं यमुना माहात्म्य

मथुरा स्थित विश्रान्ति (विश्राम) तीर्थ और सूर्य-पुत्री कालिन्दी (यमुना) के पावन जल की महिमा का गुणगान इस अध्याय में हुआ है। कंस-वध के उपरान्त भगवान श्रीकृष्ण द्वारा यहाँ विश्राम किए जाने के ऐतिहासिक तथ्य और इस तीर्थ में स्नान से समस्त पापों के क्षय का उल्लेख है।

अध्याय ८१ – अक्रूर तीर्थ एवं गोवर्धन महिमा

मथुरा के अक्रूर तीर्थ में स्नान के फल और गिरिराज गोवर्धन के दिव्य स्वरूप का वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा इन्द्र के मान-मर्दन हेतु गोवर्धन धारण करने की ऐतिहासिक लीला और गोवर्धन की परिक्रमा से प्राप्त होने वाले अक्षय पुण्य का सविस्तार निरूपण है।

अध्याय ८२ – मथुरा मण्डल की पावन परिक्रमा

मथुरा मण्डल की चौरासी कोस की परिक्रमा, उसके नियम और विभिन्न पड़ावों पर स्थित पुण्य मन्दिरों के दर्शन की विधि इस अध्याय में बतलाई गई है। भक्ति-भाव से की गई यह परिक्रमा मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर गोलोक धाम की प्राप्ति कराती है।

अध्याय ८३ – वृन्दावन एवं कुण्डों की महिमा

परम पावन वृन्दावन धाम, राधाकुण्ड, श्यामकुण्ड तथा अन्य दिव्य सरोवरों की आध्यात्मिक दिव्यता का गान यहाँ किया गया है। वृन्दावन के लता-गुल्मों और कदम्ब वृक्षों की पावनता का स्मरण करते हुए इसे नित्य रास और भगवद्-लीला का शाश्वत केन्द्र बताया गया है।

अध्याय ८४ – मथुरा क्षेत्र के द्वादश वन

मथुरा मण्डल के अंतर्गत आने वाले बारह पावन वनों (मधुवन, तालवन, कुमुदवन, कामवन, बहुलावन, भद्रवन, खदिरवन, महावन, लोहवन, विल्ववन, भाण्डीरवन और वृन्दावन) के माहात्म्य और उनके विशिष्ट आध्यात्मिक फल का सविस्तार वर्णन इस अध्याय में हुआ है।

अध्याय ८५ – सौकरव तीर्थ (शूकरक्षेत्र) माहात्म्य

भगवान वराह के प्राकट्य और लीला से जुड़े परम पावन सौकरव तीर्थ (सोरों / शूकरक्षेत्र) की अनुपम महिमा का विवेचन यहाँ किया गया है। गंगा-तट पर स्थित इस क्षेत्र में भगवान वराह की पूजा और गंगा-स्नान करने से मनुष्य सीधे वैकुण्ठ लोक का अधिकारी बनता है।

अध्याय ८६ – कोकिलामुख (कोकामुख) तीर्थ

हिमालय की सुरम्य उपत्यका में स्थित गुप्त और पावन कोकिलामुख (कोकामुख) तीर्थ का आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। भगवान वराह के विशेष अनुग्रह से युक्त इस क्षेत्र में पिण्डदान और तर्पण करने से पितरों को तत्काल मुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय ८७ – कुब्जाम्रक तीर्थ का माहात्म्य

हरिद्वार के समीप स्थित कुब्जाम्रक तीर्थ की उत्पत्ति, महर्षि रैभ्य की तपस्या और भगवान श्रीविष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन की ऐतिहासिक गाथा यहाँ अंकित है। इस पावन स्थल पर श्रीहरि की आराधना करने से साधक को ब्रह्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ८८ – बदरिकाश्रम तीर्थ का दिव्य वर्णन

अलकनन्दा के तट पर स्थित नर-नारायण के तपोभूमि स्वरूप बदरिकाश्रम (विशाल बदरी) तीर्थ का दिव्य माहात्म्य यहाँ वर्णित है। इस परम धाम के दर्शन मात्र से मनुष्य के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और वह निष्काम कर्मयोग का साक्षात्कार करता है।

अध्याय ८९ – मन्दराचल तीर्थ माहात्म्य

समुद्र-मन्थन में मथानी बने दिव्य मन्दराचल पर्वत और वहाँ स्थित मधुसूदन भगवान के मन्दिर की पावन महिमा का विवेचन इस अध्याय में किया गया है। मन्दराचल की यात्रा और वहाँ भगवान मधुसूदन का पूजन करने से साधक को अतुल पराक्रम और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

अध्याय ९० – शालग्राम क्षेत्र एवं गण्डकी महिमा

नेपाल स्थित पावन गण्डकी नदी और शालग्राम शिलाओं के प्राकट्य का रहस्य यहाँ उद्घाटित किया गया है। चक्रांकित शालग्राम शिला के घर में नित्य पूजन और गण्डकी के पावन जल के स्पर्श से मनुष्य साक्षात् वैकुण्ठ में निवास करने का पुण्य प्राप्त करता है।

अध्याय ९१ – सोमेश्वर तीर्थ का माहात्म्य

चन्द्रमा (सोम) द्वारा अपने शाप-निवारण हेतु स्थापित सोमेश्वर महादेव तीर्थ की पावन कथा इस अध्याय में वर्णित है। इस तीर्थ में भगवान शिव का जलाभिषेक करने से साधक को मानसिक शान्ति, आरोग्यता और पाप-मुक्ति की प्राप्ति होती है।

अध्याय ९२ – पापनाशिनी तीर्थ एवं सरयू महिमा

अयोध्या स्थित पावन सरयू नदी और पापनाशिनी तीर्थ के दिव्य प्रभाव का निरूपण यहाँ किया गया है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की लीला-भूमि सरयू में अवगाहन करने से प्राणी के समस्त पातक धुल जाते हैं और वह परम पद को प्राप्त करता है।

अध्याय ९३ – सर्वतीर्थ स्नान एवं वैष्णव फल

समस्त पावन तीर्थों के आध्यात्मिक समन्वय और उनमें स्नान-दान करने के समग्र फल का सार यहाँ प्रस्तुत किया गया है। भगवान वराह ने स्पष्ट किया कि जो भक्त तीर्थ-यात्रा के साथ-साथ अपने हृदय में भगवान श्रीनारायण का निरन्तर ध्यान करता है, वही वास्तविक तीर्थ-फल का भागी बनता है।

अध्याय ९४ – यमलोक एवं चित्रगुप्त संवाद

मृत्यु के उपरान्त जीवात्मा की यमलोक-यात्रा, यमराज के भव्य दरबार तथा चित्रगुप्त द्वारा जीवों के शुभाशुभ कर्मों के सूक्ष्म लेखा-जोखा का प्रामाणिक विवरण इस अध्याय में दिया गया है। धर्मराज यम के न्याय और निष्पक्षता का सजीव चित्रण यहाँ मिलता है।

अध्याय ९५ – कर्मविपाक एवं नरक यातना

पापकर्मों के फलस्वरूप मिलने वाली रौरव, कुम्भीपाक, तामिस्र, असिपत्रवन आदि विभिन्न नरकों की भीषण यातनाओं का विस्तृत वर्णन यहाँ किया गया है। जीव अपने किए हुए पापों का फल भोगने के लिए किस प्रकार नरक में तड़पता है, इसका यथार्थ निरूपण कर साधक को पापों से विरत होने की प्रेरणा दी गई है।

अध्याय ९६ – पापकर्मों के प्रायश्चित्त का विधान

विभिन्न पातकों, उपपातकों और अपराधों के शमन हेतु शास्त्रीय प्रायश्चित्तों, कृच्छ्र-चान्द्रायण व्रतों और भगवन्नाम-जप की विधि इस अध्याय में बतलाई गई है। पश्चाताप और प्रभु-शरण में जाने से किस प्रकार पापी भी शुद्ध होकर पाप-मुक्त हो जाता है, इसका मार्ग यहाँ प्रशस्त किया गया है।

अध्याय ९७ – धर्मराज यम का उपदेश

धर्मराज यम द्वारा अपने दूतों को दिए गए उस गोपनीय उपदेश का वर्णन यहाँ हुआ है, जिसमें वे कहते हैं कि जो मनुष्य भगवान श्रीनारायण के नाम का जप करते हैं और तुलसी-माला धारण करते हैं, उनके समीप कभी मत जाना। यमराज ने वैष्णव भक्तों की सर्वोच्च महिमा का प्रतिपादन किया।

अध्याय ९८ – वैष्णव सदाचार एवं नित्यकर्म

ब्राह्ममुहूर्त में जागरण, शौच-विधि, दन्तधावन, स्नान, सन्ध्योपासन और श्रीहरि के नित्य पूजन के शास्त्रीय नियमों का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। सदाचार और पवित्रता के पालन से ही अन्तःकरण शुद्ध होता है और जीव भगवत्कृपा का पात्र बनता है।

अध्याय ९९ – पञ्चमहायज्ञ एवं दान की महिमा

गृहस्थों के लिए नित्य करणीय पञ्चमहायज्ञों (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञ) तथा गोदान, भूमिदान, अन्नदान और सुवर्णदान के अनुपम माहात्म्य का वर्णन यहाँ किया गया है। इन सत्कर्मों के अनुष्ठान से मनुष्य ऋण-मुक्त होकर सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।

अध्याय १०० – वैष्णव धर्मसार एवं श्रीहरि शरणागति

भगवान श्रीवराह द्वारा माता पृथ्वी को वैष्णव धर्म के सर्वोच्च सार और एकांतिक शरणागति का उपदेश इस अध्याय में प्रदान किया गया है। समस्त शास्त्रों का निचोड़ बताते हुए प्रभु ने घोषित किया कि जो जन सर्वभाव से केवल भगवान श्रीनारायण के चरणों में समर्पित हो जाते हैं, उनका भार स्वयं भगवान वहन करते हैं और उन्हें भवसागर से पार उतारकर अपने परम वैकुण्ठ धाम में शाश्वत स्थान प्रदान करते हैं।

अध्याय १०१ – वैष्णवाचार एवं नित्य सेवा-विधि

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को वैष्णव भक्त के नित्य आचरण, शुचिता और प्रभु-सेवा की पावन विधि का उपदेश दिया। प्रभात काल के ब्राह्ममुहूर्त में जागरण, पवित्र नदियों में स्नान, तिलक-धारण, तुलसी-माला धारण और एकाग्र चित्त से श्रीहरि के विग्रह की सेवा करने के शास्त्रीय नियमों का विस्तार से निरूपण करते हुए प्रभु ने स्पष्ट किया कि बाह्य पवित्रता के साथ-साथ हृदय की निर्मलता ही सच्ची भगवद्-भक्ति की नींव है।

अध्याय १०२ – बत्तीस सेवापराधों का निरूपण

भगवान श्रीवराह ने मन्दिर में प्रभु-अर्चन और सेवा के समय अनजाने में होने वाले बत्तीस प्रकार के सेवापराधों का सविस्तार वर्णन किया। भगवान के सम्मुख रथ या पालकी पर चढ़कर जाना, पादुका पहनकर मन्दिर में प्रवेश करना, क्रोध करना, अशुद्ध वस्त्र पहनकर सेवा करना, और निषिद्ध वस्तुओं का अर्पण करना जैसे अपराधों की सूची बताते हुए प्रभु ने साधक को सर्वदा सजग, विनम्र और श्रद्धावनत रहने की प्रेरणा दी।

अध्याय १०३ – सेवापराधों का प्रायश्चित्त विधान

इस अध्याय में प्रमादवश या अज्ञानतावश घटित सेवापराधों के शमन हेतु शास्त्रीय प्रायश्चित्तों का निरूपण किया गया है। भगवान श्रीवराह ने बतलाया कि पश्चाताप-युक्त हृदय से प्रभु के सम्मुख दण्डवत प्रणाम करने, श्रीहरि के पावन नामों का संकीर्तन करने, उपवास रखने, तुलसी-दल अर्पित करने तथा ब्राह्मणों और वैष्णवों की सेवा करने से साधक के अपराध क्षमा हो जाते हैं और उसकी भक्ति पुनः निष्कलंक हो जाती है।

अध्याय १०४ – कर्मविपाक एवं चित्त-शुद्धि

जीव द्वारा किए जाने वाले शुभाशुभ कर्मों के फल-स्वरूप मिलने वाली विभिन्न गतियों और चित्त की शुद्धि के उपायों का विवेचन यहाँ हुआ है। प्रभु ने माता धरणी को समझाया कि सत्कर्म, परोपकार और भगवत्-स्मरण से अन्तःकरण के समस्त मल धुल जाते हैं, जिससे साधक के भीतर सात्त्विक वृत्तियों का उदय होता है और वह मोक्ष-मार्ग पर निर्विघ्न आगे बढ़ता है।

अध्याय १०५ – श्रीविष्णु-अर्चन एवं षोडशोपचार पूजा

भगवान श्रीनारायण के पावन विग्रह के षोडशोपचार पूजन की सम्पूर्ण विधि का भक्तिमय निरूपण इस अध्याय में किया गया है। आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, आरती और प्रदक्षिणा के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए प्रभु ने बतलाया कि प्रेमपूर्वक अर्पित किया गया एक तुलसी-दल भी कोटि-कोटि यज्ञों के समान फल प्रदान करता है।

अध्याय १०६ – मन्त्र-न्यास एवं भगवद्-ध्यान

प्रभु की आराधना में मन्त्र-शुद्धि, अंगन्यास, करन्यास तथा ध्यान की शास्त्रीय प्रणाली का उद्घाटन यहाँ किया गया है। साधक जब अपने सम्पूर्ण शरीर और इन्द्रियों में परमात्मा के दिव्य स्वरूप और मन्त्रों का न्यास करके ध्यान में लीन होता है, तब वह स्वयं समस्त सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर प्रभु के तेज में एकाकार होने की अनुभूति प्राप्त करता है।

अध्याय १०७ – दीपदान एवं धूप-नैवेद्य माहात्म्य

मन्दिरों और पवित्र तीर्थों में भगवान के सम्मुख अखण्ड दीप प्रज्वलित करने, सुगन्धित गुग्गुल-धूप देने तथा शुद्ध सात्त्विक नैवेद्य अर्पण करने की महिमा का गान यहाँ किया गया है। जो भक्त निष्काम भाव से प्रभु के मन्दिर में दीपदान करते हैं, उनके जीवन का अज्ञानान्धकार नष्ट हो जाता है और वे परलोक में सूर्य के समान प्रकाशमान विमान में बैठकर वैकुण्ठ धाम को गमन करते हैं।

अध्याय १०८ – भगवत्प्रसाद एवं चरणामृत माहात्म्य

भगवान श्रीहरि को अर्पित किए गए महाप्रसाद और शालग्राम शिला के दिव्य चरणामृत की अलौकिक महिमा का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। भगवान के चरणामृत का एक बिन्दु भी समस्त रोगों, अकाल मृत्यु के भय और जन्म-जन्मान्तर के संचित पापों का विनाश कर देता है, तथा महाप्रसाद को आदरपूर्वक ग्रहण करने वाले जीव का अन्तःकरण परम पवित्र हो जाता है।

अध्याय १०९ – वैष्णव-भक्तों के दिव्य लक्षण

सच्चे वैष्णव भक्त के आन्तरिक और बाह्य गुणों का विशद निरूपण भगवान वराह ने माता पृथ्वी के समक्ष किया। जो प्राणी समस्त चराचर जीवों में भगवान श्रीनारायण का दर्शन करता है, काम-क्रोध-मद-लोभ से सर्वथा रहित है, दूसरों के सुख में सुखी और दुःख में द्रवित होता है, तथा सर्वदा प्रभु के नाम और गुणों के चिन्तन में मग्न रहता है, वही वास्तव में परम भागवत वैष्णव कहलाता है।

अध्याय ११० – नाम-संकीर्तन एवं भगवद्-गुणगान

कलियुग में समस्त पापों से मुक्ति और परम पद की प्राप्ति के लिए भगवान के पावन नामों के संकीर्तन को सर्वश्रेष्ठ साधन घोषित किया गया है। प्रभु ने बतलाया कि ‘नारायण’, ‘गोविन्द’, ‘माधव’ और ‘हरे’ जैसे दिव्य नामों का उच्चारण करने मात्र से महापापी भी पावन हो जाते हैं, और जहाँ भक्त प्रेम से प्रभु के गुणों का गान करते हैं, वहाँ स्वयं भगवान प्रत्यक्ष उपस्थित रहते हैं।

अध्याय १११ – एकादशी-व्रत का दिव्य विधान

समस्त व्रतों में शिरोमणि एकादशी व्रत की उत्पत्ति, उसकी विधि और उसके आध्यात्मिक फल का विस्तृत वर्णन यहाँ प्रस्तुत किया गया है। दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को अन्न का त्याग कर उपवास रखने, रात्रि में जागरण करने और प्रभु का ध्यान करने से वाजपेय तथा अश्वमेध यज्ञों से भी बढ़कर अक्षय पुण्यफल की प्राप्ति होती है और कुल का उद्धार होता है।

अध्याय ११२ – द्वादशी-व्रत एवं पारण-विधि

एकादशी व्रत के उपरान्त द्वादशी तिथि को विधिपूर्वक किए जाने वाले पूजन, ब्राह्मण-भोजन, दान और पारण के शास्त्रीय नियमों का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। उचित समय पर द्वादशी पारण करने से ही व्रत की पूर्णता सिद्ध होती है और भक्त को भगवान श्रीविष्णु के परम धाम का शाश्वत सान्निध्य प्राप्त होता है।

अध्याय ११३ – कोकामुख तीर्थ का पावन आख्यान

हिमालय की सुरम्य वादियों में स्थित गुप्त और पावन कोकामुख (कोकिलामुख) तीर्थ की महिमा का विस्तृत ऐतिहासिक वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान वराह ने बतलाया कि इस तीर्थ में उनके साक्षात् स्वरूप की उपस्थिति है, और यहाँ पिण्डदान, स्नान तथा उपवास करने वाले मनुष्य को कभी यमराज के दण्ड का भय नहीं रहता।

अध्याय ११४ – बदरिकाश्रम तीर्थ का दिव्य माहात्म्य

नर-नारायण की तपोभूमि परम पावन बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) तीर्थ के अलौकिक स्वरूप का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। अलकनन्दा के पावन तट पर स्थित इस धाम में दर्शन, ध्यान और तप करने से मनुष्य के समस्त त्रिविध ताप नष्ट हो जाते हैं और वह जीवन-मुक्त होकर परम पद का साक्षात्कार करता है।

अध्याय ११५ – मन्दराचल एवं मधुसूदन तीर्थ

समुद्र-मन्थन के समय आधार बने मन्दराचल पर्वत और वहाँ प्रतिष्ठित भगवान मधुसूदन के मन्दिर का दिव्य माहात्म्य यहाँ वर्णित है। इस पवित्र पर्वत की यात्रा करने और भगवान मधुसूदन का श्रद्धापूर्वक पूजन करने से साधक को अतुल आत्मबल, पाप-मुक्ति और अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

अध्याय ११६ – कुब्जाम्रक तीर्थ का इतिहास

हरिद्वार के समीप स्थित कुब्जाम्रक तीर्थ की उत्पत्ति, महर्षि रैभ्य की कठोर साधना और भगवान श्रीविष्णु के प्रत्यक्ष दर्शन की गाथा इस अध्याय में वर्णित है। इस पावन स्थल पर भगवान की अर्चना करने से साधक को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है और उसके समस्त सांसारिक बन्धन कट जाते हैं।

अध्याय ११७ – शालग्राम क्षेत्र एवं गण्डकी महिमा

नेपाल स्थित पावन गण्डकी नदी के उद्गम और वहाँ साक्षात् नारायण स्वरूप शालग्राम शिलाओं के प्राकट्य का रहस्य यहाँ उद्घाटित हुआ है। गण्डकी के पावन जल में स्नान करने तथा शालग्राम शिला की नित्य पूजा करने वाले साधक के घर में साक्षात् लक्ष्मी का निवास होता है और वह अन्त में वैकुण्ठ को जाता है।

अध्याय ११८ – सौकरव (शूकर) तीर्थ-माहात्म्य

भगवान श्रीवराह की प्रत्यक्ष लीला-भूमि सौकरव तीर्थ (सोरों / शूकरक्षेत्र) के अनुपम माहात्म्य का विवेचन इस अध्याय में किया गया है। गंगा-तट पर स्थित इस पावन क्षेत्र में भगवान वराह का पूजन और अस्थि-विसर्जन करने से पूर्वजों को तत्काल वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।

अध्याय ११९ – गोवर्धन पर्वत एवं ब्रज-महिमा

द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर उठाए गए गिरिराज गोवर्धन और सम्पूर्ण ब्रजभूमि की दिव्यता का गान यहाँ किया गया है। गोवर्धन की परिक्रमा और ब्रज के वनों का दर्शन करने से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं और उसे भगवद्-प्रेम की दुर्लभ प्राप्ति होती है।

अध्याय १२० – यमुना-माहात्म्य एवं विश्रान्ति तीर्थ

मथुरा स्थित विश्रान्ति (विश्राम) तीर्थ और सूर्य-पुत्री यमुना जी के अमृतमय जल के प्रभाव का विशद वर्णन इस अध्याय में हुआ है। कंस-वध के उपरान्त भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी द्वारा यहाँ विश्राम किए जाने की ऐतिहासिक घटना और यहाँ स्नान से यम-यातना से मुक्ति मिलने का उल्लेख है।

अध्याय १२१ – तीर्थराज प्रयाग का दिव्य स्वरूप

गंगा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम स्थल तीर्थराज प्रयाग की अनुपम महिमा का गान इस अध्याय में किया गया है। माघ मास में प्रयाग-स्नान, दान और वेणी-माधव की पूजा करने से साधक समस्त तीर्थों के भ्रमण का फल एक ही स्थान पर प्राप्त कर लेता है और मोक्ष का अधिकारी बनता है।

अध्याय १२२ – अविमुक्त काशी तीर्थ-माहात्म्य

भगवान देवाधिदेव विश्वनाथ की प्रिय नगरी काशी (अविमुक्त क्षेत्र) के दिव्य स्वरूप और मणिकर्णिका की पावनता का निरूपण यहाँ हुआ है। काशी में निवास करने और शरीर त्यागने वाले प्रत्येक जीव को भगवान शिव स्वयं तारक मन्त्र देकर भवबन्धन से विमुक्त कर देते हैं।

अध्याय १२३ – गया तीर्थ एवं पितृ-मुक्ति विधान

पितरों के तर्पण और पिण्डदान हेतु सर्वश्रेष्ठ तीर्थ गया धाम, फल्गु नदी और विष्णुपद मन्दिर का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। गया तीर्थ में विधिपूर्वक पिण्डदान करने से घोर नरक में पड़े हुए पूर्वज भी तत्काल मुक्त होकर भगवान श्रीविष्णु के नित्य धाम को गमन करते हैं।

अध्याय १२४ – द्वारका पुरी का पावन माहात्म्य

पश्चिम समुद्र के तट पर विश्वकर्मा द्वारा निर्मित सुवर्णमयी द्वारका पुरी और गोमती नदी के संगम का दिव्य वर्णन यहाँ किया गया है। भगवान श्रीकृष्ण की इस राजधानी में दर्शन और गोपीचन्दन का तिलक धारण करने वाले भक्त को साक्षात् प्रभु का सान्निध्य प्राप्त होता है।

अध्याय १२५ – प्रभास तीर्थ एवं सोमनाथ महिमा

सरस्वती नदी के समुद्र-संगम पर स्थित प्रभास तीर्थ और द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम भगवान सोमनाथ के माहात्म्य का विवेचन इस अध्याय में हुआ है। चन्द्रमा द्वारा शाप-मुक्ति हेतु किए गए तप की ऐतिहासिक घटना और इस तीर्थ में स्नान-दान से समस्त पापों के क्षय का उल्लेख है।

अध्याय १२६ – पुष्कर तीर्थ एवं ब्रह्मा जी की अर्चना

सृष्टिकर्ता परमपिता ब्रह्मा जी के परम पवित्र पुष्कर तीर्थ के प्राकट्य और वहाँ स्थित तीनों सरोवरों की महिमा का वर्णन यहाँ किया गया है। कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर में स्नान और ब्रह्मा जी की अर्चना करने से साधक को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और समस्त मनोरथ सिद्ध होते हैं।

अध्याय १२७ – नैमिषारण्य तीर्थ का दिव्य इतिहास

जहाँ भगवान श्रीहरि के चक्र की नेमि गिरी थी, उस परम तपोभूमि नैमिषारण्य के माहात्म्य का गुणगान इस अध्याय में हुआ है। इस पवित्र वन में ऋषियों द्वारा किए गए सहस्र-वर्षीय सत्र और सत्संग की महिमा बताते हुए इसे कलियुग के दोषों से सर्वथा मुक्त क्षेत्र कहा गया है।

अध्याय १२८ – कुरुक्षेत्र तीर्थ एवं धर्मक्षेत्र महिमा

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन भूमि, सन्निहित सरोवर और ब्रह्मसरोवर के आध्यात्मिक प्रभाव का निरूपण यहाँ किया गया है। सूर्यग्रहण के अवसर पर कुरुक्षेत्र में स्नान और दान करने से अश्वमेध यज्ञ से भी सहस्र गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है।

अध्याय १२९ – हरिद्वार एवं गङ्गाद्वार तीर्थ

पहाड़ों से निकलकर मैदान में प्रवेश करने वाली पतितपावनी गंगा के पावन द्वार हरिद्वार (मायापुरी) का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। हर की पौड़ी पर ब्रह्मकुण्ड में स्नान और गंगा जी की आरती के दर्शन से प्राणी के समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक पाप तत्काल धुल जाते हैं।

अध्याय १३० – पुरुषोत्तम क्षेत्र एवं जगन्नाथ महिमा

पूर्वी समुद्र तट पर स्थित श्रीक्षेत्र (पुरुषोत्तम क्षेत्र / पुरी) और भगवान दारुब्रह्म जगन्नाथ, बलभद्र तथा सुभद्रा के दिव्य स्वरूप का वर्णन यहाँ हुआ है। जगन्नाथ जी के महाप्रसाद और रथयात्रा के दर्शन से नीच योनियों में भटकने का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

अध्याय १३१ – सेतुबन्ध रामेश्वर तीर्थ-माहात्म्य

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा लंका-विजय हेतु निर्मित सेतुबन्ध और वहाँ स्थापित भगवान रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की पावन महिमा यहाँ वर्णित है। धनुषकोटि में स्नान और रामेश्वर महादेव की पूजा करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।

अध्याय १३२ – गोदावरी नदी एवं दण्डकारण्य तीर्थ

दक्षिण की गंगा कही जाने वाली पावन गोदावरी नदी और महर्षि गौतम की तपोभूमि त्र्यम्बकेश्वर का माहात्म्य इस अध्याय में निरूपित है। भगवान श्रीराम के चरण-चिह्नों से पावन दण्डकारण्य और गोदावरी में सिंहस्थ बृहस्पति के समय स्नान करने का असीम पुण्य फल बताया गया है।

अध्याय १३३ – कावेरी नदी एवं श्रीरङ्गम धाम

दक्षिण भारत की परम पवित्र कावेरी नदी और कावेरी के मध्य स्थित श्रीरङ्गम धाम में शेष-शय्या पर शयन करने वाले भगवान रङ्गनाथ का दिव्य वर्णन यहाँ किया गया है। कावेरी के पावन जल में अवगाहन करने से साधक वैकुण्ठ लोक का अधिकारी बनता है।

अध्याय १३४ – नर्मदा नदी एवं ओंकारेश्वर माहात्म्य

भगवान शिव के पसीने से प्रकट हुई पावन नर्मदा (रेवा) नदी और नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। नर्मदा के दर्शन मात्र से ही पापनाश हो जाता है और इसके तट पर स्थित प्रत्येक कंकड़ को साक्षात् शंकर का स्वरूप माना गया है।

अध्याय १३५ – अवन्तिका पुरी एवं महाकाल माहात्म्य

सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में प्रमुख अवन्तिका (उज्जयिनी), क्षिप्रा नदी और काल के भी काल भगवान महाकालेश्वर की महिमा का विवेचन यहाँ हुआ है। क्षिप्रा में स्नान और महाकाल के दर्शन से अकाल मृत्यु का भय मिट जाता है और साधक को शिव-सान्निध्य मिलता है।

अध्याय १३६ – विन्ध्याचल क्षेत्र एवं विन्ध्यवासिनी महिमा

विन्ध्य पर्वत पर विराजमान जगतजननी भगवती विन्ध्यवासिनी के प्राकट्य और उनके अनन्य अनुग्रह का आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। जो भक्त विन्ध्याचल में जाकर भगवती की त्रिकोण परिक्रमा करते हैं, उनके जीवन की समस्त बाधाएं दूर होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है।

अध्याय १३७ – कामरूप क्षेत्र एवं कामाख्या देवी

नीलाचल पर्वत पर स्थित परम सिद्ध शक्तिपीठ कामरूप और भगवती कामाख्या के दिव्य माहात्म्य का निरूपण यहाँ किया गया है। भगवती कामाख्या के दर्शन और साधना से साधक को समस्त अष्ट सिद्धियाँ और नव निधियाँ सुलभ हो जाती हैं।

अध्याय १३८ – पाशुपत-योग एवं शिव-भक्ति विधान

भगवान शिव द्वारा उपदिष्ट पाशुपत-योग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम और भस्म-स्नान की शास्त्रीय विधि यहाँ समझाई गई है। पाशुपत व्रत के आचरण से साधक अविद्या रूपी पाश को काटकर साक्षात् पशुपति भगवान शिव के कल्याणकारी स्वरूप को प्राप्त करता है।

अध्याय १३९ – सांख्य-ज्ञान एवं वैष्णव-भक्ति समन्वय

भगवान कपिल द्वारा प्रतिपादित सांख्य-दर्शन के चौबीस तत्वों और पच्चीसवें तत्व परमात्मा के ज्ञान का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। ज्ञान और निष्काम भक्ति के समन्वय से ही जीव प्रकृति के त्रिगुणों के बन्धन से छूटकर भगवान श्रीनारायण के परम पद को प्राप्त करता है।

अध्याय १४० – भगवती चण्डिका का दिव्य प्राकट्य

देवताओं पर असुरों के घोर अत्याचारों के निवारण हेतु समस्त देवों के तेज-पुञ्ज से परम सुन्दरी और अजेय भगवती चण्डिका के प्राकट्य का सजीव वर्णन यहाँ किया गया है। समस्त देवताओं ने अपने-अपने दिव्य आयुध और आभूषण भगवती को समर्पित कर उनसे रक्षा की करुण प्रार्थना की।

अध्याय १४१ – महिषासुर-वध की पावन गाथा

भगवती चण्डिका और महाबली दैत्यराज महिषासुर के मध्य हुए भीषण युद्ध का रोमांचक इतिहास इस अध्याय में अंकित है। भगवती ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध करके तीनों लोकों को भयमुक्त किया और धर्म तथा सत्य की जय-जयकार कराई।

अध्याय १४२ – शुम्भ-निशुम्भ वध एवं देव-स्तुति

अहंकारी दैत्य शुम्भ और निशुम्भ के संहार हेतु भगवती कौशिकी और काली के पराक्रम का विस्तृत वर्णन यहाँ प्रस्तुत है। असुरों के संहार के उपरान्त इन्द्रादि देवताओं ने भगवती की अत्यंत भावपूर्ण स्तुति की और जगत् में पुनः शान्ति स्थापित हुई।

अध्याय १४३ – रक्तबीज-संहार एवं मातृका-महिमा

जिसके रक्त की प्रत्येक बूँद से नया असुर उत्पन्न होता था, उस रक्तबीज दैत्य के संहार हेतु ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी आदि सप्तमातृकाओं और भगवती चामुण्डा के रण-कौशल का वर्णन यहाँ हुआ है। भगवती चामुण्डा ने असुर के समस्त रक्त का पान कर उसका समूल विनाश किया।

अध्याय १४४ – भगवती महालक्ष्मी का स्वरूप एवं स्तुति

सत्त्वगुण की अधिष्ठात्री, सम्पूर्ण जगत का पालन करने वाली भगवती महालक्ष्मी के दिव्य स्वरूप और उनकी स्तुति का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। माता महालक्ष्मी की कृपा से साधक के जीवन से दरिद्रता और दुर्भाग्य सदा के लिए दूर हो जाते हैं।

अध्याय १४५ – भगवती महासरस्वती एवं विद्या-प्राप्ति

ज्ञान, वाणी, विद्या और संगीत की देवी भगवती महासरस्वती के प्राकट्य और उनकी उपासना-विधि का निरूपण यहाँ किया गया है। भगवती सरस्वती की आराधना से मन्दबुद्धि मनुष्य भी परम ज्ञानी और वेद-वेदांगों का पारंगत विद्वान बन जाता है।

अध्याय १४६ – भगवती महाकाली का प्राकट्य एवं असुर-दलन

तमोगुण की अधिष्ठात्री, काल का भी संहार करने वाली भगवती महाकाली के विकराल और कृपामय स्वरूप का आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। भगवती महाकाली अपने अनन्य भक्तों के समस्त भयों, शत्रुओं और काल-दोषों का समूल नाश कर उन्हें अभय प्रदान करती हैं।

अध्याय १४७ – राजा सत्यव्रत का पावन चरित्र

इक्ष्वाकु वंश के धर्मात्मा राजा सत्यव्रत के सत्य-पालन, कठोर तपस्या और धर्म-निष्ठा का प्रेरक आख्यान यहाँ प्रस्तुत किया गया है। राजा ने घोर संकटों के मध्य भी अपने सत्य-धर्म का त्याग नहीं किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान श्रीहरि की विशेष कृपा प्राप्त हुई।

अध्याय १४८ – महर्षि विश्वामित्र और वसिष्ठ संवाद

परम तपस्वी महर्षि वसिष्ठ और राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने विश्वामित्र के मध्य हुए धर्म, तप और सत्य के गूढ़ संवाद का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। इस संवाद के माध्यम से यह प्रमाणित किया गया कि बाहुबल और राजसत्ता की अपेक्षा ब्रह्मतेज और सत्य की शक्ति ही सर्वोपरि है।

अध्याय १४९ – राजा हरिश्चन्द्र की सत्य-निष्ठा

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र के जीवन की कठिन परीक्षा, राज-त्याग, श्मशान-वास और सत्य पर अडिग रहने की पावन ऐतिहासिक गाथा यहाँ अंकित है। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने सत्य के बल पर सम्पूर्ण कुल सहित स्वर्ग और परम धाम की प्राप्ति की।

अध्याय १५० – वैष्णव धर्म-सार एवं पूर्ण शरणागति

भगवान श्रीवराह ने माता धरणी को सम्पूर्ण शास्त्रों और पुराणों का परम सार समझाते हुए शरणागति-धर्म का उपदेश दिया। प्रभु ने स्पष्ट किया कि समस्त कर्मकाण्डों, व्रतों और तीर्थों का अन्तिम लक्ष्य भगवान श्रीनारायण के श्रीचरणों में अनन्य और निष्काम आत्म-समर्पण है, क्योंकि जो जीव सब कुछ छोड़कर केवल भगवान की शरण में आ जाता है, उसका सम्पूर्ण योग-क्षेम स्वयं प्रभु वहन करते हैं और उसे अपने नित्य वैकुण्ठ धाम में अनन्त आनन्द प्रदान करते हैं।

अध्याय १५१ – मथुरा मण्डल के दिव्य कुण्ड एवं वन

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को मथुरा मण्डल के अंतर्गत आने वाले परम पावन सरोवरों, कुण्डों और वनों की अलौकिक महिमा का श्रवण कराया। प्रभु ने बतलाया कि मथुरा के प्रत्येक वन और कुण्ड में भगवान श्रीकृष्ण की नित्य लीलाओं का वास है, जहाँ केवल चरण रखने मात्र से जीव के जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म हो जाते हैं और वह निष्काम भगवद्-प्रेम का दिव्य अनुभव प्राप्त करता है।

अध्याय १५२ – विश्रान्ति तीर्थ एवं यमुना की अनन्त महिमा

कंस का संहार करने के उपरान्त भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने जिस स्थान पर विश्राम किया था, उस विश्रान्ति (विश्राम) तीर्थ और सूर्य-पुत्री यमुना जी के अमृतमय जल का गुणगान इस अध्याय में हुआ है। विश्रान्ति तीर्थ में यमुना-स्नान और आचमन करने से मनुष्य को समस्त तीर्थों के भ्रमण का फल अनायास ही सुलभ हो जाता है और यमराज के दण्ड का भय सदा के लिए मिट जाता है।

अध्याय १५३ – अक्रूर तीर्थ एवं कृष्णलीला स्मरण

भगवान श्रीकृष्ण को गोकुल से मथुरा लाते समय भक्त अक्रूर जी को जहाँ साक्षात् शेष-शय्या पर विराजमान चतुर्भुज नारायण का दर्शन हुआ था, उस पावन अक्रूर तीर्थ का माहात्म्य यहाँ वर्णित है। इस पावन स्थल पर स्नान, दान और प्रभु का ध्यान करने से साधक को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसका चित्त भगवान के नित्य स्वरूप में एकाकार हो जाता है।

अध्याय १५४ – भाण्डीरवन एवं अक्षय वटवृक्ष

द्वापरयुग में भगवान श्रीकृष्ण और सखाओं की बाल-लीलाओं के साक्षी रहे पावन भाण्डीरवन तथा वहाँ स्थित दिव्य अक्षय वटवृक्ष का विशद वर्णन इस अध्याय में किया गया है। भाण्डीरवन में भगवान वंशीधर की आराधना करने से भक्तों की समस्त सात्त्विक कामनाएं पूर्ण होती हैं और उन्हें अखण्ड भक्ति का वरदान प्राप्त होता है।

अध्याय १५५ – गोवर्धन पर्वत एवं नन्दग्राम माहात्म्य

देवराज इन्द्र के गर्व का दलन करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर उठाए गए गिरिराज गोवर्धन और नन्दबाबा के पावन निवास नन्दग्राम की दिव्यता का गान यहाँ हुआ है। गोवर्धन की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा करने वाले मनुष्य को समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है और वह भगवान के परम धाम गोलोक का अधिकारी बनता है।

अध्याय १५६ – गोकर्ण तीर्थ एवं साम्ब का आख्यान

दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित पावन गोकर्ण तीर्थ की महिमा और भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के ऐतिहासिक जीवन-चरित्र का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। महर्षि दुर्वासा के शापवश कुष्ठ रोग से पीड़ित साम्ब ने अपने उद्धार के लिए तीर्थ-सेवन और देवाराधना का मार्ग ग्रहण किया, जिसका मङ्गलमय आख्यान यहाँ प्रस्तुत है।

अध्याय १५७ – भगवान सूर्य की उपासना एवं रोग-निवारण

साम्ब द्वारा चन्द्रभागा नदी के पावन तट पर भगवान भुवन-भास्कर सूर्यदेव की कठोर तपस्या और उनकी असीम कृपा से भयानक कुष्ठ रोग से मुक्ति पाने की ऐतिहासिक गाथा यहाँ अंकित है। भगवान सूर्य की नित्य उपासना और जल-अर्घ्य समर्पण करने से मनुष्य को आरोग्य, तेज और समस्त व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय १५८ – आदित्य स्तोत्र एवं सौर्य-तेज माहात्म्य

भगवान सूर्यदेव की प्रसन्नता प्राप्त करने वाले परम कल्याणकारी आदित्य स्तोत्र और द्वादशादित्य के स्वरूपों का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। इस स्तोत्र के त्रिकाल पाठ से नेत्र-रोग, दरिद्रता और शत्रु-भय का समूल विनाश हो जाता है तथा साधक सूर्य के समान तेजस्वी बनकर यश और कीर्ति प्राप्त करता है।

अध्याय १५९ – कुब्जाम्रक तीर्थ एवं सनत्कुमार संवाद

हरिद्वार के निकट स्थित पावन कुब्जाम्रक तीर्थ में महर्षि रैभ्य की तपस्या और ब्रह्मर्षि सनत्कुमार के मध्य हुए ज्ञान-संवाद का विशद वर्णन यहाँ प्रस्तुत किया गया है। इस पावन तीर्थ में भगवान श्रीहरि की अर्चना करने से साधक को आत्म-साक्षात्कार और परम वैराग्य की सहज प्राप्ति होती है।

अध्याय १६० – कोकामुख तीर्थ एवं भगवान वराह की अनुकम्पा

उत्तुंग हिमालय के सुरम्य अंचल में स्थित गुप्त और परम पावन कोकामुख तीर्थ की अलौकिक महिमा का गान भगवान वराह ने माता पृथ्वी के समक्ष किया। इस पावन धाम में भगवान वराह के विग्रह का दर्शन और पिण्डदान करने से पूर्वजों की मुक्ति सुनिश्चित होती है और साधक को परम पद प्राप्त होता है।

अध्याय १६१ – बदरिकाश्रम धाम एवं नर-नारायण की तपस्या

अलकनन्दा के पावन तट पर स्थित सनातन धाम बदरिकाश्रम (बद्रीनाथ) और वहाँ युगों-युगों से लोक-कल्याणार्थ तपस्या में लीन भगवान नर-नारायण के दिव्य स्वरूप का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। बदरिकाश्रम में तप्तकुण्ड स्नान और भगवान बद्रीनारायण के दर्शन से मनुष्य जीवन-मुक्त हो जाता है।

अध्याय १६२ – मन्दराचल पर्वत एवं भगवान मधुसूदन का प्राकट्य

समुद्र-मन्थन के ऐतिहासिक काल में मथानी बने दिव्य मन्दराचल पर्वत और वहाँ भक्तों के उद्धार हेतु प्रकट हुए भगवान मधुसूदन के मन्दिर की पावन महिमा का निरूपण यहाँ किया गया है। मन्दराचल की यात्रा और भगवान मधुसूदन की पूजा करने से साधक के समस्त पाप कट जाते हैं।

अध्याय १६३ – शालग्राम क्षेत्र एवं पावन गण्डकी नदी

हिमालय की गोद से प्रवाहित होने वाली परम पवित्र गण्डकी नदी और वहाँ साक्षात् भगवान श्रीहरि के स्वरूप चक्रांकित शालग्राम शिलाओं के प्राकट्य का रहस्य यहाँ उद्घाटित हुआ है। गण्डकी में स्नान और घर में शालग्राम जी की नित्य तुलसी-दल से पूजा करने से साक्षात् वैकुण्ठ का वास प्राप्त होता है।

अध्याय १६४ – सौकरव तीर्थ एवं पितृ-मुक्ति विधान

भगवान श्रीवराह की प्रत्यक्ष अवतार-भूमि सौकरव तीर्थ (शूकरक्षेत्र / सोरों) के अनुपम माहात्म्य का विवेचन इस अध्याय में किया गया है। गंगा-तट पर स्थित इस पावन तीर्थ में अस्थि-विसर्जन और पिण्डदान करने से पितरों को तत्काल यम-पाश से मुक्ति मिलकर श्रीहरि के नित्य धाम में स्थान मिलता है।

अध्याय १६५ – मायापुरी हरिद्वार एवं गङ्गावतरण महिमा

सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में अग्रगण्य मायापुरी (हरिद्वार) और ब्रह्मलोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई पतितपावनी भगवती गंगा के माहात्म्य का विशद निरूपण यहाँ हुआ है। हर की पौड़ी पर गंगा-स्नान करने से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के वाचिक, कायिक और मानसिक पाप तत्काल धुल जाते हैं।

अध्याय १६६ – पुरुषोत्तम क्षेत्र एवं भगवान जगन्नाथ का स्वरूप

पूर्वी समुद्र-तट पर स्थित नीलाचल धाम (पुरुषोत्तम क्षेत्र / पुरी) और वहाँ दारुब्रह्म रूप में प्रतिष्ठित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र तथा माता सुभद्रा के दिव्य प्राकट्य का इतिहास यहाँ वर्णित है। जगन्नाथ जी के महाप्रसाद को ग्रहण करने और रथयात्रा के दर्शन से जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।

अध्याय १६७ – सेतुबन्ध रामेश्वरम एवं ज्योतिर्लिंग महिमा

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा लंका पर विजय प्राप्त करने हेतु निर्मित दिव्य सेतुबन्ध और वहाँ स्थापित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में पावन भगवान रामेश्वरम की महिमा का गान यहाँ किया गया है। धनुषकोटि में स्नान और रामेश्वर महादेव का अभिषेक करने से ब्रह्महत्या जैसे घोर पाप भी विनष्ट हो जाते हैं।

अध्याय १६८ – पावन गोदावरी एवं महर्षि गौतम की तपोभूमि

दक्षिण भारत की जीवनदायिनी पावन गोदावरी नदी के प्राकट्य और महर्षि गौतम की कठोर तपस्या से जुड़े त्र्यम्बकेश्वर तीर्थ का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। सिंहस्थ बृहस्पति के समय गोदावरी में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान अक्षय पुण्यफल की प्राप्ति होती है।

अध्याय १६९ – नर्मदा नदी एवं ओंकारेश्वर माहात्म्य

भगवान देवाधिदेव शिव के अङ्ग-स्वेद से प्रकट हुई पावन नर्मदा (रेवा) नदी और उसके तट पर स्थित ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर-ममलेश्वर की महिमा का विवेचन यहाँ हुआ है। नर्मदा के पावन जल के दर्शन मात्र से पापनाश हो जाता है और नर्मदा-परिक्रमा से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय १७० – कावेरी नदी एवं श्रीरङ्गम धाम की दिव्यता

दक्षिण भारत की पावन कावेरी नदी और कावेरी के मध्य स्थित श्रीरङ्गम धाम में शेषनाग की शय्या पर शयन करने वाले भगवान रङ्गनाथ के दिव्य स्वरूप का वर्णन यहाँ किया गया है। कावेरी के पावन जल में अवगाहन करने से साधक भगवान विष्णु के परम लोक का अधिकारी बनता है।

अध्याय १७१ – अवन्तिका नगरी एवं महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग

सप्त पुरियों में विख्यात अवन्तिका (उज्जयिनी), पावन क्षिप्रा नदी और काल के स्वामी भगवान महाकालेश्वर के दिव्य माहात्म्य का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। क्षिप्रा में स्नान कर महाकाल के दर्शन करने से अकाल मृत्यु का भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

अध्याय १७२ – प्रभास तीर्थ एवं भगवान सोमनाथ का प्राकट्य

पश्चिम समुद्र-तट पर स्थित परम पावन प्रभास क्षेत्र और प्रथम ज्योतिर्लिंग भगवान सोमनाथ की स्थापना का ऐतिहासिक आख्यान यहाँ वर्णित है। चन्द्रमा द्वारा यक्ष्मा रोग से मुक्ति हेतु की गई शिव-आराधना और प्रभास-स्नान से समस्त शारीरिक व मानसिक क्लेशों का नाश होता है।

अध्याय १७३ – द्वारका धाम एवं गोमती संगम का माहात्म्य

भगवान श्रीकृष्ण की सुवर्णमयी राजधानी द्वारका पुरी, गोमती नदी और समुद्र के संगम तीर्थ का पावन वर्णन इस अध्याय में किया गया है। द्वारकाधीश भगवान के दर्शन और गोपीचन्दन का तिलक धारण करने वाले भक्त को साक्षात् वैकुण्ठ का आनन्द प्राप्त होता है।

अध्याय १७४ – पुष्कर क्षेत्र एवं ब्रह्मा जी का महायज्ञ

सृष्टिकर्ता परमपिता ब्रह्मा जी के पावन पुष्कर तीर्थ के प्राकट्य और वहाँ सम्पन्न हुए दिव्य महायज्ञ का इतिहास यहाँ अंकित है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर सरोवर में स्नान और जगत्पिता ब्रह्मा जी की अर्चना करने से साधक को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

अध्याय १७५ – नैमिषारण्य धाम एवं महर्षियों का सत्संग

जहाँ भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र की नेमि गिरी थी, उस परम पावन तपोभूमि नैमिषारण्य का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। शौनकादि अठासी सहस्र ऋषियों की इस ज्ञान-भूमि में श्रीमद्भागवत और पुराणों के श्रवण से कलियुग के समस्त दोषों का शमन होता है।

अध्याय १७६ – कुरुक्षेत्र एवं ब्रह्मसरोवर का पावन प्रभाव

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन भूमि, सन्निहित सरोवर और ब्रह्मसरोवर के आध्यात्मिक फल का निरूपण यहाँ किया गया है। कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण और अन्य पुण्य अवसरों पर स्नान तथा दान करने से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों का फल एक साथ प्राप्त होता है।

अध्याय १७७ – गया धाम एवं विष्णुपद पिण्डदान माहात्म्य

पितरों के उद्धार हेतु जगत्-प्रसिद्ध गया धाम, फल्गु नदी और भगवान विष्णु के पावन चरण-चिह्नों (विष्णुपद) की महिमा का विस्तृत विवेचन इस अध्याय में हुआ है। गया तीर्थ में विधिपूर्वक पिण्डदान करने से सौ पीढ़ियों के पितर तृप्त होकर भगवान के परम धाम को गमन करते हैं।

अध्याय १७८ – अविमुक्त काशी क्षेत्र एवं मणिकर्णिका महिमा

भगवान विश्वनाथ की पावन नगरी काशी (अविमुक्त क्षेत्र) और महातीर्थ मणिकर्णिका घाट की अलौकिक महिमा का गान यहाँ किया गया है। काशी में निवास करने और देहत्याग करने वाले प्रत्येक प्राणी को भगवान आशुतोष तारक मन्त्र प्रदान कर संसार-बन्धन से सदा के लिए मुक्त कर देते हैं।

अध्याय १७९ – तीर्थराज प्रयाग एवं त्रिवेणी संगम का अमृत फल

गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल तीर्थराज प्रयागराज की अनुपम श्रेष्ठता और माघ मास के कल्पवास का माहात्म्य इस अध्याय में वर्णित है। प्रयाग की त्रिवेणी में स्नान और वेणी-दान करने से साधक समस्त तीर्थों के पुण्यों का एक साथ अधिकारी बनकर मोक्ष प्राप्त करता है।

अध्याय १८० – सर्वतीर्थ समन्वय एवं मानस तीर्थ का स्वरूप

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को बाह्य तीर्थों के साथ-साथ सत्य, क्षमा, दया, इन्द्रिय-निग्रह और भगवद्-भक्ति रूपी मानस तीर्थों की श्रेष्ठता का उपदेश दिया। प्रभु ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य अपने अन्तःकरण को निर्मल रखकर प्रभु का ध्यान करता है, उसके हृदय में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त तीर्थ नित्य निवास करते हैं।

अध्याय १८१ – राजा सत्यकेतु का पावन चरित्र

परम प्रतापी, धर्मपरायण और न्यायप्रिय राजा सत्यकेतु के जीवन-चरित्र का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। राजा सत्यकेतु ने प्रजा को सन्तानवत् पालते हुए निष्काम भाव से भगवान श्रीहरि की आराधना की और अपने धर्म-बल से सम्पूर्ण पृथ्वी पर सत्य और न्याय की स्थापना की।

अध्याय १८२ – धर्मदत्त और कलह-कलिका का आख्यान

धर्मात्मा ब्राह्मण धर्मदत्त और उनकी कलहप्रिय पत्नी के ऐतिहासिक वृत्तान्त के माध्यम से सत्कर्म, सहिष्णुता और भगवन्नाम के प्रभाव का निरूपण यहाँ किया गया है। धर्मदत्त की निष्ठा और सत्संग के पुण्य प्रभाव से उसकी पत्नी के दुर्गुण भी दूर हो गए और दोनों ने उत्तम गति प्राप्त की।

अध्याय १८३ – नचिकेतस का उपाख्यान एवं पितृ-आज्ञा

महर्षि उद्दालक के तेजस्वी और ज्ञानपिपासु पुत्र नचिकेतस (नचिकेता) के पावन उपाख्यान का प्रारम्भ इस अध्याय में होता है। महर्षि उद्दालक द्वारा आयोजित विश्वजित यज्ञ में अनुपयोगी गायों का दान देखकर धर्मनिष्ठ बालक नचिकेतस ने अपने पिता से अपने विषय में पूछा कि वे उसे किसे दान करेंगे।

अध्याय १८४ – महर्षि उद्दालक का शाप एवं नचिकेतस का यमलोक गमन

क्रोध के वशीभूत होकर पिता उद्दालक द्वारा ‘मैं तुम्हें यमराज को देता हूँ’ कहे जाने पर पितृ-आज्ञा को शिरोधार्य कर नचिकेतस के सदेह यमलोक जाने की ऐतिहासिक घटना यहाँ वर्णित है। पिता के पश्चाताप के उपरान्त भी सत्यनिष्ठ नचिकेतस ने धर्म-मर्यादा की रक्षा हेतु यमपुरी का मार्ग स्वीकार किया।

अध्याय १८५ – यमराज की दिव्य सभा एवं धर्मराज दर्शन

नचिकेतस द्वारा यमलोक पहुँचकर धर्मराज यम की सुसज्जित, न्याय-सम्मत और भव्य सभा का प्रत्यक्ष दर्शन करने का सजीव चित्रण इस अध्याय में किया गया है। धर्मराज यम के तेजस्वी रूप, चित्रगुप्त के न्याय-कर्म और वहाँ उपस्थित विभिन्न देवताओं व ऋषियों की महिमा यहाँ वर्णित है।

अध्याय १८६ – धर्मराज यम द्वारा नचिकेतस का भव्य सत्कार

तीन दिनों तक यमलोक के द्वार पर निराहार प्रतीक्षा करने वाले ब्रह्मचारी नचिकेतस की निष्ठा से प्रसन्न होकर स्वयं धर्मराज यम द्वारा उनका पाद्य-अर्घ्य से सत्कार करने और तीन वरदान माँगने का अनुरोध करने का प्रसंग यहाँ प्रस्तुत है। नचिकेतस ने पितृ-प्रसन्नता, अग्नि-विद्या और आत्मज्ञान के गूढ़ वरदान माँगे।

अध्याय १८७ – पुण्यवान जीवों के दिव्य लोकों एवं विमानों का दर्शन

धर्मराज यम की कृपा से नचिकेतस ने सत्कर्म, परोपकार, यज्ञ, व्रत और भगवद्-भक्ति करने वाले पुण्यात्माओं के दिव्य लोकों, उनके सुवर्णमयी विमानों और अप्सराओं द्वारा की जाने वाली सेवा का प्रत्यक्ष दर्शन किया। पुण्यात्मा जीवों के आनन्द और शान्तिमय जीवन का विशद वर्णन इस अध्याय में मिलता है।

अध्याय १८८ – पापी जीवों के तप्त मार्ग एवं यमदूतों का व्यवहार

संसार में अधर्म, हिंसा, चोरी, विश्वासघात और परपीड़ा में रत रहने वाले पापी जीवों के यमलोक मार्ग पर भोगे जाने वाले भीषण कष्टों का यथार्थ निरूपण यहाँ किया गया है। तप्त बालू, काँटों से भरे मार्ग, भयंकर अन्धकार और यमदूतों के कठोर दण्ड का सजीव वर्णन साधक को पापों से विरत करता है।

अध्याय १८९ – रौरव एवं महारौरव नरक की यातनाएं

जीव-हिंसा और दूसरों का धन हड़पने वाले अपराधियों के लिए निर्धारित रौरव तथा महारौरव नरकों की भयानक अग्नि और रुरु नामक जीवों द्वारा दिए जाने वाले कष्टों का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। पापकर्मियों की करुण पुकार और पश्चाताप का दृश्य यहाँ निरूपित है।

अध्याय १९० – कुम्भीपाक एवं असिपत्रवन नरक का दारुण दृश्य

माता-पिता, गुरु और अतिथियों का अपमान करने वालों तथा विश्वासघातियों के लिए खौलते हुए तैल के कुण्डों वाले कुम्भीपाक नरक और तलवार की धार जैसे पत्तों वाले असिपत्रवन नरक की दारुण यातनाओं का विशद चित्रण यहाँ किया गया है।

अध्याय १९१ – कालसूत्र, तामिस्र एवं अन्धतामिस्र नरक वर्णन

परस्त्री-गमन, झूठी गवाही और ब्राह्मण-द्रोही मनुष्यों के लिए बने कालसूत्र, तामिस्र और महा-अन्धकारमय अन्धतामिस्र नरक के भयानक कष्टों का वर्णन इस अध्याय में हुआ है, जहाँ पापी जीव असह्य पीड़ा भोगते हुए अपने कर्मों का फल पाते हैं।

अध्याय १९२ – विभिन्न पापकर्मों के अनुरूप नरक-दण्ड विधान

धर्मराज यम ने नचिकेतस को विभिन्न पापों (ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी, गुरुपत्नी-गमन और इन पापियों का संग) के अनुसार मिलने वाले विशिष्ट नरक-दण्डों और उनके भोग की कालावधि का सूक्ष्म रहस्य सविस्तार समझाया।

अध्याय १९३ – दान की महिमा एवं यम-यातना से रक्षा

यमराज ने नचिकेतस को बतलाया कि पृथ्वी पर किए गए सत्पात्र दान, सेवा और परोपकार किस प्रकार यमलोक के मार्ग में जीव के सहायक बनते हैं। जो मनुष्य जीवन में श्रद्धापूर्वक दान करते हैं, उन्हें यम-मार्ग की धूप में छाया, प्यास में शीतल जल और भयानक वैतरणी नदी को पार करने हेतु नौका सुलभ होती है।

अध्याय १९४ – गोदान, भूमिदान एवं सुवर्णदान का माहात्म्य

समस्त दानों में सर्वश्रेष्ठ गोदान, भूमिदान और सुवर्णदान के अनुपम माहात्म्य का निरूपण इस अध्याय में हुआ है। विधिपूर्वक कपिला गाय का दान करने वाला साधक वैतरणी नदी को सुखपूर्वक पार कर जाता है और भूमिदान से उसे अक्षय स्वर्ग-लोक की प्राप्ति होती है।

अध्याय १९५ – अन्नदान, जलदान एवं दीपदान का पावन फल

भूखों को अन्न, प्यासों को शीतल जल और देवालयों व चौराहों पर दीपदान करने वाले पुण्यात्माओं को मिलने वाले अलौकिक फलों का वर्णन यहाँ किया गया है। अन्नदान को साक्षात् प्राण-दान माना गया है, जिससे पितर और देवता दोनों तृप्त होकर साधक को अक्षय सुख का आशीर्वाद देते हैं।

अध्याय १९६ – नचिकेतस का भूलोक में पुनरागमन

धर्मराज यम से आत्मज्ञान, कर्मविपाक और दान-धर्म का सम्पूर्ण रहस्य जानकर तथा उनके अनुग्रह से वरदान प्राप्त करके तेजस्वी नचिकेतस के सकुशल भूलोक और पिता के आश्रम में लौटने का पावन प्रसंग इस अध्याय में वर्णित है।

अध्याय १९७ – नचिकेतस द्वारा पिता को यमलोक-वृत्तान्त का उपदेश

आश्रम में लौटकर नचिकेतस ने अपने पिता महर्षि उद्दालक और वहाँ उपस्थित समस्त ऋषियों के समक्ष यमलोक की न्याय-व्यवस्था, पुण्यवानों के सुख, पापियों के दारुण नरक-कष्ट और दानों की महिमा का सविस्तार वर्णन किया, जिसे सुनकर सभी मुनिजन धर्म-पालन में और अधिक दृढ़-संकल्प हुए।

अध्याय १९८ – प्रायश्चित्त-विधान एवं पापनाशक व्रत

अज्ञानतावश किए गए पातकों के निवारण हेतु कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, चान्द्रायण आदि शास्त्रीय प्रायश्चित्त व्रतों और पवित्र नदियों में स्नान की विधि का निरूपण यहाँ किया गया है। सच्चे हृदय से पश्चाताप कर प्रभु-नाम का आश्रय लेने से मनुष्य समस्त पापों से विमुक्त होकर पुनः शुद्ध हो जाता है।

अध्याय १९९ – वैष्णव सदाचार, सत्य-धर्म एवं नित्य भगवत्-चिन्तन

इस अध्याय में वैष्णव साधक के नित्य आचरण, सत्य-भाषण, अहिंसा, परोपकार, तुलसी-सेवा और निरन्तर भगवान श्रीनारायण के मन्त्र-जप के शास्त्रीय नियमों का उपदेश दिया गया है। सदाचार ही धर्म का मूल है और सदाचारी भक्त पर भगवान श्रीहरि की नित्य कृपा बनी रहती है।

अध्याय २०० – श्रीहरि की अनन्य शरणागति एवं परम मोक्ष-प्राप्ति

भगवान श्रीवराह ने माता धरणी को सम्पूर्ण ज्ञान का उपसंहार करते हुए परम वैष्णव धर्म और एकांतिक भगवत्-शरणागति का अमृतमय उपदेश प्रदान किया। प्रभु ने स्पष्ट किया कि समस्त तीर्थों, व्रतों, यज्ञों और तपस्याओं का अन्तिम फल भगवान श्रीहरि के श्रीचरणों में अनन्य प्रेम और आत्म-समर्पण है, जिससे जीवात्मा संसार के समस्त बन्धनों से मुक्त होकर भगवान के नित्य, शाश्वत और परमानन्दमय वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करती है।

अध्याय २०१ – वृषभोत्सर्ग एवं पितृ-मुक्ति विधान

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को पितरों के उद्धार हेतु किए जाने वाले परम पावन वृषभोत्सर्ग संस्कार की शास्त्रीय विधि का उपदेश दिया। प्रभु ने बतलाया कि कार्तिक अथवा आश्विन मास में शुभ नक्षत्र के अंतर्गत सुसज्जित वृषभ (बैल) और चार बछड़ियों का विधिवत पूजन कर उन्हें समाज और प्रकृति के कल्याणार्थ मुक्त करने से पितर तृप्त होकर सहस्रों वर्षों तक पितृलोक में आनन्द भोगते हैं और कुल के समस्त पूर्वज प्रेत-योनि से मुक्त होकर श्रीहरि के नित्य धाम को गमन करते हैं।

अध्याय २०२ – गोदान एवं विभिन्न धेनु-दान माहात्म्य

इस अध्याय में समस्त दानों में शिरोमणि गोदान तथा विभिन्न प्रकार की धेनुओं (यथा तिलधेनु, घृतधेनु, जलधेनु, शर्कराधेनु, सुवर्णधेनु और रत्नधेनु) के निर्माण एवं दान-विधान का विशद विवेचन किया गया है। विधिपूर्वक कपिला गाय का दान करने वाला साधक भयानक वैतरणी नदी को सुखपूर्वक पार कर जाता है और उसके शरीर के जितने रोएं होते हैं, उतने सहस्र वर्षों तक वह स्वर्गलोक में दिव्य सुख प्राप्त करता है।

अध्याय २०३ – तुलापुरुष एवं महादान विधान

षोडश महादानों में सर्वश्रेष्ठ तुलापुरुष महादान की दिव्य विधि और उसके आध्यात्मिक प्रभाव का निरूपण यहाँ हुआ है। सुवर्ण अथवा धान्य से स्वयं को तौलकर सुपात्र ब्राह्मणों और दीन-दुखियों को समर्पित करने से साधक के समस्त घोर पातक तत्काल भस्म हो जाते हैं और वह सूर्य के समान तेजस्वी विमान में आरूढ़ होकर भगवान विष्णु के परम वैकुण्ठ धाम का अधिकारी बनता है।

अध्याय २०४ – भूमिदान एवं सुवर्णदान माहात्म्य

सृष्टि के आधार स्वरूप भूमि के दान और सुवर्णदान के अनुपम माहात्म्य का गान भगवान वराह ने माता धरणी के समक्ष किया। न्यायपूर्वक अर्जित भूमि को भगवद्-प्रीत्यर्थ समर्पित करने वाले मनुष्य को साक्षात् पृथ्वी के समस्त तीर्थों और यज्ञों का फल प्राप्त होता है, तथा सुवर्णदान से साधक की कोटि-कोटि पीढ़ियाँ निष्पाप होकर उत्तम गति प्राप्त करती हैं।

अध्याय २०५ – विद्यादान, अन्नदान एवं औषधदान फल

अज्ञानान्धकार को दूर करने वाले विद्यादान, भूखों को तृप्त करने वाले अन्नदान और रोगियों को जीवनदान देने वाले औषधदान के अलौकिक महत्व का प्रतिपादन इस अध्याय में हुआ है। इन सात्त्विक दानों से मनुष्य संसार में यश, आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त करता है तथा अंत में निष्काम भाव के कारण भगवान के सामीप्य का अधिकारी बनता है।

अध्याय २०६ – पापनाशक प्रायश्चित्त एवं कृच्छ्रव्रत

अज्ञानतावश अथवा प्रमादवश किए गए विविध पापों के शमन हेतु शास्त्रीय प्रायश्चित्तों और कृच्छ्रव्रतों की विस्तृत प्रणाली यहाँ समझाई गई है। प्राजापत्य, पादकृच्छ्र और अतिकृच्छ्र व्रतों के कठोर तप, नियम और उपवास के आचरण से साधक का अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध हो जाता है और वह पुनः धार्मिक कृत्यों का अधिकारी बन जाता है।

अध्याय २०७ – चान्द्रायण व्रत एवं पापनाश विधि

चन्द्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने के अनुसार ग्रास-संख्या निर्धारित कर किए जाने वाले परम पावन चान्द्रायण व्रत की शास्त्रीय विधि इस अध्याय में वर्णित है। पिपीलिका-मध्य और यव-मध्य चान्द्रायण के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से बड़े से बड़े उपपातक और पातक क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं और साधक में आध्यात्मिक तेज का संचार होता है।

अध्याय २०८ – यति-धर्म एवं संन्यास-विधान

भौतिक संसार की असारता को जानकर भगवान श्रीनारायण के अनन्य चिन्तन में लीन रहने वाले संन्यासियों और यतियों के नित्य नियमों का निरूपण यहाँ किया गया है। त्रिदण्ड-धारण, भिक्षाटन-मर्यादा, सर्वभूत-दया, काम-क्रोध का पूर्ण त्याग और निरन्तर ब्रह्म-चिन्तन ही सच्चे यति का लक्षण है, जो उसे सीधे जीवन्मुक्ति के पद पर प्रतिष्ठित करता है।

अध्याय २०९ – वानप्रस्थ एवं गृहस्थ धर्म-मर्यादा

गृहस्थ जीवन के दायित्वों को पूर्ण करने के उपरान्त वन में जाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करने वाले वानप्रस्थ आश्रम के नियमों और सदाचार का वर्णन इस अध्याय में हुआ है। गृहस्थ द्वारा पञ्चमहायज्ञों का सम्पादन और वानप्रस्थी द्वारा इन्द्रिय-संयम का पालन समाज और आत्मा दोनों को धर्म के मार्ग पर सुदृढ़ बनाए रखता है।

अध्याय २१० – ब्रह्मचर्य एवं आत्मसंयम का महत्व

विद्या-अध्ययन, वीर्य-रक्षा, गुरु-सेवा और पवित्र आचरण से युक्त ब्रह्मचर्य आश्रम की महिमा का विशद निरूपण यहाँ किया गया है। इन्द्रियों का दमन कर जो साधक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, उसमें अदम्य ओज, मेधा और आत्मबल का प्राकट्य होता है, जिससे वह कठिन से कठिन आध्यात्मिक ज्ञान को सुगमता से आत्मसात कर लेता है।

अध्याय २११ – सांख्य-ज्ञान एवं अष्टांग योग

भगवान कपिल द्वारा उपदिष्ट सांख्य-दर्शन के चौबीस तत्वों, पुरुष और प्रकृति के भेद, तथा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि रूपी अष्टांग योग की साधना का गूढ़ उपदेश यहाँ दिया गया है। योगबल से चित्तवृत्तियों का निरोध कर साधक अन्तरात्मा में परमपिता परमात्मा के ज्योतिर्मय स्वरूप का साक्षात् दर्शन करता है।

अध्याय २१२ – भक्ति-योग एवं एकांतिक शरणागति

समस्त ज्ञान और योग-मार्गों का सार बताते हुए भगवान श्रीवराह ने भक्ति-योग और एकांतिक शरणागति को मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ और सुगम साधन घोषित किया। निष्कपट भाव से भगवान श्रीनारायण के चरणों में सर्वस्व समर्पण करने वाले भक्त के समस्त योग-क्षेम का वहन स्वयं प्रभु करते हैं और उसे बिना किसी क्लेश के भवसागर से पार उतार देते हैं।

अध्याय २१३ – भगवान वराह द्वारा धरणीदेवी को अंतिम उपदेश

भगवान श्रीवराह ने माता पृथ्वी को सम्पूर्ण धर्म, व्रत, तीर्थ, दान और आत्मज्ञान का सार समझाते हुए अपने अंतिम उपदेश की पूर्णता की। प्रभु ने स्पष्ट किया कि जो भी प्राणी सत्य, अहिंसा, दया और भगवद्-भक्ति को जीवन का आधार बनाता है, उस पर पृथ्वी माता और स्वयं भगवान श्रीहरि की नित्य अनुकम्पा बनी रहती है।

अध्याय २१४ – धरणीदेवी द्वारा भगवान वराह की दिव्य स्तुति

भगवान श्रीवराह के करुणामय वचनों और ज्ञानोपदेश से परम तृप्त होकर माता धरणी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों और गद्गद कण्ठ से प्रभु की अलौकिक स्तुति की। माता पृथ्वी ने वराहरूपधारी श्रीहरि को सृष्टि का रक्षक, दुष्टों का संहारक, वेदों का उद्धारक और चराचर जगत का एकमात्र परम आश्रय मानकर उनके चरणों में बारम्बार प्रणाम किया।

अध्याय २१५ – सूत जी द्वारा शौनकादि ऋषियों को ज्ञान-उपसंहार

नैमिषारण्य के पवित्र क्षेत्र में परम ज्ञानी सूत जी ने भगवान वराह और धरणीदेवी के इस पावन संवाद का उपसंहार करते हुए शौनकादि महर्षियों के समस्त संशयों का निवारण किया। ऋषियों ने परम सन्तुष्ट होकर सूत जी का पूजन किया और सनातन धर्म के इस गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति पर स्वयं को धन्य माना।

अध्याय २१६ – श्रीवराहपुराण का माहात्म्य एवं फलश्रुति

इस अध्याय में श्रीवराहपुराण के नित्य पाठ, श्रवण और मनन से प्राप्त होने वाले अनन्त पुण्यों की विस्तृत फलश्रुति वर्णित है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस पुराण के एक अध्याय अथवा आधे श्लोक का भी नित्य पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है और अंत में भगवान विष्णु के परम वैकुण्ठ धाम को प्राप्त होता है।

अध्याय २१७ – ग्रन्थ-दान विधि एवं वैष्णव महिमा

श्रीवराहपुराण की पावन पोथी को सुवर्ण अथवा रेशमी वस्त्र से वेष्टित कर योग्य, सदाचारी और वैष्णव ब्राह्मण को दान करने की शास्त्रीय विधि का निरूपण यहाँ किया गया है। कार्तिक मास अथवा विषुव संक्रान्ति के दिन इस ग्रन्थ का दान करने वाला साधक कोटि कुलों का उद्धार कर स्वयं सायुज्य मोक्ष प्राप्त करता है।

अध्याय २१८ – उपसंहार एवं मङ्गल-प्रशस्ति

सम्पूर्ण श्रीवराहपुराण का मंगलमय उपसंहार करते हुए अखिल ब्रह्माण्ड नायक भगवान श्रीवराह, माता धरणी, ब्रह्मा, शिव तथा समस्त देवगणों की मङ्गलाशीर्वाद-युक्त वन्दना की गई है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले इस दिव्य ग्रन्थ की समाप्ति पर त्रिलोकी में शान्ति, शुचिता और भगवद्-भक्ति के नित्य प्रसार की पावन प्रार्थना के साथ पुराण पूर्ण होता है।

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