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अष्टादश महापुराणों में श्री नारद पुराण (नारदीय पुराण) अति पावन और ज्ञानवर्धक महापुराण है। यह दो बृहत् भागों में विभक्त है— पूर्वार्ध (पूर्वभाग) और उत्तरार्ध (उत्तरभाग)। पूर्वार्ध स्वयं चार विशाल पादों में संगठित है— प्रथम पाद, द्वितीय पाद, तृतीय पाद और चतुर्थ पाद। प्रथम पाद में ४१ अध्याय हैं जिसमें सनक मुनि वक्ता हैं और नारद जी श्रोता हैं, तत्पश्चात सूत जी नैमिषारण्य के ऋषियों को यह परम गाथा सुनाते हैं। द्वितीय पाद में सनन्दन मुनि वक्ता हैं जिसमें सृष्टि-उत्पत्ति, वर्णाश्रम धर्म, मोक्षधर्म तथा षडंग (वेदांग जैसे शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद) का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। तृतीय पाद में सनत्कुमार मुनि तंत्र, मन्त्र और विविध देवताओं की उपासना पद्धति का रहस्य उजागर करते हैं। चतुर्थ पाद में सनातन मुनि विभिन्न महापुराणों की अनुक्रमणिका और उनकी श्लोक संख्या का विशद वर्णन करते हैं। संपूर्ण पूर्वार्ध में १२५ अध्याय समाविष्ट हैं। प्रस्तुत विषयवस्तु में नारद पुराण के पूर्वार्ध के प्रथम ५० अध्यायों का क्रमबद्ध, विस्तृत तथा भक्तिमय विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है, जो धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के सनातन मार्गों को आलोकित करता है।

श्री नारद पुराण सनातन धर्म का एक ऐसा दिव्य प्रकाशपुंज है जो जीव को परमपद विष्णुधाम की प्राप्ति का प्रत्यक्ष मार्ग प्रदर्शित करता है। इसके प्रमुख विषयों में सर्वोपरि श्रीहरि विष्णु की निष्काम पराभक्ति और भगवन्नाम-संकीर्तन का सर्वशक्तिमान प्रभाव है। इसके अतिरिक्त, इस पावन पुराण में गंगा माहात्म्य का अत्यंत दिव्य कथात्मक वर्णन है, जिसमें राजा भगीरथ की घोर तपस्या और पतितपावनी गंगाजी का भूलोक पर अवतरण जीवंत ऐतिहासिक घटना के रूप में वर्णित है। वर्णाश्रम धर्म, गृहस्थ धर्म के पावन आचार-विचार, सदाचार, नित्य-नैमित्तिक कर्म, तिथि निर्णय, एकादशी एवं द्वादशी व्रत की अपार महिमा, श्राद्ध कल्प तथा यमलोक एवं संसार-गहन का यथार्थ चित्रण इसमें प्राप्त होता है। साथ ही, योग साधना, ज्ञानयोग, भक्ति के नवधा लक्षण, राजा भरत (जड़भरत) का परम वैराग्यमय चरित्र तथा वेदांगों (विशेषकर शिक्षा, व्याकरण, ज्योतिष आदि) का विस्तृत शास्त्रीय ज्ञान इसके मुख्य स्तंभ हैं। यह पुराण केवल एक ग्रंथ नहीं, अपितु समस्त वैदिक ज्ञान और वैष्णव भक्ति का प्रत्यक्ष अमृत-कलश है।

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सरल वचन

पूर्वार्ध का हर अध्याय का विवरण

अध्याय १ – सूत और ऋषियों का पावन संवाद

परम पवित्र तीर्थ नैमिषारण्य के पावन वन में जब शौनक आदि परमज्ञानी महर्षिगण सहस्रों वर्षों के महान सत्र में विराजमान थे, तब वहाँ सर्वशास्त्रज्ञ सूत जी का शुभ आगमन हुआ। समस्त ऋषियों ने परम आदरपूर्वक सूत जी का पूजन किया और जगत् के कल्याण हेतु प्रार्थना की कि वे ऐसा उपाख्यान सुनाएँ जिससे त्रिविध तापों से संतप्त जीवों को परम शांति और मुक्ति प्राप्त हो सके। सूत जी ने अपने गुरुदेव वेदव्यास जी तथा सर्वव्यापी परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीहरि के चरणों में वंदन करते हुए नारद पुराण का पावन प्रसंग आरंभ किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार ब्रह्मर्षि नारद ने महर्षि सनक से सर्वपापनाशक विष्णुभक्ति और पुराण के रहस्य पूछे थे। इस संवाद में सिद्ध हुआ कि केवल श्रीहरि की अनन्य भक्ति ही जीव को संसार रूपी भावबंधन से मुक्त कर सकती है और यही समस्त धर्मों का परम सार है।

अध्याय २ – सर्वव्यापी भगवान विष्णु की पावन स्तुति

इस अध्याय में देवर्षि नारद द्वारा भगवान श्रीहरि की अत्यंत ओजस्वी और भावपूर्ण स्तुति का सजीव वर्णन प्राप्त होता है। नारद जी ने परात्पर पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव के निरंजन, निराकार तथा सगुण-साकार दोनों रूपों की दिव्य वंदना की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान विष्णु ही जगत् की सृष्टि, पालन और संहार के मूल कारण हैं तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव उन्हीं एक परमेश्वर की विभूतियाँ हैं। भगवान श्रीहरि अपने भक्तों के समस्त पापों को क्षणमात्र में भस्म कर देते हैं और निष्काम भाव से की गई भक्ति ही उन्हें सर्वाधिक प्रिय है। इस स्तुति के माध्यम से यह संदेश प्रकट होता है कि जो मनुष्य सर्वदा प्रभु के मंगलमय नाम का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करता है, वह इस मर्त्यलोक में ही परमपद बैकुंठ को हस्तगत कर लेता है।

अध्याय ३ – भूमण्डल और भारतवर्ष का महिमामय वर्णन

इस अध्याय में ब्रह्मांडीय भूगोल तथा विशेष रूप से पावन भारतवर्ष की महिमा का विशद विवरण वर्णित है। महर्षि सनक ने नारद जी को बताया कि समस्त लोकों में भारतवर्ष ही कर्मभूमि है जहाँ जन्म लेकर जीव अपने शुभ-अशुभ कर्मों का क्षय करके परम गति प्राप्त कर सकता है। यहाँ बहने वाली नदियाँ और यहाँ स्थित पवित्र पर्वत-तीर्थ अत्यंत पुण्यदायी हैं। स्वर्ग के देवता भी भारतवर्ष में मनुष्य योनि में जन्म लेने की तीव्र अभिलाषा करते हैं क्योंकि केवल इसी भूमि पर निष्काम कर्मयोग और भगवद्-भक्ति के द्वारा जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति संभव है। यह अध्याय भारतभूमि को केवल एक भौगोलिक खंड नहीं, अपितु मोक्ष का एकमात्र परम द्वार और दिव्य कर्मक्षेत्र सिद्ध करता है।

अध्याय ४ – महर्षि मार्कण्डेय जी का दिव्य आख्यान

महर्षि मार्कण्डेय के प्राकट्य और उनकी परम अद्भुत तपस्या का पावन आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। महर्षि मृकंडु के पुत्र मार्कण्डेय जी ने अल्पायु का योग होने पर भी अपने अटूट संकल्प और निष्काम हरि-भक्ति के बल पर काल पर विजय प्राप्त की। उन्होंने भगवान श्रीहरि और देवाधिदेव महादेव की अनन्य उपासना करके अमरत्व का वरदान प्राप्त किया। जब प्रलय काल में समस्त ब्रह्मांड जलमग्न हो गया था, तब भी मार्कण्डेय जी भगवान की माया का प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए जलराशी में वटवृक्ष के पत्ते पर शयन कर रहे बालमुकुंद श्रीहरि के दर्शन करने में समर्थ हुए। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि प्रभु की शरण में जाने वाले भक्त के लिए काल का भय सर्वथा समाप्त हो जाता है।

अध्याय ५ – महर्षि मार्कण्डेय का तपस्वी जीवन और हरि-साक्षात्कार

इस अध्याय में महर्षि मार्कण्डेय के उग्र तपस्वी जीवन और भगवान श्रीहरि के प्रत्यक्ष साक्षात्कार का विशद वर्णन किया गया है। मार्कण्डेय जी ने इंद्रियों का पूर्ण निग्रह करके सहस्रों वर्षों तक कठोर तपश्चर्या की, जिससे देवराज इंद्र भी भयभीत हो गए। इंद्र द्वारा भेजी गई कामदेव और अप्सराओं की सेना भी मार्कण्डेय जी के अडिग ध्यान को भंग न कर सकी। अंततः भगवान नारायण ने अपने शंख, चक्र, गदा और पद्मधारी चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर मुनि को दर्शन दिए। भगवान ने महर्षि को अपने परम भक्त होने का वरदान दिया और सर्वज्ञता प्रदान की। यह इतिहास इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सच्चे साधक की निष्ठा के समक्ष संहारी प्रलोभन पूर्णतः निष्प्रभ हो जाते हैं।

अध्याय ६ – पतितपावनी गंगा जी का प्रथम माहात्म्य

गंगा जी की अलौकिक महिमा और उनके पावन अवतरण की पृष्ठभूमि का वर्णन इस अध्याय में आरंभ होता है। महर्षि सनक ने गंगा जी को समस्त पापों का नाश करने वाली, परम मुक्तिदायिनी और साक्षात् विष्णु-पादोदका सिद्ध किया है। जो मनुष्य गंगा जी के जल का आचमन करता है, उसमें स्नान करता है या केवल दूर से ही गंगा-गंगा का उच्चारण करता है, उसके कई जन्मों के संचित महापाप तत्काल भस्म हो जाते हैं। गंगा जी का प्रभाव इतना विलक्षण है कि उनके स्पर्शमात्र से जीवों के पितर नरक की यातनाओं से छूटकर उत्तम दिव्य लोकों को प्रस्थान कर जाते हैं। गंगा महिमा का यह प्रसंग जीव के हृदय में परम श्रद्धा और भक्ति का प्रादुर्भाव करता है।

अध्याय ७ – गंगा माहात्म्य की पावन कथा

इस अध्याय में गंगा माहात्म्य की कथा श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए उनके स्नान और दर्शन के अनतुल्य फलों का विस्तृत वर्णन किया गया है। यहाँ अनेक प्राचीन ऐतिहासिक दृष्टांतों के माध्यम से दर्शाया गया है कि किस प्रकार अत्यंत पापी और सदाचारहीन प्राणियों ने भी गंगाजी के जल का संयोग प्राप्त करके परम गति पाई। गंगा जी केवल जल की धारा नहीं हैं, अपितु वे साक्षात् ब्रह्मद्रव हैं जो जगत् के कल्याण हेतु प्रवाहित हो रही हैं। गंगा तट पर किया गया दान, जप, ध्यान और तर्पण सहस्रों गुना अधिक फलदायी होता है। यह प्रसंग श्रोता को पतितपावनी गंगा जी के प्रति अगाध निष्ठा और वंदन भाव से परिपूरित कर देता है।

अध्याय ८ – राजा सगर के पुत्रों की कथा और भगीरथ का संकल्प

इस अध्याय में सूर्यवंशी राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के भस्म होने तथा उनके उद्धार हेतु राजा भगीरथ के दृढ़ संकल्प की कथा वर्णित है। राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा जब इंद्र द्वारा कपिल मुनि के आश्रम में छुपा दिया गया, तब सगरपुत्रों ने मुनि पर मिथ्या दोषारोपण किया जिसके परिणामस्वरूप महर्षि कपिल के क्रोधाग्नि से वे भस्म हो गए। उनके असमय मरण और सद्गति न मिलने के कारण भगीरथ ने अपने पूर्वजों के पितृ-ऋण से मुक्ति हेतु गंगा जी को भूलोक पर लाने का कठोर संकल्प लिया। भगीरथ का यह अनुपम त्याग और पितृ-भक्ति का आदर्श सनातन संस्कृति की अमर धरोहर है जो प्रत्येक पीढ़ी को धर्मपालना की प्रेरणा देती है।

अध्याय ९ – भगीरथ की घोर तपस्या और गंगा जी का भूलोक अवतरण

राजा भगीरथ की अमानुषी और घोर तपस्या का मार्मिक वर्णन इस अध्याय में किया गया है। भगीरथ ने ब्रह्मा जी, देवाधिदेव महादेव और भगवान विष्णु की प्रसन्नता हेतु वर्षों तक कठोर निर्जल और निराहार तप किया। ब्रह्मा जी के वरदान स्वरूप गंगा जी का वेग धारण करने के लिए भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में समेट लिया। तत्पश्चात भगीरथ की प्रार्थना पर शिवजी ने गंगा की एक धारा को भूलोक की ओर प्रवाहित किया। भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलती हुई गंगा जी कपिल मुनि के आश्रम पहुँचीं और सगरपुत्रों की भस्म को स्पर्श करते ही वे समस्त साठ हजार राजकुमार दिव्य देह धारण कर सीधे स्वर्गलोक गमन कर गए।

अध्याय १० – दैत्यों द्वारा देवताओं की पराजय और बलि का उपाख्यान

इस अध्याय में देवासुर संग्राम का ऐतिहासिक विवरण तथा दैत्यराज बलि के अद्भुत ऐश्वर्य का वर्णन प्राप्त होता है। अत्यंत पराक्रमी दैत्यराज बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में सौ अश्वमेध यज्ञ संपन्न करके देवराज इंद्र को परास्त कर दिया और तीनों लोकों का राज्य हस्तगत कर लिया। समस्त देवता स्वर्ग से विस्थापित होकर वन-वन भटकने लगे और अंततः उन्होंने भगवान विष्णु की शरण ली। इस कथा के माध्यम से यह महान सत्य उद्घाटित होता है कि संसार में अधर्म और भौतिक बल कितना भी प्रबल क्यों न हो जाए, अंततः सत्य, धर्म और भगवद-आश्रय की ही विजय होती है।

अध्याय ११ – गंगा जी की उत्पत्ति का रहस्य और वामन अवतार प्रसंग

भगवान विष्णु के वामन अवतार और गंगा जी के प्राकट्य का पावन रहस्य इस अध्याय में उजागर होता है। देवताओं की रक्षा हेतु भगवान श्रीहरि ने माता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लिया और राजा बलि की यज्ञशाला में तीन पग भूमि का दान माँगा। अपने दो पगों में पृथ्वी और अंतरिक्ष को मापने के पश्चात जब भगवान ने अपना चरण सत्यलोक तक बढ़ाया, तब ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु के जल से प्रभु के पादपद्मों का प्रक्षालन किया। वही परम पवित्र चरणोदक गंगा के रूप में प्रकट हुआ। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि गंगा जी साक्षात् विष्णु के श्रीचरणों से उत्पन्न हुई सर्वपापहारिणी दिव्य धारा हैं।

अध्याय १२ – धर्मदेव और राजा भगीरथ का पावन संवाद

इस अध्याय में साक्षात् धर्मदेव और परम धार्मिक राजा भगीरथ के मध्य हुए गूढ़ आध्यात्मिक संवाद का सुंदर चित्रण है। धर्मदेव ने भगीरथ के पितृ-भक्ति और लोक-कल्याणकारी कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने राजा को बताया कि धर्म ही इस संसार का आधार है और जो मनुष्य सत्य, दया, पवित्रता और दान रूपी धर्म के चार चरणों का पालन करता है, भगवान श्रीहरि सदैव उसकी रक्षा करते हैं। भगीरथ ने धर्मदेव से मानव जीवन में आचार-विचार की शुद्धि और भक्ति के नियमों के विषय में जिज्ञासा व्यक्त की, जिसका धर्मदेव ने अत्यंत तात्विक उत्तर प्रदान किया।

अध्याय १३ – सनातन धर्म का विशद निरूपण

इस अध्याय में मानव जीवन के सर्वोत्तम कर्तव्य सनातन धर्म का अत्यंत विशद और स्पष्ट प्रतिपादन किया गया है। महर्षि सनक ने बताया कि मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना, सत्य बोलना, इंद्रियों पर संयम रखना और नित्य भगवद्-अर्चन करना ही वास्तविक धर्म है। धर्महीन मनुष्य साक्षात् पशु के समान है जो केवल भोगों में लिप्त रहता है। इसके विपरीत, धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति समस्त भौतिक सुखों का उपभोग करते हुए अंत में परमपद मोक्ष को प्राप्त करता है। यह अध्याय व्यावहारिक जीवन में धार्मिक मूल्यों के अंगीकार की परम आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

अध्याय १४ – धर्म विधान और शांति-अनुष्ठान के नियम

इस अध्याय में धर्म-कार्यों के अनुष्ठान, प्रायश्चित्त तथा विभिन्न ग्रहों व बाधाओं की शांति हेतु शास्त्रीय नियमों का निरूपण किया गया है। इसमें बताया गया है कि यजन, याजन, दान और तपस्या करते समय मन की पवित्रता और विधि-विधान का पालन कितना अनिवार्य है। यदि निष्काम भाव से और श्रद्धापूर्वक छोटा सा भी धार्मिक अनुष्ठान किया जाए, तो वह अक्षय फल प्रदान करता है। इसके विपरीत, दंभ, अहंकार या छल से किए गए महान अनुष्ठान भी निष्फल हो जाते हैं। यह अध्याय साधक को बाह्य आडंबरों से मुक्त होकर अंतःकरण की शुद्धिपूर्वक धर्म आचरण की सीख देता है।

अध्याय १५ – भगीरथ को गंगा अवतरण का मार्गनिर्देश

इस अध्याय में भगीरथ को गंगा जी को भूलोक पर लाने हेतु आवश्यक योगिक और आध्यात्मिक प्रक्रियाओं का उपदेश दिया गया है। ऋषियों तथा धर्मदेव ने भगीरथ को समझाया कि परात्पर शक्ति गंगा को भूलोक पर स्थिर रखने के लिए केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं, अपितु घोर तपोबल और भगवान शिव की कृपा अनिवार्य है। भगीरथ ने उस उपदेश को शिरोधार्य करते हुए पुनः एकाग्रचित्त होकर आशुतोष भगवान शिव की आराधना आरंभ की। यह प्रसंग संदेश देता है कि महान और असंभव प्रतीत होने वाले लोककल्याणकारी कार्यों की सिद्धि केवल निरंतर प्रयास, धैर्य और भगवत्कृपा से ही संभव होती है।

अध्याय १६ – भगीरथ द्वारा गंगा जी का भूतल पर प्रवाह

इस अध्याय में गंगा जी के पृथ्वी पर प्रवाहित होने तथा उनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों को पवित्र करने का दिव्य वर्णन है। जब गंगा जी शिवजी की जटाओं से छूटकर पृथ्वी पर अवतरित हुईं, तब वे सात धाराओं में विभक्त हो गईं। भगीरथ के दिव्य रथ के पीछे चलती हुई गंगा जी जह्नु मुनि के आश्रम पहुँचीं, जहाँ मुनि ने क्रुद्ध होकर पूरी गंगा को पी लिया, परंतु देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने अपनी कर्ण-रंध्र से पुनः प्रकट किया, जिससे वे जाह्नवी कहलाईं। अंततः गंगा जी ने रसातल में पहुँचकर सगरपुत्रों को परमगति प्रदान की और संपूर्ण भूमंडल पर जीवों के पापों का क्षय करने वाली अमर धारा बन गईं।

अध्याय १७ – द्वादशी व्रत का महात्म्य और विधि

इस अध्याय में भगवान श्रीहरि की परम प्रिय तिथि द्वादशी के व्रत का विशद माहात्म्य और उसकी शास्त्रीय पूजन विधि वर्णित है। महर्षि सनक ने बताया कि जो मनुष्य एकादशी को उपवास रखकर द्वादशी तिथि को भगवान जनार्दन का भक्तिपूर्वक पूजन करता है और पारण करता है, उसके कोटि-कोटि जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से धन, धान्य, संतति और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। द्वादशी व्रत को समस्त व्रतों का राजा कहा गया है, जो साधक को भक्ति और मुक्ति दोनों ही एक साथ प्रदान करने की क्षमता रखता है।

अध्याय १८ – लक्ष्मी-नारायण व्रत का पावन विधान

भगवान श्रीहरि और जगज्जननी माता लक्ष्मी की संयुक्त उपासना वाले लक्ष्मी-नारायण व्रत की विस्तृत महिमा इस अध्याय में वर्णित है। यह व्रत साधक के जीवन से दरिद्रता, दुःख और अशांति का पूर्णतः उन्मूलन कर देता है। अध्याय में व्रत के दिन किए जाने वाले स्नान, मंडप निर्माण, लक्ष्मी-नारायण की स्वर्ण या रजत प्रतिमा के पूजन, धूप-दीप-नैवेद्य अर्पण तथा रात्रि जागरण के नियमों को विस्तार से समझाया गया है। जो गृहस्थ भक्तिभाव से इस व्रत का अनुष्ठान करता है, उसके घर में साक्षात् महालक्ष्मी अचल रूप से निवास करती हैं और अंत में वह दंपत्ति बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।

अध्याय १९ – ध्वजारोपण का माहात्म्य और विधि

भगवान विष्णु के मंदिर के शिखर पर ध्वजा अर्पित करने तथा ध्वजारोपण उत्सव की अपार महिमा का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। मंदिर पर फहराती हुई भगवद्-ध्वजा को जितनी दूर से मनुष्य देखता है, उसके उतने ही पाप नष्ट हो जाते हैं। जो भक्त विष्णु मंदिर पर सुंदर रेशमी ध्वजा स्थापित करता है, वह उतने ही सहस्र वर्षों तक विष्णुलोक में आनंद भोगता है जितने पल वह ध्वजा वायु के वेग से लहराती है। यह अध्याय देव-प्रासाद के निर्माण, जीर्णोद्धार और ध्वजारोपण को महान पुण्य अर्जित करने का सहज और सुलभ माध्यम सिद्ध करता है।

अध्याय २० – परम धार्मिक राजा सुमति का इतिहास

इस अध्याय में पूर्वकाल के परम वैष्णव और धर्मनिष्ठ राजा सुमति का प्रेरक इतिहास वर्णित है। राजा सुमति ने अपने संपूर्ण राज्य में भगवान श्रीहरि की भक्ति और एकादशी-द्वादशी व्रतों का कठोरता से पालन कराया। उनके राज्य में कोई भी पापी, नास्तिक या धर्महीन पुरुष नहीं था। राजा सुमति के तपोबल और भक्ति के प्रभाव से उनका संपूर्ण राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण रहा और अंत काल में राजा अपने समस्त प्रजाजनों के साथ दिव्य विमान में विराजमान होकर साक्षात् बैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गए। यह आख्यान एक आदर्श शासक के कर्तव्यों का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है।

अध्याय २१ – पंचरात्र व्रत की महिमा और अनुष्ठान

इस अध्याय में पंचरात्र व्रत नाम से प्रसिद्ध अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली अनुष्ठान का वर्णन किया गया है। यह व्रत कार्तिक या मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में पाँच दिनों तक लगातार नियमपूर्वक किया जाता है। इसमें भगवान वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और नारायण की पंच-व्यूह रूप में पूजा की जाती है। जो साधक इस पंचरात्र व्रत का निष्काम भाव से आचरण करता है, वह साक्षात् पंच-व्यूहात्मक भगवान श्रीहरि के स्वरूप में लीन हो जाता है। यह व्रत ज्ञान, भक्ति और वैराग्य को तीव्र गति से बढ़ाने वाला परम साधन है।

अध्याय २२ – मासोपवास व्रत की अतुलनीय महिमा

पूरे एक मास तक उपवास रखकर की जाने वाली कठोर साधना मासोपवास व्रत का विस्तृत आख्यान इस अध्याय में वर्णित है। अश्विन या कार्तिक मास में एक माह तक केवल जल या दुग्ध पर रहकर भगवान विष्णु के ध्यान में लीन रहने वाले साधक को परम हंस पद की प्राप्ति होती है। इस व्रत के प्रभाव से शारीरिक और मानसिक समस्त मल नष्ट हो जाते हैं और साधक का शरीर दिव्य ज्योति से संपन्न हो जाता है। यह अध्याय मासोपवास व्रत के कठिन नियमों, दैनिक संध्या-वंदन, जप तथा व्रत के समापन पर किए जाने वाले उद्यापन विधान का संपूर्ण मार्गदर्शन प्रस्तुत करता है।

अध्याय २३ – एकादशी व्रत का सर्वोत्कृष्ट माहात्म्य

समस्त व्रतों में शिरोमणि एकादशी व्रत का अलौकिक माहात्म्य इस अध्याय में प्रतिपादित किया गया है। महर्षि सनक ने नारद जी को बताया कि एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करने वाला पुरुष पाप का ही भक्षण करता है। वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का अपना-अपना विशिष्ट प्रभाव है, जो जीव को समस्त पातकों से मुक्त करके परमपद प्रदान करती हैं। एकादशी के दिन केवल उपवास ही नहीं, अपितु रात्रि में हरि-कीर्तन, नृत्य और जागरण का अत्यंत विशेष महत्व है। यह व्रत भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय है और वैष्णव साधक के जीवन का मूलाधार है।

अध्याय २४ – सदाचार का स्वरूप और दैनिक नियम

इस अध्याय में मानव जीवन को अनुशासित और पवित्र बनाने वाले सदाचार के नियमों का विशद विवेचन है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में जागरण, भगवन्नाम स्मरण, शौच-दंतधावन विधि, नदियाँ या तीर्थों में स्नान, संध्यावंदन, देव-पूजन और पितृ-तर्पण के नियमों को विस्तार से बताया गया है। जो मनुष्य शास्त्रीय सदाचार का निरंतर पालन करता है, वह दीर्घायु, आरोग्य, यश और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है। सदाचार ही धर्म का प्रथम लक्षण है और सदाचारहीन मनुष्य का कोई भी धार्मिक कृत्य पूर्ण फल प्रदान नहीं करता।

अध्याय २५ – स्वाध्याय और नित्य धार्मिक कर्तव्य

इस अध्याय में वेदों के अध्ययन, ज्ञानार्जन तथा दैनिक पंचमहायज्ञों का विशद वर्णन प्राप्त होता है। द्विज के लिए नित्य वेद-पाठ, अतिथियों का सत्कार, जीवों पर दया और बालकों व वृद्धों का पोषण करना अनिवार्य कर्तव्य बताया गया है। स्वाध्याय से बुद्धि निर्मल होती है और अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है। जो मनुष्य नित्यप्रति भगवद्गीता, पुराणों अथवा वेदमंत्रों का पाठ करता है, उसके घर में समस्त देवता और पितर निरंतर निवास करते हैं। यह अध्याय ज्ञानार्जन को मानव जीवन का नित्य कर्म सिद्ध करता है।

अध्याय २६ – गृहस्थ धर्म का विस्तृत वर्णन

मानव समाज के समस्त आश्रमों का मूलाधार गृहस्थ धर्म की महिमा और उसके कर्तव्यों का विशद निरूपण इस अध्याय में किया गया है। गृहस्थ आश्रम ही वह सम्बल है जिसके सहारे ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी अपना जीवन निर्वाह करते हैं। अध्याय में न्यायोपार्जित धन द्वारा परिवार का पालन, धर्मपत्नी के साथ धर्मानुकूल आचरण, अतिथियों का भोजन दान से सत्कार और सत्यवादिता को गृहस्थ का परम धर्म बताया गया है। जो गृहस्थ अपने कर्तव्यों का निष्काम भाव से पालन करता है, वह घर में रहता हुआ भी संन्यासी के समान मोक्ष का अधिकारी बनता है।

अध्याय २७ – गृहस्थ और अन्य आश्रमों के विशेष धर्म

इस अध्याय में गृहस्थ धर्म के अतिरिक्त वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के कड़े नियमों तथा संयम का वर्णन है। वानप्रस्थी को वन में जाकर कंद-मूल का आहार करते हुए तपोमय जीवन बिताना चाहिए, जबकि संन्यासी को समस्त सांसारिक संग-दोषों का त्याग करके केवल परब्रह्म के ध्यान में लीन रहना चाहिए। साथ ही, गृहस्थ के लिए वर्णाश्रम मर्यादा का पालन करते हुए अहिंसा, क्षमा, दया और सरलता जैसे सर्वसामान्य धर्मों को अपनाने पर विशेष बल दिया गया है। यह अध्याय समाज के संपूर्ण ढाँचे को संतुलित रखने हेतु आश्रम व्यवस्था की अपरिहार्यता सिद्ध करता है।

अध्याय २८ – श्राद्ध कल्प और पितृ-तर्पण की विधि

अपने दिवंगत पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने वाले श्राद्ध कल्प का विस्तृत शास्त्रीय विधान इस अध्याय में वर्णित है। इसमें अमावास्या, पितृपक्ष तथा तीर्थों में किए जाने वाले श्राद्ध के योग्य समय, स्थान और पात्र ब्राह्मणों के चयन के नियम दिए गए हैं। विधिपूर्वक अर्पण किए गए जल, तिल और पिंड से पितर अत्यंत तृप्त होते हैं और अपने वंशजों को आयु, प्रजा, धन, विद्या और सुख का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितृ-ऋण से मुक्ति हेतु श्राद्ध कर्म का अनुष्ठान प्रत्येक गृहस्थ के लिए परम आवश्यक कर्तव्य है।

अध्याय २९ – तिथि निर्णय और काल-विधान

इस अध्याय में धार्मिक कृत्यों, व्रतों और पर्वों हेतु शास्त्रीय तिथि निर्णय तथा काल-विभाजन का विस्तृत गणितीय व ज्योतिषीय निरूपण है। सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर तिथियों की वृद्धि, क्षय, वेध और शुद्धता का आकलन कैसे किया जाए, इसे स्पष्ट समझाया गया है। किस तिथि को कौन सी पूजा या दान करना श्रेष्ठ होता है और किस तिथि में कौन से कार्य वर्जित हैं, इसका विशद मार्गदर्शन यहाँ प्राप्त होता है। सही काल और तिथि का ज्ञान ही धार्मिक अनुष्ठानों को पूर्णतः निष्पादित और सफल बनाता है।

अध्याय ३० – पापों का प्रायश्चित्त विधान

इस अध्याय में अज्ञान या प्रमादवश मनुष्य द्वारा किए गए विभिन्न पापों के शमन हेतु प्रायश्चित्त विधान का निरूपण है। महर्षि सनक ने बताया कि यदि पाप करने के पश्चात मनुष्य के मन में सच्चा पश्चाताप उत्पन्न हो और वह शास्त्रीय प्रायश्चित्त जैसे कृच्छ्र-चांद्रायण व्रत, गोदान, स्वर्णदान, तीर्थस्नान अथवा निरंतर भगवन्नाम का जप करे, तो उसके पाप क्षीण हो जाते हैं। परंतु जान-बूझकर किए गए पापों का दंड भोगना ही पड़ता है। यह अध्याय पतित जीवों को पुनः पावन बनने की आशा और शास्त्रीय मार्ग प्रदान करता है।

अध्याय ३१ – यमदूतों के कर्तव्य और यमलोक का भयावह वर्णन

इस अध्याय में यमराज के दूतों के कर्तव्यों तथा पापिष्ठ जीवों को ले जाए जाने वाले भयावह यमलोक का अत्यंत सजीव और चेतावनी पूर्ण चित्रण है। जो मनुष्य जीवन भर अधर्म, परस्त्री गमन, जीव-हिंसा, असत्य भाषण और भगवद्-विमुखता में लिप्त रहते हैं, उन्हें यमदूत तप्त लोहे की साँकलों से बाँधकर काँटेदार मार्गों से घसीटते हुए यमलोक ले जाते हैं। वहाँ कुंभीपाक, रौरव आदि दारुण नरकों में जीव को उसके कर्मानुसार भयानक यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। यह प्रसंग मनुष्य को अधर्म के मार्ग से हटाकर धर्म और हरि-भक्ति की ओर प्रवृत्त करने का कार्य करता है।

अध्याय ३२ – संसार-गहन का रूपक और वैराग्य निरूपण

इस अध्याय में इस क्षणभंगुर संसार की तुलना एक विशाल और भयानक संसार-गहन से करते हुए अत्यंत मार्मिक रूपक बाँधा गया है। इस संसार रूपी वन में काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी हिंसक पशु निरंतर जीव पर आक्रमण करते रहते हैं। विषय-भोग रूपी विषैले वृक्षों के फल खाकर जीव बारंबार जन्म और मृत्यु के गर्त में गिरता है। इस संसार-अटवी से बाहर निकलने का एकमात्र सुरक्षित मार्ग केवल वैराग्य, सत्संग और भगवान श्रीहरि के श्रीचरणों का आश्रय ही है। यह अध्याय साधक के अंतःकरण में तीव्र वैराग्य की ज्वाला प्रज्वलित करता है।

अध्याय ३३ – अष्टांग योग और ध्यान-साधना का स्वरूप

इस अध्याय में चित्त की वृत्तियों के निग्रह हेतु अष्टांग योग का विशद वर्णन किया गया है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठ अंगों का शास्त्रीय लक्षण समझाया गया है। साधक को किस प्रकार एकांत स्थान पर बैठकर अपने हृदयकमल में स्थित भगवान श्रीहरि के चतुर्भुज रूप का निरंतर ध्यान करना चाहिए, इसका विस्तृत मार्गदर्शन यहाँ प्राप्त होता है। योग साधना के माध्यम से जब मन पूर्णतः शांत और निश्चल हो जाता है, तब साधक को परमानंदमय आत्म-साक्षात्कार की अनुभूति प्राप्त होती है।

अध्याय ३४ – हरिभक्ति के लक्षण और नवधा भक्ति

परम पूज्य हरिभक्ति के विविध लक्षणों और नवधा भक्ति का अत्यंत भक्तिमय निरूपण इस अध्याय में किया गया है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन—इन नौ प्रकार की भक्तियों में से किसी भी एक अंग को पूर्णता से अपनाने पर जीव भगवान का परम प्रिय बन जाता है। निष्काम और अनन्य भक्ति ही भगवान को वश में करने का एकमात्र साधन है। जिस मनुष्य के नेत्र हरि-कथा सुनते समय अश्रुपूर्ण हो जाते हैं और शरीर रोमांचित हो जाता है, साक्षात् भगवान श्रीहरि उसके हृदय में सर्वदा के लिए विराजमान हो जाते हैं।

अध्याय ३५ – अध्यात्म ज्ञान और वेदमाली का उपाख्यान

इस अध्याय में परम अध्यात्म ज्ञान का प्रतिपादन तथा इसके व्यावहारिक उदाहरण के रूप में वेदमाली का प्रेरक इतिहास वर्णित है। पूर्वकाल में वेदमाली नामक ब्राह्मण भोग-विलास में लिप्त था, परंतु संत-संगति और महापुरुषों की कृपा से उसे सहसा तत्वज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति हुई। उसने गृह-परिवार का मोह त्याग कर केवल परमात्मा के चिंतन में स्वयं को समर्पित कर दिया और अंत में परम मोक्ष पद प्राप्त किया। यह आख्यान सिद्ध करता है कि सत्संगति का एक क्षण भी मनुष्य के संपूर्ण जीवन की दिशा बदलकर उसे अज्ञान के अंधकार से मोक्ष के प्रकाश की ओर ले जा सकता है।

अध्याय ३६ – भगवान विष्णु की नित्य सेवा की सर्वोत्कृष्ट महिमा

भगवान श्रीहरि की प्रत्यक्ष सेवा का महात्म्य इस अध्याय में स्पष्ट किया गया है। जो भक्त प्रतिदिन भगवान के श्रीविग्रह को भक्तिपूर्वक जल से स्नान कराता है, तुलसी पत्र चढ़ाता है और आरती उतारता है, वह समस्त तीर्थों के स्नान और सहस्रों यज्ञों के अनुष्ठान से भी बढ़कर पुण्य अर्जित करता है। भगवान के मंदिर की सीढ़ियाँ झाड़ने वाला मनुष्य भी समस्त पापों से छूटकर दिव्य विमान का अधिकारी बनता है। यह अध्याय प्रभु की नित्य सेवा-पूजा को अत्यंत सहज और सर्वसुलभ मोक्ष-साधन सिद्ध करता है।

अध्याय ३७ – भगवान श्रीहरि की अपार सर्वोच्चता

इस अध्याय में भगवान श्रीहरि की निरपेक्ष सर्वोच्चता और उनके अनंत ऐश्वर्य का गान किया गया है। महर्षि सनक कहते हैं कि ब्रह्मा, रुद्र, इंद्र आदि समस्त चराचर देव और सिद्ध पुरुष भगवान विष्णु की शक्ति के ही एक अंश से अपनी-अपनी सत्ता धारण करते हैं। पूरी सृष्टि भगवान के संकल्पमात्र से उत्पन्न होती है और प्रलय काल में उन्हीं के उदर में लीन हो जाती है। जो जीव इस सत्य को जानकर केवल भगवान विष्णु का अनन्य भाव से आश्रय ग्रहण करता है, उसे इस संसार में कोई भी भय या शोक पराजित नहीं कर सकता।

अध्याय ३८ – उत्तंक मुनि द्वारा विष्णु स्तुति और मोक्ष प्राप्ति

इस अध्याय में परम तपस्वी उत्तंक मुनि का इतिहास तथा उनके द्वारा की गई दिव्य विष्णु स्तुति का सजीव वर्णन है। उत्तंक मुनि ने घोर तपस्या करके भगवान श्रीहरि के प्रत्यक्ष दर्शन पाए और उनके चरणों में लोटकर अत्यंत सरस और काव्यात्मक स्तुति की। मुनि की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें तत्काल समस्त भव-बंधनों से मुक्त करके अपने परम धाम बैकुंठ में स्थान प्रदान किया। यह इतिहास इस बात का साक्षी है कि भगवान अपने अनन्य भक्तों के भाव के भूखे हैं और वे अपने शरणागत को कभी निराश नहीं करते।

अध्याय ३९ – राजा रैवत का इतिहास और विष्णु महिमा

इस अध्याय में सूर्यवंशी राजा रैवत का अद्भुत इतिहास और भगवान विष्णु के प्रति उनकी निष्ठा का वर्णन है। राजा रैवत ने अपने शासनकाल में प्रजा का धर्मपूर्वक पालन किया और अंत में अपना राज्यपुत्रों को सौंपकर गंधमादन पर्वत पर चले गए। वहाँ उन्होंने सहस्रों वर्षों तक भगवान नारायण का ध्यान किया। प्रभु की कृपा से राजा रैवत को दिव्य ज्ञान और अंततः सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई। यह प्रसंग शिक्षा देता है कि सांसारिक ऐश्वर्य और राज्य भोग का अंततः त्याग करके भगवान के चरणों में लौ लगाना ही जीवन की वास्तविक सफलता है।

अध्याय ४० – सुधर्मा का आख्यान और भगवद-भक्ति की विजय

इस अध्याय में सुधर्मा नामक परम वैष्णव राजा का उपाख्यान वर्णित है। सुधर्मा ने अनेक विघ्न-बाधाओं और शत्रुओं के आक्रमण के बावजूद भगवान विष्णु के प्रति अपनी अनन्य भक्ति और एकादशी व्रत का निष्ठापूर्वक पालन कभी नहीं छोड़ा। जब भी राजा पर कोई विकट संकट आया, भगवान के चक्र सुदर्शन ने स्वयं प्रकट होकर उनकी रक्षा की। अंततः राजा सुधर्मा ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करके विष्णुलोक प्राप्त किया। यह कथा सिद्ध करती है कि जहाँ धर्म और हरि-भक्ति है, वहाँ विजय निश्चित है।

अध्याय ४१ – भगवन्नाम की अलौकिक महिमा

प्रथम पाद के अंतिम अध्याय में भगवन्नाम की अपार और अमित महिमा का ओजस्वी वर्णन किया गया है। महर्षि सनक कहते हैं कि कलयुग में केवल हरे हरये नमः या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जैसे भगवन्नामों का कीर्तन ही जीवों के उद्धार का सर्वोत्तम साधन है। भाव से, कुभाव से, आलस्य से या अनजाने में भी लिया गया भगवन्नाम जीव के जन्म-जन्मांतरों के पापों के ढेर को उसी प्रकार जलाकर भस्म कर देता है जैसे अग्नि का एक छोटा सा तिनका रुई के ढेर को भस्म कर देता है। नाम-महिमा का यह पावन प्रसंग प्रथम पाद का परम दिव्य सार है।

अध्याय ४२ – सृष्टि-प्रक्रिया और ब्रह्मांड की उत्पत्ति

द्वितीय पाद के प्रथम अध्याय में सनन्दन मुनि द्वारा देवर्षि नारद को ब्रह्मांड की उत्पत्ति का तात्विक वर्णन सुनाया गया है। प्रलय काल में जब सब कुछ अंधकारमय और शांत था, तब परात्पर पुरुषोत्तम भगवान श्रीहरि ने अपनी त्रिगुणात्मिका माया को क्षुब्ध किया। प्रकृति से महत्तत्व, महत्तत्व से अहंकार और अहंकार से पंचतन्मात्राएँ तथा पंचमहाभूत उत्पन्न हुए। तत्पश्चात भगवान के नाभि-कमल से ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ और उन्होंने स्थावर-जंगम समस्त जगत् की रचना की। यह अध्याय सृष्टि विज्ञान का विस्तृत वैदिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

अध्याय ४३ – ब्राह्मणों के सनातन कर्तव्य और सदाचार

इस अध्याय में समाज के पथप्रदर्शक ब्राह्मणों के सनातन कर्तव्यों और उनके आचार-विचार का शास्त्रीय निरूपण किया गया है। सनन्दन मुनि ने बताया कि ब्राह्मण का वास्तविक बल उसकी तपस्या, सत्यवादिता, क्षमा, दया और वेद-अध्ययन में निहित है। धन या शक्ति का अहंकार करने वाला ब्राह्मण अपने तपोबल को खो बैठता है। ब्राह्मण को नित्य संध्यावंदन, अग्निहोत्र और भगवद्-पूजन में लीन रहना चाहिए। जो ब्राह्मण क्रोधरहित, जितेंद्रिय और सर्वभूतों का हितैषी होता है, वह साक्षात् पृथ्वी पर देवता के समान वंदनीय है।

अध्याय ४४ – ध्यान-योग का विशद शास्त्रीय निरूपण

इस अध्याय में भगवान श्रीहरि के सगुण और निर्गुण रूप के ध्यान-योग की सूक्ष्म प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। ध्यान के लिए साधक को अपने शरीर, ग्रीवा और मस्तक को सीधा रखकर, मन को बाहरी विषयों से हटाकर हृदय-गुहा में एकाग्र करना चाहिए। वहाँ शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, नीलमेघ के समान श्यामवर्ण, पीतांबरधारी भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। निरंतर ध्यान के अभ्यास से साधक का अंतःकरण पूर्णतः शुद्ध हो जाता है और उसे परमानंद की प्राप्ति होती है।

अध्याय ४५ – मोक्षधर्म का विशद प्रतिपादन

इस अध्याय में जीव को भावबंधन से सदा के लिए मुक्त करने वाले मोक्षधर्म का अत्यंत गंभीर और दार्शनिक विवेचन किया गया है। सनन्दन मुनि ने समझाया कि अज्ञान और मैं तथा मेरा रूपी ममता ही संसार-बंधन का मूल कारण है। जब विवेक-ज्ञान के द्वारा जीव यह समझ लेता है कि वह पंचमहाभूतों से निर्मित यह नश्वर शरीर नहीं, अपितु अजर-अमर सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा है, तब उसके समस्त कर्म-बंधन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। केवल भगवद-अनुग्रह और आत्म-ज्ञान ही मोक्ष का साक्षात कारण है।

अध्याय ४६ – आध्यात्मिक विषयों का विशद विवेचन

इस अध्याय में आत्मा, परमात्मा, जीव और अविद्या के गूढ़ आध्यात्मिक स्वरूप का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। जैसे एक ही आकाश घड़ों में घटकाश के रूप में भिन्न प्रतीत होता है, परंतु वास्तव में वह एक ही है, उसी प्रकार एक ही परमात्मा समस्त जीवों के हृदयों में साक्षी रूप में स्थित है। अविद्या के कारण जीव स्वयं को कर्ता और भोक्ता मानकर सुख-दुःख के चक्र में पिसता रहता है। ज्ञान की ज्योति जलते ही अविद्या का नाश हो जाता है और जीव अपने शुद्ध परमात्मा रूप को पहचान लेता है।

अध्याय ४७ – आत्म-साक्षात्कार का प्रत्यक्ष मार्ग

इस अध्याय में आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के व्यावहारिक और शास्त्रीय उपायों का निरूपण किया गया है। गुरु की निष्काम सेवा, वेदों के अर्थ का विचार, इंद्रियों का निग्रह, विषयों से वैराग्य और निरंतर भगवद्-चिंतन ही आत्म-साक्षात्कार के मुख्य सोपान हैं। जिस साधक ने अपने मन को पूर्णतः वश में कर लिया है और जो लाभ-हानि, सुख-दुःख तथा मान-अपमान में समभाव रखता है, उसे इसी जीवन में जीवन्मुक्ति का अलौकिक आनंद प्राप्त हो जाता है।

अध्याय ४८ – राजा भरत का चरित्र और जड़भरत का आख्यान

इस अध्याय में परम विरक्त राजा भरत का अद्भुत चरित्र और उनके जड़भरत बनने का प्रेरक इतिहास वर्णित है। चक्रवर्ती राजा भरत अपना विशाल राज्य त्याग कर वन में तपस्या करने लगे, परंतु एक मृगछौने के प्रति अत्यधिक मोह उत्पन्न होने के कारण उन्हें अगले जन्म में मृग बनना पड़ा। मृग देह में भी पूर्वजन्म की स्मृति रहने के कारण वे पूर्णतः असंग रहे और तत्पश्चात ब्राह्मण कुल में जड़भरत के रूप में अवतरित हुए। जड़भरत ने राजा राहूगण को परम अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया। यह इतिहास सिखाता है कि साधक को साधना काल में सूक्ष्म मोह से भी सर्वथा सावधान रहना चाहिए।

अध्याय ४९ – मुक्तिप्रद पुण्य-मार्ग और सुकृत कर्म

इस अध्याय में जीव को परम गति की ओर ले जाने वाले मुक्तिप्रद पुण्य-मार्ग और शुभ कर्मों का निरूपण किया गया है। निष्काम भाव से किए गए जप, तप, दान, यज्ञादि कर्म ही वास्तविक सुकृत हैं जो अंतःकरण को शुद्ध करते हैं। किसी भी कर्म के फल की इच्छा न रखकर उसे केवल भगवान श्रीहरि के चरणों में समर्पित कर देना कर्मयोग कहलाता है। जो साधक अपने समस्त कर्मों को भगवान में अर्पण कर देता है, वह पाप-पुण्य दोनों के बंधनों से ऊपर उठकर मोक्ष पद का अधिकारी बनता है।

अध्याय ५० – वेदांग शिक्षा: स्वर एवं वर्ण निर्णय

इस अध्याय से नारद पुराण में षडंग के अति दुर्लभ और विशद ज्ञान का निरूपण आरंभ होता है, जिसमें प्रथम वेदांग शिक्षा का प्रतिपादन किया गया है। वेदांग शिक्षा के अंतर्गत वेदमंत्रों के शुद्ध उच्चारण हेतु स्वरों, वर्णों, मात्राओं, बल, साम और संतान के शास्त्रीय नियमों का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। वेदमंत्रों का अशुद्ध उच्चारण अनर्थकारी होता है, अतः मंत्रों की प्रामाणिकता और पवित्रता बनाए रखने के लिए शिक्षा शास्त्र का ज्ञान अनिवार्य बताया गया है। यह अध्याय नारद पुराण को केवल भक्ति ग्रंथ ही नहीं, अपितु समस्त वैदिक विद्याओं का महाकोश सिद्ध करता है।

अध्याय ५१ – द्वितीय वेदांग कल्प निरूपण

इस अध्याय में षडंगों के अंतर्गत द्वितीय वेदांग कल्प का विशद और प्रामाणिक निरूपण किया गया है। सनन्दन मुनि ने देवर्षि नारद को बताया कि कल्प शास्त्र वेदों के हस्त रूप हैं, जो वैदिक यज्ञों, अनुष्ठानों तथा श्रौत-स्मार्त कर्मों का सम्पादन कराने वाले विधि-विधानों का प्रतिपादन करते हैं। इसमें श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र के लक्षणों को स्पष्ट करते हुए विभिन्न यज्ञवेदियों के निर्माण, समिधा, पात्र तथा आहुति की शास्त्रीय मर्यादाओं को समझाया गया है। जो साधक कल्प शास्त्र के नियमों के अनुसार यज्ञानुष्ठान सम्पादित करता है, उसके समस्त देव-ऋण उतर जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। यह अध्याय कर्मकाण्ड के सुव्यवस्थित स्वरूप को उजागर करता है।

अध्याय ५२ – तृतीय वेदांग व्याकरण निरूपण

इस अध्याय में वेदांगों के सर्वप्रमुख मुख-स्वरूप तृतीय वेदांग व्याकरण का गहन और विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। सनन्दन मुनि ने बताया कि शब्द-ब्रह्म की शुद्धि और वेदमन्त्रों के सही उच्चारण तथा अर्थ-बोध के लिए व्याकरण का ज्ञान अनिवार्य है। इसमें वर्ण, धातु, प्रत्यय, समास, सन्धि, कारक तथा तद्धित रूपों के शास्त्रीय नियमों को संक्षेप में परंतु सर्वांगीण रूप से समझाया गया है। व्याकरणहीन पठन से मन्त्र का अनर्थ हो जाता है, जिससे इष्ट फल के स्थान पर प्रतिकूल परिणाम मिल सकता है। यह अध्याय सिद्ध करता है कि शब्दों की साधुता और शुद्धता ही वेदवाणी के साक्षात् स्वरूप की रक्षा करती है।

अध्याय ५३ – चतुर्थ वेदांग निरुक्त निरूपण

इस अध्याय में वेदों के श्रोत्र-स्वरूप चतुर्थ वेदांग निरुक्त के गूढ़ रहस्य का उद्घाटन किया गया है। महर्षि यास्क द्वारा रचित निघण्टु और निरुक्त की परम्परा के अनुसार इसमें वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति, मूल धातुओं तथा कठिन मन्त्रों के अर्थ-उद्घाटन की विधि का वर्णन है। सनन्दन मुनि ने समझाया कि केवल व्याकरण से वेदमन्त्रों का गूढ़ भाव प्रकट नहीं होता, अपितु निरुक्त शास्त्र ही वैदिक ऋचाओं में छिपे देवताओं के रहस्य और अर्थ-तत्त्व को प्रत्यक्ष करता है। यह अध्याय साधक को वैदिक शब्दों के सनातन अर्थ-गंभीरता से परिचित कराता है।

अध्याय ५४ – पंचम वेदांग ज्योतिष निरूपण

इस अध्याय में वेदों के नेत्र-स्वरूप पंचम वेदांग ज्योतिष शास्त्र का अनुपम और गणितीय निरूपण किया गया है। इसमें काल-विभाजन, सूर्य और चन्द्र की गति, नक्षत्रों, ग्रहों, राशियों, ग्रहणों, अयनांश तथा संवत्सर का विस्तृत विवरण दिया गया है। सनन्दन मुनि ने स्पष्ट किया कि समस्त यज्ञ-याग, व्रत, पर्व तथा संस्कार काल-सापेक्ष होते हैं और सही काल का ज्ञान केवल ज्योतिष शास्त्र से ही सम्भव है। ग्रह-नक्षत्रों की अनुकूलता और प्रतिकूलता का विचार करके किए गए कृत्य शीघ्र सिद्ध होते हैं। यह अध्याय आकाशगंगा के सनातन गणित और मानव जीवन पर उसके प्रत्यक्ष प्रभाव का उद्घाटन करता है।

अध्याय ५५ – षष्ठ वेदांग छंद निरूपण

इस अध्याय में वेदांगों के चरण-स्वरूप षष्ठ वेदांग छंद शास्त्र का विस्तृत शास्त्रीय वर्णन प्राप्त होता है। इसमें गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् तथा जगती आदि प्रमुख वैदिक एवं लौकिक छंदों के लक्षण, मात्रा-संख्या और यति के नियमों का निरूपण किया गया है। सनन्दन मुनि ने बताया कि छंदों के ज्ञान बिना वेदमन्त्रों का गायन या पाठ अपूर्ण रहता है। छंद ही वेदवाणी को गति, लय और मोज प्रदान करते हैं। यह अध्याय षडंगों की सांगोपांग समाप्ति करता हुआ वेदांग ज्ञान को वैदिक अध्ययन का मूलाधार सिद्ध करता है।

अध्याय ५६ – तृतीय पाद का आरम्भ और सनत्कुमार-नारद संवाद

इस अध्याय से नारद पुराण के पूर्वार्ध का तृतीय पाद (सनत्कुमार संहिता) आरम्भ होता है। परम पावन ब्रह्मर्षि सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद के भक्तिमय प्रश्नों से प्रसन्न होकर उन्हें तन्त्र, मन्त्र और देव-उपासना के परम गोपनीय ज्ञान का उपदेश देना आरम्भ किया। सनत्कुमार जी ने बताया कि कलयुग में केवल शुष्क ज्ञान से सिद्धि दुर्लभ है, अतः मन्त्र-साधना ही जीवों को अल्प प्रयास में परमपद विष्णुधाम पहुँचाने वाली नौका है। इस पावन संवाद में तन्त्र शास्त्र के वैष्णव स्वरूप का प्रादुर्भाव होता है जो पूर्णतः वैदिक मर्यादा और निष्काम भक्ति पर आधारित है।

अध्याय ५७ – दीक्षा विधान और गुरु-शिष्य लक्षण

इस अध्याय में मन्त्र-साधना के प्रथम द्वार दीक्षा संस्कार तथा उत्तम गुरु और योग्य शिष्य के लक्षणों का विस्तार से वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि बिना दीक्षा के किया गया कोई भी मन्त्र-जप या अनुष्ठान निष्फल हो जाता है। सद्गुरु वही है जो वेद-वेदांगों का पारगामी, भगवद्भक्त, क्रोधहीन और शिष्य पर अनुग्रह करने वाला हो। योग्य शिष्य वही है जो गुरु-सेवा में समर्पित, नम्र, धर्मनिष्ठ और मन्त्र को गुप्त रखने वाला हो। अध्याय में दीक्षा के विभिन्न प्रकारों तथा दीक्षा के समय किए जाने वाले मण्डल-पूजन और मन्त्र-दान का विशद विधान वर्णित है।

अध्याय ५८ – मन्त्र-लक्षण एवं मन्त्र-शोधन विधि

इस अध्याय में मन्त्रों के विभिन्न भेदों, उनके लक्षणों तथा मन्त्र-शोधन की गहन प्रक्रिया का निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि मन्त्र तीन प्रकार के होते हैं— पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग। साधक को अपनी राशि और मन्त्र के अकारादि वर्णों का विचार करके सिद्ध, साध्य, सुसिद्ध और अरि मन्त्रों का शोधन करना चाहिए। यदि मन्त्र अरि या सुप्त हो तो उसका शोधन करके ही जप आरम्भ करना चाहिए, अन्यथा कष्ट होता है। यह अध्याय मन्त्र-शास्त्र की वैज्ञानिकता और उसकी सूक्ष्म कुञ्जी को उजागर करता है।

अध्याय ५९ – श्रीगणेश मन्त्र एवं पूजन विधान

इस अध्याय में विघ्नहर्ता प्रथमपूज्य श्रीगणेश जी के विभिन्न सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों तथा उनकी पूजन पद्धति का भक्तिमय वर्णन है। सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद को श्रीगणेश जी के एकाक्षर, षडाक्षर तथा उच्छिष्ट गणपति मन्त्रों का जप-विधान सिखाया। गणेश-यन्त्र के निर्माण, पीठावरण-पूजा, मोदक एवं दुर्वा द्वारा तर्पण तथा गणेश-कवच का पाठ करने से साधक के समस्त विघ्न-बाधाएँ तत्काल भस्म हो जाती हैं और उसे सर्व-कार्यों में सिद्धि एवं बुद्धि की प्राप्ति होती है। यह प्रसंग गणेश-भक्ति का परम संबल प्रदान करता है।

अध्याय ६० – सूर्यदेव मन्त्र एवं उपासना पद्धति

इस अध्याय में प्रत्यक्ष देवता सूर्यदेव की अलौकिक महिमा, उनके सिद्ध मन्त्रों और उपासना विधि का वर्णन प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि सूर्यदेव साक्षात् श्रीहरि के ही प्रत्यक्ष रूप हैं जो संपूर्ण जगत् को जीवन और ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसमें सूर्य-गायत्री, एकाक्षर मन्त्र, सूर्य-यन्त्र के निर्माण तथा प्रातःकाल अर्घ्यदान की विधि विस्तार से बताई गई है। सूर्य उपासना से मनुष्य को आरोग्यता, तेजोवृद्धि, नेत्र-ज्योति, सर्व-पाप-मुक्ति और अंत में सूर्यलोक की प्राप्ति होती है। यह प्रसंग सूर्य-भक्ति की सनातन मर्यादा को स्थापित करता है।

अध्याय ६१ – विष्णु-मन्त्र एवं न्यास विधान

इस अध्याय में परमेश्वर भगवान श्रीहरि विष्णु के परम पावन अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) एवं द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रों की महिमा तथा उनके विविध न्यासों का विशद वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि मन्त्र-जप से पूर्व अंगन्यास, करन्यास तथा व्यापकन्यास करना अनिवार्य है, जिससे साधक का शरीर मन्त्रमय और दिव्य बन जाता है। इस न्यास विधान से साधक के समस्त पापों का नाश होता है और वह भगवान के चतुर्भुज रूप का ध्यान करने में समर्थ होता है। यह अध्याय वैष्णव-साधना का मूलाधार प्रस्तुत करता है।

अध्याय ६२ – वासुदेव एवं वामन मन्त्र साधना

इस अध्याय में भगवान वासुदेव तथा वामन अवतार के सिद्ध मन्त्रों और उनकी साधना-पद्धति का विस्तृत विवरण दिया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि भगवान वामन के मन्त्र का जप करने से साधक को खोया हुआ राज्य, ऐश्वर्य और भूमि-संपत्ति पुनः प्राप्त हो जाती है, जैसा कि पूर्वकाल में देवताओं को प्राप्त हुई थी। वासुदेव-मन्त्र का निरन्तर जप करने से हृदय का अज्ञान रूपी अंधकार नष्ट हो जाता है और साधक को साक्षात् भगवद्-साक्षात्कार की योग्यता प्राप्त होती है। यह अध्याय संकट-निवारण हेतु भगवद्-आश्रय का मार्ग दिखाता है।

अध्याय ६३ – श्रीहनुमान मन्त्र और यन्त्र विधान

इस अध्याय में भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त श्रीहनुमान जी के अत्यंत प्रभावशाली मन्त्रों, यन्त्रों और साधना-नियमों का ओजस्वी वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि श्रीहनुमान जी कलयुग में साक्षात् जाग्रत देवता हैं जो अपने साधक की भूत, प्रेत, पिशाच, रोग और शत्रु-बाधाओं से क्षणमात्र में रक्षा करते हैं। इसमें हनुमद्-यन्त्र लेखन, चमेली के तेल और सिन्दूर से पूजन, मन्त्र-जप तथा हनुमत्-कवच के विधान को समझाया गया है। जो साधक निष्काम भाव से हनुमान जी की शरण लेता है, उसे अतुलित बल, बुद्धि और भक्ति की प्राप्ति होती है।

अध्याय ६४ – श्रीनृसिंह मन्त्र और साधना पद्धति

इस अध्याय में भगवान विष्णु के उग्र एवं भक्तवत्सल नृसिंह अवतार के सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों और उनकी उपासना विधि का सजीव वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि श्रीनृसिंह मन्त्र समस्त मन्त्रों में सर्वशक्तिमान और भय-विनाशक है। अनुष्टुप् नृसिंह मन्त्र के जप से साधक के हृदय का भय, अकाल मृत्यु का योग और उग्र शत्रु-बाधाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं। नृसिंह-यन्त्र की प्रतिष्ठा करके भक्तिपूर्वक पूजन करने से साधक को अभय पद प्राप्त होता है और भगवान नृसिंह प्रह्लाद के समान अपने भक्त की सर्वदा रक्षा करते हैं।

अध्याय ६५ – श्रीहयग्रीव एवं गोपीजनवल्लभ मन्त्र

इस अध्याय में ज्ञान के दाता भगवान हयग्रीव तथा भक्त-वत्सल श्रीगोपीजनवल्लभ (श्रीकृष्ण) के परम सिद्ध मन्त्रों का निरूपण किया गया है। भगवान हयग्रीव के मन्त्र का जप करने से साधक को समस्त वेदों, शास्त्रों, विद्याओं और काव्य-रचना का अलौकिक ज्ञान प्राप्त होता है तथा उसकी वाक्-सिद्धि जाग्रत होती है। वहीं गोपीजनवल्लभ मन्त्र का अनुष्ठान करने से साधक के अंतःकरण में विशुद्ध प्रेमाभक्ति और मधुर भाव का स्फुरण होता है। यह अध्याय ज्ञान और भक्ति दोनों के चरम उत्कर्ष का साधन प्रदान करता है।

अध्याय ६६ – श्रीराम मन्त्र और उपासना विधान

इस अध्याय में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के षडाक्षर, त्रयोदशाक्षर तथा राम-गायत्री मन्त्रों का परम भक्तिमय निरूपण प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि ‘राम’ नाम ही समस्त पापों को भस्म करने वाला और तारक मन्त्र है। इसमें राम-यन्त्र की रचना, श्रीरामचन्द्र जी के धनुर्धारी रूप का ध्यान, सीता-राम जी के युगल स्वरूप का अर्चन तथा राम-मन्त्र के पुरश्चरण के नियमों को विस्तार से समझाया गया है। इस मन्त्र के जप से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों फलों की सहज प्राप्ति होती है।

अध्याय ६७ – श्रीसीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न मन्त्र

इस अध्याय में भगवती सीता जी तथा उनके अनुज श्रीलक्ष्मण, श्रीभरत एवं श्रीशत्रुघ्न जी के विशिष्ट मन्त्रों और उनकी उपासना विधि का वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि माता जानकी का मन्त्र सर्व-समृद्धि और पातिव्रत्य धर्म प्रदान करने वाला है। श्रीलक्ष्मण जी का मन्त्र शेषनाग की कृपा और शत्रु-जय प्रदान करता है, भरत जी का मन्त्र भक्ति और भ्रातृ-प्रेम बढ़ाता है तथा शत्रुघ्न जी का मन्त्र समस्त आंतरिक और बाह्य शत्रुओं का शमन करता है। यह अध्याय सम्पूर्ण राम-परिवार की उपासना का सर्वांगीण मार्ग प्रस्तुत करता है।

अध्याय ६८ – श्रीगोपाल मन्त्र और यन्त्र साधन

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण के बाल-स्वरूप तथा मदन-गोपाल स्वरूप के विविध मन्त्रों, यन्त्रों और साधना-विधियों का अति मधुर वर्णन है। सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद को अष्टादशाक्षर गोपाल मन्त्र की अलौकिक महिमा बताई। इस मन्त्र के साधन से साधक को संतान-प्राप्ति, सुख-समृद्धि, जगत्-मोहन शक्ति तथा श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य निकुञ्ज-रस की प्राप्ति होती है। गोपाल-यन्त्र का पूजन और माखन-मिश्री का भोग अर्पण करने से भगवान श्रीकृष्ण साधक के घर में अचल निवास करते हैं।

अध्याय ६९ – त्रैलोक्यमोहन और श्रीधर मन्त्र विधान

इस अध्याय में भगवान विष्णु के त्रैलोक्यमोहन तथा श्रीधर स्वरूपों के अति दुर्लभ मन्त्रों और यन्त्रों का निरूपण किया गया है। त्रैलोक्यमोहन मन्त्र के अनुष्ठान से साधक तीनों लोकों में पूजनीय हो जाता है और उसके व्यक्तित्व में अलौकिक आकर्षण एवं तेज का संचार होता है। श्रीधर मन्त्र का जप करने से दरिद्रता का पूर्ण विनाश होता है और महालक्ष्मी अचल रूप से साधक के गृह में विराजमान रहती हैं। यह अध्याय भौतिक समृद्धि के साथ-साथ भगवद्-प्राप्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

अध्याय ७० – सुदर्शन मन्त्र और यन्त्र पूजा

इस अध्याय में भगवान विष्णु के अमोघ अस्त्र श्रीसुदर्शन चक्र के सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों और उनकी प्रचण्ड शक्ति का वर्णन प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि सुदर्शन चक्र भगवान की रक्षा-शक्ति का प्रत्यक्ष प्रतीक है। सुदर्शन मन्त्र का जप और यन्त्र की पूजा करने से असाध्य रोग, महामारियाँ, तांत्रिक अभिचार-दोष और शत्रुओं के षड्यंत्र तत्काल निष्प्रभावी हो जाते हैं। सुदर्शन चक्र अपने साधक के चारों ओर एक अभेद्य ज्योतिर्मय कवच का निर्माण कर देता है जो सर्वदा उसकी रक्षा करता है।

अध्याय ७१ – महालक्ष्मी मन्त्र और श्रीसूक्त विधान

इस अध्याय में जगज्जननी महालक्ष्मी जी के सिद्ध मन्त्रों, श्रीसूक्त के विधान तथा यन्त्र-पूजन की विस्तृत महिमा वर्णित है। सनत्कुमार जी ने बताया कि महालक्ष्मी केवल धन की देवी नहीं, अपितु भगवान विष्णु की परा-शक्ति हैं। इसमें लक्ष्मी-गायत्री, कमला-मन्त्र, अष्टलक्ष्मी-पूजन तथा श्रीसूक्त द्वारा कमल-पुष्पों और घृत से हवन करने की विधि बताई गई है। जो साधक नियमपूर्वक महालक्ष्मी की उपासना करता है, उसके जीवन से दुर्भाग्य, ऋण और अज्ञान सदा के लिए मिट जाता है।

अध्याय ७२ – सरस्वती और मातंगी मन्त्र साधना

इस अध्याय में भगवती सरस्वती तथा मातंगी देवी के सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों और ध्यान-विधियों का विशद निरूपण है। सनत्कुमार जी ने बताया कि भगवती सरस्वती विद्या, बुद्धि, कला और संगीत की अधिष्ठात्री हैं। उनके मन्त्र का जप करने से मंदबुद्धि व्यक्ति भी परम विद्वान और कवि बन जाता है। मातंगी देवी की साधना से साधक को सर्व-शास्त्रों का ज्ञान, वाक्-सिद्धि और अलौकिक मातंगी-कृपा प्राप्त होती है। यह अध्याय विद्यार्थियों और ज्ञान-साधकों के लिए परम कल्याणकारी सिद्धपीठ के समान है।

अध्याय ७३ – ललिता और त्रिपुरसुंदरी मन्त्र विधान

इस अध्याय में श्रीविद्या की अधिष्ठात्री भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी जी के परम गोपनीय मन्त्रों, श्रीचक्र (श्रीयन्त्र) की रचना तथा उसकी पूजन-पद्धति का दिव्य वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि श्रीविद्या साधना समस्त तन्त्रों का मुकुटमणि है। इसमें पंचदशी और षोडशी मन्त्रों के उद्धार, न्यास, पीठावरण-पूजा तथा भावना-क्रम को समझाया गया है। जो साधक निष्काम भाव से श्रीचक्र का अर्चन करता है, उसे जीवन्मुक्ति और परम परमानंद की अनुभूति प्राप्त होती है।

अध्याय ७४ – दुर्गा और चंडिका मन्त्र साधना

इस अध्याय में दुर्गतिनाशिनी माता दुर्गा, चंडिका तथा नवदुर्गा के सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों और अनुष्ठान-विधियों का ओजस्वी वर्णन है। सनत्कुमार जी ने नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) की अपार महिमा बताई। इस मन्त्र के जप, दुर्गा सप्तशती के पाठ तथा चंडी-हवन से साधक के जीवन के समस्त संकट, भय, रोग और पाप क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। भगवती चंडिका अपने भक्त को सर्व-विजय, बल, यश और अंत में अपना परम पद प्रदान करती हैं।

अध्याय ७५ – शिव मन्त्र और मृत्युंजय साधना

इस अध्याय में देवाधिदेव महादेव शिव के पंचाक्षर मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) तथा महामृत्युंजय मन्त्र की अलौकिक महिमा और साधना विधि का वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि महामृत्युंजय मन्त्र साक्षात् काल पर विजय प्राप्त कराने वाला अमोघ साधन है। इस मन्त्र के जप और दुर्वा-तिल द्वारा हवन करने से अकाल मृत्यु का योग टल जाता है, असाध्य बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं और साधक को आरोग्य तथा दीर्घायु प्राप्त होती है। शिव-उपासना साधक को समस्त बंधनों से मुक्त करके मोक्ष प्रदान करती है।

अध्याय ७६ – दक्षिणामूर्ति और शरभ मन्त्र विधान

इस अध्याय में भगवान शिव के परम ज्ञानी रूप श्रीदक्षिणामूर्ति तथा उग्र-विनाशक शरभेश्वर स्वरूप के मन्त्रों और यन्त्रों का वर्णन किया गया है। दक्षिणामूर्ति मन्त्र का जप करने से साधक को ब्रह्मज्ञान, आत्म-साक्षात्कार और परम शांति की प्राप्ति होती है। शरभेश्वर मन्त्र की साधना से उग्र से उग्र शत्रु-बाधा, अभिचार-दोष तथा समस्त उपद्रव तत्काल शांत हो जाते हैं। यह अध्याय शांत और उग्र दोनों भावों की शिव-साधना का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

अध्याय ७७ – कार्तिकेय और कामदेव मन्त्र साधना

इस अध्याय में देवसेनापति भगवान कार्तिकेय (स्कंद) तथा मनोभाव कामदेव के सिद्ध मन्त्रों और उनकी पूजन-विधियों का वर्णन है। कार्तिकेय मन्त्र के जप से साधक को तेज, साहस, विजय, सुयोग्य संतान और शत्रुओं पर पूर्ण प्रभुत्व प्राप्त होता है। कामदेव मन्त्र की साधना से साधक के व्यक्तित्व में अलौकिक कांति, आकर्षण और गृहस्थ जीवन में परस्पर प्रेम व सौमनस्य का विकास होता है। यह अध्याय साधक को शक्ति और सौंदर्य दोनों का संतुलन प्रदान करता है।

अध्याय ७८ – तारा और जयंती मन्त्र विधान

इस अध्याय में महाविद्या भगवती तारा तथा जयंती देवी के सिद्ध मन्त्रों, यन्त्रों और उनकी विशिष्ट साधना-विधियों का निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि भगवती तारा उग्र संकटों से उबारने वाली और ज्ञान प्रदान करने वाली तारिणी शक्ति हैं। इनके मन्त्र के प्रभाव से साधक की वाक्-सिद्धि जाग्रत होती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। जयंती देवी की उपासना से साधक को सर्वत्र विजय और सर्व-बाधाओं से मुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय ७९ – तान्त्रिक मुद्राएँ और मण्डल रचना

इस अध्याय में देव-पूजन और मन्त्र-साधना में प्रयुक्त होने वाली विभिन्न तान्त्रिक मुद्राओं तथा पूजा-मण्डल (सर्वतोभद्र मण्डल आदि) के निर्माण की विधि का विशद वर्णन है। सनत्कुमार जी ने अंजलि, वंदनी, धेनु, शंख, चक्र, गदा, पद्म, ज्ञान और सम्मोहनी आदि मुद्राओं के लक्षण और उनके प्रदर्शन के महत्व को समझाया। मुद्राएँ देवताओं को प्रसन्न करती हैं और मण्डल-रचना से पूजा-स्थल में दिव्य शक्तियों का आवाहन होता है। यह अध्याय कर्मकाण्ड के बाह्य एवं आन्तरिक स्वरूप को सुदृढ़ बनाता है।

अध्याय ८० – यन्त्र-प्रतिष्ठा और प्राण-प्रतिष्ठा विधि

इस अध्याय में निर्मित यन्त्रों तथा देव-प्रतिमाओं की शास्त्रीय प्राण-प्रतिष्ठा की सूक्ष्म प्रक्रिया का निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यन्त्र या मूर्ति केवल धातु या पत्थर ही रहती है, उसमें देवत्व का प्रादुर्भाव प्राण-प्रतिष्ठा मन्त्रों द्वारा ही होता है। इसमें अधिवास, स्नान, न्यास, वैदिक मन्त्रों द्वारा जीवन-संचार तथा आरती के नियमों को विस्तार से समझाया गया है। प्राण-प्रतिष्ठित यन्त्र और विग्रह साधक की पूजा को तत्काल स्वीकार करके मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

अध्याय ८१ – पुरश्चरण विधान और मन्त्र सिद्धि

इस अध्याय में मन्त्र को सिद्ध करने हेतु आवश्यक पुरश्चरण के समस्त अंगों का शास्त्रीय वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि मन्त्र के जितने वर्ण हों, उतने लाख जप करना पुरश्चरण का प्रथम नियम है। जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन और मार्जन का दशांश ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए। यदि साधक इन पाँचों अंगों को विधिपूर्वक पूर्ण करता है, तभी मन्त्र पूर्णतः सिद्ध होकर अभीष्ट फल प्रदान करता है। यह अध्याय मन्त्र-साधना की आधारशिला है।

अध्याय ८२ – जप विधि और माला लक्षण

इस अध्याय में मन्त्र-जप के प्रकारों तथा जप हेतु प्रयुक्त होने वाली विभिन्न मालाओं (तुलसी, रुद्राक्ष, स्फटिक, पुत्रजीवक आदि) के लक्षणों का विस्तृत वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि जप तीन प्रकार का होता है— वाचिक, उपांशु और मानस। इनमें मानस जप को कोटि गुना अधिक फलदायी और सर्वोत्कृष्ट कहा गया है। माला में १०८ मनके होने चाहिए और सुमेरु का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। यह अध्याय साधक को जप के समय रखी जाने वाली सावधानियों और एकाग्रता का मार्ग दिखाता है।

अध्याय ८३ – होम विधान और कुण्ड निर्माण

इस अध्याय में यज्ञ-अनुष्ठान हेतु हवन-कुण्ड के निर्माण, उसकी माप, मेखलाओं, नाभि तथा होम की शास्त्रीय विधि का विस्तृत निरूपण है। सनत्कुमार जी ने चौकोर, त्रिकोण, वृत्त और पद्म आदि आकृतियों के कुण्डों के विशिष्ट फलों का वर्णन किया। समिधा, घृत, चरू और तिल द्वारा अग्निदेव में आहुति देने से हविष्य सीधे देवताओं तक पहुँचता है। यह अध्याय वैदिक और तान्त्रिक यज्ञानुष्ठान की विधि को पूर्ण प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करता है।

अध्याय ८४ – तर्पण, मार्जन और बलिवैश्वदेव विधि

इस अध्याय में देव-तर्पण, पितृ-तर्पण, ऋषितर्पण, मार्जन तथा दैनिक बलिवैश्वदेव यज्ञ का विशद वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि गृहस्थ को नित्यप्रति जल और तिल द्वारा अपने पितरों और देवताओं का तर्पण करना चाहिए। बलिवैश्वदेव द्वारा पंच-सूना (गृहस्थी के अनजाने पापों) का प्रायश्चित्त होता है और समस्त जीवों, पक्षियों व कीटों को अन्न-बलि अर्पित की जाती है। यह कार्य मानव में दया, करुणा और प्राणीमात्र के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाता है।

अध्याय ८५ – सन्ध्यावन्दन और गायत्री जप विधान

इस अध्याय में द्विज मात्र के लिए अनिवार्य नित्य-कर्म सन्ध्यावंदन तथा परम पावन गायत्री मन्त्र के जप का विशद शास्त्रीय विधान वर्णित है। प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों सन्ध्याओं में आचमन, प्राणायाम, मार्जन, अघमर्षण और सूर्योपस्थान की विधि विस्तार से बताई गई है। सनत्कुमार जी ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य नित्य सन्ध्यावंदन करता है, उसका अंतःकरण निर्मल रहता है और उसे वेद-अध्ययन का पूर्ण फल प्राप्त होता है। सन्ध्याहीन पुरुष समस्त धार्मिक कृत्यों के लिए अयोग्य माना गया है।

अध्याय ८६ – वैष्णव योग और ध्यान साधना

इस अध्याय में भगवान विष्णु के ध्यान पर आधारित वैष्णव योग (अष्टांग योग का भक्तिमय स्वरूप) का गहन निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि केवल हठयोग से मन का निग्रह कठिन है, परंतु जब मन को भगवान श्रीहरि के रूप, गुण और लीलाओं में लगा दिया जाता है, तो समाधि सहज ही प्राप्त हो जाती है। इसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम द्वारा शरीर को शुद्ध करके हृदय-कमल में चतुर्भुज विष्णु के ध्यान और धारणा की प्रक्रिया समझाई गई है जो साधक को सायुज्य मुक्ति प्रदान करती है।

अध्याय ८७ – विष्णु-पादोदक और तुलसी माहात्म्य

इस अध्याय में भगवान विष्णु के चरणामृत (पादोदक) तथा परम पावन तुलसी दल की अलौकिक और अनन्त महिमा का वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि विष्णु के श्रीचरणों का स्पर्श किया हुआ जल पीने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप और समस्त शारीरिक-मानसिक रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। तुलसी जी साक्षात् लक्ष्मी रूप हैं; जो मनुष्य प्रतिदिन तुलसी की पूजा, जल-अर्पण और तुलसी-पत्र मस्तक पर धारण करता है, उसे यमराज का भय कभी नहीं होता और वह सीधे विष्णुलोक को जाता है।

अध्याय ८८ – शालग्राम-शिला लक्षण और पूजन

इस अध्याय में गंडकी नदी में उत्पन्न होने वाली साक्षात् विष्णु-स्वरूप शालग्राम-शिलाओं के विविध लक्षणों, चक्र-चिह्नों और उनके पूजन का विशद विवरण वर्णित है। सनत्कुमार जी ने बताया कि जिस घर में शालग्राम-शिला की नित्य पूजा और तुलसी-अर्पण होता है, वह घर समस्त तीर्थों से भी अधिक पवित्र हो जाता है। विभिन्न चक्रों वाली शालग्राम-शिलाओं जैसे लक्ष्मी-नारायण, नृसिंह, वामन, सुदर्शन आदि के अलग-अलग फल बताए गए हैं। शालग्राम पूजन से साधक को बिना यज्ञ के ही सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

अध्याय ८९ – विष्णु-सहस्रनाम और स्तुति विधान

इस अध्याय में परम पावन विष्णु-सहस्रनाम (भगवान विष्णु के एक हजार नाम) की महिमा और उनके द्वारा भगवान की स्तुति का सजीव वर्णन है। सनत्कुमार जी ने बताया कि भगवान श्रीहरि के सहस्र नामों का पाठ करने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह सहस्रनाम समस्त भय, शोक, रोग और दरिद्रता का नाश करने वाला परम रक्षा-स्त्रोत है। जो भक्त प्रतिदिन भक्तिभाव से इसका पाठ या श्रवण करता है, वह इस मर्त्यलोक में समस्त सुख भोगकर अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त होता है।

अध्याय ९० – विष्णु-कवच और रक्षा-स्तोत्र

इस अध्याय में संपूर्ण अंगों की रक्षा करने वाले दिव्य विष्णु-कवच का निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद को इस कवच के ऋषि, छंद, देवता और न्यास-विधि बताई। इस कवच में भगवान विष्णु के विभिन्न नामों (मत्स्य, कूर्मा, वराह, नृसिंह, वामन, राम, कृष्ण आदि) से शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा हेतु प्रार्थना की जाती है। विष्णु-कवच को धारण करने वाले साधक पर शस्त्र, अग्नि, विष, जल, भूत-प्रेत और शत्रुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह सर्वत्र विजयी होता है।

अध्याय ९१ – श्रीकृष्ण-कवच और महिमा

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण के परम अद्भुत और तेजोमय श्रीकृष्ण-कवच का वर्णन प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि यह कवच पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने नारद जी को और नारद जी ने अन्य ऋषियों को प्रदान किया था। इस कवच का पाठ करने से साधक के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं, उसकी बुद्धि निर्मल हो जाती है और उसे श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है। यह कवच साधक की सर्व-संकटों से रक्षा करता हुआ उसे अंत में गोलोक धाम में स्थान प्रदान करता है।

अध्याय ९२ – श्रीराम-कवच और स्तोत्र माहात्म्य

इस अध्याय में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के दिव्य राम-कवच तथा श्रीराम-स्तोत्र की अपार महिमा का निरूपण है। सनत्कुमार जी ने बताया कि राम-कवच का पाठ करने वाले साधक के समीप कोई भी विघ्न-बाधा या पापकर्म ठहर नहीं सकता। भगवान श्रीराम के श्रीचरणों का ध्यान करते हुए इस कवच को धारण करने से साधक को परम अभय, मनोबल, यश और राज्य-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह कवच राम-भक्तों के लिए एक सिद्ध एवं अमोघ रक्षा-वज्र के समान है।

अध्याय ९३ – श्रीहनुमत्-कवच और मन्त्र सिद्धि

इस अध्याय में संकटमोचन श्रीहनुमान जी के अति प्रभावशाली हनुमत्-कवच का विशद वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि यह कवच साधक को समस्त आधि-व्याधियों, शत्रुओं, शनि आदि ग्रहों के दुष्प्रभावों और तांत्रिक बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है। हनुमत्-कवच का पाठ करके हनुमान जी का ध्यान करने से साधक में अदम्य साहस, बल, भक्ति और कार्य-सिद्धि की क्षमता उत्पन्न होती है। यह कवच कलयुग के जीवों के लिए परम रक्षक और सम्बल है।

अध्याय ९४ – श्रीनृसिंह-कवच और भय-निवारण

इस अध्याय में परम उग्र और भक्त-रक्षक भगवान नृसिंह के सिद्ध नृसिंह-कवच का वर्णन प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि यह वही कवच है जिसे धारण करके प्रह्लाद जी ने दैत्यराज हिरण्यकशिपु की समस्त यातनाओं और अत्याचारों पर विजय प्राप्त की थी। इस कवच के पाठ से साधक के हृदय का बड़े से बड़ा भय, राज-भय, शत्रु-भय और अकाल मृत्यु का योग तत्काल समाप्त हो जाता है। भगवान नृसिंह अपने साधक के चारों ओर सर्वदा उपस्थित रहकर उसकी रक्षा करते हैं।

अध्याय ९५ – सूर्य-कवच और आरोग्य फल

इस अध्याय में प्रत्यक्ष देव सूर्यदेव के दिव्य सूर्य-कवच का विस्तृत निरूपण किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि जो मनुष्य नित्यप्रति सूर्य-कवच का पाठ करता है, उसे जीवन में कभी नेत्र-रोग, त्वचा-रोग या असाध्य शारीरिक व्याधियाँ नहीं होतीं। यह कवच साधक को निरोगी काया, ओज, तेज, दीर्घायु और समाज में उच्च पद-प्रतिष्ठा प्रदान करता है। सूर्य-कवच का पाठ रविवार को सूर्य के समक्ष करने से इसका फल सहस्रों गुना बढ़ जाता है।

अध्याय ९६ – शिव-कवच और रक्षा विधान

इस अध्याय में देवाधिदेव महादेव शिव के परम पवित्र शिव-कवच का भक्तिमय निरूपण है। सनत्कुमार जी ने बताया कि यह कवच साधक को समस्त पाशविक बंधनों, भय, मृत्यु और संसार के तापों से मुक्त करने वाला है। शिव-कवच में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) से रक्षा की याचना की जाती है। इसे धारण करने वाला साधक शिव सायुज्य का अधिकारी बनता है और उसकी कोई भी अभिलाषा अपूर्ण नहीं रहती।

अध्याय ९७ – दुर्गा-कवच और विजय प्राप्ति

इस अध्याय में भगवती जगदम्बा दुर्गा के अति दुर्लभ और सर्व-रक्षाकर दुर्गा-कवच (चंडी-कवच) का वर्णन प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि इस कवच में भगवती की नौ मूर्तियों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री) तथा अन्य शक्तियों द्वारा दसों दिशाओं और शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा का विधान है। दुर्गा-कवच का पाठ करने वाले साधक को तीनों लोकों में कोई पराजित नहीं कर सकता और वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है।

अध्याय ९८ – महालक्ष्मी-कवच और ऐश्वर्य प्राप्ति

इस अध्याय में धन, धान्य और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री माता महालक्ष्मी के सिद्ध महालक्ष्मी-कवच का वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि जो गृहस्थ दरिद्रता और संकटों से पीड़ित हो, उसे भक्तिपूर्वक महालक्ष्मी-कवच का पाठ करना चाहिए। इस कवच के प्रभाव से कुबेर के समान अक्षय धन-धान्य, व्यापार में उन्नति और गृह में सुख-शांति का विस्तार होता है। महालक्ष्मी जी अपने साधक पर सर्वदा प्रसन्न रहकर उसे संपूर्ण सांसरिक और आध्यात्मिक ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।

अध्याय ९९ – सरस्वती-कवच और बुद्धि-विकास

इस अध्याय में ज्ञानदायिनी भगवती सरस्वती के दिव्य सरस्वती-कवच का निरूपण प्राप्त होता है। सनत्कुमार जी ने बताया कि यह कवच विद्यार्थियों, विद्वानों, शास्त्रियों और साधकों के लिए परम फलदायी है। इस कवच का नित्य पाठ करने से स्मृति-शक्ति तीव्र होती है, अज्ञान का नाश होता है और वक्त्तृत्व कला में अद्भुत कुशलता प्राप्त होती है। भगवती सरस्वती की कृपा से साधक का अंतःकरण सत्य और ब्रह्मज्ञान के दिव्य प्रकाश से भर जाता है।

अध्याय १०० – मन्त्रराज पुरश्चरण फल-श्रुति

तृतीय पाद के अंतिम एवं १००वें अध्याय में पूर्व में वर्णित समस्त मन्त्रों, यन्त्रों, कवचों और पुरश्चरण-विधियों की परम पावन फल-श्रुति का ओजस्वी वर्णन किया गया है। सनत्कुमार जी ने देवर्षि नारद से कहा कि जो मनुष्य इस सनत्कुमार संहिता (तृतीय पाद) के अध्यायों का भक्तिपूर्वक पाठ, श्रवण या अध्ययन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर साक्षात् भगवान श्रीहरि का परम प्रिय बन जाता है। इस पावन प्रसंग की समाप्ति के साथ ही साधक के हृदय में अनन्य हरि-भक्ति, ज्ञान और मोक्ष का द्वार पूर्णतः उद्घाटित हो जाता है।

अध्याय १०१ – मन्त्र-उद्धार एवं तृतीय पाद उपसंहार

इस अध्याय में तृतीय पाद की सांगोपांग समाप्ति पर सनत्कुमार मुनि द्वारा देवर्षि नारद को मन्त्र-शास्त्र के अति गोपनीय सिद्धान्तों, मन्त्र-उद्धार की विधि तथा सम्पूर्ण साधना के विश्राम का उपदेश दिया गया है। सनत्कुमार जी ने बताया कि किस प्रकार सभी मन्त्र साक्षात् परब्रह्म श्रीहरि की वाङ्मयी शक्तियाँ हैं और विधिपूर्वक सिद्ध किया गया मन्त्र साधक को भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों सिद्धियाँ प्रदान करता है। इसमें मन्त्र-जप के अनन्तर अर्पण-विधि, गुरु-दक्षिणा का महत्त्व तथा तन्त्र-साधना की मर्यादाओं की रक्षा का सन्देश दिया गया है। यह अध्याय तन्त्र और मन्त्र विद्या के भक्तिमय पक्ष को स्थापित करते हुए सनत्कुमार मुनि द्वारा नारद जी को दिए गए पावन उपदेश की पूर्ति सिद्ध करता है।

अध्याय १०२ – चतुर्थ पाद का आरम्भ एवं सनातन-नारद संवाद

इस अध्याय से नारद पुराण के पूर्वार्ध का चतुर्थ पाद आरम्भ होता है जहाँ सनातन मुनि वक्ता और देवर्षि नारद श्रोता के रूप में विराजमान होते हैं। देवर्षि नारद ने सनातन मुनि के श्रीचरणों में वन्दन करके परम भक्तिभाव से प्रश्न किया कि वे सनातन धर्म के मूल आधार अष्टादश महापुराणों के लक्षण, उनकी श्लोक संख्या तथा उनकी अनुक्रमणिका का विशद वर्णन करें। सनातन मुनि ने नारद जी की निष्काम जिज्ञासा की भूरि-भूरि प्रशंसा की और बताया कि अष्टादश पुराण साक्षात् भगवान विष्णु के अठारह दिव्य अंग हैं। यह संवाद पौराणिक साहित्य के संरक्षण और उसके अनुक्रम को समझने का पावन द्वार उद्घाटित करता है।

अध्याय १०३ – ब्रह्मपुराण अनुक्रमणिका एवं विषय निरूपण

इस अध्याय में अष्टादश महापुराणों में सर्वप्रथम गिने जाने वाले श्री ब्रह्मपुराण की विस्तृत अनुक्रमणिका और उसकी श्लोक संख्या का वर्णन सनातन मुनि द्वारा किया गया है। उन्होंने बताया कि इस पुराण में दस सहस्र श्लोक समाविष्ट हैं और यह स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा महर्षि मरीचि को सुनाया गया था। इसमें सृष्टि-उत्पत्ति, सूर्यवंश और चंद्रवंश का विवरण, भूमण्डल का भूगोल, पुरुषोत्तम क्षेत्र (पुरी) की अलौकिक महिमा, साक्षात् श्रीजगन्नाथ जी के प्राकट्य का इतिहास तथा अवतार-चरित्रों का विशद गान किया गया है। यह अध्याय साधक को ब्रह्मपुराण के मूल सार-तत्त्व से अवगत कराता है।

अध्याय १०४ – पद्मपुराण अनुक्रमणिका एवं खण्ड विवरण

इस अध्याय में द्वितीय महापुराण श्री पद्मपुराण की विशाल अनुक्रमणिका, उसके पाँचों खण्डों (सृष्टि, भूमि, स्वर्ग, पाताल और उत्तर खण्ड) तथा पचपन सहस्र श्लोक संख्या का विशद निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि पद्मपुराण भगवान विष्णु के नाभि-कमल का साक्षात् स्वरूप है। इसमें राजा पृथु का चरित्र, शकुंतला का उपाख्यान, पुष्कर तीर्थ का माहात्म्य, गंगा-महिमा, श्रीमद्भागवत का माहात्म्य तथा भक्ति-ज्ञान-वैराग्य का परम पावन आख्यान वर्णित है। यह अध्याय पद्मपुराण के विशाल कलेवर और उसके कल्याणकारी विषयों का दर्शन कराता है।

अध्याय १०५ – विष्णुपुराण अनुक्रमणिका एवं अंश विवरण

इस अध्याय में तृतीय महापुराण श्री विष्णुपुराण की अनुक्रमणिका, उसके छः अंशों तथा तेरह सहस्र श्लोक संख्या का पावन वर्णन प्राप्त होता है। सनातन मुनि ने बताया कि महर्षि पराशर द्वारा रचित यह पुराण साक्षात् विष्णु-तत्त्व का प्रतिपादक है। इसमें ध्रुव और प्रह्लाद की अनन्य भक्ति का इतिहास, समुद्र-मंथन, वराह अवतार, प्रियव्रत का वंश, भरत-चरित्र, श्रीकृष्ण की बाल-लीलाएँ तथा कलयुग के लक्षणों का अत्यंत सजीव वर्णन है। यह अध्याय विष्णुपुराण को अद्वैत ज्ञान और पराभक्ति का दिव्य संगम सिद्ध करता है।

अध्याय १०६ – शिवपुराण अनुक्रमणिका एवं संहिताओं का विवरण

इस अध्याय में चतुर्थ महापुराण श्री शिवपुराण (वायुपुराण) की विस्तृत अनुक्रमणिका, उसकी विभिन्न संहिताओं तथा चौबीस सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि इस पुराण में देवाधिदेव शिव के कल्याणकारी स्वरूप, शिव-पार्वती विवाह, कार्तिकेय जन्म, त्रिपुरासुर वध, ज्योतिर्लिंगों के प्राकट्य तथा भस्म एवं रुद्राक्ष की अलौकिक महिमा का वर्णन है। शिव और विष्णु की अभेदता को उजागर करता हुआ यह अध्याय साधक के हृदय से भेद-भाव को मिटाकर परम भक्ति का प्रादुर्भाव करता है।

अध्याय १०७ – श्रीमद्भागवत पुराण अनुक्रमणिका एवं स्कन्ध विवरण

इस अध्याय में पंचम महापुराण श्री मद भागवत पुराण की सर्वोत्कृष्ट अनुक्रमणिका, उसके बारह स्कन्धों तथा अठारह सहस्र श्लोक संख्या का अति भक्तिमय निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि श्रीमद्भागवत पुराण साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण का वाङ्मय स्वरूप है। इसमें महर्षि व्यास के खेद-निवारण से लेकर राजा परीक्षित के मोक्ष, सुखदेव जी के उपदेश, नवधा भक्ति, अवतारों के चरित्र तथा दशम स्कन्ध में श्रीकृष्ण की अलौकिक रासलीला और माधुर्य-रस का गान है। यह अध्याय श्रीमद्भागवत को परमहंसों की संहिता और भक्ति का शिरोमणि ग्रन्थ सिद्ध करता है।

अध्याय १०८ – नारदपुराण अनुक्रमणिका एवं भाग विवरण

इस अध्याय में स्वयं श्री नारद पुराण की अपनी अनुक्रमणिका, इसके पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध के भागों तथा पच्चीस सहस्र श्लोक संख्या का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। सनातन मुनि ने बताया कि यह पुराण सर्वपापनाशक, ज्ञानवर्धक और मोक्षप्रद है। इसमें चारों पादों के विषय, वेदांगों का ज्ञान, तन्त्र-मन्त्र विद्या, तीर्थ-माहात्म्य तथा उत्तरार्ध में वर्णित एकादशी-व्रत, मोहिनी-चरित्र व गया-माहात्म्य का सार संक्षेप में दिया गया है। यह अध्याय नारद पुराण को समस्त वैदिक एवं पौराणिक विद्याओं का महाकोश सिद्ध करता है।

अध्याय १०९ – मार्कण्डेयपुराण अनुक्रमणिका एवं देवी माहात्म्य प्रसंग

इस अध्याय में सप्तम महापुराण श्री मार्कण्डेय पुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी नौ सहस्र श्लोक संख्या का वर्णन किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि पक्षियों के मुख से उद्घाटित यह ग्रन्थ अत्यंत अलौकिक है। इसमें महर्षि मार्कण्डेय और जैमिनि का संवाद, हरिश्चन्द्र की सत्यनिष्ठा, दत्तात्रेय-चरित्र, मदालसा का आध्यात्मिक उपदेश तथा जगज्जननी भगवती चंडिका की महिमा से परिपूर्ण सात सौ श्लोकों का परम पावन दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) समाविष्ट है। यह अध्याय ज्ञान और शक्ति-साधना का दिव्य संदेश देता है।

अध्याय ११० – अग्निपुराण अनुक्रमणिका एवं विद्या-समूह निरूपण

इस अध्याय में अष्टम महापुराण श्री अग्निपुराण की विशाल अनुक्रमणिका तथा उसकी पंद्रह सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि स्वयं अग्निदेव द्वारा महर्षि वशिष्ठ को सुनाया गया यह ग्रन्थ सर्वविद्या-निधान है। इसमें अवतार-कथाओं के अतिरिक्त व्याकरण, छन्द, साहित्य, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद, राजधर्म, ज्योतिष, नगर-निर्माण तथा तन्त्र-शास्त्र का विशद ज्ञान एकत्र है। यह अध्याय अग्निपुराण को सनातन संस्कृति का प्रत्यक्ष विश्वकोश सिद्ध करता है।

अध्याय १११ – भविष्यपुराण अनुक्रमणिका एवं पर्व विवरण

इस अध्याय में नवम महापुराण श्री भविष्यपुराण की अनुक्रमणिका, इसके पाँचों पर्वों (ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग, उत्तर आदि) तथा चौदह सहस्र पाँच सौ श्लोक संख्या का निरूपण प्राप्त होता है। सनातन मुनि ने बताया कि इस पुराण में सूर्य-उपासना, सदाचार, तिथियों के व्रत-विधान, दान की महिमा के साथ-साथ भविष्य में होने वाले राजाओं, राजवंशों, युग-धर्मों तथा आधुनिक इतिहास का अग्रिम दर्शन वर्णित है। यह अध्याय काल चक्र के गतिक्रम और भविष्य के इतिहास को प्रत्यक्ष करने वाला अनुपम ग्रन्थ सिद्ध होता है।

अध्याय ११२ – ब्रह्मवैवर्तपुराण अनुक्रमणिका एवं खण्ड निरूपण

इस अध्याय में दशम महापुराण श्री ब्रह्मवैवर्त पुराण की अनुक्रमणिका, इसके चार विशाल खण्डों (ब्रह्म, गणपति, श्रीकृष्णजन्म और प्रकृति खण्ड) तथा अठारह सहस्र श्लोक संख्या का सजीव वर्णन है। सनातन मुनि ने बताया कि इस पुराण में परब्रह्म श्रीकृष्ण और उनकी परा-शक्ति श्रीराधा जी के परम दिव्य स्वरूप का गान किया गया है। इसमें गोलोक धाम की महिमा, श्रीगणेश प्राकट्य, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती व सावित्री का उपाख्यान तथा श्रीकृष्ण की ब्रज-लीलाओं का सरस गान है। यह अध्याय प्रेमाभक्ति के परम उत्कर्ष को प्रकट करता है।

अध्याय ११३ – लिंगपुराण अनुक्रमणिका एवं शिव-माहात्म्य

इस अध्याय में एकादश महापुराण श्री लिंगपुराण की अनुक्रमणिका, इसके पूर्व और उत्तर भागों तथा ग्यारह सहस्र श्लोक संख्या का वर्णन किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि इसमें भगवान शिव के अलिङ्ग (निराकार) से लिङ्ग (साकार) रूप में प्रादुर्भाव की कथा, पञ्चाक्षर मन्त्र की महिमा, अष्टांग योग, ईशान आदि स्वरूपों की उपासना तथा दधीचि-चरित्र का सजीव चित्रण है। यह अध्याय शिव-तत्त्व की गम्भीरता और ज्ञानयोग के मार्ग को आलोकित करता है।

अध्याय ११४ – वराहपुराण अनुक्रमणिका एवं क्षेत्र माहात्म्य

इस अध्याय में द्वादश महापुराण श्री वराहपुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी चौबीस सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण प्राप्त होता है। सनातन मुनि ने बताया कि जलमग्न पृथ्वी का उद्धार करने वाले भगवान वराह ने भूदेवी के प्रश्नों के उत्तर में यह पावन ग्रन्थ सुनाया था। इसमें मथुरा, कुरुक्षेत्र तथा अन्य दिव्य तीर्थों की महिमा, नचिकेता का आख्यान, श्राद्ध-कल्प, व्रत-विधान तथा भगवद्-भक्ति से पाप-मुक्ति के अचूक उपाय वर्णित हैं। यह अध्याय भगवान वराह की सर्व-रक्षक शक्ति और तीर्थ-माहात्म्य का गान करता है।

अध्याय ११५ – स्कंदपुराण अनुक्रमणिका एवं खंड-विभाजन

इस अध्याय में त्रयोदश महापुराण श्री स्कंदपुराण की विशालतम अनुक्रमणिका, इसके सात विशाल खण्डों (माहेश्वर, वैष्णव, ब्राह्म, काशी, अवंती, नागर, प्रभास) तथा इक्यासी सहस्र एक सौ श्लोक संख्या का वर्णन किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि यह पुराण अष्टादश पुराणों में आकार में सबसे बड़ा है। इसमें भगवान कार्तिकेय द्वारा वर्णित शिव और विष्णु की लीलाएँ, काशी की महिमा, जगन्नाथ पुरी का उज्जयिनी क्षेत्र का वर्णन तथा अनगिनत तीर्थों के इतिहास का अकूत भण्डार समाविष्ट है। यह अध्याय सनातन तीर्थ-संस्कृति का परम गौरव प्रस्तुत करता है।

अध्याय ११६ – वामनपुराण अनुक्रमणिका एवं वामन-चरित्र

इस अध्याय में चतुर्दश महापुराण श्री वामनपुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी दस सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि इसमें भगवान विष्णु के वामन अवतार, राजा बलि की दानशीलता, कुरुक्षेत्र का माहात्म्य, शिव-पार्वती विवाह तथा गजेन्द्र-मोक्ष का अत्यंत भक्तिमय विवरण वर्णित है। यह अध्याय भगवान के शरणागत-वत्सल स्वभाव और अहंकार के विनाश द्वारा भक्ति की विजय को सिद्ध करता है।

अध्याय ११७ – कूर्मपुराण अनुक्रमणिका एवं ईश्वर-गीता प्रसंग

इस अध्याय में पंचदश महापुराण श्री कूर्मपुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी सत्रह सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण प्राप्त होता है। सनातन मुनि ने बताया कि क्षीरसागर के मन्थन काल में कूर्म (कछुआ) रूप धारण करने वाले भगवान श्रीहरि ने राजा इन्द्रद्युम्न को यह ज्ञान दिया था। इसमें ईश्वर-गीता, व्यास-गीता, ब्रह्म-ज्ञान, शिव-विष्णु की अभिन्नता तथा प्रायश्चित्त विधानों का विस्तृत वर्णन है। यह अध्याय ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का अनूठा समन्वय प्रस्तुत करता है।

अध्याय ११८ – मत्स्यपुराण अनुक्रमणिका एवं राजधर्म-निरूपण

इस अध्याय में षोडश महापुराण श्री मत्स्यपुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी चौदह सहस्र श्लोक संख्या का विशद वर्णन सनातन मुनि द्वारा किया गया है। उन्होंने बताया कि जल-प्रलय के समय मत्स्य रूपधारी भगवान श्रीहरि ने वैवस्वत मनु को यह उपदेश प्रदान किया था। इसमें प्रलय का सजीव विवरण, राजधर्म, वास्तुशास्त्र, मूर्ति-कला, तीर्थ-माहात्म्य, श्राद्ध-विधान तथा विभिन्न राजवंशों की वंशावली वर्णित है। यह अध्याय ज्ञान और व्यावहारिक धर्म शास्त्र दोनों का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।

अध्याय ११९ – गरुड़पुराण अनुक्रमणिका एवं प्रेतकल्प विवरण

इस अध्याय में सप्तदश महापुराण श्री गरुड़पुराण की अनुक्रमणिका तथा उसकी उन्नीस सहस्र श्लोक संख्या का निरूपण किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ जी के प्रश्नों पर भगवान विष्णु ने उन्हें यह पावन ग्रन्थ सुनाया था। इसमें आचार-काण्ड, धर्म-काण्ड के साथ-साथ प्रेत-कल्प, जीव की मरणोत्तर गति, यमलोक का मार्ग, श्राद्ध की महिमा तथा विष्णु-भक्ति द्वारा मुक्ति का अमोघ विधान वर्णित है। यह अध्याय जीव को कुकर्मों से बचाकर सन्मार्ग पर चलाने का प्रत्यक्ष चेतावनी-स्त्रोत है।

अध्याय १२० – ब्रह्मांडपुराण अनुक्रमणिका एवं ललितोपाख्यान

इस अध्याय में अष्टादश महापुराणों के अन्तिम श्री ब्रह्मांडपुराण की अनुक्रमणिका, इसके तीन भागों (प्रक्रिया, अनुषंग, उपसंहार) तथा बारह सहस्र श्लोक संख्या का वर्णन किया गया है। सनातन मुनि ने बताया कि इसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना, परशुराम-चरित्र, अध्यात्म-रामायण तथा भगवती ललिता महात्रिपुरसुंदरी का अलौकिक ललितोपाख्यान समाविष्ट है। यह अध्याय अष्टादश महापुराणों की गणना की पूर्णाहुति करता हुआ साधक को सर्व-विद्या-संपन्न बनाता है।

अध्याय १२१ – अष्टादश महापुराणों की श्लोक संख्या एवं कुल मान

इस अध्याय में सनातन मुनि द्वारा अष्टादश महापुराणों की श्लोक संख्या का समेकित आकलन एवं उनके कुल चार लाख श्लोकों के दिव्य मान का निरूपण किया गया है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार भगवान वेदव्यास ने एक ही विशाल पुराण-संहिता को जीवों के हित हेतु अठारह भागों में विभाजित किया। जो मनुष्य इन अठारह पुराणों के नाम, श्लोक संख्या और उनके सार का स्मरण करता है, उसे चारों वेदों के पठन का पुण्य प्राप्त होता है। यह अध्याय पौराणिक साहित्य की विशालता और प्रामाणिकता को एक दृष्टि में प्रत्यक्ष करता है।

अध्याय १२२ – पुराण-श्रवण की महिमा एवं मोक्षधर्म निरूपण

इस अध्याय में पुराणों के श्रवण, पठन और दान की अतुलनीय महिमा तथा मोक्षधर्म के अन्तिम सिद्धान्तों का ओजस्वी वर्णन है। सनातन मुनि ने बताया कि जो मनुष्य भक्तिभाव से पुराण-कथा का श्रवण करता है, वह जन्म-जन्मांतर के संचित पापों से छूटकर भगवान विष्णु के परम धाम बैकुंठ को प्राप्त होता है। इसमें निष्काम कर्मयोग, असंगता, अंतःकरण की शुद्धि तथा सर्वत्र वासुदेव-भाव देखने की साधना को ही मोक्ष का साक्षात् कारण सिद्ध किया गया है।

अध्याय १२३ – पूर्वार्ध की पावन फल-श्रुति

इस अध्याय में नारद पुराण के सम्पूर्ण पूर्वार्ध (१२५ अध्यायों) के पठन, श्रवण और कीर्तन की अलौकिक एवं अक्षय फल-श्रुति का गान किया गया है। सनातन मुनि कहते हैं कि इस पूर्वार्ध का प्रतिदिन पाठ करने वाला मनुष्य दीर्घायु, आरोग्य, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, यश और अंत में सायुज्य मुक्ति प्राप्त करता है। जहाँ इस ग्रन्थ की पुस्तक पूजित होकर रखी रहती है, वहाँ से भूत, प्रेत, दरिद्रता और अकाल मृत्यु सदा के लिए दूर भाग जाते हैं। यह अध्याय साधक के मन में श्रद्धा की अटूट ज्योति प्रज्वलित करता है।

अध्याय १२४ – देवर्षि नारद द्वारा सनातन मुनि का पूजन

इस अध्याय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात देवर्षि नारद द्वारा अपने गुरु सनातन मुनि के प्रति अनन्य कृतज्ञता, वन्दन और दिव्य पूजन का सजीव वर्णन है। नारद जी ने परम अश्रुपूर्ण नेत्रों से सनातन मुनि के श्रीचरणों का प्रक्षालन किया, उन्हें दिव्य वस्त्र, आभूषण और सुवर्ण अर्पित किया तथा उनकी स्तुति की। सनातन मुनि ने नारद जी को हृदय से लगाकर सर्व-सिद्धि का वरदान दिया। यह अध्याय सनातन गुरु-शिष्य परम्परा के परम पावन और भावुक आदर्श को प्रस्तुत करता है।

अध्याय १२५ – नारद पुराण पूर्वार्ध का दिव्य उपसंहार

पूर्वार्ध के अन्तिम अध्याय में सम्पूर्ण कथा-प्रवाह का परम मंगलमय उपसंहार, श्रीहरि के चरणों में समर्पण तथा सर्व-मंगल की प्रार्थना की गई है। सूत जी नैमिषारण्य के ऋषियों से कहते हैं कि यह नारद पुराण पूर्वार्ध समस्त पापों का शमन करने वाला और वैष्णवों का परम धन है। अंत में सर्व-कल्याणकारी भगवान वासुदेव के जयघोष, गंगा-महिमा और गुरु-वंदना के साथ पूर्वार्ध विश्राम लेता है। यह अध्याय संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण की भावना के साथ साधक को परमानंदमय हरि-भक्ति की धारा में निमग्न कर देता है।

उत्तरार्ध का हर अध्याय का विवरण

अध्याय १ – महर्षि वशिष्ठ और राजा मान्धाता का पावन संवाद

इक्ष्वाकु वंश के परम प्रतापी राजा मान्धाता ने जब महर्षि वशिष्ठ के चरणों में वन्दन करके संसार के समस्त दुःखों को हरने वाले तथा भगवान विष्णु को सर्वाधिक प्रिय व्रत के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, तब ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उत्तरार्ध की इस परम पावन कथा का शुभारंभ किया। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि एकादशी व्रत के समान न तो कोई तीर्थ है और न ही कोई यज्ञ। राजा मान्धाता की भक्ति देखकर वशिष्ठ जी ने पूर्वकाल में घटी राजा रुक्मांगद की सत्यनिष्ठ ऐतिहासिक गाथा सुनाना आरम्भ किया, जिसमें एकादशी की महिमा प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध हुई थी। यह संवाद श्रोता के हृदय में अनन्य हरि-भक्ति और व्रत-आचरण का बीज बोता है।

अध्याय २ – राजा रुक्मांगद का धर्मनिष्ठ चरित्र और राज्य-वर्णन

इस अध्याय में विदिशा नगरी के परम प्रतापी, प्रजावत्सल और वैष्णव राजा रुक्मांगद के अलौकिक शासन का वर्णन प्राप्त होता है। राजा रुक्मांगद भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे और अपने राज्य में धर्म की चारों चरणों पर स्थापना करते थे। उनकी महारानी संध्यावली परम पतिव्रता और धर्मपरायण स्त्री थीं तथा उनका पुत्र धर्मांगद साक्षात् धर्म का ही विग्रह स्वरूप था। राजा के राज्य में कोई भी प्राणी अधर्मी, नास्तिक, रोगी या दुःखी नहीं था। राजा ने अपने तपोबल और भक्ति से अपनी संपूर्ण प्रजा को भगवद्-भक्ति के मार्ग पर अग्रसर किया था।

अध्याय ३ – राजा रुक्मांगद द्वारा एकादशी व्रत का सार्वभौमिक प्रचार

राजा रुक्मांगद ने अपने संपूर्ण राज्य में यह कठोर राज-आज्ञा प्रसारित कर दी कि आठ वर्ष के बालक से लेकर अस्सी वर्ष के वृद्ध तक, प्रत्येक नागरिक को एकादशी तिथि के दिन पूर्ण उपवास रखना अनिवार्य होगा। जो भी व्यक्ति एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करेगा, वह राज्य से निष्कासित कर दिया जाएगा या दण्ड का भागी होगा। राजा की इस आज्ञा का पालन करते हुए सम्पूर्ण राज्यवासी निष्ठापूर्वक एकादशी का व्रत रखने लगे। इस व्रत-प्रभाव से प्रजा के समस्त पाप नष्ट हो गए और चारों ओर सुख, शांति, समृद्धि तथा आध्यात्मिक चेतना का अखंड साम्राज्य स्थापित हो गया।

अध्याय ४ – एकादशी व्रत के प्रभाव से यमलोक का शून्य होना

इस अध्याय में राजा रुक्मांगद की प्रजा द्वारा निरंतर एकादशी व्रत किए जाने के अलौकिक परिणाम का वर्णन है। एकादशी व्रत के महापुण्य से राजा रुक्मांगद के राज्य में मरने वाला प्रत्येक जीव सीधे भगवान विष्णु के परम धाम बैकुंठ को जाने लगा। यमलोक में पापी जीवों का आना पूर्णतः बंद हो गया और यमराज का द्वार सूना पड़ गया। नरक की यातना भोगने वाले पूर्वज भी मुक्त होकर दिव्य देह धारण कर स्वर्ग और बैकुंठ चले गए। यमलोक के रिक्त हो जाने से यमराज अत्यंत चिन्तित हो गए और धर्मराज के कार्य में बाधा उत्पन्न हो गई।

अध्याय ५ – यमराज की ब्रह्मा जी के समक्ष व्यथा और प्रार्थना

यमलोक के शून्य हो जाने से व्याकुल होकर यमराज और देवराज इंद्र सत्यलोक पहुँचे और पितामह ब्रह्मा जी के समक्ष उपस्थित हुए। यमराज ने ब्रह्मा जी के चरणों में प्रणाम करके अपनी व्यथा सुनाई कि राजा रुक्मांगद के एकादशी-प्रचार के कारण उनका यमलोक उजाड़ हो चुका है और सृष्टिक्रम का संतुलन बिगड़ रहा है। यदि राजा रुक्मांगद को एकादशी व्रत से विचलित न किया गया, तो संपूर्ण संसार नरक-यातना से मुक्त होकर बैकुंठ चला जाएगा और यमराज का पद निष्प्रयोजन हो जाएगा। यमराज की प्रार्थना सुनकर ब्रह्मा जी ने राजा के व्रत को खंडित करने की योजना बनाई।

अध्याय ६ – ब्रह्मा जी द्वारा मायामयी मोहिनी का प्राकट्य

यमराज और देवताओं की चिंता दूर करने हेतु ब्रह्मा जी ने अपनी योगमाया और सौंदर्य के सर्वोत्कृष्ट तत्वों को एकत्र करके एक परम रूपवती स्त्री की सृष्टि की, जिसका नाम मोहिनी रखा गया। मोहिनी का सौंदर्य इतना अलौकिक था कि वह तीनों लोकों के मुनियों का चित्त भी चंचल कर सकती थी। ब्रह्मा जी ने मोहिनी को आज्ञा दी कि वह मंदर पर्वत पर जाकर राजा रुक्मांगद को अपने रूप-पाश में बाँधे और किसी भी प्रकार उनसे एकादशी का व्रत भंग करवाए या उनके सत्य की परीक्षा ले। मोहिनी ब्रह्मा जी की आज्ञा शिरोधार्य करके मंदर पर्वत की ओर प्रस्थान कर गई।

अध्याय ७ – मंदराचल पर्वत पर मोहिनी और राजा रुक्मांगद का मिलाप

एक समय राजा रुक्मांगद आखेट खेलते हुए घने वन में मंदर पर्वत की कंदराओं के समीप पहुँच गए। वहाँ राजा ने वीणा बजाती हुई परम सुंदरी मोहिनी को देखा। मोहिनी के अमानुषी सौंदर्य को देखकर राजा रुक्मांगद उस पर मोहित हो गए और उसके समीप जाकर उसका परिचय तथा वन में अकेले रहने का कारण पूछा। मोहिनी ने अपनी मायावी बातों से राजा को रिझाया और स्वयं को अनाथ बताते हुए राजा से आश्रय माँगा। राजा ने कामातुर होकर मोहिनी से अपने साथ राजधानी चलने और विवाह करने का प्रस्ताव रखा।

अध्याय ८ – मोहिनी का राजा पर मोहिनी-अस्त्र और प्रेमालाप

इस अध्याय में मोहिनी द्वारा राजा रुक्मांगद को अपने रूप जाल में पूर्णतः आबद्ध करने का सजीव चित्रण है। मोहिनी ने अपनी मधुर वाणी, कटाक्षों और हाव-भाव से राजा के मन को पूरी तरह वश में कर लिया। राजा रुक्मांगद मोहिनी के प्रेम में इतने विह्वल हो गए कि वे अपने राजकाज और संध्या-वंदन तक को भूलने लगे। मोहिनी ने राजा के मन की कामुकता का लाभ उठाते हुए उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की पृष्ठभूमि तैयार की। राजा ने मोहिनी से कहा कि वह जो भी माँगेगी, राजा उसे पूर्ण करने के लिए वचनबद्ध हैं।

अध्याय ९ – मोहिनी द्वारा विवाह हेतु कठोर वचन की माँग

राजा रुक्मांगद के प्रस्ताव पर चालाक मोहिनी ने राजा के सम्मुख एक अत्यंत कठोर शर्त रखी। मोहिनी ने कहा कि वह राजा से तभी विवाह करेगी जब राजा प्रतिज्ञा करें कि वे जीवन भर मोहिनी की प्रत्येक इच्छा का पालन करेंगे और कभी उसकी किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे। यदि राजा ने कभी उसकी बात टारी, तो उनका सत्य नष्ट हो जाएगा। काममोहित राजा रुक्मांगद ने बिना सोचे-समझे गंगाजल और धर्म की सौगंध खाकर मोहिनी की शर्त स्वीकार कर ली। तत्पश्चात मोहिनी राजा के साथ जाने को सहर्ष तैयार हो गई।

अध्याय १० – राजा रुक्मांगद का मोहिनी के साथ राजधानी आगमन

राजा रुक्मांगद मोहिनी को रथ में बैठाकर अपनी विदिशा नगरी वापस लौटे। जब प्रजा और महारानी संध्यावली ने राजा के साथ उस परम सुंदरी मोहिनी को देखा, तो सभी आश्चर्यचकित रह गए। महारानी संध्यावली परम धर्मज्ञ थीं; उन्होंने मोहिनी को सौत मानने के बजाय राजा की इच्छा का सम्मान किया और मोहिनी का आदरपूर्वक राजमहल में स्वागत किया। राजा ने मोहिनी को सर्वोत्कृष्ट भवन और आभूषण प्रदान किए और स्वयं उसके साथ राज-भोग में लीन हो गए।

अध्याय ११ – राजा का मोहिनी के साथ काम-विलास और काल-यापन

राजा रुक्मांगद मोहिनी के सौंदर्य-पाश में आबद्ध होकर कई वर्षों तक काम-सुख में डूबे रहे। इस दौरान मोहिनी ने राजा को पूरी तरह अपने प्रभाव में रखा और राजा उसके मनोरंजन में ही अपना समय व्यतीत करने लगे। यद्यपि राजा मोहिनी के साथ विलास में लीन थे, फिर भी उनके हृदय में एकादशी व्रत के प्रति निष्ठा बनी हुई थी। मोहिनी उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी कि कब एकादशी तिथि आए और वह राजा के सत्य तथा व्रत पर आघात कर सके।

अध्याय १२ – कार्तिकी एकादशी का आगमन और मोहिनी का विरोध

समय चक्र घूमता रहा और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की परम पावन प्रबोधिनी एकादशी तिथि आ पहुँची। राजा रुक्मांगद ने नियम के अनुसार संपूर्ण राज्य में एकादशी ढिंढोरा पिटवाया और स्वयं भी उपवास तथा पूजन की तैयारी करने लगे। जब मोहिनी को ज्ञात हुआ कि राजा व्रत रखने जा रहे हैं, तब वह राजा के पास पहुँची और उन्हें व्रत रखने से रोक दिया। मोहिनी ने राजा को उनकी दी हुई प्रतिज्ञा का स्मरण कराया कि उन्हें मोहिनी की हर बात माननी होगी और आज उसकी इच्छा है कि राजा व्रत न रखें बल्कि भोजन ग्रहण करें।

अध्याय १३ – मोहिनी का हठ और राजा के सम्मुख विकट धर्म-संकट

मोहिनी के वचन सुनकर राजा रुक्मांगद सन्न रह गए। उन्होंने मोहिनी से प्रार्थना की कि वह उनका संपूर्ण राज्य, कोष, हाथी-घोड़े यहाँ तक कि उनके प्राण भी माँग ले, परंतु एकादशी का व्रत न छुड़वाए क्योंकि व्रत छोड़ने से उनका धर्म नष्ट हो जाएगा। परंतु ब्रह्मा जी की आज्ञा से प्रेरित मोहिनी अपने हठ पर अड़ी रही। मोहिनी ने राजा को दो ही विकल्प दिए— या तो राजा एकादशी के दिन भोजन करके अपना व्रत तोड़ें और मोहिनी की आज्ञा का पालन करें, या फिर अपनी तलवार से अपने इकलोटे पुत्र धर्मांगद का सिर काटकर मोहिनी को अर्पित करें। यह सुनकर राजा पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा।

अध्याय १४ – महारानी संध्यावली की पावन धर्मनिष्ठा और सम्मति

राजा रुक्मांगद इस विकट धर्म-संकट में चेतनाहीन होने लगे कि एक तरफ एकादशी व्रत और धर्म का लोप था तथा दूसरी तरफ अपने प्रिय पुत्र का वध। जब यह समाचार महारानी संध्यावली के पास पहुँचा, तो वे तत्काल राजा के पास आईं। महारानी संध्यावली ने अत्यंत धीर और धर्ममय स्वर में राजा से कहा कि पुत्र तो नश्वर है और पुनः प्राप्त हो सकता है, परंतु यदि एकादशी जैसा महान धर्म और राजा का सत्य नष्ट हो गया, तो कुल का पतन हो जाएगा और नरक की प्राप्ति होगी। महारानी ने स्वयं राजा को आज्ञा दी कि वे धर्म की रक्षा हेतु अपने पुत्र धर्मांगद का मस्तक काट दें, परंतु व्रत न तोड़ें।

अध्याय १५ – राजकुमार धर्मांगद का दिव्य त्याग और धर्म-समर्पण

जब युवा राजकुमार धर्मांगद को अपनी माता के निर्णय और पिता के धर्म-संकट का ज्ञान हुआ, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। धर्मांगद ने दौड़कर अपने पिता के श्रीचरणों का स्पर्श किया और कहा कि यह उनका परम सौभाग्य है कि उनका शरीर माता-पिता के सत्य और एकादशी धर्म की रक्षा के काम आ रहा है। धर्मांगद ने स्वयं अपने हाथों से पिता को खड्ग थमाई और भूमि पर बैठकर अपना मस्तक झुका दिया। धर्मांगद का यह अलौकिक त्याग देखकर उपस्थित समस्त प्रजाजन और देवता रो पड़े।

अध्याय १६ – राजा रुक्मांगद का खड्ग-प्रहार और भगवान विष्णु का प्राकट्य

राजा रुक्मांगद ने काँपते हाथों से खड्ग उठाई और जय श्रीहरि का उच्चारण करते हुए जैसे ही अपने प्रिय पुत्र धर्मांगद की गर्दन पर प्रहार किया, ठीक उसी क्षण एक अलौकिक चमत्कार घटित हुआ। साक्षात् अनाथबंधु, भक्तवत्सल भगवान श्रीहरि शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए दिव्य गरुड़ पर सवार होकर प्रत्यक्ष प्रकट हो गए। भगवान श्रीहरि ने अपने दिव्य कर-कमलों से राजा के खड्ग को बीच में ही रोक लिया और राजकुमार धर्मांगद को अपने हृदय से लगा लिया। संपूर्ण आकाश देवताओं के पुष्प-वर्षा और जयकारों से गूंज उठा।

अध्याय १७ – भगवान श्रीहरि द्वारा रुक्मांगद का बैकुंठ-उद्धार

प्रत्यक्ष प्रकट हुए भगवान विष्णु ने राजा रुक्मांगद, महारानी संध्यावली तथा राजकुमार धर्मांगद की अतुलनीय धर्मनिष्ठा, सत्य-पालन और निष्काम भक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की। भगवान ने कहा कि रुक्मांगद ने अपने सत्य और एकादशी-धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राणों से प्रिय पुत्र की बलि देना भी स्वीकार कर लिया, ऐसी भक्ति तीनों लोकों में दुर्लभ है। भगवान श्रीहरि ने राजा रुक्मांगद, उनकी पत्नी संध्यावली तथा उनकी संपूर्ण धर्मनिष्ठ प्रजा को अपने साथ दिव्य विमान में बैठाकर सीधे अपने परम धाम बैकुंठ लोक भेज दिया।

अध्याय १८ – मोहिनी का माया-नाश और एकादशी व्रत का परम माहात्म्य

भगवान श्रीहरि के प्राकट्य और राजा के उद्धार के साथ ही मोहिनी का मायावी रूप छिन्न-भिन्न हो गया। ब्रह्मा जी की माया शांत हो गई और देवताओं को समझ आ गया कि हरि-भक्तों के सत्य को कोई भी शक्ति डिगा नहीं सकती। राजा रुक्मांगद ने जाने से पूर्व अपने पुत्र धर्मांगद का राज्याभिषेक कर दिया, जिन्होंने लंबे समय तक धर्मपूर्वक शासन किया। महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता को बताया कि इस प्रकार एकादशी का यह व्रत तीनों लोकों में सर्वोपरि सिद्ध हुआ, जो महापातकों का नाश करके सायुज्य मुक्ति प्रदान करता है।

अध्याय १९ – विभिन्न मासों की एकादशियों की पावन कथा

राजा मान्धाता द्वारा एकादशी के विस्तृत स्वरूप और वर्ष भर की तिथियों के विषय में पूछने पर महर्षि वशिष्ठ ने वर्ष की समस्त चौबीस एकादशियों का विवरण देना आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशियों के पृथक-पृथक नाम, देवता और विशिष्ट फल हैं। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक प्रत्येक एकादशी की कथा सुनता है और उपवास रखता है, उसे सहस्रों गोदान और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

अध्याय २० – ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी महिमा

इस अध्याय में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी (भीमसेनी एकादशी) का अलौकिक माहात्म्य वर्णित है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि पूर्वकाल में जब महर्षि व्यास ने पांडवों को वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रत का उपदेश दिया था, तब वायुपुत्र भीमसेन ने अपनी तीव्र क्षुधा के कारण वर्ष भर उपवास रखने में असमर्थता व्यक्त की थी। तब वेदव्यास जी ने केवल इस एक निर्जला एकादशी का व्रत रखने का विधान बताया, जिसमें बिना जल ग्रहण किए उपवास रखा जाता है। इस एक एकादशी के व्रत से वर्ष भर की संपूर्ण २४ एकादशियों के उपवास का पुण्य फल प्राप्त हो जाता है।

अध्याय २१ – आषाढ़ मास की देवशयनी एकादशी का दिव्य विधान

इस अध्याय में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी (हरिशयनी) एकादशी का शास्त्रीय आख्यान वर्णित है। इस तिथि से भगवान श्रीहरि विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में गमन करते हैं, जिससे चातुर्मास का आरम्भ होता है। इस दिन से समस्त मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं और साधक जप, तप, नियम और व्रत का आचरण करते हैं। इस एकादशी का व्रत करने से साधक के समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और उसे अंत में बैकुंठ की प्राप्ति होती है।

अध्याय २२ – श्रावण मास की पुत्रदा एवं कामदा एकादशी माहात्म्य

इस अध्याय में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की कामदा एकादशी और शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी की पावन कथा का निरूपण किया गया है। कामदा एकादशी के व्रत से साधक की समस्त लौकिक और पारलौकिक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा पूर्वजन्म के शापों का निवारण होता है। पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से निसंतान दंपत्तियों को सर्वगुण संपन्न, दीर्घायु और धर्मनिष्ठ पुत्र की प्राप्ति होती है। यह कथा संतानहीन राजा सुकेतुमान के पुत्र-प्राप्ति के ऐतिहासिक वृत्तांत द्वारा स्पष्ट की गई है।

अध्याय २३ – भाद्रपद मास की अजा एवं पद्मा एकादशी कथा

इस अध्याय में भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी तथा शुक्ल पक्ष की पद्मा (परिवर्तिनी) एकादशी की महिमा वर्णित है। अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही परम सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र को उनका खोया हुआ राज्य, मृत पुत्र रोहिताश्व और पत्नी तारा पुनः प्राप्त हुए थे तथा उनके समस्त संकट दूर हुए थे। पद्मा एकादशी के दिन योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इस दिन भगवान वामन रूप का पूजन करने से तीनों लोकों के पूजन का फल मिलता है।

अध्याय २४ – आश्विन मास की इंदिरा एवं पापांकुशा एकादशी महिमा

इस अध्याय में आश्विन मास की इंदिरा और पापांकुशा एकादशी का वृत्तांत दिया गया है। इंदिरा एकादशी का व्रत पितृपक्ष में आता है; इस व्रत का पुण्य जब पूर्वजों के नाम से अर्पित किया जाता है, तो नरक की यातनाएँ भोग रहे पितर भी तत्काल मुक्त होकर स्वर्गलोक चले जाते हैं। राजा महिष्मत के पिता का उद्धार इसी व्रत के प्रभाव से हुआ था। पापांकुशा एकादशी का व्रत मनुष्य के मन रूपी हाथी को पापों से दूर रखने के लिए अंकुश के समान कार्य करता है और अक्षय धर्म प्रदान करता है।

अध्याय २५ – कार्तिक मास की रमा एवं प्रबोधिनी एकादशी का माहात्म्य

इस अध्याय में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी तथा शुक्ल पक्ष की परम प्रसिद्ध देवप्रबोधिनी (देवोत्थान) एकादशी का विशद वर्णन है। रमा एकादशी महालक्ष्मी का ही एक नाम है, जिसके व्रत से घर में धन-धान्य और अचल लक्ष्मी का वास होता है। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन चार माह की योगनिद्रा के पश्चात भगवान विष्णु जाग्रत होते हैं। इस दिन तुलसी-विवाह और हरि-प्रबोधन उत्सव मनाया जाता है। इस व्रत को करने से कई जन्मों के संचित महापाप भस्म हो जाते हैं।

अध्याय २६ – मार्गशीर्ष मास की उत्पन्ना एवं मोक्षदा एकादशी विधान

इस अध्याय में मार्गशीर्ष मास की उत्पन्ना और मोक्षदा एकादशी का सजीव आख्यान है। उत्पन्ना एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु के शरीर से दिव्य देवी एकादशी का प्राकट्य हुआ था, जिन्होंने मुर दैत्य का वध करके देवताओं की रक्षा की थी। इस दिन से ही एकादशी व्रत का प्रारंभ माना जाता है। मोक्षदा एकादशी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया था। इस व्रत का आचरण करने से जीव को मोह-बंधन से मुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय २७ – पौष मास की सफला एवं पुत्रदा एकादशी कथा

इस अध्याय में पौष मास की सफला एवं पुत्रदा एकादशी का निरूपण किया गया है। सफला एकादशी जैसा कि नाम से स्पष्ट है, साधक के समस्त कार्यों को सफल करने वाली है। पापी लुम्पक ने जब अज्ञानवश इस व्रत का पालन किया, तो उसका हृदय परिवर्तित हो गया और उसे राज-पाट तथा भगवद्-भक्ति प्राप्त हुई। पौष शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने से श्रेष्ठ संतति की प्राप्ति होती है और पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है।

अध्याय २८ – माघ मास की षटतिला एवं जया एकादशी माहात्म्य

इस अध्याय में माघ मास की षटतिला और जया एकादशी का विशद वर्णन है। षटतिला एकादशी में तिल का छह प्रकार से (स्नान, उबटन, भोजन, जल, दान और हवन) प्रयोग किया जाता है, जिससे साधक को कभी दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता। जया एकादशी का व्रत करने से मनुष्य पिशाच योनि या नीच योनियों में जाने से बच जाता है। माल्यवान और पुष्पवती नामक गंधर्वों को इस व्रत के प्रभाव से ही पिशाच योनि से मुक्ति प्राप्त हुई थी।

अध्याय २९ – फाल्गुन मास की विजया एवं आमलकी एकादशी विधान

इस अध्याय में फाल्गुन मास की विजया तथा आमलकी एकादशी का माहात्म्य वर्णित है। विजया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही पूर्वकाल में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने समुद्र पर लंका विजय हेतु पुल निर्माण किया था और रावण पर विजय प्राप्त की थी। आमलकी एकादशी के दिन आँवले के वृक्ष के मूल में भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। आँवला वृक्ष की उत्पत्ति भगवान के श्रीचरणों से हुई है, अतः इस व्रत से समस्त पापों का नाश होता है।

अध्याय ३० – चैत्र मास की पापमोचिनी एवं कामदा एकादशी कथा

इस अध्याय में चैत्र मास की पापमोचिनी और कामदा एकादशी का वर्णन प्राप्त होता है। पापमोचिनी एकादशी का व्रत कुसंगति और प्रमादवश हुए भयानक पापों का प्रायश्चित्त करने वाला है। मेधावी मुनि को अप्सरा मंजीघोषा के संग दोष से लगे पाप से इसी व्रत द्वारा मुक्ति मिली थी। कामदा एकादशी साधक की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करती है और शापग्रस्त गंधर्व ललित को उसके राक्षस रूप से मुक्त करके पुनः दिव्य स्वरूप प्रदान करती है।

अध्याय ३१ – वैशाख मास की वरूथिनी एवं मोहिनी एकादशी महिमा

इस अध्याय में वैशाख मास की वरूथिनी और मोहिनी एकादशी की अलौकिक कथा का निरूपण है। वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को अखंड सौभाग्य, राजांधु जैसा फल और समस्त दुःखों से सुरक्षा (कवच) प्राप्त होती है। वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी का व्रत स्वयं भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से सम्बद्ध है। समुद्र-मंथन के समय अमृत-पान हेतु और मोह के विनाश हेतु इस व्रत का अनुष्ठान परम फलदायी माना गया है।

अध्याय ३२ – एकादशी व्रत के उद्यापन की शास्त्रीय विधि

इस अध्याय में एकादशी व्रत के पूर्ण फल की प्राप्ति हेतु उसके उद्यापन विधान का विस्तृत शास्त्रीय वर्णन किया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि व्रत की समाप्ति पर उद्यापन करना अनिवार्य है। इसमें मण्डल निर्माण, सर्वतोभद्र पूजा, कलश स्थापना, स्वर्ण या ताम्र की विष्णु-प्रतिमा का पूजन, हवन, कथा-श्रवण तथा चौबीस ब्राह्मणों को भोजन व वस्त्र दान देने का नियम है। विधिपूर्वक उद्यापन करने से साधक का व्रत अक्षय बन जाता है।

अध्याय ३३ – द्वादशी व्रत पारण के नियम और सार्वभौमिक पुण्य

इस अध्याय में एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को व्रत पारण (व्रत खोलने) के शास्त्रीय नियमों का निरूपण है। पारण सदैव हरिवासर (एकादशी तिथि के अंतिम भाग) के समाप्त होने के पश्चात और द्वादशी तिथि के भीतर ही करना चाहिए। पारण के समय तुलसी-दल और चरणामृत ग्रहण करने की विशेष महिमा है। यदि कोई मनुष्य एकादशी का व्रत रखकर द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करता है, तो उसे संपूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त होता है।

अध्याय ३४ – धात्री (आँवला) और तुलसी महिमा का आख्यान

इस अध्याय में भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय दो वनस्पतियों— धात्री (आँवला) और तुलसी जी की अलौकिक उत्पत्ति तथा महिमा का गान किया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि आँवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवता और तीर्थ निवास करते हैं। तुलसी जी साक्षात् लक्ष्मी का स्वरूप हैं; जिसके घर के आँगन में तुलसी का पौधा लहराता है, वहाँ यमदूत कभी प्रवेश नहीं कर सकते। तुलसी पत्र से की गई हरि-पूजा भगवान को कोटि-कोटि स्वर्ण-पुष्पों से भी अधिक प्रिय है।

अध्याय ३५ – भगवान विष्णु के मन्दिर में दीपदान की अपार महिमा

इस अध्याय में विष्णु मन्दिर या देवालयों में दीपदान करने तथा मन्दिर की सफाई (मार्जजन) करने की अपार महिमा वर्णित है। जो भक्त एकादशी, कार्तिक मास या नित्यप्रति संध्या समय भगवान के सम्मुख घृत या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करता है, उसके कई जन्मों का अज्ञान-रूपी अंधकार नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य मन्दिर के शिखर पर ध्वजा फहराता है या मन्दिर के आँगन को बुहारता है, वह उतने ही सहस्र वर्षों तक विष्णुलोक में सुख भोगता है।

अध्याय ३६ – विष्णु-भक्तों के लक्षण और संगति का प्रभाव

इस अध्याय में वास्तविक वैष्णव या विष्णु-भक्त के पावन लक्षणों का निरूपण किया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि सच्चा विष्णु-भक्त वही है जो सर्वभूतों में भगवान का दर्शन करता है, किसी की हिंसा नहीं करता, सत्य बोलता है, परस्त्री और परधन को मिट्टी के समान समझता है तथा जिसके कंठ में तुलसी-माला और मस्तक पर तिलक सुशोभित होता है। ऐसे साधक के सत्संग मात्र से ही पापी जीवों का उद्धार हो जाता है।

अध्याय ३७ – मान्धाता का परम संतोष और महर्षि वशिष्ठ का अनुग्रह

रुक्मांगद की कथा और एकादशी के सम्पूर्ण विधान को सुनकर राजा मान्धाता का हृदय परम संतोष और आनन्द से भर गया। राजा मान्धाता ने महर्षि वशिष्ठ के चरणों में बारंबार प्रणाम किया और गुरुदेव की कृपा हेतु कृतज्ञता व्यक्त की। महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता को आशीर्वाद दिया और इसके पश्चात सनातन धर्म के पवित्र तीर्थों का वर्णन सुनाने की भूमिका तैयार की। यहाँ से उत्तरार्ध का तीर्थ-माहात्म्य खण्ड आरम्भ होता है।

अध्याय ३८ – तीर्थ-यात्रा का आरम्भ और प्रयागराज का प्राकट्य

इस अध्याय से उत्तरार्ध के तीर्थ-माहात्म्य का पावन प्रसंग आरम्भ होता है। महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता को समस्त तीर्थों के राजा, परम पवित्र तीर्थराज प्रयाग के प्राकट्य और उनके अलौकिक स्वरूप के विषय में बताना आरम्भ किया। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के पश्चात प्रथम यज्ञ किया था, तब इस स्थान को ‘प्रयाग’ (प्रधान यज्ञ स्थल) नाम प्राप्त हुआ था। प्रयागराज समस्त पापों का शमन करने वाले और साक्षात् विष्णु के स्वरूप माने गए हैं।

अध्याय ३९ – तीर्थराज प्रयाग का सर्वोत्कृष्ट माहात्म्य

इस अध्याय में तीर्थराज प्रयाग के अलौकिक आध्यात्मिक प्रभाव का विशद वर्णन है। प्रयागराज में बहने वाली नदियाँ, वहाँ का कण-कण और वायु जीव को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। माघ मास में प्रयाग में स्नान करने की महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि अन्य तीर्थों में जो फल वर्षों की कठोर तपस्या से मिलता है, वह फल प्रयागराज में केवल तीन दिन के नियमपूर्वक स्नान से सहज ही प्राप्त हो जाता है।

अध्याय ४० – वेणी-माधव और त्रिवेणी संगम का पावन महात्म्य

इस अध्याय में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम (त्रिवेणी) तथा प्रयाग के रक्षक भगवान वेणी-माधव की महिमा वर्णित है। त्रिवेणी संगम का जल साक्षात् ब्रह्म-द्रव है, जहाँ स्नान करने मात्र से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता। भगवान वेणी-माधव प्रयाग में बारह स्वरूपों में विराजमान होकर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। त्रिवेणी संगम पर किया गया स्नान, तर्पण और दान अक्षय फल प्रदान करता है।

अध्याय ४१ – प्रयाग क्षेत्र में अक्षयवट और मुण्डन की महिमा

इस अध्याय में प्रयाग स्थित अमर वटवृक्ष ‘अक्षयवट’ तथा प्रयाग-तीर्थ में केश-मुण्डन कराने के शास्त्रीय विधान का निरूपण है। प्रलय काल में भी अक्षयवट का विनाश नहीं होता और भगवान बालमुकुंद इसी के पत्ते पर शयन करते हैं। प्रयाग में मुण्डन कराने से मनुष्य के समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक पाप केशलग्न होकर नष्ट हो जाते हैं। अक्षयवट की परिक्रमा करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ४२ – प्रयागराज में स्नान-दान से मोक्ष प्राप्ति की कथा

इस अध्याय में प्रयागराज में स्नान और दान की महिमा को स्पष्ट करने वाली एक प्राचीन ऐतिहासिक कथा वर्णित है। पूर्वकाल में एक अत्यंत पापी और सदाचारहीन मनुष्य ने जब अनजाने में माघ मास के दौरान प्रयाग के त्रिवेणी संगम में स्नान कर लिया, तो उसके समस्त पाप भस्म हो गए। मृत्यु के पश्चात यमदूतों के स्थान पर विष्णुदूत उसे दिव्य विमान में बैठाकर बैकुंठ ले गए। यह आख्यान प्रयाग-स्नान के निष्पापकारी प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है।

अध्याय ४३ – प्रयाग महिमा का उपसंहार और काशी यात्रा आरम्भ

इस अध्याय में प्रयाग माहात्म्य का उपसंहार करते हुए महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि प्रयाग दर्शन से ही जीव के सारे भय दूर हो जाते हैं। इसके पश्चात राजा मान्धाता के निवेदन पर महर्षि ने भगवान शिव की परम प्रिय, तीनों लोकों से न्यारी और मोक्ष की एकमात्र राजधानी पावन काशीपुरी (वाराणसी) का माहात्म्य सुनाना आरम्भ किया। काशी की यात्रा का स्मरण मात्र ही जीव के भव-बंधन काट देता है।

अध्याय ४४ – परम पावन मुक्तिदायिनी काशी (वाराणसी) का प्राकट्य

इस अध्याय में मुक्तिदायिनी काशीपुरी के दिव्य प्राकट्य और उसकी भौगोलिक-आध्यात्मिक स्थिति का सजीव वर्णन है। काशीपुरी पृथ्वी पर स्थित होते हुए भी साक्षात् भगवान शिव के त्रिशूल के अग्र भाग पर विराजमान है, अतः प्रलय काल में भी इसका नाश नहीं होता। वरणा और असि नदियों के मध्य स्थित होने के कारण यह ‘वाराणसी’ कहलाती है। भगवान विष्णु ने अपनी तपस्या से इस क्षेत्र को आनंदकानन के रूप में प्रकट किया था।

अध्याय ४५ – अविमुक्त क्षेत्र काशी की अलौकिक आध्यात्मिक महिमा

इस अध्याय में काशी के ‘अविमुक्त क्षेत्र’ नाम की व्याख्या और उसकी महिमा का वर्णन है। भगवान शिव और माता पार्वती इस पावन क्षेत्र को कभी भी छोड़कर नहीं जाते, इसलिए इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। काशी में मरने वाला कोई भी जीव चाहे वह कीट, पतंग या पापी ही क्यों न हो, उसे सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहाँ की मिट्टी का कण-कण पारस मणि के समान है और यहाँ का जल अमृतोपम है।

अध्याय ४६ – देवाधिदेव भगवान विश्वनाथ और मणिकर्णिका तीर्थ महिमा

इस अध्याय में काशी के स्वामी साक्षात् देवाधिदेव भगवान विश्वनाथ (विश्वेश्वर) तथा परम पवित्र मणिकर्णिका तीर्थ की महिमा वर्णित है। मणिकर्णिका कुण्ड भगवान विष्णु के चक्र द्वारा निर्मित हुआ था, जहाँ स्नान करने से समस्त पापों का सर्वनाश होता है। भगवान विश्वनाथ काशी में प्रत्येक मुमूर्षु (मरणासन्न जीव) के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं, जिससे जीव कर्म-बंधन से मुक्त होकर शिव-स्वरूप हो जाता है।

अध्याय ४७ – उत्तरवाहिनी गंगा और काशी में प्राण-त्याग का फल

इस अध्याय में काशी में प्रवाहित होने वाली उत्तरवाहिनी गंगा जी की अलौकिक महिमा तथा काशी क्षेत्र में देह-त्याग करने के महापुण्य का निरूपण है। गंगा जी काशी में आकर उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं, जिससे वे अपने उद्गम स्थल की ओर निहारती प्रतीत होती हैं। उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान करने से कोटि-कोटि जन्मों के पाप धूल जाते हैं। काशी में देह त्यागने वाले प्राणी को यमलोक की यातना नहीं भोगनी पड़ती, स्वयं शिव उसे स्वीकार करते हैं।

अध्याय ४८ – काशी के पंचक्रोशी मार्ग और शिवलिंगों का निरूपण

इस अध्याय में काशीपुरी की पंचक्रोशी परिक्रमा यात्रा, उसके मार्ग और काशी में स्थापित अनगिनत शिवलिंगों का विस्तृत आख्यान है। काशी के प्रत्येक गली-मुहल्ले में स्थित शिवलिंग साक्षात् शिव का ही अंश हैं। जो भक्त नियमपूर्वक पंचक्रोशी यात्रा पूरी करता है और मार्ग में आने वाले देवताओं का दर्शन करता है, उसे संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य फल प्राप्त होता है।

अध्याय ४९ – कालभैरव, ढुण्ढिराज गणेश और काशी के प्रमुख तीर्थ

इस अध्याय में काशी के रक्षक कालभैरव, प्रथमपूज्य ढुण्ढिराज (डूंढिराज) गणेश, अन्नपूर्णा देवी तथा काशी के प्रमुख अस्सी घाटो व कुण्डों का वर्णन है। कालभैरव भगवान शिव की आज्ञा से काशी के कोतवाल के रूप में वास करते हैं और पापियों को दण्ड देते हैं। ढुण्ढिराज गणेश भक्तों के विघ्नों का हरण करते हैं और माता अन्नपूर्णा काशीवासियों को कभी भूखा नहीं सोने देतीं।

अध्याय ५० – काशी माहात्म्य का विशद विवरण और तारक मन्त्र निरूपण

उत्तरार्ध के ५०वें अध्याय में काशी माहात्म्य का विशद निरूपण पूर्ण होता है, जिसमें भगवान शिव द्वारा दिए जाने वाले परम तारक मन्त्र (राम-नाम या ॐ नमः शिवाय) के गूढ़ रहस्य का उद्घाटन किया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि काशी ही वह दिव्य स्थान है जहाँ ज्ञान, भक्ति और कर्म का त्रिवेणी संगम होता है और जहाँ साक्षात् मोक्ष घर में दासी के समान सेवा करता है। काशी महिमा का यह पावन अध्याय साधक को भगवान विश्वनाथ के श्रीचरणों में अनन्य अनुराग प्रदान करता है।

अध्याय ५१ – गयासुर का आख्यान एवं गया क्षेत्र प्राकट्य

इस अध्याय में सनातन धर्म के परम पवित्र पितृ-तीर्थ गया जी के प्राकट्य और महाबली दैत्य गयासुर के अलौकिक इतिहास का सजीव वर्णन प्राप्त होता है। पूर्वकाल में गयासुर नामक दैत्य ने कोलाहल पर्वत पर सहस्रों वर्षों तक ऐसी कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि उसका शरीर समस्त तीर्थों से भी अधिक पवित्र हो जाएगा। गयासुर के शरीर का स्पर्श करते ही पापी से पापी जीव भी सीधे विष्णुलोक जाने लगे, जिससे यमलोक शून्य होने लगा। यमराज की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी एवं समस्त देवताओं ने गयासुर के पवित्र शरीर को यज्ञ-वेदी बनाने की याचना की, जिसे गयासुर ने लोक-कल्याण हेतु सहर्ष स्वीकार कर लिया।

अध्याय ५२ – गयासुर का महान समर्पण एवं विष्णु पद-चिह्न

इस अध्याय में गयासुर के अनुपम त्याग तथा उसके शरीर पर स्थापित भगवान विष्णु के दिव्य पाद-चिह्न का वर्णन है। जब देवताओं ने गयासुर की पीठ पर यज्ञ आरंभ किया, तब यज्ञ के समय उसका शरीर हिलने लगा। उसे स्थिर करने के लिए भगवान जनार्दन ने अपनी गदा धारण करके गयासुर के सिर पर शिला रखी और स्वयं अपने पादपद्मों से उस शिला को दबा दिया। भगवान के चरण-कमलों के स्पर्श से वह शिला अचल हो गई। भगवान श्रीहरि ने गयासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि जो मनुष्य इस गया-शिला पर अपने पितरों के निमित्त पिण्डदान करेगा, उसके एक सौ एक कुलों के पितर तत्काल मोक्ष को प्राप्त होंगे।

अध्याय ५३ – गया श्राद्ध एवं पिण्डदान की अलौकिक महिमा

इस अध्याय में गया-क्षेत्र में किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान की अपार और अक्षय महिमा का विशद निरूपण किया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता को बताया कि गया जी में पितरों के उद्देश्य से तिल, जल और जौ के पिण्ड अर्पण करने मात्र से नरक की भयानक यातनाएँ भोग रहे पूर्वज भी दिव्य देह धारण करके बैकुंठ चले जाते हैं। यहाँ श्राद्ध करने के लिए काल या तिथि का कोई बंधन नहीं है; जब भी साधक गया जी में पहुँचता है, वही समय पितृ-मुक्ति का परम शुभ अवसर बन जाता है। गया-श्राद्ध से साधक को ब्रह्महत्या जैसे महापातकों से भी मुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय ५४ – गया के प्रमुख तीर्थ: फल्गु नदी एवं अक्षयवट

इस अध्याय में गया जी के अंतर्गत आने वाले प्रमुख तीर्थों जैसे फल्गु नदी, विष्णुपाद मन्दिर, प्रेतशिला, रामशिला तथा अक्षयवट का अलौकिक वर्णन वर्णित है। फल्गु नदी के पावन जल में स्नान करके तर्पण करने से पितर अत्यंत तृप्त होते हैं। अक्षयवट की छाया में बैठकर किया गया पिण्डदान कभी क्षीण नहीं होता और उसका पुण्य फल अमर रहता है। प्रेतयोनि में भटक रहे जीव भी प्रेतशिला पर पिण्ड अर्पित करने से तत्काल मुक्त हो जाते हैं। यह अध्याय गया-क्षेत्र की सीमा में स्थित प्रत्येक शिला और वृक्ष को मोक्षप्रद सिद्ध करता है।

अध्याय ५५ – गया श्राद्ध की विधि एवं पितृ-मुक्ति विधान

इस अध्याय में गया-यात्रा करने वाले साधक हेतु शास्त्रीय विधि-विधान तथा पितृ-मुक्ति की पूजन प्रक्रिया का विस्तृत निरूपण है। इसमें पुनपुना नदी में प्रथम स्नान से लेकर फल्गु-तर्पण, जनार्दन पूजन, विष्णुपाद अर्चन तथा अक्षयवट पर पिण्डदान के नियमों को क्रमबद्ध रूप से समझाया गया है। श्राद्ध के पश्चात वैष्णव ब्राह्मणों को भोजन कराने और दक्षिणा देने का विशेष महत्त्व है। जो पुत्र विधिपूर्वक गया-श्राद्ध सम्पन्न करता है, वह अपने पितृ-ऋण से सदा के लिए मुक्त हो जाता है और उसके कुल में कभी अकाल मृत्यु या दरिद्रता का प्रवेश नहीं होता।

अध्याय ५६ – पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथ पुरी) का प्रादुर्भाव

इस अध्याय से पूर्वी समुद्र तट पर स्थित परम पावन पुरुषोत्तम क्षेत्र (श्रीजगन्नाथ पुरी) का अलौकिक माहात्म्य आरम्भ होता है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि यह क्षेत्र साक्षात् भगवान विष्णु का वैकुंठ धाम है, जहाँ प्रभु स्वयं श्रीजगन्नाथ के रूप में विराजमान हैं। यह भूमि दस योजन में फैली हुई है और इसके दर्शन मात्र से ही मनुष्य के जन्म-जन्मांतरों के पाप भस्म हो जाते हैं। पुरुषोत्तम क्षेत्र में निवास करने वाला प्राणी साक्षात् शिव के समान माना जाता है और यहाँ का अन्न ग्रहण करने से जीव का पुनर्जन्म नहीं होता।

अध्याय ५७ – परम धार्मिक राजा इन्द्रद्युम्न का चरित्र

इस अध्याय में मालवा देश की उज्जैनी नगरी के सूर्यवंशी राजा इन्द्रद्युम्न के परम वैष्णव चरित्र और उनकी भक्ति का सजीव आख्यान है। राजा इन्द्रद्युम्न वेदों के ज्ञाता, धर्मनिष्ठ और भगवान श्रीहरि के अनन्य उपासक थे। उनके हृदय में भगवान विष्णु के प्रत्यक्ष नील-मणिमय रूप (श्रीनीलमाधव) के दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न हुई। राजा ने अपने राज्य के विद्वान ब्राह्मणों और दूतों को चारों दिशाओं में भगवान के उस गोपनीय रूप की खोज करने हेतु भेजा। यह प्रसंग भक्त के हृदय की व्याकुलता और भगवत्प्राप्ति की उत्कट लालसा को दर्शाता है।

अध्याय ५८ – राजा इन्द्रद्युम्न का अश्वमेध यज्ञ एवं प्रभु दर्शन संकल्प

जब राजा इन्द्रद्युम्न के दूतों ने पुरुषोत्तम क्षेत्र में जाकर भगवान नीलमाधव के अंतर्ध्यान होने तथा वहाँ प्रकट होने वाले दिव्य दारु (काष्ठ) का समाचार दिया, तब राजा इन्द्रद्युम्न अपनी विशाल सेना के साथ पुरुषोत्तम क्षेत्र पहुँचे। राजा ने वहाँ सौ अश्वमेध यज्ञों का महान अनुष्ठान आरम्भ किया। यज्ञ के समापन पर आकाशवाणी हुई कि समुद्र के तट पर एक अलौकिक, शंख-चक्र-चिह्नित विशाल वृक्ष बहकर आ रहा है, जो साक्षात् भगवान का दारु-ब्रह्म स्वरूप है। राजा ने अत्यंत आनंदित होकर उस दिव्य काष्ठ को समुद्र तट से प्राप्त किया।

अध्याय ५९ – दारु-ब्रह्म प्राकट्य एवं श्रीविग्रह निर्माण

इस अध्याय में समुद्र तट पर प्राप्त दिव्य दारु-ब्रह्म से भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र के श्रीविग्रहों के निर्माण की परम अद्भुत कथा वर्णित है। स्वयं देवाधिदेव विश्वकर्मा जी एक वृद्ध शिल्पी के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने शर्त रखी कि वे इक्कीस दिनों तक बंद द्वार के भीतर विग्रहों का निर्माण करेंगे। परंतु राजा ने उत्सुकतावश समय से पूर्व ही द्वार खोल दिया, जिससे प्रभु के विग्रह हस्त-पाद के बिना ही अव्यक्त रूप में प्रकट रहे। भगवान ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि वे इसी अनादि दारु-रूप में कलयुग के जीवों का उद्धार करेंगे।

अध्याय ६० – ब्रह्मा जी द्वारा श्रीजगन्नाथ मन्दिर की प्रतिष्ठा

इस अध्याय में सत्यलोक से साक्षात् पितामह ब्रह्मा जी के भूलोक अवतरण तथा श्रीजगन्नाथ मन्दिर की भव्य प्रतिष्ठा का वर्णन प्राप्त होता है। ब्रह्मा जी ने स्वयं वैदिक मन्त्रों द्वारा विशाल मन्दिर के रत्नवेदी पर भगवान श्रीजगन्नाथ, भ्राता बलभद्र, बहन सुभद्रा तथा सुदर्शन चक्र की स्थापना की। ब्रह्मा जी ने राजा इन्द्रद्युम्न को वरदान दिया कि जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे, तब तक यह पुरुषोत्तम क्षेत्र जगत् का कल्याण करता रहेगा। मन्दिर के दर्शन और महाप्रसाद का सेवन करने वाले जीवों को सायुज्य मुक्ति प्राप्त होगी।

अध्याय ६१ – रथयात्रा एवं स्नानयात्रा का परम माहात्म्य

इस अध्याय में श्रीजगन्नाथ पुरी में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध उत्सवों— ज्येष्ठ पूर्णिमा की स्नानयात्रा तथा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा का अलौकिक माहात्म्य वर्णित है। भगवान श्रीहरि वर्ष में एक बार अपने भ्राता और बहन के साथ नन्दीघोष आदि दिव्य रथों पर विराजमान होकर गुंडिचा मन्दिर की यात्रा करते हैं। जो मनुष्य रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ के दर्शन करता है, वह पुनः माता के गर्भ में प्रवेश नहीं करता। रथ के रस्से को स्पर्श करने मात्र से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों का फल सहज ही प्राप्त हो जाता है।

अध्याय ६२ – गुंडिचा मन्दिर एवं पुरुषोत्तम क्षेत्र के पंचतीर्थ

इस अध्याय में जगन्नाथ पुरी के प्रसिद्ध गुंडिचा मन्दिर तथा वहाँ के पंचतीर्थों (इन्द्रद्युम्न सरोवर, रोहिणी कुण्ड, मार्कण्डेय कुण्ड, श्वेतगंगा तथा महोदधि-समुद्र) की महिमा का निरूपण है। इन पंचतीर्थों में स्नान करके भगवान जगन्नाथ और नृसिंह देव का दर्शन करने से साधक के समस्त कायिक, वाचिक और मानसिक पाप क्षणभर में भस्म हो जाते हैं। गुंडिचा मन्दिर में सात दिनों तक भगवान का निवास स्थान रहता है जहाँ दर्शन करने से बैकुंठ लोक की प्राप्ति निश्चित होती है।

अध्याय ६३ – पावन मथुरापुरी एवं उसके द्वादश वन

इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मभूमि मथुरापुरी तथा उसके अंतर्गत आने वाले बारह पवित्र वनों का भक्तिमय निरूपण किया गया है। मथुरापुरी तीनों लोकों में श्रेष्ठ और साक्षात् हरि का हृदय-स्थल है। इसमें मधुवन, तालवन, कुमुदवन, बहुलावन, कामवन, खदिरवन, वृंदावन, भद्रवन, भांडीरवन, बेलवन, लोहवन तथा महावन नामक द्वादश वनों का विस्तार वर्णित है। इन वनों में परिक्रमा और स्नान करने वाले साधक को श्रीकृष्ण की अनन्य प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय ६४ – पतितपावनी यमुना जी का अलौकिक माहात्म्य

इस अध्याय में भगवान सूर्य की पुत्री और यमराज की भगिनी पतितपावनी यमुना जी (कालिंदी) की महिमा का विस्तृत गान किया गया है। यमुना जी का जल श्यामल वर्ण का और साक्षात् श्रीकृष्ण-रस से परिपूर्ण है। यमुना जी में स्नान करने वाले मनुष्य को यमलोक का द्वार नहीं देखना पड़ता क्योंकि यमराज अपने साधकों पर सर्वदा अनुग्रह रखते हैं। विश्राम घाट पर यमुना जी का पूजन और आरती करने से साधक को परमपद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ६५ – श्रीवृंदावन एवं गोवर्धन पर्वत की अलौकिक महिमा

इस अध्याय में श्रीवृंदावन धाम तथा साक्षात् हरि-दास-वर्य श्रीगोवर्धन पर्वत का ओजस्वी वर्णन है। वृंदावन वह दिव्य धाम है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला रची थी और जहाँ की रज का स्पर्श पाने हेतु ब्रह्मा और उद्धव जी भी अभिलाषा करते हैं। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने से साधक को संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य मिलता है। मानसी गंगा में स्नान और गोवर्धन का पूजन साधक के जीवन से समस्त तापों का उन्मूलन कर देता है।

अध्याय ६६ – श्रीराधाकुण्ड, श्यामकुण्ड एवं निकुञ्ज स्थली

इस अध्याय में परम पावन श्रीराधाकुण्ड, श्यामकुण्ड तथा वृंदावन की निकुञ्ज स्थली का परम गोपनीय और रसविभोर वर्णन है। अरिष्टासुर के वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने अपने चरणों के आघात से श्यामकुण्ड और श्रीराधा जी ने अपने कंकण से श्रीराधाकुण्ड का निर्माण किया था। कार्तिक मास की अहोई अष्टमी तिथि को राधाकुण्ड में स्नान करने से साधक को साक्षात् श्रीराधा-कृष्ण के युगल चरणों की अचल प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है, जो समस्त साधनों में दुर्लभ मानी गई है।

अध्याय ६७ – मायापुरी (हरिद्वार) एवं गंगाद्वार माहात्म्य

इस अध्याय में मोक्षदायिनी सात पुरियों में श्रेष्ठ मायापुरी (हरिद्वार) तथा गंगाद्वार की पावन महिमा वर्णित है। हरिद्वार वह दिव्य स्थान है जहाँ पतितपावनी गंगाजी पर्वतों को छोड़कर प्रथम बार मैदानी भाग में अवतरित होती हैं। हर की पौड़ी पर स्थित ब्रह्मकुण्ड में स्नान करने से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के संचित पातक तत्काल नष्ट हो जाते हैं। कुम्भ पर्व के समय हरिद्वार में स्नान, दान और साधु-सेवा करने का पुण्य फल वाङ्मनस से परे है।

अध्याय ६८ – श्रीबद्रिकाश्रम एवं नर-नारायण तपस्थली

इस अध्याय में हिमालय की उतुंग चोटियों के मध्य स्थित परम पवित्र श्रीबद्रिकाश्रम (बद्रीनाथ) धाम का सजीव वर्णन प्राप्त होता है। यह साक्षात् भगवान नर-नारायण की सनातन तपस्थली है जहाँ प्रभु समस्त जगत् के कल्याण हेतु निरंतर तपस्या में लीन रहते हैं। अलकनंदा नदी के तट पर स्थित तप्तकुण्ड में स्नान करके बद्रीविशाल के दर्शन करने वाले मनुष्य का इस मर्त्यलोक में पुनः जन्म नहीं होता। बद्रिकाश्रम का दर्शन ही जीव को सीधे बैकुंठ धाम पहुँचाने वाली परम सीढ़ी है।

अध्याय ६९ – श्रीकेदारनाथ एवं हिमालयी शिव-क्षेत्र

इस अध्याय में हिमालय के गंधमादन पर्वत पर विराजमान द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक श्रीकेदारनाथ धाम की महिमा वर्णित है। पांडवों ने अपने महापापों की शांति हेतु भगवान शिव की आराधना करके केदारनाथ में ही प्रभु की कृपा प्राप्त की थी। मंदाकिनी नदी में स्नान करके केदारेश्वर शिवलिंग का घृत और जल से अभिषेक करने वाला साधक शिव-लोक में आनंद भोगता है। केदारनाथ की यात्रा मनुष्य के अंतःकरण को पूर्णतः निष्पाप और ज्योतिर्मय बना देती है।

अध्याय ७० – परम पावन अयोध्यापुरी एवं श्रीरामजन्मभूमि

इस अध्याय में सरयू नदी के तट पर स्थित साक्षात् मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि परम पावन अयोध्यापुरी का वर्णन है। अयोध्याजी साक्षात् वैकुंठ का ही धरातल पर अवतरित रूप हैं। श्रीरामजन्मभूमि पर भगवान श्रीरामचन्द्र जी के बाल-स्वरूप का ध्यान और दर्शन करने से साधक को परम गति प्राप्त होती है। अयोध्यापुरी में किया गया छोटा सा भी धर्म-कार्य सहस्रों गुना अधिक फल प्रदान करता है और जीव को जन्म-मरण के चक्र से उबार लेता है।

अध्याय ७१ – पावन सरयू नदी एवं श्रीरामघाट माहात्म्य

इस अध्याय में ब्रह्म-द्रव से उत्पन्न पावन सरयू नदी तथा अयोध्या स्थित श्रीरामघाट के माहात्म्य का विशद निरूपण है। सरयू जी के पवित्र जल का आचमन करने मात्र से मनुष्य का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। श्रीरामघाट पर स्नान करके भगवान राम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण का पूजन करने से साधक को सायुज्य मोक्ष की प्राप्ति होती है। सरयू तट पर किया गया पिण्डदान पितरों को अक्षय शांति और विष्णुलोक प्रदान करता है।

अध्याय ७२ – दिव्य द्वारकापुरी एवं गोमती नदी की महिमा

इस अध्याय में पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य राजधानी द्वारकापुरी (द्वारवती) का निरूपण प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा द्वारा समुद्र के मध्य इस अलौकिक नगरी का निर्माण कराया था। द्वारका में बहने वाली गोमती नदी के संगम पर स्नान करने और द्वारकाधीश मन्दिर में प्रभु के चतुर्भुज रूप का दर्शन करने से साधक के समस्त पाप कट जाते हैं। गोपीचंदन का तिलक मस्तक पर धारण करने वाला वैष्णव सर्वदा पवित्र और पूजनीय माना जाता है।

अध्याय ७३ – काँचीपुरी, रामेश्वरम एवं दक्षिण भारत के तीर्थ

इस अध्याय में दक्षिण भारत के परम पावन तीर्थों— काँचीपुरी, सेतुबंध रामेश्वरम, धनुषकोडि तथा कावेरी-कृष्णा नदियों का माहात्म्य वर्णित है। भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पूर्व रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना करके पूजन किया था। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का दर्शन और महोदधि तथा क्षीरसागर के संगम पर स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे भयानक पाप भी तत्काल भस्म हो जाते हैं। धनुषकोडि में स्नान करने से साधक को सर्व-तीर्थों का पुण्य फल एक साथ प्राप्त होता है।

अध्याय ७४ – पुण्यतोया नर्मदा नदी एवं ओंकारेश्वर माहात्म्य

इस अध्याय में अमरकंटक से निकलने वाली साक्षात् रुद्र-कन्या पुण्यतोया नर्मदा नदी तथा नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का विशद आख्यान है। नर्मदा जी का दर्शन मात्र ही उतना पुण्य प्रदान करता है जितना गंगा जी में स्नान करने से मिलता है। नर्मदा के प्रत्येक कंकड़ में साक्षात् शिव (नर्मदेश्वर) का वास माना गया है। ओंकारेश्वर में नर्मदा-संगम पर पूजन करने से साधक को परम शिव-तत्त्व और ब्रह्मज्ञान की सहज ही अनुभूति हो जाती है।

अध्याय ७५ – अवन्तिका (उज्जैन) एवं महाकालेश्वर क्षेत्र

इस अध्याय में क्षिप्रा नदी के तट पर बसी मोक्षदायिनी अवन्तिका (उज्जैन) पुरी तथा महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। अवन्तिका पुरी काल चक्र की गणना का केंद्र है और यहाँ काल के भी काल साक्षात् महाकालेश्वर विराजमान हैं। क्षिप्रा नदी में कुम्भ पर्व के समय स्नान करने और महाकालेश्वर का भस्म-आरती व जलाभिषेक दर्शन करने से साधक की अकाल मृत्यु का योग टल जाता है और उसे दीर्घायु व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अध्याय ७६ – पावन कुरुक्षेत्र एवं अदृश्य सरस्वती नदी

इस अध्याय में धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र तथा वहाँ प्रवाहित होने वाली अदृश्य पावन सरस्वती नदी की अलौकिक महिमा का वर्णन है। कुरुक्षेत्र वह पावन भूमि है जहाँ राजा कुरु ने तपस्या की थी और जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का अमर ज्ञान प्रदान किया था। सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र के सन्नहित और ब्रह्मसरोवर में स्नान करके दान देने से कोटि-कोटि अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त होता है। सरस्वती नदी का तर्पण जीव को परम विवेक प्रदान करता है।

अध्याय ७७ – सर्वतीर्थमय पुष्कर क्षेत्र का विशद निरूपण

इस अध्याय में पितामह ब्रह्मा जी की पावन तपोभूमि सर्वतीर्थमय पुष्कर क्षेत्र का विस्तृत निरूपण प्राप्त होता है। ब्रह्मा जी के हाथ से गिरे कमल-पुष्प से जेष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ पुष्कर कुण्डों का प्राकट्य हुआ था। कार्तिक पूर्णिमा को पुष्कर सरोवर में स्नान करके साक्षात् ब्रह्मा जी के मन्दिर में दर्शन करने से साधक के समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। पुष्कर क्षेत्र में किया गया दान और जप साधक को सीधे ब्रह्मलोक में स्थान प्रदान करता है।

अध्याय ७८ – तीर्थ-यात्रा के शास्त्रीय नियम एवं सदाचार

इस अध्याय में तीर्थ-यात्रा करने वाले साधक हेतु आवश्यक शास्त्रीय नियमों, संयम और सदाचार का विशद मार्गदर्शन दिया गया है। महर्षि वशिष्ठ ने बताया कि केवल शरीर से तीर्थ जाने से फल नहीं मिलता, अपितु मन की पवित्रता, सत्यवादिता, क्षमा, दया, इंद्रिय-निग्रह और क्रोधरहित होना अनिवार्य है। तीर्थ में जाकर दूसरों की निंदा, छल-कपट, पाप-कर्म या व्यापारिक वृत्ति रखने वाले का तीर्थ-फल नष्ट हो जाता है। नम्रता और हरि-नाम स्मरणपूर्वक की गई यात्रा ही मोक्षदायिनी बनती है।

अध्याय ७९ – अनन्य विष्णु-भक्ति एवं समस्त तीर्थों का सार

इस अध्याय में समस्त तीर्थों, व्रतों और साधनों के परम सार-तत्त्व अनन्य हरि-भक्ति का प्रतिपादन किया गया है। महर्षि वशिष्ठ कहते हैं कि संसार के समस्त पावन तीर्थ साक्षात् भगवान विष्णु के श्रीचरणों के नख-मणि की कांति से ही अपनी पवित्रता प्राप्त करते हैं। जिस मनुष्य के हृदय में भगवान वासुदेव के प्रति अनन्य प्रेम और शरणागति भाव है, उसके घर में ही समस्त तीर्थ नित्य निवास करते हैं। निष्काम हरि-भक्ति ही समस्त तीर्थों का अंतिम और सर्वोच्च फल है।

अध्याय ८० – उत्तरार्ध एवं सम्पूर्ण नारद पुराण की फल-श्रुति

इस अध्याय में नारद पुराण के सम्पूर्ण उत्तरार्ध (८२ अध्यायों) तथा पूरे ग्रन्थ की परम पावन फल-श्रुति का ओजस्वी गान किया गया है। महर्षि वशिष्ठ बताते हैं कि जो मनुष्य भक्तिभाव से इस उत्तरार्ध का पाठ या श्रवण करता है, उसे चारों वेदों, समस्त पुराणों और सर्व-तीर्थों के सेवन का अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। उसके कुल में कभी दुख, दरिद्रता, अकाल मृत्यु या पापकर्म का प्रवेश नहीं होता और वह अंत में दिव्य विमान में विराजमान होकर साक्षात् विष्णुलोक को प्रस्थान करता है।

अध्याय ८१ – देवर्षि नारद और महर्षि वशिष्ठ का परस्पर वंदन

इस अध्याय में कथा-प्रवाह की समाप्ति पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ, राजा मान्धाता, देवर्षि नारद तथा महर्षि सनत्कुमार के मध्य हुए परस्पर आदर, वंदन और शुभकामनाओं का सुंदर चित्रण है। देवर्षि नारद ने महर्षि वशिष्ठ के चरणों में बारंबार प्रणाम करके इस अमृतमय कथा को सुनाने हेतु परम कृतज्ञता व्यक्त की। आकाश से देवताओं ने पुष्प-वर्षा की और समस्त ऋषियों ने ‘जय श्रीहरि’ का मंगलघोष किया। यह प्रसंग श्रोता और वक्ता दोनों के अंतःकरण को परम शांति से भर देता है।

अध्याय ८२ – नारद पुराण उत्तरार्ध का दिव्य उपसंहार

नारद पुराण के अन्तिम एवं ८२वें अध्याय में सम्पूर्ण नारद पुराण (पूर्वार्ध एवं उत्तरार्ध) का परम मंगलमय दिव्य उपसंहार किया गया है। सूत जी ने नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषियों से कहा कि यह नारद पुराण सनातन धर्म का प्रत्यक्ष अमृत-कलश है जो जीवों के त्रिविध तापों का नाश करने वाला है। सम्पूर्ण ग्रन्थ को परात्पर पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव के श्रीचरणों में समर्पित करते हुए जगत् के कल्याण, सर्वत्र शांति और अनन्य भगवद्-भक्ति की प्रार्थना के साथ नारद पुराण का यह परम पावन आख्यान परिपूर्णता को प्राप्त होता है।

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