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अष्टादश महापुराणों में परम पवित्र मत्स्य पुराण सनातन धर्म का अत्यंत प्राचीन, दिव्य तथा प्रमाणिक इतिहास ग्रन्थ है। साक्षात श्रीहरि ने प्रलयकाल के भीषण जलप्लावन के मध्य मत्स्य रूप धारण करके वैवस्वत मनु को जिस अलौकिक ज्ञान का उपदेश दिया था, वही मत्स्य पुराण के रूप में उद्भाषित हुआ। इस पावन पुराण की रचना महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी ने की है। इसमें कुल दो सौ ९१ (291) अध्याय तथा चौदह सहस्र से अधिक श्लोक समाविष्ट हैं। पुराण के पञ्चलक्षण—सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय और पुनरुत्पत्ति), वंश (ऋषियों एवं राजाओं की वंशावली), मन्वन्तर (विभिन्न काल-चक्र), तथा वंशानुचरित (सूर्यवंश व चन्द्रवंश के धर्मनिष्ठ राजाओं का इतिहास)—इस ग्रन्थ में पूर्ण रूप से संकलित हैं। इसके अतिरिक्त इस ग्रन्थ में वास्तुशास्त्र, मन्दिर निर्माण कला, मूर्तिकला, व्रत-उपवास विधान, श्राद्ध कल्प, तीर्थ माहात्म्य, तथा राजधर्म का भी विस्तृत और व्यावहारिक वर्णन प्राप्त होता है। यह पुराण भगवान मत्स्य और मनु के पावन संवाद के माध्यम से सत्य सनातन इतिहास को यथार्थ रूप में उजागर करता है।

मत्स्य पुराण सनातन संस्कृति एवं धर्म दर्शन की एक विशाल ज्ञान-गंगा है। इसके प्रथम पचास अध्यायों में परमेश्वर भगवान मत्स्य के प्राकट्य और महाप्रलय की ऐतिहासिक सत्य घटना से लेकर सृष्टि के प्रादुर्भाव का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। इसमें ब्रह्मा जी द्वारा की गई प्राथमिक सृष्टि, दक्ष प्रजापति का वंश-विस्तार, कश्यप प्रजापति द्वारा देवों, दैत्यों, दानवों, नागों एवं चराचर जीवों की उत्पत्ति का वृत्तांत समाविष्ट है। पितृगणों के विभिन्न कुलों, श्राद्ध-तर्पण की शास्त्रीय विधि, तथा पिण्डदान के अलौकिक माहात्म्य का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। इसके साथ ही सूर्यवंश और चन्द्रवंश के महान राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, मान्धाता, पृथु, पुरूरवा, ययाति, तथा कार्तवीर्य अर्जुन का वास्तविक इतिहास वर्णित है। राजा ययाति का इतिहास, देवयानी व शर्मिष्ठा का प्रसंग, कच-देवयानी संवाद, तथा ययाति का वैराग्य धर्म एवं मोक्ष के परम गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है। इसमें वर्ण-आश्रम धर्म, मदन-द्वादशी आदि पावन व्रतों के विधान, तथा द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पूर्ण अवतार और असुर-संहार की लीलाओं का भक्तिभावपूर्ण आख्यान निहित है।

मत्स्य पुराण सनातन संस्कृति एवं धर्म दर्शन की एक विशाल ज्ञान-गंगा है। अध्याय ५१ से १०० तक के पावन भाग में सनातन जीवन-पद्धति को सुदृढ़ करने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक विषयों का प्रतिपादन किया गया है। इसमें सर्वप्रथम अग्निदेव के वंश और पावक-पवमान-शुचि आदि अग्नियों के प्रादुर्भाव का इतिहास वर्णित है। तत्पश्चात् अष्टादश महापुराणों की श्लोक-संख्या, लक्षण तथा दान-माहात्म्य का शास्त्रीय निरूपण प्राप्त होता है। इस भाग का मुख्य आकर्षण विभिन्न पावन तिथियों पर किए जाने वाले व्रत विधान हैं, जिनमें तृतीया व्रतों (अक्षय्य-तृतीया, अनन्त-तृतीया, रसकल्याणिनी), सप्तमी व्रतों (विशोक-सप्तमी, फल-सप्तमी, मन्दार-सप्तमी, अर्क-सप्तमी) तथा द्वादशी व्रतों (विशोक-द्वादशी, अनन्त-द्वादशी, भीष्म-द्वादशी) का विशद वर्णन है। जनकल्याण हेतु वापी-कूप-तड़ाग (जल निकायों) की प्रतिष्ठा तथा वृक्षारोपण की महिमा बताई गई है। इसके अतिरिक्त सनातन परंपरा के सर्वोच्च दस महादानों (तुलापुरुष, हिरण्यगर्भ, तिलपर्वत, कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि) की विधि तथा नवग्रह-पूजन व ग्रह-शांति विधान का विस्तृत गान किया गया है।

मत्स्य पुराण के अध्याय १०१ से १५० तक के पावन भाग में सनातन संस्कृति तथा ब्रह्मांडीय भूगोल के अत्यंत गहन एवं गूढ़ विषयों का निरूपण किया गया है। इस भाग का आरंभ परम पवित्र तीर्थराज प्रयाग की अलौकिक महिमा, गंगा-यमुना-सरस्वती के पावन संगम, त्रिवेणी स्नान, तथा अक्षयवट के आध्यात्मिक माहात्म्य से होता है। इसके पश्चात् भुवनकोश वर्णन के अंतर्गत पृथ्वी की भौगोलिक संरचना, सातों द्वीपों (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक, पुष्कर), सातों समुद्रों, तथा परम पावन भारतवर्ष की नदियों एवं पर्वतों का विस्तृत आख्यान प्राप्त होता है। तत्पश्चात् खगोल शास्त्र तथा काल-चक्र के अंतर्गत सूर्यदेव, चन्द्रमा, नवग्रहों तथा ध्रुव मण्डल की गतियों का अलौकिक विवरण दिया गया है। इस भाग का परम रोमांचक प्रसंग त्रिपुरासुर का प्रादुर्भाव, मय दानव द्वारा तीन दिव्यातिदिव्य पुरों का निर्माण, तथा साक्षात सर्वेश्वर भगवान शिव द्वारा एक ही बाण से त्रिपुर-दहन की पावन लीला है। अंत में मन्वन्तर व्यवस्था, चारों युगों के धर्म, सप्तर्षियों की वंशावली तथा देवासुर संग्राम की महागाथा का सुंदर भक्तिभावपूर्ण वर्णन निहित है।

मत्स्य पुराण के अध्याय १५१ से २०० तक के पावन भाग में सनातन इतिहास की अनेक अलौकिक एवं धर्मनिष्ठ सत्य घटनाओं का सविस्तार वर्णन किया गया है। इस भाग का मुख्य आकर्षण तारकासुर-वध हेतु भगवान कार्तिकेय का प्रादुर्भाव, उनके बाल-लीला चरित्र, तथा देवसेनापति के रूप में तारकासुर के साथ भयंकर युद्ध और असुराधिपति का वध है। तत्पश्चात् दैत्यराज हिरण्यकशिपु के अत्याचार, उसकी उग्र तपस्या, तथा साक्षात सर्वेश्वर भगवान नृसिंह के अलौकिक प्राकट्य द्वारा हिरण्यकशिपु के संहार और प्रह्लाद की रक्षा का इतिहास निरूपित है। इसके अतिरिक्त भगवान वराह अवतार द्वारा रसातल से पृथ्वी का उद्धार तथा भगवान वामन द्वारा राजा बलि के यज्ञ में त्रिविक्रम रूप धारण का पावन आख्यान समाविष्ट है। अंधकासुर-वध के प्रसंग में भगवती मातृकाओं की उत्पत्ति तथा शिवजी की अहेतुकी कृपा का भक्तिपूर्ण गान है। आगे चलकर परम पावन तीर्थराज अविमुक्त काशी क्षेत्र एवं पतित-पावनी पुण्यसलिला नर्मदा नदी के तटवर्ती समस्त तीर्थों का विशद माहात्म्य वर्णित है। अंत में महर्षि भृगु, अंगिरा, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के पावन वंशज ऋषियों एवं गोत्र-प्रवरों की प्रामाणिक वंशावली का सूक्ष्म निरूपण प्राप्त होता है।

मत्स्य पुराण के अध्याय २०१ से २५० तक के पावन भाग में सनातन संस्कृति के अत्यंत व्यावहारिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विषयों का अनुपम निरूपण किया गया है। इस भाग का आरंभ पितृ-वंश, पितृ-गाथा तथा श्राद्ध-कल्प के अति सूक्ष्म रहस्यों से होता है, जिसमें पितरों की तृप्ति और कुल की समृद्धि हेतु तर्पण-विधान बताया गया है। तत्पश्चात् सनातन साहित्य का सर्वाधिक विस्तृत और प्रामाणिक ‘राजधर्म’ अनुभाग आरंभ होता है। इसमें राजा के गुण, मन्त्रि-परिषद, दुर्ग-निर्माण, सेना-रचना, गुप्तचर-व्यवस्था, विष-सुरक्षा, न्याय-व्यवस्था, दण्ड-नीति, तथा साम-दाम-दंड-भेद की कूटनीति का विशद निरूपण है। इसके अतिरिक्त सामुद्रिक-शास्त्र के अंतर्गत पुरुष एवं स्त्री के शुभ-अशुभ अंगों के लक्षण, गज-अश्व के लक्षण, अस्त्र-शस्त्र परीक्षा, तथा रत्न-परीक्षण का व्यावहारिक ज्ञान दिया गया है। भाग के अंत में सर्वेश्वर भगवान वामन के अलौकिक प्रादुर्भाव, राजा बलि के यज्ञ में त्रिविक्रम रूप धारण करने, सुतल लोक गमन, भगवान वराह व नृसिंह अवतारों के पावन इतिहास तथा क्षीरसागर मंथन से उत्पन्न अमृत-प्राप्ति एवं मोहिनी-अवतार की भक्तिभावपूर्ण लीलाओं का वर्णन संकलित है।

मत्स्य पुराण के अध्याय २५१ से २९१ तक के अंतिम भाग में सनातन वास्तुकला, मूर्तिकला, देव-प्रतिष्ठा विधान, भावी राजवंशों का काल-चक्र तथा षोडश महादानों का अत्यंत विशद एवं प्रामाणिक वर्णन प्राप्त होता है। इस भाग का मुख्य आकर्षण भारतीय वास्तुशास्त्र और मन्दिर-निर्माण कला का सूक्ष्म विधान है, जिसमें गृह-निर्माण, वास्तु-पुरुष पूजन, मन्दिरों के बीस प्रकार, तथा देव-प्रतिमाओं के शास्त्रीय माप-दण्ड निरूपित हैं। इसके पश्चात् शिवलिंग-प्रतिष्ठा, मण्डप-निर्माण, तथा देव-प्रतिष्ठा की पावन अधिवास विधियों का भक्तिभावपूर्वक वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण कलियुग के भावी राजवंशों (मगध, आंध्र, इक्ष्वाकु आदि) की प्रामाणिक वंशावली का काल-चक्र सुनाया गया है। भाग के उत्तरार्द्ध में सनातन धर्म के परम कल्याणकारी षोडश महादानों (तुलापुरुष, हिरण्यगर्भ, तिलपर्वत, कामधेनु, कल्पवृक्ष आदि) की शास्त्रीय विधियों और उनके अलौकिक फलों का महिमा गान है। अंत में मत्स्य पुराण का मंगलमय उपसंहार, इसकी फलश्रुति तथा सर्वेश्वर प्रभु के चरणों में अंतिम समर्पण व्यक्त किया गया है।

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मूल श्लोक और अनुवाद
केवल अनुवाद

हर अध्याय का विवरण

1 – मन्वन्तर-कथा तथा भगवान मत्स्य एवं मनु का प्रथम समागम

सत्ययुग के अंत में द्रविड़ देश के धर्मनिष्ठ राजा सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) कृतमाला नदी के पवित्र जल में तर्पण कर रहे थे, तभी उनकी अंजलि में एक सूक्ष्म मत्स्य प्रकट हुआ। राजा ने दयावश उस सूक्ष्म मत्स्य को अपने जल-पात्र में रखा, किंतु क्षणभर में वह बढ़कर अति विशाल होने लगा। राजा ने उसे क्रमशः घट, सरोवर तथा अंततः महासागर में स्थापित किया, फिर भी मत्स्य रूपधारी प्रभु का कलेवर सागर से भी विस्तृत हो गया। राजा सत्यव्रत ने तत्काल पहचान लिया कि यह साक्षात जगदात्मा सर्वेश्वर श्रीहरि हैं और उन्होंने भक्तिभाव से प्रभु की स्तुति की। भगवान मत्स्य ने प्रसन्न होकर राजा को अवगत कराया कि आज से सप्तम दिवस पर महाप्रलय का भीषण जलप्लावन तीनों लोकों को जलमग्न कर देगा, अतः वे एक सुदृढ़ नौका का निर्माण करके उसमें समस्त बीजों, औषधियों तथा सप्तर्षियों को स्थापित करें।

2 – महाप्रलय, नौका-बंधन तथा सृष्टि-पुनरारंभ

निर्धारित समय पर महाप्रलय के भयंकर संवर्तक मेघों ने मुसलाधार वर्षा आरंभ की और समस्त पृथ्वी जलमग्न हो गई। भगवान मत्स्य जलनिधि के मध्य एक विशाल स्वर्ण-श्रृंग-युक्त मत्स्य रूप में प्रादुर्भूत हुए। राजा सत्यव्रत ने भगवान के निर्देशानुसार नौका को वासुकि नाग रूपी रज्जु द्वारा मत्स्य के महाश्रृंग से दृढ़तापूर्वक बाँध दिया। प्रलय महासागर की उत्ताल तरंगों पर तैरती हुई नौका में विराजमान राजा सत्यव्रत ने परम पुरुष भगवान मत्स्य से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों, काल-चक्र, वंश-परंपरा तथा परम धर्म के विषय में प्रश्न पूछे, जिसके उत्तर में सर्वज्ञ भगवान मत्स्य ने इस पावन पुराण का दिव्य उपदेश देना प्रारंभ किया।

3 – प्राथमिक सृष्टि, ब्रह्मा का प्रादुर्भाव तथा शतरूपा का जन्म

जलमग्न ब्रह्मांड में महाप्रलय के उपरांत भगवान नारायण की नाभि-कमल से सर्वलोकपितामह ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम अपने मन से मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु तथा नारद जैसे दिव्य मानस पुत्रों की रचना की। इसके पश्चात् सृष्टि के विकास हेतु ब्रह्मा जी के श्रीअंग से परम सुंदरी शतरूपा (सरस्वती) का प्रादुर्भाव हुआ। शतरूपा के अनुपम सौंदर्य का अवलोकन करने हेतु ब्रह्मा जी के चारों दिशाओं में चार मुख प्रकट हुए और उनके तपोबल से सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया गतिमान हुई।

4 – स्वायम्भुव मनु, दक्ष प्रजापति तथा सती-चरित्र

ब्रह्मा जी और शतरूपा के दिव्य योग से स्वायम्भुव मनु तथा महारानी शतरूपा की उत्पत्ति हुई, जिनसे प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा आकूति, देवहूति, प्रसूति नामक कन्याओं का जन्म हुआ। प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष के साथ हुआ, जिनकी साठ कन्याओं ने समस्त सृष्टि के कुलों का विस्तार किया। इसी प्रसंग में दक्ष की कन्या भगवती सती का भगवान शिव के साथ पावन परिणय, दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में शिवजी का अपमान, सती जी का योगाग्नि में आत्मदाह, तथा तत्पश्चात् भारतवर्ष की पावन भूमि पर विभिन्न सिद्ध शक्तिपीठों के प्रादुर्भाव का सत्य इतिहास वर्णित होता है।

5 – वसु, रुद्र तथा मरुद्गण की संतति

प्रजापति धर्म तथा कश्यप जी की पत्नियों से उत्तम देवगणों का जन्म हुआ। आठ वसुओं—ध्रुव, धर, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—का प्रादुर्भाव हुआ, जिनके वंशजों ने जगत में प्राकृतिक व्यवस्था को संचालित किया। एकादश रुद्रों का उग्र एवं सर्वकल्याणकारी स्वरूप प्रकट हुआ। इसके साथ ही कश्यप जी की पत्नी दिति के गर्भ से इंद्र द्वारा वज्र से इक्यालीस भागों में विभाजित किए जाने पर भी अमर रहे मरुद्गणों की दिव्य उत्पत्ति का आख्यान पूर्ण भक्तिभाव से वर्णित है।

6 – कश्यप प्रजापति की संतति तथा देव-दानव-दैत्य उत्पत्ति

महर्षि कश्यप की विभिन्न देवियों से संपूर्ण चराचर जीवों की उत्पत्ति हुई। माता अदिति के गर्भ से बारह आदित्य (विष्णु, शक्र, अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान, सविता, मित्र, वरुण, अंशुमान, भग) प्रकट हुए जो देवगण कहलाए। दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष व हिरण्यकशिपु जैसे दैत्य उत्पन्न हुए और दनु के गर्भ से दानवों की संतति फैली। कद्रू से सहस्रों नाग, विनता से गरुड़ व अरुण, सुरभि से गौएँ व पशु, तथा मुनि व क्रोधा से अप्सराएँ एवं गंधर्व उत्पन्न होकर इस संसार में व्याप्त हुए।

7 – मदन-द्वादशी व्रत का विधान तथा माहात्म्य

संसार में उत्तम संतति, अखंड सौभाग्य तथा पारिवारिक समृद्धि प्राप्त करने हेतु भगवान मत्स्य ने मदन-द्वादशी व्रत का निरूपण किया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को कामदेव (मदन) तथा भगवती श्री (लक्ष्मी जी) के दिव्य स्वरूप का पूजन किया जाता है। इस व्रत में अशोक वृक्ष के पत्तों से मण्डप बनाकर, सर्वतोभद्र मण्डल पर कलश स्थापित कर, गंध, पुष्प, धूप, दीप तथा मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। जो भक्त नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करते हैं, वे इहलोक में समस्त सुख भोगकर अंत में भगवान विष्णु के परम धाम को प्राप्त होते हैं।

8 – राजाओं का राज्याभिषेक तथा चक्रवर्ती पद

सृष्टि के आरंभिक काल में धर्मपरायण राजाओं के राज्याभिषेक की वैदिक विधि तथा राजधर्म के नियमों का प्रतिपादन किया गया है। महाराज पृथु के अलौकिक राज्याभिषेक का पावन प्रसंग आता है, जब समस्त देवगण, ऋषि, मुनि तथा प्रजाजन एकत्र होकर उनका अभिषेक करते हैं। राजा को प्रजा के पालन हेतु भगवान विष्णु का अंश माना गया है, और जो राजा नीति, सत्य तथा धर्म के मार्ग पर चलकर प्रजा की रक्षा करता है, वह चक्रवर्ती पद प्राप्त कर अक्षय यश का भागी बनता है।

9 – स्वायम्भुव आदि मन्वन्तरों का विस्तृत वर्णन

काल-चक्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न मन्वन्तरों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। स्वायम्भुव, स्वरोचिश, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष तथा वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर का क्रमबद्ध वर्णन है। प्रत्येक मन्वन्तर में पृथक-पृथक मनु, उस काल के सप्तर्षि, देवगण तथा इंद्र का प्रादुर्भाव होता है। यह काल-चक्र सनातन धर्म की अगाध समय-गणना को सिद्ध करता है और यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार प्रत्येक मन्वन्तर में सृष्टि का नियमन एवं संचालन पूर्ववत होता रहता है।

10 – राजा वेन का अधर्म तथा महाराज पृथु का प्राकट्य

अंग राजा के पुत्र वेन ने राजा बनते ही अहंकारवश यज्ञ, दान व पूजा-पाठ पर रोक लगा दी और स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया। महर्षियों ने उसे बहुत समझाया, किंतु वेन के न मानने पर ऋषियों ने अपने मंत्रबल और हुंकार से उसका अंत कर दिया। तत्पश्चात् राजाविहीन पृथ्वी पर अराजकता रोकने हेतु ऋषियों ने वेन की दाहिनी भुजा का मंथन किया, जिससे साक्षात भगवान विष्णु के अंशावतार धनुर्धारी महाराज पृथु प्रादुर्भूत हुए। पृथु ने अकाल से पीड़ित प्रजा की रक्षा हेतु पृथ्वी को गौ-रूप में दुहकर समस्त अन्न, औषधि तथा रत्न पुनः प्राप्त किए।

11 – इला और बुध का समागम तथा पुरूरवा का जन्म

वैवस्वत मनु के पुत्र सुद्युम्न एक बार शिकार खेलते हुए भगवान शिव के उस वन में चले गए जहाँ प्रवेश करते ही पुरुष स्त्री बन जाता था। स्त्री-रूप प्राप्त कर उनका नाम इला हुआ। सोम के पुत्र बुध ने इला के अनुपम सौंदर्य को देखकर उनसे परिणय किया। इस पावन समागम से तेजस्वी राजा पुरूरवा का जन्म हुआ, जो आगे चलकर चन्द्रवंश के महान चक्रवर्ती सम्राट बने। तत्पश्चात् महर्षियों की कृपा और भगवान शिव के अनुग्रह से सुद्युम्न पुनः पुरुष रूप प्राप्त कर धर्मपूर्वक शासन करने लगे।

12 – सूर्यवंश (सूर्य-संतति) का पावन आख्यान

भगवान विवस्वान (सूर्यदेव) के पावन वंश का क्रमबद्ध इतिहास वर्णित है। सूर्यदेव के पुत्र वैवस्वत मनु से इक्ष्वाकु का जन्म हुआ, जिनसे अयोध्या के महान सूर्यवंश की स्थापना हुई। इस वंश में विकुक्षि, ककुत्स्थ, पृथु, मान्धाता, हरिश्चन्द्र, सगर, भगीरथ, तथा रघु जैसे परम सत्यवादी, दानवीर और धर्मनिष्ठ राजाओं ने जन्म लिया। महाराज भगीरथ की कठोर तपस्या से ही पतित-पावनी गंगा जी का भगीरथ-प्रयास द्वारा भूलोक पर अवतरण हुआ, जिससे सगर के साठ सहस्र पुत्रों का उद्धार हुआ।

13 – भगवती गौरी के 108 नाम तथा शक्तिपीठ माहात्म्य

भगवती पार्वती के 108 पावन नामों तथा पृथ्वी पर स्थित सिद्ध शक्तिपीठों का विस्तृत वर्णन किया गया है। जब भगवती सती का शरीर भगवान शिव ले जा रहे थे, तब उनके अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वे स्थान परम पवित्र तीर्थ बन गए। वाराणसी में विशालाक्षी, नैमिषारण्य में लिंगधारिणी, गया में मंगला, प्रयाग में ललिता, उज्जैन में महाकाली, तथा हरिद्वार में चण्डी के नाम से भगवती गौरी विराजमान हैं। इन 108 नामों का नित्य पाठ करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर परम सिद्धि प्राप्त करता है।

14 – अग्निष्वात्त पितृगण तथा अच्छोदा की कथा

पितरों के विभिन्न कुलों में अग्निष्वात्त नामक पितृगणों का प्रादुर्भाव और स्वरूप वर्णित है। इन पितरों की मानस कन्या अच्छोदा ने एक सहस्र वर्ष तक कठोर तपस्या की। तपस्या के अंत में जब पितृगण प्रकट हुए, तब अच्छोदा अमावसू नामक पितृ के सौंदर्य पर मोहित हो गई। इस त्रुटि के कारण उसे भूलोक पर मत्स्यकन्या (सत्यवती) के रूप में जन्म लेना पड़ा। किंतु अमावसू के निष्काम भाव के कारण उस तिथि का नाम अमावास्या पड़ा, जो पितृ-तर्पण के लिए सर्वाधिक फलदायी तिथि सिद्ध हुई।

15 – बहिर्षद आदि पितृगण एवं श्राद्ध-तर्पण की महिमा

अग्निष्वात्त के अतिरिक्त बहिर्षद, सोमपा, हविष्मत्, उपहूत तथा आज्यपा नामक अन्य पितृ-श्रेणियों का विस्तृत विवरण दिया गया है। देवलोक व पितृलोक में विराजमान ये पितर अपने वंशजों द्वारा दिए गए जल, तिल तथा पिण्ड से अत्यंत तृप्त होते हैं। जो गृहस्थ भक्तिपूर्वक पितृपक्ष तथा अमावास्या को पितृ-तर्पण करते हैं, उनके कुल में कभी धन, आरोग्य, संतति तथा शांति की कमी नहीं होती, क्योंकि पितरों का आशीर्वाद समस्त मङ्गल प्रदान करने वाला है।

16 – सामान्य श्राद्ध विधि तथा पिण्डदान विधान

शास्त्रानुकूल सामान्य श्राद्ध कर्म की प्रामाणिक विधि का प्रतिपादन किया गया है। श्राद्ध हेतु पवित्र स्थान की सफाई, कुशा-आसन, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल व तिल का दान, तथा वेदपाठी ब्राह्मणों के वरण का नियम बताया गया है। जौ के आटे, तिल, मधु तथा घी मिलाकर बनाए गए पिण्डों को पितरों को समर्पित करने का विधान है। श्राद्ध कर्म में प्रयुक्त सामग्री की पवित्रता और श्रद्धा भाव ही पितरों की परम तृप्ति का मुख्य साधन है।

17 – अभ्युदयिक (नांदीमुख) एवं साधारण श्राद्ध कर्म

मांगलिक अवसरों जैसे पुत्र-जन्म, विवाह, तथा गृह-प्रवेश के समय किए जाने वाले अभ्युदयिक (नांदीमुख) श्राद्ध तथा नित्य-नैमित्तिक श्राद्धों के भेद स्पष्ट किए गए हैं। अभ्युदयिक श्राद्ध में पूर्वाभिमुख होकर प्रसन्नचित्त से पितरों व माताओं का पूजन किया जाता है। इसके विपरीत सामान्य पितृ-कार्यों में दक्षिणाभिमुख होकर नियम-संयम से कार्य संपन्न किए जाते हैं। दोनों प्रकार के श्राद्धों का उचित काल में आचरण करने से परिवार में समृद्धि और वंश-वृद्धि होती है।

18 – सपिण्डीकरण श्राद्ध विधान

मृतक जीव की प्रेत-संज्ञा समाप्त कर उसे पितृलोक में स्थापित करने वाले अति महत्वपूर्ण सपिण्डीकरण श्राद्ध का शास्त्रीय निरूपण है। जीव की मृत्यु के पश्चात् एक वर्ष पूर्ण होने पर अथवा किसी मांगलिक कार्य से पूर्व सपिण्डीकरण किया जाता है। इसमें प्रेत-पिण्ड को पितृगणों के तीन पिण्डों में मंत्रोच्चार के साथ मिलाया जाता है। इस विधि के संपन्न होते ही दिवंगत आत्मा प्रेत-योनि से मुक्त होकर अपने पूर्वजों के पावन पितृलोक में आनंदपूर्वक स्थान प्राप्त करती है।

19 – श्राद्ध के नियम, निषेध तथा पितृ-गाथा

श्राद्ध कर्म के दौरान पालन किए जाने वाले कठोर नियमों और वर्जित वस्तुओं का विवरण दिया गया है। श्राद्ध में क्रोध, शीघ्रता, असत्य, तथा अपवित्रता पूर्णतः त्याज्य हैं। चना, मसूर, कोदों, बासी भोजन तथा अशुद्ध जल का प्रयोग वर्जित है। इसी अध्याय में पितरों द्वारा गाई गई वह प्रसिद्ध पावन गाथा उद्धृत है, जिसमें पितर अभिलाषा करते हैं कि उनके कुल में कोई ऐसा सुपुत्र जन्म ले जो गया-तीर्थ जाकर तिल और जल से उनका पिण्डदान करे और उन्हें दुर्गति से उबारे।

20 – कौशिक के सात पुत्रों तथा पिप्पली-कीट का आख्यान

महर्षि कौशिक के सात पुत्रों की परम प्रेरक कथा वर्णित है। पूर्व जन्म में जब भीषण अकाल पड़ा था, तब इन सात भाइयों ने अपने गुरु गर्ग मुनि की कपिला गाय की रक्षा करते हुए उसे मारा नहीं, अपितु संकटकाल में भी धर्म का त्याग नहीं किया और पितरों का ध्यान कर पिण्डदान किया। इस पुण्य फल के कारण वे निरंतर जन्मांतरों में पक्षी, मृग तथा अंततः कांपिल्य नगर में ज्ञानी व धर्मनिष्ठ राजा ब्रह्मदत्त तथा उनके मंत्रियों के रूप में उत्पन्न हुए।

21 – राजा ब्रह्मदत्त की कथा तथा योग-सिद्धि

कांपिल्य नगर के राजा ब्रह्मदत्त अपने पूर्व जन्मों के तपोबल से समस्त पशु-पक्षियों की भाषा समझने में समर्थ थे। एक बार उन्होंने चींटी और चींटी के मध्य हुए सूक्ष्म संवाद को सुनकर मुस्करा दिया, जिससे उनकी रानी को संदेह हुआ। राजा ने अपने पूर्वजन्म के सखाओं को पहचाना और उन सभी ने मिलकर संसार की असारता को समझते हुए राज्य का त्याग कर दिया। ब्रह्मदत्त ने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर योगमार्ग का आश्रय लिया और ध्यान-साधना द्वारा परम मोक्ष पद प्राप्त किया।

22 – श्राद्ध हेतु पवित्र तीर्थों का विस्तृत वर्णन

श्राद्ध कर्म और तर्पण हेतु संपूर्ण भारतवर्ष के परम पावन तीर्थों का सविस्तार वर्णन प्रस्तुत किया गया है। प्रयागराज (त्रिवेणी संगम), गयाजी, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, वाराणसी, गंगाद्वार (हरिद्वार), अमरकंटक, गोदावरी तट, प्रभास क्षेत्र, तथा बदरिकाश्रम जैसे दिव्य स्थलों पर किया गया पिण्डदान अक्षय फल प्रदान करता है। इन तीर्थों में पितरों के नाम से जल अर्पण करने मात्र से सहस्रों वर्षों की तृप्ति प्राप्त होती है और पितृगण प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।

23 – सोम (चन्द्रमा) की उत्पत्ति तथा तारा-सोम संग्राम

अत्रि मुनि के नेत्रों से निकले दिव्य तेज से चन्द्रमा (सोम) का प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्मा जी ने उन्हें औषधियों, नक्षत्रों तथा द्विजों का स्वामी नियुक्त किया। चन्द्रमा ने अद्भुत राजसूय यज्ञ करके तीनों लोकों में अतुलनीय यश प्राप्त किया, किंतु अहंकारवश उन्होंने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया। इसके कारण देवताओं और दैत्यों के मध्य भयंकर देवासुर संग्राम हुआ, जिसे तारा-सोम संग्राम कहा जाता है। अंततः ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से तारा को बृहस्पति को सौंपा गया, और तारा के गर्भ से अत्यंत बुद्धिमान पुत्र बुद्ध का जन्म हुआ।

24 – चन्द्रवंश की उत्पत्ति तथा राजा पुरूरवा-उर्वशी आख्यान

बुद्ध और इला के समागम से चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा का जन्म हुआ, जिनसे चन्द्रवंश का महाप्रादुर्भाव हुआ। पुरूरवा के अनुपम सौंदर्य, वीरता तथा धर्मनिष्ठा पर मुग्ध होकर स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी भूलोक पर आई और उनके साथ रहने लगी। उर्वशी और पुरूरवा का कई वर्षों तक पावन स्नेह-संबंध रहा। जब गंधर्वों के विधान से उर्वशी पुनः स्वर्ग लौटी, तो पुरूरवा अत्यंत विरक्त हुए। अंततः गंधर्वों की कृपा से पुरूरवा ने अरणि-काष्ठ के मंथन से तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) को प्रकट किया और वैदिक यज्ञ विधि की स्थापना की।

25 – राजा ययाति, शुक्राचार्य तथा कच-देवयानी प्रसंग

चन्द्रवंश में राजा नहुष के पुत्र महाप्रतापी ययाति हुए। इसी काल में दैत्यराज वृषपर्वा के कुलगुरु महर्षि शुक्राचार्य थे, जिनके पास मृत संजीवनी विद्या थी। देवताओं ने संजीवनी विद्या प्राप्त करने हेतु देवगुरु बृहस्पति के सुपुत्र कच को शुक्राचार्य के पास शिष्य रूप में भेजा। कच ने एक सहस्र वर्ष तक महर्षि शुक्राचार्य की निष्ठापूर्वक सेवा की और उनकी पुत्री देवयानी का भी स्नेह प्राप्त किया, जिससे असुर कच से ईर्ष्या करने लगे।

26 – कच और देवयानी का परस्पर शाप प्रसंग

असुरों ने कच का कई बार वध किया, किंतु देवयानी के अनुरोध पर शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से कच को पुनः जीवित कर दिया। अंत में असुरों ने कच को मारकर भस्म बनाया और मदिरा में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। शुक्राचार्य ने अपने पेट के भीतर कच को संजीवनी विद्या सिखाई और स्वयं का पेट फाड़कर कच को बाहर निकाला, फिर कच ने संजीवनी से शुक्राचार्य को जीवित किया। विद्या पूर्ण होने पर जब कच लौटने लगे, तो देवयानी ने परिणय का प्रस्ताव रखा। कच ने गुरुपुत्री होने के नाते इसे अस्वीकार कर दिया, जिससे क्रुद्ध होकर दोनों ने एक-दूसरे को शाप दिया।

27 – देवयानी और शर्मिष्ठा का विवाद

दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी अपनी सखियों के साथ वन में सरोवर पर स्नान करने गईं। स्नान के उपरांत दैवयोग से शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लिए। इस बात पर दोनों में उग्र विवाद हो गया। शर्मिष्ठा ने अहंकार में आकर देवयानी को डाँटा और उसे धकेलकर एक अंधे कूप (कुएँ) में गिरा दिया। शर्मिष्ठा देवयानी को मृत मानकर अपने राजप्रासाद लौट गई, जबकि देवयानी कूप के भीतर ही प्रभु का स्मरण करती रही।

28 – देवयानी का कूप से उद्धार तथा शर्मिष्ठा की दासी-वृत्ति

राजा ययाति शिकार खेलते हुए उसी वन में पहुँचे और प्यास लगने पर कूप के पास गए। उन्होंने कूप में गिरी देवयानी को देखा और अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर उसे बाहर निकाला। देवयानी ने ययाति को ही अपना पति स्वीकार करने का संकल्प लिया। जब शुक्राचार्य को शर्मिष्ठा के दुर्व्यवहार का पता चला, तो वे क्रोधित होकर दैत्यराज का राज्य छोड़कर जाने लगे। दैत्यराज वृषपर्वा ने शुक्राचार्य को शांत करने के लिए उनकी शर्त मानी और अपनी पुत्री शर्मिष्ठा को सहस्रों सखियों सहित देवयानी की दासी बनाकर समर्पित कर दिया।

29 – ययाति और देवयानी का विवाह प्रस्ताव

महर्षि शुक्राचार्य अपनी पुत्री देवयानी को लेकर राजा ययाति के पास आए और देवयानी का परिणय ययाति के साथ निश्चित किया। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को सचेत किया कि देवयानी के साथ दासी रूप में जा रही शर्मिष्ठा को कभी अपने एकांत भवन में न बुलाएँ और न ही उसके साथ सहवास करें। राजा ययाति ने महर्षि की इस आज्ञा का पालन करने की प्रतिज्ञा की और देवयानी को अपनी महारानी बनाकर अपने राज्य में ले आए।

30 – ययाति और देवयानी का विवाह एवं शर्मिष्ठा का गुप्त निवास

राजा ययाति और देवयानी का धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ। शर्मिष्ठा भी दासी के रूप में देवयानी की सेवा में प्रासाद के एक उपवन (अशोकवाटिका) में रहने लगी। समय बीतने पर देवयानी के गर्भ से दो तेजस्वी पुत्रों—यदु और तुर्वसु—का जन्म हुआ। शर्मिष्ठा ने अशोकवाटिका में एकांत जीवन व्यतीत करते हुए संतान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा की और राजा ययाति से धर्मानुकूल प्रार्थना करने का विचार किया।

31 – ययाति और शर्मिष्ठा का गुप्त समागम तथा संतानोत्पत्ति

शर्मिष्ठा ने राजा ययाति से एकांत में भेट करके तर्क दिया कि सखी का पति उसकी सखी का भी रक्षक होता है, अतः उसे संतान प्रदान करना राजा का धर्म है। धर्मसंकट में पड़े राजा ययाति ने शर्मिष्ठा की याचना स्वीकार की और उसके साथ गुप्त परिणय किया। शर्मिष्ठा के गर्भ से तीन अति पराक्रमी पुत्रों—द्रुह्यु, अनु तथा पुरु—का जन्म हुआ। देवयानी को जब शर्मिष्ठा के पुत्रों का पता चला, तो उसने बालकों से उनके पिता का नाम पूछा, जिस पर बालकों ने ययाति की ओर संकेत कर दिया।

32 – देवयानी द्वारा रहस्योद्घाटन तथा शुक्राचार्य का शाप

ययाति और शर्मिष्ठा के गुप्त संबंध का रहस्य उद्घाटित होते ही देवयानी अत्यंत क्रुद्ध हुई और रोती हुई अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई। शुक्राचार्य ने ययाति द्वारा अपनी आज्ञा का उल्लंघन और देवयानी के साथ अन्याय देखकर तीव्र क्रोध में ययाति को शाप दे दिया कि वे इसी क्षण कांतिहीन वृद्ध और जराग्रस्त हो जाएँ। राजा ययाति तत्काल दंतहीन, श्वेतकेश और शिथिल शरीर वाले वृद्ध बन गए। ययाति के क्षमा माँगने पर शुक्राचार्य ने कहा कि यदि उनका कोई पुत्र अपनी तरुणाई उन्हें दे दे, तो वे पुनः युवा हो सकते हैं।

33 – ययाति का यौवन परिवर्तन हेतु पुत्रों से अनुनय

असामयिक वृद्धावस्था से व्यथित राजा ययाति ने अपने बड़े पुत्रों को बुलाया। उन्होंने देवयानी के पुत्र यदु से कहा कि वे उनका वार्धक्य ले लें और अपना ओजस्वी यौवन पिता को सौंप दें। किंतु यदु ने वृद्धावस्था के कष्टों का तर्क देकर पिता की बात मानने से इनकार कर दिया। इसके उपरांत ययाति ने अपने अन्य पुत्रों तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनु से भी यही अनुनय किया, किंतु उन तीनों ने भी शरीर की शिथिलता और सुख-भोग में बाधा का कारण बताकर पिता का वार्धक्य लेने से मना कर दिया।

34 – पुरु द्वारा वार्धक्य-स्वीकार तथा पुरु का राज्याभिषेक

ययाति के सबसे छोटे पुत्र पुरु (शर्मिष्ठा के पुत्र) ने जब पिता की व्यथा देखी, तो उन्होंने तत्काल आगे बढ़कर भक्तिपूर्वक पिता का वार्धक्य स्वयं स्वीकार कर लिया और अपना नवयौवन पिता को समर्पित कर दिया। ययाति पुनः परम कांतिमान युवा बन गए और पुरु वृद्ध रूप धारण कर तपस्वी की भांति रहने लगे। सहस्रों वर्षों तक विषयों का उपभोग करने के उपरांत भी ययाति को तृप्ति नहीं हुई। अंततः विरक्त होकर ययाति ने पुरु को अपना यौवन लौटाया और उनकी पितृभक्ति से प्रसन्न होकर पुरु को ही अपने संपूर्ण साम्राज्य का चक्रवर्ती सम्राट घोषित कर उनका राज्याभिषेक किया।

35 – ययाति का वानप्रस्थ आश्रम एवं वन-गमन

राजा ययाति ने अपने अन्य अनाज्ञाकारी पुत्रों यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनु को राज्य के सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों का शासक बनाया और पुरु को मध्य देश का मुख्य सिंहासन सौंपा। तत्पश्चात् ययाति अपनी पत्नियों के साथ वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार कर वन चले गए। वन में जाकर उन्होंने कठोर तपस्या, कंद-मूल का आहार, तथा निरंतर ध्यान-साधना करते हुए अपने चित्त को संपूर्ण विषयों से विरक्त कर लिया और परम ज्ञान की साधना में लीन हो गए।

36 – ययाति द्वारा पुरु को अंतिम धर्मोपदेश

वन जाने से पूर्व राजा ययाति ने चक्रवर्ती सम्राट पुरु को राज्य-संचालन हेतु अति गूढ़ सनातन उपदेश दिया। ययाति ने कहा कि राजा को सदैव क्षमाशील, सत्यवादी, जितेंद्रिय तथा प्रजापालक होना चाहिए। जो मनुष्य दूसरों के कड़वे वचनों को सहकर क्षमा धारण करता है, वही सर्वश्रेष्ठ धर्म का पालन करता है। क्रोध को अक्रोध से, बुराई को भलाई से तथा लोभ को सन्तोष से जीतना चाहिए। यही सनातन नीति राजा और प्रजा दोनों का परम कल्याण करने वाली है।

37 – ययाति का स्वर्गारोहण तथा अहंकार से पतन

कठोर तपस्या के प्रभाव से राजा ययाति का शरीर दिव्य हो गया और वे दिव्य विमान में बैठकर स्वर्गलोक पहुँचे। स्वर्ग में उन्होंने सहस्रों वर्षों तक देवताओं के साथ सुख भोगा। एक बार देवराज इंद्र ने ययाति से उनकी तपस्या के विषय में पूछा। ययाति ने अहंकारवश उत्तर दिया कि संपूर्ण भूलोक, देवलोक तथा महर्षियों में उनके समान कोई तपस्वी नहीं है। इस आत्म-श्लाघा और अहंकार के कारण ययाति का पुण्य-क्षय हो गया और इंद्र ने उन्हें स्वर्ग से भूलोक की ओर नीचे गिरा दिया।

38 – ययाति का अष्टक आदि राजर्षियों के यज्ञ में पतन

अन्तरिक्ष से तीव्र वेग से नीचे गिरते हुए ययाति ने प्रार्थना की कि उनका पतन किसी श्रेष्ठ और सत्पुरुषों के मध्य ही हो। दैवयोग से ययाति का पतन उनके अपने ही दोहित्रों (पुत्री माधवी के पुत्रों)—अष्टक, प्रतर्दन, वसुमना तथा शिवि—के यज्ञमण्डप में हुआ। ये चारों राजर्षि अति महान, दानी और धर्मनिष्ठ थे। आकाश से गिरते हुए तेजस्वी पुरुष को देखकर चारों भाइयों ने अत्यंत आदरपूर्वक ययाति का स्वागत किया और उनसे उनका परिचय तथा इस अवस्था का कारण पूछा।

39 – ययाति और अष्टक का धर्म एवं कर्म विषयक संवाद

यज्ञमण्डप में राजर्षि अष्टक ने ययाति से जीवन, मृत्यु, स्वर्ग, नरक, कर्म-विपाक तथा पुनर्जन्म के विषय में गहन प्रश्न पूछे। ययाति ने ज्ञानपूर्वक उत्तर देते हुए बताया कि मनुष्य अपने ही शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप स्वर्ग या नरक भोगता है। अहंकार समस्त पुण्यों का विनाश कर देता है। जब तक जीव में कर्तापन का अभिमान रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है। नम्रता, सत्य तथा निष्काम भक्ति ही जीव को परम पद तक पहुँचाती है।

40 – चतुर्वर्ण तथा चतुराश्रम व्यवस्था वर्णन

संवाद के क्रम में राजा ययाति ने मानव समाज के सुचारु संचालन हेतु स्थापित सनातन वर्ण-व्यवस्था तथा आश्रम-व्यवस्था का निरूपण किया। ब्राह्मण का धर्म अध्ययन, अध्यापन व यज्ञ; क्षत्रिय का धर्म प्रजा-रक्षा व न्याय; वैश्य का धर्म कृषि, गोपालन व व्यापार; तथा शूद्र का धर्म सेवा और शिल्प है। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास इन चारों आश्रमों के कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने से ही समाज में शांति, संतुलन और मोक्ष की प्राप्ति संभव होती है।

41 – दोहित्रों द्वारा पुण्य दान तथा ययाति का पुनरुत्थान

ययाति का ज्ञानवर्धक उपदेश सुनकर चारों दोहित्रों—अष्टक, प्रतर्दन, वसुमना तथा शिवि—ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने-अपने जीवन भर के अर्जित पुण्यों को ययाति को समर्पित करने का संकल्प लिया। किंतु स्वाभिमानी ययाति ने दूसरों का पुण्य बिना कर्म किए लेने से इनकार कर दिया। तब उन पाँचों सत्पुरुषों के निष्काम धर्म, सत्य तथा त्याग के सम्मिलित प्रभाव से आकाश से पुनः दिव्य स्वर्ण-विमान प्रकट हुआ और ययाति अपने चारों धर्मनिष्ठ दोहित्रों के साथ पुनः परमधाम की ओर प्रस्थान कर गए।

42 – ययाति-चरित्र का उपसंहार तथा फलश्रुति

राजा ययाति के इस महान पावन आख्यान की समाप्ति पर इसकी फलश्रुति वर्णित है। यह कथा सनातन सत्य को उजागर करती है कि संसार का कोई भी भोग, विषय या वासना हविष्य डालने से प्रज्वलित होने वाली अग्नि की भांति कभी शांत नहीं होती, अपितु केवल वैराग्य से ही परम शांति मिलती है। जो मनुष्य ययाति के इस आख्यान का नित्य पाठ या श्रवण करता है, वह पुत्र-पौत्र, आरोग्य, धन-धान्य तथा अंत में विष्णुलोक प्राप्त करता है।

43 – यदुवंश वर्णन तथा कार्तवीर्य अर्जुन का आख्यान

ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु के पावन वंश का क्रमबद्ध वर्णन आरंभ होता है। यदु के वंश में हैहय शाखा का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें महाप्रतापी सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हुए। कार्तवीर्य अर्जुन ने महर्षि दत्तात्रेय (भगवान विष्णु के अवतार) की कठोर आराधना करके सहस्र भुजाएँ, धर्मिष्ठता तथा चक्रवर्ती साम्राज्य का वरदान प्राप्त किया था। कार्तवीर्य अर्जुन ने समूची पृथ्वी पर न्यायपूर्वक शासन किया और उनके राज्य में कभी चोरी, अकाल या असत्य का प्रवेश नहीं होता था।

44 – यदुवंश का विस्तृत निरूपण तथा क्रोष्टु-वंश

यदु के दूसरे पुत्र क्रोष्टु के वंश का विस्तार वर्णित है। इस वंश में अनेक परम वीर, दानवीर तथा धर्मनिष्ठ राजा हुए, जिनमें ज्यामघ का नाम प्रमुख है। ज्यामघ अपनी पत्नी शैब्या के प्रति अत्यंत समर्पित थे और उनकी कोई संतान नहीं थी, किंतु बाद में ऋषियों के आशीर्वाद से उन्हें विदर्भ नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। क्रोष्टु के इस महान वंश में आगे चलकर वृष्णि, अंधक तथा कुकुरादि महान राजवंशों की शाखाएँ प्रस्फुटित हुईं, जिन्होंने भारतवर्ष के इतिहास को सुशोभित किया।

45 – वृष्णि-वंश तथा स्यमंतक मणि की पावन कथा

वृष्णि-वंश का विस्तृत आख्यान करते हुए परम पावन स्यमंतक मणि का इतिहास वर्णित किया गया है। सत्राजित को सूर्यदेव की कृपा से स्यमंतक मणि प्राप्त हुई थी, जो नित्य आठ भार स्वर्ण प्रदान करती थी और जहाँ रहती थी वहाँ अकाल या महामारी नहीं होती थी। इस मणि को लेकर सत्राजित, उनके भ्राता प्रसेन, तथा सिंह व जाम्बवान से जुड़ी सत्य घटनाएँ घटीं। अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने निरपराध होते हुए भी स्यमंतक मणि की खोज कर अपना निष्कलंक चरित्र संसार के समक्ष प्रकट किया।

46 – वृष्णि और अंधक वंश के वीरों का विवरण

वृष्णि तथा अंधक कुल में प्रादुर्भूत महान योद्धाओं का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया गया है। अक्रूर, उग्रसेन, कंस, देवक, तथा वसुदेव जी का जन्म इसी वंश में हुआ। वसुदेव जी का विवाह देवक की पुत्री देवकी के साथ हुआ। वसुदेव जी के जन्म के समय देवताओं के आनन्द-दुन्दुभि बजाने के कारण उन्हें आनन्ददुन्दुभि भी कहा जाता है। इसी पावन कुल में द्वापर युग के अंत में साक्षात परम पुरुष भगवान श्रीकृष्ण और श्रीबलराम जी के अवतरण की पृष्ठभूमि तैयार हुई।

47 – भगवान श्रीकृष्ण का अवतार, देवासुर संग्राम तथा अवतार-लीला

द्वापर युग में पृथ्वी के भार का हरण करने तथा धर्म की पुनः स्थापना हेतु सर्वेश्वर भगवान श्रीविष्णु ने देवकी और वसुदेव जी के पुत्र रूप में श्रीकृष्ण का पूर्ण अवतार लिया। इसी अध्याय में विभिन्न युगों में हुए बारह देवासुर संग्रामों का इतिहास, हिरण्याक्ष-वध, वामन अवतार, तथा परशुराम अवतार का वर्णन है। महर्षि शुक्राचार्य द्वारा भगवान शिव से मृत संजीवनी विद्या प्राप्त करने का तप और असुरों को परास्त कर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोकुल, मथुरा व द्वारका में की गई पावन लीलाओं का विस्तृत भक्तिपूर्ण गान किया गया है।

48 – तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु तथा अंग-बंग-कलिंग वंश वर्णन

ययाति के अन्य पुत्रों—तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनु—के वंशज राजाओं का इतिहास निरूपित है। अनु के वंश में राजा उशीनर और तितिक्षु हुए। राजा बलि के तप से प्रसन्न होकर महर्षि दीर्घतमा के आशीर्वाद से राजा बलि की महारानी सुदेष्णा से पाँच परम पराक्रमी पुत्रों—अंग, बंग, कलिंग, सुह्म तथा पुंड्र—का जन्म हुआ। इन पाँचों राजकुमारों के नाम पर ही भारतवर्ष के पूर्वोत्तर क्षेत्रों में अंग प्रदेश, बंग प्रदेश, कलिंग प्रदेश, सुह्म तथा पुंड्र देश नामक समृद्ध राज्यों की स्थापना हुई।

49 – पौरव वंश (पुरु-वंश) का विस्तृत आख्यान

ययाति के सबसे छोटे और धर्मनिष्ठ पुत्र पुरु के ‘पौरव वंश’ (कुरुवंश) का विस्तृत और पावन इतिहास वर्णित है। पुरु के वंश में दुष्यंत हुए, जिनका विवाह महर्षि कण्व के आश्रम में शकुंतला के साथ हुआ। शकुंतला के गर्भ से महाप्रतापी चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म हुआ, जिनके नाम पर इस संपूर्ण पावन भूमि को ‘भारतवर्ष’ कहा गया। भरत के वंश में हस्ती (जिन्होंने हस्तिनापुर नगर बसाया), अजमीढ़, तथा कुरु हुए, जिनके नाम से कुरुवंश और कुरुक्षेत्र का नाम प्रसिद्ध हुआ।

50 – कुरुवंश का विस्तार तथा भावी कलियुग के राजाओं का वर्णन

कुरुवंश में राजा शांतनु, भीष्म पितामह, धृतराष्ट्र, पाण्डु, तथा पञ्च पाण्डवों एवं कौरवों की ऐतिहासिक वंशावली का पूर्ण निरूपण है। पाण्डुपुत्र अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित तथा उनके पुत्र जनमेजय के वंशक्रम का वर्णन किया गया है। इसके पश्चात् भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को कलियुग में होने वाले भावी राजवंशों जैसे नन्द वंश, मौर्य वंश, शुंग वंश, गुप्त वंश तथा आन्ध्र राजवंशों के भावी राजाओं का प्रामाणिक ऐतिहासिक काल-चक्र सुनाकर इस पचास अध्यायों की पावन श्रृंखला को पूर्णता प्रदान की।

51 – अग्नि-वंश निरूपण तथा पावक-पवमान-शुचि का प्रादुर्भाव

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को अग्निदेव के पवित्र वंश का इतिहास सुनाया। स्वायम्भुव मन्वन्तर में उत्पन्न प्रथम अग्नि पावक, पवमान तथा शुचि नामक तीन बेटों के रूप में प्रकट हुए। इन तीनों देव-अग्नियों से अड़तालीस अन्य अग्नियों की उत्पत्ति हुई, जिन्हें मिलाकर कुल चौंतालीस तथा पाँच लौकिक व दिव्य अग्नियों का छियालीस अग्नि-कुल स्थापित हुआ। यज्ञाग्नि, गार्हपत्य, आहवनीय, तथा क्रव्याद अग्नियों का शास्त्रीय विभाजन और उनके द्वारा देवों व पितरों की तृप्ति का विधान इस प्रसंग में स्पष्ट होता है।

52 – पितृ-कल्प तथा अग्नि-वंश का उत्तरार्द्ध

अग्नि-वंश के विस्तार के साथ-साथ पितृगणों के साथ अग्नियों के दिव्य संबंध का निरूपण किया गया है। स्वाहा और स्वधा के माध्यम से देवगणों तथा पितृगणों को आहुतियाँ प्राप्त होती हैं। सोमपा, अग्निष्वात्त, तथा बर्हिषद नामक पितृगणों की तृप्ति हेतु अग्नि में दी जाने वाली आहुतियों की महिमा बताई गई है। यह अध्याय प्रकट करता है कि किस प्रकार अग्नि के माध्यम से किया गया हविष्य-दान सीधे पितृलोक और देवलोक पहुँचकर कुल में कल्याण, दीर्घायु तथा संतति-समृद्धि प्रदान करता है।

53 – पुराण-लक्षण, पुराण-परिमाण तथा दान-माहात्म्य

महर्षि वेदव्यास रचित अष्टादश महापुराणों के लक्षण, उनके नाम तथा श्लोक संख्या का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित इन पाँच लक्षणों से युक्त पुराणों में ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ तथा ब्रह्माण्ड पुराण सम्मिलित हैं। मत्स्य पुराण में चौदह सहस्र श्लोक हैं। जो श्रद्धालु इस पावन ग्रन्थ को स्वर्ण-मत्स्य के साथ ब्राह्मण को दान करता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है।

54 – अक्षय्य-तृतीया व्रत विधान

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले परम पवित्र अक्षय्य-तृतीया व्रत की शास्त्रीय विधि का वर्णन है। इस दिन भगवान वासुदेव तथा भगवती लक्ष्मी का गंध, अक्षत, पुष्प व जलपूर्ण कलश से पूजन किया जाता है। इस तिथि को किया गया दान, जप, तप तथा स्नान अक्षय फल प्रदान करता है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के दरिद्र तथा पाप समाप्त हो जाते हैं और उसे अक्षय सुख व समृद्धि की प्राप्ति होती है।

55 – अनन्त-तृतीया व्रत विधान तथा माहात्म्य

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि से आरंभ होने वाले अनन्त-तृतीया व्रत की अलौकिक महिमा वर्णित है। इस व्रत में भगवान नारायण तथा भगवती भवानी का ध्यान करते हुए नित्य उपवास तथा एकभुक्त भोजन का नियम लिया जाता है। लवण, घी, तथा अन्न का दान करने से साधक को अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत अक्षय सौभाग्य, आरोग्य तथा अंत में परम पद प्रदान करने वाला महाव्रत माना गया है।

56 – रसकल्याणिनी-तृतीया व्रत विधान

स्त्री और पुरुष दोनों के सर्व-सौभाग्य की सिद्धि हेतु रसकल्याणिनी-तृतीया व्रत का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। इस व्रत में प्रत्येक मास की तृतीया को रसयुक्त पदार्थों जैसे गुड़, दूध, घी तथा शर्करा का त्याग कर भगवती गौरी और भगवान शिव का पूजन किया जाता है। वर्ष के अंत में ब्राह्मणों को रसमयी सामग्री तथा वस्त्र दान करने से साधक के घर में अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती और दम्पति अखंड सौभाग्य भोगते हैं।

57 – आर्द्रानन्दन-तृतीया व्रत विधान

आषाढ़ मास के आर्द्रानक्षत्र से युक्त तृतीया तिथि को किए जाने वाले आर्द्रानन्दन व्रत की विधि बताई गई है। इस दिन भगवान रुद्र तथा भगवती उमा का जलाभिषेक कर गंध-पुष्प से अर्चन किया जाता है। जलपूर्ण कुंभ तथा फल-फूल का दान करने से साधक के जीवन के समस्त ताप और संताप दूर होते हैं। यह व्रत संतति-सुख प्रदान करता है और गृहस्थ जीवन में शीतलता तथा शांति का संचार करता है।

58 – वापी-कूप-तड़ाग प्रतिष्ठा तथा वृक्षारोपण विधान

जनहित हेतु वापी (बावड़ी), कूप (कुएँ), तड़ाग (तालाब) के निर्माण तथा उनकी वैदिक विधि से प्रतिष्ठा का इतिहास वर्णित है। इसके साथ ही छायादार एवं फलदार वृक्षों को लगाने की शास्त्रीय महिमा बताई गई है। एक जलाशय का निर्माण सहस्रों यज्ञों के समान पुण्य देता है और एक वृक्ष दस पुत्रों के समान फल प्रदान करता है। जल स्रोतों की प्रतिष्ठा के अवसर पर वरुणदेव का पूजन तथा उत्सव रचाया जाता है, जिससे समस्त चराचर जीवों का कल्याण होता है।

59 – सौभाग्य-शयन व्रत विधान

दाम्पत्य जीवन में सुख, प्रेम तथा अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए सौभाग्य-शयन व्रत का विस्तृत विधान दिया गया है। भाद्रपद मास की तृतीया को भगवती गौरी और भगवान शिव के दिव्य विग्रह की स्थापना कर शय्या-दान, वस्त्र-दान तथा अलंकृत आभूषण अर्पित किए जाते हैं। जो नारियाँ भक्तिपूर्वक इस व्रत का आचरण करती हैं, वे पतिव्रता धर्म को सिद्ध करते हुए सदा सुहागिन रहती हैं और उनका गृहस्थ जीवन समस्त सुखों से परिपूर्ण होता है।

60 – अविपत्ति-तृतीया (सौभाग्य) व्रत विधान

जीवन में आने वाली समस्त विपत्तियों, रोगों तथा दुखों के विनाश हेतु अविपत्ति-तृतीया व्रत का प्रतिपादन किया गया है। इस व्रत में भगवती जगदम्बा के उमा स्वरूप की पूजा की जाती है और बिना नमक का भोजन ग्रहण किया जाता है। वर्षभर इस व्रत को करने से मनुष्य संकटों से मुक्त होकर अभय पद प्राप्त करता है। यह व्रत शत्रुओं का शमन करता है और साधक को जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय प्रदान करता है।

61 – अगस्त्य-अर्घ्यदान विधान तथा तृतीया व्रत उपसंहार

भाद्रपद मास में सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश करने पर महर्षि अगस्त्य के प्राकट्य के समय अर्घ्य देने की पावन विधि वर्णित है। महर्षि अगस्त्य ने समुद्र-पान कर देवताओं की रक्षा की थी। जल, फल, पुष्प, तथा गंध से युक्त तांबे के पात्र में अर्घ्य समर्पित करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। इसके साथ ही समस्त तृतीया व्रतों की समाप्ति और उद्यापन विधि का निरूपण कर श्रद्धालुओं के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया गया है।

62 – संक्रान्ति-व्रत विधान तथा माहात्म्य

सूर्यदेव के एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण (संक्रान्ति) के समय किए जाने वाले पावन व्रत और दान का विवरण दिया गया है। विशेषकर उत्तरायण (मकर संक्रान्ति) तथा दक्षिणायन संक्रान्ति के अवसर पर तिल, वस्त्र, गो, तथा अन्न दान का अलौकिक महत्व बताया गया है। संक्रान्ति काल में किया गया स्नान तथा तर्पण प्राणी को समस्त पापों से मुक्त कर आरोग्य, तेज तथा अक्षय पुण्य की प्राप्ति कराता है।

63 – विशोक-सप्तमी व्रत विधान

मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाए जाने वाले विशोक-सप्तमी व्रत की कथा और विधि प्रस्तुत की गई है। इस दिन भगवान भास्कर (सूर्यदेव) का ध्यान करते हुए पद्म-पुष्प तथा लाल चन्दन से पूजन किया जाता है। भोजन में तैल व लवण का त्याग किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से साधक का मन शोक, मोह तथा मानसिक संतापों से पूर्णतः मुक्त हो जाता है और जीवन में आनंद का प्रादुर्भाव होता है।

64 – फल-सप्तमी व्रत विधान

विभिन्न ऋतुओं के फलों को भगवान सूर्य को अर्पित कर किए जाने वाले फल-सप्तमी व्रत का निरूपण है। कार्तिक मास से प्रारंभ होकर वर्षभर चलने वाले इस व्रत में साधक स्वयं फल का त्याग कर सूर्यदेव को ऋतुफल अर्पित करता है और अंत में ब्राह्मणों को फल से भरे पात्र दान करता है। इस व्रत को करने से उत्तम संतति, आरोग्य, तथा जीवन में कर्मों के मधुर फलों की प्राप्ति होती है।

65 – शर्करा-सप्तमी व्रत विधान

सूर्यदेव की प्रसन्नता हेतु शर्करा (गुड़ व चीनी) से निर्मित पदार्थों का दान करने वाले शर्करा-सप्तमी व्रत की शास्त्रीय विधि वर्णित है। वैशाख मास की सप्तमी को सूर्यदेव के मार्तण्ड स्वरूप का पूजन किया जाता है। साधक मीठे पदार्थों का दान देकर स्वयं एकभुक्त रहता है। इस व्रत के पुण्य से मनुष्य का वाणी-दोष दूर होता है, मधुर वाणी की प्राप्ति होती है और कांति तथा यश में निरंतर वृद्धि होती है।

66 – कमल-सप्तमी व्रत विधान

सूर्यदेव के पद्मासन स्वरूप की आराधना हेतु कमल-सप्तमी व्रत का विधान दिया गया है। इस व्रत में स्वर्ण या ताम्र पत्र पर कमल का चित्र बनाकर मध्य में सूर्यदेव की स्थापना की जाती है और कमलपुष्पों से अर्चन किया जाता है। यह व्रत साधक के जीवन में भगवती लक्ष्मी का स्थायी निवास स्थापित करता है और उसे दरिद्रता व अज्ञान से मुक्त कर अलौकिक ज्ञान प्रदान करता है।

67 – मन्दार-सप्तमी व्रत विधान

माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को किए जाने वाले मन्दार-सप्तमी व्रत की पावन विधि बताई गई है। इस दिन मन्दार (आक) के पत्तों और पुष्पों से सूर्यदेव का पूजन किया जाता है। प्रातःकाल सूर्य को अर्घ्य देकर उपवास रखने से शरीर के समस्त असाध्य रोग, विशेषकर त्वचा सम्बंधी विकार नष्ट हो जाते हैं और साधक को आरोग्य रूपी अमूल्य धन प्राप्त होता है।

68 – शुभ-सप्तमी व्रत विधान तथा सूर्य-माहात्म्य

समस्त अशुभ फलों के विनाश और मंगल की प्राप्ति हेतु शुभ-सप्तमी व्रत का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें सूर्यदेव के बारह आदित्यों का ध्यान करते हुए श्वेत वस्त्र, चन्दन तथा नैवेद्य अर्पित किया जाता है। यह व्रत साधक को सर्वत्र विजय, उच्च पद तथा समाज में प्रतिष्ठा प्रदान करता है और उसके कुल में कभी अकाल मृत्यु नहीं होती।

69 – सम्प्राप्ति-सप्तमी व्रत विधान

खोए हुए साम्राज्य, धन या आरोग्य की पुन: प्राप्ति हेतु सम्प्राप्ति-सप्तमी व्रत की विधि वर्णित है। पौष मास की सप्तमी से आरंभ होकर इस व्रत में सूर्यदेव की मरीचिमाला की उपासना की जाती है। जो साधक निष्ठापूर्वक इस व्रत को धारण करते हैं, उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वे मनोवांछित फल प्राप्त कर अंत में सूर्यलोक गमन करते हैं।

70 – विशोक-द्वादशी तथा नन्द-व्रत विधान

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को किए जाने वाले विशोक-द्वादशी व्रत तथा नन्द-व्रत की शास्त्रीय विधि प्रस्तुत की गई है। इस दिन भगवान केशवनारायण का पूजन कर उपवास रखा जाता है और रात्रि में जागरण किया जाता है। यह व्रत मनुष्य के हृदय के समस्त दुखों को हरकर उसमें भक्ति और शांति का संचार करता है।

71 – अनंग-दान (अनंग-व्रत) विधान

मार्गशीर्ष मास में भगवान कामदेव तथा भगवती रति के स्वरूप की आराधना करते हुए किए जाने वाले अनंग-दान व्रत का विवरण दिया गया है। इस व्रत में सुंदर वस्त्र, आभूषण, शय्या तथा गंध का दान किया जाता है। यह व्रत साधक के व्यक्तित्व में अद्भुत आकर्षण, सुंदरता तथा सुंदर संतति प्रदान करता है और दाम्पत्य जीवन में प्रेम की वृद्धि करता है।

72 – अशून्यशयन-द्वितीया व्रत विधान

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को पति-पत्नी के विरह को दूर करने हेतु अशून्यशयन व्रत का निरूपण किया गया है। इस दिन भगवान श्रीहरि तथा भगवती लक्ष्मी का क्षीरसागर में शयन करते हुए रूप का ध्यान किया जाता है। फल, मिष्ठान्न तथा शय्या का दान करने से दम्पति का शयनगृह कभी सूना नहीं होता और जीवनभर परस्पर प्रेम बना रहता है।

73 – अंगारक-व्रत विधान तथा मंगल-माहात्म्य

मंथरा (मंगलवार) को पड़ने वाली चतुर्थी तिथि को किए जाने वाले अंगारक व्रत का पावन वर्णन है। इस व्रत में भौमदेव (मंगल ग्रह) की लाल पुष्प, रक्ताम्बर तथा ताम्रपात्र से पूजा की जाती है। यह व्रत ऋण से मुक्ति प्रदान करता है, भूमि-भवन का सुख देता है और शरीर में रक्त सम्बंधी विकारों को दूर कर साहस एवं ओज प्रदान करता है।

74 – अर्क-सप्तमी तथा सप्तमी-स्नान विधान

माघ मास के शुक्ल पक्ष की अर्क-सप्तमी (रथ-सप्तमी) के अवसर पर किए जाने वाले विशेष स्नान और सूर्य-पूजन का विधान है। इस दिन सात बदरी (बैर) और सात अर्क-पत्रों को सिर पर रखकर नदी में स्नान करने से सात जन्मों के पाप धूल जाते हैं। भगवान सूर्य के रथ की पूजा करने से साधक को उत्तम स्वास्थ्य तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है।

75 – पद्म-सप्तमी व्रत विधान

सूर्यदेव की कृपा प्राप्त करने हेतु पद्म-सप्तमी व्रत की विधि बताई गई है। इसमें कमलपत्र पर स्वर्ण-सूर्य की प्रतिमा स्थापित कर पूजन किया जाता है। यह व्रत साधक को धन-धान्य, ऐश्वर्य तथा आधि-व्याधि से मुक्ति दिलाता है और उसके गृह में मंगलमय वातावरण निर्मित करता है।

76 – विविध सप्तमी व्रत एवं सूर्यदेव की अलौकिक महिमा

विभिन्न सप्तमी व्रतों की शृंखला का समापन करते हुए भगवान सूर्य की सर्वव्यापकता और अलौकिक शक्ति का गान किया गया है। सूर्यदेव प्रत्यक्ष देवता हैं, जो जगत को प्रकाश, जल तथा जीवन प्रदान करते हैं। सूर्य-उपासना से बढ़कर कोई अन्य प्रत्यक्ष फलदायी साधना नहीं है, जो मनुष्य को तत्काल आरोग्य और तेज प्रदान करती है।

77 – भीष्म-द्वादशी व्रत विधान

माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पितामह भीष्म के तर्पण और पूजन हेतु भीष्म-द्वादशी व्रत का निरूपण है। इस दिन भगवान वासुदेव का पूजन कर जल व तिल से पितामह भीष्म को अर्घ्य दिया जाता है। यह व्रत संतति-हीन व्यक्तियों को योग्य पुत्र प्रदान करता है और साधक के समस्त पापों का शमन कर उसे मोक्ष प्रदान करता है।

78 – फल-द्वादशी व्रत विधान

मार्गशीर्ष मास की द्वादशी से प्रारंभ होने वाले फल-द्वादशी व्रत का शास्त्रीय विवरण है। इसमें वर्षभर विभिन्न उत्तम फलों का त्याग कर भगवान जनार्दन को अर्पित किया जाता है और अंत में फल से भरे स्वर्ण-पात्र का दान किया जाता है। इस व्रत से मनुष्य को अक्षय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

79 – अनन्त-द्वादशी व्रत विधान

भगवान अनन्त (श्रीहरि) की परम प्रसन्नता हेतु अनन्त-द्वादशी व्रत की विधि वर्णित है। इस व्रत में चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनन्त-डोरा धारण कर भगवान अनन्त की पूजा की जाती है। यह व्रत संकष्टों से रक्षा करता है, राज्य-पद दिलाता है और साधक को परम पद में लीन करता है।

80 – मन्वादि एवं युगादि तिथियों का माहात्म्य

विभिन्न मन्वन्तरों और युगों के आरंभ होने वाली पावन तिथियों—मन्वादि तथा युगादि तिथियों—का विस्तृत वर्णन दिया गया है। इन तिथियों में किया गया स्नान, दान, जप तथा पितृ-तर्पण अक्षय फलदायी होता है। इन तिथियों का ज्ञान रखने वाला श्रद्धालु अल्प प्रयास से भी महान पुण्य प्राप्त कर लेता है।

81 – दस महादानों का निरूपण तथा तुलापुरुष-दान विधान

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को सनातन धर्म के सर्वोच्च दस महादानों (षोडश महादानों के अंतर्गत) का रहस्य समझाया। प्रथम महादान ‘तुलापुरुष-दान’ है, जिसमें सुवर्ण अथवा बहुमूल्य धातुओं व अन्नों से दाता के भार के बराबर तौलकर ब्राह्मणों को दान दिया जाता है। यह दान महापातकों का नाश करता है और दाता को साक्षात विष्णुलोक पहुँचाता है।

82 – हिरण्यगर्भ महादान विधान

द्वितीय महादान ‘हिरण्यगर्भ-दान’ की प्रामाणिक विधि वर्णित है। इसमें स्वर्ण का एक विशाल कलश (गर्भ) बनाकर उसमें दाता प्रवेश करता है और वैदिक मन्त्रों से पुनर्जन्म की भावना के साथ बाहर आता है। तत्पश्चात् वह स्वर्ण-कलश ऋषियों व ब्राह्मणों को दान किया जाता है, जिससे दाता दिव्य देह प्राप्त कर देवलोक में पूजित होता है।

83 – तिलपर्वत महादान विधान

तृतीय महादान ‘तिलपर्वत-दान’ (धान्यपर्वत) की विधि प्रस्तुत की गई है। इसमें तिलों का विशाल पर्वत बनाकर उस पर देव-प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है और पूजा के उपरांत उसे दान किया जाता है। यह दान समस्त मानसिक व शारीरिक पापों का उच्छेद करता है और अक्षय समृद्धि देता है।

84 – सुवर्णपर्वत महादान विधान

चतुर्थ महादान ‘सुवर्णपर्वत-दान’ का अलौकिक निरूपण है। इसमें शुद्ध स्वर्ण से पर्वत का स्वरूप निर्मित कर रत्नों व वस्त्रों से अलंकृत किया जाता है। यह दान राजाओं और महान दानवीरों द्वारा किया जाता है, जो दाता को चक्रवर्ती सम्राट का पद तथा ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराता है।

85 – कामधेनु महादान विधान

पंचम महादान ‘कामधेनु-दान’ की शास्त्रीय विधि बताई गई है। इसमें स्वर्ण की गाय और बछड़े का निर्माण कर उनकी वेद मन्त्रों से प्रतिष्ठा की जाती है। यह दान दाता की समस्त मनोकामनाओं को उसी प्रकार पूर्ण करता है जैसे स्वर्ग की दिव्य कामधेनु।

86 – हिरण्याश्व महादान विधान

छठे महादान ‘हिरण्याश्व-दान’ का विवरण दिया गया है। इसमें स्वर्ण का एक परम कांतिमान अश्व बनाकर उसका पूजन किया जाता है। इस महादान से दाता के समस्त भय दूर होते हैं और उसे सूर्य के समान ओजस्वी देह तथा असीम शक्ति की प्राप्ति होती है।

87 – हिरण्याश्व-रथ महादान विधान

सातवें महादान ‘हिरण्याश्व-रथ-दान’ का वर्णन है। इसमें चार स्वर्ण-घोड़ों से युक्त विशाल स्वर्ण-रथ का निर्माण कर भगवान सूर्य या विष्णु की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस दान से दाता समस्त दिव्य लोकों की यात्रा करता है और सर्वत्र पूजनीय होता है।

88 – पंचलांगलक महादान विधान

आठवें महादान ‘पंचलांगलक-दान’ की विधि वर्णित है। इसमें हल (लांगल) तथा फलदार भूमि का दान ब्राह्मणों को किया जाता है। कृषि और अन्न उत्पादन को बढ़ावा देने वाला यह दान दाता को भूमि-पति बनाता है और उसके वंश में कभी अकाल नहीं पड़ने देता।

89 – धरा (पृथ्वी) महादान विधान

नौवें महादान ‘धरा-दान’ का विस्तृत निरूपण है। इसमें स्वर्ण की पृथ्वी का मानचित्र या प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर उसका पूजन कर दान किया जाता है। इस दान से दाता को सम्पूर्ण पृथ्वी के राज्य का पुण्य प्राप्त होता है।

90 – रत्नाचल महादान विधान

दसवें महादान ‘रत्नाचल-दान’ की विधि बताई गई है। इसमें विभिन्न प्रकार के बहुमूल्य मणियों और रत्नों का पर्वत बनाकर उसे अर्पण किया जाता है। यह दान साधक को कुबेर के समान ऐश्वर्यवान बनाता है और दरिद्रता को जड़ से समाप्त करता है।

91 – कल्पलता महादान विधान

ग्यारहवें महादान ‘कल्पलता-दान’ का शास्त्रीय वर्णन है। इसमें स्वर्ण की कल्पवृक्ष की लताएँ बनाकर उन पर विभिन्न फल व आभूषण लटकाए जाते हैं। यह दान दाता की समस्त अभिलाषाओं को तत्काल सिद्ध करता है।

92 – कल्पवृक्ष महादान विधान

बारहवें महादान ‘कल्पवृक्ष-दान’ का इतिहास वर्णित है। इसमें स्वर्ण का पूर्ण कल्पवृक्ष बनाकर देवों का पूजन किया जाता है। यह महादान परम ज्ञान, वैराग्य तथा मोक्ष प्रदान करने वाला सर्वोच्च दान माना गया है।

93 – नवग्रह-पूजन तथा शान्ति-विधान

ग्रहों की प्रतिकूलता से रक्षा हेतु नवग्रह-पूजन तथा ग्रह-शान्ति की शास्त्रीय विधि प्रस्तुत की गई है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू तथा केतु इन नवग्रहों के स्वरूप, समिधा, होम तथा मंत्रों का विवरण दिया गया है। ग्रह-शान्ति करने से जीवन के समस्त विघ्न शांत होते हैं और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

94 – नवग्रह-मण्डल निर्माण तथा शांति होम

नवग्रह-मण्डल के निर्माण, वर्ण-योजन तथा होम-वेदी के नियमों का सूक्ष्म विवरण है। विभिन्न रंगों के अक्षतों से ग्रहों के मण्डल बनाए जाते हैं और उनके निमित्त विशेष अन्न व समिधा से आहुतियाँ दी जाती हैं। यह अनुष्ठान सम्पूर्ण राष्ट्र और परिवार में सुख-शांति लाता है।

95 – शिव-चतुर्दशी व्रत विधान तथा रुद्र-माहात्म्य

प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाए जाने वाले शिव-चतुर्दशी व्रत का निरूपण है। इस दिन भगवान नीलकंठ शिव का पंचामृत से स्नान, बिल्वपत्र अर्पण तथा रात्रि-जागरण का विधान है। यह व्रत अज्ञानता व पापों का विनाश कर साक्षात शिवत्व प्रदान करता है।

96 – शिव-चतुर्दशी व्रत कथा तथा फलश्रुति

शिव-चतुर्दशी व्रत के पावन इतिहास और कथा का विस्तार से गान किया गया है। किस प्रकार इस व्रत के प्रभाव से पापी जीव भी परम गति प्राप्त कर शिवलोक पहुँचे। यह कथा भक्ति, श्रद्धा तथा भगवान शिव की अहेतुकी कृपा को प्रकट करती है।

97 – कुमुद-द्वादशी व्रत विधान

मार्गशीर्ष मास में कुमुद-पुष्पों से भगवान वासुदेव का अर्चन करने वाले कुमुद-द्वादशी व्रत की विधि बताई गई है। यह व्रत साधक के जीवन में मानसिक निर्मलता, शांति तथा भगवद्भक्ति का संचार करता है।

98 – सर्वफल-त्याग (अखण्ड-द्वादशी) व्रत विधान

अखण्ड-द्वादशी व्रत में वर्षभर प्राप्त होने वाले विभिन्न सुस्वादु फलों का त्याग कर भगवान जनार्दन की आराधना की जाती है। अंत में ब्राह्मणों को फलों का दान करने से साधक के जीवन के समस्त अधूरी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उसे अखंड आनंद मिलता है।

99 – दीपदान व्रत तथा मल्ल-द्वादशी विधान

कार्तिक मास तथा अन्य पवित्र अवसरों पर मंदिरों, नदियों के तटों तथा जलाशयों पर दीपदान करने वाले दीपदान-व्रत का निरूपण है। दीपदान से अंधकार रूपी अज्ञान नष्ट होता है और साधक को परम ज्योति स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति होती है।

100 – व्रत-समीक्षा, तीर्थ-माहात्म्य तथा पचास अध्यायों की फलश्रुति

पचास अध्यायों (51 से 100) की इस पावन श्रृंखला का समापन करते हुए समस्त व्रतों, महादानों तथा ग्रह-शांति विधानों का सार प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही परम पवित्र प्रयाग-तीर्थ के माहात्म्य की प्रस्तावना दी गई है। जो मनुष्य इस आख्यान को नित्य सुनता या पढ़ता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान श्रीहरि के परम धाम को प्राप्त करता है।

101 – प्रयाग माहात्म्य तथा तीर्थ-यात्रा विधान

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को तीर्थराज प्रयाग की महिमा सुनाते हुए बताया कि समस्त तीर्थों में प्रयाग सर्वश्रेष्ठ और परम पवित्र है। जो श्रद्धालु भक्तिभाव से प्रयाग की यात्रा करता है, उसके समस्त जन्मों के पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यहाँ नियमपूर्वक तीर्थ-यात्रा, संयम, तथा जप-तप करने से प्राणी को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। प्रयाग में पदार्पण करते ही मनुष्य का शरीर दिव्य कांति प्राप्त करता है और सर्वेश्वर श्रीहरि की अनुकंपा से उसे मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है।

102 – तीर्थ-स्नान फल तथा प्रयाग क्षेत्र सीमा वर्णन

प्रयाग क्षेत्र की पावन सीमा और वहाँ किए जाने वाले स्नान के अलौकिक फल का निरूपण किया गया है। प्रतिष्ठानपुर से लेकर हंसप्रपतन तक और यमुना के दक्षिण भाग तक का संपूर्ण क्षेत्र प्रयाग मण्डल कहलाता है। इस क्षेत्र में बहने वाली नदियाँ तथा पावन कुण्ड जीव का परम उद्धार करने वाले हैं। माघ मास में यहाँ स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के फल से भी अधिक महान माना गया है।

103 – प्रयाग क्षेत्र की अलौकिक महिमा तथा यमलोक-भय नाश

प्रयाग क्षेत्र में निवास करने वाले तथा वहाँ प्राण त्यागने वाले प्राणियों के भाग्य का विशद गान किया गया है। जो मनुष्य धर्मपूर्वक प्रयाग तीर्थ में जीवन व्यतीत करता है, उसे यमलोक के भीषण कष्टों का सामना कभी नहीं करना पड़ता। यमराज के दूत ऐसे भक्त के निकट जाने से भयभीत होते हैं। भगवान विष्णु तथा भगवान शिव स्वयं इस पावन भूमि की सतत रक्षा करते हैं और यहाँ देहावसान होने पर जीव को अपने सायुज्य पद में स्थान प्रदान करते हैं।

104 – त्रिवेणी संगम माहात्म्य तथा वेणी-स्नान महिमा

गंगा, यमुना तथा गुप्त रूप से प्रवाहित भगवती सरस्वती के पावन संगम त्रिवेणी की अलौकिक महिमा का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। संगम का जल श्वेत और श्याम धाराओं का अद्भुत समागम है, जहाँ स्नान करने मात्र से प्राणी के मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक तीनों प्रकार के पाप भस्म हो जाते हैं। त्रिवेणी में डुबकी लगाने वाला भक्त अपने पितरों की सहस्रों पीढ़ियों को तार देता है और अंत में वैकुंठ लोक में सर्वेश्वर के धाम को प्राप्त करता है।

105 – प्रयाग में प्राण-त्याग तथा अक्षयवट माहात्म्य

प्रयाग में स्थित सनातन अक्षयवट तथा वहाँ स्वेच्छा से या वृद्धावस्था में प्राण त्यागने के पावन फल का आख्यान किया गया है। अक्षयवट महाप्रलय के समय भी अक्षुण्ण रहता है और भगवान नारायण प्रलय जल में इसी वटवृक्ष के पत्र पर बालमुकुंद रूप में शयन करते हैं। अक्षयवट की छाया में किया गया जप, तप तथा पिण्डदान अक्षय फल देता है, और यहाँ प्राण त्याग करने वाला जीव सीधे मोक्ष को प्राप्त होता है।

106 – गंगा-यमुना संगम तथा विभिन्न तीर्थ-स्थल वर्णन

गंगा और यमुना के अलौकिक संगम स्थल तथा प्रयाग के अंतर्गत आने वाले अन्य उप-तीर्थों का विस्तृत निरूपण है। कम्बलाश्वतर, भोगवती, तथा दशश्वमेधिक तीर्थों का माहात्म्य बताया गया है जहाँ स्नान करने से समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण होती हैं। इन पावन स्थानों पर ऋषियों, सिद्धों तथा देवगणों का नित्य सूक्ष्म निवास रहता है, जिससे यहाँ किया गया अल्प पूजन भी अनंत गुना फल प्रदान करता है।

107 – प्रयाग तीर्थ के अंतर्गत उप-तीर्थों का विवरण

प्रयाग मण्डल में स्थित सोमतीर्थ, कोटितीर्थ, तथा अग्निहोग्र तीर्थ जैसे पावन स्थलों की महिमा का वर्णन किया गया है। इन तीर्थों में स्नान करके पितरों का तर्पण करने वाले गृहस्थ को कभी धन, आरोग्य तथा संतति की कमी नहीं होती। देवगण और पितृगण इन स्थलों पर किए गए अर्पण से अत्यंत तृप्त होकर साधक को सुख, शांति तथा धर्म पथ पर दृढ़ रहने का शुभ आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

108 – मानस-तीर्थ एवं आन्तरिक पवित्रता का वर्णन

केवल बाह्य जल में स्नान करने की अपेक्षा अंतःकरण की पवित्रता और मानस-तीर्थों के माहात्म्य पर प्रकाश डाला गया है। सत्य, क्षमा, दया, अहिंसा, संयम, तथा भक्ति को परम मानस-तीर्थ बताया गया है। जो मनुष्य बाह्य तीर्थ-स्नान के साथ-साथ इन आंतरिक सद्गुणों को धारण करता है, वही वास्तव में सच्चा तीर्थ-यात्री है और साक्षात सर्वेश्वर प्रभु की कृपा का पूर्ण पात्र बनता है।

109 – प्रयाग तीर्थ में दान व तप की दिव्य महिमा

प्रयाग की पवित्र भूमि पर किए जाने वाले दान, होम, तथा तपस्या के अक्षय फल का निरूपण किया गया है। इस भूमि पर अन्न, वस्त्र, सुवर्ण, तथा गोदान करने से मनुष्य तीनों लोकों में चक्रवर्ती सम्राट के समान यश पाता है। यहाँ किए गए दान का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता और जन्मांतरों तक मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएँ तथा अंत में मोक्ष पद प्रदान करता है।

110 – गंगा-माहात्म्य तथा पतित-पावनी स्वरूप गान

पतिता-पावनी भगवती गंगा के अवतरण और उनके अलौकिक स्वरूप की महिमा का गान किया गया है। सर्वेश्वर श्रीहरि के चरणों से प्रादुर्भूत गंगा जी शिवजी की जटाओं में विश्राम कर भूलोक पर पधारीं। गंगा जल की एक बूंद भी यदि प्राणी की अस्थियों का स्पर्श कर ले तो वह पापी जीव भी स्वर्गलोक चला जाता है। गंगा जी का नाम स्मरण करने मात्र से समस्त भयों और दुखों का विनाश हो जाता है।

111 – यमुना-माहात्म्य तथा सूर्य-पुत्री का आख्यान

सूर्यदेव की परम पवित्र पुत्री तथा यमराज की भगीरथी स्वसा भगवती यमुना के पावन माहात्म्य का वर्णन है। कालिंदी के नाम से प्रसिद्ध यमुना जी का श्याम जल भक्त के चित्त को भक्ति रस से सराबोर कर देता है। यमुना में स्नान करने से यमराज का भय समाप्त हो जाता है और प्राणी को यमलोक की यातनाओं से सदा के लिए मुक्ति मिल जाती है।

112 – प्रयाग-यात्रा का उपसंहार तथा फलश्रुति

प्रयाग माहात्म्य के इस पावन आख्यान का उपसंहार करते हुए इसकी फलश्रुति बताई गई है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रयाग-कथा का पाठ या श्रवण करता है, वह समस्त पापों से छूटकर परम ज्ञान पाता है। प्रयाग का ध्यान करने मात्र से ही दूर स्थित मनुष्य को भी तीर्थ-स्नान का पुण्य प्राप्त होता है और वह भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है।

113 – भुवनकोश वर्णन तथा जम्बूद्वीप का स्वरूप

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को संपूर्ण ब्रह्मांड के भूगोल तथा भुवनकोश का सूक्ष्म ज्ञान प्रदान किया। उन्होंने बताया कि जम्बूद्वीप संपूर्ण पृथ्वी के केंद्र में स्थित है और यह एक लाख योजन के विस्तार में फैला हुआ है। इसके मध्य में सुमेरु पर्वत विराजमान है जो सुवर्णमय और देवताओं का पावन निवास स्थल है। जम्बूद्वीप के चारों ओर खारे जल का विशाल महासागर स्थित है जो इसे सुशोभित करता है।

114 – भारतवर्ष का भौगोलिक विस्तार तथा पर्वत-नदियाँ

सनातन संस्कृति की पावन भूमि भारतवर्ष का सीमा-विस्तार, इसके नौ खंडों, पर्वतों तथा पवित्र नदियों का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया गया है। महेंद्र, मलय, सह्याद्रि, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य, तथा पारियात्र ये सात कुलपर्वत हैं। गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, और कावेरी जैसी नदियाँ इस भूमि को अत्यंत पवित्र बनाती हैं। भारतवर्ष ही कर्मभूमि है जहाँ कर्म करके जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

115 – किंपुरुष, हरिवर्ष तथा इलावृत वर्ष का वर्णन

जम्बूद्वीप के अंतर्गत आने वाले अन्य प्रमुख वर्षों जैसे किंपुरुषवर्ष, हरिवर्ष, तथा इलावृतवर्ष का दिव्य विवरण दिया गया है। इन क्षेत्रों में निवास करने वाले मानव अत्यंत दीर्घायु, नीरोगी, तथा सदैव आनंद में निमग्न रहते हैं। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत मनमोहक है और सर्वेश्वर की कृपा से यहाँ कभी अकाल या क्लेश का प्रवेश नहीं होता।

116 – मेरु पर्वत का अलौकिक स्वरूप तथा देव-सभाएँ

देवताओं के निवास स्थान सुमेरु पर्वत की अद्भुत संरचना और उस पर स्थित ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा शिवजी की दिव्य सभाओं का वर्णन किया गया है। मेरु पर्वत से ही गंगा जी चार धाराओं (सीता, अलकनंदा, चक्षु, भद्रा) के रूप में चारों दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। मेरु पर्वत की ऊँचाई और उसकी मणियों की कांति संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करती है।

117 – माल्यवान तथा गंधमादन पर्वतों का विवरण

मेरु पर्वत के पूर्व और पश्चिम में स्थित माल्यवान तथा गंधमादन पर्वतों का विस्तृत आख्यान प्रस्तुत किया गया है। इन पर्वतों पर अलौकिक दिव्य औषधियाँ, कल्पवृक्ष, तथा सिद्ध-गंधर्वों के आश्रम विद्यमान हैं। यहाँ की वायु सर्वदा सुगंधित रहती है और ऋषियों की कठोर तपस्या के प्रभाव से यह स्थान अत्यंत पावन बना रहता है।

118 – उत्तर कुरुवर्ष तथा ऋषियों का पावन निवास

जम्बूद्वीप के उत्तर में स्थित उत्तर कुरुवर्ष का अद्भुत वर्णन है। यह स्थान सिद्ध पुरुषों और महायोगियों का निवास है जहाँ कल्पवृक्ष मनचाहे भोग और वस्त्र प्रदान करते हैं। यहाँ के निवासी निष्पाप जीवन व्यतीत करते हैं और निरंतर प्रभु चिंतन में लीन रहते हैं। इस वर्ष में दुख, रोग, तथा वृद्धावस्था का कोई स्थान नहीं है।

119 – प्लक्षद्वीप तथा शाल्मलीद्वीप का विस्तृत वर्णन

जम्बूद्वीप के पश्चात् स्थित द्वितीय द्वीप ‘प्लक्षद्वीप’ तथा तृतीय द्वीप ‘शाल्मलीद्वीप’ का विस्तार से निरूपण किया गया है। प्लक्षद्वीप में प्लक्ष (पाकड़) का विशाल वृक्ष स्थित है और यह इक्षुरस (गन्ने के रस) के सागर से घिरा है। शाल्मलीद्वीप में सेमर का अलौकिक वृक्ष है और यह मदिरा के सागर से आवेष्टित है। इन द्वीपों में वर्ण-आश्रम व्यवस्था धर्मपूर्वक संचालित होती है।

120 – कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप वर्णन

चतुर्थ कुशद्वीप, पंचम क्रौंचद्वीप, षष्ठ शाकद्वीप, तथा सप्तम पुष्करद्वीप की भौगोलिक संरचना और उनके अधिपति राजाओं का विवरण दिया गया है। कुशद्वीप घृत सागर से, क्रौंचद्वीप दधि सागर से, शाकद्वीप दुग्ध सागर से, तथा पुष्करद्वीप स्वादु जल के महासागर से घिरा हुआ है। पुष्करद्वीप में स्थित न्यग्रोध वृक्ष अत्यंत विशाल है और यहाँ केवल एक ही महान धर्म प्रचलित है।

121 – लोकालोक पर्वत तथा सात समुद्रों का विवरण

सातों द्वीपों और सातों समुद्रों के पार स्थित लोकालोक पर्वत का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। यह पर्वत प्रकाश और अंधकार की सीमा रेखा है। इसके परे केवल अंधकार और अव्यक्त प्रकृति विराजमान है। भगवान विष्णु का अनंत स्वरूप लोकालोक पर्वत पर विराजमान होकर संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा करता है और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखता है।

122 – सूर्यदेव की गति, रथ तथा काल-चक्र निरूपण

ब्रह्मांड में सूर्यदेव की गति, उनके एकचक्र रथ तथा काल-चक्र के संचालन का सूक्ष्म विज्ञान वर्णित है। सूर्यदेव का रथ संवत्सर रूपी काल का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें बारह महीने रूपी अराएँ और छह ऋतुएँ रूपी नेमि लगी हैं। सूर्यदेव की गति से ही दिन, रात्रि, पक्ष, मास, अयन, तथा वर्षों का निर्माण होता है जो समस्त जगत के जीवन का आधार है।

123 – सूर्य-रथ का संचालन तथा बारह आदित्यों की उपस्थिति

सूर्यदेव के दिव्य रथ को खींचने वाले सात छंदों रूपी घोड़ों (गायत्री, त्रिष्टुप, जगती आदि) और उस पर विराजमान बारह आदित्यों का आख्यान दिया गया है। प्रत्येक मास में अलग-अलग आदित्य, ऋषि, गंधर्व, अप्सरा, नाग, तथा ग्रामणी सूर्यदेव के रथ पर सवार होकर जगत का पोषण करते हैं और वर्षा तथा तेज का वितरण करते हैं।

124 – चन्द्रमा का रथ, गति तथा कलाओं का क्षय-वृद्धि

ओषधिपति चन्द्रमा के त्रिचक्र रथ, उनके दस श्वेत घोड़ों तथा उनकी कलाओं के क्षय और वृद्धि का विस्तृत विधान है। शुक्ल पक्ष में देवगण चन्द्रमा की कलाओं का पीयूष पान करते हैं और कृष्ण पक्ष में पितृगण अमृत पान कर तृप्त होते हैं। सूर्यदेव की किरणों द्वारा चन्द्रमा का सतत आप्यायन होता है जिससे वे शीतल कांति बिखेरते हैं।

125 – नवग्रहों की स्थिति, गति तथा मण्डल वर्णन

मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, तथा शनि इन पंच ताराग्रहों के रथों, उनकी गतियों तथा मण्डलों का विवरण दिया गया है। ये समस्त ग्रह सूर्यदेव के आकर्षण बल से बंधे होकर अपने-अपने पथ पर परिभ्रमण करते हैं। ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति से ही भूलोक के प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्मफल निर्धारित होते हैं।

126 – नक्षत्र-मण्डल तथा ध्रुव तारा की अवस्थिति

सप्तर्षियों तथा सत्ताईस नक्षत्रों के मण्डल का निरूपण करते हुए ध्रुव तारा की सर्वोच्च स्थिति का वर्णन किया गया है। ध्रुव तारा वायुमयी डोरियों से समस्त ग्रहों और नक्षत्रों को अपने केंद्र से बाँधे रखता है। जैसे कुम्हार का चाक घूमता है, वैसे ही ध्रुव जी की आज्ञा से संपूर्ण खगोल चक्र निरंतर भ्रमण करता रहता है।

127 – मेघों की उत्पत्ति, प्रकार तथा वर्षा का चक्र

सूर्य की किरणों द्वारा समुद्र से जल-शोषण और उससे बनने वाले संवर्तक, आवर्तक, तथा पुष्कर नामक मेघों की उत्पत्ति की प्रक्रिया वर्णित है। सूर्यदेव जल को भाप बनाकर मेघों में संचित करते हैं और फिर पवन के माध्यम से संपूर्ण पृथ्वी पर अमृततुल्य वर्षा करवाते हैं, जिससे अन्न-औषधियाँ उत्पन्न होकर प्राणियों का पालन करती हैं।

128 – राहु-केतु की गति तथा सूर्य-चन्द्र ग्रहण रहस्य

राहु और केतु की उत्पत्ति, उनके रथों की गति तथा सूर्य और चन्द्र ग्रहण के खगोलीय व आध्यात्मिक रहस्य का आख्यान दिया गया है। पर्वकाल (अमावस्या व पूर्णिमा) में राहु सूर्य और चन्द्रमा के मण्डल को आच्छादित करने का प्रयास करता है। इस समय किया गया स्नान, जप, तथा दान अक्षय पुण्य प्रदान करता है और प्राणी को ग्रहों की पीड़ा से मुक्त करता है।

129 – त्रिपुरासुर का प्रादुर्भाव तथा तीन नगरों का निर्माण

दैत्यराज तारकासुर के तीन महाबलशाली पुत्रों—तारकाक्ष, कमलाक्ष, तथा विद्युन्माली—का प्रादुर्भाव वर्णित है। अपने पिता का वध होने पर इन तीनों असुराधिपतियों ने देवताओं से प्रतिशोध लेने का दृढ संकल्प किया। वे संपूर्ण जगत को अपने वश में करने हेतु ब्रह्मा जी की कठोर आराधना में लीन हो गए और असीम शक्ति प्राप्त करने की अभिलाषा की।

130 – तारकाक्ष, कमलाक्ष तथा विद्युन्माली की कठोर तपस्या

त्रिपुरासुरों द्वारा सहस्रों वर्षों तक की गई अत्यंत उग्र तपस्या का सविस्तार वर्णन है। उन्होंने पञ्चाग्नि तपा, केवल जल और वायु का आहार किया। उनकी तपस्या के तेज से संपूर्ण लोक संतप्त होने लगे। अंत में ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उन्हें अमरता के अतिरिक्त अन्य कोई भी वरदान माँगने का निर्देश दिया।

131 – मय दानव द्वारा स्वर्ण, रजत व लौह पुरों की रचना

ब्रह्मा जी के वरदान स्वरूप असुरों के महान शिल्पी मय दानव ने तीन अचल नगरों (पुरों) का निर्माण किया। पहला स्वर्णमय नगर अंतरिक्ष में, दूसरा रजतमय नगर आकाश में, तथा तीसरा लौहमय नगर पृथ्वी पर स्थापित हुआ। ये तीनों पुर केवल सहस्र वर्ष में एक बार अभिजित मुहूर्त में एक रेखा में आते थे और केवल एक ही बाण से नष्ट हो सकते थे।

132 – त्रिपुरासुरों का अधर्म तथा देवगणों का संताप

दिव्य पुरों को प्राप्त कर त्रिपुरासुरों का अहंकार अत्यंत बढ़ गया और उन्होंने तीनों लोकों में अत्याचार आरंभ कर दिया। ऋषियों के यज्ञों को विध्वंस करना, देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित करना और धर्म का विनाश करना उनका मुख्य कार्य बन गया। उनके इस अधर्म से व्यथित होकर समस्त देवगण और ऋषि-मुनि अत्यंत भयभीत हो गए।

133 – देवगणों द्वारा भगवान शिव की शरण एवं स्तुति

असुरों के अत्याचारों से त्राही-त्राही करते हुए देवराज इंद्र के नेतृत्व में समस्त देवता और ऋषि कैलाश पर्वत पहुँचे। उन्होंने देवाधिदेव भगवान महेश्वर के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभावपूर्ण स्तोत्रों से उनकी स्तुति की। भगवान शिव ने देवताओं का संताप देखकर त्रिपुरासुरों का संहार करने का अभय दान प्रदान किया।

134 – भगवान शिव का दिव्य रथ तथा देवों का अस्त्र-शस्त्र योगदान

त्रिपुरासुरों का वध करने हेतु संपूर्ण ब्रह्मांड के तत्वों से एक अलौकिक दिव्य रथ का निर्माण किया गया। पृथ्वी रथ बनी, सूर्य और चन्द्रमा उसके पहिये बने, ब्रह्मा जी सारथि बने, चारो वेद घोड़े बने, तथा मंदराचल पर्वत धनुष बना। भगवान विष्णु बाण बने और स्वयं अग्निदेव उस बाण की नोक बने। इस प्रकार संपूर्ण देव-शक्ति शिवजी के स्वरूप में समाहित हुई।

135 – महेश्वर का त्रिपुरासुरों के विरुद्ध युद्ध हेतु प्रस्थान

दिव्य रथ पर सवार होकर सर्वेश्वर भगवान शिव त्रिपुरासुरों के विनाश हेतु रणभूमि की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके प्रस्थान करते ही दसों दिशाएँ थर्रा उठीं और पर्वतों में कम्पन होने लगा। भगवान शिव का उग्र रूप देखकर असुरों की सेना में भय व्याप्त हो गया, किंतु मय दानव के प्रोत्साहन से असुर युद्ध हेतु तत्पर हुए।

136 – देवासुर संग्राम तथा त्रिपुरासुरों का भीषण प्रतिरोध

भगवान शिव की सेना और त्रिपुरासुरों के मध्य भीषण युद्ध का वर्णन किया गया है। गणेश जी, कार्तिकेय जी, तथा रुद्रगणों ने असुरों की विशाल सेना का संहार करना आरंभ किया। तारकाक्ष, कमलाक्ष तथा विद्युन्माली ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग कर देवताओं पर बाणों की मुसलाधार वर्षा की और भयंकर प्रतिरोध व्यक्त किया।

137 – भगवान शिव द्वारा एक ही बाण से त्रिपुर-दहन

जब तीनों पुर अभिजित मुहूर्त में एक सरल रेखा में आए, तब भगवान शिव ने अपने पाशुपतास्त्र से युक्त अमोघ बाण का संधान किया। उस बाण के छूटते ही महाप्रलयकारी अग्नि प्रकट हुई जिसने तीनों पुरों को क्षणभर में भस्म कर दिया। तारकाक्ष, कमलाक्ष, तथा विद्युन्माली उस योगाग्नि में जलकर भस्म हो गए और तीनों लोकों में धर्म की पुनः स्थापना हुई।

138 – मय दानव पर कृपा तथा शिव-भक्ति का संदेश

त्रिपुर-दहन के मध्य मय दानव की अनन्य शिव-भक्ति को देखकर भगवान शिव उस पर अत्यंत प्रसन्न हुए। प्रभु ने मय दानव को भस्म होने से बचा लिया और उसे सुतल लोक में सुरक्षित निवास प्रदान किया। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि जो असुर कुल में भी जन्म लेकर सर्वेश्वर शिव का अनन्य भक्त होता है, उसका कभी विनाश नहीं होता।

139 – त्रिपुर-दहन के पश्चात् देवगणों द्वारा शिव-स्तुति

त्रिपुरासुरों के विनाश के पश्चात् समस्त देवताओं, गंधर्वों, तथा ऋषियों ने आकाश से पुष्प-वर्षा करते हुए भगवान शिव की अद्भुत जयजयकार की। ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने महादेव के इस कल्याणकारी स्वरूप की आरती उतारी और उन्हें तीनों लोकों का रक्षक बताया। शिवजी की कृपा से स्वर्गलोक पुनः देवताओं को प्राप्त हुआ।

140 – त्रिपुर-दहन प्रसंग का उपसंहार तथा फलश्रुति

त्रिपुर-दहन की इस अलौकिक महागाथा का उपसंहार करते हुए इसकी फलश्रुति बताई गई है। जो मनुष्य इस त्रिपुर-दहन प्रसंग को नित्य सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन के समस्त शत्रु, पाप, तथा बाधाएँ तत्काल नष्ट हो जाती हैं। उसे जीवन में विजय, यश, तथा अंत में भगवान शिव के परम पद की प्राप्ति होती है।

141 – मन्वन्तर-व्यवस्था तथा ऋषियों एवं देवों का काल-चक्र

भगवान मत्स्य ने मनु को मन्वन्तर व्यवस्था का पूर्ण विधान सुनाया। प्रत्येक मन्वन्तर में चौदह मनु, उस काल के पृथक देवगण, इंद्र, तथा सप्तर्षि होते हैं जो सृष्टि का नियमन करते हैं। काल-चक्र के अनुसार चौदह मन्वन्तर मिलकर ब्रह्मा जी का एक कल्प बनाते हैं जिसमें सृष्टि का निर्माण और प्रलय निरंतर चलता रहता है।

142 – चार युगों का स्वरूप, आयु तथा धर्म-परिवर्तन

सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, तथा कलियुग इन चारों युगों के वर्षों का मान, उनकी आयु तथा उनमें होने वाले धर्म के ह्रास का विस्तृत निरूपण है। सत्ययुग में धर्म अपने चारों चरणों पर स्थित रहता है, त्रेता में तीन, द्वापर में दो तथा कलियुग में केवल एक चरण पर रह जाता है। युग परिवर्तन के साथ मनुष्यों की आयु, बुद्धि, तथा शारीरिक बल में परिवर्तन आता है।

143 – त्रेता और द्वापर युग में यज्ञ-संस्था तथा वर्ण-धर्म

त्रेतायुग में यज्ञ-संस्था का प्रादुर्भाव और द्वापरयुग में वेदों के विभाजन का इतिहास वर्णित है। ऋषियों द्वारा मंत्रों की रचना, वर्ण-धर्म की स्थापना तथा गृहस्थ आश्रम के कर्तव्यों का निरूपण किया गया है। द्वापर युग में मनुष्यों की मति भ्रष्ट होने लगती है जिससे महर्षि व्यास वेदों को चार भागों में विभक्त करते हैं।

144 – कलियुग के लक्षण, धर्म-ह्रास तथा भावी स्थिति

कलियुग में होने वाले धर्म-ह्रास, अधर्म की वृद्धि, तथा मनुष्यों के आचरण का सूक्ष्म वर्णन किया गया है। कलियुग में लोग वेदों का अनादर करेंगे, असत्य बोलेंगे, तथा धन के लोभी होंगे। किंतु कलियुग की यह महिमा भी है कि इसमें केवल प्रभु का नाम-स्मरण और कीर्तन करने मात्र से ही प्राणी को वही फल मिलता है जो सत्ययुग में सहस्रों वर्षों के तप से प्राप्त होता था।

145 – सप्तर्षियों की वंशावली तथा गोत्र-प्रवर निरूपण

भृगु, अंगिरा, मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, तथा क्रतु इन सप्तर्षियों के वंश विस्तार और उनके गोत्र-प्रवरों का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया गया है। इन महातपस्वी ऋषियों की संतानों से ही संपूर्ण भूलोक की मानव-जाति और ब्राह्मण कुलों का विस्तार हुआ है जो सनातन वैदिक परंपरा का वहन करते हैं।

146 – तारकामय संग्राम की पृष्ठभूमि तथा तारकासुर का अहंकार

दैत्यराज तारकासुर के प्रादुर्भाव और उसके द्वारा देवलोक पर किए गए भयंकर आक्रमण की पृष्ठभूमि का आख्यान दिया गया है। तारकासुर ने अत्यंत कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसका वध केवल सात वर्ष का बालक (शिव-पुत्र) ही कर सकेगा। इस अभेद्य वरदान के अहंकार में अंधा होकर उसने देवताओं पर अत्याचार आरंभ किए।

147 – तारकासुर की कठोर तपस्या तथा ब्रह्मा जी से वरदान

तारकासुर की उग्र तपस्या का सविस्तार निरूपण है जिसमें उसने अपनी देह को अग्नि में तपाया। ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर प्रकट होकर उसे वरदान दिया। वरदान प्राप्त करते ही तारकासुर ने विशाल असुरी सेना एकत्रित की और स्वर्गलोक की ओर चढ़ाई कर दी जिससे देवताओं में खलबली मच गई।

148 – असुरों द्वारा देवलोक पर अधिकार तथा देवों की व्यथा

तारकासुर ने देवराज इंद्र को युद्ध में परास्त कर स्वर्ग के सिंहासन पर अधिकार कर लिया। सूर्य, चन्द्र, वायु, तथा अग्नि के अधिकारों को छीनकर उसने असुरों को सौंप दिया। देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित होकर वनों और गुफाओं में शरण लेनी पड़ी। देवताओं की इस व्यथा से संपूर्ण चराचर जगत दुखी हो गया।

149 – भगवान विष्णु तथा देवताओं की गुप्त मंत्रणा

पीड़ित देवगण क्षीरसागर में विराजमान भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को सांत्वना दी और बताया कि तारकासुर का वध केवल भगवान शिव के तेजोमय पुत्र द्वारा ही संभव है। अतः उन्होंने भगवान शिव के तप को भंग कर सती के पुनर्जन्म (भगवती पार्वती) के साथ उनके परिणय की योजना बनाने का गुप्त परामर्श दिया।

150 – महासंग्राम की तैयारी तथा सेनापति कार्तिकेय के जन्म की भूमिका

तारकासुर के संहार हेतु देव-सेना के पुनर्गठन तथा भगवान शिव और भगवती पार्वती के दिव्य परिणय के पश्चात् उत्पन्न होने वाले सेनापति कार्तिकेय (स्कंद) के जन्म की पृष्ठभूमि का वर्णन किया गया है। इस पचास अध्यायों की पावन श्रृंखला के अंत में देवासुर महासंग्राम और असुर-संहार की दिव्य योजना का मंगलमय मार्ग प्रशस्त होता है।

151 – तारकासुर और देवासुर संग्राम का भीषण युद्ध आरम्भ

सर्वेश्वर प्रभु की लीला से तारकासुर के अत्याचारों का अंत करने हेतु देवासुर संग्राम का भयंकर युद्ध आरंभ हुआ। असुराधिपति तारकासुर ने अपनी चतुरंगिणी असुरी सेना के साथ देवलोक पर आक्रमण किया। देवताओं की ओर से इंद्र, अग्नि, यम, तथा वरुण जैसे दिग्पालों ने अपना-अपना दल लेकर रणभूमि में पदार्पण किया। दसों दिशाओं में अस्त्र-शस्त्रों की गर्जना होने लगी और दोनों पक्षों के वीरों ने पराक्रम दिखाते हुए युद्धभूमि को थर्रा दिया।

152 – देवासुर संग्राम में देवताओं और असुरी सेना का सम्मुख संग्राम

रणभूमि में देवताओं और असुरों के मध्य हुए भीषण सम्मुख युद्ध का सविस्तार वर्णन प्रस्तुत किया गया है। गदा, त्रिशूल, धनुष, तथा चक्र के प्रहार से आकाश और पृथ्वी काँप उठे। तारकासुर की मायावी सेना ने भयंकर अंधकार और अस्त्रों की वर्षा कर देवताओं को व्याकुल कर दिया। किंतु धर्मनिष्ठ देवगणों ने प्रभु का स्मरण करते हुए धैर्यपूर्वक असुरों के बाणों को काट फेंका और रणभूमि में अपने शौर्य का प्रदर्शन किया।

153 – देवताओं द्वारा भगवान महेश्वर की आराधना और कामदेव दहन प्रसंग

असुरों के निरंतर बढ़ते उपद्रव को शांत करने हेतु समस्त देवगण ब्रह्मा जी के साथ भगवान महेश्वर की शरण में पहुँचे। तारकासुर के वध हेतु शिव-पुत्र का प्रादुर्भाव आवश्यक था, अतः देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव की समाधि भंग करने हेतु भेजा। जब समाधिस्थ महादेव का ध्यान भंग हुआ, तब उनके तीसरे नेत्र से प्रकट हुई क्रोधाग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया। तत्पश्चात् देवताओं ने विनयपूर्वक प्रभु की स्तुति कर अपना दुख निवेदन किया।

154 – भगवती पार्वती का जन्म, कठोर तपस्या तथा भगवान शिव के साथ विवाह

सती जी के पुनः प्रादुर्भाव स्वरूप हिमवान और मेना के गृह में भगवती पार्वती का जन्म हुआ। बाल्यावस्था से ही भक्तिभाव से ओतप्रोत भगवती पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या आरंभ की। ग्रीष्म में पञ्चाग्नि तपा और वर्षा में जल में रहकर उन्होंने महादेव का निरंतर ध्यान किया। प्रसन्न होकर भगवान महेश्वर ने स्वरूप प्रकट किया और समस्त ऋषियों तथा देवगणों की उपस्थिति में भगवती पार्वती के साथ पावन परिणय सूत्र में बँधे।

155 – भगवान कार्तिकेय (स्कन्द) का प्रादुर्भाव एवं बाल-लीलाएँ

भगवान शिव और भगवती पार्वती के दिव्य तेज से परम कांतिमान बालक कार्तिकेय का प्रादुर्भाव हुआ। शरवण क्षेत्र में प्रादुर्भूत होने के कारण वे शरवणभव कहलाए और कृत्तिकाओं द्वारा पालन-पोषण होने से कार्तिकेय नाम से विख्यात हुए। उनके प्रादुर्भाव से संपूर्ण देवलोक में अलौकिक आनंद छा गया। बाल्यावस्था में ही भगवान कार्तिकेय ने अपने असीम ओज और बाल-लीलाओं से समस्त मुनियों और देवों को आनंदित किया।

156 – भगवान कार्तिकेय का देवसेनापति पद पर अभिषेचन

समस्त देवगणों ने एकत्र होकर भगवान कार्तिकेय का देवसेनापति के परम पवित्र पद पर राज्याभिषेक किया। ब्रह्मा जी, विष्णु जी तथा स्वयं महादेव ने उन्हें अमोघ शक्ति-अस्त्र, धनुष तथा अनेक दिव्य आभूषण समर्पित किए। कृत्तिकाओं, अग्निदेव, तथा मरुद्गणों ने उन्हें अपना आशीर्वाद और बल प्रदान किया। मयूर पर सवार होकर धनुर्धारी कार्तिकेय ने असुरी सेना का संहार करने हेतु वज्र संकल्प लिया।

157 – सेनापति कार्तिकेय के नेतृत्व में देवसेना का प्रस्थान

नवनिर्वाचित देवसेनापति भगवान कार्तिकेय के नेतृत्व में समस्त देवताओं की विशाल सेना ने रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। दुंदुभि की मंगल ध्वनियों और शंखनाद से दसों दिशाएं गूंज उठीं। कार्तिकेय के कांतिमान स्वरूप को देखकर असुरी सेना भयभीत होने लगी। भगवान कार्तिकेय ने समस्त देव-योद्धाओं को उचित स्थानों पर तैनात कर युद्ध का व्यूह रचा।

158 – भगवान कार्तिकेय और तारकासुर का महासंग्राम

सेनापति कार्तिकेय तथा असुराधिपति तारकासुर के मध्य घटित हुए ऐतिहासिक महासंग्राम का सविस्तार वर्णन किया गया है। तारकासुर ने अपनी अनेक मायावी शक्तियों का प्रयोग कर कार्तिकेय पर अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा की। भगवान कार्तिकेय ने अपनी बाल-लीला में भी अद्भुत शौर्य दिखाते हुए असुर के समस्त प्रहारों को निष्फल कर दिया। दोनों वीरों के युद्ध से तीनों लोक थर्राने लगे।

159 – भगवान कार्तिकेय द्वारा शक्ति-अस्त्र से तारकासुर का वध

जब युद्ध अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा, तब भगवान कार्तिकेय ने अपने हाथ में अग्नि के समान प्रज्वलित अमोघ शक्ति-अस्त्र धारण किया। प्रभु ने मंत्रोच्चार के साथ उस दिव्य शक्ति-अस्त्र को तारकासुर की ओर प्रक्षिप्त किया। शक्ति-अस्त्र ने क्षणभर में तारकासुर के वक्षस्थल को बींध दिया जिससे वह असुराधिपति निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और उसका अंत हो गया।

160 – तारकासुर-वध के उपरांत देवताओं का स्वर्गारोहण एवं आनंद उत्सव

तारकासुर के अंत के साथ ही असुरों का आतंक समाप्त हो गया और तीनों लोकों में धर्म की पुनः स्थापना हुई। आकाश से देवताओं तथा गंधर्वों ने पुष्प-वर्षा करते हुए भगवान कार्तिकेय की जयजयकार की। इंद्र आदि समस्त देवगण पुनः स्वर्गलोक में अपने-अपने पदों पर प्रतिष्ठित हुए। संपूर्ण ब्रह्मांड में शांति, समृद्धि तथा भक्ति का वातावरण निर्मित हुआ।

161 – हिरण्यकशिपु का प्रादुर्भाव, कठोर तपस्या तथा अभेद्य वरदान

महर्षि कश्यप और दिति के पुत्र महाबलशाली हिरण्यकशिपु के प्रादुर्भाव का इतिहास वर्णित है। अपने भ्राता हिरण्याक्ष के वध का प्रतिशोध लेने हेतु हिरण्यकशिपु ने मंदर पर्वत पर जाकर सहस्रों वर्षों तक उग्र तपस्या की। ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उसे नर, नारी, पशु, अस्त्र, शस्त्र, दिन, रात्रि, गृह अथवा बाहर न मारे जाने का अभेद्य वरदान प्रदान किया।

162 – दैत्यराज हिरण्यकशिपु का अत्याचार और देवताओं की रक्षा हेतु प्रार्थना

वरदान प्राप्त कर अहंकार में अंधा होकर हिरण्यकशिपु ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया और स्वयं को ही परमेश्वर घोषित कर दिया। उसने यज्ञ, दान तथा प्रभु-स्मरण पर रोक लगा दी और ऋषियों व देवताओं को प्रताड़ित किया। उसके अपने सुपुत्र परम भागवत प्रह्लाद जब निरंतर श्रीहरि का नाम जपते रहे, तो हिरण्यकशिपु ने उन्हें भी अनेक यातनाएँ दीं। व्यथित होकर देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली।

163 – भगवान नृसिंह का अलौकिक प्राकट्य और हिरण्यकशिपु का वध

अपने अनन्य भक्त प्रह्लाद के सत्य वचन की रक्षा हेतु तथा हिरण्यकशिपु के वरदान की सीमाओं का पालन करते हुए सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि राजसभा के एक पाषाण स्तंभ को फाड़कर साक्षात नृसिंह रूप में प्रादुर्भूत हुए। न नर, न पशु—सिंह और मनुष्य के अद्भुत संमिश्रण रूप में प्रभु ने संध्या काल में, राजप्रासाद की देहरी पर, हिरण्यकशिपु को अपनी जंघों पर रखकर अपने तीक्ष्ण नखों से उसका वक्षस्थल विदीर्ण कर दिया।

164 – भगवान नृसिंह का उग्र स्वरूप और देवताओं द्वारा दिव्य स्तुति

हिरण्यकशिपु का अंत करने के पश्चात् भी भगवान नृसिंह का उग्र क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनके भीषण हुंकार से तीनों लोक काँप रहे थे। तब ब्रह्मा जी, शिवजी, तथा समस्त देवगणों ने हाथ जोड़कर प्रभु के शांत स्वरूप की स्तुति की। अंत में जब परम भागवत प्रह्लाद ने अत्यंत भक्तिभाव से चरणों में प्रणाम कर स्तुति की, तब प्रभु का हृदय द्रवित हुआ और उन्होंने प्रह्लाद को अपनी गोदी में उठाकर वात्सल्य प्रदान किया।

165 – पद्म-कल्प कथा एवं सर्वेश्वर भगवान पद्मनाभ का महिमा गान

भगवान मत्स्य ने मनु को पद्म-कल्प के प्रादुर्भाव का पावन आख्यान सुनाया। महाप्रलय के उपरांत क्षीरसागर में शयन करते हुए सर्वेश्वर भगवान श्रीहरि की नाभि से सहस्रों दल वाले दिव्य स्वर्ण-कमल का प्रादुर्भाव हुआ। उस नाभि-कमल पर सर्वलोकपितामह ब्रह्मा जी प्रकट हुए और उन्होंने सृष्टि की रचना आरंभ की। भगवान पद्मनाभ का यह स्वरूप समस्त मंगलों का मूल आधार है।

166 – भगवान विष्णु के वराह अवतार की पावन गाथा

जब महाप्रलय के जल में पृथ्वी रसातल में विलीन हो गई थी, तब सनातन संस्कृति की रक्षा हेतु जगदात्मा भगवान श्रीहरि ने यज्ञात्मक वराह रूप धारण किया। वराह रूपधारी प्रभु के श्वास से वेद-ध्वनि प्रस्फुटित हो रही थी। उनका विशालकाय नील-वर्ण शरीर पर्वत के समान उन्नत था और उनके दंत की नोक पर पृथ्वी सुशोभित हो रही थी।

167 – सर्वपापहर वराह-प्रादुर्भाव तथा पृथ्वी का जल से उद्धार

भगवान वराह के पावन प्रादुर्भाव तथा रसातल के अगाध जल में प्रवेश करने का सविस्तार वर्णन किया गया है। प्रभु ने महासागर के भीषण जल को अपनी नासिका के उच्च्वास से हटाकर रसातल में छिपी हुई भूदेवी की खोज की। अपने विशाल दंत की नोक पर पृथ्वी को दृढतापूर्वक उठाकर प्रभु जलनिधि से ऊपर आए और समस्त ऋषियों ने वेद-मंत्रों से वराह प्रभु का स्तवन किया।

168 – हिरण्याक्ष वध तथा पृथ्वी की पुनः स्थापना

रसातल में पृथ्वी को लाते समय दैत्यराज हिरण्याक्ष ने भगवान वराह के मार्ग में भयंकर अवरोध उत्पन्न किया। प्रभु ने गदा-युद्ध में उस महाबलशाली असुर हिरण्याक्ष का संहार कर दिया। तत्पश्चात् भगवान वराह ने पृथ्वी को जल के ऊपर स्थापित कर उस पर पर्वतों तथा सागरों को यथास्थान व्यवस्थित किया, जिससे सृष्टि का कार्य पुनः सुचारु रूप से गतिमान हुआ।

169 – भगवान वामन अवतार की भूमिका एवं राजा बलि का महान यज्ञ

दैत्यराज बलि ने अपने तपोबल और शुक्राचार्य की नीति से तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी। अदिति माता के दुःखों को दूर करने हेतु सर्वेश्वर प्रभु ने उनके गर्भ से वामन रूप में जन्म लेने का संकल्प लिया। राजा बलि ने भृगुकच्छ क्षेत्र में नर्मदा तट पर एक विशाल अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया जिसमें समस्त विद्वान एकत्र हुए।

170 – भगवान वामन का प्राकट्य तथा त्रिपाद भूमि का याचन

माता अदिति और कश्यप जी के गृह में सुंदर कमनीय बालक वामन रूप में भगवान श्रीहरि अवतरित हुए। मूंज की मेखला, छत्र, तथा दण्ड धारण किए वामन प्रभु राजा बलि की यज्ञशाला में पधारे। उनके अलौकिक तेज से यज्ञ मण्डल प्रकाशित हो उठा। राजा बलि ने आदरपूर्वक प्रभु का पूजन कर वरदान माँगने को कहा, जिस पर वामन प्रभु ने केवल तीन पग भूमि का दान माँगा।

171 – सर्वेश्वर वामन द्वारा त्रिविक्रम रूप धारण तथा बलि का अनुग्रह

शुक्राचार्य के सचेत करने पर भी दानवीर राजा बलि ने संकल्पपूर्वक तीन पग भूमि वामन प्रभु को दान कर दी। दान जल हाथ में आते ही साक्षात सर्वेश्वर ने अपना अनंत त्रिविक्रम स्वरूप धारण किया। एक पग से भूलोक और दूसरे से स्वर्गलोक माप लिया। तीसरा पग रखने हेतु राजा बलि ने अपना मस्तक समर्पित कर दिया। प्रभु ने बलि की सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उसे सुतल लोक का राज्य प्रदान किया।

172 – काल-चक्र, प्रलय तथा महाप्रलय का सनातन विधान

काल-चक्र के अंतर्गत आने वाले नित्य, नैमित्तिक, प्राकृत, तथा आत्यन्तिक इन चार प्रकार के प्रलयों का सूक्ष्म विधान वर्णित किया गया है। ब्रह्मा जी के एक दिन की समाप्ति पर नैमित्तिक प्रलय होता है जिसमें तीनों लोक जलमग्न हो जाते हैं। प्राकृत प्रलय में संपूर्ण प्रकृति के तत्व अपने कारण रूप में लीन हो जाते हैं। यह विधान जीव को संसार की असारता और प्रभु-भक्ति का संदेश देता है।

173 – अंधकासुर का प्रादुर्भाव और उसकी अधर्म नीतियाँ

भगवान शिव के पसीने की बूंद से प्रादुर्भूत हुए अंधकासुर का इतिहास वर्णित है। अंधकासुर को दैत्यराज हिरण्याक्ष ने गोद लिया था। अंधकासुर ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि जब वह काम भाव से अपनी माता के समान देवी पर दृष्टि डालेगा, तभी उसका वध हो सकेगा। इस वरदान के अहंकार में अंधकासुर तीनों लोकों में उपद्रव करने लगा।

174 – अंधकासुर द्वारा देवलोक पर आक्रमण और देवासुर युद्ध

अंधकासुर ने अपनी विशाल असुरी सेना के साथ स्वर्गलोक और ऋषियों के आश्रमों पर आक्रमण कर दिया। उसने इंद्र, विष्णु तथा अन्य देवगणों के अधिकारों को छीन लिया। जब उसकी कुदृष्टि भगवती पार्वती के अलौकिक सौंदर्य पर पड़ी, तो उसने मंदराचल पर्वत की ओर रुख किया जहाँ भगवान शिव निवास करते थे।

175 – अंधकासुर और भगवान शिव का भयंकर युद्ध

मंदराचल पर्वत पर अंधकासुर और भगवान महेश्वर के मध्य हुए भयंकर युद्ध का सविस्तार वर्णन है। अंधकासुर के शरीर से रक्त की जितनी बूंदें भूमि पर गिरती थीं, उनसे उसके ही समान सहस्रों नए अंधकासुर प्रादुर्भूत हो जाते थे। इससे असुरी सेना की संख्या निरंतर बढ़ने लगी और युद्ध अत्यंत विकराल रूप धारण करने लगा।

176 – मातृकाओं की उत्पत्ति तथा अंधकासुर के रक्त का पान

अंधकासुर के रक्त से नए असुरों की उत्पत्ति रोकने हेतु भगवान शिव के मुख से ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी, तथा चामुण्डा आदि अलौकिक मातृकाओं का प्रादुर्भाव हुआ। इन दिव्य मातृकाओं ने अंधकासुर के शरीर से गिरने वाले संपूर्ण रक्त को भूमि पर गिरने से पूर्व ही अपने मुख में पान कर लिया, जिससे नए असुरों का उत्पन्न होना बंद हो गया।

177 – भगवान महेश्वर द्वारा अंधकासुर का मान-मर्दन एवं कृपा

जब अंधकासुर का संपूर्ण रक्त क्षीण हो गया, तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से अंधकासुर को बींधकर आकाश में अधर लटका दिया। सहस्रों वर्षों तक त्रिशूल पर लटके रहने से अंधकासुर का समस्त अहंकार, पाप तथा अज्ञान भस्म हो गया। उसने त्रिशूल पर स्थित होकर ही अंतःकरण से भगवान महेश्वर की परम पावन स्तुति आरंभ की।

178 – अंधकासुर का शिवगणत्व पद प्राप्ति तथा स्तवन

अंधकासुर के निष्काप स्तवन और पश्चाताप से प्रसन्न होकर भगवान आशुतोष शिव ने उसे अपने त्रिशूल से नीचे उतारा और उसके समस्त पाप क्षमा कर दिए। प्रभु ने अंधकासुर को ‘भृंगी’ नाम प्रदान कर अपने परम प्रिय गणों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। यह कथा सिद्ध करती है कि सर्वेश्वर शिव अत्यंत कृपालु हैं और शरणागत का सर्वथा कल्याण करते हैं।

179 – परम पवित्र तीर्थराज अविमुक्त (वाराणसी) का प्रादुर्भाव

भगवान मत्स्य ने मनु को पृथ्वी के मुकुटमणि परम पवित्र अविमुक्त क्षेत्र (वाराणसी) के प्रादुर्भाव की अलौकिक कथा सुनाई। प्रलयकाल में जब संपूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जाती है, तब भी यह क्षेत्र भगवान शिव के त्रिशूल की नोक पर टिका रहता है और कभी नष्ट नहीं होता। स्वयं महादेव और भगवती भवानी इस क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ते, इसीलिए इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है।

180 – अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) की अलौकिक महिमा तथा आनंदकानन स्वरूप

काशीपुरी के आनंदकानन स्वरूप का सविस्तार वर्णन किया गया है जहाँ नित्य आनंद का निवास है। इस भूमि के कण-कण में भगवान शिव की उपस्थिति है। यहाँ बहने वाली उत्तरवाहिनी गंगा जी जीव के सहस्रों जन्मों के पापों को क्षणभर में धो देती हैं। काशी क्षेत्र में किए गए जप, ध्यान, तथा दान का फल अनंत गुना होता है।

181 – वाराणसी तीर्थ में प्राण-त्याग का मोक्षदायी फल

वाराणसी तीर्थ की सर्वाधिक अलौकिक महिमा यह है कि यहाँ प्राण त्यागने वाले प्रत्येक जीव को साक्षात मोक्ष प्राप्त होता है। चाहे वह कीट, पतंग, पशु अथवा पापी मनुष्य ही क्यों न हो, मृत्यु के समय स्वयं भगवान विश्वनाथ उसके कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं, जिससे वह पुनर्जन्म के बंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

182 – महाश्मशान काशी में भगवान शिव द्वारा तारक मन्त्र उपदेश

काशीपुरी को ‘महाश्मशान’ भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ संसार रूपी अज्ञान का दहन होता है। जब कोई जीव काशी में अंतिम साँस लेता है, तब भगवती अन्नपूर्णा उसे अभय देती हैं और सर्वेश्वर शिव तारक ब्रह्ममन्त्र प्रदान कर अपनी देह में लीन कर लेते हैं। यहाँ मृत्यु भी मंगलमयी मानी गई है।

183 – रुद्रवास, उत्तरार्क तथा काशी के दिव्य उप-तीर्थों का विवरण

वाराणसी के अंतर्गत स्थित विविध पावन स्थलों जैसे रुद्रवास, उत्तरार्क, लोलार्क, तथा कपर्दीश्वर की महिमा का निरूपण है। इन स्थानों पर स्नान तथा दर्शन करने से प्राणी के समस्त कायिक, वाचिक तथा मानसिक दोष मिट जाते हैं और उसे ऋद्धि-सिद्धि तथा भक्ति की प्राप्ति होती है।

184 – वाराणसी क्षेत्र के गुप्त तीर्थों एवं कुण्डों का माहात्म्य

काशी मण्डल में गुप्त रूप से विराजमान चक्रपुष्करिणी (मणिकर्णिका) कुण्ड, ज्ञानवापी, तथा दशाश्वमेध तीर्थ का विस्तृत आख्यान दिया गया है। मणिकर्णिका कुण्ड में स्वयं भगवान विष्णु ने तपस्या की थी और शिवजी का मणिकर्ण गिरा था। यहाँ स्नान करने से परम पद सुलभ होता है।

185 – काशी-यात्रा विधान, जप-तप तथा अविमुक्त तीर्थ उपसंहार

काशी-यात्रा की प्रामाणिक विधि, पञ्चक्रोशी परिक्रमा, तथा विश्वनाथ जी के पूजन विधान का वर्णन कर अविमुक्त तीर्थ माहात्म्य का उपसंहार किया गया है। जो प्राणी निष्काम भाव से काशी का आश्रय लेता है, वह जीवनमुक्त हो जाता है और भगवान शिव के पावन धाम को प्राप्त करता है।

186 – पावन सरिता नर्मदा जी का प्रादुर्भाव एवं दिव्य माहात्म्य

भगवान महेश्वर के कठोर तप से निकली पसीने की धारा से परम पवित्र पुण्यसलिला नर्मदा (रेवा) जी का प्रादुर्भाव हुआ। नर्मदा जी का दर्शन मात्र ही प्राणी को पवित्र कर देता है, जबकि गंगा स्नान और यमुना पान से पवित्र करती हैं। नर्मदा जी का प्रत्येक कंकड़ शिवशंकर के समान पूज्य माना गया है।

187 – नर्मदा तट पर स्थित परम पवित्र तीर्थों का निरूपण

नर्मदा नदी के दोनों तटों पर स्थित सहस्रों पावन तीर्थों का सविस्तार वर्णन प्रस्तुत किया गया है। अमरकंटक पर्वत से लेकर पश्चिमी महासागर में संगम तक नर्मदा तट पर ऋषियों और मुनियों के दिव्य आश्रम विराजमान हैं जहाँ नित्य यज्ञ और प्रभु-स्मरण की ध्वनियाँ गूंजती हैं।

188 – ओंकारेश्वर, अमरकंटक तथा नर्मदा-संगम तीर्थ महिमा

नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, अमरकंटक पर्वत, तथा महासागर संगम तीर्थ का अलौकिक माहात्म्य बताया गया है। अमरकंटक पर पिण्डदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और ओंकारेश्वर में पूजन करने से प्राणी साक्षात शिव स्वरूप बन जाता है।

189 – नर्मदा के दक्षिणी तथा उत्तरी तटवर्ती सिद्ध स्थलों का वर्णन

नर्मदा नदी के उत्तर और दक्षिण तट पर स्थित कावेरी-संगम, शुक्लतीर्थ, तथा व्यास-तीर्थ की महिमा का निरूपण है। इन सिद्ध स्थलों पर स्नान करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और साधक को परम आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है।

190 – कपिला-संगम, जालेश्वर तथा भृगु-तीर्थ माहात्म्य

कपिला नदी के नर्मदा में संगम स्थल, जालेश्वर तीर्थ, तथा महर्षि भृगु की तपोभूमि भृगु-तीर्थ की पावन कथा का गान किया गया है। इन स्थलों पर किया गया दान और तप प्राणी के दरिद्र को समाप्त कर उसे अक्षय पुण्य का भागी बनाता है।

191 – नर्मदा तट पर पिण्डदान, तर्पण तथा पितृ-मुक्ति विधान

नर्मदा तट पर पितरों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध, पिण्डदान तथा तर्पण की शास्त्रीय विधि बताई गई है। नर्मदा जल से पितरों का तर्पण करने से पितृगण सहस्रों वर्षों तक तृप्त रहते हैं और अपने वंशजों को सुख, समृद्धि तथा दीर्घायु का वरदान देते हैं।

192 – नर्मदा परिक्रमा का फल एवं विविध पावन कुण्डों की कथा

नर्मदा जी की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करने की अत्यंत कठिन एवं पावन विधि का निरूपण किया गया है। पदयात्रा करते हुए नर्मदा जी की परिक्रमा करने वाले साधक को संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त होता है और वह समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है।

193 – महेश्वर-तीर्थ, बाणगंगा तथा नर्मदा-परिक्रमा उपसंहार

महेश्वर-तीर्थ, बाणगंगा तथा चक्रतीर्थ जैसे पावन स्थलों का विवरण देकर नर्मदा-परिक्रमा का उपसंहार किया गया है। नर्मदा जी की कृपा से प्राणी संसार सागर को सुगमता से पार कर लेता है और अंत में शिवलोक में स्थान पाता है।

194 – नर्मदा-माहात्म्य की फलश्रुति एवं प्रभु-कृपा गान

नर्मदा माहात्म्य के इस महान अध्याय की फलश्रुति वर्णित है। जो मनुष्य इस नर्मदा-कथा का नित्य पाठ या श्रवण करता है, वह पापों से मुक्त होकर आरोग्य, यश, तथा धन-धान्य प्राप्त करता है और अंत में वैकुंठ अथवा शिवलोक गमन करता है।

195 – महर्षि भृगु के वंश एवं गोत्र-प्रवर का प्रामाणिक निरूपण

सनातन वैदिक परंपरा के आधारस्तंभ महर्षि भृगु के पावन वंश, उनके पुत्रों, तथा गोत्र-प्रवरों की प्रामाणिक वंशावली का निरूपण किया गया है। भृगुकुल में च्यवन, जमदग्नि, तथा भगवान परशुराम जैसे महापुरुष अवतरित हुए जिन्होंने धर्म की रक्षा की।

196 – महर्षि अंगिरा के वंश, गोत्र तथा प्रवरों का विस्तृत आख्यान

महर्षि अंगिरा के गोत्रज ऋषियों तथा उनके तीन मुख्य प्रवरों का विस्तृत विवरण दिया गया है। अंगिरस कुल में बृहस्पति, उत्थ्य, तथा घोर जैसे वेदपाठी और तपस्वी ऋषि हुए जिन्होंने वैदिक सूक्तों का दर्शन कर लोक-कल्याण किया।

197 – महर्षि अत्रि एवं वसिष्ठ के वंशज ऋषियों तथा गोत्रों का विवरण

महर्षि अत्रि तथा महर्षि वसिष्ठ के पावन कुलों के गोत्रों, प्रवरों तथा ऋषियों का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। वसिष्ठ कुल में शक्ति, पराशर, तथा महर्षि वेदव्यास जी का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने सनातन साहित्य की रचना की।

198 – महर्षि कश्यप के दिव्य वंश तथा गोत्र-प्रवर विधान

समस्त जीवों के पितामह महर्षि कश्यप के वंश, शाखाओं तथा गोत्र-प्रवरों का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। कश्यप वंश के ऋषियों ने यज्ञ विधानों और सनातन नीतियों का प्रतिपादन कर समाज में व्यवस्था स्थापित की।

199 – महर्षि विश्वामित्र के पावन वंश एवं ऋषियों का वंशावली निरूपण

क्षत्रिय कुल से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करने वाले महातपस्वी विश्वामित्र के वंश, गोत्रों तथा प्रवरों का इतिहास वर्णित है। विश्वामित्र कुल के ऋषियों ने गायत्री मन्त्र के तेज को धारण कर लोक में ज्ञान का प्रकाश फैलाया।

200 – महर्षि अगस्त्य तथा प्रवर-अध्याय का उपसंहार एवं फलश्रुति

महर्षि अगस्त्य के वंश एवं गोत्र-प्रवर का निरूपण करते हुए इस प्रवर-अध्याय का उपसंहार किया गया है। इन ऋषियों की वंशावली का ज्ञान रखने वाला मनुष्य अपने कुलाचार और धर्म का निष्ठापूर्वक पालन कर प्रभु का अनन्य अनुग्रह प्राप्त करता है।

201 – पितृ-वंश तथा अगस्त्य-वंश निरूपण

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को महर्षि अगस्त्य तथा पितृगणों के पावन वंश का विस्तार सुनाया। अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद नामक पितृगणों के मानस कुलों की संतति का इतिहास वर्णित करते हुए बताया गया कि किस प्रकार पितरों का आशीर्वाद कुल की अभिवृद्धि तथा संतानों के कल्याण का मुख्य स्रोत है। महर्षि अगस्त्य के तपोबल तथा उनके वंशज ऋषियों द्वारा सनातन वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार की गाथा इस अध्याय में भक्तिभावपूर्वक उद्घाटित होती है।

202 – पितृ-गाथा तथा पितरों की अलौकिक महिमा

पितृलोक में विराजमान पितरगणों द्वारा गाई गई परम पवित्र पितृ-गाथा का निरूपण किया गया है। पितर यह अभिलाषा व्यक्त करते हैं कि उनके कुल में ऐसा धर्मनिष्ठ पुत्र जन्म ले जो गया-तीर्थ या किसी भी पवित्र नदी के तट पर जाकर तिल और जल से उनका तर्पण करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक दिए गए पिण्डदान से पितृगण तृप्त होकर अपने वंशजों को संतति, आरोग्य, धन-धान्य तथा दीर्घायु का वरदान प्रदान करते हैं।

203 – पितृ-तर्पण तथा पिण्डदान कल्प विधान

शास्त्रानुकूल पितृ-तर्पण तथा पिण्डदान की सूक्ष्म वैदिक विधि का प्रतिपादन किया गया है। तर्पण हेतु कुशा, तिल, तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके मंत्रोच्चार करने का शास्त्रीय नियम बताया गया है। जो गृहस्थ अमावस्या तथा पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक पितरों का ध्यान कर ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, उनके घर से समस्त आधि-व्याधि दूर हो जाती हैं और पितरों का अलौकिक छत्रछाया सदा बना रहता है।

204 – पितृ-तृप्ति तथा श्राद्ध-फल निरूपण

पितरों की तृप्ति से प्राप्त होने वाले अक्षय पुण्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है। हविष्य, मधु, तथा तिलयुक्त अन्न से श्राद्ध कर्म संपन्न करने पर पितृगण प्रसन्न होकर साधक के वंश की रक्षा करते हैं। इस अध्याय में यह सिद्ध किया गया है कि पितरों की पूजा सीधे परमेश्वर विष्णु की पूजा के समान फलदायी होती है, क्योंकि सर्वेश्वर श्रीहरि ही समस्त पितरों के अंतरात्मा रूप में विराजमान हैं।

205 – राजधर्म निरूपण तथा राजा के दिव्य गुण

भगवान मत्स्य ने राजा वैवस्वत मनु को प्रजा-पालन हेतु सनातन राजधर्म का उपदेश देना आरंभ किया। राजा को आठ लोकपालों (इन्द्र, अग्नि, यम, सूर्य, वरुण, चन्द्र, वायु, कुबेर) के दिव्य अंशों से निर्मित माना गया है। राजा का मुख्य कर्तव्य सत्य, न्याय, तथा धर्म के मार्ग पर चलते हुए प्रजा की रक्षा करना है। जो राजा जितेंद्रिय होकर नीतिपूर्वक शासन करता है, वह पृथ्वी का पूर्ण भोग कर अंत में स्वर्गलोक में स्थान पाता है।

206 – राजा के कर्तव्य तथा मन्त्रि-परिषद व्यवस्था

राज्य-संचालन हेतु अति योग्य, कुलीन, वेदपाठी तथा नीतिशास्त्र के मर्मज्ञ मंत्रियों के चयन का विधान प्रस्तुत किया गया है। राजा को कभी स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिए, अपितु मन्त्रि-परिषद के गुप्त परामर्श से ही राज्य के कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। राजा और मंत्रियों के मध्य अटूट विश्वास, निष्ठा तथा गोपनीयता का होना राज्य की स्थिरता और शांति का मूल आधार माना गया है।

207 – राजधर्म में दुर्ग तथा किला-निर्माण विधान

राज्य की बाह्य आक्रमणों से रक्षा हेतु दुर्ग (किले) के निर्माण का विस्तृत विवरण दिया गया है। धनुर्दुर्ग, महीदुर्ग, जलदुर्ग, वृक्षदुर्ग, नृदुर्ग, तथा गिरिदुर्ग इन छह प्रकार के दुर्गों की विशेषताएँ बताई गई हैं। इनमें गिरिदुर्ग (पर्वतीय किला) को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। दुर्ग के भीतर जल-भंडार, अन्नागार, तथा अस्त्र-शस्त्रों की पर्याप्त व्यवस्था होना राज्य सुरक्षा के लिए परम आवश्यक बताया गया है।

208 – दुर्ग-सुरक्षा तथा राष्ट्र-रक्षण नीति

निर्मित दुर्ग की सतत सुरक्षा तथा शत्रु के आक्रमण के समय अपनाई जाने वाली रक्षा-नीति का निरूपण किया गया है। किले के चारों ओर गहरी खाई, गुप्त मार्ग, तथा प्राचीर पर धनुर्धारियों की नियुक्ति का शास्त्रीय नियम है। राजा को अपने दुर्ग में प्रजा हेतु जीवन-रक्षक औषधियों और रसद का पर्याप्त संग्रह रखना चाहिए ताकि संकटकाल में भी प्रजा निर्भय होकर निवास कर सके।

209 – सैन्य-व्यवस्था तथा शस्त्रागार नियमन

चतुरंगिणी सेना (हस्ती, रथ, अश्व, तथा पैदल सैनिक) के संगठन तथा उनके प्रशिक्षण का सविस्तार वर्णन किया गया है। सेनापति के पद पर शूरवीर, नीति कुशल तथा वफादार सेनानायक को नियुक्त करने का नियम है। शस्त्रागार में धनुष, बाण, ढाल, तलवार, तथा प्रास जैसे अस्त्र-शस्त्रों को सर्वदा सुसज्जित रखने की सलाह दी गई है ताकि आवश्यकता पड़ने पर शत्रु का तत्काल दमन किया जा सके।

210 – कोष-संवर्धन तथा कर-संग्रह नीति

राज्य के अर्थ-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने हेतु कोष (राजकोष) के संवर्धन और न्यायसंगत कर-संग्रह नीति का निरूपण किया गया है। राजा को प्रजा पर अत्याचार किए बिना उसी प्रकार कर ग्रहण करना चाहिए जैसे भौंरा पुष्प को हानि पहुँचाए बिना पराग लेता है। कृषि, व्यापार, तथा गोपालन पर धर्मानुकूल कर लगाकर प्राप्त धन को राष्ट्र-सुरक्षा तथा जनकल्याण के कार्यों में व्यय करने का विधान है।

211 – षड्गुण नीति तथा साम-दाम-दंड-भेद विधान

राज्य-संचालन की प्रसिद्ध षड्गुण नीति (संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, संश्रय) तथा चार उपायों (साम, दाम, दंड, भेद) का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। बुद्धिमान राजा को सर्वप्रथम साम और दाम नीतियों का प्रयोग कर शत्रु को वश में करने का प्रयास करना चाहिए। जब समस्त शांतिप्रिय उपाय निष्फल हो जाएँ, तभी अंतिम विकल्प के रूप में दंड और युद्ध का आश्रय लेना चाहिए।

212 – राजा की दिनचर्या तथा आत्म-रक्षा विधान

राजा के दैनिक जीवन की समय-सारणी तथा उसकी व्यक्तिगत सुरक्षा का शास्त्रीय निरूपण प्रस्तुत किया गया है। राजा को प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर प्रभु का स्मरण, देव-पूजन, तथा योग-अभ्यास करना चाहिए। भोजन, शयन, तथा यात्रा के समय राजा की सुरक्षा हेतु विशेष ध्यान रखने का निर्देश दिया गया है ताकि षड्यंत्रकारियों से उसकी रक्षा हो सके।

213 – दूत तथा चर-व्यवस्था का शास्त्रीय वर्णन

शत्रु और मित्र राज्यों की गुप्त सूचनाएँ प्राप्त करने हेतु दूतों तथा गुप्तचरों (चरों) की नियुक्ति का विधान दिया गया है। दूत को प्रखर बुद्धि, वाक्पटु, देश-काल का ज्ञाता तथा स्वामीभक्त होना चाहिए। सन्यासी, व्यापारी, तथा कृषक के छद्म वेश में गुप्तचरों को राज्य के भीतर और बाहर तैनात करने से राजा को समस्त गतिविधियों की सत्य जानकारी प्राप्त होती रहती है।

214 – विष-चिकित्सा तथा राजा की खान-पान सुरक्षा

राजा को विष-प्रयोग से बचाने हेतु भोजन तथा पेय पदार्थों के परीक्षण की विधि वर्णित की गई है। भोजन में विष की उपस्थिति पहचान हेतु चकोर पक्षी की आँखों के परिवर्तन तथा अग्नि में भोजन डालने पर शिखा के रंग में बदलाव का सूक्ष्म विज्ञान बताया गया है। विषैले प्रभावों को नष्ट करने वाली दिव्य औषधियों और मणियों का वर्णन किया गया है जो राजा की प्राण-रक्षा करती हैं।

215 – न्याय-व्यवस्था तथा व्यवहार-दर्शन

राज्य में न्याय-व्यवस्था का सुचारु संचालन करने हेतु व्यवहार-दर्शन का निरूपण किया गया है। राजा को पक्षपात रहित होकर, साक्षियों के प्रमाण के आधार पर, शास्त्रानुकूल निर्णय देना चाहिए। धनी अथवा निर्धन, सब के लिए न्याय के नियम समान होने चाहिए। अन्यायपूर्ण निर्णय देने से राजा को पाप लगता है, जबकि धर्मपूर्वक न्याय करने से राज्य में शांति और समृद्धि का वास होता है।

216 – दण्ड-नीति तथा अपराध-विधान

अपराधों की गम्भीरता के आधार पर दिए जाने वाले विभिन्न दण्डों (वाग्दण्ड, धिक्दण्ड, धनदण्ड, वधदण्ड) का शास्त्रीय विधान प्रस्तुत किया गया है। दण्ड देने का मुख्य उद्देश्य अपराधी को सुधारना तथा समाज में धर्म की मर्यादा बनाए रखना है। राजा को क्रोध या लोभ में आकर कभी कठोर या अनुचित दण्ड नहीं देना चाहिए, अपितु विवेकपूर्ण दण्ड-नीति से ही प्रजा को सन्मार्ग पर रखना चाहिए।

217 – प्रजा-पालन तथा राष्ट्र-समृद्धि उपदेश

प्रजा को अपनी संतानों के समान मानकर उनका पालन-पोषण करने के स्वर्णिम नियमों का गान किया गया है। जिस राज्य में अनाथ, वृद्ध, विधवाएँ, तथा रोगी सुरक्षित रहते हैं, वहाँ सर्वेश्वर की अनुकंपा सदा बनी रहती है। राजा का मुख्य धर्म प्रजा के सुखी रहने में ही अपना सुख देखना है, जिससे राष्ट्र स्वतः ही धन-धान्य तथा वैभव से परिपूर्ण हो जाता है।

218 – शांति-कर्म तथा राजकीय अनुष्ठान

राज्य में अकाल, महामारी, उपद्रव, तथा प्राकृतिक आपदाओं के निवारण हेतु किए जाने वाले वैदिक शांति-कर्मों और राजसूय आदि अनुष्ठानों की विधि बताई गई है। वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा किए जाने वाले जप, होम, तथा तर्पण से वायुमण्डल शुद्ध होता है और राज्य पर आने वाले समस्त अदृश्य संकट भस्म हो जाते हैं।

219 – ग्रह-शांति तथा राजा हेतु शांति-होम विधान

राजा के स्वास्थ्य तथा राज्य की स्थिरता हेतु नवग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने का ग्रह-शांति विधान वर्णित है। समिधा, घृत, तथा मन्त्रों के आहुति-दान से ग्रहों के कोप का शमन होता है। राजा द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए शांति-होम से राष्ट्र में वर्षा अनुकूल होती है और प्रजा जन आरोग्य व समृद्धि का आनंद भोगते हैं।

220 – राज्याभिषेक विधि तथा वैदिक मन्त्र-विधान

नवनिर्वाचित राजा के राज्याभिषेक की परम पवित्र वैदिक विधि का सविस्तार आख्यान प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न पवित्र नदियों के जल, औषधियों, तथा सर्वतोभद्र मण्डल की स्थापना कर राजा का अभिषेक किया जाता है। राजा को अभिमंत्रित जल से स्नान कराकर मुकुट धारण कराया जाता है और वह प्रजा की रक्षा हेतु धर्म की शपथ ग्रहण करता है।

221 – नीति-शास्त्र सार तथा राजा हेतु धर्मोपदेश

सनातन नीति-शास्त्र के सर्वोत्कृष्ट नियमों का संग्रह कर राजा हेतु अंतिम धर्मोपदेश दिया गया है। राजा को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, तथा मत्सर इन छह आन्तरिक शत्रुओं पर सर्वप्रथम विजय प्राप्त करनी चाहिए। जो राजा स्वयं जितेंद्रिय और धर्मनिष्ठ होता है, उसकी आज्ञा का पालन समस्त दिशाओं के राजा सहर्ष करते हैं।

222 – विजय-यात्रा तथा युद्ध-प्रस्थान मुहूर्त

शत्रु के विरुद्ध विजय-यात्रा हेतु प्रस्थान करने के पावन मुहूर्त, तिथियों, तथा नक्षत्रों का सूक्ष्म निरूपण किया गया है। शुभ काल में किया गया प्रस्थान राजा को युद्ध में निश्चित विजय प्रदान करता है। प्रस्थान से पूर्व देव-पूजन, गो-दर्शन, तथा ब्राह्मणों का आशीर्वाद लेना परम मंगलकारी माना गया है।

223 – शकुन-शास्त्र तथा अद्भुत-शांति विधान

युद्ध-यात्रा या मांगलिक कार्यों के समय दिखाई देने वाले शुभ और अशुभ शकुनों का निरूपण किया गया है। मार्ग में जलपूर्ण कलश, गरुड़, दर्पण, तथा फल-फूल का दिखना अति शुभ माना जाता है। अशुभ शकुन दिखाई देने पर राजा को शांति-होम कराकर ही आगे बढ़ना चाहिए जिससे भावी संकट टल जाता है।

224 – युद्ध-कालीन शुभ-अशुभ शकुन निरूपण

रणभूमि की ओर बढ़ते समय आकाश, पृथ्वी, तथा वातावरण में घटने वाली अद्भुत घटनाओं और उनके परिणामों का विवरण दिया गया है। अचानक उल्कापात, भूकंप, या भयंकर आंधी का चलना युद्ध में पराजय या संकट का संकेत देता है, जबकि दक्षिण दिशा से अनुकूल पवन का बहना विजय का आभास कराता है।

225 – विजय-सूचक लक्षण तथा मांगलिक विधान

राजा की सेना हेतु विजय की सूचना देने वाले लक्षणों का वर्णन किया गया है। सैनिकों में उत्साह, अस्त्रों की कांति में वृद्धि, तथा मांगलिक बाजे की गूँज विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। राजा को युद्ध से पूर्व भगवती दुर्गा तथा सर्वेश्वर श्रीहरि का ध्यान कर ही रणभूमि में प्रवेश करना चाहिए।

226 – कृषि, पशु-धन तथा राज्य-संपत्ति रक्षण

राज्य के वास्तविक आधार कृषि, गौ-धन, तथा प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा का विधान दिया गया है। राजा को कृषकों को सिंचाई हेतु जलाशयों की सुविधा तथा पशुओं हेतु चरागाह उपलब्ध कराने चाहिए। पशुओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना और वनों की रक्षा करना राज्य का नैतिक धर्म बताया गया है।

227 – सीमा-विवाद तथा संपत्ति-न्याय विधान

दो ग्रामों, क्षेत्रों, या व्यक्तियों के मध्य होने वाले सीमा-विवाद (क्षेत्र-विवाद) के निपटारे के शास्त्रीय नियम प्रस्तुत किए गए हैं। पुराने वृक्षों, पत्थरों, तथा साक्षियों के आधार पर सीमा का निर्धारण करना चाहिए। असत्य साक्ष्य देने वाले को दण्डित कर वास्तविक स्वामी को उसकी भूमि सौंपना न्याय का मूल सिद्धांत है।

228 – सामुद्रिक-शास्त्र तथा पुरुष-स्त्री लक्षण परिचय

मानव शरीर के विभिन्न अंगों के आकार, रेखाओं, तथा चिह्नों के आधार पर उसके भूत, भविष्य, तथा स्वभाव को जानने वाले सामुद्रिक-शास्त्र का प्रादुर्भाव वर्णित है। महर्षियों द्वारा रचित यह शास्त्र मानव की शारीरिक संरचना के भीतर छिपे आध्यात्मिक तथा भौतिक भाग्य का रहस्य उजागर करता है।

229 – पुरुष-सामुद्रिक लक्षण तथा शुभ-अशुभ अंग निरूपण

पुरुषों के शरीर के विभिन्न अंगों जैसे मस्तक, नेत्र, वक्षस्थल, हस्तरेखा, तथा पदों के शुभ और अशुभ लक्षणों का सविस्तार वर्णन किया गया है। उन्नत मस्तक, विशाल वक्षस्थल, तथा कमल के समान सुंदर पद वाले पुरुष सर्वदा भाग्यशाली, ओजस्वी, तथा राजपद प्राप्त करने वाले होते हैं।

230 – स्त्री-सामुद्रिक लक्षण तथा सौभाग्यशाली अंग वर्णन

स्त्रियों के शरीर की बनावट, गमन, स्वर, तथा रेखाओं के आधार पर उनके सौभाग्य और चरित्र का निरूपण किया गया है। मृदु वाणी, हंसिनी के समान चाल, तथा स्निग्ध केश वाली नारियाँ कुल हेतु अत्यंत मंगलकारी और अखंड सौभाग्य प्रदान करने वाली मानी गई हैं।

231 – गज-लक्षण तथा हस्ती-शाला व्यवस्था

राजकीय सेना के अंग हाथियों के लक्षणों, उनके प्रकारों, तथा उनकी देख-भाल के नियमों का विवरण दिया गया है। सुंड, दंत, तथा पीठ के चिह्नों से उत्तम भद्र, मंद, तथा मृग जातियों के हाथियों की पहचान की जाती है। हाथियों की शाला को स्वच्छ तथा विष-रहित रखने का निर्देश दिया गया है।

232 – अश्व-लक्षण तथा अश्व-चिकित्सा विधान

उत्तम नस्ल के घोड़ों के आवर्तों (भंवरियों), कांति, तथा चाल के आधार पर उनके शुभ-अशुभ लक्षणों का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। देव-योग्य अश्वों के लक्षणों के साथ-साथ उनके रोगों की चिकित्सा हेतु प्रयुक्त होने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का सूक्ष्म विधान भी समझाया गया है।

233 – खड्ग-धनुष आदि अस्त्र-लक्षण निरूपण

युद्ध में प्रयुक्त होने वाली तलवारों (खड्ग), धनुषों, तथा बाणों के निर्माण और उनकी गुणवत्ता परीक्षण का विधान दिया गया है। खड्ग की धार पर बने शुभ चिह्नों से राजा की विजय निर्धारित होती है। उत्तम काष्ठ तथा लोहे से निर्मित अस्त्र ही युद्ध में सैनिक को रक्षा और विजय दिलाते हैं।

234 – रत्न-परीक्षा तथा बहुमूल्य मणियों के लक्षण

हीरा, माणिक्य, नीलम, पन्ना, तथा मोती आदि बहुमूल्य रत्नों की प्रामाणिकता और उनके शुभ-अशुभ प्रभावों का विस्तृत निरूपण है। शुद्ध और निर्दोष रत्न धारण करने से राजा का तेज बढ़ता है और ग्रहों की पीड़ा शांत होती है, जबकि दोषयुक्त रत्न धारक को कष्ट पहुँचाते हैं।

235 – छत्र-चामर तथा राजकीय प्रतीकों का लक्षण

राजा के मस्तक पर सुशोभित होने वाले श्वेत छत्र (छतरी) तथा चामर (पँखा) के निर्माण और उनके आध्यात्मिक महत्व का आख्यान दिया गया है। हंस के समान श्वेत वस्त्र से निर्मित छत्र राजा की प्रभुसत्ता का प्रतीक है जो उस पर सर्वेश्वर की कृपा दृष्टि को दर्शाता है।

236 – सिंहासन-मुकुट तथा राजकीय आभूषण निर्माण

राजा के दिव्य सिंहासन, मुकुट, तथा कुण्डल आदि आभूषणों के निर्माण हेतु प्रयुक्त होने वाले सुवर्ण और मणियों का शास्त्रीय विवरण है। सिंहासन की पादपीठ तथा उस पर उकेरे गए सिंह- आकृतियाँ राजा के शौर्य तथा तेज को प्रतिपादित करती हैं।

237 – व्यूह-रचना तथा युद्ध-कौशल विधान

रणभूमि में शत्रु सेना को घेरने हेतु बनाई जाने वाली विभिन्न व्यूह-रचनाओं (चक्रव्यूह, मकरव्यूह, गरुड़व्यूह, पद्मव्यूह) का सूक्ष्म विज्ञान समझाया गया है। सेनापति को परिस्थिति तथा भूमि के स्वरूप के अनुसार ही व्यूह की रचना कर सैनिकों को तैनात करना चाहिए।

238 – संधि-विग्रह नीति तथा शत्रु-शमन उपाय

दो राज्यों के मध्य होने वाली शांति संधि तथा युद्ध (विग्रह) की नीतियों का विस्तृत निरूपण है। जब शत्रु बलवान हो तो संधि कर समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए और जब शत्रु कमजोर हो तो विग्रह कर उस पर अधिकार जमाना चाहिए।

239 – मित्र-भेद नीति तथा कूटनीति विधान

शत्रु के सहयोगियों में फूट डालने की मित्र-भेद नीति तथा कूटनीतिक उपायों का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। गुप्तचरों के माध्यम से शत्रु की मन्त्रि-परिषद में अविश्वास उत्पन्न कर शत्रु को बिना युद्ध किए ही कमजोर बना देना चतुर राजा की नीति मानी गई है।

240 – आपद्-धर्म तथा संकट-कालीन राज्य-नीति

राज्य पर अचानक आने वाले भीषण प्राकृतिक या राजनीतिक संकट के समय अपनाई जाने वाली आपद्-धर्म नीति का निरूपण किया गया है। संकटकाल में राजा को सामान्य नियमों को शिथिल कर राष्ट्र और प्रजा के अस्तित्व की रक्षा हेतु कठोर कदम उठाने की छूट दी गई है।

241 – राजकीय दान-धर्म तथा राजा हेतु दान-माहात्म्य

राजा द्वारा किए जाने वाले तुलादान, गोदान, तथा भूमिदान के अलौकिक माहात्म्य का गान किया गया है। दान देने से राजा के जन्म- जन्मांतर के पाप भस्म हो जाते हैं और उसकी कीर्ति भूलोक पर सूर्य के समान चमकती है, जिससे अंत में उसे विष्णुलोक प्राप्त होता है।

242 – वामन-प्रादुर्भाव तथा राजा बलि की सभा का वर्णन

दैत्यराज बलि के बढ़ते अहंकार को शांत करने तथा देवताओं को उनका अधिकार दिलाने हेतु सर्वेश्वर श्रीहरि के वामन अवतार की पृष्ठभूमि वर्णित है। महर्षि कश्यप और माता अदिति के तपोबल से वामन प्रभु का प्रादुर्भाव हुआ, जिनके दिव्य तेज से संपूर्ण जगत् प्रकाशित हो उठा।

243 – राजा बलि का अश्वमेध यज्ञ तथा वामन-आगमन

नर्मदा तट पर राजा बलि द्वारा आयोजित महायज्ञ में बालक वामन रूपधारी प्रभु के पदार्पण का पावन आख्यान है। वामन प्रभु के हाथों में छत्र, दण्ड, तथा मूंज की मेखला सुशोभित थी। उनके अलौकिक सौंदर्य और तेज को देखकर राजा बलि सहर्ष अपनी शैया से उठकर प्रभु के स्वागताध्यक्ष बने।

244 – वामन प्रभु द्वारा त्रिपाद-भूमि याचना

राजा बलि द्वारा इच्छित दान माँगने के आग्रह पर वामन प्रभु ने केवल अपने तीन पग के बराबर भूमि की याचना की। राजा बलि ने इसे अत्यंत छोटा दान मानकर हँसते हुए संकल्प जल हाथ में लिया, यद्यपि उनके कुलगुरु शुक्राचार्य ने उन्हें सचेत किया कि यह बालक साक्षात श्रीहरि हैं।

245 – सर्वेश्वर वामन का त्रिविक्रम रूप धारण

बलि द्वारा दान का संकल्प जल अर्पित करते ही वामन प्रभु ने अपना अलौकिक ब्रह्मांडव्यापी ‘त्रिविक्रम’ स्वरूप धारण किया। एक पग से संपूर्ण भूलोक तथा दूसरे पग से संपूर्ण स्वर्गलोक माप लिया। प्रभु का यह विराट स्वरूप देखकर समस्त दैत्य काँप उठे।

246 – राजा बलि का बंधन तथा सुतल-लोक गमन

तीसरा पग रखने हेतु स्थान न होने पर दानवीर राजा बलि ने भक्तिपूर्वक अपना मस्तक प्रभु के चरणों में झुका दिया। सर्वेश्वर श्रीहरि ने बलि की सत्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न होकर उसे गरुड़-पाश से मुक्त किया और उसे अमरत्व देकर सुतल लोक का सार्वभौम राजा बना दिया।

247 – वराह-अवतार कथा तथा रसातल से पृथ्वी का उद्धार

महाप्रलय के अगाध जल में डूब चुकी पृथ्वी का उद्धार करने हेतु सर्वेश्वर श्रीहरि के यज्ञात्मक वराह रूप धारण करने की पावन कथा वर्णित है। भगवान वराह ने रसातल में प्रवेश कर दैत्य हिरण्याक्ष का वध किया और अपने तीक्ष्ण दंत पर पृथ्वी को उठाकर जल के ऊपर स्थापित किया।

248 – भगवान नृसिंह प्रादुर्भाव तथा हिरण्यकशिपु वध

अनन्य भक्त प्रह्लाद की रक्षा हेतु स्तंभ से प्रादुर्भूत हुए सर्वेश्वर नृसिंह भगवान के अलौकिक स्वरूप की महिमा का गान किया गया है। प्रभु ने संध्या काल में, राजप्रासाद की देहरी पर, हिरण्यकशिपु को अपनी जंघों पर रखकर नखों से विदीर्ण कर उसका संहार कर दिया।

249 – समुद्र-मंथन तथा देवासुर प्रयास वर्णन

अमृत प्राप्ति हेतु देवताओं और असुरों द्वारा मंदराचल पर्वत को मथानी तथा वासुकि नाग को नेति बनाकर किए गए ऐतिहासिक क्षीरसागर मंथन का विवरण दिया गया है। सर्वेश्वर श्रीहरि ने कच्छप (कूर्म) रूप धारण कर मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर आधार प्रदान किया।

250 – अमृत-प्राप्ति तथा मोहिनी-अवतार लीला

समुद्र-मंथन से हलाहल विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, तथा भगवती लक्ष्मी के प्रादुर्भाव के पश्चात् धन्वन्तरि जी अमृत-कलश लेकर प्रकट हुए। असुरों से अमृत की रक्षा हेतु श्रीहरि ने मोहिनी रूप धारण कर अपनी लीला से देवताओं को अमृत पान कराया और धर्म की जयजयकार कराई।

251 – वास्तुशास्त्र तथा गृह-निर्माण विधान

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को सनातन वास्तुशास्त्र का अलौकिक ज्ञान प्रदान करते हुए गृह-निर्माण की प्रामाणिक विधि समझाई। वास्तुशास्त्र के मुख्य प्रवर्तक महर्षियों तथा भूमि-चयन के नियमों का वर्णन किया गया है। गृह-निर्माण हेतु भूमि का परीक्षण, मृदा का वर्ण, गंध तथा स्वाद परखने की शास्त्रीय प्रणाली बताई गई है। सही दिशा में गृह का द्वार और कमरों का निर्माण करने से गृहस्थ जीवन में सुख, शांति तथा आरोग्य की निरंतर वृद्धि होती है।

252 – वास्तुदेवता पूजन तथा वास्तु-शान्ति विधान

गृह-निर्माण से पूर्व तथा गृह-प्रवेश के समय वास्तु-पुरुष की उत्पत्ति कथा और उनके पैंतालीस देव-अंगों के पूजन का सविस्तार वर्णन है। वास्तु-दोषों के निवारण हेतु की जाने वाली वास्तु-शान्ति यज्ञ विधि, होम, तथा बलि-दान का निरूपण किया गया है। वास्तुदेवता की प्रसन्नता से गृह में किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति का प्रवेश नहीं होता और परिवार के सदस्य समस्त ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करते हैं।

253 – गृह-प्रमाण तथा स्तम्भ-लक्षण निरूपण

विभिन्न वर्णों तथा आश्रमों के अनुसार गृहों की चौड़ाई, लंबाई, तथा ऊँचाई के शास्त्रीय परिमाण का निरूपण किया गया है। गृह में प्रयुक्त होने वाले खंभों (स्तम्भों) के प्रकारों जैसे रोचक, भद्र, घट्ट, तथा रुचक का विवरण दिया गया है। सही नाप-जोख से बनाए गए स्तम्भ गृह को सुदृढ़ता और सुंदरता प्रदान करते हैं, जिससे वास्तु-पुरुष अत्यंत संतुष्ट रहते हैं।

254 – द्वार-लक्षण तथा गृह-प्रवेश विधान

गृह के मुख्य द्वार की चौखट, द्वार की दिशा, तथा उस पर उकेरे जाने वाले शुभ चिह्नों (कलश, लता, मांगलिक आकृति) का विधान प्रस्तुत किया गया है। द्वार के दोषों से होने वाली हानियों से बचने हेतु उपाय बताए गए हैं। तत्पश्चात् शुभ मुहूर्त, तिथि, तथा नक्षत्र में कुलदेवता के पूजन एवं वेद मन्त्रों के पाठ के साथ पावन गृह-प्रवेश करने की विधि वर्णित है।

255 – गृह-उद्यान तथा शुभ-वृक्षारोपण विधान

गृह के आसपास लगाए जाने वाले शुभ और अशुभ वृक्षों का सूक्ष्म वर्गीकरण किया गया है। पूर्व दिशा में बरगद, दक्षिण में गूलर, पश्चिम में पीपल, तथा उत्तर में पाकड़ वृक्ष लगाना शुभ माना गया है। तुलसी, आंवला, अनार, तथा सुगन्धित पुष्पों के पौधे गृह-प्रांगण में लगाने से भगवती लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है और वास्तुशास्त्र सम्बंधी समस्त दोष स्वतः शांत हो जाते हैं।

256 – राजप्रासाद तथा मन्दिर-वास्तु निरूपण

सम्राटों तथा राजाओं के विशाल राजप्रासादों (महलों) तथा भव्य मन्दिरों के वास्तु-निर्माण का विस्तृत आख्यान दिया गया है। राजा के निवास, शस्त्रागार, कोषागार, तथा रसोइघर के निश्चित स्थानों का निर्देश है। मन्दिर-निर्माण हेतु सर्वोत्तम पवित्र स्थलों का चयन कर वहाँ देवालय की नींव रखने की विधि बताई गई है जिससे राज्य और राष्ट्र की सर्वदा उन्नति होती है।

257 – मन्दिर-लक्षण तथा प्रासाद के बीस प्रकार

सनातन वास्तुकला के अंतर्गत निर्मित होने वाले मन्दिरों (प्रासाद) के प्रसिद्ध बीस प्रकारों का विशद विवरण दिया गया है। मेरु, मन्दार, कैलास, विमान, नन्दन, समुद्र, पद्म, तथा गरुड़ आदि नामों से विख्यात इन प्रासादों की ऊँचाई, शिखर, तथा मण्डपों की संरचना का सूक्ष्म गणित समझाया गया है। इन मन्दिरों में देवाधिदेव की स्थापना से संपूर्ण क्षेत्र तीर्थ बन जाता है।

258 – मूर्तिकला तथा प्रतिमा-लक्षण विधान

देव-प्रतिमाओं के निर्माण हेतु प्रयुक्त होने वाले द्रव्यों (सुवर्ण, रजत, कांस्य, पाषाण, काष्ठ, मृत्तिका) के चयन की शास्त्रीय विधि वर्णित है। उत्तम शिल्पी द्वारा प्रतिमा निर्माण हेतु ‘ताल’ मान (अष्टताल, नवताल, दशताल) का परिमाण समझाया गया है। अंग-प्रत्यंग के सही अनुपात से निर्मित देव-प्रतिमा ही सर्वेश्वर के दिव्य तेज को धारण करने में समर्थ होती है।

259 – देव-प्रतिमा लक्षण तथा स्वरूप निरूपण

त्रिदेवों—ब्रह्मा जी, भगवान विष्णु, तथा भगवान शिव—की प्रतिमाओं के स्वरूप, आयुध, वस्त्र, तथा वाहनों का सूक्ष्म विवरण दिया गया है। चतुर्भुज विष्णु जी के हाथ में शंख, चक्र, गदा, पद्म; शिवजी के हाथ में त्रिशूल, डमरू, तथा मस्तक पर चंद्रकला; तथा ब्रह्मा जी के हाथ में कमंडल और वेद की सुशोभन कांति का प्रामाणिक निरूपण किया गया है।

260 – देवी एवं अन्य देव-प्रतिमा लक्षण

भगवती लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, गणेश जी, कार्तिकेय जी, तथा नवग्रहों की प्रतिमाओं के शास्त्रीय लक्षणों का वर्णन है। भगवती दुर्गा के अष्टभुज या दशभुज स्वरूप, सिंह-वाहन, तथा महिषासुर-मर्दिनी रूप के निर्माण का नियम बताया गया है। गणेश जी के एकदंत, गजानन स्वरूप तथा कार्तिकेय जी के मयूर-वाहन का सुंदर चित्रण मूर्तिकला के मानकों के अनुसार प्रस्तुत है।

261 – पीठासन तथा प्रतिमा-पीठिका विधान

देव-प्रतिमाओं को स्थापित करने हेतु निर्मित होने वाली पीठिकाओं (पेडेस्टल/आसन) के लक्षणों का निरूपण किया गया है। भद्रपीठ, महापीठ, तथा सर्वतोभद्र पीठ के माप और जल-निकासी (प्रनाल) के नियमों का विधान है। सुदृढ़ और शास्त्रीय पीठिका पर विराजित प्रतिमा ही स्थिर फल प्रदान करती है और पूजक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है।

262 – शिवलिंग-लक्षण तथा लिंग-प्रतिष्ठा विधान

भगवान महेश्वर के पावन शिवलिंग के निर्माण हेतु उत्तम शिला के चयन और उसके तीन भागों (ब्रह्मभाग, विष्णुभाग, रुद्रभाग) के परिमाण का सूक्ष्म विज्ञान वर्णित है। स्वयंभू, बाणलिंग, तथा निर्मित लिंगों के अंतर को स्पष्ट किया गया है। शिवलिंग की शास्त्रीय प्रतिष्ठा करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसका कुल धन-धान्य से परिपूर्ण रहता है।

263 – मण्डप-लक्षण तथा मण्डप-निर्माण विधान

देव-प्रतिष्ठा अनुष्ठान हेतु निर्मित किए जाने वाले विशाल यज्ञ-मण्डप की विधि बताई गई है। मण्डप की वेदियों, कुंडों, तोरणों, तथा ध्वजाओं की निश्चित दिशाओं का निरूपण है। मण्डप को सुगन्धित पुष्पों, कल्पवृक्ष के पत्तों, तथा शुभ कलशों से अलंकृत करने से यज्ञ-स्थल पर समस्त देवगण और ऋषियों का प्रत्यक्ष आगमन होता है।

264 – देव-प्रतिष्ठा तथा अधिवासन विधान

निर्मित देव-प्रतिष्ठा के पावन अवसर पर प्रतिमा को जागृत करने हेतु ‘अधिवासन’ संस्कार की विधि वर्णित है। प्रतिमा को जलाधिवेश (जल में निवास), धान्याधिवास (अन्न में निवास), तथा शय्याधिवास कराया जाता है। वेद मन्त्रों के उच्चार से प्रतिमा में परमात्मा की दिव्य चेतना समाहित होती है और वह साक्षात देव स्वरूप बन जाती है।

265 – प्रतिमा-स्नान तथा पवित्र जलाभिषेक विधान

अधिवासन के उपरांत प्रतिमा को विभिन्न औषधियों, पञ्चामृत, सुगन्धित द्रव्य, तथा सहस्र छिद्रों वाले कलश से पवित्र सरिताओं के जल द्वारा स्नान कराने का विधान है। इस महास्नान से प्रतिमा के समस्त निर्माण-दोष दूर हो जाते हैं और उसमें अलौकिक कांति प्रकट होती है जो दर्शनार्थियों का कल्याण करती है।

266 – देव-प्रतिष्ठा एवं न्यास विधान

प्रतिमा के अंग-प्रत्यंग में वैदिक मन्त्रों द्वारा देव-शक्तियों को स्थापित करने वाले ‘न्यास’ विधान का निरूपण किया गया है। नयनोन्मीलन (प्रतिमा के नेत्रों को स्वर्ण-शलाका से खोलना) की अति संवेदनशील विधि बताई गई है। जब प्रभु के नेत्र खुलते हैं, तब सर्वप्रथम गो-दर्शन और मिष्ठान्न अर्पित कर महाआरती उतारी जाती है।

267 – प्रतिष्ठा-अग्निहवन तथा महाहोम विधान

प्रतिष्ठा समारोह के चरमोत्कर्ष पर यज्ञ-मंडप में की जाने वाली महाहोम विधि का सविस्तार वर्णन है। मुख्य आचार्य तथा वेदों के ज्ञाता ऋत्विज् नवग्रहों, लोकपालों, तथा मूल देव के निमित्त घृत, समिधा, तथा हविष्य की सहस्रों आहुतियाँ समर्पित करते हैं। इस हवन के धुएं से वातावरण परम पवित्र हो जाता है।

268 – जगती-लक्षण तथा मन्दिर-प्रतिष्ठा विधान

मन्दिर की ऊँची नीव (जगती) की सुदृढ़ता तथा संपूर्ण मन्दिर प्रांगण की प्रतिष्ठा करने की विधि बताई गई है। मन्दिर के गर्भगृह में मुख्य प्रतिमा की स्थापना कर उसे सुवर्ण की कील से पीठिका पर अचल किया जाता है। मन्दिर की प्रतिष्ठा से राजा और प्रजा दोनों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

269 – प्रासाद-लक्षण तथा मन्दिर-वास्तु सम्पन्नता

मन्दिर-वास्तु के संपूर्ण अवयवों जैसे प्राचीर, गोपुरम, शिखर, तथा कलश के सामंजस्य का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। मन्दिर के निर्माण में किसी भी प्रकार की वास्तु-त्रुटि न रहने पाए, इसके उपाय बताए गए हैं। पूर्ण रूप से निर्मित प्रासाद साक्षात भगवान का दिव्य देह माना गया है।

270 – कलश-प्रतिष्ठा तथा मन्दिर-शिखर विधान

मन्दिर के सर्वोच्च शिखर पर सुवर्ण या ताम्र के दिव्य कलश तथा चक्र/त्रिशूल की प्रतिष्ठा करने की पावन विधि वर्णित है। शिखर पर ध्वजारोहण और कलश-प्रतिष्ठा होते ही मन्दिर में देव-सत्ता का पूर्ण प्रादुर्भाव हो जाता है। दूर से भी मन्दिर के शिखर का दर्शन करने वाला प्राणी समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष पाता है।

271 – कलियुग के भावी राजवंशों का वर्णन

भगवान मत्स्य ने वैवस्वत मनु को द्वापर के अंत के पश्चात् कलियुग में आने वाले भावी ऐतिहासिक राजवंशों का प्रामाणिक विवरण सुनाया। मगध के राजवंश, इक्ष्वाकु वंश के भावी राजा, पौरव वंश, तथा शुंग वंश के राजाओं के नाम और उनके शासन-काल का सटीक काल-चक्र निरूपित किया गया है।

272 – राजवंशों की वंशावली तथा काल-मान निरूपण

आंध्र राजवंश, गुप्त वंश, आभीर, तथा मुरुण्ड राजाओं की वंशावली का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत किया गया है। इन भावी राजाओं के शासन की अवधि, उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों, तथा काल-चक्र के प्रभाव से साम्राज्य के उत्थान और पतन का सूक्ष्म भौगोलिक व ऐतिहासिक विवरण दिया गया है।

273 – कलियुग का प्रभाव तथा धर्म-स्थिति

कलियुग के अंतिम चरणों में समाज में आने वाले नैतिक ह्रास, अधर्म की वृद्धि, तथा मनुष्यों के आचरण का वर्णन है। जब पृथ्वी पर अधर्म की सीमा पार हो जाएगी, तब सर्वेश्वर प्रभु का कलि-अवतार (कल्कि अवतार) होकर पुनः धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा और सतयुग का पुनरागमन होगा।

274 – षोडश महादान निरूपण तथा दान-महिमा

सनातन परंपरा में वर्णित सर्वोच्च ‘षोडश महादानों’ (सोलह महान दान) की महिमा और पृष्ठभूमि का निरूपण किया गया है। भगवान मत्स्य ने बताया कि समर्थ राजाओं और समृद्ध गृहस्थों द्वारा निष्काम भाव से किए गए ये महादान दाता के जन्म-जन्मांतर के महापापों का नाश कर उसे सीधा प्रभु धाम पहुँचाते हैं।

275 – तुलापुरुष-महादान विधान तथा माहात्म्य

सोलह महादानों में प्रथम और सर्वश्रेष्ठ ‘तुलापुरुष-दान’ की विधि वर्णित है। एक विशाल तराजू (तुला) का निर्माण कर उसके एक पलड़े पर दाता और दूसरे पर समान भार का शुद्ध सुवर्ण, रत्न, अथवा अन्न रखकर ब्राह्मणों को दान दिया जाता है। यह दान समस्त पातकों से मुक्ति दिलाकर विष्णुलोक प्रदान करता है।

276 – हिरण्यगर्भ-महादान विधान तथा विधि

द्वितीय महादान ‘हिरण्यगर्भ-दान’ की प्रामाणिक विधि का आख्यान है। इसमें सुवर्ण का एक विशाल कलश (गर्भ रूप) बनाकर दाता उसमें प्रवेश कर पुनर्जन्म की भावना के साथ बाहर आता है। इस अनुष्ठान से दाता का भौतिक शरीर दिव्य हो जाता है और उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

277 – तिलपर्वत तथा धान्यपर्वत महादान विधान

तृतीय महादान ‘तिलपर्वत-दान’ तथा चतुर्थ ‘धान्यपर्वत-दान’ का विवरण दिया गया है। तिलों या धान्यों का विशाल पर्वत बनाकर उस पर सुवर्ण के लोकपालों की स्थापना कर पूजन किया जाता है। यह दान अकाल से रक्षा करता है और दाता के घर को सदा अन्न-धन से पूर्ण रखता है।

278 – सुवर्णपर्वत-महादान विधान तथा फल

पंचम महादान ‘सुवर्णपर्वत-दान’ की शास्त्रीय विधि बताई गई है। इसमें शुद्ध सुवर्ण के पर्वत की आकृति बनाकर उसे मणियों और वस्त्रों से सजाकर दान किया जाता है। यह महादान करने वाला चक्रवर्ती राजा बनकर तीनों लोकों में अक्षुण्ण यश प्राप्त करता है।

279 – कामधेनु-महादान विधान तथा विधि

छठे महादान ‘कामधेनु-दान’ का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इसमें सुवर्ण की गाय और बछड़े का निर्माण कर उन्हें अलंकृत किया जाता है। इस दान से दाता की समस्त लौकिक और पारलौकिक अभिलाषाएँ उसी प्रकार पूर्ण होती हैं जैसे स्वर्ग की दिव्य कामधेनु से।

280 – हिरण्याश्व-महादान विधान तथा माहात्म्य

सातवें महादान ‘हिरण्याश्व-दान’ की विधि का निरूपण है। इसमें सुवर्ण के परम कांतिमान अश्व का निर्माण कर सूर्यदेव के मन्त्रों से अर्चन कर दान दिया जाता है। यह दान साधक को सूर्य के समान ओज, तेज, तथा आरोग्य रूपी अमूल्य संपत्ति प्रदान करता है।

281 – हिरण्याश्व-रथ महादान विधान

आठवें महादान ‘हिरण्याश्व-रथ-दान’ की पावन विधि बताई गई है। इसमें चार सुवर्ण-घोड़ों से युक्त दिव्य स्वर्ण-रथ का निर्माण कर भगवान सूर्य या वासुदेव की प्रतिमा स्थापित कर दान किया जाता है। इस दान के पुण्य से दाता दिव्य विमान पर सवार होकर देवलोक गमन करता है।

282 – पंचलांगलक-महादान विधान तथा फल

नौवें महादान ‘पंचलांगलक-दान’ का विवरण दिया गया है। इसमें पाँच हल (लांगल) तथा फलदार उपजाऊ भूमि का दान वेदपाठी ब्राह्मणों को किया जाता है। यह दान कृषि सम्बंधी समृद्धि लाता है और दाता को भू-स्वामी बनाकर अक्षय पुण्य का भागी बनाता है।

283 – धरा-महादान विधान तथा विधि

दसवें महादान ‘धरा-दान’ (पृथ्वी-दान) की शास्त्रीय विधि वर्णित है। इसमें सुवर्ण की पृथ्वी का मानचित्र या प्रतीकात्मक स्वरूप बनाकर उसका पूजन कर दान दिया जाता है। इस महादान से संपूर्ण पृथ्वी के दान का पुण्य प्राप्त होता है और समस्त पाप भस्म हो जाते हैं।

284 – रत्नाचल-महादान विधान तथा माहात्म्य

ग्यारहवें महादान ‘रत्नाचल-दान’ का आख्यान प्रस्तुत किया गया है। इसमें बहुमूल्य मणियों, हीरों, तथा रत्नों का पर्वत बनाकर उसे अर्पण किया जाता है। यह दान साधक को कुबेर के समान अतुलनीय ऐश्वर्य प्रदान करता है और दरिद्रता का नाश करता है।

285 – कल्पलता-महादान विधान तथा फल

बारहवें महादान ‘कल्पलता-दान’ की विधि बताई गई है। इसमें सुवर्ण की कल्पवृक्ष की लताएँ बनाकर उन पर विभिन्न फल और आभूषण लटकाकर दान किया जाता है। यह दान दाता की समस्त इच्छाओं को तत्काल सिद्ध कर उसे परम शांति देता है।

286 – कल्पवृक्ष-महादान विधान तथा विधि

तेरहवें महादान ‘कल्पवृक्ष-दान’ का सविस्तार वर्णन है। इसमें पूर्ण सुवर्ण-कल्पवृक्ष का निर्माण कर त्रिदेवों का आह्वान किया जाता है। यह महादान परम ज्ञान, वैराग्य, तथा मोक्ष प्रदान करने वाला सनातन धर्म का सर्वोच्च दान माना गया है।

287 – सुवर्णमातंग महादान विधान

चौदहवें महादान ‘सुवर्णमातंग-दान’ (सुवर्ण-हस्ती दान) की शास्त्रीय विधि निरूपित है। इसमें सुवर्ण के विशाल हाथी का निर्माण कर उसे सजाया जाता है। यह दान राजाओं को राज्य-सुरक्षा, विजय, तथा शत्रुओं पर आधिपत्य प्रदान करता है।

288 – लोकपाल महादान विधान तथा विधि

पंद्रहवें महादान ‘लोकपाल-दान’ का विवरण दिया गया है। इसमें आठों दसों दिशाओं के लोकपालों (इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण आदि) की सुवर्ण-प्रतिमाओं का पूजन कर दान किया जाता है। इस दान से संपूर्ण राष्ट्र पर आने वाली दैव बाधाएँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं।

289 – कल्पपादप महादान तथा उद्यापन विधान

सोलहवें महादान ‘कल्पपादप-दान’ तथा समस्त महादानों की सम्पूर्ति पर किए जाने वाले उद्यापन विधान का वर्णन है। विधिपूर्वक किए गए इन महादानों से यज्ञ-मंडप और संपूर्ण वातावरण में अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।

290 – महादान फलश्रुति तथा वंश-कल्याण

षोडश महादानों की महान फलश्रुति का भक्तिभावपूर्वक गान किया गया है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इन दान-विधियों का श्रवण करता है अथवा सामर्थ्यानुसार आचरण करता है, उसके कुल की सहस्रों पीढ़ियाँ तर जाती हैं और अंत में वह वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।

291 – मत्स्य पुराण उपसंहार तथा अंतिम फलश्रुति

मत्स्य पुराण के इस दो सौ ९१वें अंतिम अध्याय में संपूर्ण पुराण का मंगलमय उपसंहार प्रस्तुत किया गया है। महर्षि वेदव्यास जी की इस अमर वाणी को जो भी श्रद्धालु नित्य सुनता या पढ़ता है, उसे चारों पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष—की प्राप्ति होती है। सर्वेश्वर भगवान मत्स्य की कृपा से संपूर्ण चराचर जगत का कल्याण हो, इसी पावन प्रार्थना के साथ इस दिव्य पुराण का समापन होता है।

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