Read Brahma Vaivarta Purāṇa’s Prakṛti Khaṇḍa in Hindi

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ब्रह्म वैवर्त पुराण अष्टादश महापुराणों में परम पावन, भक्तिरस-से-आप्लावित एवं वैष्णव सिद्धान्तों का मुकुटमणि ग्रन्थ है। इसका द्वितीय खण्ड प्रकृति खण्ड के नाम से सुविख्यात है, जो सड़सठ (६७) अध्यायों में विस्तृत होकर परात्पर पूर्णब्रह्म सर्वेश्वर श्रीहरि श्रीकृष्ण की नित्य आह्लादिनी शक्ति ‘पराप्रकृति’ की परम महिमा, दिव्य प्राकट्य तथा अनन्त लीलाओं का गम्भीर आख्यान प्रस्तुत करता है। पूर्ववर्ती ब्रह्म खण्ड में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण से जगत् की उत्पत्ति का विधान वर्णित है, जबकि यह प्रकृति खण्ड स्पष्ट करता है कि किस प्रकार वह एक ही निराकार पराशक्ति ब्रह्माण्डीय कार्यों के संचालन हेतु दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती एवं सावित्री—इन पाँच मुख्य स्वरूपों तथा गंगा, तुलसी, षष्ठी, मनसा, मङ्गलाचण्डिका, स्वाहा, स्वधा, दक्षिणा एवं सुरभि आदि उप-शक्तियों के रूप में विस्तारित होती हैं।

यह अनुक्रमणिका (विषय-सूची) प्रकृति खण्ड के समस्त अध्यायों के पावन आख्यान को क्रमबद्ध भक्ति-भावमयी धारा में समाहित करती है। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं पराप्रकृति के नित्य अभेद सम्बन्ध, जगत् की समस्त नारियों के प्रति दिव्य सम्मान की अनिवार्यता, कर्म-विधान का गहन विवेचन, तुलसी एवं सावित्री के अलौकिक पातिव्रत्य, भगवती दुर्गा द्वारा महिषासुर-वध, तथा भाण्डीरवन में श्रीराधा-कृष्ण के अलौकिक दिव्य विवाह-उत्सव जैसी अमर गाथाएँ इस खण्ड में सजीव हो उठती हैं। इस पावन सार-संक्षेप का भक्तिपूर्वक श्रवण एवं पठन साधक के हृदय को श्रीराधा-कृष्ण के चरणारविन्दों की अनन्य प्रीति से आप्लावित कर परम आध्यात्मिक शान्ति प्रदान करता है।

अष्टादश महापुराणों में ब्रह्म वैवर्त पुराण परम श्रेष्ठ वैष्णव शास्त्र है। इसमें अठारह सहस्र श्लोक चार विशाल खण्डों में विभक्त हैं। इसका द्वितीय भव्य खण्ड प्रकृति खण्ड के नाम से जाना जाता है, जिसमें कुल सड़सठ अध्याय हैं। यह सम्पूर्ण खण्ड पराप्रकृति की दिव्य लीलाओं, ब्रह्माण्डीय प्राकट्य एवं अलौकिक महिमा को समर्पित है। प्रथम ब्रह्म खण्ड में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण से ब्रह्माण्ड की सृष्टि का वर्णन करने के पश्चात्, यह खण्ड प्रकट करता है कि किस प्रकार वह एक ही पराशक्ति अनन्त ब्रह्माण्डों में सृष्टि, पालन एवं मोक्ष के सम्पादन हेतु पाँच प्राथमिक देवियों—भगवती दुर्गा, भगवती राधा रानी, भगवती लक्ष्मी, भगवती सरस्वती एवं भगवती सावित्री—के रूप में तथा गंगा, तुलसी, षष्ठी, मनसा, स्वाहा, स्वधा आदि उप-शक्तियों के रूप में अभिव्यक्त होती हैं। यह खण्ड आगामी गणेश खण्ड एवं विशाल श्रीकृष्ण जन्म खण्ड का पावन द्वार है, जो यह सिद्ध करता है कि भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी नित्य शक्ति प्रकृति, अग्नि और उसकी उष्णता अथवा दुग्ध और उसकी धवलता के समान नित्य अभिन्न हैं।

प्रकृति खण्ड का मुख्य दार्शनिक सिद्धान्त सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं उनकी नित्य शक्ति पराप्रकृति का पूर्ण अभेद तत्व है। ग्रन्थ का एक प्रमुख स्तम्भ जगत् में दिव्य नारी-शक्ति की परम महिमा का गान करना है। इसमें स्पष्ट घोषणा की गई है कि इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक स्त्री—उच्चतम देवाङ्गना से लेकर साधारण भूलोक की कन्या तक—साक्षात् प्रकृति का ही प्रत्यक्ष अंश है; अतः नारियों का सम्मान, संरक्षण एवं पूजन प्रत्येक साधक का अनिवार्य आध्यात्मिक कर्तव्य है। यह ग्रन्थ विभिन्न नरकों एवं स्वर्गों में मिलने वाले कर्मफलों के गहन सिद्धान्त को भक्ति-मार्ग के साथ पिरोता है। पित्रों के तर्पण, तुलसी-गंगा की पावनता, सावित्री के दृढ पातिव्रत्य, महिषासुर पर भगवती दुर्गा की विजय तथा भाण्डीरवन में श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य विवाह के आख्यान यह दर्शाते हैं कि किस प्रकार भगवद्-कृपा सर्वत्र व्याप्त होकर जीवों का उद्धार करती है।

Read Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa’s Prakṛti Khaṇḍa Online in Hindi

Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa is organized as follows and hence reading is suggested in this order:

  1. ब्रह्म खण्ड
  2. प्रकृति खण्ड
  3. गणेश खण्ड
  4. श्रीकृष्ण जन्म खण्ड

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प्रकृति खंड – हर अध्याय का विवरण
प्रकृति खंड – मूल श्लोक का हिंदी अनुवाद

अनुक्रमणिका / विषय-सूची

१ – प्रकृति के लक्षण एवं पञ्चविध रूप

इस पावन कथा के प्रारम्भ में पूज्य श्रीसूत गोस्वामी जी ने महर्षि शौनक को भगवान् श्रीकृष्ण की परम दिव्य शक्ति पराप्रकृति के अलौकिक स्वरूप का वर्णन सुनाया। सर्वेश्वर भगवान् की सृष्टि-रचना की इच्छा मात्र से यह आदिप्रकृति सृष्टि, पालन एवं मोक्ष के सम्पादन हेतु पाँच देदीप्यमान रूपों में विस्तारित हुई। ये पाँच मुख्य देवियाँ हैं—शौर्य एवं शक्ति की स्वरूपा भगवती दुर्गा, परम दिव्य प्रेम की साक्षात् मूरति भगवती राधा रानी, समस्त ऐश्वर्य एवं सौन्दर्य प्रदात्री भगवती लक्ष्मी, ज्ञान एवं वाग्देवी भगवती सरस्वती, तथा वेदों की माता एवं सदाचारमयी भगवती सावित्री। ये सभी रूप सर्वेश्वर के मूल गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

२ – प्रकृति का प्राकट्य एवं ब्रह्माण्डीय विस्तार

कथा को आगे बढ़ाते हुए ग्रन्थ प्रकट करता है कि गोलोक धाम में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के विग्रह के वामाङ्ग से अव्यक्त आदिप्रकृति किस प्रकार साक्षात् प्रकट हुईं। प्रकट होते ही उन्होंने परमेश्वर को अगाध भक्ति से निहारा। भगवान् की इच्छा से वे पाँच मुख्य रूपों तथा अनन्त उप-शक्तियों में विभक्त हो गईं। उनकी दिव्य शक्तियों से लोक-माताएँ, पावन नदियाँ तथा विविध लोकों की रक्षक शक्तियाँ उत्पन्न हुईं। यह आख्यान बल देता है कि जगत् की समस्त नारियाँ इस पराशक्ति की ही प्रत्यक्ष अंश हैं।

३ – देवी सरस्वती का पूजन, स्तोत्र एवं कवच

यह अध्याय ज्ञान, कला एवं दिव्य वाणी की स्वामिनी भगवती सरस्वती के प्राकट्य, शास्त्रीय पूजन-विधान तथा गोपनीय रक्षा-कवच को प्रकाशित करता है। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के मानस से उत्पन्न भगवती सरस्वती निष्कपट हृदय से शरण में आने वाले साधकों को आन्तरिक विवेक, काव्य-स्फूर्ति एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती हैं। ब्रह्मा जी एवं श्रीविष्णु जी ने श्वेत कमलों, चन्दन एवं स्तोत्रों से उनका पूजन किया तथा उनके उस रहस्यमयी सरस्वती-कवच को प्रकट किया जो साधक की बुद्धि को अज्ञान एवं मोह से बचाdefense प्रदान करता है।

४ – सरस्वती, गंगा एवं लक्ष्मी जी का परस्पर विवाद

वैकुण्ठ के दिव्य दरबार में भगवान् श्रीनारायण की तीन प्रिय देवियों—सरस्वती, गंगा एवं लक्ष्मी जी के मध्य एक भावुक प्रसङ्ग घटित हुआ। जब श्रीनारायण ने देवी गंगा की ओर सस्नेह निहारा, तब देवी सरस्वती ने समानता के अभाव का अनुभव करते हुए अपना हृदयगत दुःख प्रकट किया। लक्ष्मी जी ने सौम्य वचनों से स्थिति को सम्भालने का प्रयास किया, किन्तु सरस्वती जी का रोष बढ़ गया और दोनों के मध्य एक उग्र वाक्-सङ्ग्राम छिड़ गया जो आगे चलकर महान् ब्रह्माण्डीय परिवर्तनों का कारण बना।

५ – सरस्वती, गंगा तथा लक्ष्मी जी के परस्पर शाप

वैकुण्ठ में विवाद उग्र होने पर दुःखित देवी सरस्वती ने गंगा जी को शाप दिया कि वे भौतिक संसार में पापी मनुष्यों के पाप धोने हेतु पञ्छमहाभूतों की पवित्र नदी रूप में अवतरित हों। इसके उत्तर में गंगा जी ने भी सरस्वती जी को पृथ्वी पर ज्ञान-सरिता के रूप में बहने का शाप दिया। शान्ति स्थापित करने का प्रयास कर रहीं सौम्य लक्ष्मी जी भी इस प्रसङ्ग में आ गईं और उन्हें पृथ्वी पर पावन तुलसी पौधे तथा पद्मावती नदी के रूप में अवतरित होने का विधान मिला। तब श्रीनारायण ने प्रवृत्त होकर स्पष्ट किया कि ये शाप भूलोक के आध्यात्मिक उद्धार हेतु दिव्य निमित्त मात्र हैं।

६ – पृथ्वी पर गंगा, सरस्वती एवं लक्ष्मी जी का अवतरण

दिव्य शापों में छिपे परम विधान को पूर्ण करते हुए, तीनों देवियाँ मानव जाति के आध्यात्मिक उद्धार हेतु भूलोक अवतरण के लिए उद्यत हुईं। लक्ष्मी जी राजा धर्मध्वज की तपस्विनी पुत्री के रूप में प्रकट होकर कालान्तर में पावन तुलसी का पौधा तथा पद्मावती नदी बनीं। गंगा जी राजर्षियों की कठोर तपस्या से भूलोक पर आईं, और सरस्वती जी गुह्य ज्ञान-सरिता के रूप में प्रवाहित हुईं। भगवान् श्रीनारायण ने उन्हें आश्वस्त किया कि करोड़ों जीवों का उद्धार करने के पश्चात् वे पुनः वैकुण्ठ धाम लौट आएँगी।

७ – गंगा जी का दिव्य प्राकट्य एवं ब्रह्माण्डीय महिमा

यह पावन अध्याय गोलोक में श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य यज्ञ के समय सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के चरण-कमलों के अमृत-द्रव से उत्पन्न गंगा जी के अलौकिक प्राकट्य का गान करता है। उच्च लोकों को पवित्र करती हुई, ब्रह्मा जी के लोक से होकर, भगवान् शिव के मस्तक पर बालचन्द्र के समीप विश्राम लेती हुई वे स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल—तीनों लोकों में त्रिपथगा बनकर प्रवाहित हुईं। ग्रन्थ वर्णन करता है कि गंगाजल की एक बूँद का स्पर्श अथवा उनके नाम का स्मरण सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्रदान करता है।

८ – गंगा जी हेतु राजा भगीरथ की तपस्या एवं स्तुति

महर्षि कपिलदेव के कोपाग्नि में भस्म हुए इक्ष्वाकु वंश के साठ सहस्र पितरों के उद्धार हेतु परम धार्मिक राजा भगीरथ ने सहस्रों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने स्वर्ग से उतरती गंगा जी के प्रचण्ड वेग को अपनी जटाओं में धारण करना स्वीकार किया। राजा भगीरथ ने तत्पश्चात् गंगा जी की भावपूर्ण स्तुति की और उनके पावन प्रवाह को अपने पूर्वजों के भस्म-स्थल तक ले जाकर उनका उद्धार किया।

९ – राजा सगर, महर्षि कपिलदेव की कथा एवं उद्धार

भगीरथ की वंशावली की कथा सुनाते हुए श्रीसूत गोस्वामी जी ने राजा सगर के सौवें अश्वमेध यज्ञ का आख्यान सुनाया। जब इन्द्र ने यज्ञ का घोड़ा चुराकर महर्षि कपिलदेव के आश्रम के समीप बाँध दिया, तब सगर के साठ सहस्र घमंडी पुत्रों ने ध्यानमग्न ऋषि को चोर समझकर उनका अपमान किया। महर्षि ने अपने तपोबल से उन्हें भस्म कर दिया। भगीरथ की भक्ति से गंगा जी के जल स्पर्श तक उनकी आत्माएँ बन्धन में रहीं, जो ऋषियों के अपमान के दुष्परिणाम और गंगा जी की अतुलनीय पावनता को सिद्ध करता है।

१० – गंगा जी की महिमा एवं आध्यात्मिक लाभ

यह प्रेरणादायी अध्याय गंगा जी के पावन जल का स्पर्श, दर्शन, स्नान एवं पान करने से मिलने वाले अनन्त पुण्यों, भौतिक समृद्धि तथा मोक्ष का वर्णन करता है। गंगा जी का स्मरण ही मनुष्य को महापापों से मुक्त कर दीर्घायु, आरोग्य, सुसन्तति एवं वैकुण्ठ लोक प्रदान करता है। अध्याय के अन्त में देवी गंगा का पावन स्तवन है, जो साधकों को उनके चरणारविन्दों का आश्रय लेने की प्रेरणा देता है।

११ – शङ्खचूड़ एवं तुलसी के पूर्वजन्म

कथा शङ्खचूड़ और तुलसी के पौराणिक इतिहास की ओर मुड़ती है, जो गोलोक धाम में उनके पूर्वजन्मों के रहस्यों को उद्घाटित करती है। शङ्खचूड़ पूर्वजन्म में श्रीकृष्ण के प्रिय गोप-मित्र सुदामा थे, और तुलसी एक परम रूपवती गोपिका थीं। गोलोक की एक दिव्य लीला के दौरान सुदामा और भगवती श्रीराधा रानी के मध्य हुए विवाद के कारण दोनों को परस्पर शाप मिला। सुदामा पृथ्वी पर शङ्खचूड़ नामक असुर बने और तुलसी मानव राजा की कन्या बनकर उनकी पत्नी बनीं।

१२ – शङ्खचूड़ की तपस्या एवं ब्रह्मा जी के वरदान

राजा दम्भ के तेजस्वी पुत्र के रूप में जन्मे शङ्खचूड़ में स्वाभाविक श्रेष्ठ गुण एवं आध्यात्मिक तपन थी। पुष्कर क्षेत्र में उन्होंने ब्रह्मा जी की प्रसन्नता हेतु सहस्रों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें ‘श्रीकृष्ण कवच’ प्रदान किया और वरदान दिया कि जब तक यह कवच उनके पास है और उनकी पत्नी का पातिव्रत्य अक्षुण्ण है, तब तक त्रिलोक में कोई भी उन्हें पराजित नहीं कर सकता।

१३ – शङ्खचूड़ एवं तुलसी का पावन विवाह

ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार शङ्खचूड़ बदरिकाश्रम गए, जहाँ राजकुमारी तुलसी दिव्य पति की प्राप्ति हेतु तपस्या कर रही थीं। उस पावन वातावरण में एक-दूसरे को देखते ही उनके हृदय में गोलोक के पूर्व-प्रेम की स्मृतियाँ जागृत हो गईं। ब्रह्मा जी के विधान से शङ्खचूड़ और तुलसी का गांधर्व विवाह सम्पन्न हुआ, और वे परम धर्मपरायण दांपत्य जीवन में प्रविष्ट हुए।

१४ – शङ्खचूड़ का त्रिलोक विजय

ब्रह्मा जी के वरदान, श्रीकृष्ण कवच तथा पत्नी तुलसी के पातिव्रत्य बल से शङ्खचूड़ ने धर्मसम्मत विशाल साम्राज्य स्थापित किया। किन्तु असुर स्वभाववश उन्होंने देवराज इन्द्र को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवों को उनके पदों से विस्थापित कर दिया। इसके बावजूद शङ्खचूड़ ने नीतिपूर्वक शासन किया, जिससे उसके राज्य में वैदिक यज्ञ होते रहे और प्रजा सुखी रही।

१५ – देवगणों का ब्रह्मा जी एवं श्रीविष्णु की शरण जाना

स्वर्ग एवं यज्ञ-भाग से वञ्चित देवगण इन्द्र के नेतृत्व में ब्रह्मा जी के पास सत्यलोक पहुँचे। ब्रह्मा जी उन्हें कैलाश ले गए, और पुनः सब मिलकर वैकुण्ठ में भगवान् श्रीविष्णु की शरण में गए। उनकी व्यथा सुनकर श्रीविष्णु ने प्रकट किया कि शङ्खचूड़ का वध केवल शिव जी के त्रिशूल से ही सम्भव है, किन्तु उसके लिए उसके पास से श्रीकृष्ण कवच का हटना और तुलसी के पातिव्रत्य का नियम पूर्ण होना आवश्यक है, जो उनके शाप-मोचन का भी मार्ग था।

१६ – शङ्खचूड़ की सभा में भगवान् शिव का दूत-प्रेषण

युद्ध से पूर्व धर्म-नीति का पालन करते हुए भगवान् शिव ने अपने गण पुष्पदन्त को शङ्खचूड़ के दरबार में शान्ति-दूत बनाकर भेजा। पुष्पदन्त ने शिव जी का सन्देश सुनाते हुए असुरराज से स्वर्गलोक देवों को लौटाने का अनुरोध किया। शङ्खचूड़ ने अपने तपोबल से अर्जित राज्य को लौटाने से मना कर दिया, जिससे शिव-सेना और असुर-सेना के मध्य महायुद्ध निश्चित हो गया।

१७ – दानव सेना एवं शिव-गणों का भीषण युद्ध

चन्द्रभागा नदी के तट पर भयंकर संग्राम छिड़ गया। दानव सेनापतियों के नेतृत्व में असुर सेना का सामना भगवान् शिव, कार्तिकेय जी एवं भगवती भद्रकाली की दिव्य शक्तियों से हुआ। आकाश में शस्त्रों की ज्वालाएँ कौंधने लगीं। भद्रकाली ने अपने उग्र रूप से सहस्रों दानवों का संहार किया, किन्तु शङ्खचूड़ पर्वत की भाँति अचल खड़ा रहा।

१८ – भगवान् शिव एवं शङ्खचूड़ का प्रत्यक्ष द्वन्द्वयुद्ध

अपनी सेना का विनाश देखकर शङ्खचूड़ स्वयं युद्धभूमि में उतरा और भगवान् शिव के साथ प्रत्यक्ष द्वन्द्वयुद्ध करने लगा। उसने शिव जी के प्रहारों को निष्फल करने वाले दिव्यास्त्र चलाए। शिव जी के अपार तपोबल के बावजूद शङ्खचूड़ के कवच एवं तुलसी के पातिव्रत्य के कारण उसे कोई क्षति नहीं पहुँची। तब शिव जी ने दिव्य विधान की प्रतीक्षा में युद्ध विश्राम किया।

१९ – श्रीविष्णु द्वारा तुलसी के पातिव्रत्य की परीक्षा

दिव्य विधान को पूर्ण करने हेतु सर्वेश्वर श्रीविष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर शङ्खचूड़ से दान में उसका श्रीकृष्ण कवच माँग लिया, जिसे शङ्खचूड़ ने सहर्ष दे दिया। तत्पश्चात् श्रीविष्णु ने शङ्खचूड़ का रूप धरकर तुलसी के महल में प्रवेश किया। तुलसी ने उन्हें अपना विजयी पति समझकर समागम किया। उस क्षण तुलसी के पातिव्रत्य का नियम पूर्ण होते ही शङ्खचूड़ की अभेद्य सुरक्षा समाप्त हो गई।

२० – शङ्खचूड़ वध तथा शालग्राम एवं तुलसी का प्राकट्य

तुलसी के पातिव्रत्य का नियम पूर्ण होते ही भगवान् शिव ने अपने त्रिशूल से शङ्खचूड़ का देह भस्म कर दिया और सुदामा की आत्मा गोलोक लौट गई। इधर तुलसी ने सत्य जानकर श्रीविष्णु को शिला बनने का शाप दिया। सर्वेश्वर श्रीविष्णु ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा कि वे गण्डकी नदी के तट पर पावन शालग्राम शिला बनेंगे और तुलसी का शरीर पवित्र तुलसी का पौधा बनेगा, जो उनकी पूजा में नित्य शिरोधार्य होगा।

२१ – तुलसी का पूजन, स्तोत्र एवं रक्षा-कवच

यह अध्याय तुलसी पौधे की शास्त्रीय पूजन-विधि, अष्टाक्षरी मन्त्र एवं रक्षा-कवच का वर्णन करता है। ग्रन्थ घोषणा करता है कि तुलसी-दल के बिना श्रीविष्णु की पूजा अपूर्ण है। एक तुलसी-दल अर्पित करने से सहस्रों गोदान का फल मिलता है। जिस घर में तुलसी का पावन पौधा फलित होता है, वह घर तीर्थसम हो जाता है और अकाल मृत्यु से रक्षा पाता है।

२२ – देवी सावित्री का प्राकट्य एवं पावन पूजन

कथा पराप्रकति के तीसरे मुख्य रूप भगवती सावित्री की ओर मुड़ती है। वे गायत्री मन्त्र, वेद-ज्ञान एवं धर्म-आचरण की अधिष्ठात्री देवी हैं। सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की रसना (जिह्वा) से प्रकट हुई सावित्री जी को ब्रह्मा जी की पत्नी के रूप में सृष्टि-रचना एवं वेदों के प्रसार हेतु प्रदान किया गया। यह अध्याय उनकी पूजन विधि, स्तोत्र एवं महिमा का गान करता है।

२३ – सत्यवान् के प्राणों हेतु सावित्री द्वारा यमराज का अनुगमन

पातिव्रत्य की अमर गाथा में सावित्री और सत्यवान् का इतिहास वर्णित है। सत्यवान् की अल्पायु का ज्ञान होते हुए भी सावित्री ने उनसे विवाह किया। निश्चित दिन जब वन में सत्यवान् के प्राण छूटे, तब यमराज स्वयं उनके प्राण लेने आए। सावित्री निर्भीक होकर यमराज के पीछे-पीछे यमलोक के दुर्गम मार्ग पर चल पड़ीं और अपने ज्ञानपूर्ण वचनों से यमराज को चर्चा में बाँध लिया।

२४ – सावित्री एवं यमराज का कर्म तथा भाग्य पर गम्भीर संवाद

सावित्री की अनन्य भक्ति एवं ज्ञान से प्रभावित होकर यमराज ने पति के प्राणों के अतिरिक्त अन्य वर माँगने को कहा। सावित्री ने चातुर्य से अपने श्वशुर (सत्यवान् के पिता) की आँखों की ज्योति एवं खोया हुआ राज्य माँग लिया। तत्पश्चात् उन्होंने यमराज से कर्म-सिद्धान्त, भाग्य एवं जीव के जन्म-मरण के गूढ़ प्रश्न पूछे, जिनका यमराज ने गम्भीर उत्तर दिया।

२५ – नरकों एवं कर्मफलों का विस्तृत वर्णन

सावित्री के प्रश्नों के उत्तर में यमराज ने छिहासी (८६) प्रकार के भयानक नरकों तथा पापियों को मिलने वाली यातनाओं का सविस्तर वर्णन किया। माता-पिता का अनादर करने वाले, गुरुद्रोही, दम्भी एवं जीवों को सताने वाले जीवों को नर्क में मिलने वाले दण्डों की व्याख्या की गई। यमराज ने स्पष्ट किया कि ये दण्ड जीव की आत्मा के शुद्धि-विधान हैं।

२६ – पुण्य कर्मों एवं स्वर्गलोक के सुखों का वर्णन

नरकों के वर्णन के पश्चात् यमराज ने धर्मपरायण जीवों को मिलने वाले स्वर्गलोक के सुखों एवं पुण्यों का वर्णन किया। जलाशय बनवाना, वृक्ष लगाना, अन्नदान, गो-सेवा एवं पातिव्रत्य धर्म के पालन से उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है। यमराज ने बताया कि सर्वेश्वर श्रीकृष्ण की भक्ति एवं नाम-कीर्तन से समस्त पाप भस्म हो जाते हैं।

२७ – यमराज द्वारा वरदान एवं सत्यवान् को पुनर्जीवन

सावित्री के निष्कंप धर्म एवं पातिव्रत्य से अति प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें सौ गुणवान् पुत्रों का अंतिम वरदान दिया। सावित्री ने विनम्रतापूर्वक तर्क दिया कि एक सती स्त्री पति के बिना पुत्र कैसे प्राप्त कर सकती है। यमराज अपने ही वरदान में बँध गए और उन्होंने सहर्ष सत्यवान् के प्राण मुक्त कर उन्हें चार सौ वर्ष की आयु एवं राज्य प्रदान किया।

२८ – सावित्री कथा की महिमा एवं समापन

यह अध्याय सावित्री को नारी-जाति के लिए पातिव्रत्य एवं तपोबल का सर्वोच्च आदर्श घोषित करते हुए समाप्त होता है। इस कथा का श्रवण करने वाली स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य एवं उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है। भगवती सावित्री गायत्री मन्त्र में सूक्ष्म रूप से विराजमान होकर साधकों की बुद्धि को सन्मार्ग पर चलाती हैं।

२९ – देवी लक्ष्मी का प्राकट्य एवं अनन्त ऐश्वर्य

कथा पराप्रकृति के चौथे मुख्य रूप भगवती लक्ष्मी जी की महिमा का गान करती है। वे श्रीनारायण की नित्य प्रियतमा तथा ऐश्वर्य, सौन्दर्य एवं समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं। गोलोक में श्रीकृष्ण के मानस से तथा सागर-मन्थन से प्रकट हुई लक्ष्मी जी अपने भक्तों को भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करती हैं। वे राजप्रासादों में राजलक्ष्मी तथा उत्तम गृहों में गृहलक्ष्मी के रूप में निवास करती हैं।

३० – देवी स्वाहा का प्राकट्य एवं पूजन विधि

यह अध्याय पराप्रकृति की उप-शक्ति देवी स्वाहा के पावन प्राकट्य की कथा सुनाता है। वे अग्निदेव की नित्य पत्नी हैं। प्रारम्भ में यज्ञों में दी जाने वाली आहुतियाँ स्वाहा नाम के बिना देवों तक नहीं पहुँचती थीं। देवों की प्रार्थना पर श्रीकृष्ण ने स्वाहा देवी को प्रकट किया और नियम बनाया कि प्रत्येक मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ का उच्चारण करने पर ही यज्ञ सफल होगा।

३१ – देवी स्वधा का प्राकट्य एवं पूजन विधि

स्वाहा देवी के प्राकट्य के पश्चात् पित्रों की तृप्ति हेतु देवी स्वधा का प्राकट्य हुआ। पितृलोक में पित्रों को तर्पण न पहुँचने पर ब्रह्मा जी की स्तुति से पराप्रकृति स्वधा देवी के रूप में प्रकट हुईं। श्राद्ध एवं तर्पण के समय ‘स्वधा’ शब्द के उच्चारण से पितृगण तृप्त होकर कुल को आरोग्य, दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

३२ – देवी दक्षिणा का प्राकट्य एवं पूजन

यह अध्याय यज्ञ-पुरुष की प्रियतमा देवी दक्षिणा के दिव्य प्राकट्य को प्रकाशित करता है। गोलोक में श्रीराधा जी के दाहिने स्कन्ध से प्रकट हुई देवी दक्षिणा धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात् गुरुओं एवं ब्राह्मणों को दिए जाने वाले पावन आदर-सत्कार का प्रतिनिधित्व करती हैं। योग्य दक्षिणा के बिना किए गए अनुष्ठान निष्फल हो जाते हैं, अतः दक्षिणा देवी का पूजन अनिवार्य है।

३३ – बाल-रक्षण हेतु देवी षष्ठी का प्राकट्य एवं पूजन

यह ममतामयी कथा ब्रह्मा जी की मानस पुत्री तथा कार्तिकेय जी की प्रियतमा देवी षष्ठी (देवसेना) के प्राकट्य का वर्णन करती है। वे नवजात शिशुओं की रक्षक देवी हैं। राजा प्रियव्रत के मृत जन्मे शिशु को देवी षष्ठी ने स्पर्श करके पुनर्जीवित कर दिया था। राजा ने कृतज्ञतापूर्वक बालक के जन्म के छठे दिन षष्ठी-पूजन (छठी) की परम्परा स्थापित की।

३४ – देवी मङ्गलाचण्डिका का प्राकट्य एवं पूजन

यह अध्याय भगवती दुर्गा के मंगलकारी रूप मङ्गलाचण्डिका के प्राकट्य एवं पूजन का वर्णन करता है। वे मङ्गल प्रदान करने वाली, विघ्नों का नाश करने वाली तथा शत्रुओं पर विजय देने वाली हैं। त्रिपुरासुर-वध से पूर्व भगवान् शिव ने इनका पूजन किया था। मंगलवार के दिन इनका पूजन करने से घर में सुख-समृद्धि एवं शान्ति बनी रहती है।

३५ – देवी मनसा का प्राकट्य एवं आख्यान

कथा महर्षि कश्यप की मानस पुत्री तथा शिव जी की शिष्या देवी मनसा की ओर मुड़ती है। वे नागों की स्वामिनी एवं सर्प-भय से रक्षा करने वाली हैं। कठोर तपस्या से उन्होंने श्रीकृष्ण के दर्शन प्राप्त किए। उनका विवाह महर्षि जरत्कारु से हुआ और उनके तेजस्वी पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के सर्प-सत्र यज्ञ से नागों की रक्षा की थी।

३६ – देवी मनसा का स्तोत्र, पूजन एवं महिमा

देवी मनसा के पूजन का विस्तार करते हुए यह अध्याय कश्यप ऋषि एवं धन्वन्तरि द्वारा रचित उनके द्वादशाक्षरी मन्त्र तथा स्तोत्र को प्रस्तुत करता है। नागपञ्चमी के दिन इनका पूजन करने से सर्पदंश का भय समाप्त हो जाता है और गृह में विषाक्त शक्तियों का नाश होता है।

३७ – सुरभि कामधेनु का प्राकट्य एवं पूजन

यह पावन अध्याय गोलोक में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण के मानस से प्रकट हुई सुरभि कामधेनु का गान करता है। वे समस्त कामधेनुओं की माता हैं। दीपावली के अगले दिन स्वयं श्रीकृष्ण ने गो-पूजन की परम्परा आरम्भ की थी। गो-सेवा एवं गो-रक्षण से घर में लक्ष्मी जी का नित्य निवास होता है।

३८ – दुर्वासा जी के शाप से लक्ष्मी जी का वैकुण्ठ से गमन

एक बार महर्षि दुर्वासा ने श्रीविष्णु की पावन वैजयन्ती माला देवराज इन्द्र को दी। इन्द्र ने अहङ्कारवश उसे अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया, जिसने उसे पाँव तले रौंद दिया। इस अनादर से क्रुद्ध होकर दुर्वासा जी ने इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप दिया, जिससे लक्ष्मी जी स्वर्ग त्यागकर क्षीरसागर में लीन हो गईं।

३९ – लक्ष्मी-प्राप्ति हेतु देवगणों द्वारा श्रीविष्णु की स्तुति

लक्ष्मी जी के चले जाने से स्वर्ग में दरिद्रता एवं दुर्बलता छा गई और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। ब्रह्मा जी के नेतृत्व में देवगण क्षीरसागर के तट पर पहुँचे और श्रीविष्णु की आकुल स्तुति की। भगवान् श्रीविष्णु ने उन्हें असुरों के साथ मिलकर समुद्र-मन्थन करने की सलाह दी।

४० – समुद्र-मन्थन एवं लक्ष्मी जी का पुनराविर्भाव

देवों और असुरों ने मन्दराचल पर्वत और वासुकि नाग की नेती बनाकर क्षीरसागर का मन्थन किया। श्रीविष्णु ने कूर्मावतारा धारण कर पर्वत को अपनी पीठ पर सम्भाला। मन्थन से कालकूट विष, ऐरावत, कल्पवृक्ष आदि रत्न निकले। अन्त में हाथ में कमल-माला लिए भगवती लक्ष्मी जी प्रकट हुईं और उन्होंने श्रीनारायण के वक्षःस्थल का वरण किया।

४१ – इन्द्र द्वारा लक्ष्मी जी का स्तवन एवं पूजन

अहङ्कारमुक्त होकर देवराज इन्द्र ने देवी लक्ष्मी का दिव्य स्तोत्रों से पूजन एवं स्तवन किया। इन्द्र की भक्ति से प्रसन्न होकर लक्ष्मी जी ने पुनः स्वर्ग में निवास करना स्वीकार किया और वरदान दिया कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाले के घर में वे सदा स्थिर रहेंगी।

४२ – प्रकृति की उपशक्तियों का सङ्क्षिप्त पुनरावलोकन

श्रीसूत गोस्वामी जी ने अब तक वर्णित सरस्वती, लक्ष्मी, गंगा, तुलसी, सावित्री, स्वाहा, स्वधा, दक्षिणा, षष्ठी, मङ्गलाचण्डिका, मनसा एवं सुरभि आदि प्रकृति की उप-शक्तियों की भूमिका का सङ्क्षिप्त पुनरावलोकन किया और सिद्ध किया कि ये सब एक ही पराशक्ति के विविध रूप हैं।

४३ – देवी दुर्गा का अलौकिक स्वरूप एवं प्राकट्य

अध्याय पराप्रकृति के परम तेजस्वी रूप भगवती दुर्गा की महिमा का गान करता है। वे श्रीराधा जी से अभिन्न पराशक्ति हैं। समस्त देवों के तेजोपुञ्ज से प्रकट हुई भगवती दुर्गा दानवों का संहार करने वाली तथा भक्तों की रक्षक हैं। वे दशभुजाओं में अस्त्र-शस्त्र धारण कर सिंह पर सवार रहती हैं।

४४ – महिषासुर वध हेतु देवी दुर्गा का अवतरण

जब महिषासुर ने त्रिलोक को जीतकर देवों को स्वर्ग से निकाल दिया, तब ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जी के क्रोध-तेज से हिमवान् पर्वत पर भगवती दुर्गा का प्राकट्य हुआ। समस्त देवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र देवी को समर्पित किए और जगज्जननी की जय-जयकार की।

४५ – देवी दुर्गा एवं महिषासुर का भीषण महासंग्राम

भगवती दुर्गा और महिषासुर की विशाल सेना के मध्य भयंकर संग्राम हुआ। महिषासुर ने हाथी, सिंह, दैत्य एवं महिष (भैंसे) के रूप बदलकर युद्ध किया। देवी ने लीलापूर्वक उसकी सेना का संहार किया और अंत में अपने सुदर्शन चक्र से महिषासुर का मस्तक काट दिया।

४६ – महिषासुर वध तथा ब्रह्मा जी एवं देवगणों द्वारा स्तुति

महिषासुर के वध से समस्त लोकों में आनन्द छा गया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं इन्द्र आदि देवों ने युद्धभूमि में देवी दुर्गा की भावपूर्ण स्तुति की। प्रसन्न होकर भगवती ने आश्वासन दिया कि जब-जब धर्म की हानि होगी, वे भक्तों की रक्षा हेतु पुनः अवतरित होंगी।

४७ – देवी दुर्गा की पूजन विधि, नवरत्न/नवरात्र व्रत एवं कवच

यह अध्याय नवरात्रोत्सव के समय देवी दुर्गा के शास्त्रीय पूजन, घटस्थापना, चण्डीपाठ एवं व्रत-नियमों का विस्तार से वर्णन करता है। साथ ही समस्त भयों, ग्रहों के अनिष्ठ एवं अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाले गोपनीय दुर्गा-कवच को प्रकट करता है।

४८ – भगवती श्रीराधा रानी की परम श्रेष्ठता एवं प्राकट्य

प्रकृति खण्ड अपने परम आध्यात्मिक शिखर पर पहुँचता है। पराप्रकृति के सर्वोत्तम रूप भगवती श्रीराधा रानी की अलौकिक महिमा का वर्णन है। गोलोक में श्रीकृष्ण की नित्य आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा जी परम दिव्य प्रेम की साक्षात् मूरति हैं। श्रीकृष्ण स्वयं उनकी भक्ति के वशीभूत हैं।

४९ – श्रीदामा का शाप एवं श्रीराधा जी का धरा-अवतरण

गोलोक की एक लीला में श्रीकृष्ण के प्रिय सखा श्रीदामा और श्रीराधा जी के मध्य विवाद होने पर श्रीदामा ने श्रीराधा जी को भूलोक में मानवी रूप में अवतरित होकर श्रीकृष्ण से सौ वर्ष का विरह सहने का शाप दिया। जगत्-कल्याण हेतु श्रीराधा जी ने इस शाप को रासलीला के निमित्त स्वीकार किया।

५० – बरसाना में श्रीराधा जी का अवतरण एवं बाल-लीलाएँ

व्रजमण्डल के बरसाना धाम में राजा वृषभानु एवं माता कलावती के यहाँ भगवती श्रीराधा जी का प्राकट्य हुआ। प्राकट्य के समय जब तक चिन्मय बालक श्रीकृष्ण सम्मुख नहीं आए, तब तक श्रीराधा जी ने अपने नेत्र नहीं खोले। श्रीकृष्ण के आते ही उन्होंने नेत्र खोलकर सभी को आनन्दित कर दिया।

५१ – भाण्डीरवन में श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा जी का पावन मिलन

बालक श्रीकृष्ण जब नन्दबाबा के साथ वन में गो-चारण हेतु गए, तब भाण्डीरवन में सहसा घटाएँ घिर आईं। उसी समय भगवती श्रीराधा रानी अपने पूर्ण दिव्य रूप में प्रकट हुईं। नन्दबाबा ने बालक श्रीकृष्ण को सप्रेम श्रीराधा जी की गोद में सौंप दिया। नन्दबाबा के जाते ही श्रीकृष्ण अपने किशोर द्विभुज रूप में प्रकट हो गए।

५२ – ब्रह्मा जी द्वारा श्रीराधा-कृष्ण का दिव्य विवाह

भाण्डीरवन के कुञ्ज में स्वयं ब्रह्मा जी सत्यलोक से पधारे। उन्होंने वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते हुए, अग्नि प्रज्वलित कर सर्वेश्वर श्रीकृष्ण एवं भगवती श्रीराधा रानी का अलौकिक दिव्य विवाह सम्पन्न कराया। विवाह कराकर ब्रह्मा जी ने दोनों के चरणों में प्रणाम किया।

५३ – श्रीराधा-कृष्ण की अप्राकृत दिव्य प्रेम-लीलाएँ

दिव्य विवाह के पश्चात् श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा जी ने वृन्दानवन के कुञ्जों एवं यमुना के तटों पर अलौकिक रासलीलाएँ कीं। करोड़ों गोपियों के साथ की गई यह रासलीला काम-गन्ध से रहित शुद्ध चिन्मय आत्मा और उसकी नित्य शक्ति का पावन महामिलन है।

५४ – श्रीराधा जी के गुण, महिमा एवं भक्ति-पूजन

यह अध्याय श्रीराधा जी के पावन मन्त्रों, दिव्य नामों एवं राधाष्टमी व्रत-विधान का वर्णन करता है। ग्रन्थ कहता है कि केवल एक बार ‘राधा’ नाम का कीर्तन करने से श्रीकृष्ण स्वयं भक्त के ऋणी हो जाते हैं। राधाष्टमी का व्रत करने वाले को गोलोक धाम की प्राप्ति होती है।

५५ – श्रीराधा सहस्रनाम एवं रक्षा-कवच

भगवान् शिव ने महर्षि नारद को श्रीराधा जी के सहस्रों पावन नामों की माला (श्रीराधा सहस्रनाम) तथा अभेद्य श्रीराधा-कवच का उपदेश दिया। इसका नित्य पाठ करने से साधक को श्रीकृष्ण की अनन्या भक्ति प्राप्त होती है।

५६ – श्रीराधा-कृष्ण के नित्य अभेद तत्व का गूढ़ रहस्य

यह दार्शनिक अध्याय स्पष्ट करता है कि श्रीकृष्ण और श्रीराधा दो नहीं, अपितु एक ही आत्मा के दो रूप हैं। जिस प्रकार दूध से धवलता और पुष्प से सुगन्ध अलग नहीं हो सकती, उसी प्रकार श्रीराधा से श्रीकृष्ण को पृथक् नहीं किया जा सकता।

५७ – राजा सुरथ एवं समाधि वैश्य का पूर्ववृत्तान्त

कथा राजा सुरथ की ओर मुड़ती है, जिनका राज्य दुष्ट मन्त्रियों ने छीन लिया था, तथा समाधि नामक वैश्य की ओर, जिसे उसकी स्त्री-पुत्रों ने धन छीनकर निकाल दिया था। दोनों मेधा ऋषि के आश्रम के पास वन में मिले और अपने दुःखों पर चर्चा करने लगे।

५८ – महर्षि मेधा द्वारा महामाया की शक्ति का उपदेश

महर्षि मेधा ने दोनों को समझाते हुए बताया कि अपकारी सम्बन्धियों के प्रति यह व्यर्थ का मोह पराप्रकृति की ‘महामाया’ शक्ति के कारण है। वही महामाया जगत् को मोह में बाँधती है, और प्रसन्न होने पर मुक्ति एवं समृद्धि प्रदान करती है।

५९ – राजा सुरथ एवं समाधि वैश्य की कठोर तपस्या

ऋषि के उपदेश से प्रेरित होकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने नदी तट पर देवी दुर्गा की मृण्मयी मूर्ति बनाकर तीन वर्षों तक कठोर तपस्या एवं आकुल पूजन किया।

६० – देवी दुर्गा का प्रत्यक्ष दर्शन एवं दिव्य वरदान

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवती दुर्गा प्रकट हुईं। उन्होंने राजा सुरथ को उनका खोया हुआ राज्य लौटाया तथा अगले जन्म में सावर्णि मनु बनने का वरदान दिया। वैश्य समाधि को उन्होंने परम ज्ञान एवं मोक्ष प्रदान किया।

६१ – पराप्रकृति का सर्वमातृ-स्वरूप एवं समन्वय

यह अध्याय स्पष्ट करता है कि बुद्धि में विवेक, सूर्य में प्रभा, पृथ्वी में क्षमा और भक्त में भक्ति साक्षात् पराप्रकृति ही हैं। वे ही समस्त जगत् की जननी एवं शक्ति हैं।

६२ – समस्त नारियों में प्रकृति का अंश एवं पवित्रता

पुराण का मुख्य नीति-सन्देश पुनः रेखाङ्कित किया गया है कि जगत् की समस्त नारियाँ प्रकृति का प्रत्यक्ष रूप हैं। स्त्री का तिरस्कार करने वाले का पतन होता है, जबकि नारी का सम्मान करने वाले के घर में लक्ष्मी जी का नित्य वास होता है।

६३ – प्रकृति खण्ड के पठन एवं श्रवण का पुण्य-फल

इस प्रकृति खण्ड का भक्तिपूर्वक पठन अथवा श्रवण करने वाले गृहस्थ के गृह से दरिद्रता एवं रोग मिट जाते हैं। मुमुक्षु साधक को अनन्य कृष्ण-भक्ति तथा गोलोक धाम में नित्य वास प्राप्त होता है।

६४ – नारी सम्मान एक अनिवार्य आध्यात्मिक साधना

अध्याय स्पष्ट करता है कि नारियों का सम्मान केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, अपितु आध्यात्मिक साधना है। इतिहास गवाह है कि जिन राजाओं ने सती-साध्वी नारियों का अनादर किया, उनका सर्वनाश हो गया।

६५ – जगज्जननी के पवित्र मन्त्र, स्तोत्र एवं कवच

इस अध्याय में सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, दुर्गा एवं श्रीराधा जी के नित्य जप योग्य बीजाक्षर मन्त्र, स्तोत्र एवं कवचों का सङ्कलन दिया गया है, जो साधकों के लिए दैनिक साधना की निधि है।

६६ – पराप्रकृति एवं श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण शरणागति

आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्‍च शिखर ‘शरणागति’ का प्रतिपादन किया गया है। पराप्रकृति एवं श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में पूर्ण आत्म-समर्पण करने वाले जीव को भगवती स्वयं इस भवसागर से पार उतार देती हैं।

६७ – प्रकृति खण्ड का मङ्गलमय समापन एवं आशीर्वाद

सड़सठ अध्यायों की इस महागाथा को पूर्ण करते हुए श्रीसूत गोस्वामी जी ने नैमिषारण्य में ऋषियों को, पराप्रकृति को तथा श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए मङ्गल आशीर्वाद दिया। प्रकृति खण्ड यहाँ परम गरिमा एवं अलौकिक प्रेमानन्द के साथ पूर्ण होता है।

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Brahma Vaivarta Mahā Purāṇa is organized as follows and hence reading is suggested in this order:

  1. ब्रह्म खण्ड
  2. प्रकृति खण्ड
  3. गणेश खण्ड
  4. श्रीकृष्ण जन्म खण्ड

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प्रकृति खंड – हर अध्याय का विवरण
प्रकृति खंड – मूल श्लोक का हिंदी अनुवाद

Published: August 3, 2026·Updated: August 6, 2026