Read Brahma Maha Purāṇa in Hindi Online

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अशेष महापुराणों में प्रथम एवं आदिपुराण के रूप में समादरणीय श्री ब्रह्म पुराण अत्यंत पवित्र एवं प्राचीन धर्मग्रंथ है। स्वयं जगत्स्रष्टा भगवान ब्रह्मा द्वारा महर्षि मरीचि को उपदिष्ट होने के कारण इसे ब्रह्म पुराण के नाम से जाना जाता है। इस पवित्र पुराण में मुख्य रूप से दो भाग पूर्वाद्ध और उत्तराद्ध प्राप्त होते हैं, जिनमें कुल दो सौ पैंतालीस अध्याय सन्निहित हैं। इसके पूर्वाद्ध भाग में सृष्टि की उत्पत्ति, देवों एवं ऋषियों के वंश, भूगोल, पृथु चरित्र, सूर्यवंश एवं चंद्रवंश का विस्तृत वर्णन तथा विविध तीर्थों की पावन महिमा वर्णित है। विशेष रूप से इसमें उड़ीसा क्षेत्र के पुरुषोत्तम क्षेत्र अर्थात् श्री जगन्नाथ पुरी, कोणार्क सूर्य मंदिर तथा विविध पवित्र तीर्थों का अत्यंत मनोहर और विशद आख्यान प्राप्त होता है। उत्तराद्ध भाग को मुख्य रूप से श्री कृष्ण चरितामृत और गौतम उमा संवाद के साथ-साथ तीर्थ महात्म्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ श्रीकृष्ण की बाललीलाओं, गोकुल एवं द्वारका के पावन प्रसंगों तथा योग एवं भक्ति के मार्ग का निरूपण किया गया है। यह दिव्य पुराण मानवमात्र को संसार के दुःखों से तारकर परमात्मा के चरणों में निष्काम भक्ति प्रदान करने वाला एक महान आध्यात्मिक सेतु है।

ब्रह्म पुराण – मुख्य विषय एवं दर्शन

श्री ब्रह्म पुराण का मूल दर्शन परमपिता ब्रह्मा, सर्वव्यापक श्रीहरि विष्णु तथा देवाधिदेव महादेव की अभेदता पर आधारित है, जहाँ संपूर्ण ब्रह्मांड को एक ही परमात्मा का सगुण एवं निर्गुण स्वरूप माना गया है। इस पुराण का मुख्य विषय सृष्टि रचना, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सनातन सिद्धांतों का प्रतिपादन तथा तीर्थयात्रा की महत्ता को स्थापित करना है। इसमें पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री जगन्नाथ पुरी की अनुपम महिमा गाई गई है, जहाँ भगवान श्री जगन्नाथ के दर्शन और भक्ति मात्र से जीव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, इस ग्रंथ में सूर्य उपासना, नर्मदा तथा गोदावरी नदी के तट पर स्थित तीर्थों का महत्व, वर्णाश्रम धर्म, कर्मविपाक तथा ज्ञान और योग का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है। यह पुराण बारम्बार यह संदेश देता है कि निष्काम भाव से ईश्वर का स्मरण, पवित्र तीर्थों का सेवन और प्राणिमात्र के प्रति दया भाव ही कलियुग में परम कल्याण का एकमात्र अक्षय साधन है।

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केवल अनुवाद

विषय

अध्याय 1 – महर्षि लोमहर्षण का आगमन और मुनियों की जिज्ञासा

नैमिषारण्य के परम पवित्र आश्रम में सत्रयाग का अनुष्ठान कर रहे शौनकादि ऋषियों के समक्ष सूतजी अर्थात् महर्षि लोमहर्षण का शुभ आगमन होता है। मुनिगण अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव से सूतजी का पूजन करते हैं और उनसे संसार की सृष्टि, इसके रक्षक एवं संहारक परमात्मा के स्वरूप तथा आदिपुराण ब्रह्म पुराण की पावन कथा सुनाने की विनम्र प्रार्थना करते हैं।

अध्याय 2 – सृष्टि का आद्य प्राकट्य और ब्रह्मा जी की उत्पत्ति

सूतजी ऋषियों को बताते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में केवल एक अखंड, अनादि, अनंत निरंजन परमब्रह्म ही विद्यमान थे। उन्होंने अपनी इच्छा से जल की सृष्टि की और उसमें बीज स्थापित किया, जो एक स्वर्णमय महान अण्ड के रूप में प्रकट हुआ और उसी जगदण्ड के भीतर से संपूर्ण लोक के पितामह स्वयं ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ।

अध्याय 3 – प्रजापतियों की सृष्टि और मानस पुत्रों का प्राकट्य

सृष्टि कार्य को आगे बढ़ाने के लिए भगवान ब्रह्मा ने अपने मन से मरिचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और दक्ष जैसे महान ऋषियों को उत्पन्न किया। इन मानस पुत्रों के साथ-साथ ब्रह्मा जी के शरीर से धर्म, अधर्म तथा संकल्प का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने जगत् के नियमन एवं जन-संरचना का दायित्व संभाला।

अध्याय 4 – स्वायंभुव मनु और शतरूपा की उत्पत्ति

सृष्टि के मैथुनी विकास हेतु ब्रह्मा जी ने अपने स्वरूप को दो भागों में विभक्त किया, जिनमें से एक भाग से स्वायंभुव मनु और दूसरे भाग से शतरूपा का प्राकट्य हुआ। इन दोनों के पवित्र संगम से प्रियव्रत, उत्तानपाद नामक दो पुत्रों और आकूति, देवहूति तथा प्रसूति नामक तीन कन्याओं का जन्म हुआ, जिनसे संसार का वंश चक्र चला।

अध्याय 5 – दक्ष प्रजापति की संतति और देव-दैत्य उत्पत्ति

दक्ष प्रजापति की कन्याओं के विवाह धर्म, कश्यप और अन्य ऋषियों के साथ हुए। महर्षि कश्यप की अदिति, दिति, दनु और कद्रू जैसी देवियों से आदित्य, दैत्य, दानव, नाग और अन्य समस्त चराचर जीवों की उत्पत्ति हुई, जिससे तीनों लोक विविध जातियों और प्राणियों से परिपूर्ण हो गए।

अध्याय 6 – सम्राट पृथु का जन्म और गोदोहन कथा

राजा वेन के अत्याचारों के पश्चात ऋषियों द्वारा उनके दाहिने हाथ के मंथन से परम धार्मिक राजा पृथु का प्राकट्य हुआ। राजा पृथु ने प्रजा को भुखमरी से बचाने के लिए भूदेवी का दोहन किया और समतल भूमि बनाकर अन्न, औषधि और सुंदर नगरों की स्थापना करके सर्वत्र मंगल एवं समृद्धि का विस्तार किया।

अध्याय 7 – मन्वन्तरों का निरूपण और काल चक्र

सूतजी मुनियों को चौदह मन्वन्तरों की व्यवस्था, प्रत्येक मन्वन्तर के मनु, सप्तर्षि, इंद्र और देवगणों के विषय में विस्तार से बताते हैं। इसके साथ ही कृत, त्रेता, द्वापर और कलि नामक चार युगों के काल परिमाण तथा ब्राह्म वर्ष की गणना का सूक्ष्म ज्ञान प्रदान करते हैं।

अध्याय 8 – सूर्यवंश का प्राकट्य और राजा इक्ष्वाकु की कथा

भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रसिद्ध सूर्यवंश की स्थापना हुई, जिसमें राजा इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए। इस वंश में अनेक निष्ठावान, दानवीर और पराक्रमी राजाओं का जन्म हुआ, जिन्होंने पृथ्वी पर न्याय, सत्य और सनातन धर्म के ध्वज को उच्च रखा।

अध्याय 9 – राजा मान्धाता और सौभरी ऋषि का आख्यान

सूर्यवंश के महान चक्रवर्ती राजा मान्धाता के पराक्रम और उनके राज्य की सुख-समृद्धि का वर्णन इस अध्याय में आता है। इसी संदर्भ में सौभरी ऋषि का मान्धाता की पचास कन्याओं से विवाह, उनके तपस्या भंग होने का अहसास और अंततः पुनर्विज्ञान प्राप्त कर परमपद पाने की कथा वर्णित है।

अध्याय 10 – राजा हरिश्चंद्र और सम्राट सगर की कथा

सत्यनिष्ठा के प्रतीक राजा हरिश्चंद्र के त्याग और तपस्या की महिमा गायी गई है। इसके पश्चात राजा सगर के अश्वमेध यज्ञ, कपिल मुनि के कोप से उनके साठ हजार पुत्रों का भस्म होना तथा सगर के वंशज द्वारा भगीरथ प्रयास की पृष्ठभूमि तैयार होने का वृत्तांत कहा गया है।

अध्याय 11 – श्री भगीरथ का तप और पावन गंगावतरण

राजा सगर के पूर्वजों के उद्धार हेतु राजा भगीरथ ने कल्पवृक्ष-तुल्य कड़ा तप किया और भगवान शिव तथा ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर स्वर्गगंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया। पावन गंगा जी के जल से सगर पुत्रों का उद्धार हुआ और गंगाजी संपूर्ण जगत को पवित्र करने वाली परम पावनी नदी बनीं।

अध्याय 12 – राजा रामचन्द्र का पावन चरित्र

सूर्यवंश के मुकुटमणि भगवान श्री रामचंद्र जी के अवतारी चरित्र का मधुर वर्णन किया गया है। उनके सत्यव्रत, पितृभक्ति, रावण वध, लंका विजय और अयोध्या में रामराज्य की स्थापना का गुणगान करते हुए बताया गया है कि श्री राम का स्मरण ही प्राणी को परम गति प्रदान करता है।

अध्याय 13 – चंद्रवंश का उद्भव और राजा पुरूरवा की कथा

भगवान सोम अर्थात् चंद्रमा से चंद्रवंश के प्राकट्य की कथा कही गई है। इस वंश में महान राजा पुरूरवा का जन्म हुआ और उनकी देवलोक की देवांगना उर्वशी के साथ अलौकिक प्रेम कहानी तथा अग्नि-स्थापना के पवित्र विधान का प्रतिपादन किया गया।

अध्याय 14 – राजा ययाति का चरित्र और वैराग्य ज्ञान

चंद्रवंश के राजा ययाति द्वारा अपने पुत्र पूरु से यौवन प्राप्त करने, वर्षों तक विषय भोगों को भोगने के उपरांत यह सत्य समझने की कथा है कि भोगों से तृष्णा कभी शांत नहीं होती। अंततः राजा ययाति ने पूर्ण वैराग्य धारण कर भगवान के चरणों में चित्त लगाया।

अध्याय 15 – यदुवंश का प्राकट्य और वसुदेव जी की उत्पत्ति

राजा ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु से यदुवंश का प्राकट्य हुआ, जो परम पवित्र और स्वयं भगवान श्रीहरि के अवतरण की लीलास्थली बना। इसी वंश में महाभागवत वसुदेव जी का जन्म हुआ, जिनके गृह में स्वयं जगन्नाथ का प्राकट्य होना निश्चित हुआ।

अध्याय 16 – पृथ्वी की भौगोलिक संरचना और जम्बूद्वीप

सूतजी ऋषियों को समूची पृथ्वी की भौगोलिक रचना, इसके सात महाद्वीपों, सागरों तथा केंद्र में स्थित सुवर्णमयी जम्बूद्वीप का विशद निरूपण करते हैं। वे मेरु पर्वत की भव्यता और उसके चारों ओर फैले सिद्ध क्षेत्रों की अलौकिकता का गान करते हैं।

अध्याय 17 – भारतवर्ष की अद्वितीय पावनता

समस्त द्वीपों और खण्डों में भारतवर्ष को सर्वोच्च कर्मभूमि के रूप में कल्पित किया गया है। यहाँ जन्म लेना देवों के लिए भी दुर्लभ है, क्योंकि यही वह पावन भूमि है जहाँ मनुष्य अपने सत्कर्मों, जप और तपस्या के द्वारा भगवान श्रीहरि की अनुकंपा प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

अध्याय 18 – पाताल लोक और अनंत नाग का स्वरूप

पृथ्वी के नीचे स्थित सात पाताल लोकों के अद्भुत विलास, वहां रहने वाले दैत्यों और नागों के ऐश्वर्य तथा सबसे नीचे हजार फणों पर संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करने वाले भगवान अनंत अर्थात् शेषनाग के महात्म्य का गान किया गया है।

अध्याय 19 – नरक लोकों का निरूपण और पाप कर्मफल

अधर्म, छल और दूसरों को पीड़ा देने वाले जीवों के लिए निर्धारित घोर नरकों का सजीव निरूपण किया गया है। सूतजी बतलाते हैं कि किस प्रकार के पाप से कौन सा नरक मिलता है, परंतु साथ ही यह आश्वासन देते हैं कि निष्कपट भाव से हरिनाम स्मरण करने वाला प्राणी समस्त नरक यातनाओं से छूट जाता है।

अध्याय 20 – सूर्य देव का रथ और मंडल व्यवस्था

सप्त अश्वों से युक्त भगवान सूर्य के दिव्य रथ, उनकी गति, उत्तरायण एवं दक्षिणायन चक्र तथा सूर्य की रश्मियों से जल के वाष्पीकरण और वर्षा होने की प्रक्रिया का खगोलीय एवं आध्यात्मिक वैज्ञानिक निरूपण किया गया है।

अध्याय 21 – कोणार्क सूर्य तीर्थ का महात्म्य

उत्कल देश अर्थात् उड़ीसा में समुद्र तट पर स्थित प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य क्षेत्र की अनुपम महिमा का गान किया गया है। इस पावन क्षेत्र में सूर्यदेव का पूजन करने से साधक के समस्त शारीरिक एवं मानसिक रोग दूर हो जाते हैं और उसे आरोग्य तथा मुक्ति की प्राप्ति होती है।

अध्याय 22 – पुरुषोत्तम क्षेत्र श्री जगन्नाथ पुरी का आगमन

सूतजी ऋषियों को संसार के परम दुर्लभ एवं पावन तीर्थ पुरुषोत्तम क्षेत्र अर्थात् श्री जगन्नाथ पुरी का परिचय देते हैं। वे बतलाते हैं कि यह क्षेत्र साक्षात नीलाचल धाम है, जहाँ भगवान श्रीहरि दारुब्रह्म के रूप में सर्वदा निवास करते हैं।

अध्याय 23 – राजा इंद्रद्युम्न की पावन कथा

मालवा के परम वैष्णव राजा इंद्रद्युम्न द्वारा भगवान श्री जगन्नाथ के प्राकट्य हेतु किए गए महान यज्ञों, तपोबल और भक्ति भाव का मनोहारी वर्णन किया गया है। राजा की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें नीलाचल क्षेत्र में पधारने का वरदान दिया।

अध्याय 24 – दारुब्रह्म का प्राकट्य और विग्रह निर्माण

समुद्र तट पर बहकर आई अलौकिक नीलमणिमय दारु अर्थात् पवित्र काष्ठ खंड से देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के अद्भुत दारु विग्रहों के निर्माण की अलौकिक कथा अत्यंत भक्ति भाव से वर्णित की गई है।

अध्याय 25 – श्री जगन्नाथ मंदिर की प्रतिष्ठा और उत्सव

राजा इंद्रद्युम्न द्वारा निर्मित भव्य मंदिर में स्वयं भगवान ब्रह्मा जी द्वारा दारु विग्रहों की स्थापना, महास्नान, रथयात्रा तथा विविध वार्षिक उत्सवों के अनुष्ठान का विधान बताया गया है, जो आज भी संपूर्ण जगत को भक्तिरस में सराबोर करता है।

अध्याय 26 – गुंडिचा यात्रा और रथयात्रा की महिमा

श्री जगन्नाथ जी की सुप्रसिद्ध रथयात्रा अर्थात् गुंडिचा यात्रा के महात्म्य का वर्णन करते हुए सूतजी कहते हैं कि जो भक्त रथ पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के दर्शन करता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से सदा के लिए छूट जाता है।

अध्याय 27 – पंचतीर्थ महात्म्य और स्नान फल

श्री जगन्नाथ पुरी में स्थित पंचतीर्थों – रोहिणी कुंड, अक्षयवट, मार्कंडेय सरोवर, श्वेतगंगा और इंद्रद्युम्न सरोवर के पावन महात्म्य का वर्णन किया गया है। इन तीर्थों में स्नान और दान करने से मनुष्य को सर्वतीर्थों के फल की सहज प्राप्ति होती है।

अध्याय 28 – श्री मार्कंडेय मुनि का आख्यान

परम भागवत मार्कंडेय ऋषि द्वारा प्रलय के भीषण जल में भगवान श्रीहरि के बाल रूप के दर्शन, उनके उदर में कोटि-कोटि ब्रह्मांडों की झांकी देखने तथा तत्पश्चात शिवकृपा से अमरत्व प्राप्त कर पुरी क्षेत्र में मार्कंडेय सरोवर स्थापित करने की कथा है।

अध्याय 29 – एकादशी व्रत की महिमा और नियम

समस्त व्रतों में शिरोमणि श्री एकादशी व्रत के महात्म्य का प्रतिपादन करते हुए बताया गया है कि इस दिन अन्न त्याग कर भगवान श्रीहरि का ध्यान और कीर्तन करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के महापाप भस्म हो जाते हैं।

अध्याय 30 – वर्णाश्रम धर्म और गृहस्थ जीवन के कर्तव्य

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के धर्मों का न्यायपूर्ण वर्णन तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रमों के दायित्वों का निरूपण किया गया है, जिसमें गृहस्थ आश्रम को समस्त समाज का मुख्य आधार स्तंभ स्वीकार किया गया है।

अध्याय 31 – श्राद्ध कल्प और पित्रों की तृप्ति

पितृपक्ष में पित्रों के निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की वैज्ञानिक एवं धार्मिक विधि का वर्णन है। श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से पित्र तृप्त होकर कुल को संतति, समृद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

अध्याय 32 – सदाचार का निरूपण और पावन जीवन शैली

मानव जीवन को शुद्ध एवं मंगलमय बनाने वाले आचार-विचार, स्वच्छता, माता-पिता एवं गुरुजन की सेवा, सत्यभाषण तथा अतिथिसत्कार जैसे नैतिक मूल्यों का सुंदर निरूपण किया गया है, जो चित्त की शुद्धि के लिए अनिवार्य हैं।

अध्याय 33 – गोदावरी नदी का प्राकट्य और गौतम ऋषि की कथा

महर्षि गौतम के तपोबल तथा भगवान शिव की कृपा से पावन गोदावरी नदी अर्थात् गौतमी गंगा के पृथ्वी पर प्राकट्य की अनुपम कथा है। गोदावरी के तट पर स्थित अनगिनत तीर्थों की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन इस अध्याय में प्रारंभ होता है।

अध्याय 34 – गौतमी तट के विविध पावन तीर्थ

गोदावरी नदी के दोनों तटों पर स्थित विभिन्न ऋषियों के आश्रमों, शिव लिंगों और विष्णु तीर्थों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है, जहाँ स्नान और ध्यान करने से साधक को तत्काल पापमुक्ति प्राप्त होती है।

अध्याय 35 – दान महिमा और सुपात्र लक्षण

धार्मिक जीवन में दान के महत्व का प्रतिपादन करते हुए अन्नदान, जलदान, वस्त्रदान तथा भूदान के महान फलों की चर्चा की गई है। सूतजी बतलाते हैं कि निष्काम भाव से सुपात्र को दिया गया दान अनंत गुना होकर दाता को प्राप्त होता है।

अध्याय 36 – कर्मविपाक और पापों का प्रायश्चित्त

कर्मों के गहन सिद्धांत कर्मविपाक की व्याख्या की गई है, जिसके अनुसार मनुष्य को अपने पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों का फल भिन्न-भिन्न योनियों एवं रोगों के रूप में भोगना पड़ता है। साथ ही प्रायश्चित्त के रूप में जप, तप और हरिनाम की महिमा बताई गई है।

अध्याय 37 – भगवान श्रीकृष्ण का कंस वध हेतु मथुरा आगमन

कंस द्वारा भेजे गए अक्रूर जी के साथ भगवान श्रीकृष्ण और बलराम का वृंदावन से मथुरा आगमन, मथुरा की नगर नारियों का आनंद तथा श्रीहरि द्वारा कंस के कुवलयापीड़ हाथी और मल्ल योद्धाओं का संहार वर्णित है।

अध्याय 38 – कंस वध और उग्रसेन का राज्याभिषेक

अधर्म के प्रतीक अत्याचारी कंस का भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मंच से खींचकर वध करने, अपने माता-पिता देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त कराने तथा धर्मात्मा उग्रसेन को मथुरा के सिंहासन पर बैठाने का पावन प्रसंग वर्णित है।

अध्याय 39 – द्वारका नगरी का निर्माण और यादवों का प्रवास

जरासंध के बारम्बार आक्रमणों से मथुरा की प्रजा को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा समुद्र के मध्य अति सुंदर एवं दिव्य द्वारका नगरी का निर्माण कराने तथा समस्त यादवों को वहां सुरक्षित बसाने का आख्यान है।

अध्याय 40 – भगवान श्रीकृष्ण का रुक्मिणी हरण और विवाह

विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी के प्रेमपूर्ण संदेश पर भगवान श्रीकृष्ण का अकेले जाकर रुक्मिणी जी का हरण करना, शिशुपाल आदि भूपालों के दर्प को चूर करना और द्वारका में शास्त्रीय विधि से महारानी रुक्मिणी से विवाह रचना वर्णित है।

अध्याय 41 – नरकासुर वध और पारिजात हरण

भौमासुर अर्थात् नरकासुर का संहार कर उसकी बंदी गृह से सोलह हजार एक सौ राजकन्याओं को मुक्त करना तथा देवलोक से पारिजात वृक्ष को लाकर द्वारका में सत्यभामा के आंगन में रोपित करने की श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला का गान है।

अध्याय 42 – बाणासुर युद्ध और उषा-अनिरुद्ध विवाह

सहस्रबाहु बाणासुर के साथ श्रीकृष्ण का घोर युद्ध, भगवान शिव के ज्वर को शांत करना, बाणासुर की भुजाओं का छेदन तथा अनिरुद्ध और उषा के शुभ विवाह की आनंदमयी कथा कही गई है।

अध्याय 43 – यदुवंश संहार और श्रीकृष्ण का स्वधाम गमन

गांधारी के शाप एवं मुनियों के शाप के व्याज से यादवों का परस्पर युद्ध में संहार होना, तथा भगवान श्रीकृष्ण का एक वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न अवस्था में जरा नामक व्याध के बाण को निमित्त बनाकर अपने परम धाम वैकुंठ लौटने का करुण एवं ज्ञानप्रद प्रसंग है।

अध्याय 44 – कलि काल के लक्षण और धर्म ह्रास

द्वापर युग के अंत के साथ कलि काल के आगमन, सर्वत्र अधर्म के प्रसार, संतों के उत्पीड़न, सत्य एवं पवित्रता के ह्रास का विस्तृत विवरण देते हुए बताया गया है कि कलियुग में केवल हरिनाम स्मरण ही एकमात्र नौका है।

अध्याय 45 – लय और प्रलय का विशद विवरण

ब्रह्मांड के चार प्रकार के प्रलय – नित्य, नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यंतिक प्रलय का गहन दार्शनिक विवेचन किया गया है। समस्त तत्वों का मूल प्रकृति में और प्रकृति का परमात्मा में विलीन होने का संहार चक्र समझाया गया है।

अध्याय 46 – ज्ञानयोग और अष्टांग योग का स्वरूप

चित्त की एकाग्रता हेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि रूपी अष्टांग योग की साधना का विशद निरूपण किया गया है, जिसके द्वारा साधक निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।

अध्याय 47 – सांख्य और वेदांत का समन्वय

प्रकृति और पुरुष के विवेक ज्ञान पर आधारित सांख्य दर्शन तथा ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ के वेदांत सिद्धांत का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया गया है, जो जिज्ञासु को अज्ञान के अंधकार से निकालकर परम ज्ञान के प्रकाश में ले जाता है।

अध्याय 48 – ब्रह्म पुराण की फलश्रुति और समापन

ब्रह्म पुराण के श्रवण, पठन और चिंतन के अगाध पुण्य फल का वर्णन करते हुए सूतजी कहते हैं कि इस आदिपुराण का भक्तिपूर्वक पाठ करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, उसे इहलोक में सर्व सुख तथा अंतकाल में ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

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